पौधों और कीटों की जुगलबंदी

अपूर्वा आचार्य

ल्पना कीजिए एक ऐसे बगीचे की जिसमें फूल बेरंग हों, चिड़िया की चहचहाहट न हो, भंवरों का गुंजन और रंगीन तितलियां गायब हों; सब फीका-फीका, सूना-सूना सा हो। ऐसा सचमुच हुआ तो जीवनचक्र ही थम जाएगा। प्रकृति की यह छटा कोई चुटकियों में घटी घटना नहीं, बल्कि करोड़ों सालों की बेजोड़ साझेदारी (coordination) का नतीजा है। चिड़िया, मधुमक्खियां, भंवरे, तितलियां, ये छोटे-छोटे जीव केवल सुंदरता नहीं बढ़ाते, बल्कि इनका अनदेखा श्रम हमारी प्रकृति को सहेजे हुए है।

वास्तव में, करोड़ों साल पहले धरती पर जीवन बिल्कुल भी आज जैसा नहीं था, बल्कि यह ऐसा दौर था जब फूल और कीट धरती पर प्रकट ही नहीं हुए थे। किंतु कुछ बैक्टीरिया और शैवाल ने धरती की कायापलट कर दी। ये वे जीव थे जिन्होंने सबसे पहले प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) की प्रक्रिया शुरू की। इसके व्यापक असर हुए, क्योंकि इस प्रक्रिया के एक गौण उत्पाद के तौर पर ऑक्सीजन बनकर वातावरण में फैली। कुछ जीव इस बढ़ी हुई ऑक्सीजन को झेल नहीं पाए और मारे गए, वहीं कुछ जीवों के लिए यह वरदान साबित हुई और वे फैलते गए। उन्हीं प्रकाश संश्लेषी जीवों की बुनियाद पर वर्तमान के पेड़-पौधे विकसित हुए हैं। प्रकृति के इस अनोखे रूप को समझने के लिए इतिहास को टटोलना ज़रूरी है।

युगों पहले, प्राचीन पौधे समंदर के भीतर ही अपना जीवन जीते थे। ऐसे पौधों को ‘गोताखोर’ की संज्ञा दी जा सकती है। जैव विकास की नज़र से देखें, तो लगभग 45-48 करोड़ साल पहले, कीटों का विकास महासागर में रहने वाले क्रस्टेशियन जीवों (crustaceans) से हुआ और लगभग उसी समय पौधे भी पहली बार समंदर से भूमि पर आ बसे। हालांकि शुरुआती कीटों के पंख नहीं थे; वे उड़ नहीं सकते थे। लेकिन समय के साथ विकसित होते-होते वे पृथ्वी पर उड़ने वाले सबसे पहले जीव हुए। वहीं शुरुआती भूमिगत पौधों में बिना फूलवालों का ही दबदबा था; फर्न (टेरिडोफाइटा) (pteridophyta) और अनावृतबीजी (जिम्नोस्पर्म) (gymnosperm) जैसे शंकुधारी वृक्ष, और साइकैड। ऐसे पौधों के विकास के साथ यह पहली बार हुआ कि नर और मादा लिंग अलग-अलग हो गए। इनमें नर की जनन कोशिकाओं के मादा जनन कोशिकाओं से मिलन के बाद ही अगली पीढ़ी की शुरुआत होती थी।

अब एक दिक्कत पेश आई। पेड़-पौधे खुद चलकर आपस में जनन कोशिकाओं का आदान-प्रदान तो कर नहीं सकते; ज़ाहिर है उन्हें इस मिलन को संभव बनाने के लिए किसी बाहरी कर्ता यानी बिचौलिए की ज़रूरत पड़ी। शुरुआती पेड़-पौधे इस ‘सेवा’ के लिए केवल हवा के भरोसे थे। अनावृतबीजी पौधे हज़ारों हल्के-उड़ने वाले पराग कण बनाते थे, करोड़ों में से कोई एक पराग कण संयोगवश मादा तक पहुंच पाता था। मादा भाग तक पहुंचते ही वहां उपस्थित खास चिपचिपा जाल पराग कण (pollen grain) को जल्दी से पकड़ लेता था। इस चरण को परागण (pollination) कहते हैं।

पेड़पौधों की वंशवृद्धि

वैसे तो अधिकांश पौधे अलैंगिक प्रजनन (asexual reproduction) के ज़रिए भी वंश बढ़ा सकते हैं। इसका एक प्रकार है – कायिक प्रजनन (vegetative propagation)। इसमें पौधे के छोटे भाग (तना, पत्ती या जड़) से पूर्ण नवीन पौधे का विकास हो जाता है और नवीन पौधा आनुवंशिक रूप से पहले पौधे के समान (क्लोन) होता है। ग्राफ्टिंग, बडिंग, कटिंग, लेयरिंग, जैसी विधियां इसी के अलग-अलग रूप हैं।

दूसरी ओर, लैंगिक प्रजनन (Sexual reproduction) नर व मादा युग्मकों के मिलन पर निर्भर होता है। लेकिन हमने देखा कि इसके लिए परागण ज़रूरी होता है। परागण के बाद सफल निषेचन (फर्टिलाइज़ेशन) होने पर फल और बीज बनने की प्रक्रिया (Seed) आगे बढ़ती है। ज़ाहिर है, परागण न हो तो बीज नहीं बनेंगे। इस विधि में दो अलग-अलग पौधों के आनुवंशिक पदार्थों के मिलने से आनुवंशिक विविधता में वृद्धि होती है। दूसरी ओर, कुछ नुकसान भी होते हैं; जैसे परिपक्व होने और फलने में लंबा समय लगना, साथ ही पौधों में ज़रूरत से ज़्यादा व अनावश्यक परिवर्तन भी देखने को मिल सकते हैं। सबसे बड़ी समस्या है पराग कणों को वर्तिकाग्र तक पहुंचाना। यह काफी जोखिम भरी प्रक्रिया होती है। फिर भी अधिकांश पेड़-पौधे इसी का सहारा लेते हैं। क्यों?

परागण: कुदरती कूरियर सेवा 

फूल का नर जननांग ‘पुंकेसर’ होता है और उसमें भी जिस हिस्से में पराग कण बनते हैं ‘परागकोश’ कहलाता है। मादा जननांग ‘स्त्रीकेसर’ कहलाता है और उसमें इन पराग कणों को ग्रहण करने वाले हिस्से को ‘वर्तिकाग्र’ कहते हैं। देखा जाए तो फूलों के तीन प्रकार हैं – नर, मादा और द्विलिंगी (एक ही फूल में नर व मादा दोनों जननांग पाए जाते हैं)। वैसे ही पौधे भी दो प्रकार के होते हैं – एकलिंगी पौधे (नर पौधे – केवल नर फूल खिलते हैं; मादा पौधे – केवल मादा फूल खिलते हैं) और द्विलिंगी पौधे (एक ही पौधे पर नर व मादा फूल अलग-अलग खिलते हैं)।

परागण दो प्रकार से होता है – स्व-परागण और पर-परागण। यदि किसी फूल के पराग कण उसी फूल या उसी पौधे के किसी दूसरे फूल के वर्तिकाग्र पर गिरते हैं, तो इसे ‘स्व-परागण’ (self pollination) कहते हैं। दूसरी ओर, जब किसी फूल के पराग कण उसी प्रजाति के किसी दूसरे पौधे के फूल के वर्तिकाग्र पर पहुंचते हैं, उसे ‘पर-परागण’ (cross pollination) कहते हैं।

देखा गया है कि पौधे स्व-परागण से बचते हैं और पर-परागण को प्राथमिकता देते हैं। कारण, अंतःजनन हानि (Inbreeding depression) से बचाव और आनुवंशिक विविधता के फैलाव के लिए। अंतःप्रजनन से कमज़ोर, कम उपजाऊ, और मौसम, कीट व रोगों के प्रति संवेदनशील संतानें पैदा होती हैं। वहीं, पर-परागण से आनुवंशिक जानकारी का फैलाव होता है; पौधों की विविधता बढ़ती है, जिससे अनुकूलन क्षमता विकसित होती है। 

चूंकि पौधे खुद चल नहीं सकते तो पर-परागण कुछ बिचौलियों (medium) के ज़रिए किया जाता है। ये माध्यम अजैविक भी हो सकते हैं और जैविक भी। अजैविक (abiotic) परागण में जल द्वारा एवं हवा द्वारा परागण आते हैं। जबकि जैविक (biotic) के अंतर्गत कीटों, जंतु या पक्षी द्वारा परागण शामिल है। जैविक बिचौलियों को ‘परागणकर्ता’ (pollinators) कहते हैं।

हमने देखा कि शुरुआती वनस्पतियां तो परागण के लिए हवा-पानी पर ही निर्भर थीं। फिर कुछ 28-30 करोड़ साल पहले, छोटे जीवों यानी कीटों का पौधों के जीवन में आगमन हुआ। हालांकि शुरू में कीट पौधों के पास केवल पराग खाने (pollen eaters) आते थे, क्योंकि पराग कीटों के लिए पौष्टिक भोजन था। यानी इस दौर तक पौधों और कीटों के बीच एक रिश्ता बन चुका था, लेकिन एकतरफा। माना जाता है कि आगे चलकर यही कीट एक और काम करने लगे – पौधों के पराग कणों का परिवहन – और जाने-अनजाने में परागण में मददगार हो गए।

जीवाश्म साक्ष्य में कमी के कारण ऐसी शुरुआती कीट प्रजातियों का पता नहीं लगाया जा सका है। फिर भी, कुछ साक्ष्य के मुताबिक वैज्ञानिकों का मानना है कि फूलदार पौधों के विकास से पहले भृंग अनावृतबीजी पौधों के पराग का भोजन करते थे और परागण भी कर देते थे। समय के साथ जब फूलदार पौधे (flowering plants) विकसित हुए तो उन्होंने भी भृंग (beetles) को अपनी पीढ़ी बढ़ाने की योजना में शामिल किया। यहां से पौधों और कीटों के बीच इस खास जुगलबंदी की शुरुआत हुई।

फूलदार पौधे और कीटों का सहविकास

लगभग 14-16 करोड़ साल पहले फूलदार पौधे विकसित हुए। वैकासिक आंकड़ों के अनुसार, बहुत कम समय में फूलदार पौधों की आबादी तेज़ी से बढ़ी। कीटों द्वारा परागण ही इसका खास कारण माना जा सकता है। इस समय तक पौधे और कीट सम्बंध बना ही चुके थे और वे साथ-साथ विकसित भी हो रहे थे। लेकिन शुरुआती फूलदार पौधे के पास कीटों को आकर्षित करने का केवल एक ही तरीका था – पराग। फूलदार पौधे भरपूर मात्रा में पराग बनाते थे, जो कीटों के लिए भोजन और साथ ही पौधों के वंश बढ़ाने का माध्यम था। परिणाम यह हुआ कि पराग-भक्षी कीटों द्वारा परागण के जरिए आनुवंशिक जानकारी (genetic information) दूर-दूर तक फैली। लगता है कीट परागित पौधों को प्राचीन वायु परागित पौधों के मुकाबले अपनी आबादी बढ़ाने में अच्छा-खासा फायदा हुआ।

फिर क्या था परागणकर्ताओं को लुभाने के लिए फूलदार पौधे भी आपसी होड़ में लगे रहे। पौधों और कीटों में ऐसे बदलाव होने लगे कि वे एक-दूसरे के अनुकूल (adopt) हो जाएं। दोनों में ही समय के साथ नए-नए तरीके विकसित होते गए। पौधे कीटों-जंतुओं को आकर्षित (attract) करने की तरकीब लगाने में जुट गए।

इनमें एक प्रमुख तरीका था कीटों के लिए भोजन का उपहार। और यह उपहार सिर्फ पराग के रूप में नहीं बल्कि मकरंद के रूप में भी सामने आया। कीटों को लुभाने के लिए फूलों में चटख रंगों, गंध वगैरह का विकास हुआ। पौधों में ऐसी युक्तियां भी विकसित हुई कि मकरंद (nectar) के इस उपहार तक पहुंचने के लिए कीट को पराग कणों से संपर्क करना पड़े। पौधों में विकसित हुए कुछ खास बदलावों के साथ-साथ परागणकर्ताओं (कीट, पक्षी और अन्य) में भी पुरस्कार पाने के लिए खास बदलाव होते गए। 

पौधों और कीटों के बदलाव

विविध बनावट के फूल: पौधों में फूलों के अलग-अलग आकार विकसित हुए। जैसे, मक्खियों के बैठने के लिए चौड़े-चपटे फूल, हमिंगबर्ड के लिए घंटीनुमा-गहरे फूल आए।

साजसज्जा: परागणकर्ता को आकर्षित करने के लिए पौधों में चटक-चमकीले रंगों वाले फूल विकसित हुए। जैसे, पीले, नीले, बैंगनी (मक्खियों-तितलियों के लिए) और लाल-नारंगी (पक्षियों के लिए)।

मकरंद ग्रंथि व पथदर्शी: मधुर मकरंद का विकास संभवत: पौधों में कीटों को आकर्षित करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण नवाचार था। साथ ही, मीठी-कस्तूरी, फलों जैसी सुगंध, और फूलों की पंखुड़ियों पर पराबैंगनी चिन्हों का विकास। इससे कीटों को मकरंद तक पहुंचने में आसानी हुई।

चिपकू पराग: खास चिपकू पराग कणों का विकास, जो कीटों के शरीर या पंखों पर आसानी से चिपक जाते हैं। जैसे, गुलाब, सूरजमुखी, गुड़हल, खीरा, टमाटर, कद्दू वगैरह के पराग।

कीटों से तालमेल: कुछ पौधों में पराग को नियंत्रित तरीके से खास समय पर छोड़ने का तंत्र विकसित हुआ। यानी वे उसी समय पराग छोड़ने लगे जब परागण करने वाले कीट सक्रिय रहते थे। जैसे, रात-रानी, हरसिंगार या धतूरे के फूल शाम या रात में खिलते हैं जब पतंगे सक्रिय रहते हैं।

परागणकर्ताओं की निरंतरता: कई परागणकर्ता एक ही प्रकार के पौधे के प्रति निष्ठा दर्शाने लगे। समय के साथ वे एक ही प्रजाति के पौधे का परागण करने लगे। जैसे, अंजीर-ततैया (Pleistodontes imperialis) केवल अंजीर के फूलों का परागण करती है, मोनार्क तितली (Danaus plexippus) केवल मिल्कवीड पौधों पर अपना जीवन बिताती है। 

गुंजन परागण : कुछ पौधों के फूल; जैसे टमाटर, बैंगन, कीवी फ्रूट में पराग कण खास संरचनाओं में कैद हो गए। अब पराग पाने के लिए मधुमक्खियां और भौंरे पंखों की मांसपेशियों को कंपन (गुंजन) करके एक खास ‘फ्रीक्वेंसी’ पर थपथपाने लगे, जिससे पराग झड़ कर बाहर निकल आते हैं।

यौन अनुकरण: कुछ ऑर्किड पौधे मादा कीटों की बनावट जैसे फूल विकसित कर नर कीटों को धोखा देते हैं, ताकि वे मादा सदृश फूल की ओर आकर्षित हों और परागण हो जाए।

जैसा कि पता है कई फूल द्विलिंगी (hermaphrodite) होते हैं। यानी उनमें पराग कण भी बनते हैं और स्त्रीकेसर भी होता है। लेकिन प्राय: देखा गया है कि इस हेतु विशेष युक्तियां विकसित हुई हैं कि एक फूल के पराग कण उसी फूल के वर्तिकाग्र पर न पहुंच पाएं और यदि पहुंच जाएं तो निषेचन न हो पाए। समय के साथ पौधों में स्व-परागण से बचने के लिए कई युक्तियां विकसित हुईं। जैसे, स्त्रीकेसर द्वारा अपने ही पराग कण को पहचान लेना और खारिज कर निषेचन की प्रक्रिया न होने देना (स्व-असंगतता)(self-incompatibility); पुंकेसर और स्त्रीकेसर की अलग-अलग जमावट (हर्कोगैमी)(herkogamy); एक पौधे पर केवल नर या केवल मादा फूल का होना; द्विलिंगी पौधों में नर और मादा फूलों का एक साथ परिपक्व न होना (डायकोगैमी)(dichogamy)। इन सभी बदलावों से स्व-परागण असंभव हो जाता है।

क्रमिक विकास को ध्यान में रखते हुए पौधों और कीटों में जीवन को संजोने के लिए बदलाव होते रहे हैं, तो आने वाले समय में और भी खास और अद्भुत बदलाव देखने को मिल सकते हैं।  

हाल में हुए एक अध्ययन में बताया गया है कि बिच्छूमक्खी (Panorpa communis) में शंकुधारी वृक्षों की परागण सेवा के लिए मुखांग (mouthparts) विकसित हुए थे, लेकिन जैसे ही दूसरे परागणकर्ता विकसित होने लगे तो समय के साथ बिच्छूमक्खी की भूमिका समाप्त होती गई।

परागणकर्ताओं में भी प्रमुख मधुमक्खियां (Apis) और उनकी जंगली प्रजातियां हैं – ये परागण और वैश्विक उत्पादन (अन्न, फल-सब्जियां, फूल) में लगभग 80 प्रतिशत हिस्सेदार हैं। लेकिन केवल मधुमक्खियों (bees) की हिस्सेदारी से पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem) को मज़बूती नहीं मिलती। जंगली परागणकर्ता भी अहम योगदान देते हैं। इसलिए परागणकर्ताओं की विविधता ज़रूरी है। जंगली कीटों द्वारा परागण होने पर फसलों की आनुवंशिक विविधता बढ़ती है एवं अंतःप्रजनन की समस्या और इससे होने वाले प्रभावों में कमी होती है।

वर्तमान परिस्थिति और चुनौतियां

वर्तमान में, पुष्पीय पौधों की लगभग साढ़े तीन लाख से ज़्यादा प्रजातियां ज्ञात हैं, जिनमें फल, फूल, सब्ज़ियां, वृक्ष-लताएं और अनाज वाले पौधे शामिल हैं। फूलदार पौधों की वंशवृद्धि (reproduction) के लिए कीटों की मौजूदगी ज़रूरी है। लेकिन विकास की होड़ में हम इन छोटे साथियों को भूल गए हैं जिन्होंने करोड़ों सालों से हमारी धरती को रंग-बिरंगा और हरा-भरा बनाए रखा।

बढ़ती आबादी, शहरीकरण और कृषि क्षेत्र में बढ़ोतरी के कारण जंगली फूलों, कीटों और पक्षियों के आवास में कमी होना चिंताजनक है। साथ ही रसायन व मशीन आधारित खेती कीटों की संख्या में कमी का कारण है। कृत्रिम परागण जैसी तकनीक भी इन छोटे जीवों के लिए खतरा है। दूसरी ओर, बड़े पैमाने पर मधुमक्खी पालन (bee keeping) के दौरान ज़्यादा आबादी में मधुमक्खियों का प्रजनन और उनके स्थानांतरण के कारण जंगली एवं पालतू कीटों में घातक रोग फैलने की संभावना रहती है।

परागण व परागणकर्ता हमारी खाद्य सुरक्षा (food security) के साथ पृथ्वी की जैव विविधता (biodiversity) के लिए भी अनिवार्य हैं। ज़्यादा से ज़्यादा फूलों वाले पेड़-पौधे लगाने से न केवल इन छोटे जीवों को घर मिलेगा, हमें आनंद भी मिलेगा।

अंत में एक बात कहना मुनासिब है। यह स्पष्ट है कि कायिक प्रजनन के मुकाबले लैंगिक प्रजनन काफी जोखिम भरा है और लैंगिक प्रजनन में भी स्व-परागण की अपेक्षा पर-परागण में खतरे ज़्यादा है। फिर भी पेड़-पौधों ने कायिक की बजाय लैंगिक और स्व-परागण की बजाय पर-परागण को तरजीह दी। क्यों? वैज्ञानिकों के लिए यह एक गुत्थी है। इनसे मिलने वाले लाभ ज़ाहिर हैं, लेकिन यह अनुत्तरित है कि इन प्रक्रियाओं की शुरुआत क्यों व कैसे हुई। वैज्ञानिकों ने अटकलें लगाई हैं लेकिन सर्वसम्मत उत्तर अभी नहीं मिला है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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आर्टिफिशियल एजेंटों का उपयोग

विवेक मेहता

र्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई, कृत्रिम बुद्धि) एजेंट ऐसी अजैविक कार्यप्रणालियां (system) हैं जिन्हें मानव बुद्धि की नकल करने के लिए डिज़ाइन किया गया है। ये कार्यप्रणालियां हमारी तरह ही सीखती हैं; अर्थात पर्यावरण के साथ संपर्क, संवाद या अन्य माध्यम से। ये प्रणालियां महत्वपूर्ण निर्णय ले सकती हैं, और ले भी रही हैं, जो मानवता को प्रभावित करते हैं। समस्याओं को हल करने में दक्ष होने के साथ-साथ ये बदलते हालातों के प्रति अनुकूलनशील भी होती हैं। 

एआई प्रणालियां इतनी स्मार्ट और महत्वपूर्ण होती जा रही हैं कि वर्ष 2024 में दिए गए दो नोबेल पुरस्कार एआई से सम्बंधित थे। रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्रोटीन फोल्डिंग (protein folding) की समस्या से सम्बंधित था, जिसमें प्रोटीन के 3डी आकार का पता लगाना एक महत्वपूर्ण समस्या है। बायोमेडिकल अनुसंधान (biomedical research) से जुड़ी इस महत्वपूर्ण समस्या का उद्देश्य बीमारियों से निपटने के लिए नई और बेहतर दवाइयां विकसित करना है। तीन तीन में से दो विजेताओं द्वारा विकसित एआई प्लेटफॉर्म केवल अमीनो एसिड अनुक्रम से प्रोटीन की 3डी जमावट की सटीक भविष्यवाणी करने में सक्षम साबित हुआ है। 

हम अपने दिन-प्रतिदिन के जीवन में ऐसी ही प्रणालियों से रू-ब-रू हो रहे हैं। जैसे जानकारी खोजने के लिए वेब सर्च; या हमारी स्क्रीन पर सुझाई गई कोई मूवी, वीडियो या उत्पाद। यह हमारे वॉयस असिस्टेंट (voice assistant) को दिया गया कोई आदेश हो सकता है। और अधिक उन्नत देशों में, यह एक स्वचालित टैक्सी हो सकती है। जनरेटिव एआई एप्लिकेशन जैसे ChatGPT और DALL-E के उदय के साथ, उपयोगकर्ता हर प्रकार की सामग्री बना रहे हैं।

आज तक, हम में से अधिकांश, जिन्होंने एआई का उपयोग किया है या इसके संभावित लाभों के बारे में सुना है, इससे प्रभावित हुए हैं। लेकिन समाज का एक वर्ग एआई की संभावित हानियों के प्रति आलोचनात्मक है। इन कई आवाज़ों में से एक है ज्यॉफ्री एवरेस्ट हिंटन, जिन्हें एआई के ‘गॉडफादर’ (Godfather of AI) के रूप में भी जाना जाता है। उनके पथप्रदर्शक कार्य ने इन एआई प्रणालियों की उन्नत क्षमताओं को जन्म दिया। इस योगदान के लिए उन्हें 2024 में भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। 

एक साक्षात्कार में, उन्होंने अपनी चिंताओं को सामने रखा: “आगे क्या होने वाला है, इसे लेकर भारी अनिश्चितता है! …. हो सकता है कि हम पीछे मुड़कर देखें और इसे एक ऐसा मोड़ मानें जब मानवता को यह निर्णय लेना पड़े कि क्या इन चीज़ों को आगे विकसित करना है, या अगर ये विकसित हुईं तो खुद की सुरक्षा के लिए क्या करना है।” उन्होंने और एआई क्षेत्र के कई अग्रणि शोधकर्ताओं ने एआई पर नियंत्रण रखने के लिए परमाणु तकनीक (nuclear technology) की तर्ज पर एक वैश्विक प्रणाली का आह्वान किया है। उनका मानना है कि एआई के मानव नियंत्रण से बाहर होने या इसके दुरुपयोग की संभावना, हालांकि कम है, लेकिन मौजूद है। ऐसा परिदृश्य मानवता के लिए विनाशकारी होगा।

फिर इतिहासकार युवाल नोआ हरारी जैसे लोक-बुद्धिजीवी हैं। उन्होंने लोगों और सरकारों को एआई के खतरों (Dangers of AI) के बारे में चेतावनी दी है। उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया है कि एआई हर चीज़ की गति को इतनी तेज़ी से बढ़ा रहा है कि हम नश्वर मनुष्यों के लिए इससे कदम मिलाना नामुमकिन है। उन्होंने एआई की अग्रणी हस्तियों की चिंताओं को साझा किया है।

इसके अलावा वे एक और मुद्दे पर प्रकाश डालते हैं: एआई और असमानता। वे हमें याद दिलाते हैं कि औद्योगिक क्रांति (Industrial revolution), जो ब्रिटेन, फ्रांस, अमेरिका आदि जैसे देशों द्वारा शुरू की गई थी, ने हमारे जैसे देशों को उपनिवेश बना दिया। स्वतंत्रता के बाद भी, हम इन देशों के बीच मौजूदा असमानता और उपनिवेशवाद (colonialism) के प्रभाव को महसूस कर सकते हैं। 

जहां तक एआई का सवाल है, इसकी सफलता को मुख्य रूप से दो महत्वपूर्ण कारक सीमित करते हैं: कंप्यूटिंग पॉवर और डैटा (computing power & data)। विभिन्न देशों की कंप्यूटिंग पॉवर की तुलना करने का एक आधार यह है कि प्रत्येक देश के पास कितने सुपरकंप्यूटर हैं। अगर हम दुनिया की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं को देखें, तो अमेरिका के पास विश्व के कुल सुपरकंप्यूटरों (supercomputer) में से 34.6 प्रतिशत और उसके बाद चीन (12.6 प्रतिशत), जर्मनी (8.0 प्रतिशत), जापान (6.8 प्रतिशत), और भारत (1.2 प्रतिशत) का स्थान है। भारत में डैटा की उपलब्धता के बारे में, इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) की 2019 की रिपोर्ट कहती है, “आज विभिन्न क्षेत्रों में भारी मात्रा में डैटा मौजूद है। हालांकि, यह ज़्यादातर अलग-अलग मोड में मौजूद है और प्रभावी ढंग से उपयोग नहीं किया जा रहा है। जब इसका उपयोग होता भी है, तो यह केवल साइलो में होता है। कई बार, क्षेत्रों के बीच डैटा एकीकरण शानदार लाभ प्रदान करता है, जिन्हें नज़रअंदाज कर दिया जाता है।” 

आज के समय में, डैटा को तेल और गैस की तरह एक प्रकार की संपत्ति (wealth) माना जाता है। भारतीय इंटरनेट उपयोगकर्ताओं से सम्बंधित इसका अधिकांश हिस्सा विदेशी सर्वरों पर संग्रहित है। निश्चित रूप से, शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में होने के बावजूद, हम कंप्यूटिंग पॉवर और डैटा के मामले में अन्य देशों से पीछे हैं। इस अंतर को पाटने के वित्तीय प्रभाव बहुत बड़े हैं। हालांकि, ये प्रभाव केवल वित्तीय प्रकृति के नहीं हैं। कुछ बड़ा दांव पर है।

आगे बढ़ने के लिए, मान लें कि दुनिया अचानक अधिक समान हो गई है और किसी भी देश को एआई के संदर्भ में अनुचित लाभ नहीं है। आगे मान लें कि सहयोग और विश्वास, जो फिलहाल दुर्लभ गुण हैं, ने विभिन्न शक्ति केंद्रों के बीच एआई को संचालित करने के लिए किसी प्रकार की नियामक रूपरेखा विकसित कर ली है। अब, इन धारणाओं के तहत, क्या यह मानवता के हित में होगा कि एआई को सामान्य उद्देश्यों के लिए विकसित और प्रयुक्त किया जाए? ऊर्जा खपत (energy consumption) के दृष्टिकोण से, इसका उत्तर सरल ‘हां’ नहीं हो सकता। 

एक उदाहरण लें: BigScience Large Open-science Open-access Multilingual (BLOOM) भाषा मॉडल का। यह एक लार्ज लैंग्वेज मॉडल (LLM) है जिसे प्राकृतिक व प्रोग्रामिंग भाषा प्रोसेसिंग के लिए डिज़ाइन किया गया है। इस तरह के मॉडल जनरेटिव एआई चैटबॉट जैसे ChatGPT या Perplexity का आधार हैं। अब, इन मॉडलों को, तैनात होने से पहले, बड़े पैमाने पर डैटा एक्सपोज़र और प्रशिक्षण से गुज़रना पड़ता है। उदाहरण के लिए, आर्काइव पर उपलब्ध एक शोध पत्र के अनुसार, BLOOM एक 176 अरब पैरामीटर मॉडल है जिसे 46 प्राकृतिक भाषाओं और 13 प्रोग्रामिंग भाषाओं में 1.6 टेराबाइट डैटा पर प्रशिक्षित किया गया था। कुल प्रशिक्षण समय 118 दिन, 5 घंटे और 41 मिनट का अनुमानित था। प्रशिक्षण के लिए उपयोग की गई कुल ऊर्जा की मात्रा 4,33,196 किलोवॉट-घंटे (kWh) थी।

इन संख्याओं को परिप्रेक्ष्य में रखते हैं। यदि एक पृष्ठ पर 100 किलोबाइट डैटा मानें, तो 1.6 टेराबाइट डैटा लगभग एक करोड़ अस्सी लाख पृष्ठों के बराबर होगा। फिर, यदि हम औसत पुस्तक का आकार 300 पृष्ठ मानें, तो यह लगभग 56,667 पुस्तकों के डैटा के बराबर होगा। ऊर्जा खपत के संदर्भ में, यदि हम भारत में एक घर को लें, जो प्रति माह 200 kWh बिजली की खपत करता है, तो 4,33,196 kWh उस भारतीय घर की 180 वर्षों की बिजली खपत के बराबर होगा या 2165 ऐसे परिवारों की एक महीने की खपत के बराबर होगा। 

यह आश्चर्य की बात नहीं है कि OpenAI (ChatGPT फेम) के मुख्य कार्यकारी सैम ऑल्टमैन ने सेवाओं को चलाने की लागत को ‘आंखें खोल देने वाला’ बताया है। Alphabet और उसकी सहायक कंपनी गूगल के सीईओ सुंदर पिचई ने एक साक्षात्कार में बताया था, “एआई के लिए अधोसंरचना, जिसमें ऊर्जा शामिल है, एक प्रमुख बाधा हो सकती है।” 

अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, वर्ष 2022 में ऊर्जा से सम्बंधित वैश्विक कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन (global carbon emission) 1.1% बढ़कर 37 अरब मीट्रिक टन से अधिक हो गया। यह उत्सर्जन वृद्धि उस समय हो रही है जब पूरी दुनिया की आबादी किसी न किसी रूप में जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को महसूस कर रही है। यह संभव है कि वर्तमान में इन एआई एजेंटों और प्लेटफार्मों को संचालित करने वाले बड़े डैटा केंद्रों का योगदान इतना महत्वपूर्ण न हो, लेकिन इस तकनीक की पहुंच और सीमाओं को बढ़ाने की बढ़ती कोशिशें निकट भविष्य में काफी महत्वपूर्ण हो सकती हैं। विशेषकर, हमारे जैसे देशों में, जो फिलहाल इस क्षेत्र में पिछड़े हुए हैं।

दुनिया के किसी भी चिंतित नागरिक को यह स्पष्ट होना चाहिए कि वर्तमान एआई दौड़ के मूल में शक्तिशाली देशों के बीच विश्वास की कमी और उनकी असुरक्षाएं हैं। साथ में बड़े कॉर्पोरेशन्स की बाजार में हिस्सेदारी और मुनाफे की सतत बढ़ती लालसा भी है। और जब ड्राइविंग सीट पर ये भावनाएं और स्वार्थ विराजमान हैं, तो दुनिया के कभी भी बेहतर बनने की उम्मीद बेमानी होगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit: https://www.chitkara.edu.in/blogs/wp-content/uploads/2024/05/Intersection-of-AI.jpg

झगड़े से बचना हो तो गले मिलें

किसी ने खुलकर गले लगाया हो, ज़ोरदार झप्पी दी हो, तो उसके बाद उस पर बरस पड़ना या उससे जमकर झगड़ना मुश्किल होता है। हमारा यह अनुभव रहा है कि सकारात्मक स्पर्श (positive touch) – हाथ थामना, थपथपाना, सहलाना, आलिंगन वगैरह आपसी रिश्तों को मज़बूत करते हैं।

और अब, ऐसा वानरों में भी देखा गया है। देखा गया है कि तनाव की स्थिति में रिश्ते बनाए रखने के लिए, तनाव टालने के लिए बोनोबो और चिम्पैंज़ी (bonobo & chimpanzee) गले मिलते हैं, हाथ पकड़ते हैं। इस बात का पता लगा है दो अभयारण्यों में रह रहे बोनोबो और चिम्पैंज़ी समूहों के अवलोकन से।

डरहम युनिवर्सिटी के मनोवैज्ञानिकों के एक दल ने डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ कांगो और ज़ाम्बिया के अभयारण्यों में रह रहे बोनोबो और चिम्पैंज़ियों के पांच समूह का अध्ययन किया। शोधकर्ता वानरों के बाड़े की बागड़ पास जाकर समय-समय वानरों को पुकारते थे। वानर बाड़े के किनारे आ जाते थे और भोजन का इंतज़ार करते थे। कुछ समय बाद, शोधकर्ता मूंगफली (Peanuts) से भरा एक बर्तन बाड़े में रख देते थे, जिसमें अपर्याप्त मात्रा में मूंगफली होती थी। कम मात्रा में मूंगफली होने के कारण वानरों में उन्हें लेने के लिए होड़ (competition) मच जाती थी। ऐसा करते समय शोधकर्ताओं ने मूंगफली मिलने से पहले, मूंगफली लेते और खाते समय, और खाने के बाद वानरों के आपसी व्यवहार का अवलोकन किया।

प्रोसीडिंग्स ऑफ दी रॉयल सोसाइटी बी में शोधकर्ताओं ने बताया है कि जो वानर मूंगफली मिलने से कुछ देर पहले एक-दूसरे को गर्मजोशी (हाथ पकड़ना, थपथपाना, सहलाना, आलिंगन आदि) से स्पर्श करते थे, वे आपस में मूंगफली के लिए लड़ने की बजाय उसे मिल-बांटकर (sharing) खाते थे। ऐसा स्वभाव अधिकतर शांतिप्रिय समूहों (peace-loving groups) में देखा गया। यह दर्शाता है कि दोस्ताना स्पर्श (friendly touch) सामाजिक रिश्तों को मज़बूत करता है और होड़ कम करता है। और तो और, यह तक देखा गया कि कुछ नर चिम्पैंज़ी एक-दूसरे के मुंह में अपनी उंगलियां दे रहे थे। गौरतलब है कि वानर समूहों में मुंह में उंगली देना तनाव या झगड़े की स्थिति में खतरे से खाली नहीं होता – लड़ाई-झगड़े की स्थिति में वानर प्रतिद्वंद्वी की उंगली बुरी तरह काट कर उसे चोटिल कर सकते हैं। लेकिन अपर्याप्त भोजन होने की स्थिति में भी वानरों का मुंह में उंगली डालकर जोखिम उठाना उनके भरोसे और मज़बूत रिश्ते (trust & solid relations) का द्योतक था।

बोनोबो और चिंपैंज़ी हमारे करीबी रिश्तेदार हैं; इस साझा व्यवहार से लगता है कि गर्मजोशी (excitement) जताकर शांति बनाए रखने का व्यवहार हमारे साझा पूर्वजों की देन है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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‘शाश्वत’ रसायनों से निपटने के प्रयास

कुछ रसायन बहुत टिकाऊ होते हैं, इतने टिकाऊ कि एक बार बन जाने के बाद वे बरसों तक विघटित (disintegrate) नहीं होते। औषधियों में, लीथियम आयन बैटरियों में, रेफ्रिजरेटरों में और यहां तक कि अस्थमा के इनहेलर तथा अग्निशामक मिश्रणों में भी ऐसे पदार्थों का उपयोग होता है। इन पदार्थों के अणुओं में फ्लोरीन नामक तत्व पाया जाता है। कढ़ाइयों के नॉन-स्टिक लेप और वाटरप्रूफिंग पदार्थों में भी फ्लोरीन होता है।
यह सही है कि फ्लोरीन (Flourine) की उपस्थिति की बदौलत ये पदार्थ टिकाऊ बनते हैं लेकिन समस्या यह है कि इन पदार्थों का विघटन बहुत समय तक नहीं होता। इन सब में पर- या पोली-फ्लोरो अल्काइल पदार्थ (PFAS) होते हैं। कहा जा रहा है कि दूध से लेकर एवरेस्ट की चोटी तक PFAS (Per and polyfluoroalkyl substances) बिखरे हुए हैं। समस्या यह है कि इनमें से कई मानव स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं। ये शरीर का हॉर्मोन संतुलन बिगाड़ते हैं और लीवर तथा थॉयराइड जैसे अंगों के नुकसान पहुंचाते हैं।
एक और समस्या है – फ्लोरीन को यौगिकों में जोड़ने की प्रक्रिया भी घातक है। इसके लिए फ्लोरस्पार नामक एक खनिज (कैल्शियम फ्लोराइड) लिया जाता है और उसे गंधकाम्ल के साथ तपाकर हाइड्रोजन फ्लोराइड नामक रसायन प्राप्त किया जाता है। हाइड्रोजन फ्लोराइड एक खतरनाक क्षयकारक गैस है जो पानी में घुलकर हाइड्रोफ्लोरिक अम्ल (Hydrochloric acid) बनाती है। फायदा यह होता है कि खनिज (minerals) में उपस्थित फ्लोरीन क्रियाशील अवस्था में आ जाती है। रसायन शास्त्र का कोई भी विद्यार्थी बता देगा कि हाइड्रोजन फ्लोराइड (Hydrogen flouride) कितना क्षयकारक पदार्थ है।
यही कारण है कि फ्लोरीन की इस टिकाऊ उपयोगिता के बावजूद रसायन शास्त्री लोग इससे निपटने की जद्दोजहद में सदियों से लगे हैं। इनमें से एक हैं ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय की वेरोनिक गवर्नर।
गवर्नर फ्लोरीन की समस्या से सिरे से निपटना चाहती हैं। वे कहती हैं कि कैल्शियम फ्लोराइड पानी या अन्य कार्बनिक विलायकों (organic solvents) में घुलनशील नहीं है; इसलिए इसका उपयोग सीधे रासायनिक अभिक्रियाओं में नहीं हो सकता। फिर 2023 में उनकी प्रयोगशाला के रसायनज्ञों ने फ्लोरस्पार (flourspar) से फ्लोरीन प्राप्त करने की एक ऐसी विधि विकसित की जिसमें हाइड्रोजन फ्लोराइड बनाने की ज़रूरत नहीं होती। उन्होंने देखा कि यदि फ्लोरस्पार और पोटेशियम फॉस्फेट को एक साथ पीसा जाए तो इतना घर्षण पैदा होता है कि फ्लोरीन मुक्त हो जाती है। अब एक स्टार्ट-अप इस तरीके को व्यावसायिक स्तर पर ले जा रहा है। गवर्नर बताती हैं कि वे इस विधि से लिपिटॉर (lipitor) नामक औषधि (कोलेस्ट्रॉल घटाने की दवा जिसमें फ्लोरीन होता है) का निर्माण कर पा रही हैं।
इसके अलावा, उनके दल ने इस यांत्रिक विधि का उपयोग PFAS को तोड़कर वापिस कच्चा माल प्राप्त करने के लिए आज़माया है। PFAS को पोटेशियम फॉस्फेट लवण के साथ पीसकर वे लोग पोटेशियम फ्लोराइड और डाईपोटेशियम मोनोफ्लोरो फॉस्फेट प्राप्त करने में सफल रहे हैं। ये दो फ्लोराइड लवण (पोटेशियम फ्लोराइड और डाईपोटेशियम मोनोफ्लोरो फॉस्फेट) हैं जिनका उपयोग उद्योगों में बहुतायत से होता है। लेकिन यह काम आगे तो तब बढ़ेगा जब सारे लोग यह समझ पाएं कि यह तरीका हाइड्रोजन फ्लोराइड मार्ग का एक अच्छा विकल्प है क्योंकि यह विकल्प सुरक्षित और सस्ता भी है।
अन्य रसायनज्ञ पूरी प्रक्रिया को चक्रीय बनाने पर ज़ोर दे रहे हैं – ताकि फ्लोरो-पोलीमर्स (flourine polymers) और अन्य फ्लोरीन युक्त पदार्थों को फिर से उपयोगी शुरुआती पदार्थों में बदला जा सके। जैसे इम्पीरियल कॉलेज, लंदन के एक रसायन शास्त्री मार्क क्रिमिन ने ऐसा एक चक्र विकसित किया है। संयोगवश हाथ लगे इस तरीके में कार्बन-फ्लोरीन बंध को तोड़ा जा सकता है।
क्रिमिन ने ऐसी अभिक्रियाएं विकसित कर ली हैं जिनकी मदद से फ्लोरो-यौगिकों को इस तरह बदला जा सकता है कि उनका उपयोग अन्य नवीन संश्लेषणों में किया जा सके। पहली अभिक्रिया वह है जिसे क्रिमिन ट्रांसफर फ्लोरिनेशन (transfer flourination) कहते हैं। इसमें रेफ्रिजरेटरों में इस्तेमाल किए जाने वाले हाइड्रोफ्लोरोकार्बन यौगिकों (HFC) की अभिक्रिया पोटेशियम क्षार से करवाकर पोटेशियम फ्लोराइड प्राप्त कर लिया जाता है। यह अन्य कई पदार्थों के निर्माण में उपयोगी है।
क्रिमिन द्वारा विकसित दूसरी प्रक्रिया (जिसे एचएफ शटलिंग कहते हैं) में एक अणु (जैसे पोलीविनाइलीडीन फ्लोराइड, PVDF) में से हाइड्रोजन व फ्लोरीन के परमाणु निकाले जाते हैं और एक उत्प्रेरक की मदद से इन्हें किसी अन्य अणु में जोड़कर फ्लोरोअल्काइन बनाया जाता है जो कई रसायनों के निर्माण का कच्चा माल है। PVDF का उपयोग लीथियम आयन बैटरियों में अस्तर के रूप में किया जाता है। क्रिमिन का विचार है कि पुरानी लीथियम आयन बैटरियों (lithium ion battery) से इसे प्राप्त करके फिर से उपयोगी बनाया जा सकता है। अलबत्ता, अभी ये प्रक्रियाएं प्रयोगशाला के स्तर पर हुई हैं और वास्तविक परिस्थितियों में इन्हें आज़माकर देखना होगा। इस दिशा में काम चल रहा है।
एक प्रमुख सवाल यह होगा कि उद्योगों को कैसे राजी किया जाए कि वे इसमें निवेश करें। इस संदर्भ में मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल एक नज़ीर है। ओज़ोन को क्षति पहुंचाने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFC) यौगिकों पर प्रतिबंध लगाने के लिए 1987 में एक अंतर्राष्ट्रीय संधि (मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल) (montreal protocol) अपनाई गई थी और उसके परिणाम सकारात्मक रहे हैं। आगे चलकर इस संधि में हाइड्रोक्लोरोफ्लोरोकार्बन (HCFC) को भी शामिल किया गया था।
फिलहाल PFAS पर रोक लगाने सम्बंधी नियम-कायदे अलग-अलग देशों में अलग-अलग हैं। इनमें से कुछ रसायनों (जैसे पर-फ्लोरो-ऑक्टेनोइक एसिड – PFOA और पर-फ्लोरो-ऑक्टेन सल्फोनेट – PFOS) पर युरोप व यूएस में प्रतिबंध है। इनका उपयोग नॉन-स्टिक लेपन (non-stick coating) और ऊष्मा-सह चीज़ों में किया जाता है। इनके कई हानिकारक असर प्रमाणित हुए हैं। एक तो, ये पर्यावरण में टिके रहते हैं। और दूसरा, इनका सम्बंध कैंसर तथा अन्य स्वास्थ्य समस्याओं से देखा गया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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ज़ेब्राफिश हमारी तरह सोती है

क हालिया अध्ययन बताता है कि ज़ेब्राफिश (Danio rerio) की नींद का पैटर्न लगभग मनुष्यों जैसा होता है। एक बड़ा अंतर यह होता है कि ज़ेब्राफिश की पलकें नहीं होती और वे खुली आंखों से सोती हैं। पलकें न होने के बावजूद उनकी आंखें रोशनी बढ़ने-घटने के प्रति प्रतिक्रिया देती हैं। तेज़ रोशनी में उनकी नींद खराब भी होती है।

हमारी तरह ज़ेब्राफिश दिनचर (diurnal) होती हैं और रात में सोती हैं। हमारे समान सोते समय वे निश्चल रहती हैं और पर्यावरण के संकेतों पर प्रतिक्रिया धीमी गति से देती हैं। और तो और, यदि एक रात नींद न मिले, तो अगली रात देर तक सोकर भरपाई करती हैं।

यह सब तो काफी समय से पता है। अब, नेचर कम्यूनिकेशन्स में मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर बॉयोलॉजिकल सायबर्नेटिक्स की जेनिफर मेंगबो ली और उनके साथियों ने बताया है कि ज़ेब्राफिश की नींद में कई अवस्थाएं होती हैं, जो मनुष्यों जैसी हैं। अध्ययन के लिए शोधदल ने एक विशेष स्व-चालित सूक्ष्मदर्शी (Automatic microscope) बनाया, जिसमें कैमरा लगा था। इसकी मदद से उन्होंने 105 चलती-फिरती, सोती, शिकार करती ज़ेब्राफिश का करीबी से अध्ययन किया।

सबसे पहले, उनकी आंखों की हरकतों के आधार पर शोधकर्ताओं ने ज़ेब्राफिश में नींद की चार अवस्थाओं को पहचाना। इन चार में तीन अवस्थाएं रात में नज़र आती है। पहली अवस्था गहरी नींद की होती है जिसमें ज़ेब्राफिश (Zebra fish) की आंखें बेहोशी जैसे एकटक निहारती रहती हैं। जब जागने का समय नज़दीक आता है तो दूसरी हल्की नींद की अवस्था शुरू हो जाती है – इसमें उनकी आंखें फड़कती हैं, दोनों आंखों की पुतलियां एक तरफ जाती हैं और फिर केंद्र में आ जाती हैं। सुबह आने के समय दोनों आंखों की पुतलियां एक तरफ हो जाती हैं और वहीं टिकी रहती हैं। चौथी अवस्था प्राय: दिन के समय छोटी-छोटी अवधि की होती है जब उनकी आंखें तेज़ी से दाएं-बाएं, ऊपर-नीचे होती हैं। 5-10 मिनट की इन झपकियों के दौरान मस्तिष्क की गतिविधियां लगभग ठप हो जाती हैं।

गौरतलब है कि अपने जीवन के पहले तीन सप्ताह तक ज़ेब्राफिश पारदर्शी होती है। इसलिए शोधकर्ताओं के लिए कैल्शियम इमेजिंग (calcium imaging) नामक तकनीक की मदद से यह देखना संभव हुआ कि नींद की किन अवस्थाओं में कौन-सी तंत्रिकाएं (nerves) सक्रिय रहती हैं। इस तरह से शोधकर्ता यह दर्शा पाए कि ज़ेब्राफिश में नींद की विशिष्ट अवस्थाएं (specific states) होती हैं और प्रत्येक के लिए कौन-से तंत्रिका समूह का इस्तेमाल निशानदेही के लिए किया जा सकता है।

इससे एक बात उभरती है कि भले ही ज़ेब्राफिश का मस्तिष्क मनुष्य से छोटा और सरल हो, किंतु वह नींद से जुड़ी क्रियाविधियों को समझने में मददगार हो सकता है। यह भी देखा गया है कि मनुष्यों और ज़ेब्राफिश में नींद का नियमन करने वाले कई जीन्स व तंत्रिकाओं में समानता है और दवाइयों का असर भी लगभग एक जैसा ही होता है।

हालांकि हम जानते हैं कि सारे जंतु जीवन के एक बड़े हिस्से में सोते रहते हैं लेकिन इसका कारण और नियमन की क्रियाविधि अभी पूरी तरह समझी नहीं गई है। शायद ज़ेब्राफिश इसमें मददगार हो।

(स्रोत फीचर्स)

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अलविदा डॉ. एम.पी. परमेश्वरन

न विज्ञान के क्षेत्र में एमपी के नाम से लोकप्रिय लेखक, विचारक, वैज्ञानिक और एक्टिविस्ट एम. पी. परमेश्वरन (M.P. Parmeswaran) अब हमारे बीच नहीं रहे। 11 अगस्त 2026 को वे इस दुनिया को अलविदा कह गए। परमाणु वैज्ञानिक (nuclear scientist) के रूप में प्रशिक्षित परमेश्वरन ने विज्ञान की प्रयोगशालाओं में विज्ञान करने की बजाय समाज के बीच विज्ञान पहुंचाने और वैज्ञानिक चेतना जगाने की राह चुनी। वे केरल शास्त्र साहित्य परिषद के संस्थापकों में से थे।

एम. पी. परमेश्वरन का जन्म 18 जनवरी 1935 को केरल में हुआ था। इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने के बाद उन्होंने मॉस्को से परमाणु इंजीनियंरिंग में डॉक्टरेट की उपाधि हासिल की और फिर भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (Bhabha Atomic Research Centre) में वैज्ञानिक रहे। उन्होंने मलयालम भाषा के लिए की-बोर्ड विकसित करने में भूमिका निभाई, जो आगे चलकर इनस्क्रिप्ट (INSCRIPT) की-बोर्ड (key board) का आधार बना।

1975 में उन्होंने अपना वैज्ञानिक करियर छोड़कर केरल शास्त्र साहित्य परिषद (KSSP) के साथ काम करना चुना। यह निर्णय उनके जीवन की ही नहीं बल्कि समस्त भारत के जन-विज्ञान आंदोलन की दिशा बदलने वाला साबित हुआ। उन्होंने 1987 में देश भर के जन विज्ञान संगठनों के साथ मिलकर भारत जन विज्ञान जत्था की नींव रखी। आगे चलकर उन्होंने ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क (All India Peoples Science Network) के निर्माण में भूमिका निभाई जिसके माध्यम से देश भर के जन विज्ञान में सक्रिय संगठन एक साथ आए।

उन्होंने विज्ञान और विकास के सम्बंधों पर मलयालम और अंग्रेज़ी में लगातार लिखा और चर्चाएं की। उनका आग्रह था कि विकास का अर्थ केवल अधिक उत्पादन और अधिक उपभोग नहीं हो सकता; उसे मनुष्य, प्रकृति, समता और स्थानीय समुदायों की ज़रूरतों के संदर्भ में भी देखा जाना चाहिए।

परमेश्वरन के लिए विज्ञान मात्र एक विषय नहीं था और उनके लिए विज्ञान का प्रसार केवल वैज्ञानिक तथ्यों को सरल भाषा में लोगों तक पहुंचाना नहीं था। वे विज्ञान को समाज को समझने, सवाल उठाने और अपने भविष्य के बारे में निर्णय लेने का साधन और माध्यम मानते थे। केरल शास्त्र साहित्य परिषद (Science writers’ forum of Kerela) के ज़रिए उन्होंने विज्ञान, शिक्षा, पर्यावरण और विकास के सवालों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

परमेश्वरन की सबसे बड़ी विरासत शायद यही है कि उन्होंने विज्ञान को केवल जानने और जिज्ञासा को शांत करने का साधन नहीं, बल्कि समाज को बदलने और लोकतांत्रिक (democratic) बनाने की शक्ति के रूप में प्रस्तुत किया। वे आज हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी वैचारिक विरासत हमारे साथ है। (स्रोत फीचर्स)

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क्या कॉकरोच का दूध प्रोटीन संकट का समाधान होगा?

डॉ. इरफाना बेगम (बिलन्दवी)

छोटे बच्चों के पोषण (nutrition) की बात चले तो मन में सबसे पहले आता है दूध। और उनके लिए गाय या बकरी का दूध ढूंढते हैं। सोचिए कि यदि आप से कहा जाए कि कॉकरोच का दूध (cockroch milk) अच्छा रहेगा तो आपको कैसा लगेगा। शायद आप चौंक जाएं, हंस पड़ें या इसे मज़ाक समझें। आखिर कॉकरोच भी कहीं दूध देते हैं? वे तो अंडे देने वाले कीट हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कॉकरोच की एक विशेष प्रजाति ऐसा दूध बनाती है जो गाय, भैंस, बकरी या ऊंट, किसी के भी दूध से तीन से चार गुना ज्यादा पौष्टिक है? आश्चर्यजनक किंतु सत्य!

दुनिया में कॉकरोचों की 4600 से अधिक प्रजातियां हैं जिनमें से केवल 30 प्रजातियां ही इंसानी बस्तियों के आसपास रहती हैं। बाकी जंगलों और गुफाओं में रहकर प्रकृति के सफाईकर्मी की भूमिका निभाती हैं।

पहले ही स्पष्ट कर दें कि कॉकरोच के दूध का अर्थ यह नहीं है कि हमारे घरों में घूमने वाले कॉकरोच दूध देंगे।

वैज्ञानिक यह तो जान चुके थे कि कॉकरोच की एक प्रजाति डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा (Diploptera punctata) अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देती है। डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा (पैसिफिक बीटल कॉकरोच) (pacific bettle cockroch) मुख्य रूप से एशिया के प्रशांत महासागरीय क्षेत्रों (जैसे हवाई, वियतनाम और ऑस्ट्रेलिया के कुछ हिस्सों) के जंगलों में पाया जाता है। यह घरों में रहने वाले कॉकरोच से थोड़ा छोटा और भृंग जैसा (beetle like) दिखता है। अपने बच्चों को दूध पिलाने (milk feeders) की अनूठी खासियत इसे कीटों की दुनिया में सबसे अलग और स्तनधारियों (mammals) के करीब लाती है।

इस प्रजाति की मादा के शरीर में एक विशेष कोख (ब्रूड सैक) (brood sac) होती है, जिसमें इसके भ्रूण (infants) पलते हैं। जब ये भ्रूण अपनी मां के शरीर के अंदर विकसित हो रहे होते हैं, तब इस कोख की दीवारों से एक विशेष, प्रोटीन-समृद्ध तरल पदार्थ स्रावित होता है। इसे युटेराइन दूध (uterine milk) कहते हैं। मां कॉकरोच एक साथ लगभग 9-12 बच्चों को अपनी कोख में पालती है, और यह तरल पदार्थ ही उनकी मुख्य खुराक होती है।

यह दूध कार्बोहाइड्रेट और प्रोटीन से भरपूर होता है और विकसित होते भ्रूण इसे तब पीते हैं जब उनकी अग्र-आंत्र (फोरगट) और मध्य-आंत्र (मिडगट) का शुरुआती जुड़ाव होता है। यह स्तनधारियों के दूध जैसा नहीं होता, बल्कि प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा और आवश्यक अमीनो अम्लों से भरपूर एक विशेष जैविक द्रव्य होता है।

इनके पोषण के इस रहस्य का खुलासा 2016 में बैंगलुरु के इंस्टीट्यूट ऑफ स्टेम सेल बॉयोलाजी एंड रीजनरेटिव मेडिसिन (inStem) के वैज्ञानिक सुब्रमण्यम रामास्वामी के नेतृत्व में इंटरनेशनल यूनियन ऑफ क्रिस्टलोग्राफी जर्नल में प्रकाशित शोध पत्र में हुआ।

वैज्ञानिकों की यह टीम डिप्लोप्टेरा पंक्टाटा के भ्रूणों की आंत का अध्ययन कर रही थी। अध्ययन के दौरान भ्रूणों की आंत में वैज्ञानिकों को कुछ चमकते हुए क्रिस्टल दिखे। वैज्ञानिकों ने पाया कि जब विकसित होते बच्चे मां के शरीर से स्रावित इस तरल को पीते हैं, तो वह उनकी आंत में पहुंचते ही छोटे-छोटे चमकते हुए प्रोटीन क्रिस्टल्स (protein crystals) के रूप में जम जाता है। ये क्रिस्टल एक प्राकृतिक पोषण-भंडार की तरह काम करते हैं। क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलते हैं और अमीनो एसिड, वसा और शर्करा मुक्त होते रहते हैं। इस तरल पदार्थ को लिलि-मिप (lili-mip) या लोकप्रिय भाषा में कॉकरोच मिल्क नाम दिया गया।

इन नन्हे क्रिस्टलों की संरचना को समझना अत्यंत कठिन और जटिल कार्य था। वैज्ञानिकों ने इन क्रिस्टलों को बाहर निकाला और उनकी संरचना को एक्स-रे विवर्तन तकनीक से समझने की कोशिश की। इसके लिए भारतीय वैज्ञानिकों ने फ्रांस की प्रसिद्ध सोलेल सिंक्रोट्रॉन प्रयोगशाला के वैज्ञानिकों के साथ कार्य किया। शक्तिशाली एक्स-रे विवर्तन तकनीक की मदद से इन क्रिस्टलों की परमाणु-स्तरीय संरचना सुलझाई गई। वैज्ञानिकों ने इस दूध की त्रि-आयामी संरचना और इसके भीतर छिपे संपूर्ण न्यूट्रिशन प्रोफाइल (nutritional profile) का खुलासा किया और समझाया कि कॉकरोच एक ऐसा दूध स्रावित करता है जिसमें प्रोटीन क्रिस्टल होते हैं। ये क्रिस्टल प्रोटीन, ज़रूरी वसा, शर्करा और अमीनो एसिड से भरे हैं। सोलेल सिंक्रोट्रॉन की एक्स-रे रिपोर्ट के अनुसार क्रिस्टलों की बैरल जैसी आकृति की वजह से यह दूध पेट में जाने के बाद एक साथ हजम नहीं होता बल्कि जैसे-जैसे शरीर को ऊर्जा की आवश्यकता होती है, यह क्रिस्टल पोषण धीरे-धीरे एक समान गति से मुक्त होता है और लंबे समय तक शरीर को निरंतर पोषण प्रदान करता रहता है।

जैव-रासायनिक जांच से पता चला कि यह केवल एक साधारण प्रोटीन नहीं है, बल्कि प्रकृति द्वारा तैयार किया गया एक संपूर्ण और सघन भोजन (complete meal) है। वैज्ञानिकों ने पाया कि इन प्रोटीन क्रिस्टलों में सभी आवश्यक अमीनो अम्ल संतुलित मात्रा में उपस्थित हैं। इसमें मानव विकास के लिए सभी 9 ज़रूरी अमीनो एसिड का आदर्श संतुलन है। ये वे अमीनो एसिड्स हैं जिन्हें हमारा शरीर खुद नहीं बना सकता और इन्हें भोजन से ही प्राप्त करना पड़ता है। इन क्रिस्टलों में ओलीक एसिड, लिनोलिक एसिड, ओमेगा-3 फैटी एसिड, लघु और मध्यम-शृंखला वाले वसीय अम्ल, जो मस्तिष्क और हृदय के स्वास्थ्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं, के साथ ग्लिसरॉल, विटामिन और खनिज तत्व मौजूद हैं। इन्हीं कारणों से इसे भविष्य के संभावित सुपरफूड (superfood) के रूप में देखा जा रहा है।

इस दूध की खोज तो हो गई लेकिन असली चुनौती यह होगी कि कॉकरोच के इस दूध को निकाला कैसे जाएगा। और कितनी मात्रा में यह मिलेगा और इसका उपयोग कैसे किया जाएगा। क्या भविष्य में गाय-भैंस के डेयरी फार्मों की तरह कॉकरोच के फार्म (cockroch farm) बनाए जाएंगे? क्या सुबह-सुबह ग्वाला कॉकरोच दुहने आएगा? यह बहुत ही व्यावहारिक प्रश्न है क्योंकि कॉकरोच के निप्पल या थन तो होते नहीं, इसलिए उनका दूध नहीं निकाला जा सकता। कॉकरोच के आकार के कारण इसमें बहुत ही कम मात्रा में दूध बनाता है एक छोटा सा कॉकरोच अपनी कोख में केवल कुछ माइक्रोग्राम ही इस तरल का निर्माण करता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यदि हम मात्र 100 मिलीलीटर दूध निकालना चाहें, तो उसके लिए 1000 से अधिक कॉकरोचों को मारना या उनका ऑपरेशन करना पड़ेगा।

वैज्ञानिकों ने असंभव-सी दिखने वाली इस चुनौती का एक बेहद स्मार्ट जवाब खोज लिया है। इसके लिए किसी कॉकरोच को हाथ लगाने की भी ज़रूरत नहीं होगी। शोधकर्ताओं ने इन लिलि-मिप प्रोटीन क्रिस्टलों को बनाने वाले विशिष्ट जीन्स को पहचान लिया है जो इन प्रोटीन क्रिस्टल को बनाने के कोड हैं। अब वे इन जीन्स को यीस्ट (खमीर) में प्रत्यारोपित (gene transplant) करके प्रयोगशाला में बड़ी मात्रा में यह प्रोटीन बनाने की कोशिश कर रहे हैं। बड़े-बड़े औद्योगिक बायो-रिएक्टर्स के भीतर, किण्वन की प्रक्रिया द्वारा इस प्रोटीन का हू-ब-हू और बड़े पैमाने पर उत्पादन किया जा रहा है। यह वही तकनीक है जिसका उपयोग आज चिकित्सा विज्ञान में इंसुलिन और कई जीवनरक्षक दवाइयों के उत्पादन में किया जाता है।

अगर यह प्रयोग सफल हुआ तो भले ही इसकी शुरुआत कॉकरोच से हुई हो लेकिन कॉकरोचों को बिना पाले, बिना परेशान किए प्रयोगशाला में ही यह सुपर-प्रोटीन (super protein) बड़ी मात्रा में तैयार किया जा सकेगा। जब यह सुपर-प्रोटीन भविष्य में बाज़ार में आएगा, तो यह पूरी तरह से शाकाहारी या प्रयोगशाला-निर्मित उत्पाद होगा, जिसका किसी वास्तविक कॉकरोच से लेना-देना नहीं होगा। फिर इसे प्रोटीन शेक, एनर्जी ड्रिंक, पोषण पूरक या यहां तक कि खाने की चीज़ो में मिलाया जा सकेगा।

यह खोज सिर्फ एक शुरुआत है। क्योंकि वैज्ञानिकों ने अभी इन प्रोटीन्स का मानव शरीर पर असर, एलर्जी या इनके किसी भी प्रकार के नुकसान का अध्ययन नहीं किया है। यह भी देखना बाकी है कि क्या मानव शरीर इस प्रोटीन को अच्छी तरह पचा सकता है, या क्या लैक्टोस असहिष्णुता (lactose intolerance) जैसी दिक्कत पैदा करेगा? इसे बड़े पैमाने पर कैसे बनाया जाए? और इसे खाने योग्य और स्वादिष्ट रूप में कैसे परोसा जाए?

इसे मनुष्यों की थाली तक पहुंचाने में सबसे बड़ी बाधा है इसकी उत्पत्ति। तकनीकी रूप से भले ही यह कितना भी शुद्ध और प्रयोगशाला में बना हो, लेकिन जैसे ही किसी उत्पाद पर कॉकरोच का नाम लिखा होगा, आम उपभोक्ता मनोवैज्ञानिक (psycholigically) रूप से उसे स्वीकार करने में कतराएंगे। इस दिशा में कुछ दिलचस्प प्रयास शुरू हो चुके हैं। पश्चिमी देशों (जैसे दक्षिण अफ्रीका और अमेरिका) के कुछ चुनिंदा स्टार्टअप्स ने इसके प्रोटीन क्रिस्टल्स का उपयोग करके गार्थ नाम की आइसक्रीम और विशेष एनर्जी बार्स के सैंपल तैयार किए हैं। जिन लोगों ने इसे चखा, उनका कहना था कि इसका स्वाद बेहद मलाईदार, हल्का मीठा और स्वादिष्ट था बिल्कुल सामान्य दूध की आइसक्रीम जैसा! फिर भी आमजन का मनोवैज्ञानिक सोच बहुत ही अनिश्चित है।

विज्ञान में किसी भी नए खाद्य पदार्थ को इंसानों की थाली तक पहुंचाने से पहले कठोर सुरक्षा मानकों से गुज़रना पड़ता है। वैज्ञानिक अभी इस बात की बारीकी से जांच कर रहे हैं कि प्रयोगशाला में बने इस प्रोटीन का मानव शरीर पर कोई दीर्घकालिक साइड-इफेक्ट, विषाक्तता या एलर्जी (allergy)की संभावना तो नहीं है। फिलहाल प्रयोगशाला में इस प्रोटीन को विकसित करने की लागत बहुत अधिक है। ज़ाहिर है, जब तक इसका उत्पादन बड़े पैमाने पर नहीं होता, तब तक यह आम आदमी की जेब के लिए तो बहुत महंगा ही रहेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नीट घोटाला और स्वास्थ्य-सेवा क्षेत्र का अधोपतन

डॉ. अनंत फड़के

स वर्ष मेडिकल कॉलेजों में स्नातक (MBBS) और स्नातकोत्तर (PG) प्रवेश के लिए होने वाली नीट परीक्षा (NEET Examination) व्यवस्था पूरी तरह विफल साबित हुई। इसके विरोध में दिल्ली में जंतर-मंतर पर और अन्य शहरों में हुए जेन-ज़ी आंदोलनों और अन्य दबावों के चलते इस परीक्षा प्रणाली को रद्द किया जाएगा या इसमें सुधार किए जाएंगे। लेकिन केवल इतना करने से प्रवेश-प्रक्रिया में फैला भ्रष्टाचार और अव्यवस्था समाप्त नहीं होगी। इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण, कॉर्पोरेटीकरण, चिकित्सा शिक्षा के निजीकरण और महंगे निजी कोचिंग संस्थानों (private coaching centres) के बढ़ते प्रभाव जैसे मूल कारणों को समाप्त करना होगा। आइए संक्षेप में समझें कि यह स्थिति क्यों है।

सरकारी अस्पतालों की जगह निजी अस्पतालों का विस्तार

1980 तक सबसे आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं मुख्य रूप से शहरों के छोटे-बड़े सरकारी अस्पतालों और कुछ बड़े चैरिटेबल (परमार्थ) अस्पतालों में उपलब्ध थीं। यहां इलाज के लिए मुख्यतः गरीब और मध्यम वर्ग (poor & middle class) के लोग आते थे, लेकिन समाज के अन्य वर्ग भी इन अस्पतालों में इलाज करवाते थे।

पिछले 40–45 वर्षों में नई और अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीकों के आने से स्वास्थ्य सेवाओं का स्वरूप बदल गया। सही समय पर बीमारी की पहचान और इलाज पहले की तुलना में अधिक आसान हो गया। लेकिन इसका लाभ सभी लोगों तक पहुंचाने के लिए सरकार को पुराने सरकारी अस्पतालों का आधुनिकीकरण करना चाहिए था और पर्याप्त संख्या में नए सरकारी अस्पताल भी खोलने चाहिए थे। साथ ही, ईमानदारी से काम करने वाले चैरिटेबल अस्पतालों (cheritable hospitals) को भी ऐसी सुविधाएं विकसित करने के लिए सरकारी सहायता (subsidy) मिलनी चाहिए थी। लेकिन 1980 के बाद सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में भी निजीकरण (privatization) की नीति अपनाई और धीरे-धीरे अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हटना शुरू कर दिया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 1980 से ही सिफारिश की है कि सरकार का स्वास्थ्य पर कुल खर्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 5 प्रतिशत होना चाहिए। लेकिन भारत में केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त स्वास्थ्य खर्च बढ़ने की बजाय 2014 के बाद GDP के लगभग 1.3 प्रतिशत पर ही स्थिर रहा। 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार 2025 तक सरकारी स्वास्थ्य खर्च को GDP के 2.5 प्रतिशत तक पहुंचाया जाना था और इसमें केंद्र सरकार का हिस्सा 1 प्रतिशत होना था। लेकिन पिछले पांच वर्षों में केंद्र सरकार का स्वास्थ्य खर्च GDP के 0.3 प्रतिशत से भी कम रहा है।

कॉर्पोरेट स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार

सरकार को सभी स्तरों पर आधुनिक चिकित्सा तकनीक के लिए पर्याप्त निवेश करना चाहिए था। लेकिन 1990 के बाद यह निवेश मुख्य रूप से बड़ी कॉर्पोरेट कम्पनियों (corporate companies) ने किया है। पहले भी दवा उद्योग में कॉर्पोरेट निवेश था। बाद में आधुनिक पैथॉलॉजी लैब, रक्त जांच केंद्र, स्कैन सेंटर और बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल भी तेज़ी से बढ़ने लगे। कई ऐसे अस्पताल, जो केवल नाम के लिए चैरिटेबल थे लेकिन वास्तव में लाभ कमाने के उद्देश्य से चलते थे, उनमें भी कानूनी रास्ते निकालकर कॉर्पोरेट कम्पनियों ने निवेश किया। 1991 से 2024 के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में कॉर्पोरेट निवेश लगभग ₹500 करोड़ से बढ़कर ₹50,000 करोड़ तक पहुंच गया।

कई विकसित देशों और वियतनाम जैसे देशों में यह नियम है कि डॉक्टर वैज्ञानिक दिशानिर्देशों के अनुसार ही यह तय करेंगे कि कौन-सी जांच या प्रक्रिया वास्तव में आवश्यक है। लेकिन भारत में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है। इसलिए बहुत कम विशेषज्ञ इन वैज्ञानिक दिशानिर्देशों का पालन करते हैं। 1980 के बाद मरीज़ों को किसी विशेष लैब में भेजने के बदले डॉक्टरों को कमीशन (कट) (commision) मिलने की प्रथा भी बढ़ी। परिणाम यह हुआ कि वास्तव में ज़रूरत हो या न हो, अधिक से अधिक जांच और प्रक्रियाएं करवाकर अधिक लाभ कमाना कई निजी अस्पतालों का मुख्य उद्देश्य बन गया। ऐसे मुनाफा-केंद्रित (profit-centred) अस्पतालों में काम करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या लगातार बढ़ती गई। उनके साथ काम करके कमाई करने वाले अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ती गई।

मुनाफाकेंद्रित निजी मेडिकल कॉलेजों की बढ़ोतरी

ऐसे डॉक्टर तैयार करने के लिए, जो बाद में कॉर्पोरेट अस्पतालों (corporate hospitals) में काम करें, हर साल 10-20 लाख रुपए फीस लेने वाले निजी मेडिकल कॉलेजों की संख्या लगातार बढ़ती गई। इसका समर्थन यह कहकर किया जाता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश के अनुसार हर 1000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए, और केवल सरकारी मेडिकल कॉलेजों के माध्यम से इतने डॉक्टर तैयार करना संभव नहीं है। इसलिए निजी मेडिकल कॉलेजों को बढ़ावा देना ज़रूरी बताया जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन निजी कॉलेजों (private college) से पढ़कर निकलने वाले अधिकांश डॉक्टर उन गरीब ग्रामीण या शहरी इलाकों में काम करने नहीं जाते, जहां डॉक्टरों की सबसे अधिक कमी है। कई विद्यार्थी कोचिंग पर 3-5 लाख खर्च करते हैं, और फिर निजी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और पीजी करने में 2-5 करोड़ तक खर्च हो सकता है। इतना खर्च करने के बाद कई डॉक्टर मुख्यतः शहरों के अमीर लोगों का इलाज करते हैं और कॉर्पोरेट अस्पतालों की मुनाफाखोरी का हिस्सा बन जाते हैं।

अनावश्यक जांच और इलाज का खर्च केवल अमीर लोग ही उठा सकते हैं। लेकिन उनके लिए भी यह अनुचित है और कभी-कभी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है। गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए तो यह खर्च भारी कर्ज़ का कारण बन सकता है।

निजी मेडिकल शिक्षा का तेज़ी से विस्तार

इस लाभ कमाने वाली व्यवस्था में शामिल होने की इच्छा रखने वाले डॉक्टरों की संख्या लगातार बढ़ती गई। 1980 में देश में लगभग 110 एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज (allopathic medical college) थे। इनमें हर वर्ष लगभग 10,000 विद्यार्थी प्रवेश लेते थे। इनमें से केवल 10 प्रतिशत विद्यार्थी निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ते थे। पीजी शिक्षा में हर वर्ष लगभग 3–4 हज़ार डॉक्टर प्रवेश लेते थे और उनमें से केवल 5 प्रतिशत निजी मेडिकल कॉलेजों में जाते थे। लेकिन 2025–26 तक देश में लगभग 800 एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज हो गए और उनमें लगभग सवा लाख विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। इनमें से लगभग 50 प्रतिशत विद्यार्थी निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे हैं और हर साल 10–20 लाख फीस दे रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सरकार ने पर्याप्त संख्या में सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं खोले। इस कारण केवल योग्यता और मेहनत के आधार पर अच्छे मेडिकल करियर (medical carrer) का अवसर पर्याप्त नहीं बढ़ पाया।

इसी तरह, 2025–26 में पीजी मेडिकल शिक्षा में लगभग 75 से 80 हज़ार डॉक्टरों ने प्रवेश लिया, जिनमें लगभग आधे निजी मेडिकल कॉलेजों में गए।

नीट परीक्षा और कोचिंग उद्योग

मेडिकल प्रवेश की प्रतिस्पर्धा (competition) लगातार बढ़ती गई। राष्ट्रीय स्तर पर एक समान प्रवेश प्रक्रिया बनाने के लिए 2016 में नीट परीक्षा शुरू की गई। पहले वर्ष इस परीक्षा में लगभग आठ लाख विद्यार्थी बैठे थे। 2025 तक यह संख्या बढ़कर 22 लाख हो गई। इतनी बड़ी संख्या और इतनी कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण महंगे निजी कोचिंग संस्थानों का तेज़ी से विस्तार हुआ। 2025 तक यह नया कोचिंग उद्योग लगभग 25,000 करोड़ का हो गया। ऑनलाइन कोचिंग के लिए 15–20 हज़ार तक फीस ली जाती है, जबकि अच्छे कोचिंग संस्थानों (coaching institutes) की फीस लगभग एक लाख या उससे अधिक होती है। यह धारणा बनने लगी कि जितनी अधिक फीस, सफलता की संभावना उतनी अधिक। कुछ संस्थान ‘निश्चित चयन’ कराने का दावा करते हैं और उनके लिए विद्यार्थी 3–5 लाख तक खर्च करते हैं। यदि इनमें से कुछ विद्यार्थियों को ज़्यादा पैसे देकर प्रश्नपत्र लीक होने का लाभ भी मिलता हो, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

केवल नीट में सुधार से समस्या हल नहीं होगी

नीट परीक्षा में हुए घोटाले ने यह स्पष्ट कर दिया कि अखिल भारतीय प्रवेश प्रणाली (all india admission system)की अपनी सीमाएं और गंभीर जोखिम हैं। इस विरोध के कारण वर्तमान व्यवस्था में सुधार होना चाहिए या आवश्यकता हो तो नई प्रवेश प्रणाली बनानी चाहिए। लेकिन केवल इससे प्रवेश प्रक्रिया में फैला भ्रष्टाचार (corruption) समाप्त नहीं होगा। असल में यह प्रतियोगिता ऐसे पेशे में प्रवेश पाने की है जहां बहुत अधिक पैसा और प्रतिष्ठा मिलती है। इसलिए निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाने की होड़ लगातार बढ़ रही है। भले ही बहुत से विद्यार्थियों को यह बात पूरी तरह समझ में न आती हो, लेकिन वर्तमान व्यवस्था की यही वास्तविकता है। इसलिए समस्या की जड़ पर प्रहार करना आवश्यक है।

क्या किया जाए?

1. सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े पैमाने पर निवेश (high investement) किया जाए। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा स्वास्थ्य पर खर्च में बड़ी वृद्धि की जाए। सरकारी अस्पतालों का विस्तार हो, उनमें आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हों और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था जनता के लिए पारदर्शी तथा जवाबदेह रहे। साथ ही, ईमानदारी से काम करने वाले चैरिटेबल अस्पतालों को भी सुविधाएं विकसित करने के लिए सरकारी सहायता मिले।

2. सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाई जाए। पर्याप्त नए सरकारी मेडिकल कॉलेज खोले जाएं। साथ ही, निजी मेडिकल कॉलेजों को भी सरकारी कॉलेजों के बराबर ही फीस लेने की अनुमति हो। यदि इससे कई निजी मेडिकल कॉलेज बंद भी हो जाएं, तो इससे जनता का नुकसान नहीं होगा। बल्कि मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं (medical entrance exam) के अत्यधिक महत्व और उनमें होने वाले भ्रष्टाचार को कम करने में मदद मिलेगी।

3. निजी स्वास्थ्य सेवाओं को वैज्ञानिक नियमों के अनुसार चलाया जाए। निजी अस्पतालों में इलाज केवल वैज्ञानिक चिकित्सा दिशानिर्देशों (scientific medical guidelines) के अनुसार ही किया जाए और मरीज़ों से केवल निर्धारित तथा पारदर्शी दरों पर ही शुल्क लिया जाए। यदि निजी स्वास्थ्य सेवाओं में मुनाफाखोरी, मरीजों का आर्थिक शोषण और अनावश्यक जांच तथा इलाज के माध्यम से कमाई पर रोक लगाई जाए, तो कॉर्पोरेट अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर बनने की वर्तमान अंधी दौड़ और अत्यधिक व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा भी आपो-आप कम हो जाएगी।

कुल मिलाकर, केवल मेडिकल प्रवेश परीक्षा में हुए भ्रष्टाचार पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे मौजूद मूल कारणों – स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण, चिकित्सा शिक्षा के निजीकरण, सरकारी निवेश की कमी और कॉर्पोरेट मुनाफाखोरी (corporate profit making) – को भी दूर करना आवश्यक है। ऐसा होने पर ही प्रवेश प्रक्रिया में ईमानदारी आएगी और चिकित्सा व्यवस्था अधिक न्यायपूर्ण तथा जनहितैषी (public friendly) बन सकेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कैंसर से जंग में एक नई उम्मीद – एटलस

चिकित्सा जगत में कैंसर (cancer)जैसी घातक बीमारी के सटीक उपचार के लिए शोधकर्ता लगातार नई संभावनाएं खोजने में लगे हुए हैं। इस कोशिश में शोधकर्ताओं के लिए एक सवाल पहेली बना हुआ है “क्या कारण है कैंसर के जोखिम का असर अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग होता है। कोई व्यक्ति तो कैंसर रोगी बन जाता है, वहीं कोई अन्य व्यक्ति सारे जोखिमों के बावजूद इस खतरनाक बीमारी से बचा रहता है?” जैसे कई सालों से धूम्रपान (smoking) करने वाले दो व्यक्तियों में से एक तो कैंसर का मरीज़ बन जाता है, और दूसरा बिलकुल स्वस्थ रहता है।

हाल ही में, साइंस जर्नल में बताया गया है कि कैंसर रिसर्च यूके (ब्रिटेन) और नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (अमेरिका) मिलकर एटलस (ATLAS) परियोजना के अंतर्गत एक अंतर्राष्ट्रीय शोध करने जा रहे हैं। लगभग ढाई करोड़ डॉलर का यह शोध कैंसर ग्रैण्ड चैलेंजेस (cancer grand challenges) द्वारा वित्तपोषित है। एटलस वह अंतर्राष्ट्रीय परियोजना है जिसके तहत हज़ारों वैज्ञानिक मिलकर एक स्वस्थ मानव शरीर की समस्त कोशिकाओं की पहचान करने का प्रयास कर रहे हैं।

डॉ. पॉल बस्टर्ड और उनकी टीम एक कैंसर एंटीबॉडी एटलस (cancer antibody atlas) बनाने में जुटी है, जिससे पता लगाया जा सकेगा कि प्राकृतिक तौर पर भारी जोखिम वाले व्यक्ति कैंसर से कैसे बचे रहते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस सवाल का जवाब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में हो सकता है। आम तौर पर बाहरी रोगजनकों से बचाव के लिए शरीर की बी-कोशिकाएं एंटीबॉडी बनाती हैं, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यही बी कोशिकाएं अपने ही प्रतिरक्षा तंत्र के खिलाफ काम करने वाली ऑटो-एंटीबॉडी (autiantibody) बनाने लगती हैं (यही ऑटो-एंटीबॉडी स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला कर देती हैं, जिससे ऑटोइम्यून बीमारियां होती हैं)।

वैज्ञानिकों का मानना है कि ये ऑटो-एंटीबॉडी शरीर में दो तरह की हो सकती हैं – कैंसर को बढ़ावा देने वाली या कैंसर से बचाने वाली। अनुमान है कि कैंसर को बढ़ावा देने वाली ऑटो-एंटीबॉडी ट्यूमर से बचाव करने वाले प्रतिरक्षा रसायनों (साइटोकाइंस) (cytokines) को खत्म कर सकती हैं, जिसके चलते कैंसर कोशिकाएं शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र से बचकर ट्यूमर बना लेती हैं। वहीं दूसरी ओर, बचाव करने वाली ऑटो-एंटीबॉडी कैंसर-कारी कोशिकाओं को शुरुआत में ही पहचान कर खत्म कर सकती हैं, या फिर कैंसर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकती हैं।

दरअसल, इस अध्ययन का विचार कोविड-19 (COVID-19) महामारी के दौरान किए गए एक अध्ययन से उभरा है। वैज्ञानिकों ने उस अध्ययन में पाया था कि गंभीर हालत वाले 10 से 15 प्रतिशत मरीज़ों में कुछ ऐसी ऑटो-एंटीबॉडीज़ थीं जो वायरस से लड़ने वाले उनके अपने प्रतिरक्षा रसायनों (टाइप-1 इंटरफेरॉन) का खात्मा कर रही थीं। इसलिए वे मरीज़ कोविड के प्रति बहुत ज़्यादा संवेदनशील हो गए थे। अब शोधकर्ता कैंसर में भी इनकी भूमिका समझने की कोशिश कर रहे हैं।  

पांच साल तक चलने वाले इस अध्ययन के शुरुआती चरण में दुनिया भर के 16,000 से ज़्यादा लोगों के खून के नमूनों की जांच की जाएगी। इसमें मुख्य रूप से तीन विशेष समूहों को शामिल किया जाएगा: 100 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोग, स्मोकर्स जो कैंसर-मुक्त हैं, और ऐसे जुड़वां बच्चे जिनमें सिर्फ एक कैंसर-रोगी है। खून के नमूनों में 20,000 से ज़्यादा अलग-अलग प्रोटीनों (proteins) का परीक्षण किया जाएगा। आगे चलकर 50,000 से ज़्यादा लोगों को शामिल किया जाएगा।

वैज्ञानिकों का मकसद ट्यूमर के विकास में प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली ऑटो-एंटीबॉडीज़ की भूमिका की पहचान करना है। इससे समय रहते कैंसर के जोखिम का सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा, कैंसर रोकथाम उपचार और दवाइयों का विकास हो सकेगा और वर्तमान इम्यूनोथेरेपी (immunotherapy) में सुधार किए जा सकेंगे। साथ ही, यदि कुछ हानिकारक ऑटो-एंटीबॉडीज़ की पहचान हुई, तो उन्हें जड़ से खत्म करने के उपचार भी विकसित किए जा सकते हैं। यह शोध कैंसर के खिलाफ जंग में एक नई उम्मीद साबित हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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एक चूहा जिसकी बस्ती में सिर्फ रानी के बच्चे होते हैं

डॉ. विजय दुआ

नैकेड मोल रैट (Heterocephalus glaber) को हिन्दी में नग्न तिल चूहा कहा जाता है। इसे सैंड पपी (sand puppy) भी कहते हैं। इसके शरीर पर बाल नहीं होते हैं। ये पूर्वी अफ्रीका के सूखे इलाकों में ज़मीन के नीचे सुरंग बनाकर रहने वाले अनोखे जीव हैं। ये सामाजिक जीव हैं और इनकी बस्ती में सिर्फ एक मादा (रानी) ही प्रजनन कार्य करती है।

टोरंटो विश्वविद्यालय, कनाडा की तंत्रिका वैज्ञानिक मेलिसा होम्स के अनुसार लंबे समय से यह एक पहेली रही है कि कैसे इनके समूह में केवल एक मादा (रानी) ही प्रजनन (reproduction) का कार्य करती है जबकि समूह की शेष सभी मादाएं (females) रानी की संतानों के पालन पोषण और भोजन जुटाने जैसे काम करती हैं। अब इस पहेली को सुलझाने की दिशा में एक कदम आगे बढ़े हैं।

हाल ही में नग्न तिल चूहे के बारे में नेचर में प्रकाशित एक रिपोर्ट में बताया गया है कि रानी एक प्रकार के रसायन का स्राव करती है, जिसकी गंध से समूह में उपस्थित अन्य मादाओं की प्रजनन क्रिया रोक दी जाती है! यह गंध अन्य मादा में हॉर्मोन (hormone) बनने की प्रक्रिया पर असर डालती है, और उनके बच्चे पैदा करने की क्षमता दब जाती है। यह अध्ययन बर्लिन स्थित मैक्स डेलब्रुक सेंटर फॉर मॉलीक्यूलर मेडिसिन के तंत्रिका वैज्ञानिक मोहम्मद खल्लाफ और उनके साथियों ने किया है। उन्होंने एक बस्ती में अलग-अलग सामाजिक श्रेणी के नग्न तिल चूहों के शरीर पर से फोहों में सोखकर रसायन प्राप्त किए। उन्होंने पाया कि एक रसायन है (आइसोप्रोपाइल मिरिस्टेट, आई.पी.एम.) जो रानी के शरीर पर तो प्रचुरता में उपस्थित था लेकिन बस्ती के अन्य सदस्यों पर नगण्य ही था। और तो और, रानी चूहे में भी इस रसायन की मात्रा प्रजनन चक्र के अनुसार बदलती है; विशेषकर अंडोत्सर्ग के समय सर्वाधिक रहती है। मस्तिष्क इमेजिंग (brain imaging) में भी देखा गया कि प्रजनन में अक्षम मादाएं ही आई.पी.एम. (IPM) की गंध के प्रति संवेदनशील होती हैं।

हालांकि मधुमक्खियों, चींटियों, दीमकों आदि कई अन्य सामाजिक (यूसोशल) जन्तुओं में भी सिर्फ रानी प्रजनन कार्य करती है, लेकिन उनमें बस्ती की बाकी मादा सदस्यों के प्रजनन अंग अविकसित रहते हैं और उनमें एक हॉर्मोन प्रोलैक्टिन (prolectin) का स्तर भी बढ़ा हुआ रहता है। परन्तु नग्न तिल चूहों में सभी मादाओं में प्रजनन क्षमता होते हुए भी वे यौवनारंभ (प्यूबर्टी) में ही अटकी रह जाती हैं, कभी संतानोत्पत्ति नहीं करतीं।

खल्लाफ की टीम ने इस रसायन की भूमिका को सुनिश्चित करने के लिए एक प्रयोग और किया था। उन्होंने कुछ प्रजनन-अक्षम (unreproductive) चुहियाओं को बस्ती से अलग कर दिया और शेष मादाओं में एक औषधि की मदद से उनकी गंध संवेदना (smell senses) को अवरुद्ध कर दिया। दोनों ही मामलों में ऐसी मादाओं में प्रोलैक्टिन का स्तर घट गया और वे नरों के साथ समागम करने में समर्थ हो गईं। यह भी देखा गया कि रानी की अनुपस्थिति में भी सिर्फ आई.पी.एम. की उपस्थिति प्रजनन को रोकने के लिए पर्याप्त थी। (स्रोत फीचर्स)

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