सीपें: जलीय-दुनिया की गुपचुप नायिकाएं

कुमार सिद्धार्थ

दी की तलहटी में आधी गड़ी हुई, या समुद्र के किनारे चट्टानों से चिपकी हुई सीपों (oysters) में न तो कोई चमक-दमक है, न कोई तेज़ गति। फिर भी पूरी जलीय-दुनिया (aquatic ecosystem) बहुत हद तक इन्हीं पर टिकी हुई है।

सीपों को अगर एक पंक्ति में समझना हो तो कहा जा सकता है कि वे पानी की सफाईकर्मी (water filter species) हैं। बिना थके, बिना रुके सीप अपने शरीर में पानी खींचती है, उसमें से गंदगी, सूक्ष्म कण, बैक्टीरिया, शैवाल, रसायन और भारी धातु (heavy metals) तक को छानती है और अपेक्षाकृत साफ पानी बाहर छोड़ देती है। वैज्ञानिक बताते हैं कि एक सामान्य आकार की सीप एक दिन में 20 से 40 लीटर तक पानी छान सकती है। अब ज़रा कल्पना कीजिए, अगर किसी नदी या तट पर हज़ारों या लाखों सीपें हों, तो वे कितनी बड़ी मात्रा में पानी को साफ रखती होंगी।

दुनिया भर में सीपों की लगभग 1200 से अधिक प्रजातियां (oyster species) पाई जाती हैं। इनमें से करीब 1000 प्रजातियां मीठे पानी (freshwater mussels) में और बाकी समुद्री जल में रहती हैं। दिलचस्प बात यह है कि मीठे पानी की सीपों की सबसे अधिक विविधता उत्तरी अमेरिका में पाई जाती है। वहां अकेले लगभग 300 प्रजातियां हैं। युरोप में करीब 16 प्रमुख प्रजातियां हैं, जबकि एशिया में भी बड़ी संख्या में मीठे पानी की और समुद्री सीपें मिलती हैं। चीन, भारत, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया के देश सीपों की जैव विविधता और खेती, दोनों के लिए जाने जाते हैं।

सीपों की बनावट बेहद सरल लेकिन प्रभावशाली होती है। दो मज़बूत खोलों के भीतर उनका कोमल शरीर सुरक्षित रहता है। ये खोल कैल्शियम कार्बोनेट (calcium carbonate shell) से बने होते हैं, जिसे सीपें पानी से धीरे-धीरे लेकर परत-दर-परत जमा करती हैं। यही कारण है कि उनका खोल जीवन भर बढ़ता रहता है। मोती बनने की प्रक्रिया (pearl formation) भी इसी से जुड़ी है। जब कोई बाहरी कण उनके शरीर के भीतर फंस जाता है, तो सीप उसे ढंकने के लिए कैल्शियम की परतें चढ़ाती जाती है और धीरे-धीरे मोती बन जाता है।

सीपों का जीवन चक्र (oyster life cycle) और भी रोचक है। समुद्री सीपें अपने अंडे और शुक्राणु पानी में छोड़ती हैं। उनसे सूक्ष्म लार्वा बनते हैं, जो कुछ समय तक समुद्र में तैरते रहते हैं और फिर किसी सख्त सतह से चिपक जाते हैं।

मीठे पानी की कई सीपें तो और भी अनोखा तरीका अपनाती हैं। उनके लार्वा कुछ समय तक मछलियों के गलफड़ों या पंखों से चिपककर रहते हैं। इससे उन्हें सुरक्षित वातावरण (host fish dependency) मिलता है और वे दूर-दूर तक फैल पाती हैं। बाद में वे नदी की तलहटी में गिरकर स्वतंत्र जीवन शुरू करती हैं। यानी सीपें केवल पानी पर नहीं, मछलियों पर भी निर्भर करती हैं। मछलियां कम हों, तो सीपों का भविष्य भी संकट में पड़ जाता है।

सीपों की सबसे बड़ी खासियत उनकी उम्र (longevity) है। समुद्री सीपें आम तौर पर 10 से 20 साल तक जीवित रहती हैं, जबकि मीठे पानी की कई सीपें 50 से 100 साल तक जी सकती हैं।

हाल के दशकों में यह देखा गया है कि मीठे पानी की सीपों की लगभग एक हज़ार प्रजातियों में से अधिकांश या तो संकटग्रस्त (endangered species) हैं या तेज़ी से घट रही हैं। पोलैंड, क्रोएशिया और ब्रिटेन जैसे देशों में बड़े पैमाने पर सीपों की मृत्यु की घटनाएं दर्ज की गई हैं। लंदन की टेम्स नदी में पिछले 60 वर्षों में मीठे पानी की लगभग सारी सीपें मर चुकी हैं।

उत्तरी अमेरिका में मीठे पानी की 70 प्रतिशत से अधिक सीप प्रजातियां संकटग्रस्त या विलुप्ति की कगार पर हैं। युरोप में 16 में से 12 प्रजातियां खतरे में हैं और 3 को अत्यंत संकटग्रस्त माना गया है। इसके पीछे कई कारण हैं, लेकिन सबसे बड़ा कारण है जलवायु परिवर्तन। पानी का तापमान बढ़ रहा है, ग्रीष्म लहरें आ रही हैं। जब नदी या समुद्र का पानी अचानक बहुत गर्म हो जाता है, तो सीपें उसे सहन नहीं कर पातीं और बड़े पैमाने पर मर जाती हैं। इसके साथ ही प्रदूषण, रासायनिक अपशिष्ट, माइक्रोप्लास्टिक, नदियों का बहाव बदलना, बांध, खनन और शहरी गंदा पानी इस संकट को और विकट बना रहे हैं।

महासागरों में एक और बड़ी समस्या है समुद्र का अम्लीकरण। कार्बन डाईऑक्साइड समुद्र में घुलकर पानी को अम्लीय बना रही है। इससे सीपों के खोल बनने की प्रक्रिया कमज़ोर हो जाती है। उनका खोल पतला और भुरभरा हो जाता है। छोटी-छोटी शिशु सीपें तो खोल बना ही नहीं पातीं!

समुद्री सीपें तटीय इलाकों के लिए जीवन-रेखा जैसी हैं। वे पानी साफ रखती हैं, तटों को कटाव से बचाती हैं, छोटी मछलियों और केकड़ों को आश्रय देती हैं और मत्स्य उत्पादन को स्थिर बनाए रखती हैं। जहां-जहां सीपों की चट्टानें होती हैं, वहां जैव विविधता कई गुना बढ़ जाती है।

एशियाई देशों में भी सीपों की स्थिति चिंताजनक है। अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे क्षेत्रों की समुद्री जैव विविधता पर सीपों की गिरावट का सीधा असर पड़ रहा है। इन द्वीपों के आसपास के प्रवाल भित्ति (कोरल रीफ) तंत्र में सीपों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। वे पानी की स्वच्छता बनाए रखने में मदद करती हैं, जिससे कोरल और मछलियों का जीवन संभव होता है। लेकिन समुद्र का बढ़ता तापमान, पर्यटन से उत्पन्न प्रदूषण, प्लास्टिक कचरा और तटीय विकास की गतिविधियां इन नाज़ुक तंत्रों को कमज़ोर कर रही हैं।

एशिया में सीपों की खेती किसी आधुनिक उद्योग से कम नहीं है, बल्कि यह समुद्र और इंसान के बीच बने एक पुराने रिश्ते का विस्तार है। चीन, जापान, थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में सीपों को ‘उगाया’ नहीं जाता, बल्कि उन्हें सही माहौल दिया जाता है, जहां वे अपने प्राकृतिक तरीके से पनप सकें। समुद्र के तट के पास बांस, लकड़ी या रस्सियों की कतारें लगाई जाती हैं। इन्हीं पर सीपों के लार्वा आकर चिपक जाते हैं। कुछ जगहों पर पुराने खोल, पत्थर या खास तरह की टाइलें भी डाली जाती हैं, ताकि छोटे-छोटे सीपों को पकड़ बनाने के लिए ठोस सतह मिल सके। फिर समुद्र अपना काम करता है। पानी के साथ आने वाला पोषण, शैवाल और खनिज तत्व सीपों के भोजन बनते हैं। इंसान को उन्हें खिलाना नहीं पड़ता, बस पानी को साफ और संतुलित बनाए रखना होता है। 

चीन इस क्षेत्र में सबसे आगे है। दुनिया में पैदा होने वाली समुद्री सीपों का बड़ा हिस्सा अकेले चीन से आता है। वहां के तटीय प्रांतों में हज़ारों किलोमीटर तक समुद्र में सीपों की खेती फैली हुई है। सैकड़ों सालों से मछुआरा परिवार पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस काम से जुड़े हैं। सुबह-सुबह छोटी नावों में निकलकर वे सीपों की कतारों की देखभाल करते हैं, टूटे हुए ढांचे ठीक करते हैं, ज़रूरत से ज़्यादा जमी सीपों को अलग करते हैं और परिपक्व सीपों को बाज़ार तक पहुंचाते हैं। यह खेती लाखों लोगों को रोज़गार देती है; नाविकों को, सफाई और पैकिंग करने वालों को, बाज़ार तक पहुंचाने वालों को और फिर होटल, रेस्तरां और निर्यात से जुड़े लोगों को भी।

जापान में सीपों की खेती तकनीकी रूप से काफी उन्नत है। वहां समुद्र की गहराई, पानी की गति और तापमान को ध्यान में रखकर खेती की जाती है। जापानी वैज्ञानिक सीपों की उन किस्मों पर काम कर रहे हैं जो ज़्यादा गर्म पानी में भी जीवित रह सकें। इससे जलवायु परिवर्तन के असर को कुछ हद तक संतुलित करने की कोशिश की जा रही है। जापान में सीपें केवल भोजन नहीं, बल्कि सांस्कृतिक परंपरा का हिस्सा हैं। सूप, सुशी और कई पारंपरिक व्यंजनों में सीपों का इस्तेमाल होता है।

थाईलैंड और वियतनाम जैसे देशों में सीपों की खेती छोटे-छोटे तटीय गांवों की रीढ़ है। वहां परिवार के परिवार इस काम से जुड़े हैं। महिलाएं और बुज़ुर्ग अक्सर सीपों को साफ करने, छांटने और बाज़ार के लिए तैयार करने का काम करते हैं। बच्चों की पढ़ाई से लेकर घर के खर्च तक, बहुत कुछ इसी पर निर्भर करता है। इन देशों में सीपों की खेती गरीब समुदायों के लिए एक स्थिर आमदनी का साधन बन चुकी है।

सीपों का उपयोग केवल भोजन तक सीमित नहीं है। उनके खोलों का इस्तेमाल चूना बनाने में, खाद में कैल्शियम बढ़ाने में और निर्माण सामग्री में भी होता है। कुछ जगहों पर सीपों के खोलों से सड़क और तटीय बांध मजबूत किए जाते हैं। पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में भी सीपों के खोल का पावडर उपयोग में लाया जाता रहा है।

खाने के रूप में सीपें प्रोटीन, ज़िंक, आयरन और ओमेगा-3 फैटी एसिड से भरपूर होती हैं। यही कारण है कि एशियाई देशों में इन्हें ‘समुद्र का पौष्टिक उपहार’ कहा जाता है। गरीब परिवारों के लिए यह सस्ता और पौष्टिक भोजन है, जबकि बड़े शहरों में यही सीपें महंगे रेस्तरां में विशेष व्यंजन के रूप में परोसी जाती हैं।

लेकिन दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों जैसे इंडोनेशिया, फिलीपींस और वियतनाम में भी सीपों की खेती और प्राकृतिक आबादी पर संकट गहराता जा रहा है। वहां सीपें न केवल पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा हैं, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका से भी जुड़ी हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्री तूफानों की तीव्रता, समुद्र स्तर में वृद्धि और जल-तापमान में बदलाव इन क्षेत्रों में सीपों के अस्तित्व के लिए बड़ी चुनौती बन गए हैं। खेती भी जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण से खतरे में पड़ रही है।

अगर सीपें सचमुच कम हो गईं, तो क्या होगा? सबसे पहले तो पानी की गुणवत्ता गिरेगी। नदियां और समुद्र अधिक गंदले होंगे। पीने योग्य पानी तैयार करना और महंगा हो जाएगा। फिर शैवाल विस्फोट बढ़ेंगे, जिससे मछलियां मरेंगी और दुर्गंध फैलेगी। और धीरे-धीरे पूरा पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित होने लगेगा। मत्स्य उद्योग को भी झटका लगेगा। तटीय समुदायों की आजीविका भी खतरे में पड़ेगी।

फिर भी आशा पूरी तरह खत्म नहीं हुई है। वॉशिंगटन डीसी से होकर बहने वाली एनाकोस्टिया नदी को साफ किया जा रहा है सिर्फ सीपों के लिए नहीं, बल्कि सीपों की मदद से। पुनर्प्रवेश कार्यक्रम का उद्देश्य सीवेज, ई.कोली और माइक्रोप्लास्टिक्स सहित अन्य प्रदूषकों को कम करना है।

एनाकोस्टिया नदी की तरह  कई लोग एक अलग रणनीति अपना रहे हैं। वे सीपों के संरक्षण के लिए धन जुटाने की बजाय, यह विचार सामने रख रहे हैं कि सीपों का उपयोग पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए किया जा सकता है।

पोलैंड की नीदा नदी में 1980 के दशक में सीपें पूरी तरह समाप्त हो गई थीं, लेकिन जब सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट्स ने प्रदूषण को काफी हद तक कम कर दिया, तब मोटे खोल वाली नदी-सीप को सफलतापूर्वक फिर से बसाया गया।

इन उदाहरणों से यह साफ होता है कि अगर हम पानी को साफ करें, तो सीपें लौट सकती हैं। सीपों में एक और अद्भुत क्षमता है अनुकूलन की। हर सामूहिक मृत्यु के बाद कुछ सीपें बच जाती हैं। वही आगे चलकर नई पीढ़ी (adaptation ability)  बनाती हैं। यही विकास की प्रक्रिया है। यही उम्मीद है।

अगर हमने इन खामोश सफाईकर्मियों (ecosystem engineers) को बचा लिया, तो हम न केवल एक जीव-समूह को, बल्कि अपनी नदियों, अपने समुद्रों और अपने भविष्य (sustainable future) को बचा लेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अच्छा खाएं, पृथ्वी की सीमा में खाएं

अच्छा खाओ, सेहतमंद खाओ, जंक फूड मत खाओ, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (ultra processed food) मत खाओ। ऐसी बातें कहना-सुनना आम हैं – स्वास्थ विशेषज्ञों से लेकर शुभचिंतक तक ऐसा कहते हैं। लेकिन शायद ही कोई हमारे ग्रह – पृथ्वी – की सेहत (planetary health) को ध्यान में रखकर ऐसा कहता होगा। इस संदर्भ में पॉट्सडेम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इम्पैक्ट रिसर्च के अर्थ-सिस्टम साइंटिस्ट जोहान रॉकस्ट्रॉम ने नेचर पत्रिका के एक लेख में बताया है कि किस तरह का खाना पृथ्वी की सेहत के लिए अच्छा है। उनका यह लेख ऐसे समय में और भी मौजूं है जब हमने सितंबर 2025 में पृथ्वी की नौ में से सात सीमा-रेखाओं (planetary boundaries)का उल्लंघन कर लिया है। यहां उन्हीं के लेख का सार प्रस्तुत किया जा रहा है।

म अपनी पसंद का या अपनी सेहत के लिए फायदेमंद भोजन खाते हैं। सलाह देने वाले सेहत के लिहाज़ से अच्छा खाने की सलाह देते हैं। लेकिन जोहान रॉकस्ट्रॉम कहते हैं भोजन का चुनाव सिर्फ हमारी जीवनशैली या सेहत का मामला नहीं है, बल्कि यह समाज और पृथ्वी दोनों की सेहत (earth system health) का मामला है। कैसे?

यदि आप इस पहलू को थोड़ा खंगालेंगे कि हम क्या खाते है, जो खाते हैं उसके उत्पादन (food production) में, और उसे बनाने में कितने संसाधन लगते हैं, तो बात शायद थोड़ी स्पष्ट हो जाए।

मोटे तौर पर हम तीन तरह का खाना खाते हैं

पहला, गैर-प्रोसेस्ड फूड। जैसा उपजा वैसा ही खा लिया, जैसे फल, सलाद वगैरह। (लेकिन यहां यह बात भी ध्यान में रखना होगा कि इन फलों, सब्ज़ियों को उगाने में संसाधन लगते हैं, पानी खर्च होता है, कीटनाशक से लेकर उर्वरक तक डाले जाते हैं। यह मायने रखता है कि इन चीज़ों की खेती के क्या तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं।)

दूसरा, प्रोसेस्ड फूड। खेत या बागानों से आने के बाद अनाज, फल, सब्ज़ी वगैरह को थोड़ा प्रोसेस करके खाना। जैसे गेंहूं, बाजरा आदि की रोटी बनाकर खाना, सब्ज़ियां पकाना वगैरह।

तीसरा, अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड। इसमें खाने को अत्यधिक प्रोसेस किया जाता है ताकि वह ज़्यादा दिन तक चले, या झटपट तैयार कर खा लिया जाए। जैसे चिप्स, फ्रोज़न फूड, इंस्टेंट फूड, कोल्डड्रिंक, सॉफ्टड्रिंक्स वगैरह अत्यधिक प्रोसेस्ड फूड में आते हैं।

मोटे तौर पर कहें, तो भोजन के उत्पादन व प्रोसेसिंग के दौरान कुल वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन (global greenhouse gas emissions) में लगभग 30 प्रतिशत योगदान होता है। और, दुनिया में हर साल इस्तेमाल होने वाले ताज़े पानी का लगभग 70 प्रतिशत हिस्सा खेती में खर्च होता। खेती-बाड़ी न्यूट्रिएंट्स प्रदूषण (nutrient pollution) और जैव विविधता के नुकसान (biodiversity loss) का एक बड़ा कारण भी है। (न्यूट्रिएंट्स प्रदूषण, एक तरह का जल प्रदूषण जिसमें जल निकायों में खेती में इस्तेमाल होने वाले नाइट्रोजन, फॉस्फोरस आदि बहकर मिल जाते हैं और जलनिकायों में शैवाल बढ़ाते हैं।)

वर्तमान भोजन काफी हद तक अस्वस्थ की श्रेणी में आता है और सालाना लगभग डेढ़ करोड़ लोग अस्वस्थ भोजन (unhealthy diet) के चलते असमय मर जाते हैं जो वायु प्रदूषण से होने वाली सालाना मौतों से अधिक है। इसके अलावा, फिलहाल दुनिया Reserved: पृथ्वी की सीमा-रेखाएं
2009 में, जोहान रॉकस्ट्रॉम ने अन्य वैज्ञानिकों के साथ मिलकर पृथ्वी ग्रह पर मनुष्य के प्रभाव के पैमाने का अंदाज़ा लगाने के लिए प्लेनेटरी बाउंड्रीज़ (Planetary Boundaries) फ्रेमवर्क का प्रस्ताव रखा था। उन्होंने नौ सीमाओं (प्लेनेटरी बाउंड्रीज़) की पहचान की थी, जिन्हें अगर लांघा गया तो पृथ्वी की कार्यप्रणाली डगमगा सकती है। हद में रहने का मतलब है हम सुरक्षित कामकाजी दायरे में रहेंगे। ये नौ सीमा रेखाएं हैं: जलवायु परिवर्तन, जैवमण्डल समग्रता, भू-प्रणाली परिवर्तन, मीठे पानी में बदलाव, जैव भू-रसायन चक्र, समुद्र अम्लीकरण, वायुमंडलीय एरोसोल (निलंबित कणीय पदार्थ) का भार, समतापमंडल में ओज़ोन क्षरण और नवीन कारक।
की एक प्रतिशत आबादी ही ऐसे दायरे में है जहां लोगों के अधिकार और भोजन की ज़रूरतें पृथ्वी की मर्यादाओं (safe operating space) के अंदर पूरी हो रही हैं।

ऐसे में हमें अपनी खानपान की आदतों में फौरन बदलाव लाने की ज़रूरत है। लेकिन कैसे? वैज्ञानिकों ने इस पर गंभीरता से काम किया है। 2025 के ईट–लैंसेट (EAT-Lancet) कमीशन में लगभग 35 देशों के पोषण, जलवायु, अर्थशास्त्र, स्वास्थ्य और कृषि विशेषज्ञ शामिल थे। इस कमीशन ने बताया है कि स्वस्थ भोजन क्या होता है, और एक उन्नत प्लैनेटरी हेल्थ डाइट (PHD) का सुझाव दिया है। PHD, ऐसा भोजन है जो मनुष्य और पृथ्वी दोनों के लिए स्वास्थ्यकर होगा। इसमें फल, सब्ज़ियां, गिरियां, फलियां और साबुत अनाज भरपूर मात्रा में लेने की सालह दी गई है; ये सभी मिलकर रोज़ाना की कैलोरी इनटेक का लगभग 65 प्रतिशत पूरा करें। PHD में हफ्ते में लगभग एक बार ही रेड मीट खाने और दो बार थोड़ी मात्रा में पोल्ट्री और मछली या शेलफिश खाने की सलाह दी गई है। PHD काफी लचीली है। कई पारंपरिक भोजन – जैसे मेडिटेरेनियन, दक्षिण और पूर्वी एशियाई, अफ्रीकन और लैटिन अमेरिकन भोजन – पहले से ही इसके मुताबिक हैं।

अभी, ज़्यादातर लोगों का आहार PHD से काफी अलग है। कई देशों में, खासकर अमेरिका में, लोग मीट बहुत ज़्यादा खाते हैं और सब्ज़ियां, फल, फलियां और गिरियां नहीं खाते हैं। इसके अलावा, अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (processed food consumption) पूरी दुनिया में बहुत तेज़ी से अपनाया जा रहा है, जिसके चलते ऊपर से मिलाई गई शर्करा (added sugar), संतृप्त वसा और नमक का सेवन बढ़ रहा है।

कमीशन ने ग्रह की सभी नौ सीमा-रेखाओं में विभिन्न खाद्य प्रणालियों (food systems) के योगदान को मापा। और इनकी तुलना उस खाद्य प्रणाली से की जो मनुष्य और पृथ्वी दोनों के लिए स्वास्थ्यकर और वहनीय आहार (sustainable diet) दे सकती है। यह अनुमान लगाया गया कि क्या 2050 तक लगभग दस अरब लोगों को पृथ्वी की सीमाओं के अंदर पर्याप्त और स्वास्थ्यकर खाना खिलाया जा सकता है।

नतीजे चौंकाने वाले थे। स्वस्थ खाना खाने, खाने की बर्बादी कम करने (food waste reduction) और वहनीय उत्पादन के तरीकों (जैसे न्यूनतम जुताई) को अपनाकर 2050 तक वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में 20 प्रतिशत की कमी की जा सकती है। लेकिन, अगर हमने अपने आहार और तरीकों में कोई बदलाव नहीं किया, तो यह उत्सर्जन 33 प्रतिशत तक बढ़ जाएगा। यदि नीतिगत बदलाव (policy interventions) करने से रेड मीट की मांग में कमी आती है, तो जंगलों की कटाई (deforestation) में कमी आएगी और चारागाह बनाने के लिए ज़मीन पर पड़ने वाला दबाव कम हो जाएगा।

सरकारों को ढांचे में बदलाव करने की ज़रूरत है – रेड मीट का उत्पादन (meat production) लगभग 33 प्रतिशत कम करना होगा, जबकि फल, सब्ज़ियों और गिरियों का उत्पादन (plant based food production) लगभग 60 प्रतिशत बढ़ाना होगा। ये बदलाव कई तरह की नीतियों के ज़रिए किए जा सकते हैं: वनस्पति-आधारित खेती के लिए सब्सिडी और इंसेंटिव देकर; ज़्यादा उत्सर्जन वाले मीट उत्पादन पर टैक्स या सीमा लगाकर; अलग-अलग फसलों के लिए आपूर्ति शृंखला में निवेश करके; तथा स्वास्थ्यप्रद व निर्वहनीय भोजन को प्राथमिकता देने वाले मानक बनाकर।

लेकिन यह बदलाव सस्ता नहीं होगा, इसके लिए हर साल लगभग 500 अरब डॉलर का खर्च आएगा। हालांकि इसका कुल फायदा (5-10 खरब डॉलर) (economic benefits) लागत से कहीं ज़्यादा है। यह स्वस्थ भोजन, कम जलवायु क्षति और कम पर्यावरणीय हानि की वजह से स्वास्थ्य सेवाओं पर होने वाले खर्च में बचत करेगा।

यहां एक बात ध्यान में रखने की है कि दुनिया बाज़ार के प्रभाव (market influence) में है। इसलिए लोगों को सिर्फ यह बताना पर्याप्त नहीं होगा कि वे क्या खाएं; नीतिगत स्तर पर स्वस्थ खाने के स्पष्ट दिशानिर्देश (dietary guidelines) तय करने होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बिन पीए नशा

राब पीए बिना नशे जैसे लक्षण दिखने लगें – लड़खड़ाना, अस्पष्ट बोलना, चक्कर आना, भ्रम, एकाग्रता में कमी, थकान, सिरदर्द, मतली, पेट फूलना, त्वचा का लाल होना, और बदमिज़ाजी –  तो समझ लीजिए वह व्यक्ति एक तकलीफ से पीड़ित है जिसे तकनीकी भाषा में ऑटो-ब्रुअरी सिंड्रोम (एबीएस – Auto Brewery Syndrome) कहते हैं। वैसे तो चिकित्सा साहित्य (medical literature) में ऐसे व्यक्तियों के उल्लेख बहुत कम मिलते हैं लेकिन कई चिकित्सकों का मानना है कि यह सिंड्रोम काफी आम है। तो बगैर एक घूंट भी हलक में उतारे यह नशा होता क्यों है?

इस समस्या पर अनुसंधान उन्नीसवीं सदी में ही शुरू हो गया था और आम मान्यता यह बनी थी कि इसकी वजह व्यक्ति के पेट में खमीर (फफूंद- yeast overgrowth) की अधिकता होती है। जैसा कि सभी जानते हैं हमारी आंतों में फफूंद, बैक्टीरिया के साथ-साथ कई सूक्ष्मजीव निवास करते हैं और प्राय: मददगार होते हैं। यदा-कदा ये हमें बीमार भी करते हैं। तो एबीएस का प्रमुख कारण खमीर (एक किस्म की फफूंद) को माना गया था और यह मत बना था कि जब ये खमीर अत्यधिक मात्रा में आंतों में पलते हैं तो व्यक्ति जो भी शर्करा या अन्य कार्बोहायड्रेट (carbohydrate fermentation) खाता है, उसका किण्वन करके ये अल्कोहल (एथेनॉल) पैदा करते हैं। और अल्कोहल से नशा हो जाता है।

अलबत्ता, हाल ही में नेचर माइक्रोबायोलॉजी जर्नल (Nature Microbiology) में प्रकाशित शोध पत्र ने एबीएस पर नई रोशनी डाली है। एबीएस पीड़ितों के बड़े समूह का अध्ययन करके शोधकर्ताओं का निष्कर्ष है कि इस तकलीफ का कारण खमीर नहीं बल्कि आंतों में पलने वाले बैक्टीरिया का असंतुलन (gut bacteria imbalance) है। इससे पहले 2019 में बेजिंग स्थित कैपिटल इंस्टीट्यूट ऑफ पीडियाट्रिक्स (Capital Institute of Pediatrics) के जिंग युआन ने अपने सीमित अनुसंधान के आधार पर यह संभावना व्यक्त की थी। अब इसकी पुष्टि हुई है।

ताज़ा अध्ययन कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय (University of California San Diego) (सैन डिएगो) के बर्न्ड स्क्नेबल के नेतृत्व में किया गया है। दरअसल यह गड़बड़ी आम तौर पर मान्य नहीं की जाती, यहां तक कि चिकित्सक भी व्यक्ति पर यकीन नहीं कर पाते कि उसने वास्तव में शराब नहीं पी है। अंतत: कई परीक्षण करके जब इसकी पुष्टि हो जाती है, तो इलाज पूर्व धारणा के आधार पर ही किया जाता है जिसमें फफूंद-रोधी दवाइयां (antifungal drugs) दी जाती हैं। साथ में कुछ एंटीबायोटिक्स देते हैं और व्यक्ति को कम कार्बोहायड्रेट वाली खुराक लेने को कहा जाता है जो अल्कोहल-उत्पादक सूक्ष्मजीवों को बढ़ावा देते हैं। लेकिन ऐसे व्यक्तियों में लक्षण बार-बार प्रकट होते रहते हैं।

2019 में किए गए अध्ययन में एबीएस के उभरने के लिए एक बैक्टीरिया क्लेबसिएला न्यूमोनिए (Klebsiella pneumoniae) को ज़िम्मेदार पाया गया था। अध्ययन में एबीएस की स्थिति में फैटी लीवर रोग (fatty liver disease) को भी सहायक बताया गया था।

युआन की टीम ने गंभीर एबीएस से पीड़ित कुछ व्यक्तियों से प्राप्त क्लेबसिएला का प्रत्यारोपण चूहों में किया था। उन्होंने कुछ अन्य व्यक्तियों को भी पहचाना जिनमें क्लेबसिएला के आधिक्य ने एबीएस लक्षणों में उभार उत्पन्न किया।

2019 के अध्ययन के बाद युआन की टीम को काफी लोगों ने संपर्क करके एबीएस जांच करवाने की इच्छा जताई। इसके बाद उन्होंने एबीएस मरीज़ों का अध्ययन शुरू किया। इसके लिए उन्होंने स्क्नेबल की मदद ली।

स्क्नेबल ने ऐसे 22 मरीज़ों की रिपोर्ट प्रस्तुत की है। इनके साथ उन्होंने परिवार के सदस्यों को शामिल किया था ताकि वे इस संभावना को निरस्त कर सकें कि यह दिक्कत एक जैसे भोजन या पर्यावरणीय कारणों से हो रही है।

अपेक्षा के अनुरूप, एबीएस मरीज़ों की विष्ठा के कल्चर में अल्कोहल (alcohol production in gut) बना जबकि परिवार के अन्य लोगों की विष्ठा के कल्चर में नहीं। स्क्नेबल का कहना है कि स्वस्थ लोगों की आंतों में भी थोड़ा अल्कोहल बनाता है लेकिन शरीर उसे आसानी से पचा डालता है। एबीएस मरीज़ों में ऐसे एंज़ाइम्स की सांद्रता भी अधिक थी जिससे पता चलता है कि लीवर को क्षति हुई है। एक मरीज़ में तो लीवर सिरोसिस (liver cirrhosis) की स्थिति भी पाई गई।

अपने परिजनों की तुलना में एबीएस मरीज़ों में क्लेबसिएला कहीं अधिक मात्रा में था। उनकी आंतों में एशरीशिया कोली (. कोली) नामक बैक्टीरिया भी अधिक संख्या में थे, जो अल्कोहल पैदा करते हैं। हालांकि, अब तक इसे रोग का प्रमुख कारण नहीं माना गया था। यह भी देखा गया कि लक्षणों में उछाल के दौरान मरीज़ों की आंतों में ई. कोली बैक्टीरिया की संख्या अधिक थी और इनकी संख्या लगभग लक्षणों की गंभीरता को झलकाती थी।

शोधकर्ताओं को एबीएस मरीज़ों तथा अन्य लोगों के बीच खमीर या अन्य फफूंद के स्तर में कोई खास अंतर नहीं मिला। स्क्नेबल के मुताबिक इसका कारण यह हो सकता है कि कुछ मरीज़ों को पहले ही फफूंद-रोधी उपचार मिल चुका था।

एक मरीज़ का सफल उपचार विष्ठा के सूक्ष्मजीव प्रत्यारोपण (फीकल माइक्रोबायोटा ट्रांसप्लांट, FMT) द्वारा किया गया। इसके लिए उसे एक स्वस्थ दानदाता की विष्ठा कैप्सूल (FMT capsule) में भरकर खिलाई गई थी। स्क्नेबल अब इस पर आगे काम कर रहे हैं और उनकी कोशिश है कि ज़्यादा लक्षित उपचार (targeted therapy) मिल सके।

अन्य शोधकर्ताओं का मत है कि फिलहाल यह मानना जल्दबाज़ी होगी कि हमें पूरा जवाब मिल गया है। आगे खोजबीन जारी रखने की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हिमालय में मिले प्राचीन समुद्री घटनाओं के प्रमाण

ऊंचाई पर स्थित तिब्बती पठार (Tibetan plateau) पर भूवैज्ञानिकों को लावा के अवशेष मुड़ी-तुड़ी, ऐंठी हुई खपच्चियों के रूप में मिले हैं। ये खपच्चियां ऐसे ज्वालामुखी के बड़े विस्फोटों (volcanic eruption) के अवशेष हैं जो समुद्र के पेंदे में करीब 20 करोड़ साल से भी पहले फूटे थे।

यह तो पता है कि ज्वालामुखियों के ऐसे महाविस्फोटों (जिनसे लाखों सालों तक लाखों घन किलोमीटर लावा निकलता रहता है) के कारण बड़े पैमाने पर सामूहिक जैव विलुप्तियां (mass extinction) हुईं हैं। ज़ाहिर है बड़े पैमाने पर निकले और दूर-दूर तक फैले लावा ने जीवों के आसपास के पर्यावरण को बदला होगा, कई जीव इसका सामना नहीं कर पाए होंगे और खत्म हो गए होंगे।

महाविस्फोट से निकले और दूर तक बिछे लावा से बने क्षेत्र को विशाल आग्नेय प्रांत (Large Igneous Province) कहा जाता है। इन्हें भूमि पर पहचानना आसान होता है क्योंकि इनसे निकले लावा के पठार (lava plateau) सदियों तक टिके रहते हैं। लेकिन समुद्र में हुए महाविस्फोट से बने आग्नेय प्रांत पहचानना मुश्किल होता है क्योंकि समुद्र में भूपर्पटी (oceanic crust) अपेक्षाकृत तेज़ी से मेंटल में तब्दील होती जाती है। नतीजतन अधिकतर समुद्री महाविस्फोटों के प्रमाण मिट जाते हैं। हालिया अध्ययन में, वैज्ञानिकों ने ज़मीन के बीच स्थित भूमि में लगभग मिट चुके दो समुद्री महाविस्फोटों (submarine volcanic eruptions) के सबूतों की पहचान की है। जियोलॉजी (Geology journal) में प्रकाशित यह अध्ययन बताता है कि समुद्र में हुए इन महाविस्फोटों ने जीवन के इतिहास को एक से ज़्यादा बार आकार दिया है।

हाल ही में पहचाने गए इन महाविस्फोटों की कहानी लगभग 25 करोड़ साल पहले शुरू होती है, जब पैंजिया सुपर-महाद्वीप (Pangaea supercontinent) लगभग बन चुका था। चीज़ें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। हालांकि टेथिस महासागर के पेंदे की ज़्यादातर भूपर्पटी मेंटल में समा गई, लेकिन पेंदे के कुछ अवशेष उन चट्टानों में बचे/फंसे रह गए, जो आगे चलकर हिमालय बनीं (Himalaya formation)।

वैसे, हिमालय में टेथिस महासगर (Tethys Ocean) के कई स्रोतों के अवशेष हो सकते हैं, जैसे प्राचीन समुद्री पहाड़ों के या द्वीपों के, या बड़े आग्नेय प्रांत के। इन अवशेषों को पहचानने के लिए जिलिन युनिवर्सिटी के भूवैज्ञानिक जियान-जुन फैन और कर्टिन युनिवर्सिटी के भूविज्ञानी साइमन वाइल्ड की टीम ने मध्य तिब्बत में चट्टानों के बाहर झांकते आउटक्रॉप्स (rock outcrops) का विश्लेषण किया जो टेथिस महासागर के अवशेष होने की संभावना रखते थे। इन चट्टानों में समुद्री तलछट भी थी जो ठंडे लावा से बनी आग्नेय बेसाल्ट चट्टानों के ऊपर जमा हो गई थी।

कुछ चट्टानों में मिले संकेतों से पता चला कि वे ऐसे महाविस्फोट के अवशेष हैं जिनके बारे में पहले पता नहीं था। रेडियोमेट्रिक काल-निर्धारण (radiometric dating) से पता चला कि वे लगभग एक ही समय में बने थे, जिससे पता चलता है कि वे एक ही घटना से बने थे। समस्थानिक विश्लेषण (isotopic analysis) से पता चलता है कि बेसाल्ट चट्टानों को बनाने वाला मैग्मा गर्म मेंटल प्रवाह (mantle plume) से निकला था।

शोधकर्ताओं का कहना है कि ये चट्टानें दो ज्वालामुखी विस्फोट (volcanic events) के बारे में बताती हैं, जिनके बारे में पहले पता नहीं था। एक विस्फोट लगभग 23.2 करोड़ साल पहले हुआ था, दूसरा विस्फोट लगभग 21 करोड़ साल पहले। अन्य क्षेत्रों के भूवैज्ञानिक अध्ययनों के आधार पर शोधकर्ताओं को लगता है कि लगभग 24.9 करोड़ साल पहले प्राक्-प्रशांत महासागर में तीसरा बड़ा विस्फोट हुआ था।

इन विस्फोटों ने समुद्र के भीतर के जीवन पर कहर बरपाया होगा। पिघली हुई चट्टान के आने से पोषक तत्वों की अधिकता ने शैवाल और अन्य सूक्ष्मजीव जीवन को बढ़ावा दिया होगा, पानी में ऑक्सीजन कम हो गई होगी और बड़े पैमाने पर मौतें हुई होंगी। इन विस्फोटों ने कार्बन डाईऑक्साइड को वायुमंडल में भी छोड़ा होगा, जिससे अनियंत्रित जलवायु परिवर्तन (climate change) हुआ होगा।

अन्य भूवैज्ञानिक और जीवाश्म रिकॉर्ड खंगालने पर शोधकर्ताओं ने प्रत्येक विस्फोट को महासागरों में ऑक्सीजन की कमी (ocean anoxia) और समुद्री जीवन की विलुप्ति से जुड़ा पाया। समयावधि का अनुमान लगाएं, तो लगता है कि पिछले 50 करोड़ सालों में महाविस्फोटों से 160 विलुप्ति की घटनाएं हुई होंगी। हालांकि यह मात्र अनुमान है। विस्फोटों ने वास्तव में कितना लावा उगला होगा, इसका सटीक अनुमान लगाने के लिए और अधिक काम करने की ज़रूरत है, तभी वास्तविक पैमाने का पता चल सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बास्केट बॉल: गेंद बास्केट से लौट क्यों आती है?

छिछोरे फिल्म का एक रोमांचक दृश्य सबको याद होगा। जीत-हार को तय करने वाले क्षण में हीरो गेंद को बास्केट में डालने का प्रयास करता है, गेंद बास्केट के किनारे को छूती है, पिछले हिस्से से टकराती है, अगली रिम को छूती है और टकराकर वापिस लौट आती है। यह घटना बास्केट बॉल के खेल (basketball physics) में तो होती ही है, गोल्फ (golf ball dynamics) के मैदान में भी अक्सर देखी जाती है। गोल्फ में कई बार गेंद छेद के रिम पर चक्कर लगाकर लौट आती है। यहां तक कि कई बार तो गेंद रिम के नीचे भी चली जाती है लेकिन वहां से अंदर जाने की बजाय ऊपर निकल जाती है। गोल्फ में इसे ‘लिप आउट’ कहते हैं। खिलाड़ियों के साथ-साथ लिप आउट भौतिक शास्त्रियों (physics problem) के लिए भी एक पहेली रहा है।

अब लगता है कि भौतिकविदों ने इस गुत्थी को सुलझा लिया है। रॉयल सोसायटी ओपन साइंस (Royal Society Open Science) में ब्रिस्टल विश्वविद्यालय (University of Bristol) के जॉन होगन और सेचेनी इस्तवान विश्वविद्यालय के मेट अन्ताली द्वारा प्रकाशित एक शोध पत्र में इस पर रोशनी डाली गई है। उन्होंने देखा कि लिप आउट कई कारणों से हो सकता है। ऐसी एक करामात को बैलिस्टिक लिप आउट (ballistic lip out) कहते हैं। गेंद छेद के केंद्र की ओर जाती है, लेकिन उसकी रफ्तार इतनी अधिक होती है कि वह छेद के सामने वाली सतह से टकराती है और उछलकर बाहर आ जाती है। इसी प्रकार छेद की रिम से होने वाली लिप आउट में गेंद छेद पर तिरछी दिशा में पहुंचती है, रिम का चक्कर काटती है और अंदर जाने की बजाय बाहर छिटक जाती है।

लेकिन सबसे नाटकीय स्थिति छेद से होने वाला लिप आउट होती है। इसमें होता यह है कि रिम का चक्कर काटते हुए गेंद छेद में गिरने तो लगती है लेकिन फिर गुरुत्वाकर्षण को मात देते हुए वापिस ऊपर चढ़कर बाहर निकल जाती है।

बैलिस्टिक और रिम लिप आउट (rim lip out)  तो समझ में आते हैं और ये सीधी-सादी उछाल (bounce mechanics) की वजह से होते हैं लेकिन गिरते-गिरते आधे रास्ते से लौट आना समझना मुश्किल रहा है।

इस पूरे मामले को न्यूटन द्वारा प्रतिपादित यांत्रिकी के नियमों (Newtonian mechanics) से समझने के प्रयास होते रहे हैं। लेकिन यथार्थ में इन नियमों को लागू करना गणित के लिहाज़ से काफी मुश्किल हो जाता है क्योंकि यहां गति के तीन अलग-अलग अक्ष पर ध्यान देना होता है। पहला है जिसमें मैदान क्षैतिज है और आसमान ऊपर की दिशा में। दूसरा है लुढ़कती गेंद के घूर्णन का अक्ष और तीसरा है मैदान या छेद और गेंद का संपर्क बिंदु।

विश्लेषण के लिहाज़ से ये सारी गतियां थोड़ी दिक्कत तो पैदा करती हैं लेकिन जब गेंद सपाट मैदान पर लुढ़क रही हो तो इन्हें संभाला जा सकता है। होगन के मुताबिक दिक्कतें तब उभरती हैं जब गेंद रिम से छेद की ओर बढ़ती है। उनके अनुसार इस पड़ाव पर गेंद की दो गतियां एक साथ चलती हैं – गेंद का लुढ़कना और गेंद का घूमना। इस पड़ाव पर गुरुत्व बल इन दोनों गतियों के अक्ष के लंबवत नहीं लगता है। इसकी बजाय गुरुत्व बल गेंद को उस सतह (यानी छेद की दीवार) से सटाकर खींचता है जिस पर वह लुढ़क रही है। इसलिए सपाट मैदान पर गेंद के लुढ़कने और छेद की अंदरुनी दीवार पर उसके लुढ़कने को अलग-अलग ढंग से समझने के प्रयास किए गए हैं। और इन दोनों की अंतर्क्रिया (force interaction) को समझना गणित के लिहाज़ से खासा मुश्किल हो जाता है।

लिहाज़ा होगन और अन्ताली ने इस समस्या पर बिलकुल अलग ढंग से विचार किया है। उन्होंने विश्लेषण के लिए दो अक्षों (axis of motion) को ध्यान में लिया – एक वह जो गेंद के लुढ़कने की दिशा से निर्धारित होता है और दूसरा वह जो सतह से संपर्क और उसके केंद्र बिंदु को जोड़ने वाली रेखा से। होगन के मुताबिक जब गेंद छेद में जाती है तो ये अक्ष उसके साथ ही चलते हैं।

इस विश्लेषण के द्वारा रिम और छेद से लिप आउट की घटनाओं की व्याख्या एक जैसे परिवर्तियों की मदद से की जा सकी। देखें कैसे।

जब गेंद छेद में गिरती है और दीवार पर लुढ़कती है तो वह अपने केंद्र और दीवार से संपर्क बिंदु को जोड़ने वाली अक्ष पर थोड़ा घूर्णन करने लगती है। लगभग इसी समय जड़त्व (inertia)  का प्रभाव भी हावी हो जाता है। यदि इस समय तक गेंद छेद के पेंदे में न पहुंच गई हो, तो वह घूर्णन धीमा पड़ जाता है और गेंद दीवार पर चढ़ने लगती है।

यह कहना थोड़ा कठिन होता है कि गेंद वास्तव में छेद से बाहर निकल आएगी या नहीं। दरअसल, पूर्व शोध बताते हैं कि किसी भी शॉट का परिणाम छोटी-छोटी उथल-पुथल से निर्धारित होता है। छेद में गिरना और वापिस निकल आना, इन दोनों की संभावना बराबर होती है। और किसी छोटी सी गड़बड़ (जैसे रेत का एक कण) से गेंद इनमें से कोई भी रास्ता अपना सकती है।

सवाल यह है कि क्या इस विश्लेषण से गोल्फ या बास्केट बॉल के खिलाड़ियों (sports players) को कोई मदद मिलेगी? शोधकर्ताओं का कहना है कि शायद नहीं क्योंकि अंतिम बिंदु पर बलों का संतुलन (force balance) इतनी सूक्ष्मता से होता है कि शॉट मारते वक्त नियंत्रण नामुमकिन नहीं, तो बहुत मुश्किल अवश्य है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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उड़ान के लिए तैयार आर्टेमिस-2

डॉ. इरफान ह्यूमन

नासा का स्पेस लॉन्च सिस्टम (एसएलएस-SLS) रॉकेट और ओरायन अंतरिक्ष यान 17 जनवरी, 2026 को आर्टेमिस-2 मिशन (Artemis 2 mission) के लिए लॉन्च पैड पर पहुंच गया है। हालांकि, इस मिशन के लॉन्च की तारीख अभी भी अनिश्चित है। यह रोलआउट आर्टेमिस-2 की अंतिम तैयारी का शुरुआती चरण है। यह पहला क्रूड एसएलएस/ओरायन मिशन है और दिसंबर 1972 के बाद पहली बार मनुष्य को पृथ्वी की निचली कक्षा (लो अर्थ ऑर्बिट – Low earth orbit) से आगे ले जाने वाली अंतरिक्ष उड़ान बनने को तैयार है। चार अंतरिक्ष यात्री, रीड वाइसमैन, विक्टर ग्लोवर, क्रिस्टीना कोच और जेरेमी हैंसेन, इस दस दिवसीय मिशन पर चंद्रमा के चारों ओर घूमेंगे।

पहले होंगे पूर्वाभ्यास

लॉन्च पैड पर पहुंचने के बाद, यात्री वाहन की तकनीकी जांच और परीक्षण किए जा रहे हैं, जिसमें रेडियो-फ्रीक्वेंसी इंटरफरेंस टेस्ट (radio frequency interference test) शामिल हैं, जो वीएबी के अंदर नहीं किए जा सकते। वीएबी यानी व्हीकल असेंबली बिल्डिंग (Vehicle Assembly Building) नासा का वह विशाल भवन है जहां रॉकेट और अंतरिक्ष यान असेंबल किए जाते हैं। आर्टेमिस-2 के अंतरिक्ष यात्री पैड पर इमरजेंसी एस्केप प्रक्रियाओं का पूर्वाभ्यास भी करेंगे। इसमें सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण होगा वेट ड्रेस रिहर्सल, जिसमें एसएलएस को लिक्विड ऑक्सीजन और लिक्विड हाइड्रोजन जैसे ईंधन से भरा जाएगा और एक प्रैक्टिस उल्टी गिनती की जाएगी, जो टी-माइनस 29 सेकंड पर रुक जाएगा। रिहर्सल में सब कुछ असली प्रक्षेपण जैसा ही होगा, लेकिन उड़ान नहीं होगी।

नासा ने 2022 में आर्टेमिस-1 (Artemis 1) के लॉन्च से पहले तीन वेट ड्रेस रिहर्सल (wet dress rehearsal) किए थे और हाइड्रोजन लीक (hydrogen leak) जैसी समस्याओं के कारण दो लॉन्च प्रयास रद्द कर दिए थे। आर्टेमिस-1 से मिले सबक आर्टेमिस-2 की सफलता की संभावना बढ़ाएंगे।

प्रक्षेपण तिथि

वेट ड्रेस रिहर्सल लॉन्च की तारीख तय करने में मुख्य कारक होगी। हालांकि नासा 6 से 11 फरवरी को लक्ष्य बना रहा है, लेकिन एजेंसी ने औपचारिक प्रक्षेपण तारीख घोषित नहीं की है। अगर प्रक्षेपण 11 फरवरी तक नहीं हुआ, तो अगला मौका मार्च की शुरुआत में ही बनेगा।

जटिल कारक

प्रक्षेपण में एक रोड़ा है नासा का क्रू-12 लॉन्च (Crew-12 mission), जो फिलहाल 15 फरवरी से पहले नहीं होगा। क्रू-11 की 15 जनवरी को स्टेशन से जल्द वापसी ने एजेंसी को तैयारी तेज़ करने को प्रेरित किया।

हालांकि नासा प्रशासक जेरेड इसाकमैन का कहना है कि आर्टेमिस-2 और क्रू-12 स्वतंत्र अभियान हैं, लेकिन अधिकारियों ने संभावित टकराव स्वीकार किया है। दोनों के ट्रैकिंग एंड डैटा रिले सैटेलाइट नेटवर्क (Tracking and Data Relay Satellite System – TDRSS) तक पहुंच और लॉन्च साइट्स के संसाधन साझा हैं। दोनों को एक साथ लॉन्च करना समझदारी नहीं है। लेकिन नासा दोनों की तैयारी जारी रखेगा। जिसमें भी कोई समस्या आएगी वो टलेगा या प्रक्षेपण के लिए दोनों में से एक को चुनना पड़ेगा।

आर्टेमिस-1 से एक बदलाव यह है कि नासा ने मोबाइल प्रक्षेपण प्लेटफॉर्म (mobile launch platform)  पर कामकाजी प्लेटफॉर्म जोड़े हैं ताकि सिस्टम हार्डवेयर का पुन:परीक्षण पैड पर ही हो सके। अर्थात यदि पहला प्रक्षेपण सफल नहीं होता, तो यान को वीएबी में वापस रोल न करना पड़े, यह अगले प्रक्षेपण तक वहीं बना रहे।

अधिकारी यह भी कहते हैं कि वे बाहरी दबावों से सतर्क हैं जो ‘लॉन्च फीवर’ पैदा कर सकते हैं, जिसमें जनता और राजनीतिक स्वार्थ और दबाव शामिल हैं। कार्यकारी सहायक प्रशासक लकीशा हॉकिंस ने बताया कि राजनीतिक दबाव उनके मन में मिशन के प्रति रुचि और उत्साह का एक स्रोत है। दूसरी ओर, एजेंसी का ध्यान इस बात पर है कि प्रक्षेपण क्रू के लिए सही और सुरक्षित रहे।

आर्टेमिस-2 के उपकरण

आर्टेमिस-2 में कई वैज्ञानिक उपकरण और प्रयोग शामिल हैं जो अंतरिक्ष पर्यावरण, विकिरण, और मानव स्वास्थ्य (space radiation, human health in space) पर प्रभाव का अध्ययन करेंगे। चूंकि अंतरिक्ष यान में जगह सीमित है, इसलिए इसमें बड़े वैज्ञानिक उपकरण नहीं हैं, बल्कि रेडिएशन सेंसर, ऑर्गन-ऑन-ए-चिप और ऑप्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम जैसे कॉम्पैक्ट डिवाइस हैं। कुछ मुख्य उपकरणों की चर्चा यहां की जा रही है।

विकिरण मॉनिटरिंग उपकरण

अंतरिक्ष में विकिरण (space radiation exposure) एक बड़ी चुनौती है, इसलिए आर्टेमिस-2 में कई सेंसर लगाए गए हैं जो विकिरण स्तर को मापेंगे। ये उपकरण अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने और भविष्य के मिशनों के लिए डैटा इकट्ठा करने में मदद करेंगे।

1. हाइब्रिड इलेक्ट्रॉनिक रेडिएशन असेसर्स (एचईआरए-HERA): ओरायन कैप्सूल के अंदर विभिन्न स्थानों पर छह सक्रिय विकिरण सेंसर लगाए गए हैं। ये सूर्य से उत्पन्न अंतरिक्ष मौसमी घटनाओं (जैसे सोलर फ्लेयर्स) से उत्पन्न खतरनाक विकिरण का पता लगाते हैं और चेतावनी देते हैं। अगर विकिरण अधिक हो, तो मिशन कंट्रोल अंतरिक्ष यात्रियों को शेल्टर बनाने की सलाह दे सकता है। यह आर्टेमिस-1 से सीखे गए सबकों पर आधारित है।

2. क्रू एक्टिव डोसिमीटर (crew dosimeter): प्रत्येक अंतरिक्ष यात्री को एक छोटा-सा डिवाइस दिया जाएगा, जिसे वे अपनी जेब में रखेंगे। यह व्यक्तिगत विकिरण एक्सपोज़र को मापता है। आर्टेमिस-1 में मैनेक्विन पर इसका उपयोग किया गया था, लेकिन अब पहली बार क्रू के साथ लो अर्थ ऑर्बिट से बाहर इस्तेमाल होगा।

3. एम-42 ईएक्सटी (M-42 EXT): जर्मन स्पेस एजेंसी (डीएलआर) के साथ साझेदारी में विकसित, यह एक अपडेटेड विकिरण सेंसर है जो ओरायन में लगाया जाएगा। यह आर्टेमिस-1 के एम-42 का उन्नत संस्करण है और विकिरण के प्रभाव को और बेहतर तरीके से माप सकेगा।

4. आर्चर प्रणाली (ARCHER system): आर्चर एक व्यापक प्रणाली है जो विकिरण स्तर को मॉनिटर करती है और क्रू की स्वास्थ्य स्थिति पर इसके प्रभाव का अध्ययन करती है। यह आंतरिक और बाहरी विकिरण को ट्रैक करेगी।

ऑर्गनऑनचिप

एवेटार (ए वर्चुअल एस्ट्रोनॉट टिशू एनालॉग रेस्पॉन्स) एक क्रांतिकारी प्रयोग है जिसमें यूएसबी ड्राइव जितने छोटे ‘ऑर्गन-ऑन-ए-चिप’ उपकरण का उपयोग किया जाएगा। ये उपकरण मानव ऊतकों की नकल करते हैं और विकिरण तथा माइक्रोग्रैविटी (microgravity) के प्रभाव का अध्ययन करेंगे। मसलन, ये गुर्दे या फेफड़ों पर बढ़ते विकिरण का असर देखेंगे। यह पहली बार है जब ऐसी तकनीक वैन एलन बेल्ट (Van Allen belts) से बाहर इस्तेमाल होगी। अंतरिक्ष यात्री इन उपकरणों से रीयल-टाइम डैटा इकट्ठा करेंगे, जो अलगाव और सीमित स्थान के प्रभाव को भी मापेंगे।

ऑप्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम

ओरायन आर्टेमिस-2 ऑप्टिकल कम्युनिकेशन सिस्टम (optical communication system – ओ2ओ) एक लेज़र-आधारित संचार प्रणाली (laser communication) है जो पृथ्वी से उच्च गति डैटा ट्रांसफर करेगी। इसमें एक 4-इंची टेलीस्कोप, दो गिंबल्स, मॉडेम और कंट्रोल इलेक्ट्रॉनिक्स शामिल हैं। यह पारंपरिक रेडियो संचार से तेज़ है और भविष्य के मिशनों के लिए महत्वपूर्ण होगा।

कैमरा और इमेजिंग उपकरण

हाई-एंड हैसलब्लाड और निकॉन डिजिटल कैमरे (Hasselblad camera, Nikon space camera) चंद्रमा की उच्च-रिज़ॉल्यूशन तस्वीरें लेंगे, जो पहले के मिशनों से बेहतर होंगी।

जैविक प्रयोग

आर्टेमिस-2 में कुछ जैविक नमूने ले जाए जा सकते हैं। खमीर, हरी शैवाल, कवक और बीजों पर विकिरण के प्रभाव का अध्ययन किया जाएगा। ये प्रयोग डीएनए पर अंतरिक्ष यात्रा के असर को समझने (DNA damage in space) में मदद करेंगे।

अंतरिक्ष यात्री विशेष कागज़ पर लार एकत्र करेंगे, क्योंकि रेफ्रिजरेशन उपलब्ध नहीं होगा। यह स्वास्थ्य और तनाव से जुड़े बायोमार्कर्स (biomarkers) का अध्ययन करेगा। साथ ही, नींद, तनाव और अलगाव के प्रभाव के अध्ययन लिए शारीरिक और व्यवहारगत डैटा भी इकट्ठा किया जाएगा। ये उपकरण मंगल जैसे लंबे मिशनों के लिए महत्वपूर्ण डैटा देंगे।

आर्टेमिस-2 दशकों बाद पहला ऐसा मिशन है जहां इंसान चंद्रमा के करीब (human return to the Moon) पहुंचेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कमल के फूलों में छिपा प्राकृतिक हीटर

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

र्मोजेनेसिस (thermogenesis) यानी जीवों में अपने शरीर में ऊष्मा/गर्मी पैदा करने की प्रणाली। हालांकि हम आम तौर पर सिर्फ पक्षियों और स्तनधारियों को ही गर्म खून (endotherm) वाला मानते हैं, लेकिन सभी जटिल जीव कुछ गर्मी तो पैदा करते ही हैं। कोशिकाओं में मौजूद छोटे पॉवर प्लांट, जिन्हें माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria) कहते हैं, भोजन को एक जैविक ईंधन, एडेनोसिन ट्राइफॉस्फेट (ATP) में बदलते हैं। लेकिन, भोजन की ऊर्जा का सिर्फ एक-चौथाई हिस्सा ही वास्तव में ATP बनता है; बाकी हिस्सा ऊष्मा के रूप में शरीर से बाहर निकल जाता है।

कभी-कभी, माइटोकॉन्ड्रिया शर्करा में मौजूद सारी ऊर्जा को ऊष्मा में बदल सकते हैं। पौधों में भी एक एंज़ाइम यही काम कर सकता है जिसका नाम है आल्टरनेटिव ऑक्सीडेज़ (alternative oxidase)। अलबत्ता, चंद पौधे ही विशिष्ट कामों के लिए गर्मी पैदा करते हैं (plant thermogenesis)।

कमल का पौधा (Nelumbo nucifera) उत्तरी और मध्य भारत मूल का है। और यह तालाबों, झीलों और धीमे बहाव वाले जलाशयों में उगता है। गर्मियों की शुरुआत में, कम तापमान पर फूल खिलना शुरू होते हैं। इसके सुंदर फूल तीन से चार दिनों तक खिले रहते हैं। इस अवधि में फूल का अंदरूनी तापमान लगभग 30-35 डिग्री सेल्सियस रहता है, जबकि आसपास का तापमान 10 डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है (flower temperature regulation)।

कमल में ऊष्माजनन तब शुरू होता है जब कली की सभी पंखुड़ियों के सिरे गुलाबी हो जाते हैं। इसकी अगली अलसुबह, खिलता हुआ फूल गर्मी छोड़ता है, जो फूल को एक आकर्षक खुशबू छोड़ने (pollination mechanism) में भी मदद करता है। कमल के फूल के केंद्र में शंकु आकार का एक समतल पुष्पासन होता है जिसके ऊपरी सपाट हिस्से पर 10-30 मादा जननांग होते हैं। अन्य ऊष्माजनक पौधों की तरह, कमल में भी मादा अंग पहले परिपक्व होते हैं। खुशबू परागणकर्ता़ कीटों – मधुमक्खियों और भृंगों – को स्त्रीकेसर की ओर आकर्षित (pollinator attraction) करती है। दोपहर तक पंखुड़ियां बंद हो जाती हैं, जिससे एक आरामदायक, इंसुलेटेड कक्ष बन जाता है जिसमें रात बिताने के लिए कीट शरण लेते हैं।

अगले दिन सुबह फूल खिलने से पहले, फूल के नर जननांग (पुंकेसर) परिपक्व हो जाते हैं। और पराग से लदे परागपोषी कीट फूल से उड़ जाते हैं और दूसरे महकते फूलों पर चले जाते हैं। यह प्रणाली पर-परागण (cross pollination) सुनिश्चित करने के लिए डिज़ाइन हुई है। पर-परागण से संतति को कई फायदे मिलते हैं। जैसे, अधिक जेनेटिक विविधता (genetic diversity) और कीट प्रतिरोधक क्षमता। प्रत्येक स्त्रीकेसर एक-एक बीज में तब्दील हो जाता है और पुष्पासन फव्वारे जैसे आकार की फली में परिपक्व हो जाता है।

स्त्रीकेसर जिस हिस्से पर होते हैं, वह हिस्सा फूल के बाकी हिस्सों की तुलना में लगभग 4 से 5 डिग्री सेल्सियस अधिक गर्म हो जाता है। वर्ष 2025 में प्लांट फिजियॉलॉज़ी (Plant Physiology journal) में प्रकाशित नतीजों के मुताबिक कैल्शियम आयन गर्मी बढ़ाने के ‘ऑन’ स्विच का काम करते हैं। जब गर्म होने का समय होता है, तो इस हिस्से की कोशिकाओं में कैल्शियम का स्तर चार गुना बढ़ जाता है। कैल्शियम माइटोकॉन्ड्रिया में जाता है और उन्हें तेज़ी से काम करने के संकेत देता है। ऊष्मा पैदा करने के लिए, बड़ी मात्रा में जमा स्टार्च और वसा का उपयोग किया जाता है (energy metabolism in plants)।

एरम कुल के कुछ पौधे कीटों को आकर्षित करने के लिए और अन्य विचित्र कामों के लिए भी ऊष्माजनन का इस्तेमाल करते हैं (thermogenic plants)। ईस्टर्न स्कंक कैबेज (eastern skunk cabbage) नामक पौधा उत्तरी अमेरिका के ठंडे इलाकों में उगता है। हालांकि इसका पत्तागोभी (कैबेज) से कोई सम्बंध नहीं है, लेकिन इसका नाम पत्तागोभी जैसी गंध के कारण पड़ा है, जो थोड़ी सरसों जैसी भी होती है। इस पौधे का फूल वाला तना वसंत के आरंभ में ऊष्मा पैदा करके मिट्टी पर जमी बर्फ को पिघलाकर बाहर निकलता है (snow melting plant)। भृंगों को इस फूल में मकरंद के साथ-साथ गर्म जगह मिलती है। यहां तक कि मकड़ियां भी कीटों की आवाजाही देखते हुए फूल के नज़दीक ही अपने जाले बुनती हैं।

सार्डीनिया में पाए जाने वाले डेड हॉर्स एरम लिली (dead horse arum lily) के फूलों से सड़ांध की गंध आती है। यह पौधा गर्मी का इस्तेमाल डाईमिथाइल डाईसल्फाइड (dimethyl disulfide) जैसे यौगिकों को तेज़ी से प्रसारित करने के लिए करता है, जिसकी गंध गैस सिलेंडर से रिसती गैस और थोड़ी लहसुन जैसी होती है। सड़ा हुआ मांस ढूंढने वाली मक्खियों को यह गंध बहुत पसंद आती है और वे बड़ी संख्या में इसके पास आ जाती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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कीटनाशकों का उपयोग मछलियों की उम्र घटा रहा है

साइंस पत्रिका (Science journal) में प्रकाशित हालिया शोध पत्र से पता चला है कि फसलों में इस्तेमाल होने वाला क्लोरपायरीफॉस नामक कीटनाशक (chlorpyrifos pesticide) मछलियों की कोशिकाओं को तेज़ी से बूढ़ा बना रहा है। इससे समय से पहले उनकी मृत्यु हो जाती है।

गौरतलब है कि क्लोरपायरीफॉस मनुष्यों, खासकर बच्चों, के तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। इस कारण युरोपियन यूनियन और यूएस के कई राज्यों में यह प्रतिबंधित (European Union ban)  है, जबकि कई देशों में इसका अब भी इस्तेमाल जारी है। आम तौर पर इसका उपयोग सेब, संतरा और गेहूं जैसी फसलों पर किया जाता है। बारिश के बाद यह रसायन बहकर नदियों और झीलों में पहुंच जाता है।

इसके दीर्घावधि असर को समझने के लिए वैज्ञानिक चुनशेंग लियू की टीम ने मीठे पानी की मछली (freshwater fish study) पर अध्ययन किया। चार वर्षों तक उन्होंने चीन के हुबेई प्रांत की तीन बड़ी झीलों से 24 हज़ार से अधिक मछलियां इकट्ठा कीं। इनमें से दो झीलों में सालों से खेती से प्रदूषित पानी आ रहा था, जबकि एक झील अपेक्षाकृत साफ थी।

उन्होंने पाया कि प्रदूषित झीलों में बड़ी और उम्रदराज मछलियां की संख्या काफी कम थी। तीन साल से अधिक उम्र की मछलियों की संख्या लगभग 96 प्रतिशत तक घट चुकी थी। यह भी दिखा कि जिन वर्षों में मछलियों के शरीर में क्लोरपायरीफॉस की मात्रा अधिक थी, उन वर्षों में बूढ़ी मछलियां सबसे कम मिलीं (fish population decline)।

जांच करने पर वैज्ञानिकों को प्रदूषित झीलों की मछलियों की कोशिकाओं में भारी मात्रा में लिपोफुसिन (lipofuscin accumulation) नाम का अपशिष्ट मिला, जो आम तौर पर उम्र बढ़ाने का काम करता है। इससे भी अधिक चिंता की बात टेलोमेयर में आए बदलाव (telomere shortening) थे। टेलोमेयर डीएनए के सिरों पर मौजूद सुरक्षा कवच होते हैं, जो उम्र के साथ धीरे-धीरे छोटे होते जाते हैं। जिन मछलियों पर क्लोरपायरीफॉस का असर पड़ा था, उनके टेलोमेयर सामान्य से कहीं ज़्यादा छोटे पाए गए। इनके छोटे हो जाने का मतलब है बीमारी और जल्दी मौत का खतरा। इससे साफ संकेत मिला कि यह कीटनाशक मछलियों की कोशिकाओं को तेज़ी से बूढ़ा कर रहा है।

पुष्टि के लिए प्रयोगशाला में भी परीक्षण (laboratory experiment) किया गया। मछलियों को बहुत ही कम मात्रा में क्लोरपायरीफॉस दिया गया – उतना ही जितना झीलों के पानी में था। चार महीने बाद साफ पानी में रखी सभी मछलियां ज़िंदा रहीं, लेकिन जिन टैंकों में कीटनाशक था, वहां बूढ़ी मछलियों में से लगभग आधी मर गईं और उनके टेलोमेयर लगभग एक-तिहाई तक छोटे हो चुके थे।

अध्ययन से स्पष्ट है कि रासायनिक प्रदूषण (chemical pollution) न केवल ज़हरीला होता है बल्कि जीवों को जल्दी बूढ़ा भी करता है। हालांकि अभी इंसानों पर इसके सीधे असर (human health impact) को लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन वैज्ञानिक चेताते हैं कि ऐसी ही जैविक प्रक्रियाएं इंसानों में भी होती हैं।

यदि कीटनाशकों का इस्तेमाल ऐसे ही चलता रहा, तो रसायन चुपचाप पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem damage) को बदल देंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अवैध खनन से शोध कार्य को खतरा

पेरू स्थित अमेज़न जंगल (Amazon rainforest) के पंगुआना जैविक अनुसंधान केंद्र (Panguana Biological Research Station) ने अपने सभी फील्ड अध्ययन बंद कर दिए हैं। यह फैसला इलाके में सक्रिय अवैध सोना खनन करने वालों से मिल रही धमकियों के कारण सुरक्षा की दृष्टि से लिया गया। 1968 में स्थापित यह केंद्र पेरू का सबसे पुराना पर्यावरण शोध संस्थान है। यहां दुनिया भर के वैज्ञानिक वर्षावन, वन्यजीवों और जैव विविधता पर अध्ययन करते रहे हैं। यह केंद्र युयापिचिस नदी के किनारे बने 1600 हैक्टर के एक संरक्षित क्षेत्र (protected forest area) में स्थित है और अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए जाना जाता है।

हाल के महीनों में अवैध खनन वाले लोग संरक्षित क्षेत्र के बहुत करीब पहुंच गए हैं। इन लोगों ने कर्मचारियों को जान से मारने की धमकियां दीं और कई बार संरक्षण क्षेत्र में घुसने की कोशिश भी की है। कुछ मौकों पर हथियारबंद टकराव (armed conflict) और गोलियां चलने की घटनाएं हुईं, जिससे वैज्ञानिकों के लिए सुरक्षित रहकर काम करना असंभव हो गया है।

आम तौर पर इस शोध केंद्र में लगभग 30 वैज्ञानिक और सहायक कर्मचारी काम करते थे। पिछले कई वर्षों में यहां किए गए शोध से 300 से अधिक वैज्ञानिक प्रकाशन (scientific publications) सामने आए हैं, जिनमें कीटों, पौधों और वर्षावन की पारिस्थितिकी (rainforest ecology) पर महत्वपूर्ण काम शामिल है। लंबे समय से जुटाए गए आंकड़ों से यह समझने में मदद मिली है कि उष्णकटिबंधीय जंगल पर्यावरणीय बदलावों पर कैसे प्रतिक्रिया देते हैं।

पंगुआना शोध केंद्र में पेरू के चार जलवायु निगरानी टावरों में से एक मौजूद है। ये टावर लगातार धरती और वातावरण के बीच कार्बन, नमी और ऊर्जा के आदान-प्रदान (carbon flux monitoring) को मापते हैं। यह जानकारी जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए बेहद ज़रूरी होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार टावर बताता है कि एंडीज़ पर्वत (Andes mountains) कैसे अमेज़न के मौसम को प्रभावित करते हैं।

हालांकि टावर में लगे स्वचालित उपकरण दूर से अब भी डैटा (remote sensing data) इकट्ठा कर रहे हैं, लेकिन सुरक्षा कारणों से वैज्ञानिकों और वालंटियर्स को वहां जाने से मना कर दिया गया है। स्टेशन प्रबंधन को डर है कि पहले की गई शिकायतों के बदले में खनन करने वाले लोग इस टावर को नुकसान पहुंचा सकते हैं।

पेरू में अवैध खनन एक गंभीर और बढ़ती हुई समस्या बन चुका है। अमेज़न कंज़र्वेशन (Amazon Conservation) की 2025 की रिपोर्ट के अनुसार, 1980 के बाद से खनन गतिविधियों ने 225 से ज़्यादा नदियों और झीलों को नुकसान पहुंचाया, करीब 1.4 लाख हैक्टर जंगल नष्ट किए, और कई आदिवासी समुदायों (indigenous communities) को प्रभावित किया है। यह काम अक्सर उन दूर-दराज़ इलाकों में फैलता है, जहां सरकार की मौजूदगी बहुत कम होती है। स्थानीय अभियोजक भी मानते हैं कि कमज़ोर निगरानी और कार्रवाई की कमी के कारण अवैध खनन लगातार बढ़ रहा है। हाल ही में पुलिस और सेना ने कुछ मशीनें नष्ट कीं, लेकिन इलाके में तनाव अब भी बना हुआ है।

फिलहाल क्षेत्रीय प्रशासन ने सीमित गश्त (security patrols) का सुझाव दिया है, लेकिन वैज्ञानिकों को चिंता है कि अगर मज़बूत सुरक्षा नहीं मिली, तो अमेज़न का यह महत्वपूर्ण वैज्ञानिक केंद्र लंबे समय तक बंद ही रह सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नर ऑक्टोपस में संभोग के लिए विशेष भुजा

क्टोपस आठ भुजाओं वाला विचित्र जंतु है। मज़ेदार बात यह है कि नर अपने शुक्राणुओं को मादा के शरीर में पहुंचाने के लिए इन्हीं में से एक भुजा का उपयोग करते हैं। हेक्टोस्टायलस (hectocotylus) नामक इस भुजा में इस काम के लिए विशेष परिवर्तन हुए हैं। एक नए प्रीप्रिंट शोध पत्र में बताया गया है कि हेक्टोस्टायलस के चम्मचनुमा अग्र भाग पर रसायनग्राही (chemoreceptors) होते हैं, जो प्रमुख मादा हॉरमोन प्रोजेस्टरोन (progesterone hormone) को भांप सकते हैं।

हारवर्ड विश्वविद्यालय (Harvard University) के तंत्रिका जीव वैज्ञानिक पाब्लो विलार ने प्रयोगशाला में एक ऑक्टोपस (Octopus bimaculoides) को संभोग के लिए प्रेरित किया। ये जंतु बंदी अवस्था में काफी आक्रामक हो सकते हैं। इसलिए विलार ने नर व मादा ऑक्टोपस को एक्वेरियम के दो अलग-अलग कक्षों में रखा जिनके बीच एक अपारदर्शी दीवार थी और दीवार में छिद्र थे ताकि वे आपस में एक-दूसरे की भुजाओं को छूकर जान-पहचान कर सकें।

आश्चर्य कि बात थी एक-दूसरे को न देख पाने के बावजूद नर ने अपने हेक्टोस्टायलस को छिद्र के पार ले जाकर मादा से संभोग कर लिया। वैसे तो हेक्टोस्टायलस बाकी सात भुजाओं जैसा होता है लेकिन इसके आधार से लेकर सिरे तक एक खांचा होता है। जब यह अंग मादा के अंडाशय तक जाने वाले किसी मार्ग (डिंबवाहिनी) को पहचान लेता है तो वह ढेर सारे शुक्राणु (sperm transfer) उसमें छोड़ देता है। विलार ने चार जोड़ियों में ऐसा अंधा संभोग देखा।

तो विलार और उनके मार्गदर्शक निक बेलोनो (Nick Bellono) के मन में विचार आया कि क्या हेक्टोस्टायलस रसायनों की मदद से डिंबवाहिनी को भांपता है। बेलोनो और उनके साथी पहले ऑक्टोपस के चूषकों में ऐसे रसायन-ग्राही देख चुके थे। ये ग्राही किसी सतह उपस्थित विभिन्न अणुओं को भांप सकते हैं। सामान्य भुजाओं में ये ग्राही भोजन ढूंढने या हानिकारक सूक्ष्मजीवों को पहचानने में मददगार होते हैं। लेकिन हेक्टोस्टायलस में इन ग्राहियों का काम स्पष्ट नहीं था। अनुमान था कि इनका उपयोग संभोग में होता होगा।

इस विचार को परखने के लिए विलार ने बंदी ऑक्टोपसों के बीच की दीवार के छिद्रों पर छोटे-छोटे पात्रों में अलग-अलग रसायन भर दिए। देखा गया कि नर ऑक्टोपस ने अपने हेक्टोस्टायलस से उस छिद्र को ज़्यादा देर तक टटोला जिसके पात्र में मादा यौन हॉरमोन (female sex hormone)  थे।

पता चला कि हेक्टोस्टायलस पर रासायनिक ग्राहियों की संख्या (chemoreceptor density) अन्य भुजाओं से तीन गुना अधिक थी। यह भी पाया गया कि सामान्यत: सेफेलोपॉड जंतुओं (cephalopods) में हेक्टोस्टायलस में रसायन संवेदना काफी अधिक होती है। ऑक्टोपस की दो अन्य प्रजातियों तथा स्क्विड (squid species) में काटकर अलग किए गए हेक्टोस्टायलस को प्रोजेस्टरोन के संपर्क में रखने पर उसमें काफी हरकत होती रही।

यह सही है कि ऑक्टोपस का दिमाग बड़ा होता है लेकिन उसकी भुजाएं अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से करती हैं। सवाल है कि ऑक्टोपस का तंत्रिका तंत्र (nervous system) डिंबवाहिनी की खोज का नियमन कैसे करता है। एक संभावना है कि हेक्टोस्टायलस की तंत्रिकाएं प्रोजेस्टरोन के संकेत की तीव्रता (hormone signal strength) भांपते हुए आगे बढ़ने के निर्देश देती हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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