घरेलू हिंसा: डॉक्टरों की जागरूकता व संवेदना ज़रूरी

प्रिया दुग्गल

सात साल की मुन्नी स्कूल से घर आती है। उसके जूते धूल से सने हुए और चोटियां ढीली पड़कर खुल-सी गई हैं। आते ही सबसे पहले उसकी नज़रें अपनी मां को ढूंढती हैं। लेकिन उसकी दादी उसके हाथ से बस्ता लेकर उसे हाथ-मुंह धोने को कहती हैं। अंदर कमरे में सन्नाटा और घुप अंधेरा पसरा है। वह देखती है कि उसकी मां औंधे मुंह लेटी हुई है – एक आंख सूजी हुई और काली है, गालों पर चोट/नील के निशान हैं। मुन्नी पीछे से अपनी मां को आगोश में भर लेती हैं, लेकिन उसी समय अचानक मुन्नी को पेट में तेज़ दर्द का एहसास होता है।

घर सुनसान-सा है। दादी उसे खाना खाने को बोलती हैं। फिर उसके पिता घर आते हैं और खाना खाकर दादी के कमरे में सो जाते हैं। ये सब देख कर मुन्नी के मन में सवालों का गुबार-सा उठता है, लेकिन कुछ तो है जो उसे सवाल करने से रोकता है।

अगली सुबह वह अपनी मां को पड़ोसन से बात करते हुए सुनती है। “रात को मैंने कुछ आवाज़ें सुनी। ऐसा लगा कल तुम्हारी बारी थी।” और दोनों हंसने लगीं। मुन्नी कुछ समझी नहीं, लेकिन उसे पेट में फिर वही दर्द होने लगा। चिल्ला-चोट, दर्द भरी आवाज़ें, गहरी चोट के निशान, और फिर हंसी की आवाज़ – ये सब उसे सामान्य लगने लगे थे। मुन्नी मानने लगी थी कि शायद ऐसा ही होता है। कोई नाराज नहीं होता, कोई रोकता नहीं। ये मारपीट-चिल्लाना मानों रोज़मर्रा में शामिल हो गया था, जैसे गर्मी में लू का चलना, या जैसे किसी दिन नल नहीं आना।

मुन्नी चींटियों को अपने से दुगना बड़ा टुकड़ा ढोते देखती है। मुन्नी सोचती है कि “अगर हर किसी की बारी आती है, तो क्या एक दिन उसकी भी बारी आएगी?”

चुप्पी (Silence), सफाई (Justification) और हंसी-मज़ाक (Humor) की आड़ के ज़रिए मुन्नी अनकहा सबक सीख लेती है, स्वीकार कर लेती है कि घरेलू हिंसा सामान्य है। इतना सब देखकर वह सीखती है कि विरोध और संघर्ष (Resistance) की बजाय सहन करना (Endurance) ज़्यादा आसान और सुरक्षित है। घर का वह सर्द, नीरस माहौल उसके मन में उठे सवालों को दबा देता है। और सबसे अहम सबक सिखाता है कि जब परिवार और आम समाज के लोग हिंसा (Domestic Voilence) को सामान्य मान लेते हैं तो वे लोग भी हिंसा को नज़रंदाज़ करने लगते हैं जो रोज़ाना इसके शिकार हो रहे होते हैं।

परामर्श कक्ष (Consulting room) में हिंसा से पीड़ित महिला शायद ही कभी सीधे अपनी आपबीती बताए। लेकिन इसे समझा जा सकता है। जैसे इससे पीड़ित कोई बार-बार चोटें दिखाने के लिए आता/ती है, वहीं अन्य लोगों की शिकायत सिरदर्द, नींद न आना या पेट की खराबी जैसी समस्याओं की होती है। जब तक डॉक्टर और नर्स इन चोटों के पीछे के गैर-ज़ाहिर कारण समझने के लिए प्रशिक्षित नहीं होते, यह हिंसा दबी-छुपी ही रहेगी। डॉक्टर/नर्स और मरीज़ के बीच होने वाली चंद बातों में ही वह मौका है जब परामर्शदाता सुरक्षित और सार्थक तरीके से हस्तक्षेप कर पाए, या पीड़िता अपनी आपबीती बता पाए।

महिला सुरक्षा: वैश्विक समस्या

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, लैंगिक आधार पर महिलाओं को किसी भी प्रकार का शारीरिक, मानसिक, या यौन नुकसान पहुंचाना या पहुंचाने की कोशिश करना महिला के खिलाफ हिंसा माना जाएगा। दुनिया भर में महिलाओं के प्रति इस दुर्व्यवहार को मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन (Violation of Human Rights) और जन-स्वास्थ्य के लिए संकट (Public Health Concern) माना गया है।

डबल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि हर तीन में से एक महिला अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी न कभी शारीरिक या यौन शोषण से जूझती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं। ये बताते हैं कि 18 से 49 वर्ष की लगभग 29 प्रतिशत महिलाओं ने 15 साल की उम्र के बाद कभी न कभी शारीरिक शोषण (Physical Violence) और 6 प्रतिशत महिलाओं ने यौन शोषण का सामना किया है।

इन आंकड़ों के बावजूद केवल 14 प्रतिशत महिलाएं ही इसके खिलाफ आवाज़ उठा पाई हैं। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पापुलेशन साइंसेस (2021) के आंकड़े बताते है कि भारत में अपने जीवन साथी द्वारा घरेलू हिंसा (Intimate Partner Violence) समाज के हर वर्ग और हर जगह फैली है। शोषण और हिंसा के स्वास्थ्य (शारीरिक और मानसिक) परिणाम इतने गंभीर और दीर्घकालिक होते हैं कि एक मज़बूत स्वास्थ्य व्यवस्था ही इसकी शुरुआती पहचान और रोकथाम करने में सहायक साबित होगी।

महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार सिर्फ कानून और व्यवस्था (Law & Order) की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक ‘हेल्थ इमरजेंसी’ (Health Emergency) है जो हौले-हौले अस्पतालों, डिलीवरी वार्डों, आपात कक्षों और मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों में नज़र आएगी। गौरतलब है कि स्वास्थ्यकर्मी (Healthcare Providers) ही वे पहले या कभी-कभी एकमात्र व्यक्ति होते है, जिनके सामने पीड़ित महिलाएं खुलकर अपना दर्द बयां कर पाती हैं। ऐसे मुश्किल समय में एक डॉक्टर की भूमिका या तो केवल मूक दर्शक की हो सकती है या एक सच्चे मददगार की।

मानसिक आघात और बीमारियों का सीधा सम्बंध

भारतीय महिलाओं में होने वाली हिंसा का सीधा सम्बंध मानसिक तौर पर बढ़ते अवसाद (Depression), दुश्चिंता (Anxiety) और गहरे मानसिक सदमे (Mental Trauma ) से है। हिंसा से पीड़ित महिलाएं लगातार एक मानसिक तनाव (Mental Stress) में जीती हैं।

भले ही शारीरिक हिंसा न हो, लेकिन बदसलूकी और ‘दबाकर रखना’ जैसे व्यवहार (Non-physical forms of Violence) समय के साथ मानसिक तकलीफ को और बढ़ा देते हैं। यह इस ओर इशारा करता है कि मार-पीट के इतर हिंसा का मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। जीवन साथी द्वारा घरेलू हिंसा झेल रही लगभग सभी महिलाओं में मानसिक सदमे के लक्षण दिखते हैं। इन लक्षणों में रात में नींद न आना, चिड़चिड़ापन और अतीत के बुरे हादसे बार-बार याद आना शामिल हैं।

बात-बात में ताने देना, पाबंदियों से भरी ज़िंदगी, और मानसिक प्रताड़ना जैसे दुर्व्यवहार और मानसिक दबाव धीरे-धीरे शारीरिक समस्या (Physical Consequences) में तब्दील हो जाते हैं; जैसे हमेशा शरीर में दर्द या भारीपन महसूस होना। यह भावनात्मक आघात (Psychological abuse) और शारीरिक लक्षणों के आपसी सम्बंध को दर्शाता है। इसके साथ ही घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के बच्चों में भी आगे चलकर अवसाद और दुश्चिंता जैसी मानसिक बीमारियों की संभावना बढ़ती है। इससे ज़ाहिर होता है कि मानसिक असुरक्षा और आघात एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंच सकते हैं (Intergenerational transmission of violence)। 

पुरुषों की तुलना में महिलाएं अवसादरोधी (Antidepressent) दवाओं का ज़्यादा इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि वे शरीर की जीर्ण और आत्म-प्रतिरक्षा (शरीर प्रतिरक्षा क्षमता का खुद को नुकसान पहुंचाना) बीमारियों Chronic Illness & Auto-immune diseases) से जूझ रही हैं। यहां तक कि आजकल मल्टीपल स्क्लेरोसिस (Multiple Sclerosis) (केंद्रीय तंत्रिका की एक जीर्ण बीमारी) से पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज़्यादा ग्रस्त होती हैं। पहले यह पुरुषों और महिलाओं में लगभग बराबर देखी जाती थी। 

मशहूर लेखक और डॉक्टर, डॉ. गैबोर माटे तर्क देते हैं कि इंसानों का स्वास्थ्य उनके रिश्तों और आसपास के माहौल पर बहुत अधिक निर्भर रहता है। वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि लंबे समय तक मानसिक और भावनात्मक तनाव (Chronic Emotional stress) हमारे तंत्रिका, हॉर्मोनल, और प्रतिरक्षा तंत्र को इस हद तक असंतुलित कर देता है कि शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र खुद शरीर का दुश्मन बन बैठता है और जीर्ण समस्याएं पैदा होने लगती हैं।

अपनी किताब, व्हेन दी बॉडी सेस नो (जब शरीर ना कहे) (When The Body Says No) में वे लिखते हैं कि सदमा और लंबे समय तक तनाव शरीर की तनाव-प्रतिरोधी क्षमता को पूरी तरह से ध्वस्त कर देते हैं, और कई शारीरिक समस्याएं पैदा करते हैं। वे आगे लिखते हैं कि हमारे पुरुष-प्रधान समाज (Male dominated society) के मानदंड महिलाओं को ‘शॉक-एब्ज़ॉर्बर’ (Shock Absorber) की तरह प्रस्तुत करते हैं। अर्थात पुरुष-प्रधान समाज महिलाओं से उम्मीद रखता है कि वे खुद की ज़रूरतों, इच्छाओं, भावनाओं और मन की शांति को दरकिनार करके मात्र घर-परिवार की सुख-शांति को ही अपनी ज़िम्मेदारी समझें। समाज द्वारा थोपी गई इसी स्व-उपेक्षा (Self-supression) का नतीजा महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ता है।

स्वास्थ्य में व्यवस्थागत और सांस्कृतिक सीमाएं

यहां इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि चिकित्सक घरेलू हिंसा झेल रही महिलाओं की मदद तो करना चाहते हैं, लेकिन ढांचागत और सांस्कृतिक सीमाएं उन्हें रोकती हैं। मेडिकल की पढ़ाई (Traditional Medical Education) के दौरान स्वास्थ्य कर्मियों को जो अनुभव दिए जाते हैं उसमें और ज़मीनी हकीकत में बड़ा अंतर होता है।

मेडिकल की पढ़ाई में पूरा ध्यान बीमारियों, अंगों, पैथालॉजी जांच पर केंद्रित रहता है; उसमें मरीज़ की मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक स्थिति के लिए कोई जगह नहीं होती। नतीजतन, बाधाएं बरकरार रहती हैं। इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों को कोई खास प्रशिक्षण (Special Training) नहीं दिया जाता। साथ ही, कम समय में कई मरीज़ों को देखना (परामर्श का सीमित समय), निजी जीवन में दखलंदाजी का डर, कानूनी फसाद का डर, समस्या को उचित व्यक्ति/संस्था/जगह तक पहुंचाने सम्बंधी अपर्याप्त जानकारी, और खुलकर ऐसे गंभीर विषयों पर चर्चा करने में थोड़ी झिझक भी होती है।

इन कमियों को दूर करने के लिए संस्थाओं की प्रतिबद्धता (Institutional Commitment), कार्यबल के प्रशिक्षण (Workforce Education) और समग्र नीति निर्माण (Integrated Policy Development) ज़रूरी है। हालांकि कागज़ी कार्रवाइयां और समस्या को उचित जगह पहुंचाना ज़रूरी है, लेकिन साथ में चिकित्सा पाठ्यक्रमों और रोज़मर्रा के चिकित्सा अभ्यास में ‘ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड केयर’ (सदमा समझकर देखभाल) को शामिल करना भी उतना ही आवश्यक है। वैसे तो भारतीय स्वास्थ्य शिक्षा में विद्यार्थियों को आपातकालीन स्थितियों को संभालने, उनसे निपटने और उस समय शांत, सक्षम और निष्पक्ष बने रहने की पूरी तैयारी करवाई जाती है, लेकिन हिंसा जैसी गंभीर स्थितियों में डॉक्टरों का काम मरीज़ों को केवल दवाई देना, टांके लगाना या मेडिकल टेस्ट कराने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

डॉक्टर के लिए मरीज़ के इलाज के दौरान व्यावहारिक दूरी बनाने (Clinical Detachement) और पत्थर दिल (Apathy) होने के बीच एक बारीक लकीर होती है। और इस लकीर पर दृढ़ता और करुणा (Steadiness & Compassion) के साथ टिके रहना सीखना शायद ही औपचारिक शिक्षा का हिस्सा होता है। विद्यार्थियों को मरीज़ों के साथ भावनात्मक दूरी रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन उन्हें यह नहीं सिखाया जाता कि वे अपने सामने मौजूद मानवीय ज़रूरत को नज़रअंदाज़ किए बिना ऐसा कैसे करें। मेडिकल पाठ्यक्रम में सदमों पर विचार और चर्चाओं की जगह होने से हमारे स्वास्थ्यकर्मी काबिल होने के साथ-साथ संवेदनशील और नरम दिल भी बनेंगे।

कुछ अहम बदलाव

चिकित्सकों को सदमा सम्बंधी देखभाल में प्रशिक्षित होना चाहिए। यह पाया गया है कि डॉक्टरों का मरीज़ों और पीड़ितों के साथ शांत और सहानुभूतिपूर्ण बर्ताव मानसिक तनाव कम करता है और पीड़ितों द्वारा आगे सहायता लेने की संभावना बढ़ती है (चंद मिनटों की ही सही)। स्वास्थ्यकर्मी की नपी-तुली सजग उपस्थिति मात्र उपचार में मददगार नहीं होती बल्कि उपचार का हिस्सा होती है। स्वास्थ्य पेशेवरों के सहज संकेतों में शामिल हैं चेहरे के हावभाव, शांत लहज़ा, सम्मानपूर्वक बातचीच, साहस देने वाली प्रक्रिया/चर्चा, और सजग और ध्यान से समस्या सुनना। स्वास्थ्य कर्मी अपनी नियमित दिनचर्या में छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखते हुए ऐसे मौके बना सकते हैं।

पीड़िता की पहचान: ज़रूरी नहीं कि हर पीड़िता चोट के निशान के साथ ही डॉक्टर के सामने आए। कभी-कभी लक्षण मनो-शारीरिक होते हैं। डॉक्टरों के लिए यह ज़रूरी है वे मनो-शारीरिक लक्षणों (Psycosomatic Symptoms)और हिंसा की संभावना को सक्रिय रूप से पहचानें इसके लिए शांत और खुले मन से बातचीत करने का मौका दें। यह लक्षणों को समझने में मददगार हो सकता है।

हिंसा के आयाम को समझना: कुछ परिस्थितियों में पीड़िता हिंसा वाले माहौल या हिंसा करने वालों से दूरी नहीं बना पाती। कुछ ऐसी चीज़ें होती हैं जो पीड़िता को उसी परिस्थिति में थामे रखती हैं; जैसे डर, अकेलेपन की आशंका, आर्थिक-भावनात्मक निर्भरता (Financial-Emotion Dependency) , परिवर्तन की उम्मीदें, या प्यार। किसी को पूरी तरह छोड़ देने की प्रक्रिया काफी लंबी और दर्द भरी होती है। शोध बताते हैं कि पीड़िता किसी बुरे रिश्ते से पूरी तरह निकलने से पहले उसके पास कई बार वापिस लौटती और निकलती है।

यहां मुख्य बात यह है कि डॉक्टर को यह समझना चाहिए कि अगर उनका मरीज़ दुर्व्यवहार करने वाले व्यक्ति के पास वापस जाने का फैसला करता है, तो उनका यह फैसला डॉक्टर की देखभाल या उनकी अहमियत पर कोई सवाल नहीं उठाता।

कोई मरीज़ अपने उत्पीड़क के पास वापस चला चला जाए, वह भी जब स्वास्थ्य-कर्मी के पास लौटे, तो करुणा और सहारे का हकदार होता है, न कि निराशा का। ऐसी स्थिति में डॉक्टर को यह सोचने की बजाय कि “मैं नाकाम रहा, क्योंकि वे वापस चले गए,” यह सोचना चाहिए कि “जब भी वे तैयार होंगे तब मैं उनकी मदद कर सकता हूं।” 

समाधान की बजाय मदद करना: ऐसी परिस्थिति में किसी पीड़िता पर यह दबाव नहीं बना सकते कि वह सब कुछ पूरी तरह छोड़ दे; इसकी बजाय उन्हें लगातार सहायता, संबल और ज़रूरी सेवाएं उपलब्ध करा सकते हैं। भारतीय समाज में ज़्यादातर महिलाएं घर या रिश्ता छोड़ नहीं पाती या छोड़ना नहीं चाहती। स्वास्थ्य कर्मियों को इस वास्तविकता के लिए तैयार रहना चाहिए और उन चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो उनके नियंत्रण में हैं। ऐसी स्थिति में भी पीड़िता को सुरक्षित महसूस कराना, चिकित्सकीय देखभाल देना, उन्हें समझना और उनका मनोबल बढ़ाना जैसी सहयता (Mental Health Support) तो की ही जा सकती है।

बचपन के बुरे अनुभवों के बारे में जानना, सामाजिक तनावों के बारे में जानना और भावनात्मक पीड़ा को समझना जैसे छोटे-छोटे बदलाव भी मरीज़ पर अच्छा असर डाल सकते हैं।

सुरक्षित माहौल, न कि झटपट निर्णय: इन हालातों में आम तौर पर महिलाएं मानसिक स्वास्थ्य के लिए ‘काउन्सलर या मनेचिकित्सक’ (Counselor or Psychiatrist) के पास नहीं जा पातीं या जाने से कतराती हैं। इसलिए हिंसा से पीड़ित ज़्यादातर महिलाओं के पास डॉक्टर ही एकमात्र सहारा होता है। ऐसे में उनके लिए डॉक्टर के पास सहानुभूतिपूर्ण और एक ऐसी जगह की ज़रूरत होती है जहां कोई ठप्पा नहीं लगाया जाएगा। बिना ज़ोर-ज़बरदस्ती के देखभाल को प्राथमिकता देना, जांच से पहले सहमति लेना, और डॉक्टर के कक्ष में उनकी सीमाओं का सम्मान करना – ये सभी बातें उन्हें एक ऐसा सुरक्षित माहौल (Safe space) देती हैं, जो उन्हें अपने पारिवारिक परिवेश में नहीं मिल पाता।

हमेशा उपलब्ध रहना, बिना किसी पूर्वाग्रह के पेश आना और ज़ोर-ज़बर्दस्ती न करना – ये बातें किसी पीड़िता को दोबारा मदद लेने को तैयार कर सकती हैं। और कभी-कभी, किसी पीड़िता के लिए सबसे मददगार साबित होता है कि कोई उसकी कहानी पर विश्वास करे।

भावुक नहीं, संवेदनशील बने: दूसरों (पीड़िता) की परेशानी समझने के समय डॉक्टर खुद  की मनदुरुस्ती का भी ख्याल रखें, और यह समझें कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं। निराशा, उदासी या क्रोध को समझने के लिए चिंतनशील अभ्यास, पर्यवेक्षण या सहकर्मियों की सहायता महत्वपूर्ण है। मन को शांत और संवेदना के साथ-साथ ज़्यादा भावुक होने से बचाना भी ज़रूरी है। चुनौतीपूर्ण मामलों के बाद डायरी लिखना या दूसरे साथियों से चर्चा करना मददगार हो सकता है।

यह काम मानसिक और भावनात्मक रूप से थका देने वाला (Mentally & Emotionally Intensive) है। इसलिए डॉक्टरों को यह भी समझना होगा की ऐसी परिस्थितियों में पीड़ितों के फैसले उनकी देखभाल की काबिलियत नहीं दर्शाते। संयमित चिकित्सक के रूप में संयमित चिकित्सकीय स्थान बनाते समय अपने बारे में सोचना तनाव से बचाता है।

महिलाओं का सम्मान: चुप्पी तोड़ें, हिंसा अस्वीकार्य करें

ज़्यादातर भारतीय घरों में हिंसा केवल इसी वजह से होती आई है क्योंकि समाज और महिलाएं चुप्पी साध लेते हैं। नारी को पूजने वाले देश में जब महिलाओं के प्रति अत्याचार-दुर्व्यवहार होते हैं तो वही समाज आंखें फेर लेता है, जबकि ऐसा व्यवहार बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। यह विरोधाभास (Social Contradiction) परेशान करने वाला है।

महिलाओं के प्रति हिंसा को एक निजी मामला या नियति मानना स्वीकार्य नहीं है। हमें सिखाया जाता है कि घर की ‘इज्जत’ हर हाल, हर कीमत पर बनी रहनी चाहिए। लेकिन अत्याचारों को छुपाना और चुपचाप सहते रहना कोई सम्मानजनक बात नहीं है।

सांस्कृतिक बदलाव तब शुरू होगा जब हम महिलाओं को सिर्फ इज़्ज़त का समंदर, त्याग की मूर्ति, या महज़ पीड़ित के तौर पर नहीं, बल्कि एक संपूर्ण इंसान के तौर पर देखेंगे – जिनकी सुरक्षा और गरिमा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इस बदलाव की शुरुआत घर-स्कूलों की आम चर्चाओं से, और नई पीढ़ी को जागरूक करने से होती है। यह सिखाने से होती है कि प्यार का मतलब चुप्पी, डर और सहन करना नहीं है। 

जब तक यह बड़ा सामाजिक बदलाव (Cultural Shift) होता है तब तक स्वास्थ्य, केंद्रों और स्वास्थ्य कर्मियों से ही उम्मीद की जा सकती है कि वे इन महिलाओं के लिए सुरक्षा के ठिकाने बनें और मेडिकल पाठ्यक्रम में ‘सदमा को समझकर देखभाल’ (Trauma Informed Care) सिखाने को प्राथमिकता दी जाए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://assets.avant.org.au/cdf6134c-01d7-0292-26f5-2f5cf1db96f8/ec9d9121-9260-4f64-beeb-05ac9f5852d8/Family-violence-medical-record-hero-image.jpg%20

‘एन्हांस्ड ओलंपिक’ अपने दावे पर खरे नहीं उतरे

ई 2026 के अंतिम सप्ताह में अमेरिका के लास वेगास में ओलंपिक खेलों की तर्ज पर ‘एन्हांस्ड ओलंपिक’ (Enhanced olympic) का आयोजन हुआ। इस आयोजन की खास बात थी कि इसमें खिलाड़ियों को प्रदर्शन बेहतर करने के लिए ड्रग (Drugs) लेकर खेलने पर कोई पाबंदी नहीं थी। खेलों में तैराकी, दौड़ और भारोत्तोलन जैसे खेल शामिल थे। यह खेल आयोजन ओलंपिक जितने बड़े स्तर का तो नहीं था; फिर भी इसमें लगभग 50 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया।

हालांकि इस पर विशेषज्ञों और खेल संगठनों ने कई नैतिक और स्वास्थ्य सम्बंधी सवाल उठाए और इसकी तीखी आलोचना की थी। खेल फेडरेशन (Sports Federation) ने तो यहां तक कहा था कि एन्हांस्ड ओलंपिक में बनने वाला कोई भी वर्ल्ड रिकॉर्ड (World record) मान्य नहीं होगा। और अब इसके नतीजे भी कुछ खास अंतर नहीं झलकाते हैं। दरअसल खेल संगठकों और विशेषज्ञों की चिंता डोपिंग (Doping) को लेकर है। यदि मुकाबला करने वाले कुछ या शायद सभी लोग बेहतर प्रदर्शन (Better Performance) के लिए ड्रग्स लेंगे, तो इसके स्वास्थ्य सम्बंधी नुकसान भले ही तुरंत न दिखें लेकिन लंबे समय में दिखेंगे। यह खिलाड़ियों की सेहत के साथ खिलवाड़ होगा।

एन्हांस्ड खेलों के आयोजकों का कहना था कि इन खेलों में यूं ही कोई भी ड्रग्स नहीं लिया जाएगा, सिर्फ यूएस संघीय औषधि प्रशासन (US FDA) द्वारा मंज़ूर ड्रग्स लेने की ही इजाज़त होगी, वह भी मेडिकल पेशेवरों की देखरेख में, ताकि जोखिम कम किया जा सके। साथ ही एथलीटों (Atheletes) को यूएस फेडरल और नेवादा राज्य के कानूनों का पालन करना होगा। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यूएस एफडीए द्वारा जिन ड्रग्स को मंज़ूरी मिली है वे चिकित्सकीय उपयोग के लिए है, न कि एथलेटिक प्रदर्शन-वृद्धि के लिए। जैसे, एनाबॉलिक स्टेरॉयड (Anabolic Steroids) को मंज़ूरी यौवनारंभ में विलंब की समस्या के इलाज के लिए मिली है, जिसमें वृषण में हार्मोन बहुत ही कम या बिलकुल नहीं बनते।

और तो और, खेल के पहले इस बारे में कोई जानकारी स्पष्ट रूप से साझा नहीं थी कि कौन से ड्रग्स और कितनी मात्रा में लिए जा सकेंगे, और संभावित जोखिम को कम करने की आयोजकों और मेडिकल पेशेवरों की क्या योजना होगी। जैसे डोपिंग करने वाले एथलीट्स की खेल के बाद देखभाल कैसे होगी? ड्रग्स लेकर जीतने की बात जितनी सरल लगती है, उसके बाद उन्हें छोड़ने की राह उतनी ही मुश्किल होती है। इस बात को स्पष्टता से उजागर न करना ऐसा आभास दे सकता है कि प्रदर्शनवर्धक दवाओं (Performace enhancing drugs) का इस्तेमाल करना और उन्हें बंद करना बहुत आसान है, जबकि ऐसा है नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकल देख-रेख तात्कालिक जोखिम कम कर सकती है, लेकिन इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि डोपिंग से जुड़े कई परिणाम (मानसिक परेशानियां, अनुर्वरता, मांसेपशियों व अस्थि-तंत्र की चोटें) लंबे समय तक असर करते हैं।

एन्हांस्ड ओलंपिक में एथलीट्स ने संभवत: टेस्टोस्टेरॉन, ह्यूमन ग्रोथ हार्मोन, पेप्टाइड्स और स्टिमुलेंट्स लिए थे। टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) समान्यत: स्रावित होने वाला यौन हार्मोन है। यह शरीर में मांसपेशियां और उनकी ताकत (Muscle power) बढ़ाता है। लेकिन इससे हृदय सम्बंधी एवं हॉर्मोन सम्बंधी शारीरिक परेशानियां, और उग्र व्यवहार, मूड में उतार-चढ़ाव एवं अवसाद जैसी मानसिक परेशानियां होने का जोखिम होता है। इसी तरह, एरिथ्रोपोइटिन (EPO) शरीर में स्रावित होने वाला एक नैसर्गिक हार्मोन है जो लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन बढ़ाता है, नतीजतन शरीर में ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता बढ़ती है। बाहर से अतिरिक्त rEPO लेने से ऑक्सीजन उपलब्धता बढ़ती है जो धावकों या साइकिल रेसर्स के लिए मददगार हो सकती है। लेकिन इससे खून गाढ़ा होने का खतरा रहता है, नतीजतन एथलीट्स को हृदय रोग हो सकते हैं।

और फिर, वैसे ही एथलीट्स कई शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों से घिरे होते हैं। अक्सर खिलाड़ियों को मांसपेशीय व अस्थि तंत्र की चोटों का खतरा होता है। रग्बी (Rugby) और अमेरिकन फुटबॉल (American football) जैसे खेलों में बार-बार सिर पर चोट लगने से तंत्रिका क्षति सम्बंधी बीमारियां (Neurological diseases) होने का खतरा होता है, जिन्हें ठीक होने में अरसा लगता है। फिर प्रतिस्पर्धाएं एथलीट्स के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालती हैं। जिमनास्ट सिमोन बाइल्स, टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका और धावक नोआ लाइल्स ने अवसाद और दुश्चिंता (Depression & Anxiety) के बारे में सबके सामने बात रखी है। ऐसे में ड्रग्स आग में घी का काम करेंगे।

ऐसा नहीं है कि खिलाड़ियों को अपने स्वास्थ्य की चिंता नहीं है। कुछ खिलाड़ियों ने इस प्रतिस्पर्धा (Competition) का विरोध किया है। लेकिन कई खिलाड़ी, जिनके पास अपने को साबित करने के लिए जीवन के मात्र कुछ साल होते हैं, उनके पास यदि ड्रग्स लेकर जीतने की संभावना रहेगी तो वे इनमें दिलचस्पी दिखाएंगे। वैसे भी तवज्जो, शोहरत और पैसा उसे ही मिलता है जो खेल जीतता है। खेल की दुनिया में ऐसा दिखता है कि खिलाड़ी, खासकर ओलंपिक स्तर के खिलाड़ी, बहुत सम्पन्न घरों से नहीं होते हैं, और वे कोई न कोई काम करते हुए ही साथ-साथ प्रशिक्षण लेते हैं और खेलते हैं। जीत उन्हें आर्थिक सम्पन्नता हासिल करने में मदद कर सकती है। और यदि ड्रग्स जीतने की संभावना बढ़ाएंगे तो वे शायद न हिचकें।

लेकिन ऐसे आयोजन अक्सर खेल भावना और खेल कौशल (Sportsmanship & Proficiency) को कम करते हैं और उन्हें व्यावसायिक बनाते हैं। भारत में क्रिकेट के लिए शुरू हुए आईपीएल खेलों (IPL Games) से क्रिकेटरों को पैसा और शोहरत तो मिली लेकिन क्रिकेट एक बिज़नेस हो गया; सट्टेबाज़ी (Gambling) भी शुरू हो गई। और फिर, डोपिंग का संदेश क्या है? यही कि कोई भी खेल डोपिंग के बूते जीता जा सकता है? यकीनन, ये कुछ हद तक शरीर की ताकत और क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं, लेकिन असली सफलता के पीछे खिलाड़ी और प्रशिक्षक की सालों की मेहनत, अनुभव, प्रशिक्षण और कौशल काम आता है। एन्हांस्ड खेलों के नतीजे देखें तो यह बात और पुख्ता होती है। इन खेलों में डोपिंग वाले प्रतिभागियों में से मात्र एक प्रतिभागी जीता है, बाकी तीन वे प्रतिभागी जीते हैं जो बिना डोपिंग के खेल में शामिल हुए थे। प्रदर्शन बेहतर करने के लिए ड्रग्स की इजाज़त देकर एन्हांस्ड खेलों ने अनुशासन, तकनीकी दक्षता, मानसिक संयम और नियमों पर सामूहिक भरोसे को नज़रअंदाज़ किया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://static01.nyt.com/athletic/uploads/wp/2026/05/22122318/0523_EnhancedGames-scaled.jpg?width=1200&height=900&fit=cover

दिमाग की रक्षा में सफाई तंत्र

दिमाग का सफाई तंत्र उसकी तीन स्तरीय झिल्ली (मेनिन्जेस) (Maninges) में बसा होता है। यह तंत्र भौतिक क्षति से उसे महफूज़ रखने के अलावा रोगजनकों से भी सुरक्षा करता है। इस त्रि-स्तरीय झिल्ली की सबसे बाहरी परत में बड़ी-बड़ी रक्त शिराओं (वीनस साइनस) का एक जाल फैला होता है। पहले माना जाता था कि ये शिराएं मात्र रक्त प्रवाह का काम करती हैं। लेकिन नेचर में हाल में प्रकाशित एक शोध पत्र में इनकी विविध भूमिका पर प्रकाश डाला गया है।

शोध पत्र में बताया गया है कि ये शिराएं मस्तिष्क और खोपड़ी में तरल (Cerbrospinal fluid) की निकासी का काम करती हैं। अध्ययन में चूहों और मनुष्यों में वीनस साइनसों को खून तथा सेरेब्रोस्पाइनल द्रव को पम्प करके बाहर निकालते देखा गया। यह भी देखा गया कि ये शिराएं अपनी कोशिकाओं को इधर-उधर करके गश्ती प्रतिरक्षा कोशिकाओं के लिए जगह भी बनाती रहती हैं।

अध्ययन इस बात की पुष्टि करता है कि मस्तिष्क की सरहदें अत्यंत बारीकी से संचालित इंटरफेस हैं, न कि मात्र भौतिक आवरण। शोध पत्र के एक लेखक डोरियन मैकगैवर्न का कहना है कि दरअसल, वीनस साइनसों (Venous sinus) की गतिशील प्रकृति केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की रक्षा के लिए अहम है क्योंकि शोथ तथा खोपड़ी में तरल पदार्थ का जमावड़ा और दबाव मस्तिष्क को क्षति पहुंचा सकता है और साइनस ऐसे तनाव होने पर मस्तिष्क के कार्य को जारी रखने में मदद करते हैं।

प्रयोग में शोधकर्ताओं ने जीवित, निश्चेतित चूहों में वीनस साइनसों की गतिविधियों का अवलोकन किया। इसके लिए उन्होंने खोपड़ी के एक वर्ग मिलीमीटर क्षेत्र को खुरचकर इतना पतला कर दिया था उसमें से लेज़र पुंज आसानी से गुज़र सके। यह लेज़र पुंज प्रतिरक्षा कोशिकाओं को प्रकाशित करेगा जिन्हें एक फ्लोरेसेंट प्रोटीन (Fluorescent proteins) से चिंहित कर दिया गया था। इस तकनीक को इंट्रावायटल इमेजिंग कहते हैं। इसकी मदद से शोधकर्ता खोपड़ी के अंदर स्थित, अरेखित (चिकनी) मांसपेशियों में लिपटी बड़ी शिराओं की धड़कन का अवलोकन कर पाए जब वे तरल की निकासी के लिए सिकुड़ और फैल रही थीं।

शोधकर्ता शिराओं की दीवारें निर्मित करने वाली एंडोथीलियल कोशिकाओं (Endothelial cells) का वीडियो बना पाए और देख पाए कि उनमें 1 माइक्रोमीटर व्यास तक के बारीक सुराख हैं। इन सुराखों को फेनेस्ट्रेशन (Fenestration) कहते हैं और ये तरल पदार्थ, अणुओं तथा सूक्ष्मजीवों को आर-पार जाने देते हैं। यह भी देखा गया कि शिराएं गश्ती प्रतिरक्षा कोशिकाओं के लिए जगह बनाने के लिए अपने आवरण को पुनर्व्यवस्थित भी कर पा रही थीं। शोधकर्ताओं ने इस विचित्र व्यवहार को रफ्लिंग (Ruffling) नाम दिया है।

मैकगैवर्न कहते हैं कि उन्होंने शिराओं को ऐसा करते पहली बार देखा है। उनके सुराख लगातार खुलते-बंद होते रहते हैं और इसका नियमन मुख्य रूप से प्रतिरक्षा कोशिकाएं करती हैं। ये प्रतिरक्षा कोशिकाएं लगातार साइनस की दीवारों की सतत निगरानी करती हैं और इससे पता चलता है कि साइनसों की एंडोथीलियल कोशिकाओं में इतना लचीलापन (Flexibility) होता है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://t4.ftcdn.net/jpg/17/58/92/91/240_F_1758929117_Lccb7RQy7vI2GcI6TRZ6OHQGNLOyV8yQ.jpg

फफूंदनाशी के असर बीस पीढ़ियों तक

लंबे समय तक किए गए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि चूहों में फफूंदनाशी (Fungicide) के असर बीस पीढ़ियों तक बरकरार रहते हैं। किसी मादा चूहे (Female Rat) का संपर्क फफूंदनाशी से हो जाए, तो उसकी संतानों में गुर्दा रोग, मोटापे या प्रसव में दिक्कत जैसी परेशानियां पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है।

इस बात के प्रमाण बढ़ते क्रम में मिल रहे हैं कि कतिपय रसायनों से संपर्क कई आनुवंशिक परिवर्तन (Genetic changes) पैदा कर सकते हैं। ये रसायन वास्तव में किसी जीव के आनुवंशिक पदार्थ (डीएनए) (DNA) में कोई परिवर्तन नहीं करते। दरअसल, जन्तु कोशिकाओं के डीएनए पर कुछ मार्कर चस्पा हो जाते हैं जो अगली पीढ़ियों को भी हस्तांतरित होते रहते हैं। ये जीन्स की अभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं और इन्हें एपिजेनेटिक परिवर्तन (Epigenetic changes) कहते हैं।

इस सिलसिले में हालिया अध्ययन वॉशिंगटन स्टेट युनिवर्सिटी के माइकल स्किनर और उनके साथियों ने किया है। इन शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया कि यदि चूहों की एक पीढ़ी का संपर्क फफूंदनाशी विनक्लोज़ोलीन (Vinclozolin) से करवाया जाए, तो आने वाली 20 पीढ़ियों तक इसके असर बने रहते हैं। पता चला कि एक पीढ़ी के संपर्क के कारण आने वाली पीढ़ियों में शुक्राणुओं की मृत्यु और प्रसव में दिक्कत जैसी समस्याएं बनी रहती हैं। इसके अलावा मातृ व शिशु मृत्यु दर भी काफी अधिक होती है, बनिस्बत संपर्क से मुक्त चूहों में या 12वीं से पहले की पीढ़ी की तुलना में।

अभी चूहों से प्राप्त निष्कर्षों को इंसानों के संदर्भ में लागू करना जल्दबाज़ी होगी। वैसे मनुष्यों में भी इस तरह के एपिजेनेटिक परिवर्तनों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण देखा गया है – जैसे अकाल के दौरान गर्भधारण से पैदा हुए बच्चों में डायबिटीज़ (Diabetes) का जोखिम अधिक होता है। लिहाज़ा, इन परिणामों का इंसानों के लिए निहितार्थ अकल्पनीय नहीं है।

इतना तो बनता है कि वायु प्रदूषण पर विचार किया जाए और निगरानी की जाए कि हम पर्यावरण में किस तरह के रसायन छोड़ रहे हैं क्योंकि यह चिंताजनक है कि असर इतनी पीढ़ियों बाद भी नज़र आते हैं।

यह सही है कि फसलों के संदर्भ में विनक्लोज़ोलीन का इस्तेमाल काफी कम होने लगा है और कई देशों में इस पर प्रतिबंध भी लग चुका है।

स्किनर के दल ने प्रयोग 2017 में शुरू किए थे। उन्होंने गर्भवती चूहों को विनक्लोज़ोलीन और डीएमएसओ (DMSO) नामक एक विलायक का इंजेक्शन दिया। फिर इन चूहों का प्रजनन 23 पीढ़ियों तक असंपर्कित चूहों के साथ करवाया। पहले गर्भवती चूहे और उसकी संतान तथा नाती-पोतों (grand offspring) के बारे में माना गया कि उनका सीधे संपर्क हुआ था। इसके बाद की 20 पीढ़ियों को पूर्वज-संपर्कित माना गया।

इसी के साथ एक कंट्रोल समूह भी था – इन्हें सिर्फ डीएमएसओ का इंजेक्शन दिया गया था और चार पीढ़ियों तक प्रजनन करवाया गया था।

शोधकर्ता दल ने अगली पीढ़ी में क्षार अनुक्रमण की तकनीक से पता किया कि उनके जीनोम के किन खंडों में मिथाइल समूह जुड़े हैं (यानी मिथायलीकरण हुआ है)। उन्होंने पाया कि कंट्रोल की तुलना में संपर्कित चूहों की बाद की पीढ़ियों में अधिक हिस्सों में मिथायलीकरण (Methylation) हुआ है। अर्थात एपिजेनेटिक परिवर्तन कई पीढ़ियों तक बने रहते हैं।

फिर उन्होंने चूहों के गुर्दों, प्रोस्टेट, वृषण और अंडाशयों को देखा। पता चला कि इन अंगों को प्रभावित करने वाले रोगों की दर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती गई। मसलन जिन चूहों का विनक्लोज़ोलीन से प्रथम संपर्क पिता की ओर से करवाया गया था उनकी बीसवीं पीढ़ी में सभी 11 चूहों में अंडाशय में गड़बड़ी पाई गई जबकि कंट्रोल समूह के 19 में से 11 चूहों में। यह भी देखा गया कि संपर्कित चूहों में मोटापा (Obesity) और गुर्दा रोग भी ज़्यादा गंभीर थे। यही स्थिति प्रसव सम्बंधी दिक्कतों में देखी गई। टीम का मत है कि डीएनए मिथायलीकरण अंगों के सामान्य विकास व कामकाज को प्रभावित करता है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit:https://images.nature.com/lw1200/magazine-assets/d41586-026-00555-3/d41586-026-00555-3_52123510.jpg

हाथी और गुबरैले का एक अनोखा नाता

विशाल हाथियों (Elephant) को जंगल का रक्षक माना जाता है। वे विभिन्न जंगली वनस्पतियों को खाते और कुचलते हैं जिससे बनी खाद और उनके द्वारा फैलाए गए बीज जंगल की विविधता (Biodiversity) बनाए रखते हैं। लेकिन क्या हो अगर हाथी दुनिया से हमेशा के लिए गायब हो जाएं?

हाल ही में अफ्रीका के मैदानों में हुए एक अध्ययन में यह चौंकाने वाली बात सामने आई है कि हाथियों के गायब होने से एक और प्रजाति पृथ्वी से दुगनी तेज़ी से गायब हो जाएगी – वो हैं गुबरैले।

छोटे से दिखने वाले गुबरैले (Dung Beetels) प्रकृति का एक बहुत ज़रूरी काम संभालते हैं। ये छोटे जीव इतने ताकतवर हैं कि अपने से 1140 गुना वज़नी चीज़ों को ढकेल या खींच सकते हैं। ये बड़े जानवरों का गोबर/विष्ठा खाकर, उसे गेंद जैसे आकार में बदलकर ज़मीन के अंदर दबा देते हैं। इससे मिट्टी का उपजाऊपन (Fertility) बेहतर होता है, बीजों का फैलाव होता है और गंदगी साफ होने से बीमारी फैलाने वाली मक्खियों से बचाव होता है।

दरअसल, पर्यावरण चक्र में कुछ ऐसी खास प्रजातियां हैं जो पारिस्थितिकी तंत्र को ज़िंदा रखने के लिए बहुत ज़रूरी हैं। ऐसी मुख्य प्रजातियों को विज्ञान में ‘की-स्टोन प्रजाति’ (Key stone species) कहा जाता है। इनकी कमी या विलुप्ति के कारण पर्यावरण पर गहरा और नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। हालांकि ऐसी प्रजातियों का संरक्षण करके बुरे प्रभावों को कम किया जा सकता है, लेकिन दिक्कत यह है कि ऐसी की-स्टोन प्रजातियों की असली भूमिका उनके चले जाने के बाद ही समझ आती है।

ऐसा ही कुछ केन्या में वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन के दौरान देखा। इसे ‘कैफेटेरिया प्रयोग’ (Cafeteria Experiment) नाम दिया। इस प्रयोग में उन्होंने 9 अलग-अलग स्तनधारी जीवों के ताज़ा गोबर/लीद के प्रति 100 से अधिक गुबरैला प्रजातियों की पसंद को मापा। उन्होंने हर प्रकार की लीद/गोबर पर आने वाले गुबरैलों की गिनती और पहचान की। वैसे तो गुबरैले सभी जीवों की विष्ठा खा लेते थे, लेकिन उन्होंने देखा कि गुबरैलों को हाथियों की लीद ज़्यादा पसंद थी। प्रयोग से शोधकर्ताओं को इस खाद्य संजाल की मुख्य कड़ियों को समझने में आसानी हुई।

इसी कड़ी में, पिछले कुछ अध्ययनों को आगे बढ़ाते हुए गिज्समैन और उनकी टीम ने कंप्यूटर पर एक मॉडल बनाकर देखा कि यदि हाथी जैसे बड़े स्तनधारी जीव दुनिया से गायब हो जाएं तो उसके क्या असर देखने को मिलेंगे। नतीजे काफी भयानक थे; अगर हाथी न रहे, तो गुबरैले आम अनुमान से दुगनी तेज़ी से गायब होने लगेंगे।

इस मॉडल को यथार्थ में परखने के लिए बागड़ बंद इलाके बनाए गए, ताकि हाथी और जिराफ जैसे बड़े जीवों को वहां जाने से रोका जा सके। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय में उन बागड़बंद इलाकों में गुबरैलों की संख्या में भारी गिरावट देखने को मिली। परिणामस्वरूप वहां ना तो नए पौधे उगे और ना ही दूसरे जीवों का गोबर/लीद साफ हुई। 

वर्तमान स्थिति यह है कि अफ्रीका के जंगलों (Afican Forest’s) और मैदानों को काटकर वहां गाय, भैंस, भेड़ जैसे पशुओं का पालन किया जा रहा है। हालांकि गुबरैले उनका भी गोबर खा सकते हैं। लेकिन इस अध्ययन के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि ये पालतू जानवर हाथी, जिराफ जैसे बड़े जीवों की जगह नहीं ले सकते। मवेशियों का गोबर प्रकृति को हाथियों की लीद जितना पोषण नहीं दे सकता। साथ ही, मवेशियों को पेट के कीड़े मारने की दवाइयां (जैसे आइवरमेक्टिन) (Ivermectin) दी जाती हैं, जिससे उनका गोबर खाने वाले गुबरैलों पर भी बुरा असर हो रहा है।

दूसरी ओर बढ़ते तापमान और सूखे के कारण भी ये कीट अपनी सहन-क्षमता की आखिरी सीमा तक आ पहुंचे हैं। यह भी अनुमान लगाया जा रहा है कि समय से साथ यदि विशाल स्तनधारी (Mammals) प्रजातियां विलुप्त हो जाती हैं तो एक ऐसा समय आएगा जब यह विविध और लचीला खाद्य संजाल इतना सपाट हो जाएगा कि भावी पर्यावरणीय परिवर्तनों को झेलने की क्षमता ही खो देगा। 

वैसे तो किसी भी पारिस्थितिकी तंत्र के खाद्य संजाल (Food Web) में अक्सर यह पता लगाना बहुत मुश्किल होता है कि कौन-सा जीव किस पर निर्भर है। लेकिन अब कंप्यूटर मॉडल्स और eDNA (एंवायरमेंटल डीएनए) जैसी तकनीकों से पानी, मिट्टी, या हवा में छूटे जीवों के छोटे-से अंश से ही प्रजातियों के आपसी सम्बंधों और पूरे खाद्य संजाल का आसानी से पता लगाया जा सकता है। इससे आने वाले समय में जीवों की अहमियत और उनकी अनुपस्थिति से होने वाले परिणामों का अनुमान लगाने में मदद मिलेगी, ताकि समय रहते बेज़ुबान जीवों को विलुप्ति (Extinction) से बचाया जा सके।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit:https://www.urloplandia.pl/files/gallery/1103/1340025822_1.jpg

अजगर की बैक्टीरिया-रोधी चमड़ी

वैसे तो ये अजगर (Python regius) एक सुरक्षा रणनीति के लिए जाने ही जाते हैं – खतरा भांपकर ये एक गेंद के रूप में गुड़ी-मुड़ी हो जाते हैं। इसी वजह से इनका नाम पड़ा है बॉल पायथन। इसे रॉयल पायथन (Royal Python) भी कहते हैं और यह पश्चिमी तथा मध्य अफ्रीका (Central Africa) में पाया जाता है। लेकिन अब एसीएस ओमेगा में प्रकाशित एक अध्ययन में इनकी एक और सुरक्षा रणनीति का विवरण प्रस्तुत हुआ है जो शायद हमारे काम की साबित हो।

हालांकि सांपों की त्वचा (Snake skin) की सूक्ष्म रचना का काफी अध्ययन किया गया है लेकिन इसमें ज़्यादा ध्यान रंग और चलने-फिरने पर इसके असर पर दिया गया है। बैक्टीरिया से बचाव में इसकी भूमिका उपेक्षित ही रही है।

इस संदर्भ में प्राग स्थित युनिवर्सिटी ऑफ केमेस्ट्री एंड टेक्नॉलॉजी के वैक्लाव पेरूट्का के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने बॉल पायथन (Ball Python) की त्वचा पर उपस्थित शल्कों (Scales) पर गौर किया। इन शल्कों की एक विशेषता यह है कि इन पर सूक्ष्म कंटक (Microneedles) पाए जाते हैं। हरेक कंटक करीब 9 माइक्रोमीटर लंबा होता है – यह लगभग एक कोशिका के बराबर है। शोधकर्ताओं की मान्यता थी कि ये कंटक शायद बैक्टीरिया द्वारा बायोफिल्म बनाने की प्रक्रिया को रोकते होंगे। बायोफिल्म (Biofilm) तब बनती हैं जब सूक्ष्मजीव की आबादी एक लसलसा पदार्थ छोड़ती है। ये पदार्थ  उन्हें किसी भी सतह पर चिपकने में मदद करता है।

बायोफिल्म पोषक तत्वों को बैक्टीरिया के अंदर रखने और बैक्टीरिया-नाशी पदार्थों को बाहर रखने में भी मदद करती है। इसी बायोफिल्म के माध्यम से बैक्टीरिया आपस में जीन्स का लेन-देन भी करते हैं। इनमें एंटीबॉयोटिक (Antibiotic) प्रतिरोध के जीन्स भी होते हैं। ऐसा देखा गया है कि बायोफिल्म से युक्त बैक्टीरिया मुक्तजीवी बैक्टीरिया से 1000 गुना ज़्यादा प्रतिरोधी होते हैं।

पेरूट्का की टीम ने अपने अध्ययन के लिए प्लज़ेन चिड़ियाघर से जंतुओं द्वारा विमोचित त्वचा के नमूने एकत्रित किए। इनमें से एक-एक शल्क को सुइयों पर जड़ दिया और उन्हें पोषक पदार्थों से भरपूर माध्यम में इनक्यूबेट किया। माध्यमों में दो में से एक किस्म के बैक्टीरिया भी रखे गए थे – कुछ में एशरीशिया कोली (ई.कोली) और कुछ में स्टेफिलोकॉकस ऑरियस (एस. ऑरियस)। लगभग 48 घंटे बाद देखा गया कि कंट्रोल नमूने (जिसमें शल्क पोलीस्टायरिन प्लास्टिक से बने थे) पर एक मोटी परिपक्व बायोफिल्म का आवरण बन चुका था। लेकिन सांप के वास्तविक शल्क दोनों बैक्टीरिया के विरुद्ध कहीं ज़्यादा प्रतिरोधी थे – ई. कोली 88 प्रतिशत कम चिपक पाए थे और एस. ऑरियस 78 प्रतिशत कम। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पता चला कि शल्क की सतहों पर बैक्टीरिया बहुत कम आबाद हुए थे और कंटकों के बीच की जगहों पर थे।तो सवाल उठा कि कंटकों ने यह करामात कैसे की। शोधकर्ताओं ने इसकी क्रियाविधि को लेकर कई अटकलें लगाई हैं।

एक संभावना तो यह हो सकती है कि कंटकनुमा (Spike-like) उभार बैक्टीरिया (Bacteria) को संपर्क बनाने के लिए उपलब्ध जगह को सीमित कर सकते हैं या शायद संपर्क के बाद उन्हें अस्थिर बनावट में धकेल सकते हैं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक एक संभावना यह भी है कि कंटकों के नुकीले सिरे बैक्टीरिया की झिल्ली को भेदकर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं या किसी प्रकार से बायोफिल्म स्रवण की उनकी क्रिया में बाधा पहुंचा सकते हैं। बहरहाल, प्रतिरोध की सटीक क्रियाविधि को समझना महत्वपूर्ण होगा। ऐसा होने पर कुछ उपयोगी बैक्टीरिया-रोधी चीज़ें बनाने का रास्ता खुलेगा। इस नए रास्ते की विशेषता यह होगी कि हमें रसायनों का उपयोग कम से कम करना होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://media.istockphoto.com/id/2084572439/photo/close-up-of-a-ball-python-snake-on-a-branch.jpg?s=1024×1024&w=is&k=20&c=TP7iOkmoM5zsV56ORKW9s_Mrv9Y_fgwnNiMQFxmMus0=

सिर्फ मादा चूहों की याददाश्त सुधारता एक यौगिक

वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के गैबर एगरवैरी और उनके साथियों ने चूहों (Rodents) पर कुछ मज़ेदार प्रयोग करके बताया है कि एक यौगिक (Metabolic Byproduct) है एसिटेट जो उनकी याददाश्त को सुदृढ़ करता है और यह असर सिर्फ मादा चूहों पर होता है। जिस यौगिक की बात हो रही है वह आम तौर पर शरीर में अल्कोहल, ग्लूकोज़ और अधिक रेशेदार खाद्य पदार्थों के विघटन से बनता है।

याददाश्त सम्बंधी दो प्रयोग किए गए थे। पहले प्रयोग में चूहों को दो समान वस्तुओं के साथ 10 मिनट तक खेलने दिया गया। फिर चौबीस घंटे बाद चूहों को उन्हीं वस्तुओं के संपर्क में लाया गया। लेकिन इस बार एक वस्तु की जगह बदल दी गई थी। विचार यह था कि यदि चूहे की याददाश्त अक्षुण्ण रही तो वह समझ जाएगा कि एक वस्तु की जगह बदली गई है। दूसरी ओर, यदि याददाश्त अस्त-व्यस्त हुई होगी तो वे दोनों वस्तुओं के साथ बराबर समय बिताएंगे। चूहों ने नई जगह पर रखी वस्तु से साथ ज़्यादा समय बिताया। यानी पहली बात (अक्षुण्ण याददाश्त) सही है।

दूसरे प्रयोग में चूहों को एक बार फिर दो एक-सी वस्तुओं के साथ 10 मिनट के लिए छोड़ा गया।  24 घंटे बाद वस्तुएं फिर से रखी गईं लेकिन इस बार एक वस्तु बदल दी गई थी। देखा यह गया था कि क्या चूहे नई वस्तु पर ज़्यादा ध्यान देते हैं, यानी उस पर ज़्यादा समय बिताते हैं।

देखा गया कि जिन मादा चूहों को एसिटेट (Acetate) का इंजेक्शन दिया गया था उन्होंने अन्य के मुकाबले (जिन्हें प्लेसिबो इंजेक्शन दिया गया था) इन दोनों कार्यों में बेहतर प्रदर्शन किया। अलबत्ता, रोचक बात यह रही कि नर चूहों (Male Rodents) में कोई फर्क नज़र नहीं आया।

शोधकर्ताओं को पता चला है कि एसिटेट मस्तिष्क में जीन्स की अभिव्यक्ति (Gene Expression) को प्रभावित करता है। वह हिस्टोन प्रोटीन्स (Histone Proteins) में परिवर्तन कर देता है। हिस्टोन्स वे प्रोटीन होते हैं जिनके इर्द-गिर्द डीएनए (DNA) कसकर लिपटा होता है। जब हिस्टोन पर एसिटेट समूह जुड़ जाते हैं तो यह लिपटना थोड़ा ढीला पड़ जाता है। इसकी वजह से कई जीन्स और कोशिका की आणविक मशीनरी के बीच संपर्क आसान हो जाते हैं। ऐसे में ये जीन्स सक्रिय रहते हैं।

शोधकर्ताओं ने कुछ ऐसे हिस्टोन परिवर्तन देखे जिनका सम्बंध दीर्घावधि याददाश्त (Long term memory) से जाना-माना है। इसके अलावा एसिटेट ने मादा चूहों के मस्तिष्क के सीखने से सम्बंधित हिस्सों में भी जीन्स की अभिव्यक्ति पर असर डाला था।

एक तो यह महत्वपूर्ण बात रही कि फर्क सिर्फ मादा चूहों (Female Rodents) की स्मृति (Memory) पर दिखा। दूसरी बात और भी महत्वपूर्ण है। साइन्स सिग्नलिंग पत्रिका में प्रकाशित शोध पत्र में बताया गया है कि एसिटेट तभी कारगर होता है जब मस्तिष्क में तंत्रिका गतिविधि को सीखने की किसी प्रक्रिया के दौरान सक्रिय कियी जाए; यह आम याददाश्त सुदृढ़ीकरण का तरीका नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://mescalero.noldus.com/storage/core-blog/summer-reading-list-rodent-gender-differences-1658390817.webp

इंसान बेहोशी में भी सीख सकते हैं!

शीर्षक पढ़ते ही मन में यह सवाल उठता है: क्या ऐसा सचमुच मुमकिन है? हाल ही में हुए एक शोध में वैज्ञानिकों ने ऐसी ही चौंका देने वाली जानकारी को साझा करते हुए पुरानी समझ को चुनौती दी है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि साधारण बेहोशी वाली दवा देने के बावजूद भी इंसानी दिमाग (Human Brain) सामान्य अवस्था जैसा सक्रिय (Concious) रहता है। यहां तक कि दिमाग बेहोशी की हालत में भी संकेतों को समझता और आगे का अनुमान लगाता है। पिछले कुछ अध्ययनों में यह पता लगाया जा चुका है कि दिमाग के संवेदना-ग्राही हिस्से बेहोशी की हालत में इंद्रियों के संकेतों से सरल ध्वनियों को दर्ज कर सकते हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि क्या दिमाग बेहोशी की हालत में समझ और सीख भी सकता है।

इसी का पता लगाने के लिए बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के तंत्रिका वैज्ञानिक समीर शेठ और उनके साथियों ने सात ऐसे मरीज़ों पर अध्ययन किया, जिनका मिर्गी के इलाज के लिए मस्तिष्क का ऑपरेशन किया जा रहा था। सातों को प्रोपोफोल (Propofol) नामक दवा (जनरल एनेस्थीसिया) से बेहोश करके उनके दिमाग की गतिविधि को रिकॉर्ड किया गया।

इस अध्ययन को दो समूहों में बांटकर किया गया था। पहले समूह में, बेहोशी की हालत वाले तीन प्रतिभागियों को अलग-अलग आवृत्ति की बार-बार दोहराई जाने बीप सुनाई गई और बीच-बीच में कुछ अन्य ध्वनियां। दस मिनट तक मस्तिष्क की तंत्रिका गतिविधियां रिकॉर्ड करने से पता चला कि समय के साथ ‘बेहोश’ दिमाग के हिप्पोकैम्पस (Hippocampus) हिस्से में बीप को अन्य ध्वनियों से अलग पहचानने और उनकी अलग-अलग आवृत्तियों के बीच अंतर करने की क्षमता बढ़ती गई। अर्थात लगता है कि दिमाग अचेतन सीखने की क्षमता रखता है।

शेष चार प्रतिभागियों को कुछ वार्तालाप के हिस्से सुनाए गए। दिमागी रिकॉर्डिंग में देखा गया कि कुछ तंत्रिकाएं (Neurons) शब्दों के विशेष हिस्सों पर प्रतिक्रिया दे रहीं थीं (जैसे संज्ञाओं को बाकी शब्दों से अलग पहचानना)। एक शोधकर्ता के अनुसार, ‘बेहोशी (Unconcious) में भी प्रतिभागी यह अनुमान लगाने में समर्थ थे कि अगला शब्द क्या हो सकता है’। आखिर में, बेहोश प्रतिभागियों और सामान्य (बाहोश) प्रतिभागियों के आंकड़ों की तुलना की गई। देखा गया कि सामान्य और बेहोश, दोनों ही तरह के प्रतिभागियों के दिमागों का बर्ताव लगभग एक जैसा रहा।

यह दर्शाता है कि दिमाग का एक हिस्सा – हिप्पोकैम्पस (जो नई यादें बनाने और सीखने की क्षमता के लिए जिम्मेदार है), बेहोश हालत में भी जानकारी का आकलन और अनुमान लगाने में सक्षम है। वैज्ञानिक अभी अन्य तरह से काम करने वाले निश्चेतकों पर भी प्रयोग करना चाहेंगे ताकि और अधिक दृढ़ प्रमाण मिलें जो इस प्रयोग के परिणामों की पुष्टि कर सकें।

इस जानकारी का इस्तेमाल चिकित्सा क्षेत्र में किया जा सकता है। इन आंकड़ों की मदद से ऐसे मरीज़ों का उपचार संभव हो सकेगा जो कोमा या निष्क्रिय हालत से पीड़ित हैं। इससे दिमाग के क्षतिग्रस्त हिस्सों को छोड़कर, बाकी बचे हुए सही हिस्सों को कृत्रिम रूप से सक्रिय करने में मदद मिल सकेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://media.nature.com/w580h326/magazine-assets/d41586-026-01465-0/d41586-026-01465-0_52376964.jpg

एड्स वायरस से निपटने का नया प्रयास

वैसे तो एड्स वायरस (ह्युमैन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस यानी एच.आई.वी.) (HIV) पर किए गए अनुसंधान ने हमें ऐसी कई दवाइयां मुहैया कराई हैं जो वायरस को काबू में रखती हैं और उसे हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को तहस-नहस करने से रोके रखती हैं। दुनिया भर में करीब 4 करोड़ लोग एच.आई.वी. के साथ जी रहे हैं और कोई इलाज नहीं खोजा जा सका है। आज तक इलाज करके मात्र 11 लोगों को वायरस से मुक्त किया जा सका है। यह स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण (Stem cell transplant) के ज़रिए संभव हुआ है। दिक्कत यह है कि स्टेम कोशिका उपचार का उपयोग आसान नहीं है।

अब एच.आई.वी./एड्स (AIDS) सम्मेलन में प्रस्तुत कुछ निष्कर्ष एक नई राह सुझा रहे हैं। कुछ अध्ययन प्रयोगशालाओं में किए गए हैं और कुछ अध्ययन मरीज़ों पर भी किए गए हैं। इनमें एक नए विचार का इस्तेमाल किया गया है।

आम तौर पर एड्स वायरस कोशिका में प्रवेश करने के बाद संक्रमित कोशिका में ऐसे परिवर्तन करता है कि वे उसकी उपस्थिति को भांपने और भांपकर स्वयं को नष्ट करने में असफल रहती हैं। यदि कोशिकाएं स्वयं को नष्ट करें तो उनके अंदर बैठे वायरस भी खत्म हो जाएंगे। यदि वायरस की इस करामात से पार पा लें तो काम आसान हो जाएगा।

यह सही है कि वर्तमान में उपलब्ध दवाइयां एच.आई.वी. का दमन इतनी हद तक कर देती है कि रक्त परीक्षण (Blood Test) में वह नज़र नहीं आता। लेकिन वह संक्रमित टी-कोशिकाओं (Infected T-cells) और मैक्रोफेजों में बना रहता है और अपना जेनेटिक कोड व्यक्ति के गुणसूत्रों में पिरो देता है। जैसे ही व्यक्ति उपचार बंद करता है ये सुप्त वायरस अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगते हैं और जल्दी ही लाखों वायरस रक्त में पहुंच जाते हैं। कई संक्रमित कोशिकाएं इन वायरसों को बाहर निकालने की प्रक्रिया में या प्रतिरक्षा तंत्र के हमले में मारी जाती हैं, लेकिन कुछ जीवित रह जाती है।

नई रणनीति टी-कोशिकाओं व मैक्रोफेज में पाए जाने वाले ऐसे सेंसर्स पर टिकी है जो सूक्ष्मजीवों को ताड़ते हैं। इन्हें कार्ड-8 (CARD8) कहते हैं। ये मुख्य रूप से प्रोटीएज़ (Protease) नामक एंज़ाइम को पहचानते हैं जो नव-निर्मित प्रोटीन्स को तोड़ता है ताकि नए वायरस बनाए जा सकें। जैसे ही कार्ड-8 किसी वायरस प्रोटीन की उपस्थिति भांपता है, वह एक किस्म की कोशिकीय खुदकुशी की प्रक्रिया शुरू करवा देता है जिसके चलते नए वायरसों का निर्माण अस्त-व्यस्त हो जाता है। इस प्रक्रिया को पायरोप्टोसिस (Pyroptosis) कहते हैं। 

एच.आई.वी. अपना प्रोटिएज़ दो एक-सी इकाइयों को जोड़कर बनाता है। 2021 में साइन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र में वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के लियांग शान और उनके साथियों ने बताया गया था कि कार्ड-8 (Card-8) सिर्फ दो इकाइयों के जुड़ने पर बने डाइमर को ही पहचानता है। वायरस इसका फायदा उठाते हैं – वे दो इकाइयों को जोड़ने की प्रक्रिया को तब तक मुल्तवी रखते हैं जब तक कि वायरस कण मेज़बान कोशिका से बाहर न झांकने लगे। शान की टीम ने यह भी बताया था कि दो वर्तमान एच.आई.वी. रोधी दवाइयां (एफेवाइरिनेज़़ और रिल्पिवायरिन) किसी तरह से डाइमर (Dimer) निर्माण की इस प्रकिया को जल्दी करवा देती हैं। उस समय तो किसी ने इस खोज की उपचारात्मक संभावना पर ध्यान नहीं दिया था लेकिन अब इस पर चर्चा हो रही है।

कई औषधि निर्माताओं ने ऐसी अधिक शक्तिशाली दवाइयों पर काम भी शुरू कर दिया है। जैसे टारगेटेड एक्टिवेटर ऑफ सेल किल (TACK) पर ध्यान दिया जा रहा है। 2023 में मर्क कंपनी ने साइन्स ट्रांसलेशन मेडिसिन में बताया था कि उसने ऐसा अणु खोज लिया है जो प्रोटिएज़ को डाइमराइज़ करवाने में एफेवाइरिनेज़ (Efavirenz) से कई गुना शक्तिशाली है। कंपनी इसका परीक्षण ऐसे लोगों पर कर रही है जिन्हें पहले कोई उपचार नहीं मिला है। 

दूसरी ओर, कोलंबिया विश्वविद्यालय के डेविड हो एक दोतरफा रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसमें TACK को एक अन्य तरीके के साथ जोड़ गया है। यह दूसरा तरीका है सुप्तावस्था पलट एजेंट (Latency reversal agents LRA) पर आधारित। ये ऐसे एजेंट होते हैं जो वायरस की सुप्तावस्था (latency) को समाप्त करके उन्हें अपनी प्रतिलिपियां बनाने को उकसाते हैं। इसके पीछे विचार यह है कि जिन कोशिकाओं में वायरस तेज़ी से प्रतिलिपियां बनाएंगे, उन्हें प्रतिरक्षा तंत्र नष्ट कर देगा या वे स्वयं ही फट जाएगी। लेकिन अब तक इस तरह से वायरस का जखीरा कम करने में सफलता सीमित रही है।

हो की प्रयोगशाला में बेहतर LRA बनाने पर काम चल रहा है। वहां सुप्त संक्रमित कोशिकाओं के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जो ऐसे कोशिकीय संकेतों को शुरू करवा दें जो वायरस को अपनी प्रतिलिपि बनाने को उकसाएं। लेकिन प्रयोगशाला में एच.आई.वी. संक्रमित लोगों से ली गई कोशिकाओं में अकेली एंटीबॉडी कारगर नहीं रही। ये कोशिकाएं ऐसे व्यक्तियों की थीं जो उपचार ले रहे थे और वायरस को पूरी तरह नियंत्रित कर रहे थे। लेकिन हो ने बताया है कि जब उन्होंने साथ में TACK औषधि मिला दी तो वायरल आरएनए (Viral RNA) की मात्रा तेज़ी से कम हुई।

हो का कहना है कि एच.आई.वी. संक्रमण की स्थिति पर असर डालने के लिए LRA और टैक का उपयोग शायद ज़रूरी न हो।

रिट्रोवायरस (Retrovirus) और अन्य मौकापरस्त संक्रमणों पर एक सम्मेलन में वॉशिंग्टन विश्वविद्यालय मेडिसिन की प्रिया लाल ने बताया कि उनकी टीम ने सात ऐसे एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्तियों को शामिल किया जो विभिन्न वायरस रोधी दवाइयों और एफेवाइरिनेज़ की मदद से वायरस पर काबू किए हुए थे। सुप्त रूप से संक्रमित कोशिकाओं के प्रति संवेदी तकनीकों की मदद से पता चला कि 4 महीने के उपरांत 6 व्यक्तियों में सुप्त संक्रमित कोशिकाएं 20 से 50 प्रतिशत तक कम हो गई थीं। शोधकर्ताओं ने स्वीकार किया है कि इतनी गिरावट किसी व्यक्ति को रोगमुक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है लेकिन यह इस विचार का प्रमाण है कि प्रोटिएज़ को सक्रिय करने वाले शक्तिशाली कारकों का विकास करना उपयोगी होगा। कई औषधि निर्माताओं ने इस दिशा में काम करना शुरू भी कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit:https://cdn.mos.cms.futurecdn.net/AybfvWmo3R7p4i9APrefjW.jpg

भारत की आनुवंशिक विविधता पर सबसे बड़ा अध्ययन

भारत (India) ने अपनी आनुवंशिक विविधता (Genetic Diversity) को समझने की दिशा में एक बड़ा कदम उठाया है। GenomeIndia Project के तहत वैज्ञानिकों ने देश के लोगों में लाखों ऐसे आनुवंशिक बदलाव खोजे हैं, जिनकी जानकारी पहले दुनिया के बड़े वैज्ञानिक डैटाबेस (Database) में मौजूद नहीं थी। इसके लिए 83 अलग-अलग आबादियों के लगभग 9800 स्वस्थ लोगों के पूरे जीनोम का अध्ययन किया गया और करीब 4.4 करोड़ नए आनुवंशिक बदलाव पहचाने गए।

शोध से पता चलता है कि अब तक दुनिया के अधिकतर आनुवंशिक अध्ययन युरोपीय मूल के लोगों पर आधारित थे, जिनमें भारतीय और दक्षिण एशियाई (South Asian) आबादी को कम महत्व मिला था। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह परियोजना भविष्य में बीमारियों की पहचान, लोगों की वंशावली समझने, व्यक्ति-विशिष्ट चिकित्सा और दवाइयों के असर सम्बंधी बेहतर समझ बनाने में मददगार होगी।

इस परियोजना में शामिल वैज्ञानिक इतने बड़े स्तर पर नए आनुवंशिक बदलाव देखकर हैरान रह गए। बहुत दुर्लभ बदलावों को हटाने के बाद भी कुल बदलावों में से 10 प्रतिशत से ज़्यादा ऐसे थे, जो पहले किसी वैज्ञानिक डैटाबेस में दर्ज नहीं थे। वैज्ञानिकों के अनुसार इससे यह स्पष्ट होता है कि भारत की आनुवंशिक विविधता का बड़ा हिस्सा अभी भी अनजाना है। इसकी वजह देश में हज़ारों अलग-अलग समुदायों (communities) का लंबे समय तक अलग-अलग रहना, प्रवासन और अपने ही सामाजिक समूहों में विवाह करना है।

भारत के जैव प्रौद्योगिकी विभाग से वित्तीय सहायता प्राप्त इस परियोजना में देश भर के 20 शोध संस्थानों ने मिलकर काम किया है। अभी करीब 10,000 लोगों के जीनोम (Genome) का अध्ययन किया गया है, लेकिन भविष्य में इसे बढ़ाकर 10 लाख जीनोम तक ले जाने की योजना है, जिसमें अलग-अलग बीमारियों से जुड़े समूह भी शामिल होंगे। वैज्ञानिकों का मानना है कि इतना बड़ा डैटा बेस भारतीय लोगों के लिए अधिक सटीक चिकित्सा प्रणाली (Perfect Medical System) बनाने में मदद करेगा।

अध्ययन में सबसे खास बात कुछ अलग-थलग रहने वाले आदिवासी समुदायों (Tribal Communities) से जुड़ी थी। इन समुदायों में आनुवंशिक एकरूपता (Gentic Uniformity) बहुत ज़्यादा पाई गई, जिसे होमोज़ायगोसिटी (Homozygosity) कहते हैं। जब छोटे समुदायों में पीढ़ियों तक अंदर ही अंदर ही विवाह होते रहते हैं, तो कुछ हानिकारक जीन ज़्यादा सामान्य हो सकते हैं, क्योंकि बच्चों को माता-पिता दोनों से एक जैसे खराब जीन मिलने की संभावना बढ़ जाती है।

शोध में पाया गया कि 29 में से 27 आदिवासी समूहों में बीमारी पैदा करने वाले आनुवंशिक बदलाव महत्वपूर्ण स्तर पर मौजूद थे। दक्षिण भारत के एक आदिवासी समुदाय में वैज्ञानिकों ने HGD जीन में एक हानिकारक बदलाव खोजा, जो अल्केप्टोनयूरिया ((Alkaptonuria) नाम की दुर्लभ बीमारी से जुड़ा है। यह बीमारी शरीर के जोड़ों और अंगों को नुकसान पहुंचा सकती है। खास बात यह थी कि यह बदलाव अंतर्राष्ट्रीय आनुवंशिक डैटाबेस में मौजूद नहीं था; यानी सामान्य जांच में यह बीमारी आसानी से छूट सकती थी।

वैज्ञानिकों ने 7000 से ज़्यादा जीन्स में 15,000 से अधिक ऐसे आनुवंशिक बदलाव (Gentic Changes) भी खोजे, जो कुछ जीन्स की गतिविधि को मंद या बंद कर सकते हैं। इनमें से कुछ बदलाव बीमारियों का खतरा बढ़ा सकते हैं, जबकि कुछ, शरीर को कुछ बीमारियों से बचाने में मदद भी कर सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में इनमें से कुछ खोजों का उपयोग नई RNA आधारित चिकित्सा (RNA based Treatment) विकसित करने में किया जा सकता है, जो खराब जीन के असर को ठीक करने की कोशिश करती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि इलाज के रूप में इस्तेमाल करने से पहले अभी और प्रयोगशाला परीक्षणों की ज़रूरत है।

अध्ययन में यह भी पता चला कि भारतीय लोगों पर दवाओं का असर अलग-अलग हो सकता है। एक ऐसा आनुवंशिक बदलाव मिला, जो एनेस्थीसिया (निश्चेतन) के दौरान होने वाली जटिलताओं से जुड़ा है और पहले की सोच से कहीं अधिक लोगों में पाया गया। पहले माना जाता था कि यह सिर्फ एक खास समुदाय तक सीमित है, लेकिन नए अध्ययन में यह कई अलग-अलग समूहों में मिला। वैज्ञानिकों का कहना है कि भविष्य में इससे बेहोशी की दवाएं देने के तरीके में बदलाव आ  सकता है।

वैज्ञानिकों ने ऐसे आनुवंशिक बदलाव भी खोजे, जो इस बात पर असर डाल सकते हैं कि शरीर अवसाद (Depression), दर्द, कैंसर (Cancer) और खून से जुड़ी बीमारियों की दवाओं का किस तरह इस्तेमाल करता है। कुछ आदिवासी समुदायों में हर पांच में से लगभग एक व्यक्ति में ऐसे बदलाव पाए गए, जो इस बात पर असर डाल सकते हैं कि शरीर अवसाद-रोधी या तेज़ दर्द निवारक दवाओं को कैसे प्रोसेस करता है। भविष्य में ऐसी जानकारी डॉक्टरों को अलग-अलग लोगों के लिए ज़्यादा सुरक्षित और असरदार इलाज चुनने में मदद कर सकती है।

हालांकि वैज्ञानिकों का कहना है कि भारत में जीन के आधार पर इलाज तय करने वाली सटीक चिकित्सा अभी शुरुआती चरण में है। दवाओं पर जीन के असर को समझने वाले परीक्षण मौजूद तो हैं, लेकिन अभी इतने सबूत नहीं हैं कि डॉक्टर हर इलाज का फैसला पूरी तरह इन पर भरोसा करके कर सकें, खासकर मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) से जुड़ी दवाओं में। इसे अस्पतालों में नियमित रूप से इस्तेमाल करने से पहले और बड़े क्लीनिकल अध्ययनों की ज़रूरत होगी।

इस शोध से यह भी पता चला कि अभी इस्तेमाल होने वाले आनुवंशिक जोखिम अनुमान मॉडल भारतीय लोगों के लिए पूरी तरह सही नहीं हैं। ज़्यादातर मॉडल युरोपीय आबादी के डैटा पर आधारित हैं, इसलिए वे भारतीय समुदायों पर ठीक से काम नहीं करते। इसी वजह से GenomeIndia टीम ने भारतीय लोगों के लिए एक नया संदर्भ डैटाबेस तैयार किया है, ताकि आनुवंशिक जानकारी को ज़्यादा सही तरीके से समझा जा सके।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इतनी बड़ी खोज के बावजूद मानव जीनोम (Human Genome) का बड़ा हिस्सा अभी भी अनजाना है। अभी तक का शोध मुख्य रूप से उन जीन्स पर केंद्रित रहा है, जो प्रोटीन बनाते हैं, जबकि वे पूरे डीएनए का सिर्फ 2 प्रतिशत हिस्सा हैं। बाकी 98 प्रतिशत हिस्सा, जिसे डार्क जीनोम (Drak Genome) कहा जाता है, जीन्स को नियंत्रित करने और कई बीमारियों से जुड़े महत्वपूर्ण बदलाव छिपाए हो सकता है। वैज्ञानिक मानते हैं कि अगर इस हिस्से को बेहतर तरीके से समझ लिया जाए, तो GenomeIndia Project सिर्फ जीन बदलावों की सूची न रहकर भविष्य में व्यक्ति-विशिष्ट चिकित्सा का शक्तिशाली उपकरण बन सकता है। फिलहाल यह परियोजना भारत की आनुवंशिक विविधता को वैश्विक वैज्ञानिक मंच पर पहचान दिलाने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit:https://www.healthcareradius.in/cloud/2021/11/15/081716_ti_ExAC_main_free_1.jpg