समन्वित सार्वभौमिक समय UTCको बदलने का प्रस्ताव

लीप ईयर, अधिक मास वगैरह के बारे में सुनते रहते हैं। यह भी स्पष्ट है कि ऐसी व्यवस्थाएं सूर्य-चंद्रमा की आभासी गति और समय मापन की अपनी प्रणाली के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए ज़रूरी होती हैं। लेकिन आजकल के उपकरणों/यंत्रों का कामकाज समय के अत्यंत सटीक मापन पर टिका होता है। इसके लिए 1963 में परमाणु घड़ियों (atomic clock) पर आधारित समय मापन को मानक निर्धारित किया गया था। लेकिन…

हमें इस समय मानक का तालमेल पृथ्वी की गति से बनाकर रखना ज़रूरी होता है। जब यह समय मानक (समन्वित सार्वभौमिक समय – UTC) निर्धारित किया गया, उसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति धीमी पड़ती गई। परमाणु घड़ियां तो अपनी रफ्तार से चलती रहीं और पृथ्वी की गति से निर्धारित दिवस और परमाणु घड़ी से निर्धारित दिवस की अवधि में अंतर आने लगा। इनका तालमेल बनाए रखने के लिए सबसे पहले 1972 में अंतर्राष्ट्रीय भार व माप ब्यूरो (BIPM) ने UTC में एक सेकंड जोड़ा था। इसे लीप सेकंड (leap second) कहते हैं। एक बार फिर, लेकिन…

यह जुगाड़ प्राय: समस्यामूलक रहा है। लीप सेकंड जोड़ने से कंप्यूटर प्रणालियों पर काफी असर होता है क्योंकि यहां संदेश भेजने और प्राप्त करने का समय एकदम सटीक होना ज़रूरी है। लीप सेकंड जोड़ने के कई असर देखे गए हैं।

1972 से शुरू करके अब तक 27 लीप सेकंड जोड़े जा चुके हैं। अंतिम लीप सेकंड 2016 में जोड़ा गया था। इसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति एक बार फिर रफ्तार पकड़ने लगी है। इसके चलते 2016 के बाद लीप सेकंड नहीं जोड़ा गया है। और, अब पता चला है कि पृथ्वी की घूर्णन गति (earth’s rotation) में वृद्धि काफी तेज़ रही है। बात यहां तक पहुंची है कि दुनिया के समयपाल (timekeepers) ऋणात्मक लीप सेकंड जोड़ने पर विचार करने लगे हैं। पता नहीं, ऐसा करने के क्या असर होंगे।

दरअसल, हर चार वर्षों में भार और माप के आम सम्मेलन में दुनिया भर के समयपाल जुटकर UTC पर विचार करते हैं। 2022 में 64 सदस्य राष्ट्र इस बात पर सहमत हो गए थे कि UTC और पृथ्वी की स्थिति के बीच जो अंतर आ रहा है, उसे 2035 तक 1 सेकंड से ज़्यादा होने तक चलने दिया जाए।

अलबत्ता, ताज़ा अनुमान बताते हैं कि ऋणात्मक लीप सेकंड की ज़रूरत शायद 2035 से पहले ही पड़ने वाली है। 2026 का अंतर्राष्ट्रीय भार और माप सम्मेलन अक्टूबर में प्रस्तावित है। यहां संभवत: लीप सेकंड की बजाय लीप घंटे (leap hour) की बात उठेगी क्योंकि कई विशेषज्ञों का मत है कि लीप घंटा जोड़ने की ज़रूरत शायद सैकड़ों वर्षों में एक बार पड़ेगी। कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि निर्णय जल्दी करना होगा क्योंकि यदि और इन्तज़ार किया तो मुमकिन है कि 2035 में ऋणात्मक लीप सेकंड (neagtive leap second) जोड़ना ही पड़े। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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लाल लेट्यूस को हरा बनाकर बढ़ाया सब्ज़ी का पोषण

दौलत सिंह तंवर 

जापान के त्सुकुबा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने हाल ही में जीनोम संपादन (gene editing) की मदद से लाल पत्तों वाली लेट्यूस का लाल रंग गायब कर दिया, नतीजतन पत्तियां हरी हो गईं। लेकिन असली कहानी रंग बदलने की नहीं, बल्कि इसके साथ पौधे के भीतर हुए एक अप्रत्याशित बदलाव की है। दरअसल, सब्ज़ियों की दुनिया में रंग सिर्फ दिखावे की बात नहीं है। यह अक्सर पौधे के भीतर चल रही जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं का संकेत भी होता है।

लेट्यूस की पत्तियों का रंग बदलते ही पौधे में दूसरे फायदेमंद यौगिक पहले से कहीं ज़्यादा मात्रा में जमा होने लगे। लाल पत्तों वाली लेट्यूस का रंग एंथोसायनिन नाम के पॉलीफेनॉलिक रंजक की वजह से होता है। एंथोसायनिन एक ऐसा प्राकृतिक रंजक है, जो कई फलों, फूलों और सब्ज़ियों में पाया जाता है और अपने एंटीऑक्सीडेंट गुणों के लिए जाना जाता है। पौधों में यह यौगिक फिनाइलएलानीन नामक अमीनो एसिड से शुरू होने वाली एक लंबी जैव-रासायनिक शृंखला के ज़रिए बनता है। इस शृंखला के दौरान रास्ते में कई फ्लेवोनॉइड्स भी बनते हैं। फ्लेवोनॉइड्स पौधों में पाए जाने वाले यौगिकों का एक बड़ा समूह है, जो कई जैविक भूमिकाएं निभाते हैं। सामान्य स्थिति में ये फ्लेवोनॉइड्स आगे चलकर एंथोसायनिन में बदल जाते हैं। यानी एंथोसायनिन (anthocyanin) असल में इस शृंखला का अंतिम उत्पाद है।

शोधकर्ताओं ने क्रिस्पर कास-9 (CRISPR-CAS9) नामक आधुनिक जीनोम संपादन तकनीक की मदद से डीएफआर नाम के एंज़ाइम को बनाने वाले जीन को निशाना बनाया। यह एंज़ाइम एंथोसायनिन बनने से ठीक पहले वाले चरण के लिए ज़िम्मेदार होता है, यानी फ्लेवोनॉइड्स के एंथोसायनिन में तब्दील होने के चरण पर। जब वैज्ञानिकों ने इस जीन को निष्क्रिय किया, तो एंथोसायनिन बनने की प्रक्रिया रुक गई। नतीजतन, पौधे की पत्तियों से लाल रंग पूरी तरह उड़ गया और वे हरी दिखने लगीं।

यहां एक दिलचस्प बात सामने आई। जब एंथोसायनिन बनने का रास्ता बंद हुआ तो पौधे में इस रासायनिक शृंखला के मध्यवर्ती पदार्थ (यानी फ्लेवोनॉइड्स) ही जमा होने लगे। पाया गया कि संशोधित पौधों में क्वेरसेटिन जैसे फ्लेवोनॉइड्स की मात्रा काफी बढ़ गई। क्वेरसेटिन को भी अपने एंटीऑक्सीडेंट और सूजनरोधी गुणों (anti-inflammatory quality) के लिए जाना जाता है, और यह कई स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों में पाया जाता है।

इस पूरे प्रयोग की एक और खास बात यह रही कि जीन में इतना बड़ा बदलाव करने के बावजूद पौधे की वृद्धि पर कोई नकारात्मक असर नहीं देखा गया। संशोधित लेट्यूस (modified lettuce) सामान्य लेट्यूस की तरह ही बढ़ी और उसकी पैदावार में कोई फर्क नहीं पड़ा। यह बात विशेष महत्व रखती है, क्योंकि अक्सर किसी जीन में बदलाव करने से पौधे की उत्पादकता प्रभावित होने का खतरा बना रहता है। यहां ऐसा नहीं हुआ, जिससे यह तकनीक व्यावहारिक इस्तेमाल के लिहाज़ से काफी आकर्षक बन जाती है।

यह अध्ययन सिर्फ लेट्यूस के रंग बदलने की कहानी भर नहीं है, यह दिखाता है कि किसी सब्ज़ी के भीतर पोषक तत्वों के संतुलन को सोच-समझकर नियंत्रित किया जा सकता है। अभी तक ऐसा माना जाता रहा है कि लाल लेट्यूस में हरी लेट्यूस के मुकाबले ज़्यादा पॉलीफेनॉल बनाने की क्षमता होती है। इस अध्ययन ने दिखाया कि इसी क्षमता का इस्तेमाल करके अंतिम उत्पाद (एंथोसायनिन) की बजाय, बीच के फायदेमंद यौगिकों (फ्लेवोनॉइड्स) को बढ़ाया जा सकता है, भले ही पत्तियां हरी ही क्यों न दिखें। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तरीका भविष्य में ऐसी सब्ज़ियां विकसित करने में मदद कर सकता है, जिनका पोषण-प्रोफाइल (nutrition-profile) ज़रूरत के हिसाब से कस्टमाइज़ किया जा सके। चूंकि फ्लेवोनॉइड का उत्पादन रोशनी की तीव्रता और तापमान जैसी परिस्थितियों से गहराई से प्रभावित होता है, इसलिए इन परिस्थितियों को सटीक रूप से नियंत्रित करके मनचाहे पोषक गुणों वाली सब्ज़ियां उगाना आसान हो जाएगा।

यह अध्ययन उत्साहजनक तो है, लेकिन यह देखना होगा कि यह जीन-संशोधित हरी लेट्यूस सामान्य हरी किस्मों के मुकाबले पोषण के लिहाज़ से कितनी बेहतर साबित होती है।

इसके अलावा, किसी भी जीनोम संपादित फसल के व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले उसे खाद्य सुरक्षा और नियामक मानकों (food safety & standards) की कसौटी पर परखा जाता है। विभिन्न देशों में जीन-संपादित फसलों को लेकर नियम अलग-अलग हैं, और इससे तय होगा कि यह तकनीक कितनी जल्दी किसानों और उपभोक्ताओं तक पहुंच पाती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जीन को सक्रिय करने वाले जीन की गुत्थी सुलझी

भरत नागेश 

हमारे शरीर की हर कोशिका में मौजूद DNA में लगभग 20 हज़ार से ज़्यादा जीन्स होते हैं, लेकिन हर जीन हर समय सक्रिय नहीं रहता। शरीर का सही ढंग से विकास और कामकाज तभी संभव हो पाता है जब सही जीन, सही समय पर और सही जगह पर ‘ऑन’ हों। तो, यह कौन तय करता है कि कौन सा जीन कब ऑन होगा? इसका जवाब DNA के उन खास हिस्सों में छिपा है जो जीन्स को सक्रिय करने का संकेत देते हैं। अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अब कृत्रिम बुद्धि (AI) की मदद से इसी छिपे हुए ‘जेनेटिक स्विच’ (genetic switch) को डिकोड करने में बड़ी सफलता हासिल की है।

रहस्यमयी इनिशिएटर 

वैज्ञानिकों ने डीएनए के जिस भाग पर शोध किया, उसे इनिशिएटर (initiator) कहते हैं। यह वह जगह है जहां से किसी जीन में मौजूद जानकारी को प्रतिलेखन-अनुलेखन के माध्यम से प्रोटी न या किसी अन्य ज़रूरी अणु में बदलने की प्रक्रिया शुरू होती है। दूसरे शब्दों में कहें, तो इनिशिएटर वह स्टार्ट बटन है, जो तय करता है कि जीन की गतिविधि कहां से शुरू होगी। यह जीन अभिव्यक्ति (gene expression) की पूरी प्रक्रिया की नींव माना जाता है, क्योंकि शरीर में एंज़ाइम, हॉर्मोन और तमाम ज़रूरी प्रोटीन इसी प्रक्रिया के ज़रिए बनते हैं।

अब तक वैज्ञानिकों के लिए यह एक बड़ी पहेली रही है कि आखिर डीएनए की अरबों क्षार-जोड़ियों (base pairs) में इस इनिशिएटर को ठीक-ठीक कैसे पहचाना जाए। इसकी बनावट इतनी जटिल और विविधतापूर्ण थी कि पारंपरिक तरीकों से इसका पूरा पैटर्न समझना मुश्किल हो रहा था।

खोज प्रक्रिया

इस शोध का नेतृत्व कैलिफोर्निया के मॉलीक्यूलर बायोलॉजी विभाग के प्रोफेसर जेम्स टी. कैडोनागा (James T. Kadonaga) और ग्रेजुएट रिसर्चर टॉरी राइन-कैरिग (Torrey Rhyne-Carrigg) ने किया। टीम ने सबसे पहले हाई-थ्रूपुट अनुक्रमण (High-throughput DNA sequencing) तकनीक का इस्तेमाल करते हुए डीएनए के लगभग 5,00,000 अलग-अलग वैरिएंट अनुक्रम तैयार किए और उनकी गतिविधि को मापा। इस तकनीक की मदद से एक साथ बहुत बड़ी संख्या में डीएनए अनुक्रम को तेजी से पढ़ा जा सकता है।

इसके बाद इन आंकड़ों का इस्तेमाल एक मशीन लर्निंग मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए किया गया। इस मॉडल ने लाखों अनुक्रमों का विश्लेषण करके यह सीखा कि इनिशिएटर की पहचान करने वाला क्षार-जोड़ी पैटर्न (base pair pattern) आखिर होता क्या है। यह मॉडल पहली बार मानव जीन्स में इनिशिएटर की उपस्थति या अनुपस्थिति का सटीक अनुमान लगाने में सफल रहा, और लगभग 60 प्रतिशत मानव जीन्स में इस इनिशिएटर को सफलतापूर्वक पहचान लिया गया।

प्रोफेसर कैडोनागा के मुताबिक, यह पहली बार है जब किसी एआई मॉडल ने डीएनए में मौजूद इनिशिएटर की मौजूदगी का इतना मज़बूत और भरोसेमंद अनुमान दिया है। इसके आधार पर डीएनए के इस क्षार अनुक्रम पैटर्न को असल मायनों में डिकोड (decode) किया जा सका।

खोज का महत्व

यह शोध सिर्फ अकादमिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके कई व्यावहारिक और चिकित्सकीय पहलू भी हैं:

1. बीमारियों को समझने में मदद: जब इनिशिएटर जैसे नियामक क्षेत्रों में उत्परिवर्तन होता है, तो जीन की गतिविधि गड़बड़ा सकती है, जिससे कोशिकाओं में खराबी आ सकती है। यह गड़बड़ी कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों से जुड़ी मानी जाती है। अब वैज्ञानिक इस नए मॉडल की मदद से यह अनुमान लगा सकेंगे कि कोई खास उत्परिवर्तन इनिशिएटर को कैसे प्रभावित करेगा और उससे जीन गतिविधि (gene activtiy) में क्या बदलाव आ सकता है।

2. सिंथेटिक प्रमोटर डिज़ाइन करना: इस शोध से मिले आंकड़े भविष्य में सिंथेटिक प्रमोटर डिज़ाइन करने में मदद कर सकते हैं। ये ऐसे कृत्रिम डीएनए अनुक्रम (artificila DNA sequences) होते हैं जिन्हें खास मकसद के हिसाब से जीन्स को चालू या बंद करने के लिए तैयार किया जाता है। इनका इस्तेमाल जीन थेरपी, बायोटेक्नोलॉजी और सिंथेटिक बायोलॉजी जैसे क्षेत्रों में हो सकता है।

3. जीनोम की समझ: मानव जीनोम में सिर्फ जीन्स ही नहीं, बल्कि उन्हें नियंत्रित करने वाले असंख्य नियामक घटक भी मौजूद हैं। इन घटकों को डिकोड करना पूरे जीनोम की भाषा (genome understanding) को समझने की दिशा में एक अहम कदम है।

वास्तविक प्रयोग और कृत्रिम बुद्धि का मेल

डीएनए का यह चालू-बंद स्विच (DNA switch) दशकों से एक पहेली बना हुआ था। इस अध्ययन की सबसे खास बात यह रही कि इसमें पारंपरिक प्रयोगों और कृत्रिम बुद्धि (एआई) की आधुनिक तकनीक, दोनों को साथ लाया गया। पहले वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में बड़े पैमाने पर आंकड़े जुटाए और फिर उस एक एआई मॉडल को इन आंकड़ों के आधार पर प्रशिक्षित किया ताकि वह पैटर्न पहचान सके। यह तरीका भविष्य में जीनोम की अन्य उलझनों को समझने के लिए भी एक मॉडल के तौर पर काम आ सकता है।

आगे की राह

हालांकि इस शोध ने लगभग 60 प्रतिशत मानव जीन्स में इनिशिएटर को पहचान लिया है, फिर भी बाकी बचे जीन्स में इनकी पहचान करना अभी बाकी है। वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य होगा कि वे मॉडल (model) को और बेहतर बनाएं, ताकि बाकी जीन्स में भी इनिशिएटर या उससे मिलते-जुलते नियामक घटकों को खोजा जा सके। इसके अलावा, यह समझना भी ज़रूरी होगा कि अलग-अलग प्रकार की कोशिकाओं और ऊतकों में यह स्विच किस तरह अलग-अलग व्यवहार करता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एक जीन में उत्परिवर्तन का दोहरा प्रभाव

अर्पिता व्यास 

मच्छर मलेरिया सहित कई रोगों का वाहक है। एक अनुमान के मुताबिक 2024 में दुनिया के 80 देशों में मलेरिया के पौने तीन करोड़ से ज़्यादा मामले सामने आए थे और इसकी वजह से 6 लाख से अधिक मौतें हुई थीं। मलेरिया के प्रमुख वाहक मच्छर एनॉफिलीज़ प्रजातियों के होते हैं। मलेरिया पर नियंत्रण का एक प्रमुख तरीका मच्छरों पर नियंत्रण का रहा है। इसके लिए कीटनाशकों (insecticide) का व्यापक उपयोग भी किया गया है।

1950 के दशक में मलेरिया की रोकथाम के लिए डाइएल्ड्रिन नामक कीटनाशक का छिड़काव किया गया था। यह एनॉफिलीज़ मच्छर को मारता था। लेकिन कुछ ही सालों में इसका असर होना बंद हो गया क्योंकि डाइएल्ड्रिन छिड़काव के बाद वही मच्छर जिंदा बचे जिनमें Rdl (resistance to dieldrin) जीन में उत्परिवर्तन मौजूद था और उनकी संख्या बढ़ने लगी। प्रतिरोध पैदा हो जाने के कारण डाइएल्ड्रिन का उपयोग बंद कर दिया गया। साथ ही डाएल्ड्रिन की विषाक्तता को लेकर चिंताएं भी बढ़ गई थीं।

दशकों बाद भी मच्छरों में इनमें से एक उत्परिवर्तन बना रहा। क्योंकि इस उत्परिवर्तन का एक असर यह भी था कि यह इन मच्छरों को डाइएल्ड्रिन के अलावा अन्य कीटनाशकों के खतरे से भी सुरक्षा प्रदान करता था। Rdl मच्छरों में डाइएल्ड्रिन एक रिसेप्टर (GABA receptor) पर काम करता है। अन्य कई कीटनाशक भी इसी रिसेप्टर को निशाना बनाते हैं। लेकिन साथ ही यह उत्परिवर्तन उनकी सक्रियता को कम करता था।

अब एक नए अध्ययन ने इस मामले में और प्रकाश डाला है। अपने मूल रूप में Rdl कई जंतुओं की संवेदनाओं को मंद करता है। यह देखा गया कि एनॉफिलीज़ मच्छरों में यह उनकी आवाज़ के प्रति संवेदना को मंद करता है। लेकिन उत्परिवर्तन के बाद इसकी यह भूमिका जाती रही और परिणामस्वरूप उत्परिवर्तित Rdl वाले मच्छर आवाज़ों के प्रति अधिक संवेदनशील (auditory sensitivity) हो गए।  गौरतलब है कि मच्छर संभोग के लिए साथी की तलाश के लिए मुख्यत: ध्वनि संकेतों का सहारा लेते हैं। नर मच्छर मादा के पंखों की हल्की फड़फड़ाहट पर ध्यान देकर साथी ढूंढते हैं। ध्वनि संवेदना बढ़ जाने पर वे शहरी इलाकों के शोर में भी अपने लिए साथी ढूंढ लेते हैं। यानी यह उत्परिवर्तन ज़हर से तो बचाता ही है, साथी ढूंढने में भी मददगार (mating advantage) होता है।

स्पैनिश नेशनल रिसर्च काउंसिल की न्यूरोबायोलॉजिस्ट मार्टा एंड्रेस ने इसकी जांच करने के लिए प्रयोग किए। उन्होंने अपने प्रयोगों में पाया था कि Rdl वह जीन है जिसमें उत्परिवर्तन से डाइएल्ड्रिन-प्रतिरोध (dieldrin resistance) पैदा होता है। यह जीन मूल रूप में मच्छर की श्रवण तंत्रिकाओं की सक्रियता को कम करता है। Rdl में उत्परिवर्तन होने से श्रवण तंत्रिकाएं ज़्यादा क्रियाशील हो जाती हैं। यानी वे मादा मच्छरों के पंखों की फड़फड़ाहट की ध्वनि को बेहतर सुन पाते हैं। बारी आई प्रयोगशाला में अध्ययन की।

उन्होंने एक स्पीकर से 300–550 हर्ट्ज़ आवृत्ति की आवाज़ पैदा जो मादा के पंखों की फड़फड़ाहट के लगभग समान थी। प्रयोग में देखा गया कि Rdl उत्परिवर्तित (Rdl mutated mosquitoes) नर मच्छरों की स्पीकर पर पहुंचने की संभावना अपेक्षाकृत ज़्यादा थी।

लेकिन मादा को खोज लेने का मतलब यह नहीं माना जा सकता कि नर उनके साथ संभोग (successful mating) में भी सफल होंगे। इसकी जांच के लिए शोधकर्ताओं ने 25 नर मच्छरों को 25 मादाओं के साथ छोटे पिंजरों में रखा, फिर उन्हें 48 घंटे के लिए दो अलग-अलग इनक्यूबेटर में रखा – एक में शोर 70 डेसीबल का था और दूसरे में 93 डेसीबल का (लगभग शहरों जैसा) था। दोनों परिस्थितियों उत्परिवर्तित मच्छरों में तो संभोग लगभग बराबर (40 प्रतिशत) रहा जबकि गैर-उत्परिवर्तित मच्छरों में यह दर ज़्यादा शोर वाले इन्क्यूबेटर में घटकर 33 प्रतिशत रह गई।

इस प्रयोग से स्पष्ट निष्कर्ष निकालने में एक समस्या यह है कि मच्छरों और हम मनुष्यों में ध्वनि संवेदना के ढंग थोड़े अलग-अलग हैं। जहां मनुष्य मूलत: ध्वनि स्रोत से उत्पन्न दबाव की तंरगों का सहारा लेते हैं, वहीं मच्छर ध्वनि स्रोत के आसपास कणों के कंपनों को भांपते हैं। इस वजह से दोनों मामलों में शोर को परिभाषित करने में अंतर होगा।

शोधकर्ताओं ने अपने निष्कर्षों की जांच वास्तविक परिस्थिति में भी की है। उन्होंने पाया कि शोरगुल वाले परिवेश में उत्परिवर्तन की दर ज़्यादा थी। और तो और, जिन मादाओं में यह उत्परिवर्तन नहीं था उनमें संभोग करने की संभावना ग्रामीण क्षेत्रों की अपेक्षा शोर भरे शहरों में कम थी। अलबत्ता, सीधे-सीधे कोई निष्कर्ष निकालना मुश्किल है क्योंकि शहरी और ग्रामीण परिवेश में और भी कई अंतर होते हैं।

कीटनाशक का उपयोग समाप्त होने के लंबे समय बाद भी उत्परिवर्तन की निरंतरता का अध्ययन करना महत्वपूर्ण है क्योंकि इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यदि हम कुछ समय के लिए किसी कीटनाशक का उपयोग करते हैं और जेनेटिक बदलाव (genetic modifications) कर देते हैं, तो जीवों की शारीरिक क्रिया में परिवर्तन आ जाता है। यह वास्तव में पारिस्थितिकी तंत्र में संतुलन बिगाड़ देता है। यहां एक और महत्वपूर्ण जानकारी मिलती है: एक जीन में होने वाले परिवर्तन दो अलग-अलग तरह के प्रभाव दर्शा सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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इस वर्ष के इगनोबेल हकदार

प्रतिका गुप्ता

नोबेल पुरस्कार (nobel prize) से तो सभी वाकिफ हैं। यह विज्ञान के क्षेत्र में संजीदगी से किए गए अहम शोधकार्य के लिए दिया जाता है, जिसमें सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ-साथ वैज्ञानिकों को गोल्ड मेडल और लगभग 10 लाख डॉलर की राशि भी मिलती है। यह भी सर्वमान्य है कि डीएनए की संरचना का खुलासा करना शोध का एक महत्वपूर्ण विषय है। लेकिन क्या आपको लगता है कि नाक छिनकना भी शोध का विषय हो सकता है?

नोबेल पुरस्कार के विपरीत, इगनोबेल पुरस्कार उतनी ही संजीदगी से किए गए ऐसे शोधकार्यों के लिए दिए जाते हैं जो पहले पल में तो लोगों को गुदगुदाते हैं लेकिन दूसरे ही पल लोगों को विचार करने पर मजबूर करते हैं। वास्तव में, इगनोबेल (Ig Nobel) पुरस्कार ‘ignoble’ शब्द पर तंज है जिसका मतलब होता है अप्रतिष्ठित। लेकिन, इगनोबेल पुरस्कार पाने वाले को भी काफी प्रतिष्ठा मिलती है, भले ही नकद राशि न मिलती हो। ये पुरस्कार इस बात को रेखांकित करते हैं कि महज भारी-भरकम और संजीदा लगने वाले विषय ही अहम नहीं होते और सिर्फ उन्हीं पर संजीदगी से शोधकार्य नहीं किए जाते, बल्कि हमारे मन में उठने वाले छोटे-छोटे सवाल भी उतने ही अहम होते हैं और उनके जवाब उतनी ही संजीदगी (scholarly diligence) से खोजना होते हैं।

इस वर्ष भी एनल्स ऑफ इंप्रॉबेबल जर्नल ने 10 क्षेत्रों में इन शोधकार्यों को इगनोबेल के सम्मान से नवाज़ा है। खुद देखिए कि बात कहां से निकलकर कहां तक पहुंच सकती है।

1. बायोमैकेनिक्स: चुंबन की वैज्ञानिक परिभाषा

इस वर्ष बायोमैकेनिक्स का इगनोबेल पुरस्कार मैटिल्डा ब्रिंडल, कैथरीन टैलबोट और स्टुअर्ट वेस्ट को चुंबन की एक सटीक वैज्ञानिक परिभाषा (kissing definition) देने के लिए मिला है। इस परिभाषा के अनुसार “चुंबन एक ऐसी गैर-आक्रामक क्रिया है जिसमें एक ही प्रजाति के जीवों के बीच मुंह-से-मुंह (या होंठ-से-होंठ) का सीधा संपर्क हो, होंठो/मुंह में कुछ हलचल हो और यह संपर्क या हलचल भोजन के खाने-खिलाने के लिए न हो।” न सिर्फ मनुष्यों बल्कि कई प्रजातियों में इस तरह का व्यवहार देखा गया है जिसमें दो जीवों के बीच मुंह से मुंह का संपर्क होता है; चुंबन को सटीक रूप से परिभाषित करने से इसे विभिन्न प्रजातियों के बीच बेहतर समझा जा सकेगा और इसके उद्भव और कारणों के बारे में सोचा जा सकेगा। शोधकर्ताओं की उक्त परिभाषा के अनुसार अब तक ज्ञात जीवों में ध्रुवीय भालू, कुछ पक्षी, चींटियां और कुछ अन्य प्राइमेट भी चुंबन करते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाने की कोशिश की कि यह व्यवहार कब विकसित हुआ। उन्होंने पाया है कि यह व्यवहार लगभग 2.5 करोड़ साल पहले वानरों (एप्स) के पूर्वजों से आया है। अब समझना बाकी है कि इस व्यवहार की भूमिका क्या है।

2. अर्थशास्त्र: अमीरी और अनैतिक व्यवहार 

अर्थशास्त्र का इगनोबेल पुरस्कार पॉल पिफ और उनके साथियों को उस शोध के लिए मिला है जिसमें उन्होंने सामाजिक-आर्थिक स्थिति और अनैतिक व्यवहार के बीच सम्बंध की पड़ताल की है। उन्होंने पाया कि गरीबों की तुलना में अमीर लोग (wealthy people) अधिक अनैतिक व्यवहार करते हैं। ये निष्कर्ष उनके द्वारा किए गए सात अध्ययनों के आधार पर दिए गए हैं। पहले दो अध्ययनों में उन्होंने इन दोनों वर्गों के लोगों का व्यवहार चौराहे पर वाहन चलाते समय देखा; उन्होंने पाया कि अमीर लोग चौराहे पर अपनी बारी आने के पहले ही दूसरे वाहनों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। तीसरे अध्ययन में प्रतिभागियों को कुछ परिस्थितियां देकर उन पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई – अमीर लोगों ने अधिक अनैतिक निर्णय लिए। चौथे अध्ययन में सिर्फ और सिर्फ बच्चों के लिए रखी कैंडी को अमीरों की भूमिका निभा रहे प्रतिभागियों ने अधिक लिया। पांचवे अध्ययन में बातचीत के दौरान अपनी बात मनवाने के लिए झूठ बोलने की प्रवृत्ति अमीरों में अधिक दिखी। छठवे अध्ययन में खेल जीतने के लिए चीटिंग करने का व्यवहार अमीरों में अधिक दिखा। और सातवें अध्ययन में कार्यस्थल पर अमीर अधिक अनैतिक व्यवहार (unethical behaviour) करते पाए गए।

3. रसायन विज्ञान: प्रोटीन से भरपूर कॉकरोच का दूध

रसायन विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध के लिए मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने बताया कि Diploptera punctata नामक कॉकरोच का दूध (cockroch milk) गाय के दूध से भी तीन गुना अधिक पौष्टिक है। यह कॉकरोच आम घरों में मिलने वाले कॉकरोच से अलग है और अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देता है। दरअसल, मादा कॉकरोच अपने शरीर में विकसित हो रहे भ्रूणों को एक विशेष पोषक तरल से भोजन देती है। भ्रूण जब इस तरल को ग्रहण करते हैं तो उनकी आंत में यह प्रोटीन, वसा और शर्करा से भरपूर छोटे-छोटे क्रिस्टलों के रूप में जमा हो जाता है। ये क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलकर बढ़ते भ्रूण को पोषण देते हैं।

2016 में भारतीय और फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी की मदद से इन क्रिस्टलों की संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि यह तरल अत्यधिक पौष्टिक है: यह गाय के दूध की तुलना में तीन गुना से अधिक पोषण और ऊर्जा दे सकता है। घबराइए नहीं, वैज्ञानिक सीधे इस दूध उपयोग मनुष्य के इस्तेमाल के लिए नहीं सोच रहे हैं, बल्कि इसके घटकों के आधार पर पोषक पेय (nutritious drink) तैयार करने का विचार है।

4. चिकित्सा: नाक कैसे छिनकें

चिकित्सा का इगनोबल पुरस्कार जापानी चिकित्सक टोकुजी उन्नो के 1977 के उस अध्ययन के लिए मिला है जिसमें उन्होंने बताया था कि नाक कैसे साफ करें। रोज़ाना नाक की सफाई श्वासनली और फेफड़ों के संक्रमण के जोखिम को कम करती है, और जब सर्दी-ज़ुकाम होता है तो नाक तो छिनकनी पड़ती है। उन्नो यही जानना चाह रहे थे कि किस तरह नाक की सफाई (nostril hygiene) स्वस्थ रहने में मदद कर सकती है। इसके लिए उन्होंने देखा कि कितनी तेज़ी और ताकत से हवा बाहर करने पर, एक बार में एक नथुने से छिनकने पर, या दोनों नथुनों से छिनकने पर नाक की सफाई में क्या अंतर पड़ता है। उन्होंने यह सब 14 से 48 वर्ष की आयु के 15 लोगों पर करके देखा। नाक से निकलने वाली हवा की गति मापने के लिए दो न्यूमोटैकोमीटर (pnuemotachometer) लगाए गए और नाक से निकली हवा की मात्रा तथा समय भी दर्ज किया गया। साथ ही कान की बाहरी नलिका में दबाव परिवर्तन को एक कैथेटर और संवेदनशील प्रेशर ट्रांसड्यूसर से मापा गया। उन्होंने पाया कि दोनों नथुने खुले रखते हुए नाक साफ करने की बजाय एक बार में एक नथुने को खुला रखकर नाफ साफ करने से ज़्यादा अच्छे से सफाई होती है।

5. जीव विज्ञान: सांप कब काट सकता है

यह तो कहा ही जाता है कि सांप तभी काटता है जब आपका पैर उस पर पड़ जाए। जीव विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन के लिए दिया गया जिसमें शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि विषैले सांप पर पांव कहां पड़ने पर उसके द्वारा काटने की संभावना अधिक होती है। उन्होंने ब्राज़ील के विषैले सांप पिट वाइपर (pit viper snake) के व्यवहार का अध्ययन किया और उसकी लंबाई, लिंग, उम्र, तापमान, दिन का समय तथा मनुष्य द्वारा दी गई उत्तेजनाओं जैसे कारकों को देखा। प्रयोगों में सांपों के साथ नियंत्रित मानव-संपर्क की परिस्थितियां बनाई गईं और यह देखा गया कि कहां पांव पड़ने पर सांप रक्षा के लिए काटता (defensive snakebite) है। पाया गया कि सिर पर पांव पड़ने पर काटने की संभावना लगभग 44 प्रतिशत थी, शरीर के बीच के हिस्से पर 20 प्रतिशत और पूंछ पर 11 प्रतिशत थी। छोटे सांपों, विशेषकर नवजातों में काटने की प्रवृत्ति भी अधिक पाई गई। हालांकि पशु-नैतिकता सरोकारों के चलते इस अध्ययन को साइंटिफिक रिपोर्ट्स ने फरवरी 2025 में वापस ले लिया।

6. भौतिकी: छींटे-मुक्त युरिनल 

भौतिकी का इगनोबेल पुरस्कार ऐसे युरिनल डिज़ाइन (splash-free urinal design) करने के लिए दिया है जिससे आसपास फैलने वाले छींटे और गंदगी न के बराबर फैलें। शोधकर्ताओं ने ऐसा अनुभव किया था कि कितनी भी सावधानी से युरिनल में पेशाब की जाए, आसपास के फर्श पर छींटे फैल ही जाते हैं और सार्वजनिक शौचालयों की सफाई का मुद्दा बना रहता है। यदि सफाईकर्मी हर व्यक्ति के जाने के बाद सफाई करते रहें तो यह उनके लिए भी थकाऊ होता है, और सफाई बरकरार रखने में संसाधन, पैसा और ऊर्जा भी लगती ही है। इसी के समाधान में उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि छींटे छिटककर बाहर आते ही क्यों हैं और इस आधार पर नए युरिनल डिज़ाइन पेश किए; इन डिज़ाइन का नाम उन्होंने नॉटी-लू (Nauti-Loo), कॉर्नुकोपिया (Cornucopeea) और यूरिन-नो (Urine-no) नाम दिए हैं। इसके लिए उन्होंने किसी तरल के सतह से टकराने के कोण और छींटों के उचकने के बीच के सम्बंध का गणितीय मॉडल बनाया और पाया कि किसी सतह पर किसी तरल की जितनी सीधी धार (90 डिग्री के कोण से) पड़ेगी छींटे उतने ज़्यादा छिटकते हैं, सतह पर धार यदि कम कोण (30 डिग्री से कम) से टकराए तो छींटे कम उछलते हैं। इसके आधार पर उन्होंने तिरछी सतहों वाले तीन युरिनल डिज़ाइन तैयार किए और उनका परीक्षण किया। नई डिज़ाइनों से प्रचलित युरिनल की तुलना महज़ 1.4 प्रतिशत छींटे बाहर आए।

7. तकनीक: मच्छर की सूंडी से 3-डी प्रिंटिंग

तकनीक का इगनोबेल पुरस्कार वैज्ञानिकों की उस कोशिश को मिला जिसमें मरी हुई मादा मच्छर की सूंड को 3-डी प्रिंटर की बेहद सूक्ष्म नोज़ल के रूप में इस्तेमाल किया गया। मच्छर की सूंड बहुत पतली होने के साथ काफी मज़बूत भी होती है। कई कीटों के सूंड (मुखांगों) की संरचना और यांत्रिक गुणों की तुलना करने पर मादा मच्छर की सूंड सबसे उपयुक्त लगी। उन्होंने प्रयोगशाला में पाले गए मृत मच्छरों से सूंड अलग करके डिस्पेंसिंग नोज़ल से जोड़ा और डायरेक्ट-इंक-राइटिंग 3-डी प्रिंटर (direct-ink-writing 3-D printer) में लगाया और अलग-अलग गति संयोजन से प्रिंट करके देखा। उन्होंने पाया कि इस नोज़ल व्यवस्था से लगभग 20 माइक्रोमीटर पतली लकीरें प्रिंट की जा सकती हैं, जो आम व्यावसायिक नोज़लों की तुलना में काफी पतली लकीरें हैं।

8. घ्राण विज्ञान: संतान की गंध 

घ्राण विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन को मिला है जिसमें शोधकर्ताओं ने यह जांचा कि माता-पिता अपनी संतानों के शरीर की गंध को अलग-अलग उम्र में किस तरह महसूस करते हैं। पोलैंड में किए गए अध्ययन में 235 माता-पिता ने कुल 367 संतानों के शरीर की गंध की सुखदता (pleasing body odor) का आकलन किया। संतानों की उम्र एक महीने से 35 वर्ष तक थी। प्रतिभागियों ने अपनी संतानों की गंध को 0 से 20 के पैमाने पर बेहद बुरी से बहुत अच्छी तक अंक दिए। शोधकर्ताओं ने संतानों की उम्र, माता-पिता और संतान का लिंग, साथ बिताया समय तथा माता-पिता और-संतान के बीच सम्बंध जैसे कारकों को भी विश्लेषण में शामिल किया। पाया गया कि संतान की उम्र बढ़ने के साथ उसके शरीर की गंध को सुखद मानने की प्रवृत्ति घटती गई। शिशुओं की गंध को 93.7 प्रतिशत माता-पिता ने सुखद या बहुत सुखद बताया, जबकि किशोरावस्था से बड़ी संतानों के लिए यह आंकड़ा 75.2 प्रतिशत था। शोधकर्ताओं का कहना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच सम्बंधों में गंध की भूमिका हो सकती है।

9. शांति: दुश्मन का दुश्मन दोस्त क्यों

शांति का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध को मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने दोस्ती और दुश्मनी के बीच एक दिलचस्प सामाजिक मनोविज्ञान का अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं ने छह अध्ययनों में कुल 1183 प्रतिभागियों से पूछा कि वे अपने आदर्श दोस्त (ideal friend) में क्या गुण चाहते हैं। प्रतिभागी अमेरिका और भारत के छात्र तथा सामान्य समुदाय के थे। उनसे यह भी पूछा गया कि उनका दोस्त उनके साथ, किसी अजनबी के साथ या उनके दुश्मन के साथ कैसा व्यवहार करे तो उन्हें ठीक लगेगा। सामान्य स्थिति में लोगों ने दयालु और भरोसेमंद दोस्त को अधिक पसंद किया। लेकिन जब सवाल किसी दुश्मन के प्रति व्यवहार का था, तो तस्वीर बदल गई। कुछ प्रतिभागियों ने ऐसे दोस्त को पसंद किया जो उनके दुश्मन के प्रति थोड़ा रूखा और सख्त रवैया रखते हों। शोधकर्ताओं ने इसे “embedded dyad” यानी दोस्ती को व्यापक सामाजिक नेटवर्क के भीतर देखने के दृष्टिकोण से समझाया। कोई दोस्त केवल हमारे साथ ही ताल्लुक नहीं रखता बल्कि वह हमारे प्रतिद्वंद्वियों से भी मिलता-जुलता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर हम पर पड़ सकता है।

10. मृदा विज्ञान: जांघियों से मिट्टी की सेहत 

मृदा विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार मिट्टी में दबाए गए सूती जांघियों और टी-बैग्स के ज़रिए मिट्टी की जैविक सक्रियता और गुणवत्ता (soil biological activity & quality) का अध्ययन करने के लिए मिला है। विचार सरल था: मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव जितने सक्रिय होंगे, सूती कपड़े जैसे जैविक पदार्थ की अपघटन गति उतनी ही तेज़ होगी। शोधकर्ताओं ने शौकिया वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे मानकीकृत सूती जांघिए और टी-बैग्स वगैरह अपने आसपास की विभिन्न तरह की मिट्टियों (जैसे बाग-बगीचे, मैदान, खेत आदि) में गाड़ दें और लगभग दो महीने बाद उन्हें निकालें, ताकि यह देखा जा सके कि कपड़ा कितना सड़-गल गया और कितना बाकी है। दुनिया भर के  लगभग 1000 शौकिया वैज्ञानिकों ने 2000 से अधिक जांघिए और हज़ारों टी-बैग्स दफनाए। पाया गया कि निजी बगीचों, जहां पेड़-पौधों की प्रजातियों में विविधता थी, में कपड़ा सबसे अधिक तेज़ी से अपघटित हुआ, जबकि लॉन (जिस पर सिर्फ एक तरह के पौघे – हरी घास या दूब – उगी थी) में अपघटन (decomposition) धीमी गति से हुआ। मिट्टी की गुणवत्ता के लिहाज़ से यह अहम है।

चलते–चलते

विगत 3 सितंबर को स्विट्जरलैंड के ज़्यूरिख में इस वर्ष के इगनोबेल पुरस्कार दिए गए। अपने 36 वर्ष के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब एनल्स ऑफ इंप्रोबेबल ने यह समारोह बोस्टन के बाहर आयोजित किया गया। इसका कारण पिछले दो वर्ष का अनुभव रहा: विगत दो सालों में अमेरिका में सख्त किए गए वीज़ा नियमों और विभिन्न देशों के बीच चल रहे युद्ध एवं संघर्ष के चलते कई विजेता चाहकर भी समारोह में शामिल नहीं हो पा रहे थे। और, इगनोबेल पुरस्कार के संस्थापक मार्क अब्राहम्स (mark abrahams) के लिए यह चिंता का विषय था कि यह समारोह जो हल्के-फुल्के और मज़ेदार अंदाज़ में सम्पन्न होता है उस पर संघर्ष और नीतियां हावी हो रही हैं, विजेता शामिल नहीं हो पा रहे हैं और मेहमानों के लिए देश का दौरा करना असुरक्षित हो गया है।

इस वर्ष विजेता तो शामिल हो ही पाए, साथ ही समारोह में नोबेल पुरस्कार विजेता एशर डफलो, अभिजीत बनर्जी, मिशेल मेयर एवं टिम हंट भी शामिल रहे जिन्होंने इगनोबेल पुरस्कार विजेताओं को मशरूम-आकार की ट्रॉफी दी। आमंत्रित अतिथियों ने 24/7 की तर्ज पर व्याख्यान भी दिए: तयशुदा विषय पर पहले तो 24 सेकंड में और फिर 7 शब्दों में विषय समझाया गया। समारोह की शुरुआत ‘लैबोरेटरी ऑफ स्मॉल डिसास्टर’ की थीम पर डांस परफॉर्मेंस हुई, फंजाई थीम पर ओपेरा संगीत (fungi themed opera)सम्पन्न हुआ, और समारोह का समापन दर्शकों ने कागज़ के हवाई-जहाज़ उड़ाकर किया। हर इवेंट की शुरुआत फोर-पीस ऑर्केस्ट्रा द्वारा की गई, और विजेताओं की वेशभूषा उनके शोध विषय से सम्बंधित थी।

अगले वर्ष ये पुरस्कार बेल्जियम के एंटवर्प (antwerp) में 5 सितंबर को दिए जाएंगे। आप यदि दर्शकों में शामिल होना चाहें तो मई में टिकट बुकिंग उनकी वेबसाइट पर प्रारंभ होगी। और, आप चाहें तो किसी मज़ेदार लेकिन संजीदा शोध को अगले वर्ष के लिए नामित (nominate) भी कर सकते हैं, क्या पता आपका नामित शोध पुरस्कार पा जाए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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समन्वित सार्वभौमिक समय UTCको बदलने का प्रस्ताव

लीप ईयर, अधिक मास वगैरह के बारे में सुनते रहते हैं। यह भी स्पष्ट है कि ऐसी व्यवस्थाएं सूर्य-चंद्रमा की आभासी गति और समय मापन की अपनी प्रणाली के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए ज़रूरी होती हैं। लेकिन आजकल के उपकरणों/यंत्रों का कामकाज समय के अत्यंत सटीक मापन पर टिका होता है। इसके लिए 1963 में परमाणु घड़ियों (nuclear clock) पर आधारित समय मापन को मानक निर्धारित किया गया था। लेकिन…

हमें इस समय मानक का तालमेल पृथ्वी की गति से बनाकर रखना ज़रूरी होता है। जब यह समय मानक (समन्वित सार्वभौमिक समय – UTC) निर्धारित किया गया, उसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति धीमी पड़ती गई। परमाणु घड़ियां तो अपनी रफ्तार से चलती रहीं और पृथ्वी की गति से निर्धारित दिवस और परमाणु घड़ी से निर्धारित दिवस की अवधि में अंतर आने लगा। इनका तालमेल बनाए रखने के लिए सबसे पहले 1972 में अंतर्राष्ट्रीय भार व माप ब्यूरो (BIPM) ने UTC में एक सेकंड जोड़ा था। इसे लीप सेकंड (Leap second) कहते हैं। एक बार फिर, लेकिन…

यह जुगाड़ प्राय: समस्यामूलक रहा है। लीप सेकंड जोड़ने से कंप्यूटर प्रणालियों पर काफी असर होता है क्योंकि यहां संदेश भेजने और प्राप्त करने का समय एकदम सटीक होना ज़रूरी है। लीप सेकंड जोड़ने के कई असर देखे गए हैं।

1972 से शुरू करके अब तक 27 लीप सेकंड जोड़े जा चुके हैं। अंतिम लीप सेकंड 2016 में जोड़ा गया था। इसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति एक बार फिर रफ्तार पकड़ने लगी है। इसके चलते 2016 के बाद लीप सेकंड नहीं जोड़ा गया है। और, अब पता चला है कि पृथ्वी की घूर्णन गति (earth’s rotation) में वृद्धि काफी तेज़ रही है। बात यहां तक पहुंची है कि दुनिया के समयपाल ऋणात्मक लीप सेकंड जोड़ने पर विचार करने लगे हैं। पता नहीं, ऐसा करने के क्या असर होंगे।

दरअसल, हर चार वर्षों में भार और माप के आम सम्मेलन में दुनिया भर के समयपाल (global timekeepers) जुटकर UTC पर विचार करते हैं। 2022 में 64 सदस्य राष्ट्र इस बात पर सहमत हो गए थे कि UTC और पृथ्वी की स्थिति के बीच जो अंतर आ रहा है, उसे 2035 तक 1 सेकंड से ज़्यादा होने तक चलने दिया जाए।

अलबत्ता, ताज़ा अनुमान बताते हैं कि ऋणात्मक लीप सेकंड की ज़रूरत शायद 2035 से पहले ही पड़ने वाली है। 2026 का अंतर्राष्ट्रीय भार और माप सम्मेलन अक्टूबर में प्रस्तावित है। यहां संभवत: लीप सेकंड की बजाय लीप घंटे (leap hour) की बात उठेगी क्योंकि कई विशेषज्ञों का मत है कि लीप घंटा जोड़ने की ज़रूरत शायद सैकड़ों वर्षों में एक बार पड़ेगी। कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि निर्णय जल्दी करना होगा क्योंकि यदि और इन्तज़ार किया तो मुमकिन है कि 2035 में ऋणात्मक लीप सेकंड (negative leap second) जोड़ना ही पड़े। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पांच करोड़ वर्ष पहले की जंगल गाथा              

डॉ. किशोर पंवार

इन दिनों ग्लोबल वार्मिंग की चर्चा कुछ ज़्यादा ही हो रही है और तरह-तरह के पर्यावरणीय खतरों की बातें अलग-अलग प्लेटफॉर्म पर होती रहती हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि ग्लोबल वार्मिंग हमारी पृथ्वी के इतिहास में पहली बार हो रहा है। जियोलॉजिकल इतिहास (geological history) को देखें तो पता चलता है कि ऐसा पूर्व में भी हो चुका है; इस धरा पर हमारे पदार्पण से करोड़ों वर्षों पहले। यह घटना लगभग पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व जिस काल खंड में घटी थी उसे पैलियोसीन-इयोसीन थर्मल मैक्सिमम (पीईटीएम) (Paleocene-eocene thermal maximum- PETM) कहा गया है। पृथ्वी के इतिहास में 6.6 करोड़ से 5.6 करोड़ वर्ष पूर्व की अवधि को पैलियोसीन युग और 5.6 करोड़ से 3.39 करोड़ वर्ष पूर्व की अवधि को इयोसीन युग कहा जाता है।

हाल ही में अमेरिका में जीवाश्म वैज्ञानिकों के एक दल ने उस कालखंड के वनों के घनेपन (Forest density) के बारे में बहुत ही शानदार जानकारी उपलब्ध कराई है। यह आश्चर्यजनक है कि जब हम नहीं थे, उस अतीत के बारे में इतनी विस्तार पूर्वक जानकारी कैसे हासिल की गई। आइए देखते हैं।

यह महती काम सैमुअल ऑश्चिन ग्लोबल सेंटर फॉर आइस एज रिसर्च की रेगन डन, व्योमिंग विश्वविद्यालय में प्रोफसर एलेन कुरानो और उनकी टीम ने किया है। टीम ने व्योमिंग के हैना बेसिन से पीईटीएम से पहले और बाद के सैकड़ों नमूने एकत्र करके उन प्राचीन जंगलों के जीवाश्म प्रमाणों की खोज की। इस जीवाश्म रिकॉर्ड (fossil records) का उपयोग करते हुए उन्होंने उस काल की गाथा को पुनः रचा है। आज से लगभग पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व, पृथ्वी के वन एक महत्वपूर्ण मोड़ पर पहुंच गए थे। वैज्ञानिकों ने अपने अध्ययन के आधार पर बताया है कि पृथ्वी पर ग्रीनहाउस प्रभाव के सबसे तीव्र दौरों में से एक की शुरुआत में तो जंगल ज़्यादा घने और हरे-भरे हो गए थे। लेकिन फिर यह वृक्षावरण झीना होने लगा। वैश्विक तापमान में 6 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि के कारण गर्मी और सूखे ने जंगलों पर दबाव डाला, जिससे बड़ी संख्या में पेड़ नष्ट हो गए। जंगलों की ऊपरी छतरी खुल गई, जिससे ज़मीन पर अधिक सूर्य की रोशनी पड़ने लगी और भूभाग में पानी की गति में बदलाव आ गया।

वैज्ञानिकों ने यह अध्ययन अमेरिका के एक राज्य दक्षिण व्योमिंग (south wyoming) में किया है जहां पर फॉसिल ब्यूट राष्ट्रीय स्मारक स्थित है। यहां पर पांच करोड़ साठ लाख वर्ष पूर्व से लेकर तीन करोड़ चालीस लाख वर्ष पूर्व के जंतुओं और पौधों के शानदार जीवाश्म मिलते हैं।

ऊपरी परत (चंदवा या कैनपी) जंगल की भू-सतह तक पहुंचने वाले प्रकाश की मात्रा, तापमान, जलीय आवास और वन द्वारा संग्रहित की जा सकने वाली कार्बन की मात्रा को नियंत्रित करती है। इस तरह, यह कैनपी और इसका घनापन पारिस्थितिक तंत्र के कार्य करने के तरीके का सबसे स्पष्ट संकेतक बन जाते हैं। वर्तमान जंगलों के घनेपन के आकलन का सर्वोत्तम तरीका लीफ एरिया इंडेक्स (Leaf Area Index – LAI) का है।

लीफ एरिया इंडेक्स

यह पत्तियों के कुल क्षेत्रफल और पेड़ के नीचे की भूमि के क्षेत्रफल का अनुपात है – इसमें नापा जाता है कि पेड़ों का फैलाव कितनी भूमि पर है और उन पेड़ों की पत्तियों का कुल क्षेत्रफल कितना है। यह एक बहुत ही महत्वपूर्ण मापदंड है। यह तो जानी-मानी बात है कि किसी पेड़ पर सारी पत्तियां एक बराबर ऊंचाई पर नहीं लगी होतीं – वे अलग-अलग परतों में जमी होती हैं। इसके अध्ययन को फिलोमेट्री (phyllometry) कहा जाता है। सबसे ऊपर वाली पत्तियों पर भरपूर प्रकाश पड़ता है, निचली पत्तियों पर कम। अंतत: नीचे की ज़मीन जो प्रकाश पहुंचेगा वह इन सारी पत्तियों की रुकावट के बाद ही पहुंचेगा। वनों का घनापन छाया, तापमान, जल हानि और प्रकाश संश्लेषण को प्रभावित करता है।

लेकिन सवाल तो यह है कि साढ़े पांच करोड़ वर्ष पूर्व अस्तित्व में रहे जंगलों का लीफ एरिया इंडेक्स कैसे निकाला जाए।

पुरातन जंगल का लीफ एरिया इंडेक्स

डन, कुरानो और उनके साथियों ने इसी सवाल के जवाब में एक नया तरीका खोज निकाला है। यह देखा गया है कि पत्तियों की कोशिका का आकार (shape of leaf cells) उनके विकास के दौरान प्राप्त धूप की मात्रा को दर्शाता है। उदाहरण के लिए, छाया में उगने वाली पत्तियां धूप की तलाश में फैलते समय लंबी और अधिक चौड़ी कोशिकाएं विकसित करती हैं। वहीं, अधिक धूप में उगने वाली पत्तियां छोटी और गोल कोशिकाएं विकसित करती हैं।

लेकिन इसका अध्ययन तो आजकल की पत्तियों में किया जा सकता है। साढ़े पांच करोड़ वर्ष पूर्व (5 crore yeras ago) जो पत्तियां गिरी होंगी वे तो पूरी तरह सड़-गल गई होंगी। यानी उनकी कोशिकाओं का अध्ययन तो हो नहीं सकता। यहां एक दूसरा सुराग काम आया। यह सुराग था पत्ती की क्यूटिकल के टुकड़े।

पत्ती की सबसे बाहरी जीवित परत (एपिडर्मिस) के ऊपर एक पतली सुरक्षा परत चढ़ी होती है जिसे क्यूटिकल कहते हैं। क्यूटिकल एक अघुलनशील पॉलीमर से बनी होती है। यह जल-अवरोधी गुण (water-resistent quality) प्रदान करती है। इसकी रचना, आकार-प्रकार एपिडर्मिस कोशिकाओं से मेल खाते हैं। अतः क्यूटिकल के अध्ययन से एपिडर्मिस कोशिकाओं की रचना के बारे में खास जानकारी मिलती है। रोचक बात है कि क्यूटिकल का अपघटन करोड़ों सालों तक नहीं होता। पौधों के जीवाश्म अवसादी (तलछटी) चट्टानों में पाए जाते हैं जिनमें ऑक्सीजन का सीमित संचय होता है। इनमें जीवाश्म का संरक्षण अच्छी तरह से हो जाता है। जीवाश्मों में पत्तियों के ये खंडित क्यूटिकल अवशेष संरक्षित हैं।

वैज्ञानिकों ने क्यूटिकल और एपिडर्मिस कोशिकाओं के इस सम्बंध को प्राचीन जंगलों के पुनर्निर्माण के लिए एक उपकरण के रूप में इस्तेमाल किया। इसे सटीक रूप से समझने के लिए, पहले उन्होंने मध्य और दक्षिण अमेरिका के वर्तमान जंगलों से मिट्टी के नमूने लिए, जिनमें विभिन्न सघनता (varied plant density) वाले पेड़ों की एक विस्तृत शृंखला शामिल थी। मिट्टी के प्रत्येक नमूने में कई अलग-अलग पेड़-पौधों द्वारा छोड़ी गई क्यूटिकल पाई जाती है।

क्यूटिकल और एपिडर्मिस (leaf cuticle & epidermis) कोशिकाओं की रचना (गोल बनाम लंबी) की तुलना करने पर स्पष्ट हो गया कि अधिक घनी कैनपी वाले नमूनों में अधिक लंबी कोशिकाएं दिखाई देती हैं, जबकि विरल कैनपी नमूनों में अधिक गोलाकार कोशिकाएं पाई जाती हैं। शोधकर्ताओं ने पेड़ के नीचे की भूमि पर कैमरे लगाए, जिनके मुंह ऊपर की ओर थे। इनमें कैद तस्वीरों से पता चल गया कि भूमि पर कितनी रोशनी पहुंच रही है जो जंगल के घनेपन का द्योतक है। फिर इसका सम्बंध उन्होंने क्यूटिकल की कोशिकाओं से जोड़ा।

क्यूटिकल के आधार पर हज़ारों एपिडर्मिस कोशिकाओं के आकार की तुलना शोधकर्ताओं ने उनके द्वारा वास्तव में आकलित लीफ एरिया इंडेक्स से की। देखा गया कि पत्ती की कोशिकाओं का आकार लीफ एरिया इंडेक्स से और इस प्रकार से जंगल के घनत्व से निकट से संम्बधित है। कोशिकाएं जितनी अधिक लंबी होती हैं, उनके ऊपर वन आवरण उतना ही घना होता है। इस रिश्ते ने लाखों साल पहले व्योमिंग के जंगलों की बनावट का पुनर्निर्माण करने और यह दिखाने में मदद की कि समय के साथ वे कैसे बदलते रहे। (LAI & forest density relation)

पीईटीएम के दौरान वन संरचना में आए बदलावों (forest development changes) को समझना बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे हमें पता चलता है कि वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड की मात्रा बहुत अधिक बढ़ने से पौधों की वृद्धि, बायोमास और उत्पादकता कैसे प्रभावित होती है। अत्यधिक कार्बन डाईऑक्साइड वनों के लिए हानिकारक है क्योंकि इसके साथ होने वाली गर्मी और सूखा पेड़ों पर दबाव डालते हैं और इससे कई पेड़ों की मृत्यु हो जाती है।

इस शोध से पता चलता है कि पीईटीएम के दौरान, वनों की ऊपरी परत अधिक खुली (open canopy) हो गई थी, बड़े पेड़ों की संख्या कम हो गई थी, और इस बदलाव ने जलवायु, पोषक तत्वों के चक्रण, अपक्षय और निश्चित रूप से, वनों में रहने वाले जानवरों को प्रभावित किया।

जंगल: हद कर दी आपने

एक बात यह पता चली कि तीव्र वैश्विक तापमान वृद्धि शुरू होने से ठीक पहले, वनों का घनत्व अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गया था, जो संभवतः वायुमंडल में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा बढ़ने का परिणाम था क्योंकि कार्बन डाईऑक्साइड पेड़-पौधों को प्रकाश संश्लेषण के ज़रिए कार्बोहायड्रेट व अन्य सामग्री के निर्माण में मददगार होती है। लिहाज़ा, वातावरण में अधिक कार्बन डाईऑक्साइड हो, तो प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) ज़्यादा होगा और उनकी वृद्धि भी ज़्यादा होगी।   

लेकिन कार्बन डाईऑक्साइड का एक अन्य असर भी होता है – ग्रीनहाउस प्रभाव (green house effect), जिसके कारण तापमान बढ़ता है। तो वह शुरुआती हरा-भरा जंगल ज़्यादा समय तक नहीं टिक पाया। तापमान बढ़ने के साथ-साथ, गर्मी और सूखे के चलते पेड़ों के मरने से जंगल की ऊपरी परत तेज़ी से झीनी होती गई।

लेकिन 5.6 करोड़ वर्ष पूर्व के प्राचीन जंगलों की कहानी उनके पतन के साथ समाप्त नहीं होती है। समय के साथ, गर्म जलवायु में चट्टानों के विघटन (जिसे अपक्षय कहा जाता है) (rock weathering) की प्रक्रिया ने धीरे-धीरे हवा से कार्बन को खींचकर समुद्री तलछट में जमा कर दिया। इससे एक बार फिर वायुमंडल में कार्बन डाईऑक्साइड में कमी आई, जिसके परिणामस्वरूप जलवायु ठंडी हुई और पानी अधिक आसानी से उपलब्ध हो गया। वन आवरण फिर से विकसित हो गए और अंततः वैश्विक तापमान वृद्धि शुरू होने से पहले की तुलना में और भी अधिक घने हो गए। वनों के विस्तार के साथ, संभवतः मिट्टी को स्थिर करने, जल-चक्र को नियंत्रित करने और वायुमंडल से कार्बन को अवशोषित करने की उनकी क्षमता बहाल हो गई। जब पेड़-पौधे फिर से अधिक कार्बन डाईऑक्साइड सोखने लगे तो ग्रीनहाउस प्रभाव को कम करने और ग्रह के दीर्घकालिक पुनरुद्धार को बढ़ावा देने में मदद मिली। लेकिन इसमें एक लाख वर्षों से भी अधिक समय लगा।

वर्तमान परिदृश्य

इस घटनाक्रम में आज के लिए एक महत्वपूर्ण सबक छिपा है। दुनिया में इस समय कार्बन डाईऑक्साइड की बढ़ती मात्रा पेड़-पौधों की वृद्धि को बढ़ावा दे सकती है, लेकिन केवल तभी जब तापमान और पानी पेड़ों की सहनशीलता की सीमा (saturation limit) के भीतर रहें। एक हद से ज़्यादा गर्मी, सूखा, कीड़े, रोगजनक और जंगल की आग कार्बन डाईऑक्साइड के किसी भी वृद्धिकारक प्रभाव को खत्म कर सकते हैं।

विश्व भर में, तापमान में वृद्धि (temperature increase) के साथ-साथ लकड़ी, फसलों और चारागाहों के लिए वनों की कटाई से जंगलों की सहनशीलता और भी कम हो रही है, जिसके कारण कई जंगलों में पहले से ही कम होने के संकेत दिखने  लगे हैं।

आज, मानव जनित कार्बन उत्सर्जन और वैश्विक तापमान में वृद्धि उस काल की तुलना में कहीं अधिक तेज़ी से हो रही है। जीवाश्म रिकॉर्ड यह तो बताते हैं कि वन पुनर्जीवित (forest restoration) हो सकते हैं, बशर्ते मनुष्य उन्हें उन सीमाओं से आगे न धकेलें, जिनसे उबरने में लाखों वर्ष लग जाते हैं।

इस अध्ययन की प्रमुख शोधकर्ता डन आगे कहती हैं, “पेड़ अद्भुत हैं। जंगल हर दिन करोड़ों टन कार्बन सोखते हैं, लेकिन जब जंगल कम होने लगते हैं, तो कार्बन सोखने वाले सोख्ते भी कम होने लगते हैं। पीईटीएम हमें याद दिलाता है कि जब जंगल कम होते हैं, तो इसके दूरगामी परिणाम पूरे जलवायु तंत्र पर पड़ते हैं। मानव जनित जलवायु परिवर्तन की अभूतपूर्व गति को कम करने में वनों की क्षमता को देखते हुए, इनकी रक्षा और पुनर्स्थापन (forest re-establishment & conservation) करना ही बुद्धिमानी होगी।” (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नेपाल जलवायु परिवर्तन से हुई बर्बादी का मुआवज़ा चाहता है  

प्रमोद भार्गव

दुनिया जलवायु परिवर्तन (climate change) के चलते आज भीषण सूखे, बाढ़, बारिश, अत्यधिक ठंड एवं गर्मी से जूझ रही है। लेकिन अब जलवायु परिवर्तन के चलते नेपाल के भोटकेशी और त्रिशूली में विनाशकारी बाढ़ से जो तबाही हुई है, उसकी आपूर्ति के लिए नेपाल ने मानवीय मदद और दान लेने की बजाय अंतर्राष्ट्रीय मंचों से ‘जलवायु मुआवजा’ (climate compensation) और न्याय देने की मांग उठाना शुरू कर दी है। नेपाल की यह मांग न्यायसंगत है क्योंकि कुल वैश्विक कार्बन डाईऑक्साइड (जलवायु परिवर्तन का प्रमुख उत्तरदायी) उत्सर्जन में नेपाल की भागीदारी मात्र 0.05 प्रतिशत है। यदि सभी प्रकार की ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन को जोड़ लिया जाए, तब भी यह हिस्सेदारी केवल 0.08 प्रतिशत की होती है। अतएव नेपाल का कहना है कि विकसित या विकासशील देशों द्वारा तात्कालिक राहत सामग्री भेजना पर्याप्त नहीं है, इस त्रासदी के लिए ज़िम्मेदार ग्रीनहाउस गैसों के बड़े उत्सर्जक देशों को आर्थिक मुआवज़ा देना होगा। साफ है नेपाल अब जलवायु न्याय और कानूनी मुआवज़े की मांग को प्राथमिकता दे रहा है। 

नेपाल का तर्क है कि वैश्विक कार्बन उत्सर्जन (global carbon emission) में उसकी भागीदारी न्यूनतम है, लेकिन उसे हिमखंड पिघलने के सबसे गंभीर संकट का सामना करना पड़ रहा है। नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र के ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ (loss and damage fund) से 5 अरब डॉलर की तत्काल जलवायु राहत देने की मांग की है। संयुक्त राष्ट्र के इस कोश से जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली क्षति की पूर्ति का प्रावधान है। यह एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक बदलाव का संकेत है। नेपाल ने विश्व समुदाय के सामने बेबाकी से यह बात कही है। इस मांग को रखते हुए नेपाल ने दो टूक शब्दों में यह भी कहा है कि औद्योगिक कार्बन उत्सर्जक देशों में चीन, अमेरिका और भारत इस त्रासदी के लिए उत्तरदायी हैं। इन्हीं के उद्योगों से जो कार्बन उत्सर्जन हो रहा है, उसके प्रभाव से हिमालय के हिमखंड (himalyan glaciers) दुनिया के बाकी हिमखंडों की तुलना में तीन गुना तेज़ी से पिघल रहे हैं।

नेपाल ने चीन से इस बात पर भी नाराज़गी जताई है कि उसने 26 अगस्त को तिब्बत में हिमखंड टूटने (glacier break) की जानकारी समय रहते नहीं दी। इस कारण नेपाल को अपने लोगों को बचाने का समय नहीं मिल पाया।      

धरती पर रहने वाले जीवन पर करीब तीन दशक से जलवायु परिवर्तन के वर्तमान और भविष्य में होने वाले संकटों की तलवार लटकी हुई है। इस संकट से निपटने के उपाय तलाशने की दृष्टि से प्रतिवर्ष जलवायु सम्मेलन (climate summit) होता है। परिचर्चाओं और वाद-विवाद से निकले निष्कर्ष चेताते रहे हैं कि कोयला, तेल और गैस अर्थात जीवाश्म ईंधन इस संकट के दोषी हैं। अतएव इनका उपयोग धीरे-धीरे खत्म करना होगा। लेकिन सहमति बनती नहीं है। विकासशील देश इस बात को लेकर असहमत रहते हैं कि समझौते में जो शर्तें दर्ज रहती हैं, एक तो वे पूरी तरह स्पष्ट नहीं होती, दूसरे उन्हें अमीर देशों की आर्थिक मदद के बिना पूरा करना आसान नहीं होता। इस सम्मेलन का एक ही प्रमुख लक्ष्य था कि दुनिया उस रास्ते पर लौटे, जिससे वैश्विक तापमान वृद्धि को औद्योगिक विश्व के पहले के तापमान से 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित रखा जा सके। 100 से ज़्यादा देश 2030 तक दुनिया की नवीनीकरणीय ऊर्जा को बढ़ाकर तीन गुना करने पर सहमत भी हैं। इसके अंतर्गत अक्षय ऊर्जा के प्रमुख स्रोत सूर्य, पवन और पानी से बिजली बनाने के उपाय सुझाए गए हैं। इस सिलसिले में प्रेरणा के रूप में ऊरुग्वे जैसे देश का उदाहरण दिया जाता है, जो अपनी ज़रूरत की 98 फीसदी ऊर्जा इन्हीं स्रोतों से प्राप्त करता है। लेकिन यह एक अपवाद है; हकीकत यह है कि यूक्रेन और रूस तथा इस्राइल और हमास और अमेरिका व ईरान के बीच चलते भीषण युद्ध के कारण कोयले जैसे जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा उत्पादन बढ़ा है और बिजली उत्पादन के जिन कोयला संयंत्रों को बंद कर दिया गया था, उनका उपयोग फिर से शुरू हो गया है।

दुनिया में चीन सबसे ज़्यादा (30-33 प्रतिशत) कार्बन उत्सर्जित करता है। इसके बाद अमेरिका की भागीदारी करीब 11 से 14 प्रतिशत और भारत की हिस्सेदारी 7 से 8 फीसदी है। 2015 में हुए ऐतिहासिक पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते (Paris agreement) को तब बड़ा झटका लगा था, जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इसे खारिज कर दिया था। तब ये आशंकाएं उठी थीं कि वैश्विक समस्याओं पर अब आगे कोई सहमति शायद नहीं बन पाएगी। फिलहाल तो यह कहना भी मुश्किल है कि नेपाल ने संयुक्त राष्ट्र के ‘लॉस एंड डैमेज फंड’ से 5 अरब डॉलर की जो मांग की है वह उसे मिल ही जाएगी।

अपने औद्योगिक हितों (industrial profits) की चिंता और अमेरिका प्रथम की अवधारणा वाले डोनाल्ड ट्रंप और उनका अमेरिका मानने लगा है कि जलवायु परिवर्तन और बढ़ता वैश्विक तापमान एक खोखली शंका है। वहां देश की जीडीपी दर और आर्थिक संपन्नता घटने की बात भी कही जा रही है। साफ है कि अमेरिका के लिए स्वहित सर्वोपरि है। लेकिन अमेरिका आगे आकर निजी और संयुक्त राष्ट्र के स्तर पर नेपाल की मदद हेतु कोई पहल करे, तभी अन्य देश नेपाल की मदद के लिए आगे आएंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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बदलते मौसम के साथ क्या ततैया खो रही हैं अपनी लय?

कुमार सिद्धार्थ

प्रकृति में ततैया (wasp) की भूमिका केवल डंक मारने वाले कीट की नहीं है। वह परागण में योगदान देने के साथ-साथ प्राकृतिक शिकारी के रूप में कई दूसरे कीटों की संख्या नियंत्रित करने वाले कीट के रूप में भी महत्वपूर्ण है। हाल ही में ब्रिटेन में हुए एक अध्ययन से पता चला कि वर्ष 2025 में ततैयों की संख्या असामान्य रूप से अधिक रही थी, जबकि 2026 की गर्मियों में कई इलाकों में वे बहुत कम दिखाई दीं। वैज्ञानिकों की चिंता है कि मौसम में बढ़ती अनिश्चितताएं इस प्राकृतिक उतार-चढ़ाव को और तेज़ तथा अप्रत्याशित बना सकती हैं।

सवाल यह है कि अगर बदलते मौसम के कारण ततैयों की संख्या और उनके जीवन-चक्र में बदलाव आ रहा है, तो क्‍या इसका असर केवल ततैयों पर पड़ेगा या पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) पर?

अपने देश में ततैयों की विविधता काफी बड़ी (diverse) है। वर्ष 2020 में प्रकाशित भारत में Vespidae परिवार की विस्तृत सूची के अनुसार देश में ततैया परिवार की 288 प्रजातियां, 60 वंश और पांच उपकुल दर्ज किए गए थे। ये प्रजातियां देश के अलग-अलग भौगोलिक क्षेत्रों में पाई जाती हैं।

ततैयों की वास्तविक विविधता इससे भी अधिक हो सकती है, क्योंकि देश के कई हिस्सों में इन पर पर्याप्त अध्ययन नहीं हुआ है। वर्ष 2023 में भारतीय उपमहाद्वीप की ततैयों पर प्रकाशित एक समीक्षा में ततैयों की कम से कम 104 प्रजातियां दर्ज की गई थीं। शोधकर्ताओं ने यह भी रेखांकित किया कि इनकी जैविकी और पारिस्थितिकी के बारे में उपलब्ध जानकारी अभी सीमित (limited knowledge) है।

मौसम से जुड़ा जीवन–चक्र

सामाजिक ततैयों (social wasps) की कॉलोनी की शुरुआत आम तौर पर एक रानी से होती है। मौसम अनुकूल होने पर रानी सुरक्षित जगह तलाशती है, घोंसला बनाती है और शुरुआती कामगारों को जन्म देती है। इसके बाद कामगारों की संख्या बढ़ती जाती है और कॉलोनी विकसित होती है।

मौसम में बदलाव का असर शुरुआती चरण पर पड़ सकता है। तापमान, बारिश, नमी और भोजन की उपलब्धता जैसी परिस्थितियां यह तय कर सकती हैं कि कितनी रानियां सफलतापूर्वक कॉलोनी स्थापित (colony establishment) कर पाएंगी।

वसंत, गर्मी और मानसून का चक्र कई क्षेत्रों में अलग-अलग है। हिमालय, पूर्वोत्तर, पश्चिमी घाट, मध्य भारत और शुष्क पश्चिमी भारत में ततैयों के लिए परिस्थितियां एक जैसी नहीं हैं। लेकिन इससे एक महत्वपूर्ण शोध प्रश्न जरूर निकलता है क्या भारत में भी मौसम की बढ़ती अनिश्चितता ततैयों के प्राकृतिक जीवन चक्र (natural life cycle) को प्रभावित कर रही है या करेगी?

पूर्वोत्तर से पश्चिमी घाट तक

हाल के शोध इस बात का संकेत देते हैं कि ततैयों की विविधता और उनका पर्यावरण (diversity & environment relation) से सम्बंध कितना व्यापक है। वर्ष 2026 में प्रकाशित तवांग, अरुणाचल प्रदेश के एक अध्ययन में 19 प्रजातियां दर्ज की गईं। इसी अध्ययन में अरुणाचल प्रदेश में Vespidae की 73 प्रजातियों और 27 वंशों की सूची तैयार की गई।

पश्चिमी घाट के गोवा क्षेत्र में किए गए एक अध्ययन में वर्ष 2019 के दौरान 231 ततैया नमूनों की पहचान की गई, जो 19 प्रजातियों, 12 वंशों और Vespidae के चार उपपरिवारों से संबंधित थे। वन क्षेत्र में 19 प्रजातियां मिलीं, जबकि कृषि क्षेत्र में 13 प्रजातियां दर्ज हुईं।

असम में गुवाहाटी विश्वविद्यालय परिसर में वर्ष 2022-23 के दौरान किए गए अध्ययन में ततैया और मधुमक्खियों की 23 प्रजातियां दर्ज की गईं। यहां ततैयों की संख्या में मौसमी बदलाव (weather influence) देखा गया और मानसून के महीनों में उनकी उपस्थिति सर्वाधिक रही।

ये आंकड़े बताते हैं कि ततैयों की आबादी मौसम और आवास के साथ बदलती है और अलग-अलग पारिस्थितिक क्षेत्रों (ecosystem areas) में इनका अध्ययन ज़रूरी है।

ततैया हमारी दुश्मन नहीं

ततैया को आम तौर पर मधुमक्खी के मुकाबले कम पसंद किया जाता है। मधुमक्खी से शहद मिलता है, वह परागण (pollination) करती है और कृषि के लिए उपयोगी मानी जाती है। ततैया को अक्सर केवल उसके डंक और उसके घोंसले से जोड़कर देखा जाता है। लेकिन यह तस्वीर अधूरी है।

कई ततैया प्रजातियां दूसरे कीटों का शिकार करती हैं। वे मक्खियों, इल्लियों (कैटरपिलर्स) और दूसरे छोटे कीटों को पकड़कर अपनी संतानों को खिलाती हैं। इस तरह वे प्राकृतिक कीट नियंत्रण (biological insect control) में अहम भूमिका निभाती हैं।

कुछ ततैया परागण में भी योगदान देती हैं। हाल के वर्षों में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में हुए अध्ययनों ने यह दिखाया है कि गैर-मधुमक्खी परागणकर्ताओं को लंबे समय तक अपेक्षाकृत कम महत्व दिया गया है।

मधुमक्खी से अलग है ततैया

ततैया को अक्सर मधुमक्खी समझ लिया जाता है, जबकि दोनों में महत्वपूर्ण अंतर हैं। मधुमक्खियां मुख्यतः फूलों के रस और पराग पर निर्भर रहती हैं और परागण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके विपरीत, ततैयों की कई प्रजातियां दूसरे कीटों का शिकार करती हैं (parasitoids)। मधुमक्खियों का शरीर अपेक्षाकृत रोएंदार होता है, जबकि ततैयों का शरीर चिकना और पतला दिखाई देता है। कई ततैया बार-बार डंक मार सकती हैं, जबकि कामगार शहद मधुमक्खी आमतौर पर डंक मारने के बाद मर जाती है।

कीट नियंत्रण

ततैयों की भूमिका को केवल जैव विविधता के नज़रिए से देखना उपयुक्त नहीं है। कृषि में प्राकृतिक कीट नियंत्रण का महत्व तेज़ी से बढ़ रहा है।

अगर कुछ ततैया प्रजातियां खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाने वाले कीटों का शिकार करती हैं, तो उनकी मौजूदगी किसानों के लिए एक प्राकृतिक (इकॉलॉजिकल) सेवा है। दूसरी ओर, अत्यधिक कीटनाशक इस्तेमाल, आवास का नुकसान और बदलता मौसम इनकी संख्या को प्रभावित कर  सकते हैं।

इसलिए कीट नियंत्रण की ऐसी रणनीति ज़रूरी है जिसमें ‘हानिकारक कीट’ और ‘उपयोगी शिकारी कीट’ के बीच अंतर किया जाए। हर ततैया को नष्ट कर देना कीट नियंत्रण नहीं है। कई बार यह प्राकृतिक नियंत्रण की एक महत्वपूर्ण कड़ी (chains of natural control) को खत्म करना भी साबित हो सकता है।

जलवायु परिवर्तन: असली खतरा

जलवायु परिवर्तन का अर्थ केवल औसत तापमान का बढ़ना नहीं है। मौसम के समय और तीव्रता में बदलाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है। बहुत गर्म दिन, अचानक बारिश, लंबे सूखे, असामान्य ठंड या मानसून के आने-जाने में बदलाव ये सभी उन कीटों के जीवन-चक्र को प्रभावित कर सकते हैं जिनकी गतिविधियां मौसम से गहराई से जुड़ी हैं (weather dependent life-cycle)।

ततैयों के मामले में शुरुआती मौसम विशेष रूप से महत्वपूर्ण हो सकता है। अगर रानियां (queen wasp) ऐसे समय में बाहर निकलती हैं जब भोजन उपलब्ध नहीं है या अत्यधिक गर्मी और बारिश के कारण घोंसला बनाना मुश्किल है, तो उस वर्ष कॉलोनियों की संख्या प्रभावित हो सकती है।

दूसरी ओर, अनुकूल मौसम बड़े पैमाने पर कॉलोनियों के विकास को बढ़ावा दे सकता है।

शोध की कमी चिंता का विषय

भारत में ततैयों की प्रजातियों की सूची तैयार करने का काम हुआ है, लेकिन उनकी आबादी में दीर्घकालीन बदलावों (long term changes) को दर्ज करने वाले व्यवस्थित अध्ययन बहुत कम हैं। इसलिए ततैयों की निगरानी को जैव विविधता की व्यापक निगरानी का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।

स्कूलों, विश्वविद्यालयों, कृषि संस्थानों और विज्ञान कार्यक्रमों के माध्यम से भी ऐसे आंकड़े जुटाए जा सकते हैं। लोग अपने आसपास दिखाई देने वाली ततैयों की प्रजातियों, संख्या, मौसम और स्थान की जानकारी दर्ज कर सकते हैं। इस तरह कई वर्षों में तैयार हुआ आंकड़ा (data) महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।

सवाल सिर्फ ततैयों का नहीं जलवायु परिवर्तन के दौर में प्रकृति के संकेत (nature’s calamatous signals) अक्सर बहुत सूक्ष्म होते हैं। किसी पक्षी का समय से पहले लौटना, किसी पेड़ का असमय फूलना, तितलियों की संख्या में बदलाव या किसी कीट का अचानक कम दिखाई देना, ये सभी बड़े बदलावों की शुरुआती सूचनाएं हो सकते हैं। ततैया भी ऐसा ही एक संकेत हो सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दुनिया में कितनी कीट प्रजातियां हैं

जीव वैज्ञानिकों ने पिछली तीन सदियों के प्रयासों से अब तक करीब 10 लाख कीट प्रजातियां पहचानकर उनका वर्णन किया है। कीट पृथ्वी पर जीवों का सबसे अधिक विविधतापूर्ण समूह (diverse group) है। इनमें आधे मीटर साइज़ की ततैया से लेकर अनाज के दाने के बराबर कीट भी हैं, और पानी में रहने वाले कीटों से लेकर ज़मीन में बिल बनाकर रहने वाले और हवा में उड़ने वाले कीट भी हैं।

अब प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ (यूएस) में प्रकाशित एक नया अध्ययन बताता है कि वैज्ञानिकों द्वारा खोजे गए कीट शायद वास्तविक संख्या (exact insect population) का एक छोटा-सा अंश ही हैं। इस अध्ययन में सांख्यिकी की विधियों का उपयोग करके यह अद्भुत आंकड़ा प्रस्तुत किया गया है कि पृथ्वी पर कीट प्रजातियों की संख्या संभवत: 2 करोड़ तक हो सकती है। यह पूर्व अनुमानों (60 लाख प्रजातियां) से 3 गुना से भी अधिक है।

एक बेहतर अनुमान लगाने के लिए कनेक्टिकट विश्वविद्यालय के कीट वैज्ञानिक रॉबर्ट कोलवेल और उनके साथियों ने कोस्टा रिका गुआनाकास्टे राष्ट्रीय उद्यान में पिछले कई वर्षों में किए गए कीट सर्वेक्षणों (insect survey) से प्राप्त आंकड़ों का अध्ययन किया और फिर इन आंकड़ों पर रोग-प्रसार विज्ञान में प्रयुक्त की जाने वाली सांख्यिकीय विधियों को लागू किया।

शुरुआत में उन्होंने पैरासिटॉइड ततैयों (parasitoid wasps) के एक उपकुल (माइक्रोगैस्ट्रीने) पर गौर किया। पैरासिटॉइड (parasitoid) उन कीटों को कहते हैं जो अपने जीवन चक्र की अपरिपक्व अवस्था में किसी अन्य पर परजीवी होते हैं। इन ततैयों का काफी विस्तृत व बारीकी से अध्ययन किया गया है। वैज्ञानिकों ने कोस्टा रिका (costa rica) में पाई जाने वाली ऐसी 3000 प्रजातियों का वर्णन किया है। तो कोलवेल की टीम ने यह जांच करने की ठानी कि उद्यान में किए गए कीट सर्वेक्षण इन ततैयों की विविधता का प्रतिनिधित्व करते हैं या नहीं।

पिछले कई वर्षों में उद्यान में उड़ने वाले कीटों का सर्वेक्षण करने के लिए वैज्ञानिकों ने जो ट्रैप (शिकंजे) लगाए थे उनमें से मुख्य सेट में माइक्रोगैस्ट्रिने (microgastrinae) की 388 प्रजातियों का ब्यौरा दिया गया। इसके अलावा कुछ अतिरिक्त शिकंजों में 578 प्रजातियों को पहचाना गया। जब वैज्ञानिकों ने उन इल्लियों (कैटरपिलर) पर गौर किया जो परजीवी प्रकोप का शिकार हुई थीं, तो उन्हें 889 ततैया प्रजातियों का पता चला।

रोचक बात यह रही कि जब कोलवेल की टीम ने इन दो समूहों को एक साथ देखा, तो पाया कि शिकंजों में कैद हुई प्रजातियां और कैटरपिलर की जांच से दिखी प्रजातियां एकदम अलग-अलग थीं – यानी इन दो समूहों के बीच ओव्हरलैप (अतिव्याप्ति) (species overlap) बहुत कम था। इसका एक ही मतलब हो सकता है कि ये दोनों विधियां उद्यान में उपस्थित माइक्रोगैस्ट्रिने प्रजातियों के एक-एक अंश को ही देख पा रही थीं। यदि दोनों तरीकों को जोड़कर सांख्यिकीय विधियां लागू की जाए, तो पता चलता है कि उद्यान में पूरी-पूरी 2394 माइक्रोगैस्ट्रिने प्रजातियां मौजूद हैं।

यदि यह सही है, तो इसका मतलब है कि सर्वेक्षणों ने उद्यान के केंद्रीय भाग की माइक्रोगैस्ट्रिने प्रजातियों के मात्र छठे भाग (लगभग 16 प्रतिशत) को उजागर किया है। यदि इस प्रतिशत को पूरे उद्यान (53,945 ज्ञात प्रजातियां) पर लागू किया जाए, गुआनाकास्टे उद्यान (guanacaste park) में 3,32,846 प्रजातियां मौजूद हैं जिनमें से अधिकांश का अवलोकन ही नहीं किया गया है।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने इन गणनाओं को एक अन्य समूह (वृक्षों) पर लागू करके देखा। पूरी पृथ्वी पर वृक्षों की 73,000 प्रजातियां पाई जाती हैं और गुआनाकास्टे उद्यान में 1200 से 1500 प्रजातियां। अर्थात उद्यान में कुल वैश्विक वृक्ष प्रजातियों (global tree species) का लगभग 1.6 से 2.1 प्रतिशत पाया जाता है। यदि यही प्रतिशत कीटों पर भी लागू होता हो, तो पृथ्वी पर 1.33 करोड़ से 2.47 करोड़ कीट प्रजातियां होनी चाहिए। औसत के आधार पर यह माना जा सकता है कि पृथ्वी पर 2.03 करोड़ कीट प्रजातियां (insect species) होंगी।

अध्ययन दल का कहना है कि उनका अनुमान थोड़ा कम ही बैठेगा। अलबत्ता संरक्षण के लिहाज़ से यह एक अच्छा आंकड़ा हो सकता है। और इससे हमें यह समझने में मदद मिलेगी कि जैव विविधता (biodiversity) का विस्तार कितना व्यापक है। (स्रोत फीचर्स)

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