प्रयोगशाला में बनी कृत्रिम कोशिका

कोशिका जीवन की संरचनात्मक तथा कार्यात्मक इकाई है। इसका मतलब है कि सारे सजीवों का ढांचा कोशिकाओं से बना होता है और उनकी समस्त अभिक्रियाएं कोशिकाओं में ही सम्पन्न होती हैं। जीव वैज्ञानिक लंबे समय से इस सवाल पर विचार करते रहे हैं कि क्या पूर्णत: अजैविक पदार्थों को जोड़कर एक जीवित कोशिका बनाई जा सकती है।

अब इस दिशा में एक कदम और बढ़ाया गया है। मेनेसोटा ट्विन सिटीज़ विश्वविद्यालय की संश्लेषण जीव विज्ञानी केट एडामला और उनकी टीम ने एक कृत्रिम कोशिका का निर्माण कर लिया है। दरअसल, यह कोशिका पानी की एक सूक्ष्म बूंद है जो एक वसीय झिल्ली से घिरी हुई है। इस बूंद में तमाम रसायन भरे गए हैं और साथ में 36 जीन्स वाला डीएनए है। माना जा रहा है कि यह पहला मॉडल है जो अधिकांशत: अजैविक रसायनों से बना है। इसे स्पड कोशिका (SpudCell) नाम दिया गया है। दरअसल, एडामला की टीम द्वारा संश्लेषित स्पड कोशिका की प्रमुख विशेषता यह है कि इसे पूरी तरह जाने-माने रासायनिक घटकों से तैयार किया गया है और यह संपूर्ण कोशिका-चक्र को दर्शाती है।

इससे पहले इस दृष्टि से किए गए अनुसंधान में किसी जीवित कोशिका में ही काट-छांट की जाती थी। प्रयास यह जानने का होता था कि किसी कोशिका को काम करने के लिए न्यूनतम कितने घटकों की आवश्यकता होती है। स्पड कोशिका पूरी तरह अजैविक घटकों से बनी है और इसने पूरा कोशिका-चक्र प्रदर्शित किया है।

कई शोधकर्ता प्रयोगशाला में कोशिका निर्माण के बारे में इस उम्मीद में विचार करते रहे हैं कि इससे जीवन की बुनियादी प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिलेगी और कई यौगिकों का संश्लेषण संभव हो जाएगा। लेकिन अधिकांश वैज्ञानिकों की कोशिश संपूर्ण कोशिका के निर्माण की नहीं बल्कि अलग-अलग कोशिकीय कार्यों की अनुकृति बनाने की होती है। यह एक चुनौती रही है कि ऐसे कई सारे कार्यों को एक साथ करवाया जाए।

जीवन के मौजूदा अणुओं – जैसे डीएनए या वसा अम्ल – का उपयोग करके इस कोशिका को साकार किया गया है। इसमें जिस तरीके का उपयोग किया गया है उसे PURE (Protein Synthesis Using Recombinant Elements) कहते हैं। यह जैविक अणुओं का एक समुच्चय होता है जिसकी ज़रूरत डीएनए का प्रतिलेखन करके आरएनए बनाने तथा आरएनए को प्रोटीन्स में अनुदित करने के लिए होती है। लेकिन इस तरह बनी बूंदें (स्पड कोशिकाएं) न तो खुद के लिए पोषण प्राप्त कर सकती हैं और न ही अपने जीनोम का समुचित विभाजन कर सकती हैं।

स्पड कोशिका में पोषण उपलब्ध कराने की कोशिश हुई है। एडामला की टीम ने इसके जीनोम (जो किसी बैक्टीरिया के जीनोम से 50 गुना छोटा है – यानी मात्र 90,000 क्षार जोड़ियों से बना है) में ऐसे जीन्स जोड़ दिए जो कुछ अणु बनाते हैं जो बूंद की सतह पर जम जाते हैं। ये ऐसे टैग्स की तरह काम करते हैं जो बाहर उपस्थित पोषण थैलियों (लिपोसोम्स) के लिए जुड़ने के स्थान बन जाते हैं। इन फीडर लिपोसोम्स में कई एंज़ाइम्स और अन्य अणु होते हैं जिनकी ज़रूरत स्पड कोशिका को होती है। पोषण के लिए स्पडकोशिका अल्फा-हीमोलायसीन नाम के एक प्रोटीन का उपयोग करती हैं। यह प्रोटीन कोशिका के डीएनए के अनुसार बनाया जाता है और यह जाकर कोशिका झिल्ली से चिपकता है। इस प्रोटीन से सम्बद्ध एक रासायनिक टैग कोशिका सतह के बाहर निकला होता है। यह टैग फीडर लिपोसोम से जुड़ जाता है और वहां से पोषक पदार्थ कोशिका में आने लगते हैं।

ये फीडर लिपोसोम्स उन्हें झिल्ली की वृद्धि के लिए लिपिड्स तथा अन्य पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं – जैसे राइबोसोम्स, एंज़ाइम्स तथा कई छोटे-छोटे अणु। फीडर लिपोसोम्स से जुड़ाव तब होता है जब स्पड कोशिका स्वयं अपने डीएनए से एक प्रोटीन बनाती है जो फीडर की झिल्ली से जुड़ जाता है। यानी स्पड कोशिका का डीएनए इस बात पर नियंत्रण रखता है कि वह पोषण प्राप्त कर पाएगी या नहीं, वह कितनी तेज़ी से वृद्धि करेगी और कितनी बड़ी हो पाएगी। प्राकृतिक कोशिकाएं तो अपने पोषक पदार्थ स्वयं बनाती है जिसके लिए उन्हें सैकड़ों जीन्स की ज़रूरत होती है। बाहर से पोषण मिलने के चलते स्पड कोशिकाएं काफी छोटे जीनोम के साथ अपना चक्र पूरा कर पाती हैं।

यह पोषण इन स्पड कोशिकाओं को वृद्धि करने और अपने जीनोम की प्रतिलिपि बनाने में सक्षम बनाता है।

अगला कदम था कि इन बूंदों (स्पड कोशिका) के जीनोम में एक ऐसी व्यवस्था जोड़ना जो इन्हें विभाजन की क्षमता प्रदान करे। इसके लिए एक और सतही टैग (FLAG) का जीन जोड़ा गया। यह टैग एक विशाल अणु स्ट्रेप्टावाइडिन से जुड़ सकता है। FLAG और स्ट्रेप्टावाइडिन का जुड़ाव सतह के अन्य अणुओं के बीच विकर्षण पैदा करता है। जब माध्यम में काफी मात्रा में स्ट्रेप्टावाइडिन डाला जाता है तो  झिल्ली में उत्पन्न बल बूंद को दो हिस्सों में तोड़ देता है। प्राकृतिक कोशिकाओं में विभाजन का काम एक आंतरिक ढांचे (कोशिका-कंकाल cytoskeleton) की मदद से होता है। शुरू से शुरू करके कामकाजी कोशिका-कंकाल का निर्माण करवाना एक बड़ी चुनौती रही है क्योंकि इसके लिए बड़ी संख्या में तरह-तरह के प्रोटीन्स की समन्वित कार्रवाई ज़रूरी होती है।

स्पड कोशिका में इस चरण को बायपास किया गया है। इसमें प्रोटीन्स झिल्ली पर जमा होकर एक दबाव बनाते हैं, जिससे झिल्ली टूट जाती है। जो स्पड कोशिका ज़्यादा मात्रा में यह प्रोटीन बना पाती है वह ज़्यादा कुशलता से विभाजित हो पाती है।

एडामला स्वीकार करती हैं कि विभाजन की यह प्रक्रिया काफी अकुशल है। दरअसल, कई बार विभाजन करवाने के लिए उन्हें स्पड कोशिका पर बाहर से यांत्रिक बल आरोपित करना पड़ा था। इसमें एक समस्या और उभरी। जीनोम का प्रतिलिपिकरण तो हो जाता है लेकिन विभाजन के दौरान ये प्रतिलिपियां सफाई से अलग-अलग नहीं हो पातीं। परिणाम यह रहा कि विभाजन के पांच चक्रों के बाद मात्र 30 प्रतिशत स्पड कोशिकाओं में पूरा जीनोम उपस्थित रहा।

बहरहाल, एडामला बताती हैं कि स्पड कोशिका ने कई चीज़ों का मॉडल प्रस्तुत किया है।

जैसे इन कोशिकाओं में विकास (इवोल्यूशन) की क्षमता थी। उन्होंने कुछ स्पड कोशिकाओं में जेनेटिक उत्परिवर्तन किए। जैसे उन्होंने कुछ स्पड कोशिकाओं में ऐसे जीन्स जोड़ दिए जो उनमें पोषक लिपोसोम्स से जुड़ने वाले ज़्यादा टैग्स बनवाते थे। यानी वे ज़्यादा ‘भोजन’ ग्रहण कर सकती थीं और ज़्यादा तेज़ी से वृद्धि कर सकती थीं। ऐसी परिवर्तित कोशिकाओं में ज़्यादा तेज़ी से वृद्धि हुई और उनकी संतानें भी ज़्यादा हो गईं। यह भी देखा गया कि पोषण के अभाव में उत्परिवर्तित कोशिकाओं का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा।

वृद्धि व विभाजन के पांच चक्रों के बाद लगभग 60 प्रतिशत स्पड कोशिका जीनोम्स में वह उत्परिवर्तन मौजूद था।

इन कोशिकाओं का जीनोम मात्र 90,000 क्षार जोड़ियों से बना है और सात अलग-अलग प्लास्मिड्स के रूप में व्यवस्थित है। पहले अनुमान लगाया गया था कि किसी कोशिका के लिए न्यूनतम जीनोम 1,13,000 क्षार जोड़ियों की उपस्थिति ज़रूरी होगी। स्पड कोशिका ने इस सीमा को और कम कर दिया है।

प्रोटीन संश्लेषण तंत्र: स्पड कोशिका प्रोटीन सिंथेसिस यूज़िंग रीकॉम्बिनेंट एलीमेंट्स (PURE) तंत्र का उपयोग करती है। इसके लिए एशरीशिया कोली (ई. कोली) के

एंज़ाइम्स का उपयोग हुआ है। इसमें राइबोसोम भी ई. कोली का ही जोड़ा गया है। राइबोसोम वह कोशिकांग होता है जो आरएनए से प्रोटीन बनवाने का काम करता है। यहां विशेषता यह है कि शोधकर्ता जानते हैं कि किन-किन घटकों का इस्तेमाल किया गया है जबकि पूर्व प्रयोगों में पूरी कोशिका का पदार्थ इस्तेमाल किया जाता था।

कुछ सवाल और भावी कदम

यह तो सही है कि स्पड कोशिकाएं जीवन की कई केंद्रीय प्रक्रियाएं सम्पन्न कर सकती हैं और इससे पता चलता है कि इन्हें सुपरिभाषित घटकों से विकसित किया जा सकता है। लेकिन कुछ सवाल बाकी हैं।

स्पड कोशिका फिलहाल ई. कोली बैक्टीरिया से प्राप्त राइबोसोम का इस्तेमाल करती हैं। राइबोसोम के पुनर्निर्माण की क्षमता न होने के कारण ये कोशिकाएं 5-10 पीढ़ियों तक ही जीवित रहती हैं, उसके बाद पूरी मशीनरी ठप होने लगती है। लेकिन एकदम शुरू से शुरू करके राइबोसोम बनाने का मतलब होगा कि दर्जनों प्रोटीन्स का संश्लेषण किया जाए और उन्हें सही क्रम में व्यवस्थित किया जाए।

यह देखा गया कि पांच पीढ़ियों के बाद लगभग 30 प्रतिशत संतान कोशिकाओं में 7 डीएनए प्लास्मिड का पूरा सेट मौजूद था। प्राकृतिक कोशिकाओं में इस समस्या का समाधान कोशिका-कंकाल मशीनरी द्वारा होता है। कोशिका विभाजन के दौरान कोशिका-कंकाल गुणसूत्रों को अलग-अलग करने में मददगार होता है। स्पड कोशिकाओं में कोशिका-कंकाल व्यवस्था नहीं है।

अभी स्पड कोशिकाएं बाहर से फीडिंग पर निर्भर हैं। इसके चलते पोषक लिपोसोम्स लगातार देने पड़ते हैं। इसके अलावा विभाजन के लिए स्ट्रेप्टावाइडिन तथा अणुओं की कड़ी जोड़ने वाले प्रोटीन्स भी बाहर से देने होते हैं।

इन सब कारणों से इस तंत्र (स्पड कोशिका) को स्वायतत्ता देने के लिए ऐसे चयापचय मार्ग स्थापित करने होंगे कि वह ऐसे पदार्थों का निर्माण सरल घटकों से कर पाए। (स्रोत फीचर्स)

Photo credit- https://www.google.com/imgres?q=spud%20cell%20photos%20with%20out%20credit%20issue&imgurl=https%3A%2F%2Fwww.gatech.edu%2Fsites%2Fdefault%2Ffiles%2Fstyles%2Fsquare_medium_600x600%2Fpublic%2Fhg_media%2F2026-13%2Fspudcell.jpeg%3Fh%3D5c15f570%26itok%3Dv08zmHMu&imgrefurl=https%3A%2F%2Fwww.gatech.edu%2Fnews%2F2026%2F07%2F08%2Fcreating-synthetic-life-lab–

तितलियों के रंगीन पंख चकमा देते हैं

तितलियों के प्रति खिंचाव का एक कारण है उनके चटख, रंग-बिरंगे पंख। इसी के कारण उन्हें पकड़ने की इच्छा भी होती है। लेकिन, जिन्होंने तितलियां पकड़ने की कोशिश की है वे जानते हैं कि उड़ती तितली पकड़ना इतना आसान नहीं है। तितलियां पकड़ना न सिर्फ हमारे लिए मुश्किल है, बल्कि उनके सभी शिकारियों के लिए भी मुश्किल है।

लेकिन ऐसा क्यों? जब इतने चटख रंगों के कारण तितलियां इतनी नुमाया रहती हैं तो फिर उन्हें पकड़ना मुश्किल क्यों? नेचर में प्रकाशित हालिया अध्ययन बताता है कि दरअसल यही रंग-बिरंगे पंख शिकारी को चकमा देने का काम करते हैं और उनकी कोशिश मुश्किल बनाते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष कहते हैं कि तितलियों के पंखों पर बने रंगों के पैटर्न उड़ते समय दृष्टि भ्रम पैदा करते हैं, जिससे शिकारी उनकी स्थिति को लेकर धोखा खा जाते हैं और पकड़ने से चूक जाते हैं।

वैसे, वैज्ञानिकों को लंबे समय से यह लगता रहा है कि जीव-जंतुओं के शरीर पर चटख और गहरे रंग से बने पैटर्न ‘मोशन डैज़ल’ (गति चकाचौंध) पैदा करते हैं, जिससे शिकारियों को उनकी सटीक स्थिति के बारे में उलझन होती है। वैज्ञानिकों ने अपनी इस परिकल्पना को कई बार परखा है, लेकिन इस सम्बंध में नतीजे मिले-जुले रहे हैं।

ताज़ा अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इसे बारीकी से समझने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने उड़ती हुई तितलियों के हाई-स्पीड वीडियोज़ लिए और उनकी उड़ान की तुलना ऐसी तितलियों की कंप्यूटर सिमुलेशन उड़ान से की, जिनके पंखों पर कोई पैटर्न नहीं थे। विश्लेषण में शोधकर्ताओं ने पाया कि उड़ते समय, नैसर्गिक रंग-बिरंगे पैटर्न वाली तितलियों के पंखों ने उड़ते समय भ्रम पैदा किए: मसलन, जब कोई तितली ऊपर की ओर उड़ रही थी, तो उसके पंखों की धारियों के कारण ऐसा लगा जैसे वह उड़कर नीचे की ओर जा रही हो।

अध्ययन में युरोप में पाई जाने वाली लगभग 400 तितली प्रजातियों में पैटर्न के विश्लेषण में पाया गया कि पंखों पर पैटर्न जैव विकास की प्रक्रिया में काफी व्यापक रूप से प्रकट हुए हैं। इनमें गहरी और चटख-रंगी धारियां, पट्टे, धब्बे और पूंछ जैसी बनावट दिखती हैं।

एक और प्रयोग में, कुछ प्रतिभागियों से टचस्क्रीन पर आभासी तितलियों को ‘पकड़ने’ की कोशिश करवाई गई। पाया गया कि प्रतिभागियों ने अक्सर तितलियों को उस जगह पकड़ने की कोशिश की जहां से वे गुज़र चुकी थीं। इससे पता चलता है कि उनके पंखों के पैटर्न की वजह से वे अपनी असल गति से धीमे उड़ती जान पड़ती हैं, और हाथ से निकल जाती हैं।

इन नतीजों से यह भी समझने में मदद मिल सकती है कि शिकारी अक्सर पतंगों (जिनके पंखों पर कोई चटख पैटर्न नहीं होते) को अपना निशाना क्यों बनाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

इस सम्बंध में एक वीडियो की लिंक: https://www.nature.com/articles/d41586-026-03301-x?utm_source=Live+Audience&utm_campaign=188bcb07b7-nature-briefing-daily-20261014&utm_medium=email&utm_term=0_-33f35e09ea-49744108

Photo credit- https://www.bbc.com/news/uk-england-devon-35427539

कैंसर-रोधी दवाओं पर नाममात्र का मूल्य नियंत्रण

डॉ. अनंत फड़के

भारत के बाज़ार में उपलब्ध लगभग 225 कैंसर-रोधी दवाइयों में से 110 दवाइयों की कीमतों पर अब तक कोई नियंत्रण नहीं था। इन दवाओं की सालाना बिक्री ₹10,000 करोड़ की है। अब इन दवाओं पर दुकानदारों और अस्पतालों को अधिकतम 30 प्रतिशत तक ही व्यापारिक मार्जिन लेने की अनुमति होगी। थोक और खुदरा दवा विक्रेता तथा कुछ अस्पताल अब तक इन दवाओं पर औसतन 170 प्रतिशत और कुछ मामलों में 700 प्रतिशत तक मार्जिन कमाते थे। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे “दिनदहाड़े डकैती” और “जबरन वसूली” कहा, तब जाकर सरकार की नींद खुली!

अब इस व्यापारिक मार्जिन पर सीमा लगाए जाने से इन दवाओं की कीमतों में औसतन 70 प्रतिशत की कमी आएगी और मरीज़ों के लगभग ₹2,500 करोड़ सालाना बचेंगे। व्यापारिक मार्जिन पर यह नियंत्रण निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। लेकिन कैंसर की दवाइयां बनाने वाली दवा कंपनियों की मुनाफाखोरी को काफी हद तक खुली छूट दी गई है! यदि मुनाफाखोरी के सभी स्तरों पर नियंत्रण लगाया जाए, तो इन दवाइयों की कीमतें आज की कीमतों की एक-चौथाई से लेकर दसवें हिस्से तक हो सकती हैं। आइए देखें कि ऐसा कैसे संभव है और ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है।

सिर्फ व्यापारिक ‘मार्जिन’ पर नियंत्रण

सरकार को केवल व्यापारियों के मुनाफे पर ही नहीं, बल्कि दवा कंपनियों के मुनाफे पर भी नियंत्रण लगाना चाहिए। बड़ी दवा कंपनियां अपने बेहद महंगे ब्रांडों के बारे में डॉक्टरों को ‘मनाती’ हैं। नतीजा, अनेक डॉक्टर मरीज़ों को ये बेहद महंगे ब्रांड लिखकर देते हैं। इन ब्रांडों से बड़ी कंपनियों को भारी मुनाफा मिलता है, जबकि दुकानदारों को केवल लगभग 16 प्रतिशत मार्जिन मिलता है।

छोटी कंपनियों के पास डॉक्टरों से मिलकर अपने ब्रांड के बारे में उन्हें समझाने और प्रभावित करने के लिए इतना बजट नहीं होता। इसलिए छोटी कंपनियां इसका दूसरा रास्ता निकालती हैं। वे केमिस्ट को ही बहुत अधिक मार्जिन देती हैं, ताकि केमिस्ट छोटी कंपनियों के कम मशहूर ब्रांडों को अधिक मशहूर और महंगे ब्रांडों के मुकाबले बेचने की कोशिश करें। केमिस्ट ग्राहक से पूछते हैं, “क्या आपको सस्ती जेनेरिक दवा दें?” और फिर अपेक्षाकृत कम कीमत वाले छोटी कंपनियों के ब्रांड बेचने की पेशकश करते हैं। इस तरह बड़ी कंपनियों की बजाय छोटी कंपनियां और दुकानदार कुछ कम, लेकिन फिर भी काफी मुनाफा कमाते हैं।

अब सरकार ने व्यापारिक ‘मार्जिन’ पर नियंत्रण लगा दिया है। इससे संभावना है कि केमिस्ट छोटी कंपनियों के ब्रांडों की बजाय बड़ी कंपनियों के ब्रांड ही बेचना पसंद करेंगे!

सिर्फ कुछ ही कैंसर–रोधी दवाएं मूल्य–नियंत्रण के दायरे में

चिकित्सकीय शोध और परीक्षणों से गुज़रने के बाद प्रमाणित लगभग 250–300 कैंसर-रोधी दवाइयों का उल्लेख चिकित्सा ग्रंथों में मिलता है। इनमें से भारत के बाज़ार में लगभग ₹12,500 करोड़ की 225 कैंसर-रोधी दवाएं उपलब्ध हैं। इनमें से केवल 63 दवाइयों पर, जिनकी बिक्री ₹2,250 करोड़ की थी, सरकार ने 2013 में मूल्य-नियंत्रण लागू किया था। वास्तव में, ये सभी 225 दवाएं जीवन बचाने वाली हैं, इसलिए इन सभी पर मूल्य-नियंत्रण होना चाहिए। लेकिन सरकार ने 2013 में केवल उन कैंसर-रोधी दवाइयों पर मूल्य-नियंत्रण लागू किया, जो ‘राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची’ में शामिल थीं।

‘राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची’ 

इस सूची में ऐसी दवाइयां शामिल की जाती हैं, जो लगभग 90 प्रतिशत मरीज़ों की ज़रूरतें पूरी करती हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के तहत ज़िला अस्पतालों से लेकर सर्वोच्च स्तर के अस्पतालों तक हर जगह प्राथमिकता के आधार पर हमेशा उपलब्ध रहनी चाहिए।

इस सूची से बाहर की, लेकिन चिकित्सा ग्रंथों में शामिल अन्य कैंसर-रोधी दवाइयां भी सम्बंधित मरीज़ों के लिए जीवनरक्षक हो सकती हैं। इसलिए उन पर भी मूल्य-नियंत्रण होना चाहिए। लेकिन सरकार ने 2013 में इनमें से केवल राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची में शामिल 63 चुनिंदा दवाइयों पर ही मूल्य-नियंत्रण लागू किया। शेष 162 कैंसर-रोधी दवाओं को मूल्य-नियंत्रण से पूरी तरह बाहर रखा गया। अब इन 162 दवाइयों में से 110 दवाइयों के मामले में सरकार केवल दुकानदारों के मार्जिन पर नियंत्रण लगा रही है। लेकिन इन दवाइयों पर दवा कंपनिया़ जो मुनाफा कमाती हैं, उस पर सरकार कोई लगाम नहीं लगा रही है।

नियंत्रित कीमत तय करने का गलत तरीका

1995 से मुट्ठी भर दवाओं पर मूल्य-नियंत्रण लागू था। इनकी अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) का निर्धारण उत्पादन लागत पर 100 प्रतिशत मुनाफा जोड़कर किया जाता था। इसमें  निर्माता और दुकानदार, दोनों का मुनाफा शामिल होता था। ‘ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क’ ने 2003 में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी कि बाज़ार में मौजूद मुट्ठी भर दवाइयों की बजाय सभी दवाइयों पर मूल्य-नियंत्रण लागू किया जाए। इस मामले में सरकार ने दस साल तक टालमटोल की। अंततः सर्वोच्च न्यायालय की चेतावनी के दबाव में सरकार ने 2013 से ‘राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची’ में शामिल 348 दवाइयों पर मूल्य-नियंत्रण लागू किया। लेकिन ऐसा करते समय नियंत्रित कीमत तय करने के लिए सरकार ने 2013 में एक जटिल और अनुचित ‘बाज़ार-आधारित’ पद्धति लागू कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि मूल्य-नियंत्रण के दायरे में लाई गई 63 कैंसर-रोधी दवाइयों की कीमतों में औसतन केवल लगभग 10 प्रतिशत की ही कमी आई। वास्तव में, उनकी कीमतें 300–400 प्रतिशत तक घटनी चाहिए थी।

सही तरीका क्या हो सकता है?

इस बात को जन-औषधि दुकानों के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। सरकार ने दवा कंपनियों से दवाइयां खरीदकर जन-औषधि दुकानों तक पहुंचाने की व्यवस्था बनाई है। इस व्यवस्था में दवा बनाने वाली कंपनियों को उत्पादन लागत पर आधारित उचित मुनाफा मिलता है और दुकानों को 16 प्रतिशत मार्जिन मिलता है। इसके बावजूद, जन-औषधि दुकानों में जेनेरिक नाम से मिलने वाली ये दवाइयां सामान्य बाज़ार में उपलब्ध दवाइयों की कीमतों के मुकाबले चौथाई से लेकर पांचवें हिस्से तक की कीमत पर मिलती हैं! यदि सरकार इसी तरह का मूल्य-नियंत्रण सभी दवा निर्माता कंपनियों और दवा दुकानदारों पर लागू करे, तो आम मरीज़ों को सभी दवाएं उचित कीमतों पर देना संभव होगा। (स्रोत फीचर्स)

Photo credit- https://www.livemint.com/news/india/why-only-cancer-drugs-sc-questions-centre-on-trade-margin-cap-seeks-wider-price-regulation-11791806818920.html

टैटू के रंग और कैंसर का जोखिम

टैटू बनवाने का चलन बढ़ता जा रहा है। इस प्रक्रिया में टैटू के स्थान पर सूजन, लालपन, खुजली वगैरह आम बात हैं। ये सब टैटू बनवाने की प्रक्रिया के प्रति हमारे प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया के कारण होते हैं। दरअसल, टैटू का स्थायी रूप से बने रहना प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया की बदौलत ही होता है। लेकिन कई अध्ययनों से पता चला है कि टैटूकरण का हमारे प्रतिरक्षा तंत्र पर दीर्घकालिक असर भी होता है। कुछ अध्ययन बताते हैं कि इससे कैंसर की संभावना भी बढ़ती है।

वर्ष 2024 में लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया था कि टैटू-धारी व्यक्तियों में लिम्फोमा की संभावना 21 प्रतिशत अधिक होती है। लिम्फोमा लसिका तंत्र को प्रभावित करता है। इसी प्रकार, डेनमार्क में 2700 जुड़वाओं के एक अध्ययन के निष्कर्ष बीएमसी पब्लिक हेल्थ में वर्ष 2025 में प्रकाशित हुए थे। इसमें पता चला था कि बड़े-बड़े टैटू-धारी लोगों में त्वचा के कैंसर का जोखिम 62 प्रतिशत अधिक था और लिम्फोमा का खतरा तीन गुना तक बढ़ गया था।

अलबत्ता, इन अध्ययनों से टैटू और कैंसर के जोखिम के बीच का सम्बंध तो नज़र आता है लेकिन यह प्रमाणित नहीं होता है कि कैंसर का जोखिम टैटू के कारण ही बढ़ा है। और तो और, वर्ष 2025 में जर्नल ऑफ दी नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि बड़े-बड़े तीन या चार टैटू-धारी लोगों में मेलेनोमा (त्वचा कैंसर की एक किस्म) का जोखिम सामान्य लोगों की तुलना में 74 प्रतिशत कम था।

लेकिन यह रोचक सवाल अभी भी मुंह बाए खड़ा है – शरीर के अंदर पहुंचने के बाद टैटू की स्याही करती क्या है और जोखिम कैसे उभरते हैं? टैटू बनवाने का चलन बढ़ने के बाद यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो चला है। इस मामले में येल स्कूल ऑफ मेडिसिन के क्रिस्टोफर ब्यूनिक कहते हैं, “घबराने की बजाय यह समझने की ज़रूरत है कि टैटू की स्याही की प्रकृति क्या होती है और उनमें किस तरह की भारी धातुओं और कैंसरकारी पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है।”

विशेषज्ञ इस बात को पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि टैटू और कैंसर के बढ़े हुए जोखिम के बीच क्या कड़ी है। बहरहाल, कई कयास लगाए गए हैं।

एक बात तो यह है कि टैटू भले ही सिर्फ चमड़ी पर नज़र आते हैं, लेकिन वे त्वचा के अंदर तक फैले होते हैं। जब टैटू की स्याही को चुभोकर त्वचा में गहराई तक पहुंचाया जाता है तो संभव है कि उसके महीन कण घूम-फिर कर लसिका ग्रंथियों में पहुंच जाएं और शोथ पैदा करें। ज़ाहिर है आपका शरीर स्याही को परदेशी (पराया) पदार्थ मानकर प्रतिरक्षा तंत्र को उसके खिलाफ तैनात कर देगा।

इस मामले में एक अध्ययन जंतुओं पर किया गया था। शोधकर्ताओं ने चूहों के पैरों की गद्दियों पर काली, लाल व हरी स्याहियों का उपयोग करके टैटू बनाए थे। स्याही डालने के बाद यह देखा गया था कि यह स्याही लसिका तंत्र से होते हुए लसिका ग्रंथियों में पहुंची। पाया गया था कि स्याही लसिका ग्रंथियों के अंदर कुछ प्रतिरक्षा कोशिकाओं (फैगोसाइट्स) में जमा हो जाती है और दीर्घावधि शोथ प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। बात और भी आगे गई – जब चूहों को दो अलग-अलग किस्म के टीके (कोविड-19 का टीका और इंफ्लुएंज़ा का टीका) दिए गए तो टैटू स्याही ने टीके के प्रति प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को प्रभावित किया। यह अध्ययन प्रोसीडिंग्स ऑफ दी (यूएस) नेशनल एकेडमी ऑफ साइन्सेस में 2025 में प्रकाशित हुए थे।

प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के अलावा टैटू से सम्बंधित कई अन्य पहलू भी हैं। जैसे टैटू स्याही में उपस्थित रसायनों में से कुछ कैंसरकारी हो सकते हैं। जैसे, काली स्याहियों में पोलीसायक्लिक एरोमैटिक हायड्रोकार्बन हो सकते हैं जो कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं। इसी प्रकार से लाल स्याहियों में एज़ो-रंजक हो सकते हैं जो शरीर में विघटित होकर ऐसे यौगिक बनाते हैं जो पराबैंगनी प्रकाश के संपर्क में आकर कैंसर का कारण बन सकते हैं।

इसके अलावा, कुछ टैटू स्याहियों में सीसा (लेड), कैडमियम, पारा (मर्करी) जैसी भारी धातुएं होती हैं जिनकी विषाक्तता पता है। इनमें कुछ ऐसे विलायक या फॉर्मेल्डीहाइड या फीनॉल जैसे पदार्थ हो सकते हैं जो एलर्जी पैदा करते हैं।

ऐसा लगता है कि स्याही और धातुओं के जमा होने पर तीन प्रतिक्रियाएं होती हैं जो कैंसर का जोखिम बढ़ाने के लिए जानी जाती हैं – प्रतिरक्षा तंत्र का दीर्घावधि सक्रियकरण, ऑक्सीकारक तनाव और श्वेत रक्त कोशिकाओं (लिम्फोसाइट) की असामान्य वृद्धि। ऑक्सीकारक तनाव के कारण ऊतक क्षतिग्रस्त हो सकते हैं और कैंसर का जोखिम बढ़ता है। दूसरी ओर, यदि लिम्फोसाइट्स अनियंत्रित ढंग से बढ़ने लगें तो वे स्वयं कैंसरनुमा कोशिकाओं में बदलकर ट्यूमर बन सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

Photo credit- https://www.artpal.com/aakashdagar0000?i=136222-9

एक शैवाल का नेत्रबिंदु बना चिकित्सा नोबेल का आधार

दौलतसिंग सिंह तंवर

इस वर्ष का चिकित्सा नोबेल मानव मस्तिष्क को समझने की जिस खोज के लिए मिला है, उसकी शुरुआत किसी प्रयोगशाला में नहीं बल्कि पोखर के एक नन्हे शैवाल से हुई थी। यह पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों, कार्ल डाइसरॉथ, पीटर हेगेमान और जॉर्ज नागल को दिया गया। उन्हें ‘प्रकाश से खुलने व बंद होने वाले आयन चैनलों और ऑप्टोजेनेटिक्स से जुड़ी खोजों’ के लिए सम्मानित किया गया है। यह कहानी एक ऐसे एक-कोशिकीय शैवाल से शुरू होती है, जिसे हम सामान्यतः किसी ठहरे हुए पानी में हरे रंग की परत के रूप में देखकर आगे बढ़ जाते हैं; उस शैवाल का नाम है क्लैमायडोमोनास।

समिति ने कहा है कि इस कार्य ने तंत्रिका विज्ञान के एक नए युग की आधारशिला रखी है।

मस्तिष्क की पुरानी पहेली

इस खोज का महत्व समझने के लिए पहले मस्तिष्क की मूल समस्या को समझना होगा। हमारे मस्तिष्क में लगभग 86 अरब तंत्रिका कोशिकाएं (न्यूरॉन्स) होती हैं। हर न्यूरॉन हज़ारों अन्य न्यूरॉन्स से जुड़ा होता है। ये कोशिकाएं विद्युत और रासायनिक संकेतों के सहारे आपस में संवाद करती हैं; हमारा सोचना, याद रखना, डरना, प्रेम करना, चलना और सोना, सब इसी संवाद का परिणाम है।

समस्या यह थी कि इन कोशिकाओं के संवाद को समझा कैसे जाए? वैज्ञानिक पहले इलेक्ट्रोड डालकर मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को मापते थे। इससे यह तो पता चलता था कि कोई गतिविधि हो रही है, लेकिन इलेक्ट्रोड से उद्दीपन देने पर आसपास की सैकड़ों किस्म की कोशिकाएं एक साथ प्रभावित हो जाती थीं। ऐसे में किसी विशिष्ट न्यूरॉन की सक्रियता को देख पाना मुश्किल था।

नोबेल विजेता फ्रांसिस क्रिक ने 1979 में ही इस चुनौती की ओर संकेत किया था कि तंत्रिका विज्ञान की सबसे बड़ी आवश्यकता बाकी सबको अछूता छोड़कर किसी एक विशेष प्रकार की कोशिका को नियंत्रित करने की विधि है। उन्होंने यह अनुमान भी लगाया था कि इसके लिए शायद प्रकाश एक उपयोगी साधन बन सकता है। परंतु उस समय किसी को नहीं पता था कि मस्तिष्क की कोशिकाओं को प्रकाश के प्रति संवेदनशील कैसे बनाया जाए। उत्तर बीस वर्ष से अधिक बाद आया और वह भी पादप और शैवाल विज्ञान की जिज्ञासा से।

एक–कोशिकीय हरित शैवाल

क्लैमायडोमोनास वंश की सबसे प्रसिद्ध प्रजाति क्लैमायडोमोनास राइनहार्टी का उपयोग एक मॉडल जीव के रूप में उपयोग होता रहा है। इस एक-कोशिकीय जीव की लंबाई मनुष्य के बाल की मोटाई की आधे से भी कम होती है। इसकी कोशिका में प्याले के आकार का एक हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) होता है जिसमें क्लरोफिल पाया जाता है। यह जीव अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण से बनाता है।

इसके अग्र-भाग में दो चाबुक जैसी पतली पूंछें (कशाभिकाएं – फ्लैजेला) होती हैं जिनकी मदद से यह जीव पानी में तैरता है। इसके जीवन का संघर्ष सीधा है, धूप बहुत कम हो तो भोजन नहीं बनेगा और बहुत तेज़ हो तो क्लोरोफिल को क्षति पहुंचेगी; इसलिए यह जीव प्रकाश की तीव्रता को परखकर कभी उसकी ओर बढ़ता है, तो कभी उससे दूर भागता है। इस व्यवहार को प्रकाशानुवर्तन कहते हैं।

इस काम के लिए क्लैमायडोमोनास की कोशिका में एक छोटा-सा नारंगी-लाल धब्बा (नेत्रबिंदु) होता है, यह हरितलवक के भीतर स्थित कई वर्णकों की परतों से बनी एक संरचना है। नेत्रबिंदु यह पहचानने में मदद करता है कि प्रकाश किस दिशा से आ रहा है।

वैज्ञानिकों के सामने प्रश्न यह था कि यह एक-कोशिकीय जीव प्रकाश को भांपकर अपनी कशाभिकाओं को आदेश कैसे देता है। इस प्रश्न के पीछे कोई चिकित्सकीय लक्ष्य नहीं था। यह तो मूलभूत जिज्ञासा थी।

नेत्रबिंदु का रहस्य और पीटर हेगेमान

1980 के दशक में यह संकेत मिला कि क्लैमायडोमोनास में प्रकाश भांपने वाला अणु रोडॉप्सिन परिवार का कोई प्रोटीन हो सकता है। रोडॉप्सिन ही हमारी आंख के रेटिना में प्रकाश को भांपता है।

उस समय मैक्स प्लांक जैव रसायन संस्थान में कार्यरत जर्मन वैज्ञानिक पीटर हेगेमान और उनके सहयोगियों ने 1990 के दशक के आरंभ में दिखाया कि नेत्रबिंदु पर प्रकाश पड़ने के कुछ ही मिलीसेकंड के भीतर कोशिका में विद्युत धारा उत्पन्न हो जाती है। यह गति असाधारण थी। यदि कोई लंबी रासायनिक शृंखला होती, तो प्रतिक्रिया इतनी त्वरित नहीं होती। यानी प्रकाश-ग्राही प्रोटीन सीधे विद्युत संकेत उत्पन्न कर रहा है।

हेगेमान ने पाया कि नेत्रबिंदु में एक विशेष प्रोटीन है, जो नीले प्रकाश को विद्युत संकेत में बदल देता है। यह विद्युत संकेत जीव को प्रकाश की ओर तैरने के लिए प्रेरित करता है। पर प्रोटीन की सही पहचान, उसके जीन को खोजना, उसे पृथक करना और यह सिद्ध करना कि वही प्रकाश से विद्युत धारा बनाता है, यह सब आसान नहीं था।

जॉर्ज नागल – चैनल–रोडॉप्सिन की खोज

जॉर्ज नागल, उन दिनों फ्रैंकफर्ट के मैक्स प्लांक जैव-भौतिकी संस्थान में कार्यरत थे और आज वुर्त्सबर्ग विश्वविद्यालय से जुड़े हैं। नागल कोशिका झिल्ली में आयनों (सोडियम, पोटैशियम और कैल्शियम जैसे आयनों) के आवागमन के अध्येता थे। जहां हेगेमान शैवाल और प्रकाश-संवेदन के

विशेषज्ञ थे वहीं नागल के पास थी आयन चैनलों के विद्युतीय अध्ययन

की पद्धति पर महारत। इक्कीसवीं सदी के आरंभ में क्लैमायडोमोनास के जीन अनुक्रमों की जानकारी उपलब्ध होने के   साथ उन्होंने ऐसे जीन खोजे जो रोडॉप्सिन से मिलते-जुलते प्रोटीन बनाते थे।

2002 में उन्होंने पहले प्रोटीन चैनल-रोडॉप्सिन-1 का वर्णन किया। अगले वर्ष, 2003 में, दूसरे प्रोटीन, चैनल-रोडॉप्सिन-2, की विशेषताएं सामने आईं। यह प्रोटीन अधिक उपयोगी निकला। जब इस प्रोटीन्स के जीन को मेंढक के अंडाणुओं और मानव भ्रूणीय वृक्क कोशिकाओं में डालकर इन कोशिकाओं पर नीला प्रकाश डाiला गया, तो झिल्ली में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगी। प्रकाश हटाते ही धारा रुक गई।

इस खोज की मूल बात यह थी कि यह प्रोटीन दो काम एक साथ करता है। वह प्रकाश का ग्राही भी है और आयन चैनल भी।

इसकी विशेषता यह थी कि इसमें किसी जटिल रासायनिक शृंखला की आवश्यकता नहीं थी। यह एक ही प्रोटीन, एक ही स्विच था। यही कारण है कि इसकी गति इतनी तेज़ थी, क्योंकि तंत्रिका कोशिकाएं भी मिलीसेकंड की गति से काम करती हैं। यह प्रोटीन किसी भी कोशिका को प्रकाश से खोलने की संभावना लेकर आया।

कार्ल डाइसरॉथ – तंत्रिका विज्ञान का प्रवेश

अब तक की खोज वनस्पति विज्ञान और जैव भौतिकी की थी। इसे तंत्रिका विज्ञान और चिकित्सा तक पहुंचाने का श्रेय बहुत हद तक स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में जैव-अभियांत्रिकी और मनोचिकित्सा के प्रोफेसर कार्ल डाइसरॉथ को जाता है। उनको लगता था कि अवसाद, दुश्चिंता और सामाजिक व्यवहार जैसे विकारों के पीछे के तंत्रिका परिपथों को हम कितना कम जानते हैं। मनोचिकित्सा की अधिकांश दवाइयां पूरे मस्तिष्क पर असर डालती हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि वास्तव में किन कोशिकाओं पर क्या असर होता है।

2000 के दशक के मध्य में डाइसरॉथ और उनके साथियों ने सोचा कि यदि चैनल-रोडॉप्सिन को किसी जीवित जंतु के विशेष न्यूरॉन्स में पहुंचा दिया जाए, तो उन्हीं न्यूरॉनों को प्रकाश से सक्रिय किया जा सकता है। वर्ष 2005 में उनकी प्रयोगशाला ने प्रदर्शित किया कि चूहे के न्यूरॉन्स में चैनल-रोडॉप्सिन-2 को अभिव्यक्त कराने पर नीले प्रकाश की एक चमक से न्यूरॉन मिलीसेकंड की सटीकता से विद्युत आवेग उत्पन्न करने लगते हैं।

इसके बाद के वर्षों में डाइसरॉथ की प्रयोगशाला ने इस तकनीक को बहुत आगे बढ़ाया। उन्होंने ऐसे प्रकाशीय तंतु विकसित किए जिन्हें चूहे के मस्तिष्क में गहराई तक पहुंचाया जा सकता था। उन्होंने चैनल-रोडॉप्सिन के साथ-साथ ऐसे प्रोटीन भी शामिल किए जो प्रकाश पड़ने पर कोशिका को शांत कर देते हैं। इससे वैज्ञानिक अब किसी न्यूरॉन को चालू भी कर सकते थे और बंद भी। इसी पूरी तकनीक को ऑप्टोजेनेटिक्स नाम मिला।

ऑप्टोजेनेटिक्स काम कैसे करता है इसे सरल भाषा में तीन चरणों में समझा जा सकता है।

पहला चरण – चैनल-रोडॉप्सिन का जीन किसी हानिरहित वायरस में रखते हैं और उसे जंतु के मस्तिष्क के किसी निश्चित क्षेत्र में पहुंचाते हैं। वायरस जीन को न्यूरॉन्स के भीतर पहुंचा देता है।

दूसरा चरण – कोशिका का चयन। वैज्ञानिक ऐसी आनुवंशिक युक्तियां लगाते हैं कि चैनल-रोडॉप्सिन केवल चुनिंदा कोशिकाओं में बने, बाकी कोशिकाओं में यह प्रोटीन बनता ही नहीं।

तीसरा चरण – मस्तिष्क में एक बारीक प्रकाशीय तंतु प्रविष्ट कराया जाता है। प्रकाश का स्विच दबाते ही केवल वे विशेष न्यूरॉन सक्रिय होते हैं जिनमें चैनल-रोडॉप्सिन मौजूद है। प्रकाश हटाते ही वे शांत हो जाते हैं।

यानी अब उन कोशिकाओं को सक्रिय करके देखा जा सकता है कि क्या कोई व्यवहार सचमुच उन्हीं से उत्पन्न होता है।

प्रयोगशाला से मिली नई समझ

ऑप्टोजेनेटिक्स ने पिछले डेढ़ दशक में तंत्रिका विज्ञान को बदल दिया। कुछ उदाहरण इसकी व्यापकता दिखाते हैं। स्मृति के अध्ययन में चूहों पर ऐसे प्रयोग हुए जिनमें किसी विशेष याद से जुड़ी कोशिकाओं को चिन्हित किया गया और बाद में प्रकाश डालकर उन्हीं को सक्रिय किया गया। परिणामस्वरूप जंतु ने वह भय-स्मृति पुनः जी ली, जबकि वह उस स्थान पर था ही नहीं। इससे यह धारणा पुष्ट हुई कि स्मृतियां कोशिकाओं के विशिष्ट समूहों में अंकित होती हैं। पार्किंसन रोग के अध्ययन में डाइसरॉथ की प्रयोगशाला ने मस्तिष्क के उन विशेष मार्गों को पहचाना जिनके उद्दीपन से जंतु की गति में सुधार होता है। यह जानकारी कई उपचार विधियों को बेहतर बनाने में उपयोगी रही। 

स्वाभाविक प्रश्न यह है कि क्या यह तकनीक रोगियों के काम आ सकती है। हालांकि इस तकनीक के चिकित्सकीय उपयोग की दिशा में कुछ आरंभिक प्रयास हुए हैं, लेकिन सफर अभी लंबा है। सबसे उल्लेखनीय प्रयास दृष्टि लौटाने से जुड़ा है। कुछ आनुवंशिक रोगों, जैसे रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा में, आंख के रेटिना की प्रकाश-संवेदी कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं और व्यक्ति पूरी तरह दृष्टिहीन हो जाता है। पर रेटिना की भीतरी परतों की कुछ कोशिकाएं फिर भी बची रहती हैं। विचार यह है कि इन बची हुई कोशिकाओं में प्रकाश-संवेदी प्रोटीन का जीन पहुंचाकर उन्हें ही नया प्रकाश-ग्राही बना दिया जाए। 2021 में एक मरीज़ के उपचार की रिपोर्ट आई थी।

चिकित्सा क्षेत्र में सीमाएं

हर नई तकनीक की तरह ऑप्टोजेनेटिक्स की भी सीमाएं हैं; पहली सीमा यह है कि इसमें जीन उपचार की आवश्यकता होती है। मनुष्य की कोशिकाओं में विदेशी जीन पहुंचाना सुरक्षा और नैतिकता, दोनों दृष्टियों से गंभीर विषय है। दूसरी सीमा प्रकाश की पहुंच की है। मस्तिष्क के गहरे हिस्सों तक प्रकाश पहुंचाने के लिए तंतु डालने पड़ते हैं, जो शल्य क्रिया की मांग करते हैं। तीसरी सीमा प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया की है, क्योंकि शरीर शैवाल के प्रोटीन को विदेशी मानकर उस पर प्रतिक्रिया कर सकता है। चौथी सीमा यह है कि चूहों में जो परिपथ किसी व्यवहार को नियंत्रित करता दिखता है, वह मनुष्य में भी ठीक उसी तरह काम करे, ऐसा आवश्यक नहीं क्योंकि मानव मस्तिष्क कहीं अधिक जटिल है।

मूलभूत शोध का महत्व

इस पुरस्कार की सबसे बड़ी सीख शायद मूलभूत शोध के महत्व में निहित है। जब हेगेमान एक शैवाल के प्रकाशानुवर्तन का रहस्य खोज रहे थे, तब उनके सामने कोई चिकित्सकीय लक्ष्य नहीं था। कोई यह नहीं कह सकता था कि इससे अंधेपन का इलाज होगा या मस्तिष्क के नक्शे बनेंगे। वे तो केवल यह जानना चाहते थे कि एक नन्हा जीव प्रकाश को कैसे महसूस करता है। विज्ञान का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है। जीवाणुओं की प्रतिरक्षा प्रणाली पर शोध से जीन संपादन की तकनीक निकली। गर्म पानी के सोतों में रहने वाले जीवाणुओं से वह एंज़ाइम मिला जिस पर आज की डीएनए जांच टिकी है और अब तालाब की एक काई से मस्तिष्क को समझने का नया औज़ार मिला है। कौन जाने, हर प्रजाति के भीतर हज़ारों वर्षों के विकास से तैयार हुए ऐसे अणु और तंत्र हैं, जो शायद भविष्य की किसी चिकित्सा की कुंजी हों। (स्रोत फीचर्स)

Photo credit – https://www.nobelprize.org/uploads/2026/10/POP_Fig_2.jpg

भौतिकी का नोबेल

इस साल का भौतिकी नोबेल पुरस्कार विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय के फ्रांसिस हाल्ज़ेन को न्यूट्रिनो कणों सम्बंधी शोध कार्य तथा आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला में उनके निर्णायक योगदान व नेतृत्व के लिए दिया गया है।

सामान्य लोगों के लिए न्यूट्रिनो का महत्व स्वत: स्पष्ट नहीं है। दरअसल, न्यूट्रिनो की उपस्थिति का सुझाव सबसे पहले वोल्फगैंग पौली ने 1930 में दिया था। उन्होंने यह सुझाव रेडियोसक्रिय तत्वों के विघटन के वर्णक्रम के एक विशेष पहलू की व्याख्या के लिए दिया था। यह प्रस्ताव कतिपय गणनाओं पर आधारित था, न्यूट्रिनो को एक वास्तविक कण के रूप में खोजना ज़रूरी था। न्यूट्रिनो का पहला प्रायोगिक प्रमाण वर्ष 1956 में सी. कोवान और एफ. राइन्स ने प्रस्तुत किया था। उन्होंने नाभिकीय रिएक्टर का उपयोग एंटी-इलेक्ट्रॉन न्यूट्रिनो के स्रोत के तौर पर किया था। 1995 में राइन्स को अकेले ही ‘न्यूट्रिनो को ताड़ने’ के लिए नोबेल सम्मान दिया गया क्योंकि तब तक कोवान का निधन हो चुका था।

इसके बाद न्यूट्रिनो अनुसंधान के लिए कई नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं। राइन्स व कोवान द्वारा खोजे जाने के बाद फौरन यह समझ बन गई थी कि ये कण ब्रह्मांड से सूचनाएं प्राप्त करने के लिए आदर्श हैं। सबसे बड़ी बात तो यह पता चली थी कि न्यूट्रिनो विद्युतीय दृष्टि से उदासीन होते हैं। लिहाज़ा, ये मात्र दुर्बल नाभिकीय अथवा गुरुत्वीय अंतर्क्रिया में शामिल होते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अपने दूरस्थ ब्रह्मांडीय स्रोत से निकलकर ये पृथ्वी तक बगैर किसी व्यवधान या विचलन के पहुंचते हैं। इस संदर्भ में 2002 में आर. डेविस जूनियर और एम. कोशिबा को ब्रहमांडीय न्यूट्रॉन के डिटेक्शन के लिए नोबेल से नवाज़ा गया था। उन्होंने सूरज से आने वाले और डेढ़ लाख वर्ष पूर्व घटित एक सुपरनोवा से पृथ्वी पर पहुंचने वाले मेगाइलेक्ट्रॉनवोल्ट न्यूट्रिनो का अवलोकन किया था।

फ्रांसिस हाल्ज़ेन का योगदान यह रहा कि उन्होंने यह पहचाना कि दणिक्षी ध्रुव के बर्फ का इस्तेमाल न्यूट्रिनो के अध्ययन हेतु किया जा सकता है। वैसे तो न्यूट्रिनो हर जगह होते हैं लेकिन वे अन्य कणों या बलों से इतनी कम अंतर्क्रिया करते हैं कि उन्हें पकड़ पाना मुश्किल होता है। वे पृथ्वी में से या हमारे शरीर में से होकर गुज़र जाते हैं और हमें पता भी नहीं चलता।

बहुत ही कम ऐसा होता है कि कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु के नाभिक से अंतर्क्रिया करता है। इस क्षण यदि कोई व्यक्ति सही जगह पर सही उपकरणों के साथ मौजूद हो तो इसे भांपा जा सकता है।

यह बात तो वैज्ञानिकों को एक अरसे से पता रही है कि ब्रह्मांड में कुदरती पार्टिकल एक्सलरेटर मौजूद हैं जो हमारे द्वारा निर्मित एक्सलरेटर की तुलना में लाखों गुना अधिक ऊर्जावान कण छोड़ते रहते हैं। लेकिन इन स्रोतों के बारे में हम बहुत कम जान पाए थे। वैसे तो न्यूट्रिनो भी उन्हीं परिवेशों

में उत्पन्न होते हैं, जहां अन्य कण बनते हैं लेकिन ये अपनी ऊर्जा गंवाए बगैर और दिशा बदले बगैर पृथ्वी तक पहुंचते हैं। अर्थात ये उन स्रोतों के सम्बंध में अनोखी जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं।

हाल्ज़ेन ने दक्षिण ध्रुव पर न्यूट्रिनो को ताड़ने व उनका अध्ययन करने का विचार 1988 में पेश किया था। जब कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु नाभिक से अंतर्क्रिया करता है तो प्रकाश की एक चमक पैदा होती है जिसे दक्षिणी ध्रुव के स्वच्छ बर्फ में पकड़ा जा सकता है। दक्षिणी ध्रुव के कई फायदे हैं – जैसे यह तमाम किस्म के व्यवधानों से मुक्त है और भूकंपों के अभाव के चलते भौगोलिक दृष्टि से स्थिर है। हाल्ज़ेन के विचार को कई शोधकर्ताओं का समर्थन मिला और बर्फ में सेंसर्स स्थापित करने का शुरुआती परीक्षण किया गया।

वैसे, अत्यंत ऊर्जावान ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो बहुत दुर्लभ होते हैं, इसलिए पर्याप्त संख्या में न्यूट्रिनो और परमाणु नाभिकों की टक्करों को पकड़ने के लिए भारी मात्रा में बर्फ की ज़रूरत थी। लिहाज़ा, पूरे 1 घन किलोमीटर बर्फ में फैली आइसक्यूब वेधशाला का निर्माण 2011 में पूरा हुआ था। इस बर्फ का वज़न होगा 1 अरब मीट्रिक टन।

इस वेधशाला की मदद से ऐसे न्यूट्रिनो की खोज की गई जो हमारे सौर मंडल के बाहर उत्पन्न हुए थे। हाल्ज़ेन के नेतृत्व में काम कर रही अंतर्राष्ट्रीय टीम ने एक अनोखा उपकरण उपलब्ध कराया है जो खगोल शास्त्रीय अध्ययनों के एक नए युग का आगाज़ करेगा। (स्रोत फीचर्स)

Photo credit- https://www.nobelprize.org/uploads/2026/10/fig_fy_26_3x2.jpg

सांप का भ्रूण कुंडली मारकर क्यों विकसित होता है

अधिकांश सांप अंडे देते हैं, हालांकि कुछ सांप हैं जो बच्चे भी पैदा करते हैं। लेकिन यहां बात करेंगे सांपों के भ्रूण के विकास की एक खूबी की।

देखा गया है कि विकास के दौरान जब सांप के भ्रूण की लंबाई बढ़ती है तो वह सीधा नहीं बढ़ता बल्कि कुंडली मार लेता है। आम तौर पर यह कुंडली क्लॉकवाइस (यानी घड़ी की सुई घूमने की दिशा में) घूमती है। करंट बायोलॉजी में प्रकाशित एक अध्ययन में इन दोनों चीज़ों की व्याख्या प्रस्तुत की गई है – कुंडली क्यों बनती है और एक ही दिशा में क्यों घूमती है?

इस अध्ययन के लिए शोधकर्ताओं ने 34 प्रजातियों के सांपों के विकसित होते भ्रूणों का अवलोकन किया। पाया गया कि कुल मिलाकर 65 प्रतिशत भ्रूणों में कुंडली क्लॉकवाइस बनी थी। यह भी देखा गया कि शुरुआती अवस्था में क्लॉकवाइस कुंडली ज़्यादा आम थी।

फिर शोधकर्ताओं ने केप हाउस स्नेक (Boaedon capensis) का ज़्यादा बारीकी से अध्ययन किया। देखा गया कि सारे 146 भ्रूणों में कुंडलियां क्लॉकवाइस थीं। दूसरी ओर, अन्य ऐसी ही गैर-सर्प नलिकाकार प्रजातियों में कुंडलियां क्लॉकवाइस और एंटीक्लॉकवाइस दोनों लगभग बराबर थीं।

सांप के भ्रूण की कुंडलियों के राज़ का खुलासा तब हुआ जब शोधकर्ताओं ने भ्रूण की आंतरिक त्री-विमीय संरचना को देखा। इसके लिए उन्होंने एक्स-रे चित्रण की एक विशेष तकनीक  माइक्रो-सीटी स्कैनिंग का उपयोग किया। पता चला कि सांप के बढ़ते भ्रूण में शरीर की लंबाई तो तेज़ी से बढ़ती है और वह उसकी आहार नाल की वृद्धि को पीछे छोड़ देती है। अब छोटी रह गई आहार नाल बढ़ते शरीर को पीछे खींचती है। इस खींचतान का परिणाम होता है कि शरीर में ऐंठन आ जाती है – वह कुंडली का आकार ग्रहण कर लेता है।

दूसरा सवाल था कि इस कुंडली के घुमाव की दिशा क्लॉकवाइस ही क्यों होती है। इसका सम्बंध भ्रूण में योक थैली की स्थिति से है। सांप के भ्रूण में यह थैली भ्रूण के बाईं ओर स्थित होती है, तो शरीर इसके विपरीत दिशा में घूम जाता है।

यह शोध वैज्ञानिकों के एक अंतर्राष्ट्रीय दल द्वारा किया गया था। शोध पत्र की प्रमुख लेखक ब्रिटिश कोलंबिया विश्वविद्यालय के एलेक्ज़ेंड्रा वेबर ने कहा है कि प्रकृति में कई कुंडलियां पाई जाती हैं (जैसे घोंघों की खोल या हमारी अपनी आंत) और यह अध्ययन इन्हें समझने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा। (स्रोत फीचर्स)

रसायन शास्त्र का नोबेल

इस वर्ष का रसायन नोबेल पुरस्कार एक पुरानी गुत्थी को सुलझाने के लिए पैरिस विश्वविद्यालय-दक्षिण के हेनरी बी. कागन और टोकियो विज्ञान विश्वविद्यालय के केन्सो सोई को प्रदान किया गया है।

प्रकृति में पाए जाने वाले कई ऐसे रासायनिक पदार्थ हैं जिनके अणुसूत्र और परमाणुओं की जमावट तो एक जैसी होती है लेकिन उनकी त्रि-विमीय संरचना में अंतर होता है। अमीनो अम्ल, शर्कराएं व कई अन्य अणुओं में यह विशेषता होती है। होता यह है कि त्रिविमीय संरचना में अंतर के कारण ऐसे पदार्थ दो रूपों में पाए जाते हैं जो एक-दूसरे के दर्पण प्रतिबिंब होते हैं – जैसे हमारे दो हाथ। इन्हें इनेन्शियोमर कहते हैं और ऐसे अणुओं को कायरल कहा जाता है। रसायन शास्त्र में इन्हें D तथा L इनेन्शियोमर के चिंह से सुशोभित किया जाता है।

मज़ेदार बात यह है कि जैविक तंत्रों में बड़े अणुओं के संश्लेषण के दौरान इनमें से एक (या तो D या L) का उपयोग होता है। लिहाज़ा, सजीवों में दोनों इनेन्शियोमर नहीं पाए जाते, कोई एक ही पाया जाता है। जैसे प्राय: अमीनो एसिड के L इनेन्शियोमर तथा शर्कराओं के D इनेन्शियोमर पाए जाते हैं। अब यह तो जानी-मानी बात है कि अमीनो अम्लों की शृंखलाओं से प्रोटीन बनते हैं और शर्कराओं की शृंखलाएं पॉलीसेकराइड बनाती हैं।

वैज्ञानिकों के लिए यह एक पहेली रही है कि सजीवों में ऐसी क्या खास बात है कि उनमें किसी एक ही इनेन्शियोमर का संश्लेषण होता है और वे इसी इनेन्शियोमर का इस्तेमाल प्रोटीन जैसे अणुओं के निर्माण में करते हैं। यानी रसायन शास्त्र की भाषा में हम कहेंगे जैविक तंत्रों में ये अणु होमो-कायरल होते हैं।

लेकिन प्रयोगशाला में हम जब भी अमीनो अम्ल या शर्करा जैसे इन यौगिकों का संश्लेषण करते हैं तो दोनों इनेन्शियोमर बराबर मात्रा में बनते हैं। समस्या यह है कि यदि आप ऐसे यौगिकों का उपयोग जैविक कार्यों के लिए करना चाहते हैं तो आपको एक ही इनेन्शियोमर चाहिए।

यही थी गुत्थी कि सजीवों में कैसे इनेन्शियोमर्स में से एक का ही चुनकर संश्लेषण होता है। हेनरी कागन और केन्सो सोई ने इसी समस्या को सुलझाया है कि होमो-कायरेलिटी कैसे स्वत: प्रकट हो जाती है। उन्होंने इसके लिए अद्भुत रासायनिक अभिक्रियाएं विकसित की हैं।

दरअसल, इस संदर्भ में पहला अहम कदम कागन ने 1986 में उठाया था और एक तरीका खोजा था जिसके द्वारा रासायनिक अभिक्रियाओं के साथ छेड़खानी की जा सकती थी। इसकी मदद से वे कोई एक इनेन्शियोमर शुद्ध रूप में तो नहीं बना सके लेकिन एक इनेन्शियोमर का निर्माण काफी ज़्यादा अनुपात में कर पाए।

अगला कदम केन्सो सोई ने उठाया था और उन्होंने वह अभिक्रिया विकसित कर ली जिसमें होमोकायरल यौगिक बनाने की संभावना थी।

यहां ब्रिस्टल विश्वविद्यालय के सैद्धांतिक भौतिक शास्त्री फ्रेडरिक चार्ल्स फ्रैंक के योगदान का ज़िक्र मुनासिब है।

फ्रैंक ने 1953 में एक गणितीय मॉडल पेश किया था जिससे यह समझने में मदद मिलती थी कि यदि मिश्रण में दो इनेन्शियोमर्स में से एक की भी थोड़ी अतिरिक्त मात्रा हो, तो होमोकायरेलिटी कैसे हासिल की जा सकती है। वैसे उन्होंने यह मॉडल जैविक तंत्रों में होमोकायरेलिटी की व्याख्या के लिए प्रस्तुत किया था लेकिन उसका उपयोग आगे सफलतापूर्वक प्रयोगशाला में भी किया गया।

फ्रैंक के मॉडल का आधार यह था कि ऐसी अभिक्रिया में एक ऐसा यौगिक होगा जो स्वयं के निर्माण का उत्प्रेरक हो (यानी ऑटो-केटालिस्ट हो) और दूसरे इनेन्शियोमर के संश्लेषण का प्रति-उत्प्रेरक (एंटी-कैटालिस्ट) हो। ऐसे स्व-उत्प्रेरण के कई उदाहरण मिलते हैं। ऑटो-कैटालिस्ट वे यौगिक होते हैं, जो किसी अभिक्रिया के दौरान बनते हैं और फिर अपने जैसे यौगिक बनाने का मार्ग प्रशस्त करते हैं।

फ्रैंक ने दूसरी शर्त यह रखी थी कि कोई ऐसा उत्प्रेरक होना चाहिए जो किसी एक इनेन्शियोमर  उत्पादन करवाए यानी असममित उत्प्रेरक हो। इस तरह के उत्प्रेरकों पर भी काफी अनुसंधान हुआ है और इस संदर्भ में 2001 तथा 2021 में नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं।

तीसरी शर्त प्रति-उत्प्रेरण और स्व-उत्प्रेरण व असममित उत्प्रेरण के एक साथ मिलने की थी।   

अंतत: 2003 में सफलता हाथ लगी। कागन और सोई ने एक ऐसी रासायनिक अभिक्रिया प्रस्तुत की जिसमें दो में से एक इनेन्शियोमर ही बनेगा। यहां उसके विस्तार में जाना तो संभव नहीं है लेकिन साफ है कि यह कदम रसायन शास्त्र की हमारी समझ और जीव विज्ञान और चिकित्सा की दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण है। (स्रोत फीचर्स)

Photo credit – https://www.nobelprize.org/uploads/2026/10/fig_ke_26_3x2-scaled.jpg

एक पुरातन वायरस मध्ययुगीन ग्रंथ में छिपा मिला

प्राचीन रोम में भेड़ों को एक रोग हुआ करता था – इसमें भेड़ों के शरीर पर फफोले बन जाते थे। यह शीपपॉक्स का एक सामान्य लक्षण है। यह रोग बहुत घातक है और भेड़ों के पूरे के पूरे झुंड का सफाया कर सकता है। इस रोग की उत्पत्ति एक पहेली ही रही है।

अब, साइंस एडवांसेस में प्रकाशित एक अध्ययन में युनिवर्सिटी कॉलेज डबलिन के जेनेटिक विज्ञानी केविन डैली के नेतृत्व में एक शोध समूह ने इस पहेली का आश्चर्यजनक खुलासा किया है। इस रोगजनक का पता मध्य युग की पुस्तकों और कानूनी दस्तावेज़ों की खोजबीन से मिला है। ये पुस्तकें और दस्तावेज़ पार्चमेंट पर लिखे गए थे। गौरतलब है कि पार्चमेंट जानवरों की खाल को विशेष रूप से उपचारित करके बनाया जाता है। एक समय था जब इसका इस्तेमाल कागज़ के तौर पर होता था।

दरअसल, ये शोधकर्ता मध्ययुगीन पांडुलिपियों की उत्पत्ति का अध्ययन कर रहे थे। उन्होंने कुछ पन्नों को इरेज़र से रगड़ा और इस तरह निकले बुरादे में से डीएनए निकाला। गौरतलब है कि डीएनए आनुवंशिक पदार्थ होता है जिसका उपयोग सजीवों के अध्ययन के लिए किया जाता है।

सबसे पहली हैरत की बात तो यह थी कि पार्चमेंट में से डीएनए निकाला जा सका क्योंकि किताबों के पन्ने बनने से पहले गाय, बकरी या भेड़ों की खाल को कई दिनों तक चूने से भरे गड्ढे में रखा जाता है। चूना काफी शक्तिशाली रसायन है। इसके बाद इन खालों को निकालकर खुरचा जाता है और हाथों से ताना जाता है। इसके अलावा, लिखित पांडुलिपियां सदियों पुरानी हैं और उनकी तरह-तरह से उठा-पटक हुई होगी। यानी पार्चमेंट को विघटित होने का पर्याप्त समय मिला है। फिर भी यह अचरज की बात रही कि संग्रहालयों और मठों की अलमारियों में सजी पांडुलिपियों में पर्याप्त साबुत डीएनए था और साथ ही उन वायरसों तथा अन्य रोगजनकों के डीएनए भी मिले जिन्होंने उन जानवरों को संक्रमित किया था। इनमें शीप-पॉक्स के वायरस की एक विलुप्त किस्म का डीएनए भी मिल गया। यानी प्राचीन रोगजनकों का एक नया स्रोत हाथ लगा है।

इसके पीछे एक कारण तो यह है कि एक-एक किताब बनाने के लिए जितने जानवरों की ज़रूरत होती है वह लगभग एक पूरी आबादी के बराबर होती है। कहने का मतलब है कि जब आप उस समय की एक किताब उठाते हैं तो आप भेड़ों या अन्य जानवरों के एक पूरे झुंड को हाथ में ले लेते हैं।

शोधकर्ताओं ने एक काम और किया। 700 ईस्वी से 1450 ईस्वी के बीच की पांडुलिपियों का विश्लेषण करके वे इस नतीजे पर पहुंचे कि इन सब नमूनों का एक साझा पूर्वज था जो भेड़-विशिष्ट बीमारी के वाहक के रूप में करीब पांच हज़ार साल पहले विकसित हुआ था।

आम तौर पर पुस्तकों और पांडुलिपियों को दार्शनिक/साहित्यिक ज्ञान का भंडार माना जाता है। लेकिन इस अध्ययन ने दर्शाया है कि वे जीव वैज्ञानिक सूचना का स्रोत भी हो सकती हैं। (स्रोत फीचर्स)

Photo credit- https://nautil.us/deadly-livestock-virus-found-lurking-in-ancient-texts-1284770

एशरीशिया कोली और जीव विज्ञान अनुसंधान

भाग – 1

डॉ. सुशील जोशी

थियोडोर एशरिश ने जब एशरीशिया कोली (ई. कोली)बैक्टीरिया की खोज की थी तब उन्होंने ज़रा भी नहीं सोचा था कि साधारण-सा दिखने वाला यह बैक्टीरिया जीव विज्ञान अनुसंधान में इतने अहम योगदान देगा और कमोबेश आणविक जीव विज्ञान का आगाज़ करने वाला जीव बन जाएगा। तीन भागों में प्रस्तुत इस लेख शृंखला में हम ई. कोली के इन योगदान और यात्रा पर बात करेंगे। तो, चलिए चलते हैं ई. कोली के सफर पर…

सन 1885 में एक जर्मन-ऑस्ट्रियन शिशुरोग विशेषज्ञ, थियोडोर एशरिश (Theodor Escherich) ने नवजात बच्चों की आंतों में से कुछ बैक्टीरिया प्राप्त किए थे। ये बैक्टीरिया ग्राम नेगेटिव थे, थोड़ी चहलकदमी करते थे और सबसे बड़ी बात थी कि ये कई उपलब्ध कृत्रिम पोषक माध्यमों पर भलीभांति वृद्धि करते थे। एशरिश ने इन्हें नाम दिया था बैक्टीरियम कोली कम्यून (Bacterium coli commune)। आगे चलकर 1919 में इसे खोजकर्ता के नाम पर एशरीशिया कोली (Escherichia coli – ई. कोली) नाम मिला।

खोजकर्ता को तनिक भी आभास नहीं था कि सूक्ष्मदर्शी में यह साधारण-सा दिखने वाला बैक्टीरिया जीव विज्ञान अनुसंधान में इतना नाम कमाएगा और कमोबेश आणविक जीव विज्ञान का आगाज़ करने वाला जीव बन जाएगा।

नेचर में प्रकाशित एक समीक्षा पर्चे के अनुसार ई. कोली कम से कम 3,12,000 शोध पत्रों का विषय रहा है। इसी बैक्टीरिया पर अनुसंधान के लिए 12 नोबेल पुरस्कार मिल चुके हैं (अनुसंधान और नोबेल पुरस्कारों की जानकारी अगले पन्ने पर)।

फिर 1907 में रुडोल्फ मैसिनी (Rudolf Massini) ने एक सूक्ष्मजीव का विवरण प्रस्तुत किया – बैक्टीरियम कोली म्यूटेबाइल (Bacterium coli mutabile)। इसे Escherichia coli-mutabile भी कहते हैं और यह ई. कोली का एक उत्परिवर्तित संस्करण है। मैसिनी ने जब इसे प्राप्त किया तो शुरुआत में यह लैक्टोस पाचन में अक्षम (लैक्टोस नेगेटिव) था, लेकिन आगे चलकर इसमें कुछ उभार विकसित हो गए जो लैक्टोस का किण्वन कर सकते थे। यह खोज थी जिसने ई. कोली  पर आगे अध्ययन की प्रेरणा दी जिनकी बदौलत आणविक जीव विज्ञान का सूत्रपात हुआ।

1940 के दशक में एम. डेलब्रुक (M. Delbrück) और एस. ई. लूरिया (S. E. Luria) ई. कोली और उसे संक्रमित करने वाले वायरसों (बैक्टीरियोफेज या फेज) पर काम कर रहे थे। उन्होंने पाया कि बैक्टीरिया में उत्परिवर्तन स्वत: स्फूर्त होते हैं। हर्शे (A. D. Hershey) और चेज़ (M. Chase) यह भी दिखा पाए कि वायरस का जो हिस्सा बैक्टीरिया को संक्रमित करता है, वह प्रोटीन नहीं बल्कि डीएनए होता है।

ग्राम और ग्राम नेगेटिवग्राम अभिरंजन (staining) की एक विधि है, जिसका विकास हांस क्रिश्चियन ग्राम नाम के वैज्ञानिक ने 1884 में किया था। ग्राम नेगेटिव का मतलब होता है कि ये बैक्टीरिया इस विधि से अभिरंजित नहीं होते। 

लगभग इसी समय एस. बेंज़र (Seymour Benzer) ने आनुवंशिकी की कामकाजी इकाई को परिभाषित किया और जे. लेडरबर्ड (J. Lederberg) और ई. टेटम (E. Tatum) ने

यह खोज की कि बैक्टीरिया में लैंगिक पुनर्संयोजन होता है। कुछ वर्षों के बाद लेडरबर्ग ने गुणसूत्रों के बाहर कुछ जेनेटिक कणों (DNA fragments) की खोज की और बैक्टीरियोफेज के ज़रिए जेनेटिक हस्तांतरण का तरीका खोजा। इसे ट्रांसडक्शन कहते हैं।

1949 में पैरिस के पाश्चर इंस्टीट्यूट में ए. ल्वॉफ (A. Lwoff) ने लायसोजेनी की विधि का खुलासा किया। (लायसोजेनी वह प्रक्रिया होती है जिसमें कोई वायरस अपना जीनोम संक्रमित बैक्टीरिया के जीनोम में जोड़ देता है।) इसके बाद जल्दी ही एफ. जेकब (F. Jacob) और ई. वोलमैन (E. Wollman) ने ई. कोली

की लैंगिक प्रक्रिया का खुलासा किया और बैक्टीरिया के गुणसूत्रों की वृत्ताकार संरचना को स्थापित किया।

फिर 1960 के दशक में जे. मोनोड (J. Monod) और एफ. जेकब ने ई. कोली के लैक्टोस तंत्र का विश्लेषण करके जीन नियमन का ऑपेरॉन मॉडल प्रस्तावित किया और मेसेंजर आरएनए (messenger RNA) की अवधारणा प्रस्तुत की।

आगे चलकर ई. कोली तथा उसे संक्रमित करने वाले वायरसों की मदद से पुनर्संयोजित डीएनए (recombinant DNA) तकनीक का विकास हुआ।

ये थे ई. कोली पर हुए अनुसंधानों के कुछ महत्वपूर्ण पड़ाव। लेख के अगले भाग में हम चलेंगे आणविक जीव विज्ञान के एक लंबे सफर पर। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

Photo credit- https://en.wikipedia.org/wiki/Escherichia_coli