
कोशिका जीवन की संरचनात्मक तथा कार्यात्मक इकाई है। इसका मतलब है कि सारे सजीवों का ढांचा कोशिकाओं से बना होता है और उनकी समस्त अभिक्रियाएं कोशिकाओं में ही सम्पन्न होती हैं। जीव वैज्ञानिक लंबे समय से इस सवाल पर विचार करते रहे हैं कि क्या पूर्णत: अजैविक पदार्थों को जोड़कर एक जीवित कोशिका बनाई जा सकती है।
अब इस दिशा में एक कदम और बढ़ाया गया है। मेनेसोटा ट्विन सिटीज़ विश्वविद्यालय की संश्लेषण जीव विज्ञानी केट एडामला और उनकी टीम ने एक कृत्रिम कोशिका का निर्माण कर लिया है। दरअसल, यह कोशिका पानी की एक सूक्ष्म बूंद है जो एक वसीय झिल्ली से घिरी हुई है। इस बूंद में तमाम रसायन भरे गए हैं और साथ में 36 जीन्स वाला डीएनए है। माना जा रहा है कि यह पहला मॉडल है जो अधिकांशत: अजैविक रसायनों से बना है। इसे स्पड कोशिका (SpudCell) नाम दिया गया है। दरअसल, एडामला की टीम द्वारा संश्लेषित स्पड कोशिका की प्रमुख विशेषता यह है कि इसे पूरी तरह जाने-माने रासायनिक घटकों से तैयार किया गया है और यह संपूर्ण कोशिका-चक्र को दर्शाती है।
इससे पहले इस दृष्टि से किए गए अनुसंधान में किसी जीवित कोशिका में ही काट-छांट की जाती थी। प्रयास यह जानने का होता था कि किसी कोशिका को काम करने के लिए न्यूनतम कितने घटकों की आवश्यकता होती है। स्पड कोशिका पूरी तरह अजैविक घटकों से बनी है और इसने पूरा कोशिका-चक्र प्रदर्शित किया है।
कई शोधकर्ता प्रयोगशाला में कोशिका निर्माण के बारे में इस उम्मीद में विचार करते रहे हैं कि इससे जीवन की बुनियादी प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिलेगी और कई यौगिकों का संश्लेषण संभव हो जाएगा। लेकिन अधिकांश वैज्ञानिकों की कोशिश संपूर्ण कोशिका के निर्माण की नहीं बल्कि अलग-अलग कोशिकीय कार्यों की अनुकृति बनाने की होती है। यह एक चुनौती रही है कि ऐसे कई सारे कार्यों को एक साथ करवाया जाए।
जीवन के मौजूदा अणुओं – जैसे डीएनए या वसा अम्ल – का उपयोग करके इस कोशिका को साकार किया गया है। इसमें जिस तरीके का उपयोग किया गया है उसे PURE (Protein Synthesis Using Recombinant Elements) कहते हैं। यह जैविक अणुओं का एक समुच्चय होता है जिसकी ज़रूरत डीएनए का प्रतिलेखन करके आरएनए बनाने तथा आरएनए को प्रोटीन्स में अनुदित करने के लिए होती है। लेकिन इस तरह बनी बूंदें (स्पड कोशिकाएं) न तो खुद के लिए पोषण प्राप्त कर सकती हैं और न ही अपने जीनोम का समुचित विभाजन कर सकती हैं।
स्पड कोशिका में पोषण उपलब्ध कराने की कोशिश हुई है। एडामला की टीम ने इसके जीनोम (जो किसी बैक्टीरिया के जीनोम से 50 गुना छोटा है – यानी मात्र 90,000 क्षार जोड़ियों से बना है) में ऐसे जीन्स जोड़ दिए जो कुछ अणु बनाते हैं जो बूंद की सतह पर जम जाते हैं। ये ऐसे टैग्स की तरह काम करते हैं जो बाहर उपस्थित पोषण थैलियों (लिपोसोम्स) के लिए जुड़ने के स्थान बन जाते हैं। इन फीडर लिपोसोम्स में कई एंज़ाइम्स और अन्य अणु होते हैं जिनकी ज़रूरत स्पड कोशिका को होती है। पोषण के लिए स्पडकोशिका अल्फा-हीमोलायसीन नाम के एक प्रोटीन का उपयोग करती हैं। यह प्रोटीन कोशिका के डीएनए के अनुसार बनाया जाता है और यह जाकर कोशिका झिल्ली से चिपकता है। इस प्रोटीन से सम्बद्ध एक रासायनिक टैग कोशिका सतह के बाहर निकला होता है। यह टैग फीडर लिपोसोम से जुड़ जाता है और वहां से पोषक पदार्थ कोशिका में आने लगते हैं।
ये फीडर लिपोसोम्स उन्हें झिल्ली की वृद्धि के लिए लिपिड्स तथा अन्य पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं – जैसे राइबोसोम्स, एंज़ाइम्स तथा कई छोटे-छोटे अणु। फीडर लिपोसोम्स से जुड़ाव तब होता है जब स्पड कोशिका स्वयं अपने डीएनए से एक प्रोटीन बनाती है जो फीडर की झिल्ली से जुड़ जाता है। यानी स्पड कोशिका का डीएनए इस बात पर नियंत्रण रखता है कि वह पोषण प्राप्त कर पाएगी या नहीं, वह कितनी तेज़ी से वृद्धि करेगी और कितनी बड़ी हो पाएगी। प्राकृतिक कोशिकाएं तो अपने पोषक पदार्थ स्वयं बनाती है जिसके लिए उन्हें सैकड़ों जीन्स की ज़रूरत होती है। बाहर से पोषण मिलने के चलते स्पड कोशिकाएं काफी छोटे जीनोम के साथ अपना चक्र पूरा कर पाती हैं।
यह पोषण इन स्पड कोशिकाओं को वृद्धि करने और अपने जीनोम की प्रतिलिपि बनाने में सक्षम बनाता है।
अगला कदम था कि इन बूंदों (स्पड कोशिका) के जीनोम में एक ऐसी व्यवस्था जोड़ना जो इन्हें विभाजन की क्षमता प्रदान करे। इसके लिए एक और सतही टैग (FLAG) का जीन जोड़ा गया। यह टैग एक विशाल अणु स्ट्रेप्टावाइडिन से जुड़ सकता है। FLAG और स्ट्रेप्टावाइडिन का जुड़ाव सतह के अन्य अणुओं के बीच विकर्षण पैदा करता है। जब माध्यम में काफी मात्रा में स्ट्रेप्टावाइडिन डाला जाता है तो झिल्ली में उत्पन्न बल बूंद को दो हिस्सों में तोड़ देता है। प्राकृतिक कोशिकाओं में विभाजन का काम एक आंतरिक ढांचे (कोशिका-कंकाल cytoskeleton) की मदद से होता है। शुरू से शुरू करके कामकाजी कोशिका-कंकाल का निर्माण करवाना एक बड़ी चुनौती रही है क्योंकि इसके लिए बड़ी संख्या में तरह-तरह के प्रोटीन्स की समन्वित कार्रवाई ज़रूरी होती है।
स्पड कोशिका में इस चरण को बायपास किया गया है। इसमें प्रोटीन्स झिल्ली पर जमा होकर एक दबाव बनाते हैं, जिससे झिल्ली टूट जाती है। जो स्पड कोशिका ज़्यादा मात्रा में यह प्रोटीन बना पाती है वह ज़्यादा कुशलता से विभाजित हो पाती है।
एडामला स्वीकार करती हैं कि विभाजन की यह प्रक्रिया काफी अकुशल है। दरअसल, कई बार विभाजन करवाने के लिए उन्हें स्पड कोशिका पर बाहर से यांत्रिक बल आरोपित करना पड़ा था। इसमें एक समस्या और उभरी। जीनोम का प्रतिलिपिकरण तो हो जाता है लेकिन विभाजन के दौरान ये प्रतिलिपियां सफाई से अलग-अलग नहीं हो पातीं। परिणाम यह रहा कि विभाजन के पांच चक्रों के बाद मात्र 30 प्रतिशत स्पड कोशिकाओं में पूरा जीनोम उपस्थित रहा।
बहरहाल, एडामला बताती हैं कि स्पड कोशिका ने कई चीज़ों का मॉडल प्रस्तुत किया है।
जैसे इन कोशिकाओं में विकास (इवोल्यूशन) की क्षमता थी। उन्होंने कुछ स्पड कोशिकाओं में जेनेटिक उत्परिवर्तन किए। जैसे उन्होंने कुछ स्पड कोशिकाओं में ऐसे जीन्स जोड़ दिए जो उनमें पोषक लिपोसोम्स से जुड़ने वाले ज़्यादा टैग्स बनवाते थे। यानी वे ज़्यादा ‘भोजन’ ग्रहण कर सकती थीं और ज़्यादा तेज़ी से वृद्धि कर सकती थीं। ऐसी परिवर्तित कोशिकाओं में ज़्यादा तेज़ी से वृद्धि हुई और उनकी संतानें भी ज़्यादा हो गईं। यह भी देखा गया कि पोषण के अभाव में उत्परिवर्तित कोशिकाओं का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा।
वृद्धि व विभाजन के पांच चक्रों के बाद लगभग 60 प्रतिशत स्पड कोशिका जीनोम्स में वह उत्परिवर्तन मौजूद था।
इन कोशिकाओं का जीनोम मात्र 90,000 क्षार जोड़ियों से बना है और सात अलग-अलग प्लास्मिड्स के रूप में व्यवस्थित है। पहले अनुमान लगाया गया था कि किसी कोशिका के लिए न्यूनतम जीनोम 1,13,000 क्षार जोड़ियों की उपस्थिति ज़रूरी होगी। स्पड कोशिका ने इस सीमा को और कम कर दिया है।
प्रोटीन संश्लेषण तंत्र: स्पड कोशिका प्रोटीन सिंथेसिस यूज़िंग रीकॉम्बिनेंट एलीमेंट्स (PURE) तंत्र का उपयोग करती है। इसके लिए एशरीशिया कोली (ई. कोली) के
एंज़ाइम्स का उपयोग हुआ है। इसमें राइबोसोम भी ई. कोली का ही जोड़ा गया है। राइबोसोम वह कोशिकांग होता है जो आरएनए से प्रोटीन बनवाने का काम करता है। यहां विशेषता यह है कि शोधकर्ता जानते हैं कि किन-किन घटकों का इस्तेमाल किया गया है जबकि पूर्व प्रयोगों में पूरी कोशिका का पदार्थ इस्तेमाल किया जाता था।
कुछ सवाल और भावी कदम
यह तो सही है कि स्पड कोशिकाएं जीवन की कई केंद्रीय प्रक्रियाएं सम्पन्न कर सकती हैं और इससे पता चलता है कि इन्हें सुपरिभाषित घटकों से विकसित किया जा सकता है। लेकिन कुछ सवाल बाकी हैं।
स्पड कोशिका फिलहाल ई. कोली बैक्टीरिया से प्राप्त राइबोसोम का इस्तेमाल करती हैं। राइबोसोम के पुनर्निर्माण की क्षमता न होने के कारण ये कोशिकाएं 5-10 पीढ़ियों तक ही जीवित रहती हैं, उसके बाद पूरी मशीनरी ठप होने लगती है। लेकिन एकदम शुरू से शुरू करके राइबोसोम बनाने का मतलब होगा कि दर्जनों प्रोटीन्स का संश्लेषण किया जाए और उन्हें सही क्रम में व्यवस्थित किया जाए।
यह देखा गया कि पांच पीढ़ियों के बाद लगभग 30 प्रतिशत संतान कोशिकाओं में 7 डीएनए प्लास्मिड का पूरा सेट मौजूद था। प्राकृतिक कोशिकाओं में इस समस्या का समाधान कोशिका-कंकाल मशीनरी द्वारा होता है। कोशिका विभाजन के दौरान कोशिका-कंकाल गुणसूत्रों को अलग-अलग करने में मददगार होता है। स्पड कोशिकाओं में कोशिका-कंकाल व्यवस्था नहीं है।
अभी स्पड कोशिकाएं बाहर से फीडिंग पर निर्भर हैं। इसके चलते पोषक लिपोसोम्स लगातार देने पड़ते हैं। इसके अलावा विभाजन के लिए स्ट्रेप्टावाइडिन तथा अणुओं की कड़ी जोड़ने वाले प्रोटीन्स भी बाहर से देने होते हैं।
इन सब कारणों से इस तंत्र (स्पड कोशिका) को स्वायतत्ता देने के लिए ऐसे चयापचय मार्ग स्थापित करने होंगे कि वह ऐसे पदार्थों का निर्माण सरल घटकों से कर पाए। (स्रोत फीचर्स)

















