एआई ने सुझाए प्रचीन रोमन खेल के नियम-कायदे

प्रतिका गुप्ता

बात करीब सवा सौ साल पहले की है। दक्षिण-पूर्वी नीदरलैंड्स के शहर हीरलेन में खुदाई के दौरान एक चूना पत्थर मिला था, जो फ्रांस से आयातित था। इस पर उभरी लकीरों के पैटर्न देखकर तो ऐसा लगता था जैसे यह कोई बोर्ड गेम (ancient board game) हो। रोमन म्यूज़ियम की क्यूरेटर कैरन जेनेसन के शब्दों में “पत्थर को नफासत से तराशा गया था। इसे मेज़ पर रखकर खेला जाता होगा।” लेकिन लकीरों के पैटर्न किसी भी जाने-पहचाने रोमन खेल (Roman era game) जैसे नहीं थे।

तो यह गुत्थी अनसुलझी ही रही कि यह क्या खेल है, इसे कैसे खेलते होंगे, इसके नियम क्या होंगे, वगैरह-वगैरह। इस खेल-पत्थर के आसपास कांच, हड्डी और सिरेमिक की गोटियां भी मिली थीं, जिन्हें हेट रोमाइन्स म्यूज़ियम में सहेजा गया (archaeological discovery)।

 फिर, साल 2020 में लीडेन युनिवर्सिटी के प्राचीन बोर्ड गेम्स विशेषज्ञ वाल्टर क्रिस्ट तकरीबन आठ इंच चौड़े इस बोर्ड गेम के सामने ठिठक गए। कारण इसकी सीधी-तिरछी लकीरों से बनी अष्टभुज आकृति का अब तक ज्ञात किसी भी खेल से मेल न बैठना था। उन्होंने तफ्सील से अध्ययन करने का सोचा।

क्रिस्ट ने खेल-पत्थर पर गोटियां खिसकाने से बने घिसावों को ध्यानपूर्वक देखा ताकि चालों का अंदाज़ा लगाया जा सके। फिर उन्होंने अन्य विशेषज्ञों की मदद से खेल-पत्थर का विस्तृत और सूक्ष्म 3डी स्कैन (3D scan analysis) करवाया। 3डी स्कैन में खेल-पत्थर पर बने निशान और गोटियों की चाल थोड़ा उभर कर आ रही थीं: कुछ लकीरें अन्य लकीरों की तुलना में थोड़ी ज़्यादा गहरी थीं। इससे साफ पता चलता था कि कुछ खास चालों को ज़्यादा चला गया था। चालों को देखकर यह किसी ब्लॉकिंग खेल की तरह लगता था, जिसमें एक खिलाड़ी अपने प्रतिद्वंद्वी की गोटियां आगे बढ़ने से रोकने और उन्हें घेरने की कोशिश करता है, जैसे टिक-टैक-टो या ओथेलो में होता है (strategy board game)। साथ ही खेल-पत्थर के नफासत से तराशे गए किनारे बताते थे कि इसे सोच-समझकर बनाया गया था।

खेल के नियमों को डिकोड करने में शोधकर्ताओं का अगला कदम था कृत्रिम बुद्धि (एआई- artificial intelligence AI) की मदद लेना। नियमों को समझने के लिए, क्रिस्ट ने मास्ट्रिख्ट युनिवर्सिटी के वैज्ञानिक डेनिस सोमर्स के साथ मिलकर दो एआई एजेंट्स को सौ से अधिक प्रचलित रोमन-युरोपियन खेलों के नियमों से प्रशिक्षित किया (AI game simulation)। फिर AI एजेंट्स ने हर नियम सेट के अनुसार 1000 राउंड खेले। शोधकर्ताओं ने विभिन्न नियमों के अनुसार खेले गए खेलों में मोहरों की चालों को देखा। फिर उन्होंने चालों की तुलना खेल-पत्थर पर मिले घिसावों से की ताकि यह पता चल सके कि किन नियमों के मुताबिक गोटियां चली गई थीं। शोधकर्ताओं को नौ नियम मिले जो खेल-पत्थर के घिसावों के साथ मेल खा रहे थे; ये सभी नौ नियम ब्लॉकिंग (घेराबंदी) खेलों के थोड़े परिवर्तित रूप थे। पैटर्न को देखकर ऐसा लगता था कि इस खेल में ज़्यादा गोटियों वाला खिलाड़ी कम गोटियों वाले खिलाड़ी को बढ़ने से रोकने या घेरने की कोशिश करता है।

इस आधार पर शोधकर्ताओं ने इस खेल को पुनर्निमित किया और इसे खेलने के कुछ नियम बताए। खेल को उन्होंने लुड्स कोरिओवल्ली (Ludus Coriovalli) नाम दिया है जिसका मतलब है कोरिओवलम का खेल। कोरिओवलम हीरलेन शहर का प्राचीन रोमन नाम है, जहां से यह खेल-पत्थर मिला था।

शोधकर्ता खेल के नियम तो बताते हैं लेकिन थोड़ा सतर्क भी करते हैं कि यह चालों और ज्ञात अन्य खेलों के नियमों के आधार पर एक निष्कर्ष है; हो सकता है रोमन लोग वास्तव में इसे थोड़े अलग ढंग से खेलते हों।

उम्मीद है कि इस अध्ययन के बाद अन्य प्राचीन खेलों के नियम वगैरह सुलझाने में मदद मिलेगी। बहरहाल, अध्ययन यह बात साफ उभारता है कि काम के अलावा, मनोरंजन भी प्राचीन लोगों के जीवन का अहम हिस्सा था (Roman civilization lifestyle)। वे न सिर्फ खोज, नए आविष्कार या दिन-रात काम करते थे बल्कि अपने मनोरंजन का ख्याल भी रखते थे और मनोरंजन के नए-नए तरीके, नए खेल भी गढ़ते थे। (स्रोत फीचर्स)

कैसे खेलें लुड्स कोरिओवल्ली

बोर्ड: कागज़ या तख्ती पर चित्र 1 के अनुसार बिसात बनाएं।

खिलाड़ी: इस खेल को दो खिलाड़ी (चोर और पुलिस) खेल
सकते हैं। चोर खिलाड़ी के पास दो गोटियां होंगी और पुलिस
खिलाड़ी के पास चार गोटियां होंगी।

लक्ष्य: पुलिस खिलाड़ी को कम से कम चालों में चोर को चारों
ओर से घेरना है, ऐसे कि चोर खिलाड़ी की गोटियों को आगे
चलने के लिए कोई चाल न बचे।

नियम

  • खेल दो पारियों में खेला जाता है। खेल शुरू करने के पहले खिलाड़ी यह तय कर लें कि पहली पारी में कौन सा खिलाड़ी चोर बनेगा और कौन सा खिलाड़ी पुलिस।
  • चित्र के अनुसार गोटियां जमा लें। चित्र में काली गोटियां पुलिस की हैं और सफेद गोटियां चोर की।
  • बिसात में दो या दो से अधिक रेखाओं के जोड़ बिंदु ‘घर’ हैं।
  • एक खिलाड़ी एक चाल में नज़दीकी एक घर आगे बढ़ सकता है।
  • कोई भी खिलाड़ी अपनी या विरोधी खिलाड़ी की गोटी को लांघकर आगे नहीं बढ़ सकता।
  • एक घर पर एक ही गोटी रह सकती है, एक से ज़्यादा नहीं।
  • खिलाड़ी बारी-बारी से अपनी चाल चलेंगे। एक खिलाड़ी एक चाल में अपनी गोटी एक घर ही खिसका सकता है। और अपने द्वारा चली चालों का हिसाब रखता जाता है।
  • यदि चोर की गोटी को अगली चाल चलने के लिए कोई रास्ता न बचे, वह अपनी गोटी कहीं भी आगे न बढ़ा पाए तो इस सूरत में गोटी घिरी हुई कहलाएगी।

पारी खत्म कब होगी

पारी तब खत्म होगी जब चोर की दोनों गोटियां पुलिस से पूरी तरह घेर ली जाएंगी। एक पारी के अंत में पुलिस ने कितनी चालों में चोर को पूरी तरह घेर लिया इसे गिना जाएगा।

अगली पारी, भूमिका बदली

अगली पारी खिलाड़ियों की भूमिकाएं आपस में बदलकर खेली जाएगी। यानी अगली पारी में पुलिस खिलाड़ी चोर बनेगा और चोर खिलाड़ी पुलिस बनेगा। और, फिर खेल
दोहराया जाएगा। खेल के अंत में दोनों पुलिस खिलाड़ियों
की चालों को गिना जाएगा। जिस खिलाड़ी ने सबसे कम
चालों में चोर को घेरा होगा वह विजेता कहलाएगा। यदि
खेल ड्रॉ होता है, तो खेल शुरू से दोबारा खेला जाएगा। तो चलिए, यह प्राचीन लेकिन नया खेल खेलकर देखिए।
वैसे खेल के नियम आप अपने हिसाब से मुश्किल और
मज़ेदार बना सकते हैं, थोड़े बदल सकते हैं। क्योंकि
मतलब खेलने के मज़े से है। किसी भी तरह खेलें और
मज़ा लें! चाहें तो आप बिसात थोड़ा बदल भी सकते हैं।

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://static.scientificamerican.com/dam/m/7e1f9d133bec2c01/original/Roman-game-cropped.jpg?m=1770756397.469&w=1200
https://www.researchgate.net/publication/400677952/figure/fig3/AS:11431281933993895@1770835319942/Glass-game-pieces-from-Coriovallum-Het-Romeins-Museum-object-numbers-clockwise-from-top.ppm


व्यायाम और मस्तिष्क

क्सरसाइज़ (व्यायाम – exercise benefits) का नाम सुनते ही क्या ख्याल आता है? मज़बूत मसल्स, स्वस्थ दिल, स्वस्थ फेफड़े यानी तंदुरुस्त शरीर। और यदि कहा जाए कि शरीर की इस तंदुरुस्ती में मस्तिष्क (brain health) भी शामिल है तो?

जी हां, न्यूरॉन जर्नल (Neuron journal study) में प्रकाशित हालिया अध्ययन यही बात कहता है; व्यायाम से मस्तिष्क की वायरिंग मज़बूत होती है, जिससे कुछ न्यूरॉन्स फटाफट सक्रिय हो जाते हैं। इससे समझ आता है कि लगातार व्यायाम करने से व्यायाम में होने वाली आसानी और बेहतर क्षमता (यानी व्यायाम सहिष्णुता (exercise tolerance)) में मस्तिष्क सक्रिय रूप से शामिल होता है। फिलहाल यह निष्कर्ष चूहों पर हुए अध्ययन के आधार पर है, हो सकता है कि ऐसा मनुष्यों में भी होता हो लेकिन पहले इसे परखना होगा।

फिलेडेल्फिया में पेन्सिलवेनिया युनिवर्सिटी के न्यूरोसाइंटिस्ट निकोलस बेटली और उनके साथी यह जानना चाहते थे कि जब लोग व्यायाम करते हैं तो मस्तिष्क में क्या होता है। असल में पूर्व अध्ययन में ऐसा पाया गया था कि स्टेरॉयडोजेनिक फैक्टर-1 (SF1) नामक प्रोटीन को कोड करने वाले जीन को ठप करने से चूहों में व्यायाम सहिष्णुता कम हो जाती है। इसलिए शोधकर्ताओं ने मस्तिष्क के वेंट्रोमीडियल हाइपोथैलेमस (ventromedial hypothalamus) हिस्से के उन न्यूरॉन समूहों की निगरानी करना तय किया जो SF1 नामक प्रोटीन बनाते हैं। गौरतलब है कि वेंट्रोमीडियल हाइपोथैलेमस भूख और रक्त शर्करा को नियंत्रित करने के लिए ज़िम्मेदार होता है, और SF1 प्रोटीन चयापचय क्रिया को नियंत्रित (metabolic regulation) करने में भूमिका निभाता है।

शोधकर्ताओं ने चूहों को ट्रेडमिल पर दौड़ाया और उनमें SF1 न्यूरॉन्स की गतिविधि देखी। ये तो उन्होंने पाया ही कि ये न्यूरॉन्य व्यायाम करने से सक्रिय हो गए थे, लेकिन और भी दिलचस्प बात उन्हें यह पता चली कि SF1 न्यूरॉन्स का एक समूह व्यायाम खत्म होने के बाद ही सक्रिय होता है। कई व्यायाम सत्रों के बाद चूहों में सक्रिय होने वाले न्यूरॉन्स की संख्या और उनकी सक्रियता के परिमाण में भी बढ़ोतरी देखी गई।

जब शोधकर्ताओं ने तीन हफ्तों तक लगातार नियमित व्यायाम करने वाले चूहों की मस्तिष्क गतिविधि की तुलना उन चूहों की मस्तिष्क गतिविधि से की जिन्होंने व्यायाम करने में नागा किया था, तो उन्हें दोनों समूह के चूहों के SF1 न्यूरॉन्स के विद्युतीय गुणों में अंतर मिला। नियमित व्यायाम करने वाले चूहों में न्यूरॉन्स को सक्रिय करना आसान हो गया था। साथ ही न्यूरॉन्स के बीच कनेक्शन्स (सायनेप्स) की संख्या भी दुगनी हो गई थी। अनुमान तो लगाया जा सकता है कि शायद मनुष्यों में भी ऐसा कुछ होता होगा, लेकिन इसे परख कर देखना ज़रूरी है। आखिरकार यह तो देखा ही गया है कि मनुष्यों में भी व्यायाम शुरू करने के बाद कुछ दिन थोड़ा तकलीफदेह गुज़रते हैं, लेकिन दिन-ब-दिन आसानी होने लगती है (brain exercise link)। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या बच्चों को सोशल मीडिया की ‘लत’ लग रही है?

न दिनों अमेरिका की अदालत में एक ऐसा वैज्ञानिक सवाल सामने आया है, जिसका जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं है। सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया (social media addiction debate) बच्चों और किशोरों के लिए ‘लत’ बन सकता है, और अगर उससे उन्हें मानसिक नुकसान होता है तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी होगी। कैलिफोर्निया में शुरू हुए इस ऐतिहासिक मुकदमे में एक युवती का कहना है कि बचपन में सोशल मीडिया का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करने की वजह से उसे लंबे समय तक चिंता, अवसाद और अपने शरीर को लेकर हीन भावना जैसी समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं।

इंटरनेट कानून के विशेषज्ञ एरिक गोल्डमैन के अनुसार, जूरी को दो बेहद मुश्किल सवालों पर फैसला करना होगा। पहला, क्या सोशल मीडिया की ‘लत’ एक वास्तविकता है? और दूसरा, क्या टेक-कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म से होने वाले मानसिक नुकसान (tech company liability case) के लिए कानूनी रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? उनके मुताबिक, इन सवालों के जवाब आसान नहीं होंगे, क्योंकि इन्हें लेकर वैज्ञानिकों के बीच ज़ोरदार बहस होने वाली है।

यह बात अभी वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। नशे या जुए की ‘लत’ की तरह सोशल मीडिया की ‘लत’ को मानसिक रोगों की मानक पुस्तकों (mental disorder classification) में आधिकारिक रूप से बीमारी नहीं माना गया है। इसी वजह से शोधकर्ता इस विषय पर बहुत सावधानी से बात करते हैं। कुछ वैज्ञानिक सोशल मीडिया के लिए ‘लत’ शब्द इस्तेमाल करने में सहज हैं, लेकिन कई दूसरे वैज्ञानिक इससे असहमत हैं और कहते हैं कि इसके पक्ष में ठोस सबूत अभी पर्याप्त नहीं हैं (scientific debate)।

आम तौर पर लत का मतलब होता है किसी चीज़ को निरंतर करते रहना, उसे छोड़ने पर बेचैनी महसूस होना और साफ नुकसान दिखने के बावजूद उसका इस्तेमाल जारी रखना। कई किशोरों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल इसी तरह आदत बन चुका है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह तय करना अभी मुश्किल है कि इसे एक मानसिक रोग कहा जाए या सिर्फ एक संगीन खराब आदत। इसी कारण ज़्यादातर वैज्ञानिक इसे ‘समस्यामूलक सोशल मीडिया उपयोग’ (problematic social media use) कहना ज़्यादा उचित मानते हैं।

एक और बड़ी मुश्किल यह समझना है कि सोशल मीडिया और मानसिक समस्याओं के बीच सम्बंध कार्य-कारण का है या सिर्फ साथ-साथ होने वाली (correlation vs causation) बात का। जिस समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा है, उसी दौरान युवाओं में चिंता और अवसाद के मामले भी बढ़े हैं। लेकिन ज़्यादातर शोध यह पक्के तौर पर साबित नहीं कर पाए हैं कि इन मानसिक समस्याओं की सीधी वजह सोशल मीडिया ही है (psychological research findings)। संभव है कि कुछ किशोर पहले से ही मानसिक रूप से संवेदनशील हों और इसी कारण वे सोशल मीडिया का ज़्यादा सहारा लेने लगते हों।

सोशल मीडिया के असर को मापने का तरीका भी बहुत अहम है। कई अध्ययनों में केवल स्क्रीन टाइम देखा जाता है, लेकिन इससे पूरी सच्चाई सामने नहीं आती। बिना सोचे-समझे लगातार स्क्रॉल करना, शारीरिक चीज़ों पर ज़ोर देने वाली सामग्री देखना या ऑनलाइन परेशान किया जाना नुकसानदेह हो सकता है, जबकि दोस्तों से जुड़ना और रचनात्मक काम करना कभी-कभी फायदेमंद भी साबित हो सकता है।

2024 में विज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी यूएस की एक राष्ट्रीय समिति (National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine) के अनुसार अब तक हुए शोध यह साबित नहीं करते कि सोशल मीडिया से सभी किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को बड़े स्तर पर नुकसान हो रहा है। फिर भी कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ बच्चों और किशोरों पर इसका असर साफ तौर पर दिखाई देता है, खासकर तब जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत ज़्यादा किया जाता है (digital wellbeing concern) ।

अब जब अदालतें इस अधूरी और अनिश्चित वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर ज़िम्मेदारी तय करने की कोशिश कर रही हैं, तो इस मामले का फैसला यह तय कर सकता है कि समाज आगे चलकर किशोरों की डिजिटल ज़िंदगी को कैसे समझे (social media regulation policy) और उस पर कैसे नियम बनाए। फिर भी इस मुद्दे पर विभिन्न वैज्ञानिकों के विचार और वाद-विवाद काफी महत्वपूर्ण होंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोविड वैक्सीन और कभी-कभार खून के थक्के बनना

वैश्विक कोविड-19 टीकाकरण (COVID-19 vaccination) के दौरान वैज्ञानिकों ने एस्ट्राज़ेनेका (AstraZeneca vaccine) और जॉनसन एंड जॉनसन द्वारा विकसित टीका लेने वाले कुछ लोगों में एक गंभीर दुष्प्रभाव पाया, हालांकि यह दुष्प्रभाव दुर्लभ है। इन लोगों में असामान्य तरीके से खून के थक्के बने और प्लेटलेट्स की संख्या घट गई थी। शोधकर्ताओं ने अब इस बीमारी के के लिए ज़िम्मेदार जैविक प्रक्रिया को समझ लिया है।

VITT यानी वैक्सीन इंड्यूस्ड इम्यून थ्रम्बोसायटोपीनिया एंड थ्रम्बोसिस) की स्थिति अमेरिका में जॉनसन एंड जॉनसन टीका लेने वाले लगभग 2 लाख में से 1 व्यक्ति और ब्रिटेन में एस्ट्राज़ेनेका टीका लेने वाले लगभग 1 लाख में से 3 व्यक्तियों में देखी गई थी। दोनों टीकों को बनाने में एडेनोवायरस (adenovirus vector vaccine) के परिवर्तित रूप का उपयोग किया गया था। हालांकि इन टीकों ने लाखों लोगों की जान बचाई, फिर भी VITT के चंद मामलों के बाद कुछ देशों ने अपनी टीका नीति बदल (vaccine policy change) ली। उदाहरण के तौर पर, 2021 में ब्रिटेन ने 40 साल से कम उम्र के लोगों को ऐसा दूसरा टीका लेने की सलाह दी, जिनमें खून के थक्के बनने का जोखिम नहीं था।

गौरतलब है कि 2021 में वैज्ञानिकों ने पाया था कि VITT से प्रभावित लोगों के शरीर में PF4 (Platelet Factor 4)नामक एक प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी बन रही थीं, जो खून के थक्के बनने में भूमिका निभाता है। लेकिन यह साफ नहीं था कि शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अचानक इस प्रोटीन पर हमला क्यों करने लगी (autoimmune reaction)।

हाल ही में न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन (New England Journal of Medicine study) में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने इसका कारण बताया है। जब एक विशेष जीन संस्करण वाले लोग एडेनोवायरस का सामना करते हैं, तो उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली आम तौर पर pVII नामक वायरल प्रोटीन के खिलाफ एंटीबॉडी बनाती है। ज़्यादातर लोगों में यह प्रक्रिया पूरी तरह सुरक्षित और हानिरहित होती है। लेकिन थोड़े-से लोगों में एक छोटा-सा जेनेटिक बदलाव (genetic mutation) इन एंटीबॉडीज़ की बनावट बदल देता है। इसमें सिर्फ एक अमीनो अम्ल का परिवर्तन होता है, जिसके कारण एंटीबॉडी pVII की बजाय PF4 प्रोटीन से चिपकने लगती है। यदि टीकाकरण के बाद ऐसी गलत दिशा में काम करने वाली एंटीबॉडीज़ ज़्यादा बनने लगें, तो इससे शरीर में खतरनाक थक्के बनने लगते हैं और साथ-साथ प्लेटलेट्स की संख्या भी घट जाती है (abnormal immune response)।

शोधकर्ताओं ने जिन 21 लोगों में VITT पाया, उन सभी में एक अमीनो अम्ल का यह जेनेटिक बदलाव मौजूद था। जब वैज्ञानिकों ने इस बदलाव के बिना एंटीबॉडी बनाकर उन्हें चूहों पर परखा, तो खून के थक्के बनना काफी कम हो गया (preclinical research)।

फ्लिंडर्स युनिवर्सिटी के प्रतिरक्षा विशेषज्ञ टॉम गॉर्डन के अनुसार, यह पहली बार है जब किसी ऑटोइम्यून बीमारी को उसके अंतिम असली कारण तक साफ-साफ जोड़ा जा सका है।

इस अध्ययन से यह स्पष्ट होता है कि टीकों में कोई कमी या खोट नहीं थी। इस अध्ययन से भविष्य में और ज़्यादा सुरक्षित टीके बनाने में मदद मिल सकती है, साथ ही ऐसी दुर्लभ ऑटोइम्यून प्रतिक्रियाओं की पहले पहचान भी बेहतर तरीके से हो सकेगी (vaccine safety research)। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नए कोशिका एटलस से प्रतिरक्षा व्यवस्था में विविधता उजागर

क ऐसा कोशिका एटलस (cell atlas study) तैयार किया गया है जो चीन के 400 व्यक्तियों की प्रतिरक्षा कोशिकाओं के कामकाज (immune cells profiling) का प्रतिबिंब प्रस्तुत करता है। इस एटलस से पता चला है कि अलग-अलग आबादियों के लोगों में कई जीव वैज्ञानिक अंतर (population level differences) होते हैं।

साइंस (Science journal research) में प्रकाशित इस अध्ययन में खून में उपस्थित प्रतिरक्षा कोशिकाओं का एक मल्टी-ओमिक विवरण (multi-omics analysis) दिया गया है। ओमिक शब्द आजकल काफी प्रचलन में है – किसी कोशिका के सारे जीन्स को मिलाकर जीनोम कहते हैं, सारे प्रोटीन्स के समूह को प्रोटियोम और किसी मनुष्य के सारे सूक्ष्मजीवों के समूह को माइक्रोबायोम कहते हैं। यह अध्ययन विभिन्न ओम्स का परिचय देता है। इसे चाइनीज़ मल्टी-ओमिक्स एटलस (CIMA- Chinese Multi-Omics Atlas) नाम दिया गया है। इस एटलस में प्रतिरक्षा कोशिकाओं के कामकाज में महत्वपूर्ण विविधता पहचानी गई है जो इसी तरह के युरोपीय और जापानी समूहों में नहीं देखी गई थीं। एटलस के रचयिताओं ने कहा है कि यह डैटाबेस अन्य ऐसे ही डैटाबेस का पूरक है जो मूलत: युरोप-केंद्रित हैं।

अलग-अलग अध्ययनों के अंतर्गत विभिन्न कोशिका प्रकारों के लिए मल्टी-ओमिक एटलस तैयार किए हैं और इनका उपयोग मस्तिष्क, अल्ज़ाइमर (Alzheimer’s research) और प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़े सवालों को समझने में किया गया है। लेकिन ये एटलस अक्सर युरोपीय मूल के लोगों से प्राप्त डैटा पर निर्भर रहे हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि इनके आधार पर विकसित औषधियां शायद अन्य मूल के लोगों के लिए प्रभावी न साबित हों। इसी खामी को भरने के लिए चीन के शांक्सी मेडिकल युनिवर्सिटी-बीजीआई कोलेबोरेटिव सेंटर फॉर फ्यूचर मेडिसिन के जुआनहुआ यिन और उनके साथियों ने चीन के 428 वयस्कों के खून में उपस्थित एक करोड़ से ज़्यादा कोशिकाओं का मल्टी-ओमिक विश्लेषण (large scale genomic profiling) किया।

इस एटलस में प्रत्येक व्यक्ति के जैव-आणविक सूचक (biomolecular markers) पता चलते हैं। इनमें चयापचय उत्पादों की तस्वीर, रक्त के जैव रासायनिक चिंह, क्रोमेटिन एक्सेसिबिलिटी (यानी सक्रिय डीएनए) डैटा और विभिन्न कोशिका आबादियों में जीन्स की अभिव्यक्ति में फर्क नज़र आते हैं।

इससे पहले OneK1K नामक परियोजना (OneK1K database) के तहत एक डैटाबेस बन चुका था, जिसमें उत्तर युरोपीय मूल के लोगों का विश्लेषण किया गया था। इसके अलावा जापान का ImmuNexUT project नामक डैटाबेस भी मौजूद था। इनसे तुलना करके शोधकर्ताओं ने पाया कि विभिन्न आबादियों में प्रमुख प्रतिरक्षा क्रियामार्ग और कोशिका प्रकार एक जैसे हैं।

इस समानता के बावजूद इन तीन एटलसों के बीच जेनेटिक नियमन (genetic regulation differences) और प्रतिरक्षा कोशिकाओं की अवस्थाओं में महत्वपूर्ण अंतर दिखे। जैसे उन्होंने कतिपय जीन्स के निकट उपस्थित विविधताओं पर ध्यान दिया जो इस बात पर असर डालती है कि वह जीन कितना सक्रिय होगा। पाया गया कि CIMA डैटा में 93 प्रतिशत लक्षित जीन्स और जापानी समूह के ऐसे जीन्स में समानता थी लेकिन युरोपीय समूह के साथ यह समानता मात्र 44 प्रतिशत ही देखी गई (population genomics)।

एक उदाहरण के तौर पर rs11886530 जीन (gene variant rs11886530) के परिवर्तित रूप पूर्वी एशियाई आबादी में तो आम थे मगर युरोपीय आबादी में बिरले थे। यह जीन प्रतिरक्षा कोशिकाओं (टी-कोशिकाओं) की अंदरुनी दैनिक घड़ी को प्रभावित करता है। इससे पहले यह क्रियाविधि प्रतिरक्षा कोशिकाओं में कभी नहीं देखी गई थी।

चीनी परियोजना में जिन लोगों (189 पुरुषों और 239 महिलाओं) का अध्ययन किया गया उनकी उम्र 20 से 77 वर्ष के बीच थी। शोधकर्ताओं ने देखा कि उम्र बढ़ने के साथ व्यक्तियों में श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ती है, जो शोथ (इन्फ्लेमेशन) का कारण बनती है। इसके अलावा, डेंड्राइटिक कोशिकाओं में जीन्स की अभिव्यक्ति बदल जाती है। ये कोशिकाएं प्रतिरक्षा तंत्र में संदेशवाहक का काम करती हैं।

कुल मिलाकर CIMA का यह एटलस चिकित्सा के क्षेत्र में हमारी समझ को बढ़ाएगा और व्यक्ति-आधारित चिकित्सा व औषधि चयन में योगदान देगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://www.science.org/cms/asset/7e077147-9398-479d-8967-b89f9d87cecf/atlas_16_9.jpg

खुद को आस्तीन की तरह सीधा-उल्टा करता कृमि

जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलॉजी के मेकेनिकल इंजीनियर डेविड हू जानना चाहते थे कि ये ब्लडवर्म इस कारस्तानी में इतने कुशल कैसे हैं? और ऐसा करते हुए उनकी मांसपेशियों को क्षति क्यों नहीं होती?

शोधकर्ताओं ने जब ब्लडवर्म (Glycera dibranchiata) की इस हरकत को रिकॉर्ड करके बारीकी से अध्ययन किया तो लगा कि ऐसा सूंड पर हर ओर मौजूद अत्यधिक झुर्रियों/सिलवटों की बदौलत संभव है। बहुत ही ज़्यादा झुर्रियां/सिलवटें होने से जब शुण्ड को बाहर की ओर उलटा जाता है, तो अंदर की त्वचा सामान्य से तीन गुना ज़्यादा फैल जाती हैं और मांसपेशियों को कोई क्षति भी नहीं होती। यह कुछ-कुछ हाथी की सूंड पर मौजूद झुर्रियों की तरह काम करता है(flexible biological structure)।

वीडियो यहां देखें
HTTPS://WWW.SCIENCE.ORG/CONTENT/ARTICLE/WATCH-SUPERSTRETCHY-BLOODWORMS-TURN-THEMSELVES-INSIDE-OU

ब्लडवर्म अपनी शुण्ड को 2 सेकंड से भी कम समय में पूरा पलटकर बाहर कर लेते हैं। वहीं इसे वापिस अंदर करने में लगभग 8 सेकंड लगते हैं और इसके लिए ज़्यादा जटिल हरकतें भी करनी पड़ती हैं।

ब्लडवर्म की यह बनावट ऐसे उलटने-पलटने वाले और लचीले रोबोट बनाने में सहायक हो सकती है। ऐसे लचीले रोबोट(soft robotics) मरीज़ों की मदद कर सकते हैं; ये रोबोट बिस्तर पर पड़े मरीज़ों के नीचे जाकर फैल और फूल सकते हैं, जिससे नर्सें उन्हें धीरे से इधर-उधर खिसका कर उनकी चादरें आसानी से बदल सकेंगी। (स्रोत फीचर्स)

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घोंसलों पर लहराती लटकन सजावट नहीं, चकमा है

क्षिण-पूर्वी ब्राज़ील के जंगल (Southeast Brazil rainforest) में नदी का किनारा है। हल्की बयार बह रही है। इस बयार में, पेड़ की शाखों से लटकी काई-युक्त लताएं/टहनियां लटकन की तरह डोल रही हैं। यदि नज़ारा आपको महज़ कुदरती सजावट लगे, तो जान लीजिए कि कुदरती शिकारियों की तरह आप भी धोखा खा गए हैं। आप यदि इस ‘सजावट’ पर ज़रा गौर फरमाएंगे तो पाएंगे कि इन लटकनों से घोंसलों को सजाया गया है और घोंसलों में पक्षी के अंडे/चूज़े रखे हैं। निराश न हो, ये सजावट थी भी शिकारियों को चकमा देने (anti-predator strategy)।

बायोलॉजी लेटर्स के अध्ययन के अनुसार, ब्लू मैनाकिन (Chiroxiphia caudata) (Blue Manakin bird) नामक चिड़िया अपने अंडों और चूज़ों की सुरक्षा के लिए घोंसलों में लंबी-लंबी लटकनें लटका देती है ताकि टूकेन समेत अन्य शिकारियों को उनके घोंसले, घोंसले-जैसे न लगें और वे इनसे दूर ही रहें। ऐसा करने से इन शिकारियों द्वारा हमले की संभावना 10 गुना कम हो जाती है। हालांकि बड़े शिकारी-पक्षियों के आक्रमण की संभावना तो फिर भी बनी रहती है, वे घोंसले पहचान सकते हैं।

वैज्ञानिकों को काफी समय से यह पता था कि ब्लू मैनाकिन और अमेरिका की कई अन्य पक्षी प्रजातियां घोंसलों में लटकन लटकाती हैं। उनका अनुमान था कि ऐसा शायद वे छद्मावरण (camouflage behavior) देने के लिए करती होंगी। यानी ऐसा करने से घोंसले आसपास के परिवेश में घुल-मिलकर शिकारियों की नज़रों से ओझल रहते होंगे। लेकिन यह अनुमान पक्का नहीं था। एक विवाद यह था कि लटकनदार घोंसले तो ज़्यादा नुमाया हो सकते हैं और आसानी से पहचाने जा सकते हैं (nest recognition theory)।

इस विवाद को सुलझाने के लिए फेडरल युनिवर्सिटी के पक्षी विज्ञानी मर्सिवल रॉबर्टो फ्रांसिस्को के दल ने ब्लू मैनाकिन द्वारा परित्यक्त घोंसलों की निगरानी करने का सोचा। जब ब्लू मैनाकिन का प्रजनन काल खत्म हो गया, तब पक्षी विज्ञानी कैसियानो मार्टिंस जंगल से 50 खाली और परित्यक्त घोंसले और उनकी काई-युक्त लटकन ले आए। प्रयोगशाला में उन्होंने प्लास्टिसिन (मॉडलिंग क्ले) से असली जैसे अंडे बनाए और हर घोंसले में ऐसे दो नकली अंडे रख दिए। फिर, अगले दो प्रजनन मौसम में इन घोंसलों को जंगल में ऐसी जगहों पर रखा जहां कुदरती तौर पर काईदार लटकन बहुत कम पनपती है। शोधकर्ताओं ने कुछ घोंसलों पर लटकन लगी रहने दी, और कुछ की लटकन हटा दी। और घोंसलों की इंफ्रारेड कैमरे से निगरानी (infrared camera monitoring) की।

लटकन होने का फर्क साफ दिखा। लटकन-विहीन 54 घोंसलों में से ग्यारह (20 प्रतिशत) घोंसलों से अंडे चोरी हुए थे, जबकि लटकन वाले 54 घोंसलों में से सिर्फ एक से अंडे चोरी (predation rate) हुआ था।

अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि लटकनदार घोंसले बनाने वाले पक्षी दरअसल अपने घोंसलों को न तो छुपाने की कोशिश करते हैं, न आसपास की किसी अन्य चीज़ जैसा दिखाने की। बस कोशिश यह होती है कि घोंसलों को ऐसे आकार दें कि वे घोंसले जैसे न दिखें ताकि शिकारियों को पता न चले (deceptive nest structure)। हालांकि यह तरीका स्तनधारी या उन शिकारियों के विरुद्ध काम नहीं करेगा जो शिकार खोजने के लिए गंध का सहारा लेते हैं।

बहरहाल, एक सवाल बना हुआ है: इन घोंसलों पर काईदार जगहों पर ज़्यादा हमले क्यों होते हैं क्योंकि यहां तो घोंसले अधिक ओझल होना चाहिए। शायद टूकेन पक्षी समझ गया हो कि ब्लू मैनाकिन अपने घोंसले काईदार जगह पर बनाता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बांस के गुणों पर फिर एक नज़र

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

बांस (तमिल में ‘मूंगली’) (bamboo plant)  एक प्राचीन पौधा है जो नम मिट्टी और कड़ी धूप में तेज़ी से बढ़ता है। बांस एशिया और लैटिन अमेरिका में काफी लोकप्रिय है; यहां लोग बांस का उपयोग कई तरह के कामों में करते हैं। खाद्य वैज्ञानिक और इतिहासकार के. टी. अचया ने अपनी किताब हिस्टोरिकल डिक्शनरी ऑफ इंडियन फूड में लिखा है कि भारत में प्राचीन समय से ही जैन भिक्षु और वनवासी भोजन में बांस के तने और पत्तियों को पकाते (bamboo as food) रहे हैं।

बांस ऐसे उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों और आर्द्र इलाकों में अच्छे से वृद्धि करते हैं, जहां धूप अच्छी पड़ती हो और मिट्टी जैविक पदार्थ से भरपूर हो। भारत में असम, त्रिपुरा, मिज़ोरम, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु राज्यों में बांस खूब होते हैं (bamboo cultivation in India)। चंद्रमोहन सिंह और उनके साथियों ने ट्रीस, फॉरेस्ट्स एंड पीपुल जर्नल में एक पेपर प्रकाशित किया है, जिसका शीर्षक है ‘जंगल से भविष्य तक: जैव विविधता, स्वदेशी ज्ञान, पारिस्थितिक लचीलापन और पूर्वोत्तर भारत में वर्तमान स्थिति के साथ बांस के सम्बंध पर एक टिकाऊ नज़रिया (From Forest to future: A sustainable perspective on bamboo’s nexus with biodiversity, indigenous knowledge, ecological resilience, and current status in Northeast India)’। इस पेपर में बताया गया है कि बांस-आधारित उद्योगों को, स्थानीय ज्ञान का इस्तेमाल करके, वैज्ञानिक तरीकों  और नीतियों के ज़रिए मज़बूत किया जा सकता है। इसके लिए बांस शोध संस्थान स्थापित किए जा सकते हैं ताकि स्थानीय ज्ञान को बेहतर किया जा सके।

धीरे-धीरे बांस के नए उपयोग हो रहे हैं, जैसे डिस्पोज़ेबल प्लास्टिक (plastic alternatives) के बर्तनों की जगह बांस के बर्तन। असम के नुमालीगढ़ में, प्रधानमंत्री ने पिछले साल एक बायो-रिफाइनरी (bamboo bio-refinery) का उद्घाटन किया था जिसका उद्देश्य बांस से 50,000 मीट्रिक टन इथेनॉल का उत्पादन था। इसकी वेबसाइट पर भारत में बांस से बने कई उत्पादों का ज़िक्र है, जिनमें कपड़े, टोकरियां, चटाई, कुर्सियां, मेज़, अलमारियां, छत और फर्श, वाद्ययंत्र (बांसुरी और ढोल), तथा अगरबत्ती शामिल हैं। कुछ राज्यों ने बांस से बने उत्पादों को विकसित करने के लिए बांस अनुसंधान संस्थान (bamboo research institutes) भी स्थापित किए हैं।

बांस सेक्टर को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार ने राष्ट्रीय बांस मिशन 2025 (National Bamboo Mission 2025) शुरू किया है, जिसके तहत बांस की खेती को बढ़ाना, उद्योग से कड़ियों को मज़बूत करना और आयात पर निर्भरता कम करना है। इस पहल का उद्देश्य गैर-वन भूमि पर (जैसे खेतों, घरों, सामुदायिक भूमि और सिंचाई नहरों के किनारों पर) बांस के बागान बढ़ाना है, जिससे किसानों की आय बढ़ेगी और उद्योगों के लिए कच्चे माल की निरंतर आपूर्ति सुनिश्चित होगी। इसके अलावा, बांस और इसके उत्पादों (जैसे बड़े दर्पण, सूती वस्त्र और बांस के आभूषण) का अमेरिका, डेनमार्क और नाइजीरिया को निर्यात किया जाता है। विश्व स्तर पर, भारत बांस और उसके उत्पादों के शीर्ष तीन निर्यातकों में है (अन्य दो शीर्ष देश हैं चीन और वियतनाम)। इस निर्यात (bamboo exports from India) से लाखों-करोड़ों की आमदनी होती है। महाराष्ट्र, केरल और असम सहित कई राज्यों ने बांस शोध एवं तकनीकी संस्थान भी स्थापित किए हैं। ये बांस से बने टेक्सटाइल, इमारत सम्बंधी और खाद्य उत्पाद बेचते हैं।

पोषक मूल्य

नवंबर 2025 में, एडवांसेज़ इन बैम्बू साइंस नामक जर्नल में प्रकाशित एक शोधपत्र में बताया गया है कि बांस एक ज़ोरदार सुपरफूड (bamboo superfood) है। एंग्लिया रस्किन युनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन में आहार में बैम्बू शूट (bamboo shoots nutrition), पत्तियों और बीजों के सेवन के पोषण सम्बंधी फायदों के बारे में बताया है और बताया है कि बांस की इन चीज़ों को खाने से ज़रूरी अमीनो एसिड, विटामिन A, B6 व E मिल सकते हैं। और रक्त शर्करा और लिपिड स्तर को नियंत्रित किया जा सकता है। बांस मधुमेह और ह्रदय सम्बंधी बीमारियों (diabetes and heart health) के लिए अच्छे हैं। वैज्ञानिकों ने बांस के सेवन से होने वाले स्वास्थ्य परिणामों का एक व्यवस्थित बहु-देशीय विश्लेषण भी किया, जिससे पता चला है कि बांस से बने खाने में एंटीऑक्सीडेंट भी ज़्यादा होते हैं और प्रोबायोटिक फायदे भी मिलते हैं।

ग्रामीण लोगों के भोजन में तो बांस शामिल है ही, हम शहरी लोग कैसे लाभ ले सकते हैं? कूरियर सर्विस और कई ऑनलाइन वेंडर्स (online bamboo food products) और डिस्ट्रीब्यूटर्स बांस से बने खाद्य और उत्पाद बेचते हैं, और हम उनसे से खरीदकर खा सकते हैं। (स्रोते फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विज्ञान की प्रयोगशाला बनता ग्रीनलैंड

वंबर में ग्रीनलैंड की राजधानी नूक की सड़कें दुनिया भर के वैज्ञानिकों से भरी थीं। वे ‘ग्रीनलैंड साइंस वीक’ (Greenland Science Week)  नामक एक बड़े सम्मेलन में शामिल होने आए थे, जिसका उद्देश्य आर्कटिक क्षेत्र (Arctic region research) में हो रहे वैज्ञानिक शोध के बढ़ते महत्व को दिखाना था। सम्मेलन की थीम थी – ‘All Eyes on Greenland (सबकी नज़र ग्रीनलैंड पर)’। इसी दौरान अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रंप ने एक बार फिर अमेरिका द्वारा ग्रीनलैंड पर पूर्ण नियंत्रण हासिल करने का विवादित बयान दिया।

हालांकि, बाद में सैन्य कार्रवाई से इन्कार से तनाव कुछ कम तो हुआ, लेकिन अनिश्चितता बनी रही। यह अभी स्पष्ट नहीं है कि इस राजनीतिक रुचि का ग्रीनलैंड में हो रहे वैज्ञानिक शोध पर क्या असर पड़ेगा। लेकिन एक बात बिलकुल स्पष्ट है, ग्रीनलैंड, – जिसे स्थानीय लोग ‘कालालित नूनात’ (Kalaallit Nunaat) कहते हैं – आज जलवायु परिवर्तन (climate change research) जैसे अहम मुद्दों पर शोध के लिए दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण स्थानों में से एक बन चुका है – एक अनोखी प्राकृतिक प्रयोगशाला साबित हो रहा है।

विज्ञान की दृष्टि से देखा जाए तो ग्रीनलैंड की भौगोलिक बनावट (geography of Greenland), उसका इतिहास और वहां के लोग – तीनों ही खास हैं। सैकड़ों सालों से इनुइट समुदाय (Inuit indigenous knowledge) का पारंपरिक ज्ञान इलाके के मौसम और पर्यावरण को समझने में मदद करता रहा है। आगे चलकर युरोप के खोजकर्ताओं और अमेरिका के अभियानों ने यहां वैज्ञानिक अध्ययनों को आगे बढ़ाने में योगदान दिया।

1990 के दशक तक ग्रीनलैंड जलवायु विज्ञान (climate science) का एक बड़ा केंद्र बन गया था। दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने यहां की मोटी बर्फ की चादर में गहराई तक जाकर बर्फ के नमूने (ice core samples) निकाले। इन नमूनों से यह समझने में मदद मिली कि हज़ारों सालों में पृथ्वी का मौसम कैसे बदलता रहा है।

आज ग्रीनलैंड की बर्फ पर वैज्ञानिक लगातार नज़र रख रहे हैं, जिसका असर पूरी दुनिया के समुद्र स्तर पर पड़ता है। अगर ग्रीनलैंड की पूरी बर्फ पिघल जाए, तो समुद्र का स्तर लगभग 7.4 मीटर तक बढ़ सकता है। अभी भी हर साल यहां बहुत बड़ी मात्रा में बर्फ पिघल रही है (Greenland ice melt) – सिर्फ 2024 में करीब 129 अरब टन – जो दुनिया भर में समुद्र के स्तर को बढ़ाने में बड़ा योगदान दे रही है।

ग्रीनलैंड की अहमियत केवल बर्फ तक सीमित नहीं है। वहां की ज़मीन में लीथियम (lithium mining) जैसे महत्वपूर्ण खनिज मिलने की संभावना है, जो बैटरी और नवीकरणीय ऊर्जा तकनीकों (renewable energy technology) के लिए बेहद ज़रूरी हैं। इसके अलावा, ग्रीनलैंड आनुवंशिक और जैव-चिकित्सीय शोध के लिए भी एक खास जगह है। यहां की अधिकतर आबादी इनुइट समुदाय की है, जो हज़ारों वर्षों तक बाकी दुनिया से काफी हद तक अलग-थलग रहे। इस कारण उनके जीनोम (Inuit genome studies) में ऐसे खास गुण पाए जाते हैं, जो मानव स्वास्थ्य और बदलते वातावरण के अनुसार शरीर के ढलने की प्रक्रिया को समझने में वैज्ञानिकों की मदद करते हैं।

ग्रीनलैंड के बढ़ते वैज्ञानिक महत्व को देखते हुए, वहां की सरकार ने 2022 में पहली बार एक राष्ट्रीय शोध नीति (national research policy) जारी की। इस नीति में 2030 तक की प्राथमिकताएं तय की गई हैं। इसमें कहा गया है कि शोध ग्रीनलैंड की ज़मीन और समाज से जुड़ा होना चाहिए, स्थानीय लोगों की ज़रूरतों को ध्यान में रखकर होना चाहिए और साथ ही दुनिया भर के वैज्ञानिकों के साथ सहयोग (international scientific collaboration) के लिए खुला रहना चाहिए। इसका मकसद यह है कि शोध के नतीजों का फायदा ग्रीनलैंड के लोगों के साथ-साथ पूरी दुनिया को मिले।

इस नीति का असर अब दिखने लगा है और ग्रीनलैंड का छोटा लेकिन बढ़ता हुआ शोध तंत्र (research ecosystem) मज़बूत हो रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है ‘ताराजोक’ (research vessel Tarajoq) नाम का शोध पोत, जो ग्रीनलैंड सरकार द्वारा अब तक की सबसे बड़ी वैज्ञानिक परियोजना है। 2022 से संचालित यह जहाज़ वैज्ञानिकों को दूर-दराज़ के फ्योर्ड्स और समुद्री इलाकों तक पहुंचने में मदद करता है, जहां पहले अध्ययन करना मुश्किल था।

हाल के एक अभियान में इसी पोत की मदद से वैज्ञानिकों ने यह समझने की कोशिश की कि ग्लेशियर से पिघलने वाला पानी समुद्री पारिस्थितिकी (marine ecosystem) से कैसे अंतर्क्रिया करता है। बर्फ से ढंके तटों के पास काम करने की इसकी क्षमता लंबे समय तक आर्कटिक क्षेत्र के अध्ययन के लिए अहम साबित होगी।

तकनीक और भविष्य

ग्रीनलैंड अब आधुनिक तकनीकों को भी तेज़ी से अपना रहा है। पिछले साल ग्रीनलैंड के प्राकृतिक संसाधन संस्थान ने देश का पहला कृत्रिम बुद्धिमत्ता (artificial intelligence AI) आधारित कंप्यूटर सिस्टम लगाया। इस तकनीक की मदद से वैज्ञानिक समुद्र के भीतर की वीडियो और आवाज़ों का तेज़ी से विश्लेषण (marine data analysis) कर सकते हैं, समुद्री जीवों की पहचान कर सकते हैं और मछलियों की संख्या का अनुमान लगा सकते हैं। जो काम पहले महीनों में होता था, अब कुछ ही दिनों में पूरा हो जाता है। जैसे-जैसे जलवायु परिवर्तन (global climate change) तेज़ हो रहा है और ग्रीनलैंड को लेकर दुनिया की वैज्ञानिक, आर्थिक और राजनीतिक रुचि (scientific and geopolitical interest) बढ़ रही है, यह द्वीप एक अहम मोड़ पर खड़ा है। आगे का रास्ता इस बात पर निर्भर करेगा कि अंतर्राष्ट्रीय ध्यान और स्थानीय ज़रूरतों के बीच संतुलन कैसे बनाया जाता है। भावी फैसले न सिर्फ आर्कटिक विज्ञान (Arctic science) की दिशा तय करेंगे, बल्कि पूरी पृथ्वी को समझने के हमारे नज़रिए को भी प्रभावित करेंगे। (स्रोत फीचर्स)

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कितना माइक्रोप्लास्टिक है वातावरण में ?

माइक्रोप्लास्टिक (microplastic pollution) अब धरती के लगभग हर हिस्से में फैल चुका है – सहारा रेगिस्तान से लेकर आर्कटिक की बर्फ तक। लेकिन एक सवाल अब तक बना हुआ है: हवा में कितना माइक्रोप्लास्टिक (airborne microplastics) तैर रहा है? एक नए वैज्ञानिक अध्ययन ने इसका जवाब बेहद चिंताजनक बताया है।

नेचर में प्रकाशित शोध (Nature journal study) के अनुसार, हर साल भूमि पर होने वाली मानवीय गतिविधियां लगभग 600 क्वाड्रिलियन (6 शंख या 6×1017) माइक्रोप्लास्टिक कण हवा में छोड़ती हैं। यह मात्रा समुद्रों से निकलने वाले माइक्रोप्लास्टिक से करीब 20 गुना अधिक है। इससे यह धारणा गलत साबित होती है कि हवा में फैलने वाले माइक्रोप्लास्टिक का मुख्य स्रोत समुद्र हैं; वास्तव में तो भूमि से होने वाला प्रदूषण (land-based pollution) कहीं बड़ा कारण है।

शोध में, भूमि के ऊपर की हवा के हर घन मीटर में औसतन 0.08 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए, जबकि समुद्र के ऊपर यह संख्या केवल 0.003 कण थी। आसान शब्दों में कहें तो हम जो हवा सांस के साथ अंदर ले रहे हैं, उसमें मौजूद ज़्यादातर माइक्रोप्लास्टिक मानव गतिविधियों से आ रहे हैं – जैसे यातायात (vehicular emissions), कारखाने, शहरों की धूल, सिंथेटिक कपड़ों के रेशे और कचरे से।

माइक्रोप्लास्टिक बहुत सूक्ष्म प्लास्टिक कण होते हैं, जिनका आकार एक माइक्रॉन से लेकर पांच मिलीमीटर तक होता है। ये इतने हल्के होते हैं कि हवा इन्हें आसानी से उड़ा ले जाती है और ये दूर- दूर तक फैल सकते हैं। एक बार पर्यावरण में पहुंच जाने के बाद इन्हें हटाना लगभग असंभव होता है और ये सालों तक बने रहते हैं (persistent environmental pollution)।

पहले हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक को लेकर किए गए अनुमान बहुत अलग-अलग थे – कहीं बहुत कम कण बताए गए थे, तो कहीं सैकड़ों। इस नए अध्ययन (global microplastic study) से यह समझ में आता है कि ऐसा क्यों हुआ। पहले के शोध अक्सर सीमित इलाकों के आंकड़ों या प्लास्टिक उपयोग के मोटे-मोटे अनुमानों पर आधारित थे। इसके विपरीत, इस अध्ययन में दुनिया भर के 283 स्थानों से जुटाए गए 2782 आंकड़ों का विश्लेषण किया गया, जिससे अब तक का सबसे व्यापक वैश्विक डैटा (global data analysis) तैयार हो सका है।

अध्ययन के प्रमुख लेखक और विएना विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक एंड्रियास स्टोल के अनुसार इस शोध से एक बात तो साफ है कि हवा में फैलने वाले माइक्रोप्लास्टिक का मुख्य स्रोत भूमि है, न कि समुद्र। हालांकि अभी भी कुछ जानकारियों की कमी है, लेकिन दिशा अब स्पष्ट है। उम्मीद है कि यह अध्ययन आगे होने वाले शोध (future climate research) के लिए आधार बनेगा। बहरहाल, प्लास्टिक प्रदूषण सिर्फ पानी और मिट्टी तक सीमित नहीं है, बल्कि उस हवा में भी मौजूद है जिसमें हम सांस लेते हैं, और इसके लंबे समय के असर (health impact) क्या होंगे यह एक बड़ा सवाल है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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