जलचर स्तनधारियों को सिटेशियन कहते हैं। इनमें व्हेल, डॉल्फिन तथा पॉरपॉइज़ शामिल हैं। और इनमें भी वैज्ञानिक देखते आए हैं कि डॉल्फिन का भोजन हासिल करने का तरीका बहुत विचित्र है। आम तौर पर डॉल्फिन करती यह है कि किसी मछली का पीछा करेंगी। वे उस मछली को खाएंगी नहीं बल्कि उसने जो शिकार पकड़ा है उसे छीनकर खा जाएंगी? इसे चोर-परजीविता या क्लेप्टोपैरासिटिज़्म कहते हैं। 2015 में जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के समुद्री जीव वैज्ञानिक जेनेट मैन ने बताया था कि ऑस्ट्रेलिया की शार्क बे में उन्होंने देखा है कि एक डॉल्फिन ने तीन पनकौओं की चोंच से मछली छीन ली। लेकिन समुद्री जीवों में यह व्यवहार बहुत कम देखने को मिलता है।
और अब तो इन्तहा हो गई है। एक डॉल्फिन विशेष (जिसे स्थानीय लोग बबल्स कहते हैं) ने अजीब व्यवहार का प्रदर्शन किया है। बबल्स किसी मछली का पीछा करेगी और फिर वह उसकी कै को चट कर जाएगी। सनशाइन कोस्ट विश्वविद्यालय की समुद्री जीव वैज्ञानिक एशिया आर्मस्ट्रॉन्ग को बबल्स के बारे में जानकारी 2017 में दक्षिणी ग्रेट बैरियर रीफ के लेडी एलियट द्वीप के नज़दीक बनाए गए एक वीडियो से मिली थी। यह एक बॉटलनोज़ डॉल्फिन (टर्सिओप्स ट्रन्केटस – Tursiops truncatus) थी। आर्मस्ट्रॉन्ग की टीम ने आगे खोजबीन की।
जून 2021 से अक्टूबर 2025 के बीच इस टीम ने बिगआई ट्रेवेली मछली (Caranx sexfasciatus) के झुंड में शिकार करती बबल्स की गतिविधियों को रिकॉर्ड किया। हालांकि डॉल्फिन कभी-कभार मछलियां खाती हैं लेकिन यहां सारी मछलियों को छोड़कर डॉल्फिन एक के पीछे पड़ गई। उसने ट्रेवेली का काफी नज़दीक से तब तक पीछा किया किया जब तक कि वह उल्टी करके भाग नहीं गई। तब उस डॉल्फिन ने वह कै खा डाली। और तो और, इस डॉल्फिन ने अगले तीस मिनट में यही वारदात 10 अन्य ट्रेवेली मछलियों के साथ दोहराई।
उसने मछली को खाने की बजाय उसके उल्टी करने का इन्तज़ार क्यों किया, इस मामले में आर्मस्ट्रॉन्ग ने एक परिकल्पना प्रस्तुत की है। हो सकता है कि अतीत में बबल्स उस ट्रेवेली को खाने के इरादे से ही झपटती रही होंगी लेकिन जब उसका पचा-पचाया भोजन (वमन) मिल गया तो उन्होंने रास्ता बदल लिया। वैसे भी ट्रेवेली काफी बड़ी होती है और उसे चबाने, हजम करने में समय और मेहनत लगती होगी। उसके मुकाबले उल्टी को संभालना ज़्यादा आसान साबित हुआ होगा।
अलबत्ता, इस चोर-परजीविता में भी बबल्स ने मेहनत तो की थी। ट्रेवेली समूह से उलझने से पहले बबल्स ने अपने सिर को दाएं-बाएं करते हुए क्लिक की ध्वनि उत्पन्न की। उसके बाद एक अकेली ट्रेवेली का पीछा करते वक्त उसने बार-बार क्लिकिंग ध्वनि निकाली और कई सारी निम्न आवृत्ति की ध्वनियां भी पैदा कीं। डॉल्फिन अपनी आवाज़ की प्रतिध्वनि की मदद से मछली के आकार, आकृति और संघटन में बारीक फर्क का अंदाज़ा लेती हैं। आर्मस्ट्रॉन्ग की टीम को लगता है कि सिर को दाएं-बाएं झटके देकर बबल्स को यह पता करने में मदद मिलती होगी कि किस ट्रेवेली ने अभी-अभी किसी शिकार को चट किया है। दूसरी ओर पीछा करने को दौरान उत्पन्न क्लिक ध्वनियां ट्रेवेली को उल्टी करने को उकसाती होंगी। वैसे शोधकर्ताओं को अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्लिक की आवाज़ें ट्रेवेली से उल्टी कैसे करवाती हैं। यह भी हो सकता है कि मछली डॉल्फिन से पीछा छुड़ाने के लिए वैसे ही उल्टी कर देती हो। बहरहाल, डॉल्फिन को तो भोजन मिल ही जाता है। (स्रोत फीचर्स)
अनुकूल समय की प्रतीक्षा में बीजों का कई दिनों, महीनों या वर्षों तक निष्क्रिय पड़े रहना किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसे बीज की सुप्तावस्था कहते हैं। बाहर से पूरी तरह से निर्जीव और शांत प्रतीत होने वाला छोटा-सा बीज, अपने भीतर जीवन की एक असीम संभावना को समेटे रहता है। वनस्पति विज्ञान के नज़रिए से, सुप्तावस्था कोई निष्क्रिय अवस्था नहीं है, बल्कि यह पौधे की उत्तरजीविता की रणनीति है। यह वह तंत्र है जो बीज को यह तय करने की क्षमता देता है कि उसे कब अंकुरित होना है और कब अपनी ऊर्जा को बचाकर सुप्त पड़े रहना है।
जैव विकास के लंबे सफर में पौधों में यह प्रणाली इसलिए विकसित हुई है ताकि उनके बीज प्रतिकूल मौसम में अंकुरित होकर नष्ट न हो जाएं। नमी, तापमान और प्रकाश की आदर्श स्थितियां मिलने तक बीज सुप्तावस्था में रहते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि बीज को यह कैसे पता चलता है कि बाहर का मौसम अंकुरण के लिए सुरक्षित है या नहीं? इसी गूढ़ प्रश्न का उत्तर अब वैज्ञानिकों ने एक ‘जैविक स्विच’ के रूप में खोज निकाला है।
आधुनिक कृषि के सामने बीजों, खासकर गेहूं के बीजों, का समय से पहले (पौधे पर लगे-लगे ही) अंकुरित होना एक अत्यंत गंभीर चुनौती बन चुका है। इस समस्या को ‘प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग’ कहा जाता है। कल्पना कीजिए कि गेहूं की फसल खेत में पूरी तरह से पककर कटाई के लिए तैयार है, लेकिन तभी अचानक बेमौसम बारिश हो जाती है या वातावरण में नमी का स्तर अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में, अगर बीजों का सुप्तावस्था तंत्र कमज़ोर है, तो वे बालियों में ही अंकुरित होने लगते हैं। इस अवांछित अंकुरण के कारण अनाज के भीतर मौजूद स्टार्च टूटने लगता है और महत्वपूर्ण एंज़ाइम सक्रिय हो जाते हैं, जिससे गेहूं की गुणवत्ता, उसका पोषण मूल्य और उसके पकाने सम्बंधी गुण पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। वैश्विक स्तर पर, प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग के कारण केवल गेहूं की फसल में हर साल अरबों डॉलर तक का नुकसान होता है।
इस समस्या के मुकम्मल समाधान की दिशा में वनस्पति विज्ञानियों और आनुवंशिकी विशेषज्ञों ने एक युगांतरकारी खोज की है। वैज्ञानिकों ने गेहूं (ट्रिटिकम एस्टिवम) के जीनोम में TaNAC018-7D नामक एक विशेष जीन की पहचान की है। यह जीन एक प्रतिलेखन कारक के रूप में कार्य करता है। प्रतिलेखन कारक वे विशेष प्रोटीन होते हैं जो डीएनए से जुड़कर यह नियंत्रित करते हैं कि कौन सा जीन ‘चालू’ होगा और कौन सा ‘बंद’। TaNAC018-7D एक मास्टर कंट्रोलर या जैविक स्विच की तरह काम करता है, जिसका मुख्य काम बीज के भीतर सुप्तावस्था (डॉरमेंसी) के स्तर को निर्देशित करना है। यह जीन ही अंततः निर्धारित करता है कि बारिश की कुछ बूंदों के संपर्क में आने के बाद बीज को तुरंत अंकुरित हो जाना चाहिए या अभी प्रतीक्षा करनी चाहिए।
इस जैविक स्विच की कार्यप्रणाली को गहराई से समझने के लिए, हमें बीजों के भीतर चल रही अभिक्रियाओं को समझना होगा। बीजों के अंकुरण और सुप्तावस्था के बीच का पूरा संतुलन मुख्य रूप से दो हार्मोन्स – एब्सिसिक एसिड (ABA) और जिबरेलिक एसिड (GA) – के बीच की रस्साकशी है। एब्सिसिक एसिड सुप्तावस्था का रक्षक है, यह बीज को सुप्त बनाए रखता है और अंकुरण को रोकता है। दूसरी ओर, जिबरेलिक एसिड अंकुरण को उकसाता है, यह सुप्तावस्था को तोड़कर बीज के भीतर मौजूद भ्रूण को वृद्धि करने का संकेत देता है। एक स्वस्थ और सुरक्षित बीज में, परिपक्वता के दौरान ABA का स्तर बहुत अधिक होता है और GA का स्तर नगण्य होता है। जब बीज पानी सोखता है तो ABA का स्तर तेज़ी से गिरता है और GA का स्तर बढ़ता है, जिससे अंकुरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
यहीं पर TaNAC018-7D जीन भूमिका निभाता है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि यह प्रतिलेखन कारक सीधे तौर पर उन जीन्स की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करता है जो ABA के निर्माण और संकेतन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। जब बीज बालियों में पक रहे होते हैं, तब TaNAC018-7D सक्रिय होकर यह सुनिश्चित करता है कि बीज के भीतर ABA का एक पर्याप्त और सुरक्षित स्तर बना रहे। इसके साथ ही, यह उन एंज़ाइमों की गतिविधि को भी धीमा कर देता है जो ABA को नष्ट कर सकते हैं। इस प्रकार, यह जीन बीजों की सुप्तावस्था को इतना मज़बूत बना देता है कि फसल कटाई के समय यदि अचानक बेमौसम बारिश हो भी जाए, तो बीजों के भीतर मौजूद ABA का कवच तुरंत न टूटे। इस तरह, बीज बालियों में अंकुरित होने से बच जाते हैं।
इस महत्वपूर्ण जीन की खोज की वैज्ञानिक यात्रा अपने आप में जीन मानचित्रण और आणविक जीवविज्ञान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। गेहूं का जीनोम अत्यंत विशाल और जटिल होता है (यह मानव जीनोम से भी कई गुना बड़ा है), इसलिए इसमें से एक विशिष्ट प्रतिलेखन कारक को ढूंढना भूसे के ढेर में सूई खोजने जैसा था। वैज्ञानिकों ने गेहूं की ऐसी किस्मों का विस्तृत आनुवंशिक अध्ययन किया जो प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी थीं, और उनकी तुलना उन किस्मों से की जो आसानी से अंकुरित हो जाती थीं। उन्नत तकनीकों का उपयोग करके, वे अंततः गुणसूत्र 7D पर उस सटीक स्थान तक पहुंचने में सफल रहे जहां TaNAC018-7D जीन स्थित है।
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र अनियमित हो गया है। कभी अत्यधिक सूखा पड़ता है तो कभी फसल कटाई के समय भारी बारिश और ओलावृष्टि हो जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी हमने पिछले कुछ वर्षों में देखा है कि मार्च-अप्रैल के महीनों में, जब गेहूं व रबी की अन्य फसलें कटाई के लिए तैयार होती हैं, पश्चिमी विक्षोभ के कारण अचानक बारिश हो जाती है। ऐसी अनियमित मौसमी घटनाओं से निपटने के लिए हमें ऐसी फसलों की आवश्यकता है जो पर्यावरण के इन झटकों को सह सकें। TaNAC018-7D जीन हमें वह वैज्ञानिक औज़ार देता है जिससे हम ऐसी ‘क्लाइमेट-स्मार्ट’ फसलें विकसित कर सकते हैं।
इस खोज का सबसे बड़ा व्यावहारिक लाभ भविष्य की कृषि व्यवस्था को मिलेगा। पारंपरिक पादप प्रजनन तकनीकों की मदद से, कृषि वैज्ञानिक अब इस विशिष्ट जीन वाले गेहूं के पौधों का चयन कर सकते हैं और उन्हें उच्च उपज वाली लेकिन संवेदनशील किस्मों के साथ क्रॉस करा सकते हैं। क्रिस्पर-कास-9 जैसी आधुनिक जीन संपादन तकनीक का उपयोग करके, वैज्ञानिक सीधे तौर पर गेहूं की मौजूदा व्यावसायिक किस्मों में TaNAC018-7D जीन की अभिव्यक्ति को समायोजित कर सकते हैं। अर्थात हम ऐसे बीज डिज़ाइन कर सकते हैं जिनकी सुप्तावस्था कटाई के समय तक महफूज़ रहे, लेकिन जब किसान उन्हें अगले मौसम में बोने के लिए मिट्टी में डालें, तो वे आसानी से और समान रूप से अंकुरित हो जाएं। (स्रोत फीचर्स)
Picture credit – https://phys.org/news/2014-11-seed-dormancy-property-germination-million.html ( dormancy in seeds)
हाल ही में शोध पत्रिका नेचर में स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय के सर्जिउ पास्का व साथियों द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि उन्होंने मानव मस्तिष्क की कोशिकाओं को एक जीवित चूहे (माउस) के मस्तिष्क में प्रत्यारोपित किया है।
गौरतलब है कि मानव मस्तिष्क से जुड़े विकारों को दूर करने के लिए उचित उपचार और दवाइयां विकसित करने के लिए मानव मस्तिष्क का विभिन्न परिस्थितियों में अध्ययन ज़रूरी है। अब तक जीवित मानव मस्तिष्क की कार्यिकी को समझना वैज्ञानिकों के लिए बहुत कठिन रहा है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने कई तरह के मॉडल विकसित किए हैं। इनमें से एक है पेट्री-डिश में बनाए जाने वाले मस्तिष्क ऑर्गेनॉइड। इसमें मनुष्य की त्वचा की कोशिकाओं को पहले तो स्टेम कोशिका में बदला जाता है जो फिर तंत्रिका कोशिकाएं बनाती हैं। इन्हें ब्रैन ऑर्गेनॉइड कहते हैं। ये मानव मस्तिष्क के विकास के कुछ पहलुओं को समझने में उपयोगी हैं, लेकिन इनमें जीवित मस्तिष्क जैसी प्राकृतिक परिस्थितियां नहीं होती: उन्हें मस्तिष्क में शरीर से आने वाले वास्तविक संकेत नहीं मिलते और उनमें सामान्य रक्त वाहिकाओं से रक्त आपूर्ति भी नहीं होती।
वैज्ञानिकों ने मानव मस्तिष्क की कोशिकाओं को माउस के मस्तिष्क में प्रत्यारोपित करने की कोशिश की है। लेकिन यहां एक समस्या सामने आई। माउस की अपनी मस्तिष्क कोशिकाएं भी लगातार विकसित हो रही थीं और मानव कोशिकाओं के साथ जगह के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही थीं। चूंकि चूहे के मतिष्क की कोशिकाएं जल्दी वृद्धि करती हैं इस कारण मानव कोशिकाओं को पर्याप्त रूप से चूहे के मस्तिष्क में विकसित होने का अवसर नहीं मिल पा रहा था।
इस समस्या को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने चूहे में कुछ आनुवंशिक परिवर्तन किए। इन परिवर्तनों के कारण उसके मस्तिष्क का एक हिस्सा खाली रह गया और पर्याप्त जगह उपलब्ध हो गई। जब इस जगह पर मानव मस्तिष्क की कोशिकाओं से विकसित किए गए ऑर्गेनॉइड को प्रत्यारोपित किया गया, तो वे अच्छी तरह विकसित हुए।
इस तरह वैज्ञानिकों के हाथों में चूहे और मानव कोशिकाओं से बना एक मिश्रित या शिमेरिक मस्तिष्क मॉडल आ गया। महत्वपूर्ण बात यह है कि मानव कोशिकाएं जीवित मस्तिष्क के वातावरण में विकसित हो रही थीं और उन्हें वहां मौजूद तंत्रिका तंत्र से संकेत तथा वाहिकाओं से रक्त आपूर्ति मिल रही थी।
इस शोध का एक नैतिक आयाम भी है। जब किसी जानवर के मस्तिष्क में मानव मस्तिष्क की कोशिकाएं प्रत्यारोपित की जाती हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इससे उस जानवर के व्यवहार या चेतना में मानव जैसी कोई विशेषता विकसित हो सकती है। पास्का ने बताया कि इस अध्ययन में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि मानव कोशिकाओं के प्रत्यारोपण से चूहे में मानव जैसी चेतना विकसित हुई हो या उसकी बौद्धिक क्षमता में कोई असाधारण वृद्धि हुई हो। वैसे भी इस प्रयोग का उद्देश्य माउस को बुद्धिमान बनाना नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क की कार्यिकी को समझना है। (स्रोत फीचर्स)
Picture credit – https://neurosciencenews.com/hybrid-human-brain-mouse-tissue-31216/ ( human cell in mice brain )
जब हम अपने स्मार्टफोन पर एक 15-सेकंड की रील देखते हैं या सप्ताहांत पर नेटफ्लिक्स पर हाई-डेफिनिशन (HD) क्वालिटी में कोई वेब सीरीज़ स्ट्रीम करते हैं, या 10-15 रुपए का भी छोटा सा पेमेंट पे-टीएम के ज़रिए करते हैं तो हमें इसमें कोई गड़बड़ी, कोई प्रदूषण नहीं दिखता। क्योंकि हमारे आसपास कोई धुआं नहीं उड़ता, कोई हानिकारक गंध नहीं आती और न ही कोई दृश्य कचरा जमा होता है। कैशलेस या कागज़-मुक्त होने की बात भी ठीक ही लगती है क्योंकि कागज़ का कचरा फैलते नहीं दिखता। लेकिन पर्दे के पीछे की कहानी कुछ और ही है। हमारी इन गतिविधियों से पृथ्वी के वायुमंडल में लगातार कार्बन डाईऑक्साइड गुपचुप रूप से जुड़ रही होती है। सूचना और संचार प्रौद्योगिकी का यह गुप्त पर्यावरणीय प्रभाव आज इक्कीसवीं सदी का सबसे तेज़ी से बढ़ता ‘अदृश्य संकट’ बन चुका है।
विभिन्न पर्यावरण जर्नल्स और विज्ञान संस्थानों के शोध के अनुसार, वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में संपूर्ण डिजिटल तंत्र का योगदान वर्तमान में लगभग 2.1 प्रतिशत से 3.9 प्रतिशत के बीच आंका गया है। इस तंत्र में केवल इंटरनेट का उपयोग ही शामिल नहीं है, बल्कि विशाल डैटा सेंटर्स, वैश्विक नेटवर्क केबल्स और इन उपकरणों के निर्माण की प्रक्रिया भी जुड़ी है। यह डैटा चौंकाने वाला इसलिए है क्योंकि यह वैश्विक विमानन उद्योग (लगभग 2.5 प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार) के बराबर या उससे भी अधिक है।
इंटरनेट का उपयोग बढ़ने के साथ ही क्लाउड कंप्यूटिंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) के आगमन ने बिजली की खपत को और बढ़ा दिया है। जब आप डैटा का उपयोग करते हैं, तो वह आपके डिवाइस से होते हुए स्थानीय इंटरनेट टॉवरों और अंततः विशाल डैटा सेंटर्स तक जाता है। ये डैटा सेंटर हज़ारों सर्वरों का एक नेटवर्क होते हैं जो चौबीसों घंटे चलते हैं और उन्हें चालू तथा ठंडा रखने के लिए भारी मात्रा में विद्युत ऊर्जा और पानी की आवश्यकता होती है। चूंकि वैश्विक स्तर पर आज भी बिजली का एक बड़ा हिस्सा कोयले या जीवाश्म ईंधनों से बनता है, इसलिए हर डिजिटल गतिविधि सीधे तौर पर कार्बन उत्सर्जन से जुड़ जाती है।
ऊर्जा के भूखे डैटा सेंटर
अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के आंकड़ों के अनुसार, दुनिया भर के डैटा सेंटर्स वैश्विक बिजली आपूर्ति का लगभग 1 प्रतिशत से 1.3 प्रतिशत उपभोग करते हैं। डैटा सेंटर्स और एआई एल्गोरिदम की बढ़ती मांगों के कारण यह ऊर्जा खपत वर्ष 2026 तक दुगनी होने का अनुमान है, जो पर्यावरणीय दृष्टिकोण से एक गंभीर चिंता का विषय है।
डिजिटल कार्बन पदचिंह का एक बड़ा और ओझल हिस्सा ‘डार्क डेटा’ कहलाता है। यह वह डैटा है जिसे एक बार बनाकर या इकट्ठा करके छोड़ दिया जाता है और दोबारा कभी उपयोग नहीं किया जाता। उदाहरण के लिए, हमारे इनबॉक्स में पड़े हज़ारों पुराने अनरेड ईमेल, धुंधली तस्वीरें जिनका बैकअप क्लाउड पर है, और पुरानी अप्रयुक्त फाइलें। ‘दी कार्बन लिटरेसी प्रोजेक्ट’ के अनुसार, एक सामान्य ईमेल भी अपने पीछे लगभग 4 ग्राम कार्बन पदचिंह छोड़ता है, जबकि बड़ी अटैचमेंट वाला ईमेल 50 ग्राम तक कार्बन उत्सर्जन के लिए ज़िम्मेदार हो सकता है। लाखों-करोड़ों उपयोगकर्ताओं द्वारा छोड़े गए इस कचरे को सहेजने के लिए डैटा सेंटर्स को लगातार बिजली खर्च करनी पड़ती है।
इसके अतिरिक्त, एआई का प्रशिक्षण और संचालन इस संकट को और गहरा कर रहा है। नेचर जर्नल में प्रकाशित शोधों के अनुसार, एक विशाल भाषा मॉडल (LLM) को प्रशिक्षित करने में उतनी ही कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जित हो सकती है, जितनी पांच कारें अपने पूरे जीवनकाल में (निर्माण से लेकर कबाड़ होने तक) करती हैं। इसका कारण यह है कि एआई को प्रोसेस करने वाले विशेष चिप्स सामान्य कंप्यूटरों की तुलना में कई गुना अधिक बिजली खींचते हैं।
स्क्रॉलिंग और स्ट्रीमिंग
अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्था Greenspector द्वारा स्मार्टफोन एप्लिकेशन्स की ऊर्जा खपत पर किए गए प्रयोगशाला अध्ययनों के तहत विभिन्न सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को रीयल-टाइम में टेस्ट किया गया। निष्कर्षों से पता चला कि शॉर्ट-वीडियो फॉर्मेट (जैसे टिकटॉक और इंस्टाग्राम रील्स) प्रति मिनट सबसे अधिक डैटा और बिजली का उपभोग करते हैं क्योंकि इनमें वीडियो प्री-लोडिंग और एल्गोरिदम रेंडरिंग बैकग्राउंड में लगातार चलती रहती है। जब हम लगातार स्क्रॉल करते हैं, तो सर्वर पर दबाव बढ़ता है और डिवाइस की बैटरी भी तेज़ी से खत्म होती है।
समाधान: डिजिटल डीटॉक्स और ग्रीन कंप्यूटिंग
इस डिजिटल प्रदूषण को पूरी तरह से समाप्त करना आधुनिक दुनिया में व्यावहारिक नहीं है, परंतु शोधकर्ताओं ने इसके शमन के लिए कुछ अत्यंत प्रभावी और सरल उपाय सुझाए हैं जिन्हें हम अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना सकते हैं:
सही नेटवर्क का चयन: मोबाइल डैटा (4G) के मुकाबले ब्रॉडबैंड वाई-फाई नेटवर्क लगभग 4 से 5 गुना कम ऊर्जा की खपत करता है। घर या कार्यालय में वाई-फाई का उपयोग डिजिटल पदचिंह को काफी हद तक घटा देता है। वैसे, 5G तकनीक भी पुरानी 4G तकनीक की तुलना में प्रति गीगाबाइट अधिक ऊर्जा-कुशल साबित हो रही है।
ऑटो-प्ले और डिवाइस दक्षता: दी कार्बन ट्रस्ट और युनिवर्सिटी ऑफ ब्रिस्टल के शोध के अनुसार, वीडियो स्ट्रीमिंग का अधिकांश कार्बन उत्सर्जन आपके घर के डिवाइस की बिजली खपत से तय होता है। वीडियो प्लेटफॉर्म पर ‘ऑटो-प्ले’ की सेटिंग को बंद रखकर और उपकरणों की ऊर्जा दक्षता को सुधारकर हम डैटा ट्रांसमिशन लोड और कार्बन उत्सर्जन दोनों को नियंत्रित कर सकते हैं।
डिजिटल स्वच्छता: अपने इनबॉक्स को नियमित रूप से साफ करना, अनावश्यक क्लाउड बैकअप को हटाना और बिना वजह वीडियो कॉल की बजाय वॉयस कॉल को प्राथमिकता देना, व्यक्तिगत स्तर पर बड़े बदलाव ला सकता है।
इंफ्रास्ट्रक्चर बदलाव की मांग: वैश्विक स्तर पर टेक कंपनियों पर यह दबाव बनाना आवश्यक है कि वे अपने डैटा सेंटर्स को 100 प्रतिशत नवीकरणीय ऊर्जा (जैसे सौर या पवन ऊर्जा) पर स्थानांतरित करें। भविष्य ‘ग्रीन कंप्यूटिंग’ का है, जहां सॉफ्टवेयर के कोड और हार्डवेयर की बनावट को इस तरह डिज़ाइन किया जाएगा कि वे कम से कम बिजली का उपयोग करें। लेकिन यह दिल्ली अभी दूर है। फिलहाल अनावश्यक डैटा उपयोग से बचने और डिजिटल आदतों के प्रति सचेत रहने में ही समझदारी है, ताकि इस अदृश्य धुएं को हमारी पृथ्वी का दम घोटने से रोका जा सके। (स्रोत फीचर्स)
इस वर्ष के पहले नोबेल पुरस्कार की घोषणा कर दी गई है। जीव विज्ञान का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से कार्ल डाइसरॉथ (हॉवर्ड ह्यूजेस मेडिकल इंस्टीट्यूट तथा स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय), पीटर हेगेमन (बर्लिन के हम्बोल्ड विश्वविद्यालय) तथा जॉर्ज नागेल (वुर्ज़बर्ग विश्वविद्यालय) को प्रदान किया जाएगा। इन्हें यह पुरस्कार प्रकाश-चालित आयन मार्गों तथा ऑप्टोजेनेटिक्स की खोज के लिए दिया गया है।
ऑप्टोजेनेटिक्स एक ऐसी विधि है जिसकी मदद से यह समझना संभव हो गया है कि तंत्रिकाएं स्मृतियों, भावनाओं और व्यवहारों को कैसे आकार देती हैं और संजोती हैं।
शुरुआत हुई थी एक सरल से सवाल से। पीटर हेगेमन की जिज्ञासा यह जानने में थी कि एक-कोशिकीय शैवाल क्लैमायडोमोनास प्रकाश की ओर कैसे तैर जाती है। इसी बात को समझते-समझते हेगेमन और जॉर्ज नागेल ने एक चैनल-रोडॉप्सिन की खोज कर ली। चैनल-रोडॉप्सिन शैवालों में पाया जाने वाला एक अनोखा प्रोटीन है। यह कोशिकाओं की सतह पर पाया जाता है। जब कोशिका की सतह पर नीला प्रकाश पड़ता है तो इस प्रोटीन के ज़रिए एक प्रवाह मार्ग (चैनल) खुल जाता है और इस मार्ग से आवेशित आयन कोशिका में प्रवाहित होने लगते हैं। इस प्रवाह के कारण एक विद्युत आवेग उत्पन्न होता है। हेगेमन और नागेल ने पाया कि यह प्रोटीन किसी भी कोशिका में डाल दिया जाए, वह कोशिका प्रकाश संवेदी हो जाती है।
अगला कदम कार्ल डाइसरॉथ ने उठाया। उन्होंने क्लैमायडोमोनास के चैनल-रोडॉप्सिन का जीन एक चूहे की तंत्रिका कोशिकाओं में रोप दिया। इन कोशिकाओं पर नीली रोशनी डालकर वे तंत्रिका संकेत प्रेषित करवा पाए थे। यानी यह प्रोटीन एक प्रकाश-नियंत्रित स्विच की तरह काम करता है। यह खोज 2005 में करने के 2 साल बाद डाइसरॉथ ने जीवित चूहों की तंत्रिका कोशिकाओं में इस प्रकाश-चालित स्विच को जोड़कर काम करवाया।
तंत्रिका कोशिकाओं में प्रकाश की मदद से संकेतों का नियंत्रण करवाने की इस विधि को ऑप्टोजेनेटिक्स कहते हैं और यह अत्यंत प्रभावशाली तकनीक साबित हुई है। इसकी मदद से शोधकर्ता तंत्रिका सम्बंधी विकारों तक मनो-चिकित्सकीय संदर्भों में विशिष्ट स्मृतियों, भावनाओं और व्यवहारों के तंत्रिका सर्किट्स का खुलासा कर पाए हैं। और तो और, दृष्टि बाधित व्यक्तियों में इस तकनीक का उपयोग करके दृष्टि बहाल करने के प्रयास भी जारी हैं। इस तकनीक ने मस्तिष्क को लेकर हमारी समझ को नए आयाम दिए हैं। यह समझने की दिशा में रोज़ नई खोजें हो रही हैं कि हमारा अद्भुत दिमाग काम कैसे करता है। (स्रोत फीचर्स)
Picture Credit – https://www.nobelprize.org/uploads/2026/10/NP_POM_2026_3-2_01.jpg ( Nobel Prize in Physiology
विज्ञान की दुनिया में कई ऐसी समस्याएं हैं जो कि सालों से अनसुलझी रही हैं। इनमें से कई समस्याओं को सुलझाने के लिए बड़े-बड़े इनाम भी घोषित किए गए हैं। वैज्ञानिक अक्सर इन समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने समय की मौजूदा तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। हमारे अपने समय में जो एक तकनीक प्रभावी तौर पर उभरी है, वह है एआई यानी कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस या कृत्रिम बुद्धि। हाल ही में एक ऐसी ही समस्या पर एआई द्वारा सुझाए गए हल को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।
नेवियर स्टोक्स पहेली
सामान्य वस्तुओं की गति को समझने के लिए हम न्यूटन के नियमों की मदद लेते हैं। लेकिन अगर इन नियमों को किसी तरल की गति को समझने के लिए इस्तेमाल किया जाए तो हमें जो गणितीय समीकरण मिलता है उसे नेवियर-स्टोक्स समीकरण के नाम से जाना जाता है। यह समीकरण विमान के डिज़ाइन में, मौसम की भविष्यवाणी में, रक्त के प्रवाह को समझने में एवं पानी और हवा के प्रवाह के अध्ययन में मदद करता है। इन तमाम परिस्थितियों एवं उनसे जुड़े सवालों के अलावा वैज्ञानिक इस सवाल से भी लगातार जूझते रहते हैं कि किसी एक वास्तविक परिस्थिति की व्याख्या करता हुआ उनका कोई गणितीय मॉडल या समीकरण किस हद तक विश्वसनीय है। उसकी हद क्या है?
नेवियर-स्टोक्स समस्या के साथ भी ऐसा ही है, या कहें, ऐसी ही था। लगभग 90 वर्षों से यह सवाल अनसुलझा था कि किसी तरल की सामान्य और सुचारु त्रि-आयामी गति क्या अचानक ऐसी स्थिति में पहुंच सकती है जहां गणितीय रूप से उसका व्यवहार बिगड़ जाए? नेवियर-स्टोक्स समीकरणों के संदर्भ में कहें तो क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ समय बाद एक भले से दिखने वाले तरल का प्रवाह अचानक इतनी तेज़ी से बदल जाए कि नेवियर-स्टोक्स समीकरणों के अनुसार उसकी गति अनंत हो जाए?
अब चूंकि हकीकत में किसी भी वस्तु की गति अनंत नहीं हो सकती, ऐसे में अगर गणितीय मॉडल में तरल की गति अनंत हो जाती है तो इसे उस मॉडल की सीमा के रूप में देखा जाएगा।
ओपनएआई (OpenAI) कंपनी ने सितंबर 2026 के शुरुआती दिनों में यह दावा पेश किया कि उनके नए एआई मॉडल ने नेवियर-स्टोक्स समस्या को सुलझा दिया है। उनके दावे के मुताबिक, एक भले से दिखने वाले प्रवाह की गति भी गणितीय मॉडल के मुताबिक अनंत हो सकती है। इसके साथ ही ओपनएआई ने इस दावे का एक गणितीय प्रमाण भी प्रस्तुत किया है। अब यह दावा कितना सही है या गलत इसकी पड़ताल तो चल ही रही होगी, लेकिन ओपनएआई ने समस्या को सुलझाने के लिए जिस प्रक्रिया को अपनाया है उस पर भी सवाल उठ रहे हैं।
विवाद
जैसा है कि हम जानते हैं एआई मॉडल ट्रेनिंग या सीखने के लिए डैटा का इस्तेमाल करते हैं। इस सीखने-सिखाने के प्रक्रिया में लगभग हर स्तर पर इंसान व इंसानों के द्वारा सृजित ज्ञान का इस्तेमाल होता है। कई दफे तो बाकायदा हाथ पकड़कर एआई या एआई एजेंट को सही हल के बारे में बताया जाता है, जैसे किसी छोटे बच्चे का हाथ पकड़कर उसे चलना सिखाया जाता है।
ओपनएआई की घोषणा से कुछ घंटे पहले न्यूयार्क युनिवर्सिटी के गणितज्ञ ट्राइस्टन बकमास्टर ने एक सम्बंधित गणितीय परिणाम प्रकाशित किया था। जिस समस्या पर बकमास्टर अपने सहयोगी लेवेंट एल्पोग के साथ काम कर रहे थे, उसे ओयलर (Euler) पहेली के नाम से जाना जाता है। अलबत्ता, यह समस्या नेवियर-स्टोक्स समस्या से मुख्य तौर पर इस मामले में अलग है कि ओयलर पहेली में तरल की श्यानता (घर्षण) को नकार दिया जाता है। बकमास्टर व एल्पोग इस पहेली पर काम करने के दौरान एआई तकनीक का सहारा भी ले रहे थे। ओपनएआई के ही एक एआई एजेंट कोडेक्स (Codex) पर लगातार पिछले कई महीनों से वे अपने काम व उससे जुड़े मसौदों को साझा कर रहे थे।
बकमास्टर ने आरोप लगाया है कि ओपनएआई जिस रास्ते से नेवियर-स्टोक्स समस्या के हल तक पहुंचा है, वह उनके ओयलर समस्या के हल से जुड़ा हो सकता है जिस पर वे पहले से काम कर रहे थे। मुख्य तौर पर बकमास्टर का कहना है कि ओपनएआई एजेंट ने समस्या को सुलझाने की प्रक्रिया में उन मसौदों से भी सीखा होगा जो कि ओपनएआई के डैटाबेस में पहले से ही मौजूद हैं। ओपनएआई ने ऐसी किसी भी संभावना को नकारा है।
लेकिन शक बे-बुनियाद नहीं है और बहस जारी है। कई गणितज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ दशकों में नेवियर-स्टोक्स समस्या पर काफी हद तक समझ बनाई जा चुकी थी और यह समस्या बस हल होने की कगार पर ही थी। ऐसे में ओपनएआई का दावा ज्ञान-सृजन की बजाय बाज़ार में अपनी छवि चमकाने व मूल्य बढ़ाने का प्रयास अधिक नज़र आता है।
एक और बात जो ओपनएआई के सुझाए गए हल पर सवाल उठाती है वह है संसाधनों को लेकर। ओपनएआई ने दावा किया कि दशकों पुरानी इस समस्या को लगभग 4-5 दिनों में ही सुलझा दिया। ऐसा करने के लिए उसने मल्टीएजेंट व्यवस्था का सहारा लिया, जिन्होंने पहले-पहल समस्या के कुछ सरल स्वरूपों पर काम किया और फिर मुख्य समस्या पर। सभी गणितीय समस्याओं को मिलाकर एजेंटों ने लगभग 49 लाख संदेश एक-दूसरे को भेजे। इन संदेशों को तैयार करने में लगभग 300 अरब आउटपुट टोकन्स का इस्तेमाल हुआ। केवल नेवियर-स्टोक्स पहेली पर एजेंटों ने लगभग 27 लाख संदेश एक-दूसरे को भेजे व लगभग 130 अरब आउटपुट टोकन्स बनाए।
अब अगर इन तमाम संदेशों के पीछे काम कर रही तकनीक और उससे जुड़े खर्चों का हिसाब लगाया जाए तो अनुमानित एक करोड़ अमरीकी डॉलर से लेकर 2.25 करोड़ अमरीकी डॉलर के बीच बैठता है। इस पहेली को सुलझाने के लिए जो इनाम था (दस लाख अमरीकी डॉलर) वह इससे कहीं कम है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह वास्तव में एआई की ‘गणितीय समझ’ की सफलता है, या बहुत बड़ी कंप्यूटेशनल शक्ति से लाखों संभावित गणितीय हलों को छांटने की सफलता?
इन जैसे तमाम सवालों को लेकर एआई पर बहस अब और भी तीखी होती जा रही है। और यह बहस अब मात्र तकनीक तक ही सीमित नहीं रह गई है। इसके राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक पहलुओं व प्रभावों पर भी लगातार चर्चा हो रही है; कई अकादमिक समूह तो एआई व इससे जुड़ी कंपनियों के खिलाफ एक मुहिम-सी छेड़ते हुए नज़र आते हैं।
सितंबर 2026 के महीने में जहां एक ओर ओपनएआई सरीखी कंपनियां कठिन समस्याओं से जुड़े अपने दावों को लेकर सामने आती दिखलाई देती हैं तो इसी महीने में एसोसिएशन ऑफ ह्यूमन मैथेमेटिशियन्स (इन्सानी गणितज्ञ संगठन) नाम से एक संस्था/समूह का जन्म भी होता है। इससे जुड़े गणितज्ञ संस्था के बारे में बतलाते हुए कहते हैं कि “इस संस्था का मुख्य उद्देश्य गणित व इसके साधकों को एआई कंपनियों के चंगुल से बचाना है। इन एआई कंपनियों के काम करने के तरीके ना केवल गणित, बल्कि पर्यावरण व वृहद समाज के लिए भी घातक हैं। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ज़रूरी है कि हम एआई माडलों के उपयोग में एक आलोचनात्मक नज़रिया अपनाएं; ना केवल शोध या उससे जुड़े कामों को करते हुए, बल्कि पढ़ने-पढ़ाने व उससे जुड़े कार्यकलापों में भी।”
एआई के दौर में पढ़ने-पढ़ाने के तरीकों पर विचार करने की ज़रूरत व ज़िम्मेदारी कई शिक्षण संस्थान महसूस भी कर रहे हैं। विश्व में तकनीकी ज्ञान सृजन व संचार के मामले में अग्रणी संस्थान MIT ने जनवरी 2026 में एक समिति का गठन किया था, जिसका उद्देश्य संस्थान में एआई के इस्तेमाल के संदर्भ में यह सुझाव देना था कि शिक्षण और मूल्यांकन को किस तरह बदला जाना चाहिए और उसके लिए संस्थागत नियम क्या होने चाहिए। इस समिति ने अपनी रपट अगस्त 2026 में सार्वजनिक कर दी है। एआई के प्रति इस रपट का नज़रिया एसोसिएशन ऑफ ह्यूमन मैथेमेटिशियन्स सरीखा तीखा तो नहीं है लेकिन समिति ने युवाओं पर हो रहे इसके असर और शिक्षकों व अन्य शैक्षणिक कर्मचारियों की ज़िम्मेदारियों की ओर इशारा करते हुए कहा है कि “ऐसा प्रतीत होता है कि एआई को तेज़ी से अपनाए जाने का प्रभाव पहले से ही विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है और इससे लंबे समय में नई चुनौतियां पैदा हो रही हैं। कुछ विद्यार्थी अपने शैक्षणिक कार्यों या भावनात्मक सहारे के लिए एआई पर निर्भर होते जा रहे हैं; उनमें अपने निर्णय और कार्य स्वयं करने की क्षमता, उद्देश्य-बोध और आत्मविश्वास की भावना कम हो रही है; और वे एआई से अत्यधिक प्रभावित दुनिया में अपने करियर की संभावनाओं को लेकर चिंतित हैं। शिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारियों को एआई से जुड़ी शैक्षणिक, सामाजिक और भावनात्मक चुनौतियों को पहचानने के लिए तैयार रहना चाहिए और विद्यार्थियों को आवश्यकता पड़ने पर उचित सहायता एवं सम्बंधित संसाधनों तक पहुंचने के लिए मार्गदर्शन देना चाहिए।”
यह रपट मानवता को केंद्र में रखकर तकनीक के इस्तेमाल की बात करती है। जिस तरह के बदलावों की अपेक्षा है उनकी ओर इशारा करते हुए कहा गया है कि एआई के इस दौर में “MIT में पढ़ाई जाने वाली अधिकांश कक्षाओं की सावधानीपूर्वक समीक्षा करनी होगी और कई मामलों में, उनमें पर्याप्त बदलाव भी करने होंगे, ताकि वे एआई के प्रभाव का सामना किसी गंभीर व्यवधान के बिना कर सकें। एआई उन शैक्षणिक मान्यताओं को चुनौती देगा, जिनके आधार पर पाठ्यक्रम की विषय-वस्तु, शिक्षण पद्धतियों और विद्यार्थियों के प्रदर्शन के आकलन के तरीकों का चुनाव किया गया है।”
संक्षेप में, अब समय आ गया है कि हम गहराई और व्यापकता के साथ इस बात पर विचार करें कि हम क्या पढ़ाते हैं और उसे कैसे पढ़ाते हैं। भविष्य की कक्षाओं की संरचना, मूल्यांकन पद्धतियां और नीतियां स्पष्ट उद्देश्य के साथ तैयार की जानी चाहिए। उन्हें केवल एआई की तत्काल वास्तविकताओं के जवाब में छोटे-मोटे बदलाव करके तैयार नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि हर पाठ्यक्रम में एक ही तरह के बदलाव करने होंगे।
कई अन्य देशों की तरह भारत में भी एआई की संभावनाओं को लेकर एक उत्साह का माहौल है। शिक्षा के क्षेत्र में भी इसे कई समस्याओं के समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है। उम्मीद है, नीति-निर्माता इस तकनीक के व्यापक असर से जुड़ी चिंताओं पर भी विचार कर रहे होंगे। दुनिया भर में लोग एआई व उसके प्रभावों को लेकर चिंतित हैं और उनकी चिंता बेवजह नहीं है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit: https://openai.com/index/navier-stokes-solution/
किसी भी देश में विज्ञान व तकनीकी का विकास केवल बड़ी व प्रतिष्ठित प्रयोगशालाओं में निर्धारित नहीं होता है, इसके साथ यह भी आवश्यक है कि आम लोगों में, जनसाधारण में जो वैज्ञानिक सोच व प्रतिभा छिपी है, उसे भलीभांति खिलने के अवसर मिलें व इसके आधार पर जनजीवन में सुधार के अवसर विकसित हों।
इस तरह ग्रासरूट पर विज्ञान व तकनीकी का जो विकास है, उसका एक बहुत उपयोगी उदाहरण हमारे देश में मंगल टर्बाइन के रूप में सामने आया है। किसानों का खर्च कम करने की बात हो, जीवाश्म ईंधन पर खेती की निर्भरता कम करके जलवायु परिवर्तन को थामने में योगदान की बात हो या गांवों की आत्म-निर्भरता बढ़ाने की महात्मा गांधी की सोच, सभी दृष्टियों से मंगल टर्बाइन बहुत उपयोगी है।
भारत सरकार के ग्रामीण विकास मंत्रालय द्वारा नियुक्त मैथानी समिति ने मंगल टर्बाइन के व्यापक प्रसार की सिफारिश की है। इसके बावजूद मंगल टर्बाइन का उचित प्रसार नहीं किया गया है। इसके आविष्कारक मंगल सिंह अब वृद्ध हो गए हैं, 79 वर्ष की आयु के हैं। अत: यह और ज़रूरी हो गया है कि अब उनकी सेवाओं का उचित उपयोग कर मंगल टर्बाइन के द्रुत प्रसार में और देरी न की जाए।
हमारे देश में लाखों किसान बहते नदी-नालों से अपने खेत की सिंचाई करने के लिए डीज़ल पंप से पानी उठाते हैं। अनेक गांवों में पेयजल के लिए या अन्य उपयोग के लिए भी इस तरह पानी उठाया जाता है। इस डीज़ल पर किसानों का बहुत पैसा खर्च होता है; प्रदूषण होता है, सो अलग। ललितपुर ज़िले (उत्तर प्रदेश) के एक किसान व ग्रामीण वैज्ञानिक मंगल सिंह ने किसानों की इस समस्या को समझा व मंगल टर्बाइन बना कर ऐसी व्यवस्था संभव की कि बिना डीज़ल व बिजली के ही पानी उठाकर प्यासे खेतों तक पहुंचाया जा सके।
अपने इस पेटेंट प्राप्त आविष्कार के बारे में मंगल सिंह स्वयं बताते हैं, “मंगल टर्बाइन गांव में ही बनने वाली एक ऐसी मशीन है, ऐसी ग्रामीण तकनीकी है, जो जलधारा के प्रवाह से चलती है। इसमें आवश्यकता के अनुरूप छोटा-बड़ा व्हील बनाते हैं और उसे एक गियर बॉक्स से जोड़ते हैं जो उसके चक्कर बढ़ा देता है। लिहाज़ा इंजन मोटर की भांति तेज़ स्पीड से चक्कर लगाने लगता है। गियर बॉक्स की आउटपुट शाफ्ट दोनों तरफ निकली होती है जिससे क्लॉकवाइज़ या एंटी-क्लॉकवाइज़ कोई एक या दोनों भी एक साथ पंप चला सकते हैं। गियर बाॅक्स की शाफ्ट के दूसरे सिरे पर घिरनी लगाकर कुट्टी मशीन, आटा चक्की, गन्ना पिराई या कोई भी अन्य कार्य कर सकते हैं या जनरेटर जोड़ कर बिजली बना सकते हैं। आम तौर पर ग्रामीण इलाकों में जहां किसान नदी-नालों से डीज़ल या बिजली पंपों से सिंचाई करते हैं वहां मंगल टर्बाइन द्वारा बिना इंजन, बिना मोटर, बिना डीज़ल, बिना बिजली के सिंचाई कर सकते हैं। पाइपों के द्वारा पानी कहीं भी ले जा सकते हैं। पीने के लिए भी पानी पंप कर सकते हैं।
मंगल टर्बाइन का उपयोग यदि उन सभी स्थानों पर किया जाए जो इसके अनुकूल हैं तो इससे सालाना करोड़ों लीटर डीज़ल की बचत हो सकती है, और किसान का खर्च भी बहुत कम हो सकता है। साथ ही ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन बहुत कम होगा।
मंगल टर्बाइन को सिंचाई व कुटीर उद्योगों के लिए वरदान बताते हुए आई.आई.टी. दिल्ली व विज्ञान शिक्षा केंद्र के एक अध्ययन में बताया गया है कि पूरी तकनीक ऐसी है जो गांव स्तर पर अपनाई जा सकती है व इससे गांवों में बड़े पैमाने पर रोज़गार सृजन भी होगा।
यदि एक मंगल टर्बाइन दिन में 11 घंटे चले तो (25 एच.पी. डीज़ल पंप की 4 लीटर प्रति घंटे की खपत के आधार पर) दिन में 44 लीटर डीज़ल की बचत हो सकती है। यदि वर्ष में 190 दिन सिंचाई हो तो एक मंगल टर्बाइन से वर्ष में 8360 लीटर डीज़ल की बचत होती है। यदि एक मंगल टर्बाइन 15 वर्ष तक कार्य करे तो अपने जीवन काल में एक मंगल टर्बाइन से 1,25,400 लीटर डीज़ल की बचत होती है। डॉ. जय शंकर सिंह के अनुमान के अनुसार यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग 335 टन कमी के बराबर है।
ग्रीनहाऊस गैस के उत्सर्जन में कमी विश्व का पर्यावरण बचाने के लिए तो ज़रूरी है ही, साथ ही इसमें उल्लेखनीय सफलता प्राप्त करने पर देश अधिक अंतर्राष्ट्रीय सहायता का हकदार भी बनता है। इस तरह मंगल टर्बाइन के सभी उचित व अनुकूल स्थानों पर विभिन्न सावधानियों के साथ उपयोग होने से किसानों, सरकार, पर्यावरण सभी का लाभ है।
देश के अनेक जाने-माने विशेषज्ञों व अघिकारियों ने मौके पर जाकर मंगल टर्बाइन का अध्ययन किया है और इस आविष्कार की प्रशंसा करते हुए इसकी व्यापक संभावनाओं की ओर ध्यान दिलाया है। मध्यप्रदेश सरकार के पूर्व प्रमुख सचिव बी. के. साहा ने लिखा है कि स्टॉप डैम के खर्च को जोड़ लिया जाए तो भी मंगल टर्बाइन की व्यवस्था छोटी नदियों से जल उठाने की अन्य व्यवस्थाओं से कहीं अधिक सस्ती है। मंगल टर्बाइन से डीज़ल व बिजली की बचत होती है तथा यह पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के पूर्व उप महानिदेशक डॉ. टी. पी. ओझा ने लिखा है कि मंगल टर्बाइन में बड़ी संभावनाएं निहित हैं। भारत सरकार में ग्रामीण विकास विभाग के पूर्व सचिव बी. के. सिन्हा ने कई बार मंगल टर्बाइन व इसके आविष्कारक की प्रशंसा करते हुए राष्ट्रीय हित में इन्हें प्रोत्साहित करने को कहा है। राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अनेक जाने-माने विद्वानों व संस्थानों ने मंगल टर्बाइन की उपयोगिता व संभावनाओं को स्वीकार किया है। इसके बावजूद इसका उचित प्रचार नहीं हो सका। दरअसल, सरकार को मंगल सिंह जैसे प्रतिभाशाली वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करना चाहिए एवं अनुकूल अवसर देना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit: https://ruralindiaonline.org/article/%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%B2-%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E
कृत्रिम बुद्धि यानी एआई आजकल बहुत प्रचलित लफ्ज़ बन गया है। इसका मतलब यह माना जाने लगा है कि मशीनें सोचने-विचारने, विश्लेषण करने, निष्कर्ष निकालने वगैरह सारे काम कर डालेंगी। और कई कंपनियां एआई के क्षेत्र में बढ़-चढ़कर निवेश कर रही हैं। इसी प्रवृत्ति के मद्देनज़र नेचर पत्रिका ने अपने पाठकों का एक सर्वेक्षण किया था कि वे अपने काम के कौन-से हिस्से एआई को सौंप देंगे और कौन-से हिस्से अपने हाथों में ही रखना चाहेंगे। कुछ पाठकों की प्रतिक्रियाएं देखने से लगता है कि अनुसंधान में लगे अधिकांश लोग अपने काम का आनंद अपने पास ही सुरक्षित रखना चाहेंगे। इनमें से कुछ प्रतिक्रियाएं देखिए।
इस्तांबुल (तुर्की) के मुलेक ओज़्कामेक (Müleyke Özçakmak) का कहना था कि वे एआई और चेतना के क्षेत्र में अनुसंधान करते हैं और उनके विचार से सबसे रोमांचक हिस्सा है जिज्ञासु रहना, अनपेक्षित कड़ियां देखना और मौजूदा मान्यताओं को चुनौती देना। ऐसे क्षण प्राय: मार्गदर्शक के साथ बातचीत, सहकर्मियों के साथ चर्चाओं और खुद मनन करने से आते हैं, न कि किसी एल्गोरिद्म से।
मेक्सिको सिटी (मेक्सिको) के एल्वा एस्कोबार (Elva Escobar) गहरे समुद्र के शोधकर्ता हैं। उनके विचार से खोज का रोमांच और प्रयोग डिज़ाइन करने की सृजनात्मकता को एआई के सुपुर्द करना मुश्किल होगा। बातचीत के लिए गहरे समुद्र से एक निजी जुड़ाव होना ज़रूरी है। इसके अलावा उनका कहना है कि विज्ञान में उनकी एक नैतिक जवाबदेही भी है।
मेनचेस्टर (यूके) की ल्यूसी न्जोकी न्जुकी (Lucy Njoki Njuki) जैव-सांख्यिकी (बायो-स्टेटिस्टिक्स) में प्रशिक्षित हैं और उन्हें गड्ड-मड्ड आंकड़ों के साथ काम करना और उन्हें साफ-सुथरे ढंग से प्रस्तुत करना इतना आनंददायक लगता है कि यह काम वे खुद करना चाहेंगी।
पीटरमार्टिज़बर्ग (दक्षिण अफ्रीका) के रिचर्ड कुंज़ (Richard Kunz) कहते हैं कि हालांकि कोड लिखने में एआई की कुशलता मुझमें ईर्ष्या पैदा करती है, लेकिन फिर भी मैं खुद कोड लिखना पसंद करता हूं। मुझे अपने काम के इस हिस्से से प्रेम है। वैसे भी एआई द्वारा लिखित कोड मुश्किल होते हैं और उन्हें डीबग करने (यानी गलत अंशों को सुधारने) में बहुत वक्त ज़ाया होता है।
हॉन्गकॉन्ग के शेंग बाओ (Sheng Bao) कहते हैं कि वैज्ञानिक प्रगति सिर्फ उत्तर पा लेने का नाम नहीं है। इसमें दृष्टिकोणों का आदान-प्रदान, मान्यताओं को चुनौती देना, और वार्तालाप के ज़रिए विचारों/धारणाओं का विकास करना भी शामिल है। कई सारे उम्दा अनुसंधान विचार नाहक चर्चाओं से उभरते हैं।
पोर्टो एलेग्रे (ब्राज़ील) के एनरिके फाल्सेटो डी बोरोस (Enrique Falceto De Barros) का मत है कि एक डॉक्टर और स्वास्थ्य सम्बंधी शोधकर्ता होने के नाते वे मरीज़ के हित को सबसे ऊपर रखते हैं। लिहाज़ा, यदि एआई कोई काम उनसे बेहतर कर सकता है, तो उस काम में उसे उनका स्थान ले लेना चाहिए। यह विचार डरावना है लेकिन उन्हें उम्मीद है कि एआई उनकी भूमिका को सुदृढ़ करेगा, उनका स्थान नहीं लेगा। वह दूसरों की देखभाल करने की उनकी चाहत, उनके मानवीय स्पर्श, जिज्ञासा-प्रेरित अनुसंधान की जगह नहीं लेगा। वह अन्य लोगों के साथ जुड़कर सृजन करने के आनंद और स्वास्थ्य-समता में सुधार की नैतिक ज़रूरत को भी समाप्त नहीं करेगा।
फोर्ट कोलिन्स (कोलेरेडो) की एना हॉडशायर (Anna Hodshire) का मत है कि वे नहीं चाहेंगी उनका लेखन और समीक्षा का कार्य कोई चैटबॉट छीन ले। लिखने से उन्हें वे पहलू पकड़ में आते हैं जो वे अन्यथा नहीं समझतीं। अन्य लोगों के काम की समीक्षा से उन्हें आलोचनात्मक सोच में मदद मिलती है। उनका तो यहां तक कहना है कि उबाऊ इमेल लिखते हुए भी उन्हें संवाद के अपने हुनर को तराशने में मदद मिलती है।
बेजिंग (चीन) के लिआओ मेंगचाओ (Liao Mengchao) का कहना है कि वे प्रारंभिक डैटा संग्रह, वास्तविक स्थल पर अवलोकन करने और रूबरू साक्षात्कार खुद करने को तरजीह देते हैं। इसमें गहरे सवालों वाली प्रश्नावलियों और मैदानी सर्वेक्षण करना तथा चिकित्सा उपचार पा रहे लोगों से बातचीत करना शामिल होता है। इन कामों के लिए हमदर्दी, लचीलापन, तत्काल रिस्पॉन्स और आमने-सामने की चर्चाएं शामिल हैं। एआई प्रत्यक्ष जानकारी जुटाने के लिए वास्तविक दुनिया के परिदृश्यों तक पहुंच नहीं बना सकता। लिहाज़ा, वे इस काम को एल्गोरिद्म के भरोसे कदापि नहीं छोड़ना चाहेंगे।
हैनोवर (जर्मनी) के फ्रांज़िस्का मुलर (Franziska Müller) कहते हैं कि वे प्रस्तुतीकरण के लिए रेखाचित्र बनाना या पोस्टर, प्रकाशन की रचना करना एआई के सुपुर्द नहीं करेंगे। किसी डिज़ाइन के घटकों का मिलान करना या उन्हें किसी तस्वीर में सही तरह से जोड़ना, ताकि एक बेतरतीबी में तरतीब पैदा हो जाए, और एक कहानी सुनाना अपने आप में बहुत संतोषप्रद होता है।
तालसेरी (भारत) की अदिति अनिल (Adithi Anil) संज्ञान मनोविज्ञान में पीएच.डी. कर रही हैं। यह विषय इंसानों से, उनके दिमागों से और इस बात से ताल्लुक रखता है कि वे अपने पर्यावरण से कैसे अंतर्क्रिया करते हैं। हो सकता है कि एआई के साधन कोडिंग, प्रयोग की डिज़ाइन और आंकड़ों के विश्लेषण को तेज़ कर दें, लेकिन जोखिम यह रहेगा कि हम दिमाग और व्यवहार के उस अनोखे झरोखे को गंवा दें, जो एक इंसानी शोधकर्ता के साथ आते हैं।
नेशविले, टेनेसी की एलेना इवान्स (Elena Evans) को लगता है कि विज्ञान को व्यापक श्रोताओं तक ले जाना इंसानों पर छोड़ दिया जाना चाहिए। उन्हें पेचीदा विषयों को लोगों तक सृजनात्मक ढंग से संप्रेषित करने में आनंद मिलता है और वे यह काम एआई को सौंपना नहीं चाहेंगी।
रिगा (लाटविया) की एग्नेस उसाका (Agnese Ušacka) आंकड़ों का विश्लेषण छोड़ना नहीं चाहेंगी। वे कहती हैं कि ज़रा उस रोमांच की कल्पना कीजिए जो महीनों या बरसों तक आंकड़े जुटाने के बाद तब मिलता है जब पता चलता है कि वे आंकड़े आपकी परिकल्पना की पुष्टि करते हैं। वे मानती हैं पूरी प्रक्रिया के इस सबसे मज़ेदार हिस्से को एआई को सौंप देना नासमझी होगी। (स्रोत फीचर्स)
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आम तौर पर माना जाता था कि शराब या अन्य मादक पदार्थों का इस्तेमाल तकरीबन 13,000 साल पहले खेती के विकास के साथ शुरू हुआ। लेकिन हाल ही में हुए एक शोध से मनुष्य और नशीले पदार्थों के इस नाते के इससे भी पहले के सबूत मिले हैं। साइंस एडवांसेज़ में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार एक इंडोनेशियाई द्वीप से सुपारी सेवन के ऐतिहासिक अवशेष मिले हैं।
आस्ट्रेलिया की ग्रिफिथ युनिवर्सिटी के शोधकर्ता सुलावेसी द्वीप की अलग-अलग गुफाओं से मिले दो खानाबदोश मानव कंकालों का अध्ययन कर रहे थे। इनमें से एक अवशेष लगभग 7000 साल पुराना था, जबकि दूसरा करीब 16 से 25 हज़ार साल पुराना था। अध्ययन के दौरान दोनों कंकालों की दाढ़ में कुछ असामान्य, गोल और गहरे गड्ढे दिखाई पड़े। दाढ़ इतनी बुरी तरह घिस चुकी थीं कि दंत-मज्जा दिखने लगी थी। वैज्ञानिकों के लिए इस पहेली के नतीजे हैरतअंगेज़ थे।
जब दांतों के ऊतकों का रासायनिक विश्लेषण किया गया तो उनमें एरेकोलाइन नामक रसायन के अवशेष मिले। एरेकोलाइन मन-मस्तिष्क को प्रभावित करने वाला एक प्राकृतिक ‘साइकोऐक्टिव’ पदार्थ है। यह सुपारी में पाया जाने वाला मुख्य उत्तेजक और सक्रिय एल्केलॉइड है, जो केंद्रीय तंत्रिका तंत्र को प्रभावित करता है।
सुपारी (Areca catechu, अरेका पाम के फल का बीज) मुख्य रूप से दक्षिण और दक्षिणपूर्वी एशिया में पाई जाती है। सुपारी चबाने से एल्केलॉइड अवशोषित होता है, जिससे व्यक्ति सचेत, ताज़ा या हल्का उत्साह महसूस करता है।
अध्ययन के दौरान पाया गया कि ये प्राचीन मनुष्य सुपारी को लंबे समय तक दांतों के बीच दबाए रखा करते थे। प्राकृतिक तौर पर सुपारी काफी सख्त और खुरदरी होती है, जिससे दांतों की ऊपरी परत (इनेमल) घिसती गई। इसलिए लगातार सुपारी चबाने से दाढ़ों में गहरे गड्ढे बन गए।
शोधकर्ताओं का अनुमान है कि इन प्राचीन मनुष्यों ने शायद शुरुआती तौर पर दांत के दर्द निवारण या मुंह में सुन्न-पन महसूस करने के लिए सुपारी चबाना शुरू किया होगा। लेकिन सुपारी के ज़रूरत से ज़्यादा सेवन और इसके खुरदरेपन ने इनके दांतों को इतना नुकसान पहुंचाया कि दर्द कम होने के बजाय बढ़ गया। नतीजतन, बढ़ते दर्द से राहत पाने के लिए इन्होंने और अधिक सुपारी चबाना शुरू कर दिया। इस तरह वे एक लगातार चलने वाले राहत और दर्द के चक्र में फंस गए।
हालांकि, खुराक के मुताबिक सुपारी के सकारात्मक (जैसे सतर्कता, एकाग्रता, चिंता में कमी) और नकारात्मक (अत्यधिक लार आना, धीमी हृदय गति, कंपन, आंखों की पुतलियों का सिकुड़ना) दोनों तरह के प्रभाव हैं। इसका सेवन बंद करने पर तलब, बेचैनी जैसे लक्षण भी होते हैं। पारंपरिक तौर पर सुपारी का इस्तेमाल कई सभ्यताओं (खासकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र) में होता है। लेकिन इस शोध से यह साबित हुआ है कि यह परंपरा हज़ारों साल पुरानी है। अलबत्ता, मनुष्यों में यह वनस्पति आधारित नशे का सबसे प्राचीन सबूत है। (स्रोत फीचर्स)
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लीप ईयर, अधिक मास वगैरह के बारे में सुनते रहते हैं। यह भी स्पष्ट है कि ऐसी व्यवस्थाएं सूर्य-चंद्रमा की आभासी गति और समय मापन की अपनी प्रणाली के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए ज़रूरी होती हैं। लेकिन आजकल के उपकरणों/यंत्रों का कामकाज समय के अत्यंत सटीक मापन पर टिका होता है। इसके लिए 1963 में परमाणु घड़ियों (atomic clock) पर आधारित समय मापन को मानक निर्धारित किया गया था। लेकिन…
हमें इस समय मानक का तालमेल पृथ्वी की गति से बनाकर रखना ज़रूरी होता है। जब यह समय मानक (समन्वित सार्वभौमिक समय – UTC) निर्धारित किया गया, उसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति धीमी पड़ती गई। परमाणु घड़ियां तो अपनी रफ्तार से चलती रहीं और पृथ्वी की गति से निर्धारित दिवस और परमाणु घड़ी से निर्धारित दिवस की अवधि में अंतर आने लगा। इनका तालमेल बनाए रखने के लिए सबसे पहले 1972 में अंतर्राष्ट्रीय भार व माप ब्यूरो (BIPM) ने UTC में एक सेकंड जोड़ा था। इसे लीप सेकंड (leap second) कहते हैं। एक बार फिर, लेकिन…
यह जुगाड़ प्राय: समस्यामूलक रहा है। लीप सेकंड जोड़ने से कंप्यूटर प्रणालियों पर काफी असर होता है क्योंकि यहां संदेश भेजने और प्राप्त करने का समय एकदम सटीक होना ज़रूरी है। लीप सेकंड जोड़ने के कई असर देखे गए हैं।
1972 से शुरू करके अब तक 27 लीप सेकंड जोड़े जा चुके हैं। अंतिम लीप सेकंड 2016 में जोड़ा गया था। इसके बाद पृथ्वी की घूर्णन गति एक बार फिर रफ्तार पकड़ने लगी है। इसके चलते 2016 के बाद लीप सेकंड नहीं जोड़ा गया है। और, अब पता चला है कि पृथ्वी की घूर्णन गति (earth’s rotation) में वृद्धि काफी तेज़ रही है। बात यहां तक पहुंची है कि दुनिया के समयपाल (timekeepers) ऋणात्मक लीप सेकंड जोड़ने पर विचार करने लगे हैं। पता नहीं, ऐसा करने के क्या असर होंगे।
दरअसल, हर चार वर्षों में भार और माप के आम सम्मेलन में दुनिया भर के समयपाल जुटकर UTC पर विचार करते हैं। 2022 में 64 सदस्य राष्ट्र इस बात पर सहमत हो गए थे कि UTC और पृथ्वी की स्थिति के बीच जो अंतर आ रहा है, उसे 2035 तक 1 सेकंड से ज़्यादा होने तक चलने दिया जाए।
अलबत्ता, ताज़ा अनुमान बताते हैं कि ऋणात्मक लीप सेकंड की ज़रूरत शायद 2035 से पहले ही पड़ने वाली है। 2026 का अंतर्राष्ट्रीय भार और माप सम्मेलन अक्टूबर में प्रस्तावित है। यहां संभवत: लीप सेकंड की बजाय लीप घंटे (leap hour) की बात उठेगी क्योंकि कई विशेषज्ञों का मत है कि लीप घंटा जोड़ने की ज़रूरत शायद सैकड़ों वर्षों में एक बार पड़ेगी। कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि निर्णय जल्दी करना होगा क्योंकि यदि और इन्तज़ार किया तो मुमकिन है कि 2035 में ऋणात्मक लीप सेकंड (neagtive leap second) जोड़ना ही पड़े। (स्रोत फीचर्स)