कॉकरोच भी बन गया साईबोर्ग!

डॉ. इरफान ह्यूमन

जकल सोशल मीडिया और कुछ आंदोलनों में कॉकरोच (तिलचट्टा) का प्रतीकात्मक उपयोग चर्चा में रहा है। कॉकरोच (cockroch) व्यवस्था-विरोधी या प्रतिरोध का रूपक इसलिए कि यह अत्यंत जीवट प्राणी होता है और कठिनतम परिस्थितियों में भी जीवित रह सकता है।

इसके इतर, वैज्ञानिक कॉकरोच पर कुछ विशेष प्रयोगों को अंजाम दे रहे हैं। बीते दिनों वैज्ञानिकों ने एक ऐसा डाइविंग सूट (diving suite) विकसित किया है, जिसे कॉकरोच को पहनाया जा सकता है। यह सूट कॉकरोच को पानी के भीतर भी जीवित रहने और चलने-फिरने में सक्षम बनाता है। इस तरह से कॉकरोच इलेक्ट्रॉनिक प्रणाली से चलने वाला जीव (साइबोर्ग) (cyborg) बन गया है।

साइबोर्ग और कॉकरोच

साइबोर्ग शब्द साइबरमेटिक ऑर्गेनिज़्म (cybermatic organism) का संक्षिप्त रूप है। यह ऐसे जीव को कहा जाता है जिसमें जैविक (बायोलॉजिकल) और इलेक्ट्रॉनिक घटक एक साथ कार्य करते हैं। दूसरे शब्दों में, जब किसी जीवित प्राणी के शरीर में इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, सेंसर, कृत्रिम अंग या कंप्यूटर-नियंत्रित प्रणालियां जोड़ी जाती हैं, तो वह साइबोर्ग कहलाता है। उदाहरण के लिए कृत्रिम (बायोनिक) हाथ या पैर वाले व्यक्ति, पेसमेकर लगे हृदय रोगी, श्रवण यंत्र का उपयोग करने वाले व्यक्ति, सेंसर और नियंत्रक लगे साइबोर्ग कॉकरोच।

डाइविंग सूट की आवश्यकता

दरअसल वैज्ञानिकों का विचार साइबोर्ग कॉकरोच (cyborg cockroch) का उपयोग खोज एवं बचाव कार्यों में करने का है। वैज्ञानिक कई वर्षों से कॉकरोचों पर छोटे सेंसर, कैमरे और इलेक्ट्रॉनिक नियंत्रक लगाकर उन्हें संकरे स्थानों में भेजने के प्रयोग कर रहे हैं। लेकिन एक बड़ी समस्या यह थी कि ये कॉकरोच केवल सूखी भूमि पर ही काम कर सकते थे। बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों, जलमग्न सुरंगों, सीवर लाइनों या पानी से भरे मलबों में उनका उपयोग सीमित था। कॉकरोच पानी में अधिक समय तक नहीं रह सकते क्योंकि वे मछलियों की तरह गलफड़ों से श्वसन नहीं करते। उनके शरीर के दोनों ओर छोटे-छोटे छिद्र (स्पाइरैकल्स) होते हैं जिनके माध्यम से हवा शरीर में पहुंचती है। जब कॉकरोच पानी में डूबता है तो स्पाइरैकल्स (spiracles) पानी से ढंक जाते हैं और हवा का प्रवाह रुक जाता है। कुछ समय बाद उनका श्वसन तंत्र काम करना बंद कर सकता है। कॉकरोच को जलमग्न क्षेत्रों में सक्षम बनाने के लिए ही डाइविंग सूट का विचार उभरा है।

डाइविंग सूट में तीन प्रमुख भाग होते हैं। पहला, जलरोधी सुरक्षा कवच जो पानी को कॉकरोच के शरीर में प्रवेश करने से रोकता है। इससे स्पाइरैकल्स सीधे पानी के संपर्क में नहीं आते और शरीर सुरक्षित रहता है। दूसरा, कृत्रिम ऑक्सीजन आपूर्ति। डाइविंग सूट में एक सूक्ष्म ऑक्सीजन उत्पादन प्रणाली (mini oxygen generating sysytem) लगाई जाती है जो रासायनिक अभिक्रिया के माध्यम से ऑक्सीजन बनाती है और उसे कॉकरोच के श्वसन तंत्र तक पहुंचाती है। तीसरा, इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की सुरक्षा। कैमरे, सेंसर और नियंत्रक सामान्यत: पानी से खराब हो सकते हैं। डाइविंग सूट इन्हें जलरोधी बनाकर सुरक्षित रखता है। इससे वैज्ञानिक वीडियो रिकॉर्ड कर सकते हैं, तापमान माप सकते हैं, गैस रिसाव का पता लगा सकते हैं और वातावरण की जानकारी एकत्र कर सकते हैं।

डाइविंग सूट का सबसे बड़ा लाभ यह है कि कॉकरोच ज़मीन और पानी में दोनों में कार्य करता रह सकता है। इसे उभयचर कार्यक्षमता (apmhibian function) कहते हैं।

विशेष डाइविंग सूट पहने साइबोर्ग कॉकरोच के परीक्षण के परिणाम अत्यंत उत्साहजनक रहे। साइबोर्ग कॉकरोच लगभग 3 घंटे तक पानी के भीतर सक्रिय बना रहा। और केवल जीवित ही नहीं रहा, बल्कि पानी में चल सकता था, दिशा बदल सकता था, बाधाओं को पार कर सकता था तथा आगे बढ़ सकता था।

जब कॉकरोच को पानी से बाहर निकाला गया, तब भी वह सामान्य रूप से चलने में सक्षम था। उसकी गति भूमि पर लगभग उतनी ही रही जितनी सूट-रहित कॉकरोच की होती है। यह उपलब्धि इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि अतिरिक्त उपकरण किसी जीव की गति और संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं। प्रयोगों में पाया गया कि सेंसर सुरक्षित रहे, नियंत्रण प्रणाली कार्य करती रही, जलरोधी आवरण ने इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों (electronic instruments) को नुकसान से बचाया। इससे भविष्य में कैमरे, माइक्रोफोन और अन्य सेंसर जोड़ने की संभावना मजबूत हुई।

उपयोग

प्राकृतिक आपदाओं (natural calamities) और दुर्घटनाओं के दौरान सबसे बड़ी चुनौती प्रभावित लोगों तक शीघ्र पहुंचने की होती है। भूकंप, भवन ध्वंस, बाढ़, खदान दुर्घटनाएं तथा अन्य आपातकालीन स्थितियां अक्सर ऐसे हालात उत्पन्न कर देते हैं, जहां मानव बचावकर्मी या बड़े रोबोट आसानी से नहीं पहुंच पाते। ऐसे में साइबोर्ग कॉकरोच एक प्रभावी समाधान के रूप में उभर रहे हैं। इनके कई उपयोग हो   सकते हैं:

1. मलबे में फंसे लोगों की खोज: ऐसी दुर्घटनाओं में कई बार लोग मलबे के नीचे जीवित फंसे रहते हैं, लेकिन उनकी सही स्थिति का पता लगाना कठिन होता है। साइबोर्ग कॉकरोच कुछ मिलीमीटर चौड़ी दरारों में प्रवेश कर सकते हैं। और मलबे के जटिल रास्तों से गुज़र सकते हैं। कैमरे और सेंसर की सहायता से अंदर की वास्तविक स्थिति की जानकारी भेज सकते हैं। इससे बचाव दल को यह पता लगाने में सहायता मिल सकती है कि कोई व्यक्ति कहां फंसा है और उसे निकालने का सबसे सुरक्षित मार्ग कौन-सा होगा।

2. जीवन के संकेतों का पता लगाना: साइबोर्ग कॉकरोचों पर विभिन्न प्रकार के सेंसर (sensor) लगाए जा सकते हैं। इनकी सहायता से वे ध्वनि, हलचल या कंपन का पता लगा सकते हैं। ऊष्मा और कार्बन डाईऑक्साइड की अधिक मात्रा भांप सकते हैं, जो किसी जीवित व्यक्ति की उपस्थिति का संकेत हो सकती है। मलबे के नीचे फंसे व्यक्ति की पुकार को माइक्रोफोन बचाव दल तक पहुंचा सकता है।

3. बाढ़ और जलमग्न क्षेत्रों में उपयोग: साईबोर्ग कॉकरोच बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों (flood affected area) का निरीक्षण कर सकते हैं। जलमग्न सुरंगों और पाइपलाइनों में प्रवेश कर सकते हैं। पानी के भीतर मौजूद अवरोधों का पता लगा सकते हैं मानव गोताखोरों की पहुंच से बाहर के स्थानों की जानकारी एकत्र कर सकते हैं। यह क्षमता उन्हें पारंपरिक बचाव उपकरणों की अपेक्षा अधिक बहुमुखी (diverse) बनाती है।

4. खदान दुर्घटना जोखिम क्षेत्रों में उपयोग: खदान दुर्घटनाओं में सुरंगें ध्वस्त हो सकती हैं या विषैली गैसें भर सकती हैं। ऐसी स्थिति में साइबोर्ग कॉकरोच गैस सेंसर द्वारा वातावरण व ऑक्सीजन स्तर की जांच कर सकते हैं, फंसे हुए श्रमिकों का पता लगा सकते हैं। इसी तरह, रासायनिक दुर्घटना स्थल, परमाणु विकिरण वाले क्षेत्र और अस्थिर भवन आदि में मदद कर सकते हैं।

5. बड़े रोबोटों की तुलना में लाभ: साइबोर्ग कॉकरोच की लागत अपेक्षाकृत कम है। लिहाज़ा वैज्ञानिक इन्हें भविष्य की खोज एवं बचाव तकनीक का महत्वपूर्ण भाग मानते हैं।

कॉकरोच ही क्यों?

साइबोर्ग कॉकरोच परियोजना में वैज्ञानिकों ने अनेक प्रकार के कीटों और छोटे जीवों पर विचार किया, लेकिन अंतत: कॉकरोच को सबसे उपयुक्त पाया। इसका कारण केवल उसका छोटा आकार नहीं है, बल्कि उसकी असाधारण शारीरिक क्षमता, सहनशीलता और अनुकूलनशीलता भी है। कॉकरोच सबसे मज़बूत और जीवट जीवों (resilient oraganism) में से एक माना जाता है। यह विभिन्न वातावरणों में जीवित रह सकता है; गर्मी और ठंड दोनों सहन कर सकता है’ सीमित भोजन-पानी में भी कुछ समय तक जीवित रह सकता है। कॉकरोच का शरीर लचीला और चपटा होता है, वह बहुत छोटी दरारों में घुस सकता है।

कृत्रिम सूक्ष्म रोबोट को चलाने के लिए बैटरी और मोटरों की आवश्यकता होती है, जिससे उनकी ऊर्जा जल्दी चुक सकती है। इसके विपरीत, कॉकरोच अपने शरीर की प्राकृतिक ऊर्जा प्रणाली का उपयोग करता है और बहुत कम ऊर्जा में लंबे समय तक काम चला सकता है। कॉकरोच अपने वज़न की तुलना में काफी अधिक भार वहन कर सकता है। इस विशेषता के कारण उसके शरीर पर सेंसर, कैमरे, माइक्रोफोन, संचार उपकरण, नियंत्रण प्रणाली लगाने के बाद भी उसकी गतिशीलता पर बहुत अधिक प्रभाव नहीं पड़ता। छोटे रोबोट अक्सर उबड़-खाबड़ सतहों पर फंस जाते हैं, लेकिन कॉकरोच ऊबड़-खाबड़ सतहों पर चल सकता है और छोटे अवरोधों को पार कर सकता है। वह तेज़ी से दिशा बदल सकता है और गिरने के बाद स्वयं संतुलन बना सकता है। ये सभी गुण उसे प्राकृतिक रूप से एक उत्कृष्ट ‘जैविक रोबोट’ (biological robot) बनाते हैं; खोज एवं बचाव कार्य के लिए आदर्श जैविक मंच (बायोलॉजिकल प्लेटफॉर्म) बनाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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उंगलियां चटकाने का सुख और कष्ट

डॉ. सुशील जोशी

उंगलियां चटकाना तो सभी जानते हैं। हालांकि कुछ लोग आदतन ऐसा करते हैं जबकि कुछ नहीं करते। इसके अलग-अलग तरीके भी होते हैं; कुछ लोग उंगलियों को सीधी रखकर उन्हें खींचते हैं, तो कुछ लोग उंगलियों को जोड़ों पर से मोड़कर उन्हें दबाते हैं। परिणाम कुल मिलाकर एक ही होता है – उंगलियों से चटक की आवाज़ आती है और कहते हैं कि इससे सुकून मिलता है। तो सवाल यह उठता है कि यह आवाज़ कहां से आती है और सुकून क्यों मिलता है। साथ में सवाल यह भी है कि क्या उंगलियां चटकाना (knuckle cracking) लंबे समय में नुकसानदायक भी हो सकता है।

दरअसल, उंगलियां चटकाने पर तमाम तरह की क्रियाएं होने लगती हैं। सबसे पहले तो यह देखिए कि चटक की आवाज़ कहां से निकलती है। बात की शुरुआत यह बताकर करना मुनासिब होगा कि वैज्ञानिकों-चिकित्सकों-अस्थि विशेषज्ञों के बीच इस सम्बंध में आम सहमति नहीं है।

हमारे शरीर के जोड़ों में हड्डियों को आपस में जोड़ने की तीन व्यवस्थाएं होती हैं। एक होती है जिसमें हड्डियां तंतुओं या रेशों के ज़रिए जुड़ी होती हैं। कपाल (cranium) की हड्डियों के बीच जोड़ इसी प्रकार के होते हैं। इन जोड़ों में गति नहीं होती। दूसरी होती है जिसमें हड्डियों को उपास्थियों के ज़रिए जोड़ा जाता है। इनमें थोड़ी गति संभव होती है। और तीसरी व्यवस्था में हड्डियों के जोड़ों पर एक रेशेदार कैप्सूल में तरल भरा होता है। कोहनी, घुटनों, कलाइयों, ऐड़ियों के जोड़ इसी प्रकार के होते हैं। हमारी उंगलियों के जोड़ों में भी एक तरल भरा होता है जो उन्हें गति करने में घर्षण से बचाता है। इस तरल को सिनोवियल द्रव (synovial fluid) कहते हैं। इसके अलावा यह एक नरम गद्दी की तरह कार्य करता है और उपास्थियों को पोषण भी पहुंचाता है। जोड़ों में यह तरल न हो या कम हो तो कई तरह की दिक्कतें हो सकती है।

हाथ की संरचना और खास तौर से उसमें हड्डियों की जमावट चित्र 1 की तरह होती है। कलाई और हथेली के जोड़ पर कई सारी हड्डियां होती हैं जिन्हें कार्पल्स कहते हैं। कार्पल्स अनियमित आकार की हड्डियां होती हैं जो अनियमित ढंग जमी होती हैं। इसके बाद आती हैं बेलनाकार मेटाकार्पल्स (metacarpels) जो हथेलियों में जमी होती हैं, और अलग-अलग उंगली की हड्डियों से जुड़ी होती हैं। चार उंगली और एक अंगूठे के लिए पांच मेटाकार्पल्स होती हैं। फिर आती हैं उंगलियों की हड्डियां – फैलेंजेस (phalanges)। चारों उंगलियों में तीन-तीन फेलेंजेस होती हैं जबकि अंगूठे में मात्र 2। मेटाकार्पल्स से लेकर फैलेंजेस तक के सारे जोड़ सिनोवियल होते हैं। चटकाने की मुख्य क्रिया को मेटाकार्पल और फैलेंजेस के जोड़ों पर अंजाम दिया जाता है। इन्हें संक्षेप में एमसीपी (MCP) जोड़ कहते हैं।

चटकाने की क्रिया

उंगलियां चटकाने पर काफी अनुसंधान हुए हैं। इस सामान्य सी क्रिया पर ध्यान देने का प्रमुख कारण यह रहा है कि इसे लेकर तमाम धारणाएं-मान्यताएं हैं, खास तौर से इसके कारण होने वाले नुकसान को लेकर।

1947 में जे. बी. रोस्टन और आर. व्हीलर हैन्स ने जर्नल ऑफ एनाटॉमी में पहली बार MCP जोड़ों की क्रमिक रेडियोग्राफी (sequential radiography) के आधार पर उंगलियां चटकाने के चार चरणों का विवरण दिया था:

विश्राम की अवस्था, जब जोड़ पर कोई बल नहीं लगाया जा रहा है और सतहें लगभग परस्पर संपर्क में होती हैं;

जब थोड़ा बल लगाया जाता है तो जोड़ की सतहें एक-दूसरे से दूर जाने लगती हैं;

बल का परिमाण एक सीमा से अधिक होने पर सतहें इतनी दूर हो जाती हैं कि बीच में एक खाली जगह बन जाती है। तब चटकने की अवस्था आती है;

अंतिम चरण बहाली का होता है जिसके दौरान उंगलियों को फिर से नहीं चटकाया जा सकता। यह चरण लगभग 20 मिनट का होता है।

आवाज़ का उद्गम

एक मत यह है कि सिनोवियल द्रव में गैसें (मुख्यत: कार्बन डाईऑक्साइड और नाइट्रोजन) घुली होती हैं। जब जोड़ों को तेज़ी से खींचा जाता है तो बीच की जगह में एक खाली स्थान पैदा हो जाता है। इस निर्वात की वजह से गैस के बुलबुले (gas bubbles) सिनोवियल द्रव से बाहर निकलकर इस जगह में भर जाते हैं। फिर जब बुलबुले खूब फूल जाते हैं तो अपने ही तनाव की वजह से गुब्बारे की तरह फूट जाते हैं। आवाज़ इन्हीं बुलबुलों के फूटने की होती है। और यही कारण है कि एक बार चटकाने के बाद कुछ समय तक ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि बुलबुलों को फिर से बनने में समय लगता है।

लेकिन… विज्ञान में लेकिन तो हमेशा बना रहता है।  

रोस्टन और हैन्स की परिकल्पना थी कि जोड़ों की सतहों के बीच खाली स्थान पर जलवाष्प (watervapour) भरी होती है। उनका मत था कि आवाज़ जोड़ों की तेज़ गति के कारण उत्पन्न कंपनों से पैदा होती है।

इस संदर्भ में ए. अन्सवर्थ, डी. डावसन और वी. राइट ने अपने प्रयोगों के परिणाम 1971 में एनल्स ऑफ दी रुमेटिक डिसीसेज़ में प्रकाशित करके बताया था कि बुलबुलों का बनना और फूटना ही चटकने की आवाज़ का स्रोत है। जैसे-जैसे जोड़ की सतहें एक-दूसरे से दूर हटती हैं, वहां कम दबाव का क्षेत्र (low pressure zone) बन जाता है। परिणामस्वरूप, द्रव का वाष्पीकरण होता है और द्रव में घुली गैसें बुलबुले बन जाती हैं।

हालांकि इस बात पर सहमति है कि उंगली चटकाने के दौरान जोड़ों पर बुलबुले बनते हैं लेकिन बुलबुलों के बनने की क्रियाविधि और आवाज़ का स्रोत विवाद का विषय रहा है।

जैसे 2015 में अलबर्टा विश्वविद्यालय के ग्रेगरी कॉचुक और उनके साथियों ने चटकाने की प्रक्रिया का एमआरआई अध्ययन किया। यह अध्ययन दस MCP जोड़ों पर किया गया था। उन्होंने चटकने वाली उंगली को एक लंबी लचीली नली में पिरोकर उसका एमआरआई अध्ययन (MRI scan) किया था। शोधकर्ताओं ने पाया कि आवाज़ आने के बाद भी बुलबुला मौजूद था। यानी आवाज़ बुलबुले के निर्माण के समय आई थी, न कि बुलबुला फटने के कारण।

कॉचुक व साथियों ने बुलबुला बनने के कारण के रूप में ट्राइबोन्यूक्लिएशन (tribonucleation) नामक क्रियाविधि सुझाई थी। इसमें होता यह है कि दो सतहें एक आसंजन (चिपकू) बल द्वारा चिपकी होती हैं। जब उन्हें अलग-अलग करने के लिए लगाया जा रहा बल इस आसंजन बल से अधिक हो जाता है तो सतहें अलग-अलग होने लगती हैं लेकिन उन्हें चिपकाकर रखने वाला द्रव उतनी तेज़ी से फैल नहीं पाता। लिहाज़ा वहां वाष्प की एक गुहा (कैविटी) बन जाती है। द्रव में मौजूद गैसें बुलबुले के रूप में बाहर निकलने लगती हैं। इस प्रक्रिया को ट्रायबोन्यूक्लिएशन कहते हैं। लेकिन चटकने की आवाज़ इस खाली स्थान के बनने के समय ही पैदा हो जाती है, उसके वापिस पिचकने से पहले।

इसके बाद 2017 में रॉबर्ट बूटिन और उनके साथियों ने चटकते जोड़ों में सोनोग्राफी की मदद से इकोजेनिक क्षेत्रों की पहचान की। ये वे क्षेत्र होते हैं जो सोनोग्राफी (sonography) करते समय ध्वनि तरंगों को परावर्तित कर देते हैं। उनके अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि बुलबुले बनने में ट्रायबोन्यूक्लिएशन की प्रक्रिया ही क्रियाशील है।

जब कुछ शोधकर्ताओं ने चटकती उंगलियों की जांच अल्ट्रासोनोग्राफी (ultrasonography) से की तो कुछ अलग ही तस्वीर सामने आई। इस अनुसंधान में 40 सहभागी थे (23 पुरुष और 17 महिलाएं)। इनमें से 30 आदतन उंगलियां चटकाने वाले थे जबकि 10 को ऐसी कोई आदत नहीं थी। शोधकर्ताओं ने इन सबका चिकित्सा इतिहास रिकॉर्ड किया – जैसे वे कितनी बार उंगलियां चटकाते हैं, उनकी हाथों की पकड़ कितनी मज़बूत है वगैरह। इसके बाद सभी सहभागियों के एमसीपी जोड़ की अल्ट्रासोनोग्राफी चटकाने के पहले, उसके दौरान और उसके बाद की गई।

प्रयोग के दौरान 40 सहभागियों के 400 एमसीपी जोड़ों का अवलोकन किया गया। 400 एमसीपी में 62 के तोड़ने-मरोड़ने पर चटक की आवाज़ सुनाई पड़ी। साथ में अल्ट्रासाउंड तस्वीर में चटकाने की क्रिया के दौरान एक चमक दिखाई दी। अल्ट्रासाउंड तस्वीरों में उत्पन्न चमक की मदद से रेडियोलॉजिस्ट सुनाई पड़ने वाली चटक को 94 प्रतिशत सटीकता से पहचान पाए। इससे इतना तो पता चलता है कि चटकने की आवाज़ का सम्बंध जोड़ में गैस के बुलबुले के दबाव में परिवर्तन से जुड़ा है। अलबत्ता, अभी भी यह कहना मुश्किल है कि पहले क्या होता है – चटकने की आवाज़ या चमक। लेकिन अल्ट्रासोनोग्राफी जांच ने इतना तो स्पष्ट कर ही दिया कि चटकने की आवाज़ गैस का बुलबुला फटने से 10 मिलीसेकंड पहले सुनाई पड़ती है। बुलबुले का फटना सोनोग्राम (sonogram) में एक चमक के रूप में दिखता है।

इस मामले में अलबर्टा विश्वविद्यालय के इमेजिंग विशेषज्ञ रिचर्ड थॉमसन ने यह विचार प्रस्तुत किया है कि हो सकता है कि आवाज़ सुनाई पड़ने से पहले ही बुलबुले का बनना शुरू हो जाता है लेकिन अल्ट्रासाउंड तस्वीर में वह पूरा बनने के बाद ही नज़र आता है। यही वह क्षण होता है जब आपको आवाज़ सुनाई पड़ती है। वैसे थॉमसन ने इसी तरह के शोध के लिए एमआरआई का उपयोग किया था। चूंकि उसमें प्रति सेकंड बहुत ज़्यादा तस्वीरें नहीं मिलती हैं (जो उस अध्ययन की सीमा थी) इसलिए वे यह नहीं बता पाए थे कि पहले आवाज़ आती है या बुलबुला बनता है।

और इस सिलसिले में सबसे हालिया शोध चंद्रन सूजा और अब्दुल बरकत (2018) का रहा है। इन्होंने साइन्टिफिक रिपोर्ट्स में उंगलियां चटकाने की आवाज़ की व्याख्या करते हुए एक गणितीय मॉडल प्रकाशित किया था। उनका मत था कि एमआरआई या सिनेरेडियोग्राफी जैसी तकनीकों में विभेदन बहुत कम है (क्रमश: 80-100 फ्रेम प्रति सेकंड और 100 फ्रेम प्रति सेकंड)। जबकि चटकने की आवाज़ का स्रोत पकड़ने के लिए कम से कम 1200 फ्रेम प्रति सेकंड का विभेदन चाहिए। इसलिए उन्होंने एक गणितीय मॉडल (mathematical model) विकसित किया।

उन्होंने दर्शाया कि उनके मॉडल में बुलबुले के आंशिक फूटने के ध्वनि हस्ताक्षर वैसे ही रहे जैसे प्रयोगों में देखे गए थे। तो संभव है कि वाष्प गुहा (vapour cavity) बनने और आंशिक रूप से बुलबुलों के फूटने को मिलाकर चटक की आवाज़ आती हो।

उंगलियां चटकाने का सुख

तो, सवाल यह है कि यदि जोड़ों में सिर्फ गैस के बुलबुले पिचक और फूट रहे हैं तो सुकून क्यों मिलता है।

इस संदर्भ में कैलिफोर्निया के अस्थि सर्जन रोजे मेलिकन का मत है कि जोड़ों की त्वरित हरकत वहां उपस्थित तंत्रिकाओं को भी उत्तेजित कर सकती है, जिसकी वजह से दर्द में कमी आती है और एंडॉर्फिन (endorphin) नामक पदार्थ मुक्त होते हैं। वैसे यह बात अभी प्रमाणित नहीं हुई है।

लगता है कि मामला सिर्फ शरीर की अंदरुनी क्रियाओं यानी कार्यिकी का न हो। कुछ मनोवैज्ञानिक पहलू भी इसमें जुड़े हैं। जैसे एक तो यह है कि उंगलियां चटकाना कुछ लोगों के लिए एक आदत बन जाती है। और जब इससे सुकून मिलता है तो इस आदत को बढ़ावा मिलता है। कुछ लोगों को सिर्फ चटकने की आवाज़ सुनना अच्छा लगने लगता है। लेकिन कहते हैं कि कभी-कभी आसपास के लोगों को इससे परेशानी होती है।

नुकसान

अक्सर अत्यधिक उंगलियां चटकाने वालों को टोका जाता है। कहा जाता है कि इससे नुकसान होगा, उंगलियां कमज़ोर पड़ जाएंगी, गठिया (arthritis) का खतरा बढ़ जाएगा। इस मामले में किए गए कई अध्ययनों में ऐसी सारी चेतावनियों को खारिज किया गया है। हां, कुछ अध्ययनों में यह बात ज़रूर सामने आई है कि आदतन उंगलियां चटकाने से व्यक्ति की उंगलियों में सूजन आ सकती है या पकड़ कमज़ोर पड़ सकती है।

उंगलियां चटकाने के हानिकारक असर को लेकर कई प्रयोग किए गए हैं। इनमें से सबसे मशहूर प्रयोग कैलिफोर्निया के एक चिकित्सक डॉ. डोनाल्ड एल. उन्गर ने किया था। वे यह देखना चाहते थे कि क्या उंगलियां चटकाने से गठिया (आर्थ्राइटिस) होता है। उन्होंने पूरे 50 साल तक अपने बाएं हाथ की उंगलियों को रोज़ाना कम से कम दो बार चटकाया जबकि दाएं हाथ को अछूता छोड़ रखा। बाद में जब उन्होंने दोनों हाथों का एक्सरे (X-Ray) निकाला तो उनमें कोई अंतर नहीं था। किसी में भी गठिया का कोई प्रमाण नहीं था।

खैर, यह तो हुई एक व्यक्ति के निजी प्रयोग की बात लेकिन ज़्यादा व्यापक अध्ययनों के परिणाम भी ऐसे ही रहे हैं।

उदाहरण के लिए, 2017 में हैंड सर्जरी एंड रिहैबिलिटेशन जर्नल में प्रकाशित एक पर्चे में 35 उंगलियां चटकाने वालों और न चटकाने वालों की तुलना की गई थी। आदतन उंगलियां चटकाने वाले लोग दिन में कम से कम पांच बार ऐसा करते थे। यह देखा गया कि उंगलियां चटकाने वालों में मेटाकार्पल के सिरों की उपास्थियां (cartilages) अपेक्षाकृत मोटी हो गई थीं। अलबत्ता, उनके हाथों की पकड़ पर कोई नकारात्मक असर नहीं हुआ था।

ऐसा एक प्रयोग 1975 में रॉबर्ट स्वीज़ी और स्टुअर्ट स्वीज़ी ने किया था। इसके परिणाम वेस्टर्न जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुए थे। इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि कम उम्र में उंगलियां चटकाने की आदत से बुढ़ापे में एमसीपी जोड़ों में किसी क्षतिकारक परिवर्तन का कोई प्रमाण नहीं है।

दूसरी ओर, जे. कोस्टेलोन और डी. एक्सलरॉड द्वारा एनल्स ऑफ दी रुमेटिक डिसीज़ेस में 1990 में प्रकाशित अध्ययन में 45 वर्ष से अधिक उम्र के 300 मरीज़ों को शामिल किया गया था। 300 में से 74 आदतन उंगलियां चटकाने वाले थे जबकि 226 गैर-चटकाने वाले। दोनों समूहों के हाथों में अतिरिक्त गठिया का कोई लक्षण नहीं दिखा। अलबत्ता, आदतन उंगलियां चटकाने वालों के हाथों में सूजन और पकड़ की कमज़ोरी की संभावना ज़्यादा पाई गई। एक अवलोकन यह था कि उंगलियां चटकाने की आदत का सम्बंध शारीरिक श्रम वाले काम, नाखून चबाने, धूम्रपान और शराब पीने से होता है।

बैंगलुरु प्रयोग

यह प्रयोग एस. कांचन तथा आर. मेघना द्वारा बेंगलुरु में 18-25 वर्ष के 150 कॉलेज छात्रों पर किया गया था। जर्नल ऑफ इकोफिज़ियोलॉजी एंड हेल्थ में 2025 में प्रकाशित इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि आदतन उंगलियां चटकाने के प्रमुख हाथ (यानी जिस हाथ का वह व्यक्ति प्रमुखता से इस्तेमाल करता है – डॉमिनेन्ट हाथ) के एमसीपी जोड़ों की गतिशीलता में कमी आती है और पकड़ की मज़बूती (hand grip) भी कम हो जाती है।

2001 में क्रिस्टोफर पीटरसन, चेरिल बार्नेस और लोरेटा डेविस ने उंगलियां चटकाने को लेकर एक अलग ही किस्म का अध्ययन किया था। पीडियॉट्रिक डर्मेटोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन में जोड़ों पर आने वाले उभारों (नकल पैड्स) पर ध्यान दिया गया था। प्राय: इन सूजननुमा उभारों का कारण पता नहीं चल पाता। और इनके प्रभावों की बात बहुत कम हुई है। यह अध्ययन एक ही मरीज़ (14 वर्षीय बच्ची) पर किया गया था जिसकी कई उंगलियों के जोड़ों पर 3 साल से गठान जैसी दिख रही थीं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये गठानें (knots) उसकी उंगलियां चटकाने की आदत के चलते उभरी हैं।

ऐसा ही लीक से हटकर एक और अध्ययन गौरतलब है। एडवर्ड रॉस, जेनिफर पॉग-मिलर और रॉबर्ट नेप्पो का यह अध्ययन क्लीनिकल किडनी जर्नल में 2023 में प्रकाशित हुआ था। देखा गया कि किडनी रोग के अंतिम दौर के मरीज़ों में सेकंडरी हायपरथॉयराइडिज़्म (यानी थॉयराइड की अति-सक्रियता) प्रकट होती है और मांसपेशियों और कंकाल तंत्र पर उसके विविध लक्षण नज़र आते हैं। इन शोधकर्ताओं के कई मरीज़, जो डायलिसिस पर थे, ने स्वत: बताया था कि उनमें अब उंगलियां चटकाने की क्षमता नहीं रही। आश्चर्य की बात यह रही कि पैराथॉयराइड ग्रंथि को सर्जरी के ज़रिए निकाल देने के बाद उंगली चटकाने की क्षमता लौट आई। मतलब है कि पैराथॉयराइड से सम्बंधित खनिज लवण तथा अस्थि विकारों (bone disorders) का असर उंगलियां चटकाने के कार्यिकीय व यांत्रिकी आधार पर होता है।

कुल मिलाकर लगता है कि उंगलियां चटकाने के तात्कालिक या दीर्घावधि नुकसान का कोई सुस्पष्ट प्रमाण नहीं है। हालांकि कुछेक अध्ययनों में नकारात्मक परिणाम दिखे हैं। लेकिन सभी शोधकर्ता यह चेतावनी दोहराते हैं कि शरीर के बाकी जोड़ों के साथ खिलवाड़ सही नहीं है क्योंकि उनमें से कई जोड़ सिनोवियल जोड़ (synovial joints) नहीं होते। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अब लैब में बनेंगे ‘मिनी’ मस्तिष्क!

हालिया हुए एक शोध में विज्ञान और चिकित्सा जगत को एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त हुई है। नेचर में प्रकाशित शोध के अनुसार प्रयोगशाला में मानव मस्तिष्क के हू-ब-हू छोटे मॉडल  विकसित कर लिए गए हैं। इन्हें ‘ब्रेन ऑर्गेनॉइड’ (brain organoid) या ‘मिनी ब्रेन’ कहा जाता है। 

पिछले कुछ अन्य अध्ययनों में भी ऐसे मिनी ब्रेन विकसित किए गए थे लेकिन वे थोड़े समय में – केवल कुछ हफ्तों-महीनों के भीतर – नष्ट हो जाते थे। उनकी मदद से मस्तिषक के केवल शुरुआती विकास का अध्ययन ही मुमकिन था। लेकिन इस ताज़ा अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस ‘मिनी ब्रेन’ (mini brain) को पांच साल से अधिक समय तक सफलतापूर्वक जीवित और विकासमान रखा।  

हारवर्ड युनिवर्सिटी की प्रोफेसर पाओला अर्लोटा और उनकी टीम ने 34 मिनी ब्रेन विकसित करके उनका अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि प्रयोगशाला में विभाजन कर रहे कोशिकाओं के समूह समय के साथ बिल्कुल उसी गति और क्रम से वृद्धि कर रहे थे जैसे मां के गर्भ में बच्चे (human embryo) का मस्तिष्क विकसित होता है। विकास के चरण कुछ इस प्रकार थे – 15 दिन से 2 महीने में पहली तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 3 से 6 महीने में दूसरी तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 12 महीने में नवजात शिशु के मस्तिष्क जैसी स्थिति और पांच साल तक कोशिकाओं के चारों तरफ प्रोटीन की सुरक्षा परत बनना (myelination) और परिपक्व होना। 

शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग भी किया। उन्होंने नई (15 दिन पुरानी) और परिपक्व (9 से 12 महीने पुरानी) कोशिकाओं का एक साथ 15 दिनों तक विभाजन करवाया। नतीजा यह था कि नई कोशिकाओं ने शुरुआती तंत्रिका कोशिकाएं बनाई, जबकि परिपक्व कोशिकाओं ने उनकी परिपक्वता के अनुसार परिपक्व तंत्रिका कोशिकाओं का ही विकास किया। इस प्रयोग से यह साबित हुआ कि मस्तिष्क की कोशिकाओं में जैविक स्मृति (biological memory) होती है, और वे नए माहौल में भी अपनी जैविक उम्र के अनुसार ही काम करती हैं।

पिछले अध्ययनों में मस्तिष्क की मुख्य कोशिकाएं पोषण की कमी से जल्दी नष्ट हो जाती थीं। इससे निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने एक खास संशोधित तरल (ब्रेनफिज़) (brainphys) का इस्तेमाल किया। ब्रेनफिज़ की मदद से तंत्रिका कोशिकाएं न केवल लंबे समय तक क्रियाशील रहीं, बल्कि उनके बीच जटिल विद्युतीय संकेतों (complex electric signals) का प्रेषण भी होने लगा। 

शोधकर्ताओं को लगता है कि यह अनुसंधान शिज़ोफ्रेनिया और ऑटिज़्म जैसी मानसिक और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के कारणों और लक्षणों को बेहतर तरीके से समझने में सहायक होगा, क्योंकि ये बीमारियां एक खास उम्र के बाद ही सामने आती हैं। इसके अलावा, मरीज़ों की स्टेम कोशिकाओं (stem cells) से मिनी ब्रेन विकसित करके नई दवाइयों का सुरक्षित परीक्षण भी संभव हो सकेगा।

भविष्य में शोधकर्ता संवेदनाओं से युक्त ऐसे मिनी ब्रेन बनाने की कोशिश करने जा रहे हैं जो सुनने, देखने, और छूने जैसे संकेतों को महसूस करने में भी सक्षम हों। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पदचिन्ह ने दिए डायनासौर के समकालीन बड़े स्तनधारी के सुराग

क ज़माना था जब पृथ्वी पर डायनासौर का वर्चस्व था। सरीसृप (reptile) की श्रेणी में आने वाले ये डायनासौर शाकाहारी से लेकर शिकारी, और छोटे (लोमड़ी बराबर) से लेकर विशालकाय शरीर वाले थे। लेकिन उस ज़माने में स्तनधारी जीव इतने बड़े नहीं होते थे – प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर ऐसा माना जाता था कि उस युग में स्तनधारी अधिक से अधिक गिलहरी जितने बड़े होते थे और वे अपने से विशाल काया वाले और शिकारी डायनासौरों से डरा करते थे, छिप-छिपाकर अपनी जान बचाया करते थे।

इसी दौरान, लगभग 13 करोड़ साल पहले अपने शिकारियों से बचने और प्रजनन के लिए एक छोटा स्तनधारी जीव वर्तमान के दक्षिणी ब्राज़ील (south brazil) के नम रेत के टीलों की ओर पलायन कर गया। लेकिन हाल ही में मिले एक प्राचीन जीव के अश्मीभूत पदचिन्ह इस ओर इशारा करते हैं कि एक स्तनधारी (mammal) आकार में इतना बड़ा हो गया था कि अपने कुछ डायनासौर प्रतिद्वंद्वियों का मुकाबला कर सकता था। अश्मीभूत पैरों के निशानों के दो समूह के आधार पर शोधकर्ताओं का कहना है कि यह जीव लगभग कुत्ते की साइज़ का होगा और उस समय का अब तक का ज्ञात सबसे बड़ा स्तनधारी जीव होगा।

पंजों के निशान दक्षिणी ब्राज़ील के बोटुकाटू फॉर्मेशन में वर्ष 2019 की खदान खुदाई में मिले थे। 13 करोड़ साल पहले भी यह इलाका एक विशाल रेगिस्तान का हिस्सा था जो ब्राज़ील और पश्चिमी अफ्रीका के कुछ हिस्सों तक फैला हुआ था। यहां बलुआ पत्थरों पर कई जीवों के अश्मीभूत पंजों के निशान बड़ी संख्या में मिलते हैं, लेकिन यहां कोई भी अश्मीभूत कंकाल (fossilized skeleton) नहीं मिला है। बलुआ पत्थरों पर डायनासौर, छिपकलियों, स्तनधारियों, टेरोसॉर और आर्थ्रोपोड जीवों की पद-छाप मिलती हैं।

मिनास गेरैस स्टेट युनिवर्सिटी के जीवाश्म विज्ञानी पेड्रो विक्टर बक और उनके साथियों ने इन निशानों की तुलना बोटुकाटू में मिले अन्य पंजे के निशानों और शुरुआती क्रेटेशियस काल (crestaceous period) में रहने वाले अन्य स्तनधारियों के पंजे के निशानों से की।

उन्होंने पाया कि अश्मीभूत पंजे की लंबाई (10 सेंटीमीटर) के मुकाबले चौड़ाई (13 सेंटीमीटर) अधिक है और पंजे में चार उंगलियां हैं जिनके सिरे गोलाई लिए हुए हैं। ज़मीन पर इनकी एक-दूसरे के सापेक्ष स्थिति और दूरी बताती है कि जिस जीव के ये पंजों के निशान हैं वो चौपाया रहा होगा। इन विशेषताओं के आधार पर बक का अनुमान है कि ये किसी स्तनधारी जीव के पदचिन्ह (footprints) हैं।

यह तो समझ आ गया कि पंजों के निशान किसी स्तनधारी जीव के हैं, लेकिन सवाल था कि किस जीव के? दिलचस्प बात यह थी कि इन पंजों की लंबाई-चौड़ाई इस इलाके में मिलने वाले किसी भी अन्य स्तनधारी जीव के पंजों से लगभग दुगनी बड़ी थी। तब शोधकर्ताओं ने इसकी तुलना क्रेटेशियस काल के एक अन्य स्तनधारी जीव एडालाथेरियम हुई (Adalatherium hui) की कद-काठी से की। एडालाथेरियम हुई की लंबाई लगभग 52 सेंटीमीटर थी। तुलना के आधार पर बक का अनुमान है कि यह नया खोजा गया जीव 1.55 मीटर लंबा रहा होगा, यानी किसी बड़े कुत्ते या माउंटेन लॉयन जितना बड़ा जो अब तक का ज्ञात उस समय का सबसे बड़ा स्तनधारी है। ये नतीजे जर्नल ऑफ साउथ अमेरिकन अर्थ साइंसेज़ में प्रकाशित हुए हैं।

हालांकि सिर्फ निशानों से यह पक्के तौर पर कहना मुश्किल है कि वे किस जीव के होंगे, लेकिन शोधकर्ताओं का अनुमान है कि ये ट्राइकोनोडोंट्स या क्लैडोथेरियन (triconodont/ cladotherian) के होंगे – ये दोनों समूह शुरुआती स्तनधारी हैं जिनके बारे में पहले माना जाता था कि वे चूहे से लेकर रैकून जितने बड़े होते थे।

यह भी रहस्य ही है कि उस समय ये स्तनधारी अन्य की तुलना में इतने बड़े (huge) कैसे हो गए। एक संभावना यह हो सकती है कि जहां यह पाया गया है उस रेगिस्तान में बहुत कम बड़े डायनासौर विचरते थे, जिससे कुछ स्तनधारियों को बड़ा होने का मौका मिल गया होगा। लेकिन ये महज़ अटकलें हैं, पक्के तौर पर अभी कुछ नहीं कहा सकता।

इससे पहले, वर्ष 2023 में, शोधकर्ताओं को ऐसे जीवाश्मीय सबूत मिले थे जो इशारा करते थे कि कुछ स्तनधारी कभी-कभार छोटे डायनासौर का शिकार कर लिया करते थे। यदि बोटुकाटू में मिला स्तनधारी वाकई इतना ही बड़ा था, तो हो सकता है कि इसने शायद और भी बड़े डायनासौरों (dinosaur) का शिकार किया होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्रकाश प्रदूषण: विकास की चकाचौंध में गुम होती रातें 

सुदर्शन सोलंकी

रोशनी को प्रगति और विकास का प्रतीक माना गया है। लेकिन अंधकार पर विजय पाने की इस होड़ की एक भारी पारिस्थितिक और स्वास्थ्य सम्बंधी कीमत चुकानी पड़ रही है। आज प्रकाश प्रदूषण (light pollution) एक ऐसे संकट के रूप में उभर चुका है, जिसे फिलहाल भारत सहित दुनिया भर में प्रदूषण की श्रेणी में गंभीरता से स्वीकार नहीं किया जाता।

भारतीय शहरों की स्थिति 

क्लाइमेट स्टार्टअप प्राणा एयर और उपग्रह अध्ययनों के अनुसार, दुनिया की 80 प्रतिशत आबादी और भारत की 50 प्रतिशत से अधिक आबादी हर रात कृत्रिम रूप से आलोकित आकाश (illuminated sky) तले जीवनयापन कर रही है। 2014 से 2022 के बीच दुनिया में रात के समय कृत्रिम रोशनी लगभग 16 प्रतिशत बढ़ी है।

भारत के महानगरों में रात का प्राकृतिक अंधेरा लगभग गायब हो चुका है। सामान्य प्राकृतिक रात की तुलना में:

– नई दिल्ली में रातें 61 गुना ज़्यादा चमकीली हो चुकी हैं।

– बेंगलुरु में 59 गुना, मुंबई में 52 गुना और इंदौर में 42 गुना अधिक चमक दर्ज की गई है।

– प्रयागराज में कुंभ मेले के दौरान यह चकाचौंध 91 गुना तक पहुंच गई थी, जो देश में सर्वोच्च स्तर है।

एलईडी का विरोधाभास

भारत में प्रकाश प्रदूषण के तेज़ी से बढ़ने की मुख्य वजह ऊर्जा-दक्ष तकनीकों (energy efficient technology) का अनियंत्रित उपयोग है। ‘उजाला योजना’ के तहत देश भर में 36 करोड़ से अधिक एलईडी बल्ब वितरित किए गए और पिछले एक दशक में स्थानीय निकायों द्वारा 1.34 करोड़ से ज़्यादा नई सड़क बत्तियां (स्ट्रीट लाइटें) लगाई गईं।

हालांकि सोडियम वैपर लाइट (sodium vapour light) की तुलना में एलईडी 8 गुना अधिक रोशनी देती है और बिजली बचाती है, लेकिन रोशनी का उपयोग बेहद सस्ता होने के कारण आवश्यकता से अधिक लाइटिंग की जाने लगी है। अर्थशास्त्र में इसे ‘जेवन्स विरोधाभास’ (Jevons Paradox) कहते हैं। जेवन्स विरोधाभास एक आर्थिक अवधारणा है। यह बताता है कि जब कोई उपकरण किसी संसाधन के उपयोग को अधिक कुशल बनाता है, तो उस संसाधन की कुल खपत कम होने की बजाय बढ़ जाती है। बेहतर दक्षता के कारण संसाधन का उपयोग सस्ता हो जाता है, जिससे समग्र मांग में भारी वृद्धि होती है। इसके अलावा, देश में मौजूद 35 करोड़ से अधिक वाहनों की हेडलाइट्स ने रातों के प्राकृतिक संतुलन को बिगाड़ दिया है।

जैवविविधता पर प्रहार

पृथ्वी पर जीवन का विकास 3.8 अरब वर्षों से 24 घंटे के प्रकाश-अंधकार चक्र (Circadian Rhythm) के तहत हुआ है। यदि यह गड़बड़ता है तो स्वभाविक है कि इसके असर भी होंगे।

प्रवासी पक्षियों पर असर: वर्ष 2024 में नवी मुंबई के नेरुल स्थित डीपीएस फ्लेमिंगो लेक में लगाई गई अत्यधिक चकाचौंध वाली एलईडी लाइटों (high voltage LED’s) के कारण हज़ारों किलोमीटर दूर से आए प्रवासी पक्षी दिशा भ्रमित हो गए और आसपास की इमारतों से टकराकर मर गए।

कीटों और परागण का नुकसान: रात्रिचर कीट (पतंगे, जुगनू) तेज़ रोशनी में भटककर अपनी ऊर्जा खो देते हैं। जर्नल ऑफ एप्लाइड इकोलॉजी के अनुसार, एलईडी लाइट वाले क्षेत्रों में कीटों के लार्वा की आबादी में 52 प्रतिशत तक की कमी आई है, जिससे फसलों का प्राकृतिक परागण ठप हो रहा है।

मानव स्वास्थ्य 

अंधेरा होते ही मस्तिष्क की पीनियल ग्रंथि मेलाटोनिन नामक हार्मोन (melatonin hormone) का स्राव करती है, जो गहरी नींद के लिए ज़रूरी है। इसके अलावा यह प्रतिरक्षा प्रणाली को मज़बूत करने और कैंसर कोशिकाओं को रोकने में भी भूमिका निभाता है। रात में एलईडी व स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी (तरंग दैर्घ्य 450–480 नैनोमीटर) मेलाटोनिन का बनना रोक देती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की कैंसर अनुसंधान एजेंसी (IARC) ने अत्यधिक रात्रि प्रकाश और नाइट-शिफ्ट वर्क को ‘संभावित कैंसरकारी’ (Group 2A) में वर्गीकृत किया है। यह वर्गीकरण शरीर की जैविक घड़ी में बाधा, मेलाटोनिन हार्मोन के कम उत्पादन और पशुओं पर किए गए शोध के आधार पर तय किया गया है।

भारत में नीतिगत शून्य

दुनिया के कई देशों ने इसे कानूनी रूप से नियंत्रित करना शुरू कर दिया है। चेक गणराज्य में स्ट्रीट लाइटों को ज़मीन पर फोकस न करके आसमान में रोशनी फैलाने पर 3 लाख रुपये से अधिक का जुर्माना है और सफेद प्रकाश वाली लाइटों (3000K) पर प्रतिबंध है। दरअसल, 3000K यानी 3000 केल्विन तापमान पर कोई ब्लैक बॉडी ऐसा ही प्रकाश पैदा करती है। हैलोजन लैम्प (hallogen lamp) की रोशनी इस तरह की होती है।

फ्रांस में रात 1 बजे के बाद दुकानों/दफ्तरों की बाहरी लाइटें बंद करना अनिवार्य है। जर्मनी में रिहाइशी इलाकों में रात 10 बजे के बाद तेज़ रोशनी प्रतिबंधित है।

भारत की स्थिति: वरिष्ठ पर्यावरणविदों के अनुसार, भारत में वायु, जल या ध्वनि प्रदूषण की तरह प्रकाश प्रदूषण के नियंत्रण के लिए कोई विशिष्ट कानून या राष्ट्रीय नीति नहीं है।

समाधान

प्रकाश प्रदूषण का समाधान बेहद आसान है – रोशनी की दिशा सही करना और बेवजह की चकाचौंध को बंद करना। इसके लिए सिर्फ इतना करना होगा:

– डाउन-शिल्डेड लाइटें (down shielded lights) लगाई जाएं ताकि रोशनी केवल ज़मीन पर पड़े।

– वार्म सीसीटी (<2200K) वाली पीली रोशनी का उपयोग बढ़े।

– लद्दाख के हानले डार्क स्काई रिजर्व जैसी पहलों को बढ़ावा दिया जाए।

प्राकृतिक अंधेरा (natural darkness) कोई अभाव नहीं, बल्कि हमारी पारिस्थितिकी का एक अमूल्य संसाधन (invaluable resource) है। यदि हमने समय रहते रोशनी के इस अतिरेक को नियंत्रित नहीं किया, तो हम न केवल आसमान के तारों को देखने से वंचित हो जाएंगे, बल्कि अपनी सेहत और जैव-विविधता की भी अपूरणीय क्षति कर बैठेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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डार्विन का अंदाज़ा सही था: यह पौधा कीटभक्षी है

दौलत सिंह तंवर

विज्ञान प्रकृति के रहस्यों को परत-दर-परत सुलझाने का उद्यम है। महान जीवविज्ञानी चार्ल्स डार्विन ने विकासवाद का सिद्धांत देकर दुनिया को चौंका दिया था। वनस्पति जगत को लेकर भी उनकी अंतर्दृष्टि और सूक्ष्म अवलोकन क्षमता बेजोड़ थी। वर्ष 1875 में, डार्विन ने एक पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम (Saxifraga candelabrum) को देखकर यह अनुमान लगाया था कि वह मांसाहारी (carnivorous) हो सकता है। पूरे डेढ़ सौ साल तक यह महज़ एक परिकल्पना बनी रही, क्योंकि इसे साबित करने के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं था। अंतत: अगस्त, 2026 में प्रकाशित एक अभूतपूर्व शोध ने वे प्रमाण उपलब्ध करा दिए हैं। चीन के हेंगडुआन पर्वत और किंगहाई-तिब्बत पठार की बर्फीली ऊंचाइयों पर पाए जाने वाले पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को अब आधिकारिक तौर पर एक मांसाहारी पौधे की मान्यता मिल गई है।

सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम कोई सामान्य पौधा नहीं है। इसका आवास स्थान समुद्र तल से हज़ारों मीटर ऊपर, अत्यधिक ठंडे और दुर्गम अल्पाइन क्षेत्रों में है। इन बर्फीले और पथरीले इलाकों की मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों, विशेषकर नाइट्रोजन और फास्फोरस की भारी कमी होती है। अत्यधिक ठंड के कारण मृत जीवों और वनस्पतियों का अपघटन बहुत धीमी गति से होता है, जिससे मिट्टी उपजाऊ नहीं बन पाती। ऐसे कठोर वातावरण में जीवित रहने के लिए पौधों को कुछ असाधारण रणनीतियां अपनानी पड़ती हैं। अपनी नाइट्रोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए प्रकृति ने इस पौधे को एक गुप्त हथियार दिया है – कीटों का शिकार करने की क्षमता (insect eating capacity)। यह पारिस्थितिक अनुकूलन (ecological adaptation) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां विपरीत परिस्थितियां किसी जीव को एक पूरी तरह से नई जीवनशैली अपनाने के लिए विवश कर देती हैं।

चार्ल्स डार्विन (charles darwin) ने अपने अध्ययन के दौरान सैक्सीफ्रेगा वंश के पौधों की पत्तियों और तनों पर मौजूद छोटे-छोटे ग्रंथिल रोमों को बेहद करीब से देखा था। उन्होंने पाया कि इन रोमों से चिपचिपा तरल पदार्थ स्रावित होता है, जिसमें छोटे-छोटे कीड़े अक्सर फंस जाते हैं। डार्विन को पूरा विश्वास था कि यह पौधा इन कीटों को केवल फंसाता ही नहीं है, बल्कि उन्हें पचाकर अपना भोजन भी बनाता है। हालांकि, उस समय विज्ञान इतना उन्नत नहीं था कि आणविक या रासायनिक स्तर पर इस प्रक्रिया को प्रमाणित किया जा सके। इसके अलावा, इस पौधे का निवास स्थान इतना दुर्गम है कि वहां जाकर लंबे समय तक इसका प्राकृतिक अवस्था में अध्ययन करना किसी भी वैज्ञानिक के लिए एक बड़ी चुनौती थी। यही कारण है कि डार्विन का यह विचार दशकों तक केवल परिकल्पना ही रहा और इसे मुख्यधारा के कीटभक्षी पौधों (insect eating plants) में शामिल नहीं किया गया।

हाल ही में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में चीनी शोधकर्ताओं के एक दल ने अपना विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया है। उन्होंने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को मांसाहारी साबित करने के लिए आधुनिक विज्ञान की सबसे उन्नत तकनीकों का सहारा लिया। वनस्पति विज्ञान के कड़े नियमों के अनुसार, किसी पौधे को केवल कीट फंसाने के आधार पर मांसाहारी नहीं कहा जा सकता। इसके लिए यह साबित करना अनिवार्य होता है कि पौधा शिकार को आकर्षित करता है, उसे फंसाता है, उसे पचाने के लिए विशेष एंज़ाइम (special enzyme) निकालता है और अंतत: उस शिकार से प्राप्त पोषक तत्वों को अपने भीतर अवशोषित करता है। शोध दल ने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को इन सभी मापदंडों की वैज्ञानिक कसौटी पर परखा।

शोध की शुरुआत व्यापक मैदानी अध्ययन से हुई। दल ने प्राकृतिक आवास में मौजूद सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के पौधों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण किया। उन्होंने पाया कि पौधे के चिपचिपे ग्रंथिल रोम (sticky pore glands) शिकार को पकड़ने में बेहद कुशल हैं। औसतन एक परिपक्व पौधे पर इकहत्तर छोटे कीट फंसे हुए मिले। यह इस बात का पहला संकेत था कि पौधा सक्रिय रूप से शिकार कर रहा है और ये कीट केवल संयोगवश नहीं फंसे थे।

दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम यह पता लगाना था कि क्या पौधा इन फंसे हुए कीटों को वास्तव में पचा रहा है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने फ्लोरेसेंस टैगिंग (flouroscence tagging) नामक एक विशेष प्रकाश-आधारित तकनीक का उपयोग किया। इस आधुनिक तकनीक के माध्यम से उन्होंने पौधे के ग्रंथिल रोमों में फॉस्फेटेस एंज़ाइम की गतिविधि का पता लगाया। फॉस्फेटेस वह प्रमुख पादप एंज़ाइम है जो शिकार के शरीर को गलाकर उसमें से आवश्यक पोषक तत्वों को अलग करने का काम करता है। यह एक बहुत बड़ी सफलता थी, क्योंकि इससे साबित हो गया कि पौधा कीटों को केवल पकड़ने के लिए चिपचिपा पदार्थ नहीं छोड़ता, बल्कि एक रासायनिक प्रक्रिया के तहत उन्हें पचाता (digest) भी है।

अंतिम और सबसे निर्णायक प्रमाण यह साबित करना था कि पौधे ने कीटों के शरीर से निकले पोषक तत्वों को वास्तव में सोख लिया है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने समस्थानिक ट्रेसिंग तकनीक (isotope tracing technique) का प्रयोग किया। उन्होंने प्रयोगशाला में फल मक्खियों को नाइट्रोजन के एक समस्थानिक (परमाणु भार 15 वाले आइसोटॉप) युक्त यौगिक से पोषित किया। नाइट्रोजन के दो स्थिर समस्थानिक होते हैं – एक का परमाणु भार 14 (उपस्थिति 99.26 प्रतिशत) और दूसरे का परमाणु भार 15 (उपस्थिति 0.38 प्रतिशत) होते हैं। इसके बाद इन मक्खियों को पौधे के ग्रंथिल रोमों पर रख दिया गया। कुछ दिनों बाद जब पौधे के ऊतकों का रासायनिक विश्लेषण किया गया तो वही नाइट्रोजन-15 समस्थानिक पौधे की पत्तियों और तनों के भीतर मौजूद पाया गया। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण था कि पौधे ने शिकार को पचाने के बाद उसके पोषक तत्वों को सफलतापूर्वक अवशोषित (Absorb) कर लिया है।

इन शारीरिक प्रमाणों के अलावा, शोधकर्ताओं ने पौधे का संपूर्ण जीनोम विश्लेषण भी किया। उन्होंने पाया कि सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के डीएनए में शिकार को आकर्षित करने, उसे पचाने और पोषक तत्वों को सोखने वाले वे सभी जीन सक्रिय (active genes) हैं, जो दुनिया के अन्य जाने-माने मांसाहारी पौधों में पाए जाते हैं।

विकासवाद के नज़रिए से यह बहुत महत्वपूर्ण खोज है। यह अभिसारी विकास का एक शानदार उदाहरण है, जहां बिल्कुल अलग-अलग वंश के पौधे समान पर्यावरणीय चुनौतियों (environmental stress) का सामना करने के लिए स्वतंत्र रूप से एक जैसी विशेषताएं विकसित कर लेते हैं।

यह शोध न सिर्फ वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है, बल्कि महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन की दूरदृष्टि (vision) को भी एक भव्य श्रद्धांजलि है। जो बात डार्विन ने अपनी सूक्ष्म अवलोकन क्षमता के आधार पर कही थी, उसे आधुनिक प्रयोगशालाओं और उन्नत तकनीकों ने सही साबित कर दिया है। सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम की यह कहानी हमें बताती है कि प्रकृति जीवन को बचाए रखने के लिए किस हद तक जा सकती है, और वैज्ञानिक जिज्ञासा अंतत: हर गहरे रहस्य को उजागर कर देती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वनों की अनोखी अनुकूलन क्षमता

वैश्विक जलवायु परिवर्तन के दौर में उष्णकटिबंधीय जंगलों (tropical forests) को सूखे के प्रति अधिक संवेदनशील माना जाता रहा है। लेकिन नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक खोज ने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया है। शोधकर्ताओं ने कैरेबियन द्वीप प्यूर्टो रिको के वनों के विभिन्न पेड़ों पर सूखे के प्रभाव का बारीकी से अध्ययन किया।

पाया गया कि एक ही प्रजाति के अलग-अलग पेड़ों में पानी की उपलब्धता और वातावरण के अनुकूल अपने हिसाब से परिवर्तन (adaptations) होते हैं। इस तरह के पूर्व अध्ययन अलग-अलग प्रजातियों की अनुकूलन क्षमता पर केंद्रित थे। वैज्ञानिकों का यह भी मानना था कि एक ही प्रजाति के सभी पेड़ सूखे के प्रति लगभग एक जैसी प्रतिक्रियाएं देते हैं।

शोधकर्ताओं ने प्यूर्टो रिको में प्राकृतिक वर्षा की मात्रा के आधार पर छह वन क्षेत्रों को चिन्हित किया। सालाना  85 सेंटीमीटर वर्षा वाले सूखे ग्वानिका वन (guanica forest) से लेकर 450 सेंटीमीटर वाले लुक्विलो वर्षावन (luquilo rainforest) में 18 विभिन्न प्रजातियों के 290 पेड़ों का परीक्षण किया। हर एक पेड़ से शाखाओं के नमूने लेकर प्रयोगशाला में उनके सूखने की प्रक्रिया को जांचा। जांच के दौरान हर पांच मिनट के अंतराल पर शाखाओं की तस्वीर ली गईं। तनों के जल विभव (वाटर पोटेंशियल) और वाहिका-रोध (एम्बोलिज़्म) को भी मापा गया। जल विभव से आशय होता है कि किसी स्थान से पानी किस ओर बहेगा और वाहिका-अवरोध का मतलब होता है कि पानी की कमी का कितना तनाव होने पर संवहनी ऊतक (ज़ायलम) की नलिकाओं में हवा के बुलबुले बनकर पानी का प्रवाह रोक देंगे।

18 में से 17 प्रजातियों के पेड़ों में वर्षा की मात्रा से सम्बंधित अंतर साफ दिखे। सूखे क्षेत्र वाले पेड़ों के संवहनी ऊतकों में एम्बोलिज़्म (embolism) के प्रति अधिक प्रतिरोधक क्षमता पाई गई। ये पेड़ सूखे के हालत में भी पर्ण रंध्रों (स्टोमैटा) को खुले रखने में सक्षम थे, जिससे पानी की कमी होते हुए भी नियंत्रित तौर पर भोजन बनाने की प्रक्रिया (प्रकाश संश्लेषण) जारी रही।

दूसरी ओर, नमी वाले वन क्षेत्रों के पेड़ों के तनों और पत्तियों में पानी संग्रह करने की अधिक क्षमता पाई गई।

शीतोष्ण क्षेत्रों (temperate areas) में एक ही प्रजाति के पेड़ों में वातावरण के अनुसार ऐसा अनुकूलन अक्सर कम ही देखने को मिलता है, लेकिन प्यूर्टो रिको के उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में यह अंतर बिल्कुल स्पष्ट था। इस अनुकूलन क्षमता का एक कारण वर्षावन की ज्वालामुखीय मिट्टी है, जो नमी बेहतर ढंग से सोखती है। जबकि सूखे क्षेत्र में चूना पत्थर (limestone) की मिट्टी पानी नहीं रोक पाती। 

यह खोज जलवायु परिवर्तन के अनुसार वन संरक्षण मॉडलों (forest conservation models) को ज़्यादा सटीक बनाने में मददगार साबित होगी, क्योंकि अब वैज्ञानिक किसी प्रजाति की एक निश्चित क्षमता के बजाय स्थानीय स्तर पर होने वाले अनुकूलन को भी शामिल कर सकेंगे। यह अध्ययन पेड़ों के लचीले स्वभाव को तो दर्शाता है, लेकिन साथ ही वैज्ञानिक एक चेतावनी भी दे रहे हैं। तेज़ी से बढ़ता वैश्विक तापमान और सूखे जैसे हालात इन पेड़ों की सहनशीलता की सीमा को लांघ सकते हैं, जिससे भविष्य में वनों का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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ये शैल चित्र क्या इंसानी खून से बनाए गए हैं?

म तौर पर प्राचीन समय के शैल चित्र ऐसी चट्टानों पर मिलते हैं जो थोड़ी गुफानुमा या ढंकी हुई हों। प्राचीन लोगों ने जब खुली चट्टान या खड़ी-चट्टानों पर चित्रकारी की भी है तो उनका मौसम-पानी की मार के कारण सलामत बचा रहना मुश्किल रहा है। लेकिन अब शैल चित्रों (Rock paintings) का ऐसा समूह मिला है जो खड़ी चट्टान के खुले पहलू पर होने के बाद भी सदियों से सही-सलामत है।

चीन की ज़ुओजियांग नदी घाटी (Zuojiang River Valley) की सपाट, खड़ी चट्टानों पर बने शैल चित्र हवा-पानी की सीधी मार पड़ने के बावजूद आज भी एकदम नुमाया और अक्षुण्ण हैं। ये रंग चट्टानों से इतनी मज़बूती से चिपके हैं कि यदि वे उखड़ते हैं, तो रंग के साथ चूना-पत्थर की परत भी साथ झड़ जाती है। ये शैल-चित्र ज़ुओजियांग नदी के साथ-साथ 260 किलोमीटर लंबाई में फैली चूना-पत्थर (कार्स्ट लाइमस्टोन) की खड़ी चट्टानों पर करीब 80 पुरातात्विक स्थलों पर मिलते हैं। ये स्थल ज़ुओजियांग हुआशान रॉक आर्ट कल्चरल लैंडस्केप (Zuojiang rock art cultural landscape) नाम से जाने जाते हैं।

ये चित्र लगभग 2000 साल से अधिक पुराने हैं। इन्हें लोयुए संस्कृति के लोगों ने पांचवीं शताब्दी ईसा पूर्व से दूसरी शताब्दी ईसवीं के बीच लगभग लगभग 700 साल की अवधि में बनाया था। लोयुए समाज (luoyue) दक्षिणी चीन में रहने वाला एक मातृसत्तात्मक समाज (matrilineal society) था। ये लोग प्राय: शिकारी, मछुआरे और संग्राहक थे।

लोयुए संस्कृति के लोगों ने कमोबेश इन चित्रों में दोनों हाथ ऊपर किए हुए उकड़ू बैठी मुद्रा में नग्न पुरुषों की टोली, पंखों का ताज पहने एक विशालकाय व्यक्ति, आसपास कुछ जानवर और प्राचीन रस्मों में बजने वाले ढोल और घंटियां गेरुआ लाल रंग में बनाए हैं। साथ ही, गर्भवती महिलाओं और प्रसव का चित्रण मिलता है।

काफी समय से वैज्ञानिक इस बात से हैरान थे यह मुक्ताकाश शैल चित्र दीर्घा मौसम की इतनी कड़ी मार कैसे झेल पाई, जबकि अन्य स्थलों पर इसके सैकड़ों साल बाद बने शैल चित्र मिट चुके हैं या धुंधले पड़ चुके हैं।

इस हैरानी ने ही शेडोंग युनिवर्सिटी की रसायनशास्त्री मेंग वू और उनके साथियों को चट्टानों के तीन स्थलों पर चित्रों के झड़े हुए टुकड़ों का अवरक्त प्रकाश (Infrared spectroscopy) और इलेक्ट्रॉन बीम से विश्लेषण करने को उकसाया। अवरक्त प्रकाश की मदद से उन्होंने इन चित्रों के रंगों में इस्तेमाल घटकों की आणविक स्तर पर पहचान की। और अत्यंत सूक्ष्म स्तर इसके कण-गठन (टेक्स्चर) का पता लगाने के लिए इलेक्ट्रॉन बीम का इस्तेमाल किया।

पता चला कि रंग बनाने के लिए लोयुए कलाकारों ने पहले अत्यधिक तपाए गए चूना-पत्थर (कैल्शियम कार्बोनेट) और जानवरों की हड्डियों से एक गाढ़ा पेस्ट बनाया। इस पेस्ट में उन्होंने पानी और खून मिलाकर एक चिकना और पतला घोल तैयार किया। इस घोल में मौजूद बुझा हुआ चूना, कैल्शियम फॉस्फेट (calcium phosphate) और खून के प्रोटीन रंग को बांधे रखने का काम करते थे। लाल रंग के लिए उन्होंने स्थानीय लाल मिट्टी में मौजूद आयरन ऑक्साइड (iron oxide) का इस्तेमाल किया।

इलेक्ट्रॉन माइक्रोस्कोपी (electron microscopy) में उन्हें चित्रों की अलग-अलग परतें दिखाई दीं, जिससे पता चला कि चट्टान पर चित्रकारी दो चरणों में की गई थी। पहले चरण में चट्टान की सतह पर प्राइमर (primer) के तौर पर रक्त-युक्त घोल लगाया गया था और फिर इस अध-सूखे अस्तर पर लाल मिट्टी का रंग चढ़ाया गया था। जैसे ही बुझा हुआ चूना हवा की कार्बन डाईऑक्साइड के साथ क्रिया करता था, रक्त-प्रोटीन कैल्शियम कार्बोनेट के ‘जैव-खनिजीकरण’ (biomineralization) को बढ़ावा देते थे, जिससे रंग चट्टान की सतह के साथ मज़बूती से जुड़ जाता था।

जब शोध दल ने रक्त का विश्लेषण किया, तो उन्हें उसमें जानवरों के साथ-साथ मानव रक्त के प्रोटीन (human blood protein) भी मिले। वू बताती है कि वे नमूनों में मानव रक्त के निशान मिलने से भौंचक्की रह गई थीं। वे सोचने लगीं कि क्या ये कलाकार चित्रकारी के लिए खुद अपने शरीर पर घाव करते थे? क्या लोगों की बलि दी जाती थी? लेकिन तभी उन्हें एक बात सूझी – उस समय उनके पीरियड्स चल रहे थे। उन्होंने सोचा कि शायद खून कम हिंसक तरीके से इकट्ठा किया गया होगा, जैसे माहवारी या प्रसव का।

वू की टीम ने खून की और भी बारीकी से जांच की, तो उन्हें उसमें दो प्रोटीन – प्रोलैक्टिन-इंड्यूसिबल प्रोटीन (protein inducible protein) और लैक्टोफेरिन (lactoferin) – की थोड़ी मात्रा मिली। ये दोनों प्रोटीन रक्त में गर्भावस्था के आखिरी समय में बढ़ जाते हैं। चूंकि लोयुए लोग मातृवंशीय परंपरा को मानते थे, और भित्ति-चित्रों में गर्भवती महिलाओं और बच्चे के जन्म चित्रित किए गए हैं, इसलिए शोधकर्ताओं का अनुमान है कि प्रसव के दौरान निकलने वाले खून को प्रजनन क्षमता (fertility) से जुड़े अनुष्ठानों के लिए इकट्ठा किया जाता होगा। वैसे भी, चित्रकारी के लिए हर वर्ग मीटर पर खून की बस चंद मिलीलीटर मात्रा की ही ज़रूरत रहती होगी।

अन्य शोधकर्ता कहते हैं वैसे तो अध्ययन बहुत सावधानी से और विस्तार से किया गया है। फिर भी, इस बात के पर्याप्त सबूत नहीं हैं कि वह खून गर्भवती महिलाओं (pregnant females) का ही था। ऐसा इसलिए, क्योंकि इंसानी खून के संकेत बहुत हल्के थे, और इनमें 2000 सालों तक चट्टान की सतह पर मौसम की मार झेलने के कोई रासायनिक संकेत नहीं मिले हैं। इसलिए इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि शायद ये रसायन नमूनों की जांच के दौरान के दौरान मिल गए होंगे।

पूरे दावे के साथ कुछ भी कहना मुश्किल है क्योंकि हम इतिहास में वापिस जाकर लोयुए लोगों से बात करके कुछ पक्का नहीं कर सकते। लेकिन इतना तो कहा जा सकता है कि प्राचीन लोग न सिर्फ चित्रकारी करके अपनी संस्कृति की जानकारी दर्ज कर रहे थे, बल्कि वे कुशल बायोकेमिकल इंजीनियर (skilled biochemical engineers) थे। यह अध्ययन विस्तार से जर्नल ऑफ आर्कियोलॉजिकल साइंस के आगामी किसी अंक में प्रकाशित होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अगली पीढ़ी की अंतरिक्ष वेधशाला: रोमन अंतरिक्ष दूरबीन

डॉ. इरफान ह्यूमन

मनुष्यों ने सदियों से आकाश की ओर देखकर ब्रह्माण्ड (universe) के रहस्यों को समझने का प्रयास किया है। दूरबीनों के आविष्कार से लेकर आधुनिक अंतरिक्ष वेधशालाओं (Modern Space Laboratories) तक विज्ञान ने हमें ब्रह्माण्ड की अद्भुत झलक दिखाई है। इसी क्रम में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा की नैन्सी ग्रेस रोमन अंतरिक्ष दूरबीन खगोल विज्ञान के इतिहास में एक मील का पत्थर बनने जा रही है। यह अत्याधुनिक अंतरिक्ष दूरबीन ब्रह्माण्ड के विस्तार, डार्क मैटर, डार्क एनर्जी और हमारे सौरमंडल से बाहर स्थित ग्रहों (एक्सोप्लैनेट) के बारे में नई जानकारियां प्रदान करेगी।

इस दूरबीन का नाम प्रसिद्ध अमेरिकी खगोलविद नैन्सी ग्रेस रोमन (Nncy grace roman) के सम्मान में रखा गया है। नैन्सी ग्रेस रोमन को आधुनिक अंतरिक्ष खगोल विज्ञान की अग्रदूत माना जाता है। उन्हें अक्सर हबल स्पेस टेलीस्कोप की जननी (Mother of Hubble) कहा जाता है क्योंकि उन्होंने हबल मिशन की अवधारणा और विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

नैन्सी ग्रेस रोमन अंतरिक्ष दूरबीन का प्राथमिक दर्पण (प्राइमरी मिरर) 2.4 मीटर व्यास का है, जो हबल अंतरिक्ष दूरबीन के दर्पण के बराबर है। हालांकि इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसका अत्यंत विशाल दृष्टि क्षेत्र (फील्ड ऑफ व्यू) है, और यह हबल की तुलना में लगभग 100 गुना अधिक क्षेत्र को एक साथ देख सकती है।

प्रमुख उपकरण

यह दूरबीन 21वीं सदी की सबसे उन्नत अंतरिक्ष वेधशालाओं में से एक है। इसमें मुख्य रूप से दो वैज्ञानिक उपकरण लगाए गए हैं – वाइड फील्ड इंस्ट्रूमेंट (WFI) तथा कोरोनाग्राफ इंस्ट्रूमेंट (CGI)।

1. वाइड फील्ड इंस्ट्रूमेंट: इस दूरबीन का मुख्य वैज्ञानिक उपकरण है। यह एक अत्याधुनिक निकट-अवरक्त (नीयर इन्फ्रारेड) कैमरा और स्पेक्ट्रोस्कोपिक प्रणाली (Spectroscopic system) है, जो 0.5 से 2.3 माइक्रॉन तरंगदैर्घ्य के प्रकाश का अध्ययन करती है। इसकी प्रमुख विशेषताएं हैं:

300 मेगापिक्सेल का कैमरा

0.281 वर्ग डिग्री का विशाल दृष्टि क्षेत्र

इमेजिंग तथा स्लिटलेस स्पेक्ट्रोस्कोपी, दोनों की सुविधा

अत्यंत संवेदनशील अवरक्त डिटेक्टर

विशाल खगोलीय सर्वेक्षणों के लिए उपयुक्त

डब्ल्यूएफआई के मुख्य उप घटक

(क) फोकल प्लेन ऐरे: यह डब्ल्यूएफआई का ‘हृदय’ (Heart of WFI) है। इसमें 18 उन्नत H4RG-10 डिटेक्टर लगे हैं। प्रत्येक डिटेक्टर से कुल मिलाकर लगभग 300 मेगापिक्सेल का चित्रण संभव होता है।

(ख) इमेजिंग फिल्टर प्रणाली: डब्ल्यूएफआई में 8 वैज्ञानिक फिल्टर लगाए गए हैं। इन फिल्टरों की सहायता से वैज्ञानिक विभिन्न तरंगदैर्घ्यों 9wavelength) पर निहारिकाओं, तारों और निहारिकाओं का अध्ययन कर सकेंगे।

(ग) ग्रिज़्म: ग्रिज़्म, दरअसल ग्रेटिंग और प्रिज़्म का संयुक्त रूप है। इसका काम प्रकाश को विभिन्न रंगों (वर्णक्रम) में विभाजित करना, निहारिकाओं की दूरी और गति मापना और ब्रह्माण्ड के विस्तार (Universal expansion) की दर निर्धारित करना है।

(घ) लो-रिज़ोल्यूशन प्रिज़्म: इसका उपयोग मंद एवं अत्यधिक दूरस्थ निहारिकाओं का अध्ययन, प्रारंभिक ब्रह्माण्ड के अवलोकन और डार्क एनर्जी सर्वेक्षणों (Drak energy survey) में सहायता करना है।

2. कोरोनाग्राफ इंस्ट्रूमेंट: यह एक तकनीकी प्रदर्शन उपकरण है जिसे तारों के प्रकाश को अवरुद्ध करने और दूरस्थ एक्सोप्लैनेट (Exoplanet) की सीधी छवि प्राप्त करने के लिए डिज़ाइन किया गया है।

सामान्यत: कोई ग्रह अपने तारे की तुलना में अरबों गुना कम चमकदार होता है। इसलिए ग्रह सीधे दिखाई नहीं देते। सीजीआई विशेष तकनीकों की सहायता से तारे के प्रकाश को दबाकर ग्रहों को देखने योग्य बनाता है।

कोरोनाग्राफ की प्रमुख तकनीकें

(क) कोरोनाग्राफ मास्क: विशेष रूप से निर्मित सूक्ष्म ऑप्टिकल मास्क (optical mask) तारे के प्रकाश को अवरुद्ध करते हैं। इसका लाभ ग्रहों को सीधे देखने में सहायता, तारकीय प्रकाश के प्रभाव को कम करना और ग्रहों के वायुमंडल का अध्ययन करना है।

(ख) डिफॉर्मेबल मिरर: ये ऐसे दर्पण हैं जिनका आकार अत्यंत सूक्ष्म स्तर पर बदला जा सकता है। इनका कार्य प्रकाशीय विकृतियों को दूर करना, चित्रों की स्पष्टता बढ़ाना और ग्रहों की पहचान को सटीक बनाना है।

(ग) वेवफ्रंट सेंसिंग एवं नियंत्रण प्रणाली: इसका कार्य प्रकाशीय त्रुटियों का पता लगाना, स्वतः सुधार करना और उच्च कंट्रास्ट वाली छवियां प्राप्त करना है।

(घ) इलेक्ट्रॉन मल्टीप्लाइंग सीसीडी डिटेक्टर: ये अत्यंत संवेदनशील डिटेक्टर होते हैं। ये बहुत कम प्रकाश को भी रिकॉर्ड कर सकते हैं।

मानवता के लिए महत्व

1. ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति और विकास को समझने में मदद: एक बड़ा प्रश्न रहा है – ‘ब्रह्माण्ड कैसे बना और यह कैसे विकसित हो रहा है।’ रोमन अंतरिक्ष दूरबीन (Roman space telescope) अरबों निहारिकाओं का अध्ययन करके ब्रह्माण्ड का एक विशाल त्रि-आयामी मानचित्र (3-D structure) तैयार करेगी। इससे वैज्ञानिक यह समझ सकेंगे कि बिग बैंग (Big bang) के बाद ब्रह्माण्ड कैसे विकसित हुआ, निहारिकाएं कैसे बनीं और समय के साथ उनकी संरचना में क्या परिवर्तन हुए। इस प्रकार रोमन दूरबीन हमें अपने ब्रह्माण्डीय इतिहास को समझने में सहायता करेगी।

2. डार्क एनर्जी और डार्क मैटर के रहस्य को समझना: वर्तमान वैज्ञानिक अध्ययनों के अनुसार ब्रह्माण्ड का लगभग 68 प्रतिशत भाग डार्क एनर्जी से बना है। यह एक रहस्यमयी शक्ति है जो ब्रह्माण्ड के विस्तार को लगातार तेज़ कर रही है। आज तक वैज्ञानिक यह नहीं जानते कि डार्क एनर्जी वास्तव में क्या है? इसकी उत्पत्ति कैसे हुई? यह भविष्य में ब्रह्माण्ड को किस दिशा में ले जाएगी? रोमन अंतरिक्ष दूरबीन लाखों सुपरनोवा 9supernova) तथा अरबों निहारिकाओं का अध्ययन करके डार्क एनर्जी के व्यवहार को समझने में सहायता करेगी। यदि डार्क एनर्जी का रहस्य सुलझ जाता है, तो यह आधुनिक भौतिकी की महत्वपूर्ण उपलब्धियों में से एक होगा।

वैज्ञानिकों का अनुमान है कि ब्रह्माण्ड का लगभग 27 प्रतिशत भाग डार्क मैटर से बना है, लेकिन इसे प्रत्यक्ष रूप से कभी नहीं देखा गया है। रोमन अंतरिक्ष दूरबीन गुरुत्वीय लेंसिंग तकनीक (gravitational lensing technique) का उपयोग करके डार्क मैटर के वितरण का मानचित्र तैयार करेगी। इससे वैज्ञानिक समझ सकेंगे कि डार्क मैटर कहां स्थित है। यह निहारिकाओं को कैसे प्रभावित करता है और ब्रह्माण्ड की संरचना में इसकी क्या भूमिका है। यह अध्ययन आधुनिक खगोल विज्ञान और कण भौतिकी के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण होगा।

3. पृथ्वी जैसे ग्रहों की खोज: क्या ब्रह्माण्ड में पृथ्वी के अतिरिक्त कहीं और जीवन मौजूद है? यह प्रश्न सदियों से मानव जिज्ञासा का विषय रहा है। रोमन अंतरिक्ष दूरबीन हज़ारों नए एक्सोप्लैनेट्स की खोज करेगी। इनमें से कुछ ग्रह अपने तारों के रहने योग्य क्षेत्र में हो सकते हैं, जहां तरल जल की उपस्थिति संभव है।

इन खोजों से पृथ्वी जैसे ग्रहों की संख्या का अनुमान लगाया जा सकेगा, जीवन की संभावनाओं (life expectency) का अध्ययन होगा, भविष्य के अंतरतारकीय अभियानों (interstellar mission) की दिशा तय होगी। यदि किसी ग्रह पर जीवन के संकेत मिलते हैं, तो यह मानव इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण खोजों में से एक होगी।

4. मानव ज्ञान की सीमाओं का विस्तार: इतिहास बताता है कि प्रत्येक बड़ी वैज्ञानिक खोज ने मानव सोच को बदल दिया है। कॉपरनिकस ने बताया था कि पृथ्वी ब्रह्माण्ड का केंद्र नहीं है। गैलीलियो ने दूरबीन से आकाश का अध्ययन किया। हबल ने दिखाया था कि हमारी आकाशगंगा (galaxy) अकेली निहारिका नहीं है। जेम्स वेब दूरबीन ने प्रारंभिक ब्रह्माण्ड की झलक दिखाई थी।

उसी प्रकार रोमन अंतरिक्ष दूरबीन मानव ज्ञान की सीमाओं को और आगे बढ़ाएगी। यह हमें उन प्रश्नों के उत्तर खोजने में मदद करेगी जिनके बारे में आज केवल अनुमान लगाए जाते हैं।

5. विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास को गति: अंतरिक्ष मिशनों के लिए विकसित तकनीकें अक्सर पृथ्वी पर भी उपयोगी सिद्ध होती हैं। भविष्य में इन तकनीकों का उपयोग चिकित्सा, दूरसंचार, रक्षा, मौसम विज्ञान और कंप्यूटर विज्ञान में किया जा सकता है। इस प्रकार यह मिशन अप्रत्यक्ष रूप से मानव जीवन की गुणवत्ता (quality of life) को भी बेहतर बनाएगा।

6. अगली पीढ़ी के वैज्ञानिकों को प्रेरणा: बड़े वैज्ञानिक मिशन केवल अनुसंधान ही नहीं करते, बल्कि नई पीढ़ी को प्रेरित भी करते हैं। रोमन अंतरिक्ष दूरबीन विद्यार्थियों में विज्ञान के प्रति रुचि अवश्य बढ़ाएगी।

7. अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा: आधुनिक अंतरिक्ष अनुसंधान किसी एक देश का कार्य नहीं है। रोमन मिशन में कई देशों के वैज्ञानिक, विश्वविद्यालय और अनुसंधान संस्थान शामिल हैं। लिहाज़ा, यह मिशन वैश्विक वैज्ञानिक सहयोग को मज़बूत करेगा, ज्ञान के आदान-प्रदान को बढ़ाएगा और मानवता को साझा वैज्ञानिक लक्ष्यों की ओर प्रेरित करेगा।

रोमन अंतरिक्ष दूरबीन में प्रयुक्त कई तकनीकें भविष्य के मिशनों के लिए परीक्षण मंच (टेक्नॉलोजी डिमांस्ट्रेशन) का कार्य करेंगी। विशेष रूप से इसका कोरोनाग्राफ इंस्ट्रूमेंट (coronagraph instrument) भविष्य में ऐसी दूरबीनों के निर्माण का आधार बनेगा जो पृथ्वी जैसे बाह्यग्रहों की प्रत्यक्ष तस्वीरें ले सकें। इस प्रकार रोमन मिशन आने वाले दशकों के अंतरिक्ष अनुसंधान की नींव रखेगा।

अतः रोमन अंतरिक्ष दूरबीन केवल एक दूरबीन नहीं है, बल्कि यह ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति, विकास और भविष्य को समझने का एक शक्तिशाली साधन भी है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चौदह वर्ष की बहस के बाद एक बीमारी का नया नाम

ऋषि राज राय

पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, जिसे PCOS कहा जाता था, अब आधिकारिक रूप से पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) कहलाएगा। यह घोषणा 12 मई 2026 को लैंसेट में प्रकाशित एक अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्र में हुई। इस नाम-परिवर्तन के पीछे चौदह वर्षों की प्रक्रिया है, जिसमें छह महाद्वीपों से 22,000 से अधिक मरीज़ों, डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और मरीज़-संगठनों की राय ली गई। अगुवाई ऑस्ट्रेलिया के मोनाश विश्वविद्यालय की हेलेना टीड ने की, और फिनलैंड के ओलू विश्वविद्यालय की तेरही पिल्टोनन सहायक रहीं।नाम बदलने का कारण वैज्ञानिक असंतोष था। PCOS का नाम अंडाशय पर बनने वाले सिस्ट (गांठ – त्वचा के नीचे या शरीर के अंदर स्थित एक बंद थैली जिसमें तरल पदार्थ, हवा या मुलायम पदार्थ भरा होता है) पर आधारित था। लेकिन ये गांठें असल में गांठें नहीं होतीं। ये अपरिपक्व फॉलिकल (पुटिकाएं) (immature follicle) होती हैं, जिन्हें अल्ट्रासाउंड जांच में गांठ (सिस्ट) जैसा दिखने के कारण यह नाम मिला था। इसी शोध समूह का एक अध्ययन दिखाता है कि इस बीमारी वाली महिलाओं में असामान्य अंडाशयी सिस्ट का प्रसार बाकी आबादी से अलग नहीं है। यानी नाम जिस लक्षण पर आधारित था, वह न रोग-विशिष्ट था, न अनन्य।

इस बीमारी की असली प्रकृति अंडाशय तक सीमित नहीं है। यह एक बहु-तंत्रगत अंत:स्रावी-चयापचय अवस्था है, जिसमें इंसुलिन प्रतिरोध, एंड्रोजेन हार्मोन की अधिकता, हाइपोथैलेमस-पिट्यूटरी अनियमितता, त्वचा के लक्षण, वज़न में परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य पर असर वगैरह शामिल हैं। PMOS (Polyendocrine Metabolic Ovarian Syndrome) वाली महिलाओं में टाइप-2 डायबिटीज़ का जोखिम कई गुना अधिक होता है, हृदय रोग का जोखिम बढ़ा हुआ होता है, और मानसिक अवसाद कहीं ज़्यादा आम है। इनमें से कोई भी अकेले अंडाशय की बीमारी नहीं है।

पुराने नाम (PCOS) ने तीन बड़ी समस्याएं पैदा की थीं। पहली, निदान में देरी। लक्षण चूंकि त्वचा, वज़न, बालों, या मनःस्थिति के होते हैं, महिलाएं अलग-अलग विशेषज्ञों के पास चक्कर काटती रहती हैं, और स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynaecologist) के पास पहुंचने पर ही कभी-कभार निदान हो पाता है। दूसरी, टुकड़ों-टुकड़ों में इलाज। एक डॉक्टर बालों की समस्या, दूसरा अनियमित माहवारी, तीसरा वज़न की दिक्कत पर ध्यान देता; कोई पूरी तस्वीर नहीं देखता था। और तीसरी लांछन का डर। ‘ओवेरियन’ (ovarian) शब्द के कारण कई देशों में महिलाओं को अपनी बीमारी बताने में शर्म आती थी।

नाम-परिवर्तन की प्रक्रिया अपने आप में गौरतलब है। इसमें अमेरिकन एंडोक्राइन सोसाइटी, अंतर्राष्ट्रीय एंड्रोजेन एक्सेस और PCOS सोसाइटी, और ब्रिटेन के वेरिटी सहित 56 अकादमिक, चिकित्सा और मरीज़ संगठनों ने भाग लिया। वर्ष 2017, 2023 और 2025 में तीन वैश्विक सर्वेक्षण हुए। अंतिम सर्वेक्षण में लगभग 14,360 मरीज़ और स्वास्थ्य पेशेवर शामिल हुए। कार्यशालाओं में विश्व के हर क्षेत्र से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ। जब पूछा गया कि नए नाम से क्या उम्मीद करनी चाहिए, तो तीन बातें सबसे ऊपर थीं: नया नाम लांछन कम करे, आसानी से समझ आए और वैज्ञानिक रूप से सही हो।

नाम बदलने पर आपत्ति भी दर्ज हुई। अमेरिका के दो प्रमुख मरीज़-संगठन नेताओं, अंजेला ग्रासी और साशा ऑटी का कहना है कि PMOS “बहुत बदला हुआ तो है लेकिन पर्याप्त नहीं बदला है।” उनका मुख्य तर्क यह है कि नए नाम में ‘ओवेरियन’ शब्द बरकरार है, जो बीमारी के पुरुष रूप की संभावना को अनदेखा करता है।

हाल के अध्ययन बताते हैं कि PMOS वाली महिलाओं के पुरुष रक्त-सम्बंधियों में भी इंसुलिन प्रतिरोध, कम उम्र में गंजापन, और चयापचय जोखिम बढ़ा हुआ मिलता है। यानी बीमारी की जड़ में जो अंत:स्रावी चयापचय (endocrine system) असंतुलन है, वह सिर्फ अंडाशय में नहीं होता बल्कि पुरुषों में भी हो सकता है।

भारत के लिए यह बहस विशेष रूप से प्रासंगिक है। यहां PMOS का प्रसार 8 से 22 प्रतिशत के बीच आंका गया है; और शहरी युवा महिलाओं में यह और अधिक हो सकता है। लेकिन भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था इसे अभी भी मुख्यतः स्त्री रोग (gynaecological) के रूप में देखती है, न कि चयापचय (metabolism) से सम्बंधित बीमारी के रूप में। परिणाम यह है कि करोड़ों महिलाएं बिना निदान के जीती हैं, या केवल जन्म-नियंत्रण गोलियों से लक्षण दबाती हैं, जबकि चयापचय जोखिम पीछे-पीछे बढ़ता रहता है। नए नाम का असर तभी होगा जब सरकारी दिशानिर्देश, मेडिकल कॉलेजों का पाठ्यक्रम, और आयुष्मान भारत जैसे कार्यक्रम इसे चयापचय बीमारी की तरह देखना शुरू करें।

नए नाम से निदान के मानदंड (diagnosis) और इलाज तुरंत नहीं बदलेंगे। जो बदलेगा वह है भाषा, और भाषा के साथ ध्यान की दिशा। लैंसेट में शोध दल ने साफ किया है कि कई वर्षों तक दोनों नाम साथ चलेंगे, चिकित्सा रिकॉर्ड में दोनों दिखाई देंगे, और नए नाम को धीरे-धीरे अपनाया जाएगा।

वैसे चिकित्सा के इतिहास (Medical history) में यह पहला नाम-परिवर्तन नहीं है। बाइपोलर डिसऑर्डर (पहले उन्मादी अवसाद या मैनिक डिप्रेशन कहा जाता था), डाउन सिंड्रोम (पहले मंगोलिज़्म या मंगोलियन पागलपन), और पेट के अल्सर (पूर्व में अपच) के मामले में हर बार नाम केवल शब्द नहीं था। नाम ने तय किया कि डॉक्टर क्या देखेंगे, शोधकर्ता क्या पूछेंगे, और मरीज़ अपनी बीमारी को कैसे समझेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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