जन-आंदोलन के रूप में स्वास्थ्य सेवा: शहीद अस्पताल

रोहित एम.

लौह अयस्क (iron ore mining) की लाल धूल से ढंकी हुई दल्ली राजहरा (Dalli Rajhara, Chhattisgarh) की सड़कों को देखकर ऐसा लगता है जैसे समय कहीं ठहर सा गया हो। इस छोटे से शहर में रहने और सांस लेने के कुछ ही पलों बाद एक अजीब से विलगाव का एहसास होना तय है।

इसमें जब उस मज़दूर आंदोलन (labor movement history), जिसने लगभग आधी सदी से इस शहर को आकार दिया है, की कहानी जुड़ जाती है तो दंतकथा बनना तय है। इस इतिहास का जीता-जागता साक्षी है शहीद अस्पताल (Shaheed Hospital model)। यह अस्पताल, जिसे मज़दूरों ने मज़दूरों के लिए बनाया था, जिसकी एक-एक ईंट मज़दूरों के योगदान से आई थी, एक असाधारण दौर की याद दिलाता है।

अस्पताल की पुरानी इमारत के प्रवेश द्वार पर लगी शिला-स्मारिका (memorial plaque) – जो 3 जून, 1983 को शहीद अस्पताल के उद्घाटन की याद दिलाती है – पर दो नाम खुदे हुए हैं: लहर सिंह (खदान मज़दूर) और हलालखोर (किसान और अर्रेझर गांव के बड़े-बुज़ुर्ग)। ये वे लोग थे जिन्होंने इस अस्पताल का उद्घाटन किया था।

दल्ली और राजहरा, भिलाई स्टील प्लांट (Bhilai Steel Plant – बीएसपी) के स्वामित्व वाली दो लौह अयस्क खदान इकाइयां हैं, जिनके नाम पर इस शहर का नाम ‘दल्ली राजहरा’ पड़ा है। यह बालोद ज़िले में स्थित एक छोटा सा कस्बा है, जो भिलाई से लगभग 90 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी लगभग 44,000 है।

शहीद अस्पताल में 100 से 150 किलोमीटर दूर तक के कस्बों और गांवों से लोग इलाज के लिए आते हैं। मंगलवार को छोड़कर, सप्ताह के बाकी सभी दिन अस्पताल की ‘बाह्य-रोगी’ (OPD) इमारत और रिसेप्शन लॉबी में खूब आवक-जावक रहती है। शहर से सटी हुई लौह अयस्क की खदानें — जिनका इतिहास इस जगह से गहराई से जुड़ा हुआ है — मंगलवार को बंद रहती हैं। इसी वजह से, शहीद अस्पताल में भी मंगलवार को सीमित सेवाएं ही उपलब्ध रहती हैं।

एक आम दिन में शहीद अस्पताल की लॉबी राजनांदगांव, रायपुर, बालोद, कांकेर, चरामा और अन्य जगहों से आए मज़दूरों, किसानों और छोटे-मोटे दुकानदारों (working class patients) से खचाखच भरी रहती है, जो अपने रजिस्ट्रेशन का इंतज़ार कर रहे होते हैं।

बाहर से देखने पर, शहीद अस्पताल नई और पुरानी इमारतों का एक मिला-जुला रूप लगता है, जिसमें घुमावदार सीढ़ियां, एक विशाल प्रतीक्षालय और अलग-अलग हिस्सों की ओर जाने वाले गलियारे हैं। अस्पताल का स्टाफ पूरी लगन से विभिन्न वार्डों में घूमता रहता है और बीमारों की देखभाल करता है। बाहरी दिखावों से परे, अस्पताल का इतिहास मुख्यत: बातों के ज़रिए ही फैलता जाता है, जिनमें संघर्षों (workers struggle) की यादें गुंथी होती हैं।

कहानियां मुंह-ज़ुबानी एक से दूसरे इंसान तक पहुंचती हैं — जैसे, छत के बहुत जल्दी बन जाने की कहानी, जिसको बनाने में दस हज़ार खदान मज़दूरों (mine workers protest) ने अपना काम रोककर योगदान दिया था; या फिर वह कहानी जिसमें अस्पताल को बिजली देने से मना कर दिया गया था, जिसके बाद खदानों के हर क्षेत्र के मज़दूरों ने मिलकर विरोध प्रदर्शन (workers protest movement) किया था। ये घटनाएं अस्पताल के स्टाफ और स्थानीय समुदाय की यादों में हमेशा-हमेशा के लिए रच-बस गई हैं।

मज़दूरों के ऐतिहासिक संघर्षों (trade union history) से निकले कई मूल्य शहीद अस्पताल के रोज़मर्रा के कामकाज में साफ झलकते हैं। अस्पताल का संचालन समितियों और एक मज़बूत आंतरिक लोकतंत्र प्रणाली (internal democracy system) के ज़रिए किया जाता है। नर्सें, सफाईकर्मी, डॉक्टर और अन्य स्टाफ अलग-अलग प्रशासनिक मामलों पर फैसले लेने में बराबर की हिस्सेदारी निभाते हैं।

बैठकों में वेतन, काम के घंटे, कार्यस्थल से जुड़े मुद्दे और अस्पताल के भावी कार्यों (organizational decisions) जैसे विषयों पर चर्चा की जाती है। “यहां कुछ ज़्यादा ही लोकतंत्र है”, ऐसी काना-फूसी अक्सर मैंने सुनी है; लोगों का कहना है कि निर्णय प्रक्रिया बहुत ज़्यादा थकाऊ और लंबी-लंबी बहसों (democratic process challenges) वाली होती है। हालांकि, आंतरिक लोकतंत्र के प्रति शहीद अस्पताल की प्रतिबद्धता पूरी तरह से अडिग है।

जग्गू राम साहू – जिन्हें प्यार से ‘जग्गू दादा’ कहते हैं — 70 वर्षीय रिटायर्ड खदान मज़दूर (retired mine worker) हैं जो अक्सर अस्पताल में अपनी साधारण-सी गुलाबी शर्ट पहने हुए दिखते हैं और मरीज़ों व स्टाफ, दोनों का ही बड़े प्यार से अभिवादन करते हैं। अब वे पूर्णकालिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (community health worker) के तौर पर काम करते हैं। एक बार मैंने उनसे अस्पताल के इतिहास के बारे में पूछा। उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया; वे कुर्सी की छोर पर बैठ गए और उन्होंने मुझे ‘लाल मैदान’ (Red Maidan protest) में हुई उस ऐतिहासिक बैठक के बारे में विस्तार से बताया।

खदानों में ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों (contract labor issues) में लंबे समय से जो अलगाव की भावना पनप रही थी, वह 1977 के ‘लाल मैदान’ विरोध प्रदर्शन (1977 labor protest)  के रूप में सामने आई। इमर्जेंसी हटे अभी ज़्यादा समय नहीं गुज़रा था, और हवा में संघर्ष करने तथा मज़दूरों के जायज़ अधिकारों को वापस दिलाने का जोश भरा हुआ था। जग्गू दादा याद करते हुए बताते हैं, “उन दिनों जो मज़दूर पक्की नौकरी पर नहीं थे उन्हें महीने के 70 रुपए मिलते थे, जबकि पक्की नौकरी वाले मज़दूरों की तनख्वाह 300 रुपए थी। दरअसल, दोनों तरह के मज़दूर एक ही तरह का काम कर रहे थे।”

जग्गू दादा जब लाल मैदान विरोध प्रदर्शन (labor union protest) के उन जोशीले दिनों के बारे में बात करते हैं, तो उनकी आंखों में एक चमक दिखाई देती है। उन्हें याद है कि हज़ारों ठेका मज़दूर कई दिनों तक वहीं जमे रहे; वे नाचते-गाते थे और आपस में संगठित होने तथा यूनियन बनाने के बारे में चर्चा करते थे। वे बोनस, साइट पर जबरन खाली बैठाने के बदले मुआवज़ा और बारिश के पहले अपनी कच्ची झोपड़ियों की मरम्मत (labor welfare demands) के लिए भत्ते की मांग कर रहे थे।

लाल मैदान का यह विरोध प्रदर्शन आगे चलकर ‘छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ’ (CMSS) में बदल गया। यह एक ऐसा मज़दूर संगठन था जिसने शंकर गुहा नियोगी को अपना नेता चुना, जो कि उस समय यूनियन संगठक और आंदोलनकर्ता के तौर पर जानी जाने वाली शख्सियत थे। जब मैंने जग्गू दादा से पूछा कि उन्हें शंकर गुहा नियोगी के बारे में कैसे पता चला और यह फैसला उन्होंने कैसे किया कि वही उनके नेता होंगे, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “आपको नेल्सन मंडेला (Nelson Mandela inspiration) के बारे में कैसे पता चला और आपने उनका सम्मान करने का फैसला कैसे किया? ठीक उसी तरह, हमें भी उस समय तक नियोगी जी के बारे में पता चल चुका था और हमने उन्हें अपना नेता चुन लिया।”

अधिकारों के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ता और शिक्षाविद इलीना सेन, जो दल्ली राजहरा के ट्रेड यूनियन आंदोलन से काफी करीब से जुड़ी हुई थीं, अपनी संस्मरण किताब इनसाइड छत्तीसगढ़ – ए पॉलिटिकल मेमॉयर (Inside Chhattisgarh – A Political Memoir) में लिखती हैं: “1977 में जब नई यूनियन बनी, उसके कुछ ही समय बाद उसके नेताओं ने पास की दानीटोला खदानों का दौरा किया। वहां शंकर गुहा नियोगी अपने ससुराल में अपना स्वास्थ्य संभाल रहे थे। वे आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम (मीसा – MISA Act India) जैसे सख्त और भयावह कानून के तहत हिरासत से रिहा हुए थे और वहां ठीक हो रहे थे।” यहीं पर यूनियन नेताओं ने, जो कि नियोगी के काम और विचारों से अच्छी तरह वाकिफ थे, उनसे मज़दूर आंदोलन के बौद्धिक और संगठनात्मक विकास (labor movement leadership) की बागडोर संभालने की गुज़ारिश की।

यह आंदोलन जग्गू दादा जैसे कई लोगों के लिए ज़िंदगी बदलने वाला अनुभव (social movement impact) साबित हुआ। लोगों की मदद करने की अपनी दिली चाहत की वजह से उनका झुकाव ‘स्वास्थ्य विभाग’ की ओर हुआ। स्वास्थ्य विभाग मज़दूर संगठन द्वारा बनाए गए 17 विभागों में से एक था। ‘शहीद अस्पताल’ इसी स्वास्थ्य विभाग की एक पहल थी। इस अस्पताल का नाम उन 11 खदान मज़दूरों की शहादत (martyrs memorial) की याद में रखा गया था, जो 1977 में हुई पुलिस फायरिंग में मारे गए थे। यह घटना ऐतिहासिक ‘लाल मैदान’ सभा के बाद हुई थी।

जग्गू दादा ने 1981 में एक ‘स्वयंसेवी स्वास्थ्य कार्यकर्ता’ (volunteer health worker) के तौर पर अपने काम की शुरुआत की थी। उस समय, ट्रेड यूनियन दफ़्तर के परिसर में बनी एक कच्ची झोपड़ी (गैराज) में ही एक अस्थायी क्लीनिक चलाया जाता था। 2012 में अपनी सेवानिवृत्ति तक वे दिन के समय खदानों में काम करते, और साथ ही एक स्वयंसेवी स्वास्थ्य कार्यकर्ता के तौर पर भी अपनी सेवाएं देते रहे — यह एक ऐसा काम था जिसके प्रति उनके मन में गहरा जुनून था। सेवानिवृत्ति के बाद, वे एक ‘पूर्णकालिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता’ बन गए। उन्होंने शहीद अस्पताल की स्वास्थ्य टीमों के साथ मिलकर भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal gas tragedy relief) और 1993 के लातूर भूकंप (Latur earthquake relief) जैसी आपदाओं के दौरान राहत कार्यों में हिस्सा लेने के लिए काम से लंबी-लंबी छुट्टियां भी लीं – इस कारण उनके वरिष्ठ अधिकारियों की त्यौरियां भी चढ़ गईं।

जग्गू दादा के लिए, सामाजिक सक्रियता (एक्टिविज़्म-activism) और स्वास्थ्य सेवा का काम आपस में गहराई से जुड़ा हुआ है। जब मैंने उनसे शंकर गुहा नियोगी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत ‘संघर्ष और निर्माण’ (struggle and development concept) के बारे में पूछा, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “हम अपने पेट की खातिर संघर्ष करते हैं, और समाज की सेवा के लिए अस्पताल में काम करते हैं।”

शहीद अस्पताल के वरिष्ठ सदस्यों से जग्गू दादा जैसी कहानियां अक्सर सुनने को मिलती रहती हैं।

कुलेश्वरी दीदी यानी कुलेश्वरी सोनवानी, जो इस समय अस्पताल की सबसे वरिष्ठ नर्स हैं, ने मुझे अपनी कहानी सुनाई, “शहीद अस्पताल के बिना मेरी अपनी कोई पहचान ही नहीं है।” वे उन चुनिंदा नर्सों में से हैं, जो उस शुरुआती दौर से ही अस्पताल के साथ जुड़ी रही हैं, जब यह ट्रेड यूनियन दफ्तर के गैराज में चलने वाला एक अस्थायी क्लीनिक हुआ करता था।

जब मैंने उनसे पूछा कि आज जो भव्य शहीद अस्पताल हमारे सामने खड़ा है, उसकी नींव कैसे रखी गई, तो उन्होंने मुझे कुसुम बाई (maternal death case) की कहानी सुनाई। उन्होंने बताया, “कुसुम बाई मज़दूर नेताओं में से एक थीं। मेडिकल सुविधाओं की कमी के चलते प्रसव के दौरान उनकी मौत हो गई। दल्ली राजहरा में बीएसपी के स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टरों ने उन्हें भर्ती करने से मना कर दिया था, क्योंकि उनके पास हेल्थ कार्ड (health access issue) नहीं था। कुसुम बाई की शोक सभा में मज़दूरों ने फैसला किया कि वे अपने और ऐसी ही मुश्किलों का सामना कर रहे अपने जैसे अन्य लोगों के लिए एक अस्पताल बनाएंगे।”

जब तक शहीद अस्पताल नहीं बना था, तब तक दल्ली राजहरा में ठेके पर काम करने वाले खदान मज़दूरों (contract workers healthcare) के लिए स्वास्थ्य सेवाएं लगभग न के बराबर थीं। उन्हें नियमित मज़दूरों की तरह कोई सुविधाएं या अधिकार नहीं मिलते थे। मज़दूरों के अपने अस्पताल बनाने के पक्के इरादे को कई युवा डॉक्टरों का साथ मिला – जैसे, बिनायक सेन (Binayak Sen), आशीष कुंडू, पवित्र गुहा, सैबल जाना, पुण्यब्रत गुन वगैरह। इन डॉक्टरों ने मज़दूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनके इस सामूहिक सपने को पूरा करने में मदद की।

69 साल की अनुभवी कार्यकर्ता कुलेश्वरी दीदी को अपनी ज़िंदगी के सफर में कई निजी मुश्किलों (domestic violence) का सामना करना पड़ा। उनके पति बिल्कुल नहीं चाहते थे कि वे शहीद अस्पताल में काम करें। उन्होंने मुझे बताया कि उस ज़माने में जो औरतें काम के लिए घर से बाहर निकलती थीं उन्हें ‘चरित्रहीन’ (women stigma) कहा जाता था। अपने पति के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, “उन्हें शराब की बहुत बुरी लत थी। वे देर रात घर लौटते थे और मुझे मारते-पीटते थे।” शक की वज़ह से कभी-कभी वे कुलेश्वरी दीदी की रात की ड्यूटी के वक्त अस्पताल में ही सोते थे। कई बार उन्होंने अपने घर के हिंसक माहौल से भागकर अस्पताल में ही पनाह ली। उनके पति शराब पर ही सारा पैसा उड़ा देते थे। उनके पति द्वारा नशे में की गई हिंसा आज भी उनकी यादों में ताज़ा है। वे बताती हैं, “उन दिनों के बारे में सोचते ही मैं सिहर उठती हूं।”

उस मुश्किल दौर में जब उनके परिवार ने उनका साथ छोड़ दिया था और कोई भी उनके साथ खड़ा नहीं था, तब अस्पताल के डॉक्टरों और कर्मचारियों ने ही हर तरह से उनकी मदद (support system) की थी। “मुझे नहीं लगता कि इस अस्पताल के बिना मैं इतने लंबे समय तक ज़िंदा रह पाती।” यह कहते हुए उनकी आंखे भर आईं थीं। उनके दो बेटे और एक बेटी थी। उनके एक बेटे ने आत्महत्या कर ली थी। जैसे-जैसे समय बीतता गया और कुलेश्वरी दीदी के बच्चे बड़े होते गए, घर में उनकी स्थिति और मज़बूत होती गई।

मिट्टी की एक छोटी-सी झोपड़ी में शुरू हुआ छोटा-सा दवाखाना (small clinic beginning) चार दशकों का सफर तय कर आज एक विशाल और शानदार अस्पताल (modern hospital setup) बन चुका है। हालांकि, शहीद अस्पताल के शुरुआती साल चुनौतियों से भरे थे। सुजाता दीदी, वे भी अनुभवी नर्स हैं और हाल ही में रिटायर हुई हैं, ने अस्पताल के शुरुआती दिनों की बहुत ही छोटी-छोटी बातें बताईं।

उस समय, पेशेवर स्टाफ को रखने के लिए बहुत कम पैसे (low funding healthcare) थे। स्वास्थ्य कार्यों में रुचि रखने वाले लोगों को अस्पताल चलाने के लिए स्वयंसेवक के तौर पर भर्ती किया गया। अपने संस्मरण में इलीना सेन लिखती हैं कि कैसे डेविड वर्नर (David Werner book) की किताब ‘जहां डॉक्टर न हो (व्हेयर देयर इज़ नो डॉक्टरWhere There Is No Doctor) स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए एक बुनियादी किताब बन गई थी। चूंकि कई कार्यकर्ताओं की औपचारिक शिक्षा सीमित थी, इसलिए जानकारी देने के लिए चर्चाओं और चित्रों का इस्तेमाल किया जाता था, साथ ही डॉक्टरों के साथ सैद्धांतिक और प्रैक्टिकल कक्षाएं भी होती थीं।

इसी तरह, एक ट्रेड-यूनियन बैठक के बाद सुजाता दीदी को क्लीनिक-डिस्पेंसरी में काम शुरू करने के लिए बुलाया गया। ‘वह एक ऐसा समय था जब हमें एक साथ कई काम (multi tasking healthcare) करने पड़ते थे। नर्सिंग के कामों के अलावा, हम बहुत दूर से पानी लाते थे, कपड़े धोते थे, खाना बनाते थे और क्लीनिक को संभालते थे।’ वे याद करते हुए बताती हैं कि अस्पताल की पुरानी मिट्टी की दीवारों (rural setup hospital) पर गोबर और मिट्टी से छबाई भी किया करते थे।

शुरुआती दिनों में, डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं सहित पूरा स्टाफ बहुत ही घनिष्ठ समुदाय की तरह रहता था। वे एक साथ रहते थे और अपना खाना आपस में बांटकर खाते थे। यहां तक कि डॉक्टर और नर्स भी अस्पताल की चादरें धोने जैसे कामों में हाथ बंटाते थे। उन्होंने याद करते हुए बताया, “हम शायद ही कभी अस्पताल से बाहर जाते थे। हमने कई-कई घंटों काम किया, सुबह 11 बजे से रात 12 बजे तक। और शुरू में, हमें कोई वेतन (unpaid work) नहीं मिलता था। हम तो बस अपने लोगों की मदद कर रहे थे।”

अब, 150 बिस्तरों वाला यह अस्पताल – जिसमें सर्जरी, जनरल मेडिसिन और प्रसूति एवं स्त्री रोग के लिए वार्ड हैं – इस क्षेत्र की नर्सों, सफाई कर्मचारियों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं, कम्युनिस्ट डॉक्टरों, मज़दूरों और किसानों (people powered healthcare) के कंधों पर खड़ा हुआ है। इसकी फीस बहुत कम है, ताकि यहां के लोगों की आमदनी के हिसाब से उनकी जेब पर भारी न पड़े। इसका प्रशासन मुख्य रूप से ट्रेड यूनियन के नेताओं और अस्पताल के कर्मचारियों (collective management) द्वारा किया जाता है। शहीद अस्पताल के बाह्य-रोगी विभाग (OPD) में रोज़ाना तकरीबन 200 मरीज़ आते हैं।

इस शानदार काम की मज़बूत रीढ़ हैं 70 वर्षीय मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. सैबल जाना (Dr Saibal Jana), जिन्हें प्यार से ‘जाना सर’ कहते हैं। वे ऊर्जा के एक ऐसे स्रोत हैं जो शहीद अस्पताल के कामकाज को सुचारू रूप से चलाए रखता है।

पिछले 40 वर्षों से, डॉ. जाना ने अस्पताल को एकजुट रखा है, और खुद को मज़दूरों के संघर्षों (egalitarian values) से जुड़े समानतावादी मूल्यों के प्रति समर्पित कर दिया है। मज़बूत कद-काठी वाले, दिल खोलकर हंसने वाले और असीम ऊर्जा से भरे इस सज्जन को अक्सर क्लीनिकल राउंड के दौरान एक सादे सूती कुर्ते या शर्ट में देखा जा सकता है। चपटे फ्रेम वाले चश्मे के पीछे उनकी आंखें हर मरीज़ को पूरे ध्यान से देखती हैं। जैसा कि एक डॉक्टर ने मुझे बताया, “जाना सर मरीज़ों के चेहरों को बहुत ध्यान से देखने (clinical observation) पर ज़ोर देते हैं। उनके अनुसार, कई मामलों में, सिर्फ चेहरा देखकर ही बीमारी का एक मोटा-मोटा अंदाज़ा लगाया जा सकता है।”

लगातार खुद सीखते रहने की बदौलत वे एक ऐसे डॉक्टर बन गए जो इस क्षेत्र के लोगों की सभी चिकित्सकीय और सर्जिकल ज़रूरतों का इलाज करने में सक्षम हैं। शहीद अस्पताल के नेता के तौर पर, उन्होंने ‘जन स्वास्थ्य आंदोलन’ (public health movement) की अगुवाई की, जिसने इस क्षेत्र के मज़दूरों को प्रभावित करने वाले स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न मुद्दों के संदर्भ में अभियान चलाया।

इमारत के निर्माण से लेकर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण तक, अस्पताल के विकास के हर चरण में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। हर्निया का ऑपरेशन करते समय ऑपरेशन टेबल पर अरबपतियों के बारे में बात करने से लेकर, नियमित राउंड के दौरान स्वास्थ्य और इलाज जैसे विषयों पर बड़ी दवा कंपनियों (pharma industry critique) के नैरेटिव को सक्रिय रूप से चुनौती देने तक, डॉ. जाना शहीद अस्पताल के लिए एक नैतिक मार्गदर्शक की तरह हैं।

क्लीनिकल राउंड लेते समय, एक बार उन्होंने ट्रेड यूनियन नेता शंकर गुहा नियोगी की ‘अर्ध-मशीनीकरण’ (semi mechanization concept) की अवधारणा को दोहराते हुए कहा था, “अगर मशीनें गलती करें, तो शायद हमें कभी पता ही न चले। लेकिन अगर इंसान गलती करते हैं, तो उसे सुधारने की गुंजाइश हमेशा रहती है।” ‘अर्ध-मशीनीकरण’ आज के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI debate) और तकनीकी क्रांतियों के दौर के लिए एक महत्वपूर्ण विचार है, जिसे फिर से सामने लाने की ज़रूरत है। यह CMSS के उस अभियान से विकसित हुआ था जो पूर्ण-मशीनीकरण के खिलाफ था, क्योंकि पूर्ण-मशीनीकरण से खदानों में कई नौकरियां खत्म हो जातीं।

उस समय, नियोगी ने तर्क दिया था कि भारत जैसे श्रम-अधिशेष (जहां श्रमिकों की बहुतायत हो – labor surplus economy) वाले देश के लिए पूर्ण-मशीनीकरण वांछनीय तकनीकी विकल्प नहीं है, और भविष्य में दल्ली राजहरा खदानों के लिए एक बेहतर रणनीति अर्ध-मशीनीकरण ही होगी।’ CMSS ने खनन में अर्ध-मशीनीकरण पर एक अध्ययन भी करवाया था, जिसमें दिल्ली के अर्थशास्त्रियों की एक शोध टीम शामिल थी। इलीना सेन अपने संस्मरणों में उनकी रिपोर्ट के बारे में लिखती हैं, “उनकी रिपोर्ट ने इस विकल्प की सराहना की और दिखाया कि लागत के लिहाज़ से अर्ध-मशीनीकरण सस्ता था, और साथ ही यह श्रमिकों के लिए भी अनुकूल था।”

इसी भावना के साथ, डॉ. जाना मशीनों से हासिल निष्कर्षों (human vs machine) के मुकाबले मानवीय अवलोकन को ज़्यादा महत्व देते हैं। अत्यधिक टेस्ट करवाने की बजाय बारीकी से शारीरिक जांच अपनाने से मरीज़ों को अनावश्यक स्वास्थ्य खर्चों से बचने में मदद मिल सकती है। एक अन्य अवसर पर, डॉ. जाना ने कहा था, ‘हमें उत्पादन की प्रक्रिया में अपनी चेतना (human intelligence) का उपयोग करने की ज़रूरत है। जो लोग मशीनों को बढ़ावा देना चाहते हैं, वे ही मानवीय मूल्यों के ऊपर मुनाफे को प्राथमिकता देते हैं। मशीन के पुर्ज़ों को समय-समय पर बदलना पड़ता है, और यह अपने आप में खर्चीली प्रक्रिया है।’

उन्होंने कहा था, “अंततः, निष्कर्षों तक पहुंचने के लिए मानवीय चेतना ही सबसे महत्वपूर्ण है।” यह पूंजी-प्रधान तकनीक (capital intensive technology) की बजाय लोगों के विज्ञान को सशक्त बनाने (people’s science centric approach) की दिशा में एक कदम है। कई मायनों में, डॉ. जाना के शब्द शहीद अस्पताल के मूल मूल्यों को पूरी तरह से समेटे हुए हैं।

शहीद अस्पताल में फुसफुहाटें (collective voice)  बयार बन जाती हैं। एक डाल से दूसरी डाल तक और एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ तक, मशीनी खदानों की भूलभुलैया जैसी गुफाओं से एक गूंज उठती है और पहुंच जाती है अस्पताल के उस प्रांगण तक जहां शिशु जन्म लेते हैं। यह गूंज वास्तव में लामबंद होने, व्यवस्था को बदलने, उठ खड़े होने, विद्रोह करने और स्वयं को मुक्त कराने (people’s movement) की एक ज़ोरदार हुंकार है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://nivarana.org/vital-signs/healthcare-as-a-peoples-movement-the-story-of-shaheed-hospital

कुत्ते कब पालतू बने?

चाहे गांव हो या शहर, ऐसा कोई गली-मोहल्ला नहीं होगा जहां कुत्ते (street dogs) दिखाई न दें। जहां-जहां मनुष्यों की आबादी है, कुत्ते वहां-वहां दिख ही जाते हैं। आजकल तो ऐसी खबरें भी सुनने को मिलती हैं कि गली में घूमते कुत्ते कुछ ज़्यादा ही आक्रामक (dog aggression) हो गए हैं, और लोग गली के कुत्तों से थोड़ा कतराने लगे हैं। लेकिन कभी कुत्ते मनुष्यों के लिए बहुत खास हुआ करते थे। सुरक्षा से लेकर रास्तों की पहचान तक में वे काम आते थे। हालांकि ऐसा भी नहीं है कि आज कुत्तों का कोई महत्व नहीं रहा। लोग प्रेमवश उन्हें पालते हैं; पुलिस नशीले पदार्थों को ढूंढने में, लोगों की पहचान करने में, ढूंढने में कुत्तों की मदद लेती है; लोगों के सहायकों (service dogs) के रूप में भी वे काम आते हैं।

लेकिन सवाल है कि कुत्ते (dog domestication) ठीक कब से मनुष्यों के साथ हैं। और भेड़ियों से कुत्ते में कब विकसित होना शुरू हुए? वैज्ञानिक यह तो जानते हैं कि कुत्ते भूरे भेड़ियों (gray wolves) के वंशज हैं, लेकिन उनके लिए यह सवाल हमेशा सवाल ही रहा कि यह विकास प्रक्रिया ठीक-ठीक कब, कहां, कैसे चली।

अब तक, सबसे प्राचीन कुत्ते के जो पुख्ता जीवाश्म प्रमाण (fossil evidence) मिले हैं वे लगभग 11,000 साल पुराने हैं, जो उत्तर-पश्चिमी रूस के एक खुदाई स्थल से मिले थे। हालांकि इसके बाद और इसके पहले पुरातत्वविदों को खुदाई स्थल से इससे भी कहीं ज़्यादा प्राचीन हड्डियां मिली थीं, जिनकी कद-काठी देखने में भेड़ियों की बजाय कुत्तों जैसी थी – जैसे खोपड़ियां छोटी और चौड़ी थीं। यह इस बात के स्पष्ट संकेत थे कि ये बदलाव भेड़ियों के पालतू बनने की प्रक्रिया (domestication process) के दौरान उनमें आए थे। लेकिन पक्के तौर पर कुछ कहने के लिए इनके बारे में ज़रूरी विस्तृत जेनेटिक जानकारी (genetic data) उपलब्ध नहीं थी। तो मामला वहीं अटका रहा।

अब हालिया अध्ययन इस बारे में थोड़ा प्रकाश डालता है। दरअसल वर्ष 2004 में, मध्य तुर्की के पुनारबश नामक एक शिकारी-संग्राहक काल के खुदाई स्थल (Pinarbasi Turkey site) से वैज्ञानिकों को एक मानव कब्र के ठीक पास की कब्र में तीन पिल्लों की हड्डियां मिली थीं। हड्डियां इतनी छोटी थीं कि यह बताना मुश्किल था कि वे भेड़िए के पिल्लों की थीं या कुत्तों के पिल्लों की। मानव कब्र के इतने पास मिलने से ऐसा लगता था कि वे कुत्तों के पिल्लों की ही होंगी। लेकिन जब यह पता किया गया कि वे कितनी पुरानी हैं तो पता चला कि वे करीब 15,800 साल पुरानी हैं। यानी कुत्ते के अब तक मिले पक्के प्रमाणों (ancient dog fossils) से भी 5000 साल पुरानी!

फिर क्या था, शोधकर्ताओं ने उनमें से एक पिल्ले का डीएनए अनुक्रमण किया। इसके साथ ही, उन्होंने दक्षिणी इंग्लैंड की गॉग गुफाओं (Gough’s Cave England) (14,300 साल प्राचीन) और उत्तरी स्विट्ज़रलैंड की केसलरलॉक गुफाओं (Kesslerloch Cave Switzerland) (14,200 साल प्राचीन) से मिले कुत्ते सरीखे जानवरों का भी डीएनए अनुक्रमण किया। विश्लेषण में पता चला कि पुनारबश से मिले अवषेश पूर्णत: कुत्ते के थे, और उसमें भेड़िए जैसे कोई अंश नहीं थे। इसके अलावा अन्य दो गुफाओं से मिले अवशेष भी कुत्तों के ही निकले।

और तो और तुर्की, इंग्लैंड और स्विट्ज़रलैंड के खुदाई स्थलों के बीच भले ही भौगोलिक दूरी और सांस्कृतिक अंतर बहुत ज़्यादा है लेकिन इन तीनों स्थलों से मिले कुत्तों के जीनोम (genome similarity) एक-दूसरे के काफी समान थे। मसलन गॉग गुफाओं के रहवासी मैडेलेनियन संस्कृति का हिस्सा थे और वे बेहतरीन गुफा-चित्रकारी और इंसानी खोपड़ियों से प्याले बनाने के लिए जाने जाते हैं। वहीं, पुनारबश में एंटोलियन शिकारी-संग्रहकर्ता (Anatolian hunter gatherers) लोग रहते थे। जिनके वंशजों ने बाद में युरोप में खेती-बाड़ी की शुरुआत की। शोधकर्ता कहते हैं कि इन अलग-अलग संस्कृतियों के इंसानों के डीएनए में अंतर था, लेकिन कुत्तों के डीएनए में ऐसा कोई अंतर नहीं दिखा। इससे अंदाज़ा मिलता है कि ये सभी कुत्ते एक ही मूल आबादी से विकसित हुए थे। यानी ये कुत्ते युरोप के आदि-कुत्ते थे – कुत्तों की एक ऐसी प्राचीन नस्ल, जो उस समय तक किसी खास काम के लिए विशेष रूप से विकसित नहीं हुई थी। बाद में कुत्तों को कई तरह के काम करने के लिए पाला गया, जैसे शिकार (hunting dogs) में मदद करने के लिए, रखवाले के तौर पर।

अलग-अलग जगहों पर मिले कुत्तों और इंसानों के डीएनए के आधार पर शोधकर्ताओं का कहना है कि लगभग 21,000 से 12,000 साल पहले तक पूरे दक्षिणी और पूर्वी युरोप में रहने वाले एपिग्रेवेटियन लोग (Epigravettian culture) शायद पूरे महाद्वीप में कुत्तों को फैलाने में मददगार रहे होंगे।

एक अन्य अध्ययन भी ऐसा ही कुछ इशारा करता है। जब शुरुआती किसान युरोप में आकर बसे और अपने साथ कुत्ते लाए तब नवागंतुक मनुष्यों ने तो लगभग पूरी तरह से पहले से मौजूद युरोपीय लोगों की जगह ले ली। लेकिन कुत्तों के मामले में ऐसा नहीं हुआ। नवागंतुक कुत्तों के साथ-साथ पहले से मौजूद कुत्ते भी बने रहे। लगभग 9000 से 7000 साल पहले (युरोप में कृषि आगमन से पहले और बाद का समय) के कुत्तों के अवशेषों का विश्लेषण (ancient DNA analysis) करके पता चला है कि युरोपीय कुत्तों के डीएनए का केवल लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा ही पूर्वी कुत्तों के डीएनए से प्रतिस्थापित हुआ था। इससे पता चलता है कि प्रवासी किसानों को युरोपीय कुत्ते विशेष रूप से उपयोगी लगे होंगे और उन्होंने इन कुत्तों को अपने साथ शामिल किया, न कि उन्हें अपने कुत्तों से बदलने की कोशिश की। लेकिन उत्तरी अमेरिका में इसका ठीक उल्टा हुआ, जहां उपनिवेश बनाने वाले युरोपीय लोगों (European colonization) ने मूल कुत्तों को लगभग पूरी तरह से विलुप्त कर दिया। ऐसा शायद नवागंतुक कुत्तों का उपयोगिता या खूबी के कारण हुआ होगा।

नेचर में प्रकाशित (Nature journal study) उपरोक्त दोनों ही अध्ययन कुत्ते के विकास और फैलाव पर थोड़ी रोशनी तो डालते हैं लेकिन फिर भी इस सवाल का जवाब अभी पूरा नहीं देते हैं कि अंतत: कुत्ते कहां से आए। उम्मीद है कि आगे ऐसी ही और खोजें और तफ्तीश (future research) इस सवाल को सुलझाने में मददगार होंगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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आधुनिक टेक्नॉलॉजी के चालक: दुर्लभ मृदा तत्व

डॉ. सुशील जोशी

मानव इतिहास में विभिन्न रासायनिक तत्व समय-समय पर महत्वपूर्ण रहे हैं। रासायनिक तत्वों के अहम होने से पहले हम लकड़ी-पत्थर के औज़ारों पर निर्भर थे। उस काल को पाषाण युग कहते हैं। इसे भी पत्थरों के प्रकारों और उनके उपयोग के आधार पर पुरा-पाषाण और नव-पाषाण काल में विभाजित किया जाता है। पहली बार धातुओं का उपयोग शुरू हुआ था कांसे के साथ और यह कहलाया कांस्य युग। उसके बाद बाद आता है लौह युग। कांसा तांबे और टिन की मिश्रधातु यानी एलॉय है जबकि लोहा एक शुद्ध धातु है। कांसा और लोहा से बने औज़ारों ने खेती में क्रांति कर दी थी। इसके अलावा लोहा हथियारों में भी उपयोगी साबित हुआ।

कांस्य व लौह युग के नाम तो दो तत्वों पर पड़े हैं लेकिन इनके साथ तांबा, टिन, आर्सेनिक व सीसा (लेड) भी बराबर महत्व के थे। टिन का उपयोग तांबे में मिलाकर कांसा बनाने में किया जाता था जबकि आर्सेनिक तथा लेड का उपयोग भी धातु की चीज़ें बनाने में होता था। सोना-चांदी, प्लेटिनम भी महत्वपूर्ण धातुएं थीं। धीरे-धीरे इस्पात (लोहे और कार्बन व अन्य तत्वों की मिश्र-धातु) बनाया जाने लगा।

फिर आता है कार्बन युग। हालांकि इसे औपचारिक दर्जा नहीं मिला है लेकिन औद्योगिक क्रांति का चालक कार्बन ही था। एक बड़ा अंतर यह है कि जहां कांसा और लोहा चीज़ें बनाने में काम आते हैं वहीं कार्बन ऊर्जा का प्रमुख स्रोत बना – चाहे तत्व के रूप में या यौगिकों के रूप में। लकड़ी को जलाकर गर्मी प्राप्त करना तो इतिहास में काफी पहले शुरू हो चुका था लेकिन आगे चलकर कोयले के भंडारों की खोज तथा निष्कर्षण के चलते ऊर्जा का यह स्रोत बहुत महत्वपूर्ण हो गया – भाप के इंजिन से सभी वाकिफ हैं और यह भी जानते हैं कि ये इंजिन कोयले को जलाकर चलते थे और इनके आगमन ने यातायात व अन्य क्षेत्रों में कैसी क्रांति ला दी थी।

हाइड्रोजन प्रकृति में सबसे हल्का तत्व है, जिसका अणु भार 2 होता है। इसका उपयोग अमोनिया और मेथेनॉल बनाने में होता है। अमोनिया का उत्पादन मुख्य रूप से रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन में होता है, जबकि मेथेनॉल अन्य औद्योगिक प्रक्रियाओं में काम आता है। एक अनुमान के मुताबिक दुनिया भर में जितनी हाइड्रोजन का उत्पादन होता है, उसमें से 25 प्रतिशत का इस्तेमाल तो पेट्रोलियम शोधन व परिष्करण में होता है। हाइड्रोजन का उपयोग धातुकर्म में भी किया जाता है जहां यह धातु के ऑक्साइड्स से शुद्ध धातु प्राप्त करने के लिए अवकारक का काम करती है।

हाइड्रोजन का एक बड़ा उपयोग असंतृप्त वनस्पति तेलों को संतृप्त बनाने में किया जाता है। इसका उपयोग सेमीकंडक्टर, एलईडी तथा सपाट स्क्रीन्स के निर्माण में तराशी कार्य में भी होता है। वेल्डिंग में भी काम आती है। और आजकल कार्बन मुक्त ऊर्जा स्रोत के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग ईंधन सेल बनाने में बढ़ता जा रहा है। ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का सीधा इस्तेमाल भी होता है।

आगे चलकर, कार्बन के यौगिक महत्वपूर्ण हो गए – पेट्रोल, डीज़ल, गैसोलीन वगैरह। पेट्रोलियम उत्पाद ऊर्जा के अलावा वस्तु-निर्माण (जैसे प्लास्टिक) के अहम स्रोत बन गए। जिन इलाकों में पेट्रोलियम के प्रचुर भंडार थे, भू-राजनीति में उनका महत्व बढ़ता गया। साथ ही, कार्बन ईंधन जलाने का एक पर्यावरणीय असर भी हुआ – इनको जलाने से ऊर्जा के साथ-साथ कार्बन डाईऑक्साइड निकलती है जो एक ग्रीनहाउस गैस है और धरती का तापमान बढ़ाने में ज़बर्दस्त योगदान देती है।

कार्बन के बाद आए तत्व

सिलिकॉन आधुनिक इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटरों और सूचना टेक्नॉलॉजी का आधार है। युरेनियम परमाणु ऊर्जा का प्रमुख स्तंभ है। लेकिन आधुनिक युग में सबसे महत्वपूर्ण हो गए लीथियम और दुर्लभ मृदा तत्व (रेयर अर्थ एलीमेंट्स)। ये कार्बन से मुक्त ऊर्जा के दोहन के प्रमुख स्रोत हैं – बैटरियां, हरित टेक्नॉलॉजी वगैरह के। इसी के चलते अब दुनिया में ये नए तत्व महत्वपूर्ण हो चले हैं और वर्तमान भू-राजनीति पर हावी हैं हालांकि पेट्रोलियम का महत्व कम नहीं हुआ है। तो चलिए बात करते हैं दुर्लभ मृदा तत्वों और आधुनिक टेक्नॉलॉजी में उनकी निर्णायक भूमिका की।

दुर्लभ मृदा तत्व

दुर्लभ मृदा नामक 17 तत्व कई मामलों में आधुनिक टेक्नॉलॉजी के लिए महत्वपूर्ण हैं। जैसे विद्युत वाहनों, पवन चक्कियों के टर्बाइन और मिसाइल, सोनार जैसे सैन्य उपकरणों के लिए चुंबक बनाने में। दुर्लभ मृदा तत्वों का रणनीतिक महत्व मुख्य रूप से इस बात पर टिका है कि इनका उपयोग स्मार्टफोन, टैबलेट्स, कंप्यूटर, टेलीविज़न तथा कई अन्य घरेलू उपकरणों में किया जाता है। इसके अलावा, दुर्लभ मृदा तत्वों का इस्तेमाल चिकित्सा के क्षेत्र में कतिपय कैंसरों के उपचार में तथा वैज्ञानिक अनुसंधान में भी होता है। दुर्लभ मृदा तत्व रक्षा क्षेत्र में भी प्रयुक्त होते हैं; जैसे रडार, सोनार, लेज़र तथा मिसाइल की दिशा-निर्देशक प्रणालियों में।

उत्प्रेरक के रूप में भी ये उपयोगी साबित हुए हैं। उदाहरण के लिए सीरियम नामक दुर्लभ मृदा तत्व कच्चे तेल (पेट्रोलियम) को कई अन्य उपयोगी पदार्थों में बदलने के लिए एक उत्प्रेरक की तरह इस्तेमाल किया जाता है। इसी प्रकार से परमाणु रिएक्टर्स में गैडोलीनियम का इस्तेमाल किया जाता है क्योंकि यह रिएक्टर में ऊर्जा का नियंत्रित उत्पादन करवाने में भूमिका निभाता है।

अलबत्ता, दुर्लभ मृदा तत्वों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताएं उनकी प्रकाश उत्सर्जन क्षमता (संदीप्ति) और उनका चुंबकत्व हैं। दुर्लभ मृदा तत्वों के प्रकाश उत्सर्जन के गुण का उपयोग स्मार्टफोन के स्क्रीन को रंगत देने में होता है। इसी गुण का एक अन्य उपयोग असली-नकली करंसी नोट्स के बीच अंतर करने में भी होता है। इनसे बने ऑप्टिकल फाइबर्स समुद्र में लंबी दूरियों तक संकेत पहुंचाते हैं।

सबसे शक्तिशाली तथा विश्वसनीय चुंबक भी इन्हीं धातुओं से बन रहे हैं और यही धातुएं आपके हेडफोन्स में ध्वनि तरंगें पैदा करती हैं और अंतरिक्ष में संप्रेषण में सहायक होती हैं।

और अब दुर्लभ मृदा तत्व हरित टेक्नॉलॉजी के विकास को भी गति दे रहे हैं। पवन चक्कियों और विद्युत-चालित वाहनों के ये प्रमुख अवयव बन गए हैं। और तो और, आजकल जिन क्वांटम कंप्यूटर्स की चर्चा हो रही है, उनमें भी ये प्रमुख घटक हैं।

दुर्लभ मृदा तत्वों की उपलब्धता

पिछले कुछ वर्षों में दुर्लभ मृदा तत्वों के अलावा लौह व अन्य धातुओं की मांग में ज़बर्दस्त वृद्धि देखी गई है। विश्व बैंक का अनुमान है कि मूलत: हरित व नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण के चलते दुर्लभ मृदा तत्वों की मांग और बढ़ेगी। जैसे, विद्युत चालित व हाइब्रिड वाहनों तथा सौर व पवन ऊर्जा के दोहन के लिए ज़रूरी उपकरणों का निर्माण इन्हीं तत्वों पर निर्भर है। उम्दा प्रकाश-उत्सर्जन और चुंबकीय गुण की वजह से ये टेक्नॉलॉजी के महत्वपूर्ण घटक बन गए हैं।

वैसे इन तत्वों को दुर्लभ मृदा तत्व कहते ज़रूर हैं, लेकिन प्रकृति में ये उतने भी दुर्लभ नहीं हैं। लोहा, तांबा तथा निकल जैसी धातुओं की अपेक्षा ये कहीं अधिक मात्रा में पाए जाते हैं। लेकिन इनका भौगोलिक वितरण तथा इनके निष्कर्षण की प्रक्रिया इन्हें दुर्लभ बना देते हैं। इनके निष्कर्षण की प्रक्रिया पर्यावरण पर प्रतिकूल असर भी डालती है।

तथ्य यह है कि प्रकृति में ये तत्व विभिन्न खनिजों के साथ मिश्रण के रूप में पाए जाते हैं। लिहाज़ा, इन्हें अलग-अलग करना पड़ता है। इस काम के लिए तेज़ाबों और कई कार्बनिक विलायकों का उपयोग ज़रूरी होता है जो पर्यावरण की दृष्टि से हानिकारक होते हैं। एक तो निष्कर्षण के दौरान कार्बन डाईऑक्साइड उत्पन्न होती है और साथ ही रेडियोधर्मी तथा रासायनिक कचरा पैदा होता है। और तो और, किसी मिश्रण में धातु विशेष की सांद्रता के अनुसार निष्कर्षण की अलग-अलग विधियों का उपयोग किया जाता है। परिणामस्वरूप प्रत्येक धातु के लिए विशिष्ट टेक्नॉलॉजी और जानकारी की ज़रूरत होती है। निष्कर्षण में विभिन्न चरण होते हैं और समय लगता है। इस तरह की सुविधाएं फिलहाल चीन में मौजूद हैं।

अधिकांश दुर्लभ मृदा तत्वों की खदानें चीन में हैं जो विश्व के भंडारों के लगभग एक-तिहाई का मालिक है। इसके बाद वियतनाम, ब्राज़ील, रूस, भारत, ऑस्ट्रेलिया, ग्रीनलैंड तथा यूएस हैं। वर्तमान में चीन इस सेक्टर में सर्वोपरि है और वह दुनिया भर के कुल उत्पादन के 90 प्रतिशत को नियंत्रित करता है। इस संदर्भ में चीन के बोलबाले के कई कारण बताए जाते हैं। पहला तो यही है कि दुर्लभ मृदा के व्यापक भंडार उसके भोगोलिक क्षेत्र में हैं। यह भी कहा जाता है कि वहां पर्यावरणीय कायदे-कानून थोड़े शिथिल हैं और उत्पादन की प्रकिया की खासी जानकारी है। चीन ने इस सेक्टर में काफी निवेश भी किया है।

दुर्लभ मृदा धातुओं में इस एकाधिकार का उपयोग चीन एक भू-राजनैतिक हथियार के रूप में भी करता है। उदाहरण के लिए उसने जापान को इन तत्वों के निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर अपनी शर्तें मनवाई थीं। आशंका यह है कि ऐसा अन्य देशों के साथ भी संभव है। उदाहरण के लिए, यूएस दुर्लभ मृदाओं की 80 प्रतिशत आपूर्ति के लिए चीन पर निर्भर है। यूएस द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्ज़ा करने का प्रयास इसी से निपटने का तरीका हो सकता है।

दुर्लभ मृदाओं के गुण

आखिरकार, इन 17 तत्वों में ऐसी क्या खास बात है कि ये आधुनिक टेक्नॉलॉजी के लिए इतने महत्वपूर्ण हो गए हैं। दुर्लभ मृदा तत्वों का महत्व उनके भौतिक व रासायनिक गुणों में निहित है। इसके अलावा वे कई खनिजों के गुणों में इज़ाफा भी कर सकते हैं जिसके चलते इन खनिजों की प्रौद्योगिकी उपयोगिता बढ़ जाती है।

बात को समझने के लिए हमें परमाणुओं पर गौर करना होगा। सारे तत्व परमाणुओं से बने होते हैं जिनमें एक केंद्रीय नाभिक होता है जहां परमाणु का सारा धनावेश प्रोटॉन के रूप में संग्रहित होता है और ऋणावेशित इलेक्ट्रॉन इस नाभिक के चक्कर काटते हैं।

चुंबकत्व

चुंबकत्व मूलत: आवेशों की गति से पैदा होता है। परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन आवेशित कण होते हैं और पदार्थों में चुंबकत्व इन्हीं इलेक्ट्रॉन की गति से उत्पन्न होता है। परमाणु में इलेक्ट्रॉन धनावेशित केंद्रक की परिक्रमा करते हैं। यह हुई इलेक्ट्रॉन की पहली गति। केंद्रक के आसपास चक्कर काटते हुए इलेक्ट्रॉन बेतरतीब ढंग से यहां-वहां नहीं भटकते; वे निर्धारित कक्षाओं में घूमते हैं। इलेक्ट्रॉन की दूसरी गति होती है उनका अपने अक्ष पर घूर्णन। इन दोनों गतियों को मिलाकर चुंबकत्व उत्पन्न होता है।

इलेक्ट्रॉन के परिक्रमा करने की कक्षाएं केंद्रक के पास से दूर तक होती हैं – इन्हें क्रमश: 1, 2, 3, 4 कहा जाता है। फिर प्रत्येक कक्षा में उप-कक्षाएं होती हैं जिन्हें s, p, d, f  कहा जाता है। इन कक्षाओं/उपकक्षाओं में इलेक्ट्रॉन की संख्या निश्चित होती है – जैसे पहली कक्षा में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं, दूसरी में 8, तीसरी में 18 तथा चौथी में 32। फिर, इलेक्ट्रॉन उप-कक्षाओं में बंटते हैं। किसी भी उपकक्षा में अधिकतम दो इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं। और जब किसी उपकक्षा में दो इलेक्ट्रॉन हों तो उनका घूर्णन विपरीत दिशा में होता है। चूंकि घूर्णन विपरीत दिशा में होता है इसलिए प्रत्येक से उत्पन्न चुंबकत्व जोड़ीदार इलेक्ट्रॉन के चुंबकत्व को निरस्त कर देता है और परमाणु कुल मिलाकर अचुंबकीय बना रहता है।

लेकिन कुछ परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन व्यवस्था ऐसी होती है कि उनमें सारे जोड़-घटा के बाद चुंबकत्व शेष रहता है। ऐसे परमाणुओं में सारे इलेक्ट्रॉनों की जोड़ियां नहीं बनती। बेजोड़ी इलेक्ट्रॉनों की गति से उत्पन्न चुंबकत्व कैंसल नहीं होता और कुछ नेट चुंबकत्व बचा रहता है।

दुर्लभ मृदा तत्वों के परमाणुओं की इलेक्ट्रॉन जमावट देखें तो पता चलता है कि उनमें में 5 बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन पाए जाते हैं। लेकिन एक दिक्कत है – दुर्लभ मृदा तत्वों की धात्विक त्रिज्या बहुत अधिक होती है (धात्विक त्रिज्या से आशय होता है धातु की जमावट में पास-पास के दो परमाणुओं के केंद्रकों के बीच की दूरी)। इस कारण से इनमें बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन का घनत्व कम हो जाता है और चुंबकत्व काफी सीमित रहता है। किंतु जब इन्हें लोहे या कोबाल्ट जैसी संक्रमण धातु (जिनमें काफी संख्या में बेजोड़ी इलेक्ट्रॉन होते हैं) के साथ मिलाकर मिश्र-धातु (एलॉय) बनाई जाती है तो इनका यह गुण निखर जाता है। इस प्रकार बनाए गए चुंबक कहीं ज़्यादा चुंबकीय ऊर्जा संग्रह कर लेते हैं। जैसे नियोडीमियम से बना चुंबक उतने ही आकार के लौह चुंबक की तुलना में 18 गुना ज़्यादा चुंबकीय ऊर्जा संग्रह कर सकता है।

दुर्लभ मृदा चुंबकों का उपयोग टर्बाइन्स, विदुयत मोटर, वायुयानों और मिसाइलों में लक्ष्य निर्धारण प्रणालियों, स्पीकर्स तथा कंप्यूटर हार्ड ड्राइव्स में किया जाता है।

दुर्लभ मृदा से बने चुंबकों की एक दिक्कत यह रही है कि सामान्य तापमान पर उनका चुंबकत्व लगभग चुक जाता है। बहरहाल, कोबॉल्ट या लोहे जैसी किसी संक्रमण धातु और दुर्लभ मृदा तत्वों की मिश्र-धातु से बने चुंबकों का चुंबकत्व काफी ऊंचे तापमान पर भी बरकरार रहता है। मसलन, नियोडीमियम-लौह-बोरॉन (Nd2Fe14B) चुंबक या समारियम-कोबॉल्ट (SmCo5) चुंबक।

प्रकाशउत्सर्जन

किसी पदार्थ पर विद्युत-चुंबकीय विकिरण की बौछार की जाए और वह प्रकाश पैदा करने लगे तो इस गुण को संदीप्ति कहते हैं। कुछ दुर्लभ मृदा तत्वों में यह गुण पाया जाता है। इसके चलते ये फॉस्फर्स (यानी प्रकाश-उत्सर्जक तत्वों) के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। जैसे एलईडी और सीएफएल में। युरोपियम आधारित फॉस्फर्स लाल रोशनी पैदा करते हैं और ये रंगीन टेलीविज़न के विकास में महत्वपूर्ण रहे हैं। संदीप्ति गुणों के चलते एर्बियम आयन ग्लास फाइबर्स में संकेतों को एम्लीफाय करने में महत्वपूर्ण साबित हुए हैं। इनकी मदद से लंबी दूरी के टेलीफोन संवाद और इंटरनेट डैटा का आवागमन सुलभ हुआ है। दुर्लभ मृदा तत्वों के संदीप्ति गुण का एक अन्य ज़बर्दस्त उपयोग लेज़र के क्षेत्र में होता है। विभिन्न किस्म के लेज़र्स का इस्तेमाल चिकित्सा, सैन्य कार्यों में किया जाता है। खास तौर से ये गाइडेड मिसाइल्स में किसी लक्ष्य की दूरी तथा दिशा निर्धारण करने में मददगार हैं।

विद्युतीय गुण

दुर्लभ मृदा तत्वों के विद्युतीय गुण उन्हें निकल-धातु हायड्राइड (NiMH) बैटरियों के लिए उपयुक्त बनाते हैं। इन बैटरियों के एनोड्स जिस पदार्थ से बनते हैं उसे मिशमेटल कहते हैं, जो सीरियम, लैन्थेनम, नियोडिमियम तथा प्रासियोडीमियम का मिश्रण है। चूंकि यहां मिश्रण का ही उपयोग होता है इसलिए इसका निर्माण सस्ता पड़ता है। दुर्लभ मृद्दा तत्वों की बदौलत इन बैटरियों में ऊर्जा संग्रहित करने की क्षमता (ऊर्जा घनत्व) अधिक होती है और चार्जिंग-डिसचार्जिंग के कई चक्रों के बावजूद यह क्षमता बनी रहती है। इन बैटरियों का उपयोग हायब्रिड कारों वगैरह में बहुतायत से होता है।

दुर्लभ मृदा तत्वों का इलेक्ट्रॉन विन्यास उन्हें उपयोगी उत्प्रेरक भी बनाता है। इस संदर्भ में लैन्थेनम और सीरियम प्रमुख रहे हैं। सीरियम का इस्तेमाल पेट्रोल से चलने वाली कारों में किया जाता है। इसके इस्तेमाल से कारों से उत्सर्जित गैसों में विषैली कार्बन मोनोऑक्साइड को कार्बन डाईऑक्साइड में बदला जाता है। लैन्थेनम का उपयोग कच्चे तेल से उपयोगी हायड्रोकार्बन्स बनाने में होता है।

धातुकर्म की दिक्कतें

दुर्लभ मृदा तत्व लगभग हर महाद्वीप पर मिलते हैं और समुद्र के पेंदों में भी। लेकिन अधिकांश चट्टानों में इनकी सांद्रता बहुत कम होती है। चुनौती यह होती है कि ऐसे अयस्क खोजे जाएं जिनमें इन तत्वों की सांद्रता पर्याप्त हो।

दुर्लभ मृदा तत्व प्राय: साथ-साथ पाए जाते हैं। इन्हें अलग-अलग करना और शुद्ध रूप में प्राप्त काफी महंगा होता है। सबसे पहले तो धरती से चट्टानें या रेत खोदकर निकालना होती है, फिर उसमें से मूल्यवान अयस्क को अलग करना होता है। इसके अलावा, खास तौर से दुर्लभ मृदा तत्वों के मामले में, एक महत्वपूर्ण चरण धातुओं को एक-दूसरे से अलग-अलग करने का होता है। यह काफी कठिन और महंगा साबित होता है क्योंकि सारे दुर्लभ मृदा तत्वों के रासायनिक गुणधर्म लगभग एक समान होते हैं।

इस समस्या से निपटने के लिए कई जटिल पृथक्करण प्रक्रियाएं अपनाई जाती हैं। इनमें से सबसे अधिक उपयोग सॉलवेंट एक्सट्रेक्शन का किया जाता है। इसमें दुर्लभ मृदा तत्वों के मिश्रण को दो अघुलनशील विलायकों में डाला जाता है, जिनमें उनकी घुलनशीलता थोड़ी अलग-अलग होती है। फिर इन दो विलायकों को अलग-अलग किया जाता है और प्रक्रिया को कई बार (सैकड़ों बार) दोहराया जाता है ताकि धीरे-धीरे किसी एक तत्व की सांद्रता बढ़ती जाए। ज़ाहिर है, यह कार्य बहुत संसाधन-निर्भर, समयखर्ची और महंगा होता है। इसके विकल्पों पर काम जारी है।

इसलिए वैज्ञानिक दुर्लभ मृदा तत्वों के वैकल्पिक स्रोतों की तलाश में हैं। एक स्रोत हो सकता है वनस्पति। कुछ पौधे मिट्टी में से इन तत्वों को चुनिंदा ढंग से सोखते हैं और अपने ऊतकों में संग्रहित कर लेते हैं। सूरजमुखी, कैनरी घास तथा कुछ फर्न यह काम बखूबी करते हैं। इनके सत पर फिर सॉलवेंट एक्सट्रेक्शन लागू करना पड़ता है। वैसे अभी इस तरीके का औद्योगिक इस्तेमाल नहीं किया गया है।

एक स्रोत अन्य धातुओं के निष्कर्षण से बचा कचरा भी है और इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों में से प्राप्त करना भी हो सकता है।

भूराजनीतिक समस्याएं

विद्युत वाहनों तथा नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव के चलते अब पेट्रोलियम पर निर्भरता से हटकर दुनिया इन धातुओं पर निर्भर होने लगी है और धातु उत्पादक देशों का दबदबा बढ़ रहा है।

दुर्लभ मृदा तत्वों के परिशोधन पर चीन का वर्चस्व है, जिसके चलते वह निर्यात पर प्रतिबंध लगाकर इसे एक राजनैतिक हथियार की तरह इस्तेमाल कर सकता है।

कई देश अब धातु संसाधनों की जमाखोरी में लग गए हैं। आधुनिक शस्त्र (रडार, लेज़र, लक्ष्य निर्धारण प्रणालियां) विशिष्ट दुर्लभ तत्वों पर निर्भर हैं और ये अब राष्ट्रीय सुरक्षा के केंद्र में आ गए हैं।

उपरोक्त तथ्यों के मद्देनज़र अब खनिज सुरक्षा साझेदारियां विकसित होने लगी हैं।

जीवाश्म ईंधन (कोयला तथा तेल) के भंडार अपेक्षाकृत कम भौगोलिक इलाकों में सिमटे हैं जिसकी वजह से भू-राजनीति पर इनका खासा असर रहा है क्योंकि आपूर्ति शृंखला में बाधाएं रही हैं, कई सरकारें इनके आयात पर निर्भर हैं और ये संसाधन आंतरिक तनावों और समस्याओं से जुड़े रहे हैं।

फिलहाल कुल ऊर्जा खपत में नवीकरणीय ऊर्जा का हिस्सा बहुत कम है, हालांकि यह बढ़ता जा रहा है। इसकी प्रमुख वजहों में जलवायु परिवर्तन की चिंता, जीवाश्म ईंधनों के चुक जाने का डर, नवीकरणीय ऊर्जा की लागत में गिरावट, और कई देशों में ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की आकांक्षा है। ऊर्जा के मसले और भू-राजनीति के विभिन्न पहलुओं की समीक्षा कई नज़रियों से की जा सकती है।

आयात पर निर्भर देश कोशिश करते हैं कि पर्याप्त व किफायती ऊर्जा मिलती रहे। दूसरी ओर, संसाधन-समृद्ध देश अपने संसाधनों से पर्याप्त लाभ अर्जित करना चाहते हैं। बहरहाल, सभी देश चाहते हैं कि व्यापारिक प्रवाह बना रहे।

ऐसा लगता है कि ऊर्जा-संक्रमण (यानी जीवाश्म ईंधनों से नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बदलाव) महत्वपूर्ण खनिजों की मांग को निर्धारित करने वाला प्रमुख कारक होगा। अंतर्राष्ट्रीय नवीकरणीय ऊर्जा एजेंसी के मुताबिक यदि वैश्विक औसत तापमान में वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम रखने का लक्ष्य लें, तो ऊर्जा संक्रमण के लिए बड़े पैमाने पर अधोसंरचना और सामग्री की ज़रूरत होगी। इस नज़ारे में वर्ष 2050 तक 33,000 गीगावॉट नवीकरणीय बिजली ज़रूरी होगी और 90 प्रतिशत सड़क परिवहन का विद्युतीकरण करना होगा।

ऊर्जा सुरक्षा की चिंता मुख्य रूप से जीवाश्म ईंधन के चुक जाने से जुड़ी है। जीवाश्म ईंधन और नवीकरणीय ऊर्जा के लिए ज़रूरी सामग्रियों के बीच एक प्रमुख अंतर है। जहां जीवाश्म ईंधन समाप्त हो जाएगा, वहीं नवीकरणीय ऊर्जा से सम्बंधित सामग्री के खत्म हो जाने का खतरा नहीं है। हालांकि यह सही है कि ऊर्जा संक्रमण सामग्रियों का कोई अभाव नहीं है लेकिन उनकी खनन व परिशोधन की क्षमताएं सीमित हैं। कहा यह जा रहा है कि किसी एक पदार्थ की कमी होने पर दुनिया भर में ऊर्जा संक्रमण थम जाएगा। इनके नए-नए स्रोत तलाशे जा रहे हैं तथा खनन व परिशोधन में निवेश बढ़ रहा है। इसके अलावा कार्यकुशलता में सुधार और किसी पदार्थ की जगह दूसरे के इस्तेमाल होने पर मांग और आपूर्ति का समीकरण बदल सकता है।

एक समस्या यह है कि क्रिटिकल सामग्री के खनन व परिशोधन का कार्य कुछ चुनिंदा देशों में सिमटा हुआ है और पूरे नज़ारे पर इनका दबदबा है – ऑस्ट्रेलिया (लीथियम), चिली (तांबा व लीथियम), चीन (ग्रेफाइट तथा दुर्लभ मृदा तत्व), कॉन्गो जनतांत्रिक गणतंत्र (कोबाल्ट), इंडोनेशिया (निकल) तथा दक्षिण अफ्रीका (प्लेटिनम, इरिडियम)। यह संकेंद्रण परिशोधन के चरण में और भी गंभीर हो जाता है। उदाहरण के लिए, ग्रेफाइट व डिसप्रोसियम के परिशोधन की 100 प्रतिशत, कोबाल्ट की 70 प्रतिशत तथा लीथियम व मैगनीज़ की लगभग 60 प्रतिशत परिशोधन क्षमता चीन के पास है।

एक और मसला यह है कि खनन उद्योग पर मुट्ठी भर कंपनियों का वर्चस्व है। उदाहरण के लिए 61 प्रतिशत लीथियम तथा 56 प्रतिशत कोबाल्ट उत्पादन पांच शीर्ष कंपनियों के नियंत्रण में है।

फिलहाल, ऊर्जा संक्रमण के लिए ज़रूरी सामग्री का अधिकांश उत्पादन विकासशील देश कर रहे हैं। और तो और, कुल प्राकृतिक भंडार में भी उनका हिस्सा काफी ज़्यादा है हालांकि इसका पूरा अन्वेषण नहीं हो पाया है। उदाहरण के लिए, बोलीविया में 210 लाख टन लीथियम का भंडार है। यह किसी भी अन्य देश से ज़्यादा है लेकिन फिलहाल बोलीविया विश्व उत्पादन में मात्र 1 प्रतिशत का योगदान दे रहा है। कई देश अपने खनिज संसाधनों के उपयोग के लिए उद्योगों को आकर्षित कर सकते हैं, जो परिशोधन तथा अंतिम उत्पादों (जैसे बैटरियां, विद्युत वाहन) के उत्पादन में भी मदद कर सकें।

जिस एक समस्या पर प्राय: ध्यान नहीं दिया जाता है, वह है कि अधिकांश ऊर्जा संक्रमण सम्बंधी सामग्री (लगभग 54 प्रतिशत) देशज समुदायों (आदिवासियों) की ज़मीनों पर या उनके आसपास स्थित है। 80 प्रतिशत से अधिक लीथियम परियोजनाएं और निकल, तांबा तथा जस्ते की आधी से ज़्यादा परियोजनाएं आदिवासी लोगों के इलाकों में हैं। इसी प्रकार से, ऊर्जा संक्रमण के लिए ज़रूरी खनिज की परियोजनाएं आदिवासी इलाकों या किसानों की ज़मीन पर या उनके नज़दीक हैं। यहां पानी का संकट, टकराव और खाद्यान्न सुरक्षा के मुद्दे उठना स्वाभाविक है। उदाहरण के लिए 90 प्रतिशत प्लेटिनम भंडार, 76 प्रतिशत मॉलिब्डेनम भंडार और 74 प्रतिशत ग्रैफाइट संसाधन ऐसी ज़मीनों में हैं।

इस संदर्भ में ट्रम्प द्वारा ग्रीनलैंड पर हक जताने का प्रयास भी मौजूं है। दरअसल, आर्कटिक, बाह्य अंतरिक्ष और गहरे समंदरों में ऐसे क्रिटिकल संसाधनों के लिए भू-राजनीतिक संघर्ष संभावित है। जैसे, आर्कटिक क्षेत्र में निकल, जस्ता और दुर्लभ मृदा जैसी क्रिटिकल सामग्री प्रचुरता में है और यही इस क्षेत्र के रणनीतिक महत्व का कारण बन गया है। खास तौर से, अंतरिक्ष और गहरे समंदर में इस तरह की महत्वाकांक्षाओं पर लगाम लगाना ज़रूरी है क्योंकि इसके पर्यावरणीय असर तथा नियामक ढांचे को लेकर अनिश्चितता है।

एक महत्वपूर्ण मुद्दा यह भी है कि आज तक खनन उद्योगों का इतिहास रहा है कि खनन गतिविधियों और प्रक्रियाओं का स्थानीय समुदायों पर काफी  प्रतिकूल असर होता है, भूमि बरबाद होती है, जल संसाधनों का ह्रास व संदूषण होता है, वायु प्रदूषण होता है। इसके अलावा, श्रम व मानव अधिकार के मुद्दे तो स्वाभाविक रूप से उभरते ही हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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शराब कम करने में मददगार हार्मोन

यूं तो किसी भी जश्न (celebration culture) की जान होते हैं उससे जुड़े व्यंजन। लेकिन जश्न मनाने का एक चलन ‘पार्टी’ करने का भी है, जिसमें लोग शौकिया शराब पीते हैं। हज़ारों सालों से मद्यपान (drinking habit) की प्रवृत्ति मनुष्य ने दिखाई है और यदा-कदा त्यौहारों या जश्न में शराब पी जाती है। जैसे होली, शिवरात्रि में भांग तो घोटी जाती है लेकिन आजकल शराब की ओर भी काफी रुझान (alcohol trend) है। ऐसा ही एक सामूहिक जश्न अक्टूबरफेस्ट जर्मनी (Oktoberfest Germany) में मनाया जाता है, जिसमें लोग कई दिनों तक छककर शराब पीते हैं। लेकिन पीने की भी एक हद होती है, जिसके बाद पीने वाला कहता है अब बस। लेकिन ऐसा किसी को पता कब और कैसे चलता है कि बस अब बहुत पी ली है, अब और नहीं?

यही सवाल डेनमार्क (Denmark research)  के वैज्ञानिकों का शोध विषय बना। उनके शोध नतीजे बताते हैं कि जो हार्मोन गर्भावस्था के दौरान मॉर्निंग सिकनेस (सुबह—सुबह मितली) जैसा एहसास कराता है वही हार्मोन ‘बहुत हो गया’ का संकेत भी देता है।

दरअसल, गर्भावस्था के शुरुआती दौर में मॉर्निंग सिकनेस (morning sickness) का अनुभव होता है; ऐसा देखा गया है कि यह गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में ग्रोथ डिफरेंशिएशन फैक्टर-15 (GDF15) नामक हार्मोन के तेज़ी से बढ़ने के कारण होता है। वैसे तो यह हार्मोन शरीर के सारे ऊतक लगातार थोड़ी मात्रा में बनाते हैं लेकिन गर्भावस्था में अपरा यानी गर्भनाल इसका निर्माण काफी मात्रा में करने लगती है।

एक मत है कि मॉर्निंग सिकनेस सुरक्षा की दृष्टि से होती है: यह इशारा होता है कि गर्भवती मां खराब भोजन न खाए वरना भ्रूण को नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन GDF15 उन लोगों में भी मौजूद होता है जो गर्भवती नहीं हैं; लिहाज़ा, इसे भूख दबाने से भी जोड़ा गया है। दवा उद्योग इसे संभावित मोटापे-रोधी दवा के रूप में देख रहा है।

दरअसल युनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन (University of Copenhagen) के हार्मोन रोग विशेषज्ञ मैथ्यू गिलम पूर्व में एक अध्ययन में शामिल थे। उस अध्ययन में रॉकस्लाइड संगीत समारोह (music festival study) में जश्न मनाने वालों युवकों में विभिन्न हार्मोन्स के स्तरों की जांच की गई थी। जश्न में शामिल युवकों ने लगातार एक हफ्ते तक खूब ‘खाया-पीया’ था। अध्ययन में उनमें कई बदलाव दिखे थे; जिनमें से एक था GDF15 के स्तर में वृद्धि। इस अध्ययन ने गिलम को शराब के सेवन (alcohol effects) पर इस हार्मोन के प्रभाव के बारे में सोचने पर प्रेरित किया।

इस बारे में समझने के लिए गिलम और उनके साथियों (scientific study) ने कई अध्ययन किए। इस शृंखला में सबसे पहले उन्होंने एक बहुत छोटा अध्ययन किया। इसमें उन्होंने अक्टूबरफेस्ट में शामिल तीन लोगों के पार्टी से पहले और बाद के नमूने लिए। तीनों ने 3 दिन तक हर दिन लगभग 1 लीटर बीयर पी थी। विश्लेषण में इन लोगों में GDF15 का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया। हालांकि, अध्ययन बहुत छोटा था और यह भी स्पष्ट नहीं था कि यह बदलाव शराब पीने की वजह से ही हुआ है या अन्य अस्त-व्यस्त दिनचर्या की वजह से।

इसके बाद उन्होंने 12 मेडिकल विद्यार्थियों पर परीक्षण (clinical trial) किया, जिन्होंने पांच मानक पेग (60X5 मि.ली.) पिए थे। इन लोगों में GDF15 का स्तर बिल्कुल नहीं बढ़ा था। इससे ऐसा लगता है कि शराब के प्रति इस हार्मोन की प्रतिक्रिया शायद लगातार लंबे समय तक शराब पीने (chronic alcohol use) के बाद होती है, न कि थोड़े समय के लिए ज़्यादा शराब पीने से।

इस विचार को जांचने के लिए शोधकर्ताओं (alcohol addiction study) ने उन लोगों में GDF15 के स्तर को मापा जिन्हें शराब की लत थी। जिन वयस्कों को यह लत नहीं थी, उनकी तुलना में ज़्यादा शराब पीने वाले लोगों में GDF15 का स्तर औसतन लगभग पांच गुना ज़्यादा दिखा।

फिर उन्होंने लोगों के जेनेटिक और जीवनशैली से जुड़े डैटा का विश्लेषण किया। यूके बायोबैंक (UK Biobank data) से लिए गए इस डैटा का विश्लेषण करने पर उन्हें एक और दिलचस्प सम्बंध दिखा: जिन लोगों में एक ऐसा जेनेटिक उत्परिवर्तन होता है जो GFRAL (एक प्रोटीन रिसेप्टर जो GDF15 से जुड़ता है) को निष्क्रिय कर देता है, उन्होंने उत्परिवर्तन-रहित लोगों की तुलना में हर हफ्ते 26 मिलीलीटर ज़्यादा नीट शराब पी (250 मिलीलीटर वाइन या 500 मिलीलीटर बीअर के तुल्य)।

गिलम कहते हैं कि कुल मिलाकर ये नतीजे इस विचार (biological mechanism) की पुष्टि करते हैं कि लंबे समय तक शराब पीने की प्रतिक्रिया के रूप में GDF15 का स्तर बढ़ता है, और स्वस्थ लोगों में यह शराब पीने की मात्रा को नियंत्रित करता है। उनका अनुमान है कि जिन लोगों में जेनेटिक उत्परिवर्तन के कारण यह तंत्र काम नहीं करता या जिनमें शराब की लत के कारण GDF15 असंवेदी हो गया है, उनमें यह ‘फीडबैक लूप’ (feedback loop mechanism) काम नहीं करता, जिसकी वजह से शायद वे ज़्यादा शराब पीते हैं।

इसके बाद टीम ने चूहों (mouse experiment) पर भी परीक्षण किया। देखा कि क्या GDF15 शराब पीने की मात्रा कम कर सकता है, या यह सिर्फ भूख शांत करने में भूमिका निभाता है। उन्होंने चूहों को GDF15 का इंजेक्शन लगाया और मापा कि वे सादा पानी ज़्यादा पीते हैं या इथेनॉल (शराब) (ethanol alcohol) मिला हुआ। जैसी कि उम्मीद थी GDF15 ने चूहों की भूख तो कम की ही, साथ ही उनकी शराब पीने की मात्रा में भी कमी (reduced alcohol consumption) आई। यह कमी खाने में आई कमी से कहीं ज़्यादा थी। अन्य शोधकर्ताओं कहना है कि यह प्रयोग शराब पीने में GDF15 की भूमिका जानने की दिशा में एक अच्छा कदम है। लेकिन यह पुख्ता करने के लिए कि यह हार्मोन विशेष तौर पर शराब के प्रति कितना प्रभावी है, अलग-अलग तरह के खाद्य पदार्थों पर परीक्षण करने की ज़रूरत है।

एक संभावना यह भी है कि लगातार कई दिनों तक शराब पीने (liver damage risk) से लीवर को होने वाले नुकसान की वजह से GDF15 बन सकता है, लेकिन दूसरे अंग भी यह हार्मोन बना सकते हैं। इंसान हज़ारों सालों से शराब पीते आ रहे हैं, इसलिए यह मुमकिन है कि किसी चीज़ भी चीज़ की अति रोकने के लिए शरीर में कुछ तरीके (body regulation system) विकसित हुए हों।

शोधकर्ताओं को लगता है कि bioRxiv प्रीप्रिंट (bioRxiv research paper) में प्रकाशित इन नतीजों की मदद से शराब की लत का इलाज में करने में मदद मिल सकती है। लेकिन अभी वे गर्भवती महिलाओं में GDF15 का स्तर, जेनेटिक परिवर्तन और खान-पान में बदलाव (शराब सहित) (diet and alcohol behavior) का अध्ययन करने की योजना बना रहे हैं, ताकि यह देखा जा सके कि GDF15 क्रियामार्ग और शराब से तुष्टि के बीच कोई कार्य-कारण सम्बंध है या नहीं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चांद पर आलू उगाने के प्रयास

चंद्रमा पर फसल उगाने (Moon farming) का विचार, जो पहले सिर्फ विज्ञान-कथाओं का विषय था, अब धीरे-धीरे सच के करीब आ रहा है। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि आलू, जो बहुत आसानी से अलग-अलग परिस्थितियों में उग सकता है, चंद्रमा पर भी उग सकता है लेकिन इसके लिए पृथ्वी से कुछ मदद ज़रूरी होगी। इससे यह विश्वास पैदा होता है कि भविष्य में अंतरिक्ष यात्री (space missions food) लंबे मिशनों के दौरान अपना भोजन खुद उगा सकेंगे।

वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की मिट्टी जैसी मिट्टी बनाई, जिसे रेगोलिथ (lunar regolith) कहा जाता है। असली चंद्रमा की मिट्टी में पौधों के लिए ज़रूरी पोषक तत्व (soil nutrients) नहीं होते, इसलिए उसमें खेती करना बहुत कठिन है। इस समस्या को हल करने के लिए वैज्ञानिकों ने इसमें थोड़ी मात्रा में वर्मी कम्पोस्ट (केंचुए द्वारा बनाई खाद) मिलाई। उन्होंने पाया कि रेगोलिथ में सिर्फ 5 प्रतिशत खाद मिलाने से चंद्रमा सरीखे चुनौतीपूर्ण वातावरण में भी आलू उगने लगे।

इस प्रयोग में पाया गया कि आलू के पौधे लगभग दो महीने तक जीवित रह सकते हैं और उनमें कंद (खाने वाला हिस्सा) भी विकसित हो सकता है। यह अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए अच्छी खबर है, खासकर तब जब नासा जैसी एजेंसियां चंद्रमा (NASA moon base) पर स्थायी ठिकानों की योजना बना रही हैं। आलू को अंतरिक्ष खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि यह पोषण से भरपूर है और विभिन्न परिस्थितियों में आसानी से उगता है।

अलबत्ता, अध्ययन (research findings) में कुछ सीमाएं भी सामने आई हैं। चंद्रमा जैसी मिट्टी में उगाए गए आलुओं के डीएनए विश्लेषण से पता चला कि उनमें तनाव सम्बंधी जीन्स सक्रिय हुए थे। साथ ही इनमें तांबा और ज़िंक (heavy metals toxicity) जैसी धातुओं की मात्रा ज़्यादा पाई गई, जो मनुष्यों के लिए नुकसानदायक हो सकती हैं। हालांकि, इन आलुओं का पोषण स्तर (nutritional value) पृथ्वी पर उगाए गए आलुओं के बराबर ही रहा, जो शोधकर्ताओं के लिए हैरानी की बात थी।

साथ ही, वैज्ञानिकों (space environment challenges) का कहना है कि यह प्रयोग चंद्रमा की असल कठिन परिस्थितियों को पूरी तरह नहीं दर्शाता। प्रयोग में तीव्र विकिरण, तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव (extreme temperature) और वायुमंडल की लगभग अनुपस्थिति जैसी चीजें शामिल नहीं थीं। असल स्थितियों में खेती और मुश्किल होगी। फिर भी, यह शोध अंतरिक्ष में टिकाऊ जीवन (sustainable space living) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आगे के प्रयोगों में अलग-अलग किस्म के आलुओं को परखा जाएगा, ताकि यह पता चल सके कि कौन-सी किस्म चंद्रमा की परिस्थितियों में बेहतर उग सकती है। वैज्ञानिक यह भी उम्मीद कर रहे हैं कि भविष्य में पौधों में ऐसे बदलाव (genetic modification crops) किए जा सकेंगे, जिससे वे अंतरिक्ष में ज़्यादा अच्छी तरह जीवित रह सकें। (स्रोत फीचर्स)

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पारंपरिक दवाओं की प्रभाविता पर जांच

SHANGHAI, CHINA – DECEMBER 12: Employees work on the production line of traditional Chinese medicine ‘Tanreqing Zhusheye’ (sputum-heat clearing injection), which was listed on China’s diagnosis and treatment protocol for COVID-19 patients (Trial Version 9), at a workshop of Shanghai Kaibao Pharmaceutical Co., Ltd on December 12, 2022 in Shanghai, China. (Photo by VCG/VCG via Getty Images)

हालिया दिनों में चीन (China healthcare reforms) ने अपनी पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को वैज्ञानिक तरीके से परखने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। नए नियमों के तहत पारंपरिक चीनी चिकित्सा (TCM – Traditional Chinese Medicine) के इंजेक्शन बनाने वाली कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उनके उत्पाद सुरक्षित हैं, असरदार हैं और उनका वैज्ञानिक आधार (scientific validation) है। अगर ऐसा नहीं हो पाता, तो उनके उत्पाद बाज़ार से हटाए जा सकते हैं।

गौरतलब है कि इंजेक्शन (medical injections) सामान्य दवाओं की तरह मुंह से नहीं लिए जाते, बल्कि सीधे मासंपेशियों या शिराओं में लगाए जाते हैं। नए नियम सिर्फ इंजेक्शनों पर लागू होंगे। इन्हें कई वर्षों से दिल और फेफड़ों की बीमारियों के इलाज या कैंसर के उपचार के साइड इफेक्ट (cancer treatment side effects) कम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। अधिकांशत: ये मुंह से ली जाने वाली दवाइयों के ही सांद्रित रूप हैं। लेकिन समय के साथ इनकी प्रभाविता और सुरक्षा को लेकर सवाल उठे हैं, और कुछ मामलों में गंभीर दुष्प्रभाव भी सामने आए हैं।

इस कदम से यह लगता है कि चीन अब पारंपरिक चिकित्सा को परखने का तरीका (evidence based medicine) बदल रहा है। पहले TCM मुख्य रूप से लंबे अनुभव और परंपरागत ज्ञान पर आधारित थी, लेकिन अब इसे आधुनिक वैज्ञानिक मानकों (clinical standards) के अनुसार जांचा जा रहा है। यानी अब आधुनिक दवाओं की तरह ही इनके असर और उपयोगिता को प्रमाणों के आधार पर परखा जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे यह साफ हो सकेगा कि कौन-से उपचार सच में काम करते हैं और कौन-से नहीं।

यह सख्ती 2019 में दवा कानूनों (drug regulation laws) में हुए बदलावों का हिस्सा है। इन बदलावों के तहत अब सभी नई दवाओं, चाहे वे पारंपरिक ही क्यों न हों, को सुरक्षा और प्रभावशीलता के आधुनिक मानकों पर खरा उतरना होगा। नए नियम अब उन पुराने TCM इंजेक्शनों (approved drugs review) पर भी लागू किए जा रहे हैं, जिन्हें पहले इन सख्त मानकों के बिना ही मंजूरी मिल गई थी।

हालांकि, कंपनियों को यह तय करने की छूट दी गई है कि वे अपने उत्पादों के लिए सबूत कैसे देंगे। कुछ निर्माता पहले से मौजूद क्लीनिकल डैटा (clinical data) या वास्तविक उपयोग के रिकॉर्ड का उपयोग कर सकते हैं जबकि कुछ को नए शोध – जैसे अन्य दवाओं से गहन तुलनात्मक परीक्षण (comparative trials) – का सहारा लेना पड़ेगा। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अभी मौजूद TCM इंजेक्शनों में से लगभग एक-तिहाई तो बिना अतिरिक्त शोध के नए मानकों पर खरे उतरेंगे। कई सारे उत्पादों के पास पर्याप्त सबूत (insufficient evidence) नहीं हैं, इसलिए उनके बाज़ार से हटने की संभावना है।

सिर्फ सुरक्षा और असर साबित करना ही काफी नहीं होगा, कंपनियों को यह भी बताना होगा कि उनकी दवा शरीर में कैसे काम करती है। यह आसान नहीं है, क्योंकि इन दवाओं में अक्सर कई सक्रिय तत्व (active compounds) होते हैं। कई बार अलग-अलग तत्व मिलकर असर दिखाते हैं, इसलिए यह समझना मुश्किल होता है कि असली प्रभाव किस वजह से हो रहा है।

इन चुनौतियों के बावजूद कुछ वैज्ञानिक इसे एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि पारंपरिक दवाओं का गहराई से अध्ययन (pharmacological research) करने से नई औषधियों की खोज हो सकती है। इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण आर्टेमिसिनिन (artemisinin malaria drug) है, जो मलेरिया की दवा है और एक ऐसे पौधे से निकली है जिसका इस्तेमाल लंबे समय से चीनी पारंपरिक चिकित्सा में होता रहा है।

वैसे, जल्द ही लागू होने वाले ये नए नियम समस्त दवाइयों पर लागू रहेंगे, सिर्फ पारंपरिक चिकित्सा पर नहीं। इसके पीछे उद्देश्य है कि दवाओं के मज़बूत वैज्ञानिक प्रमाण हों, ताकि लोगों का भरोसा बढ़े और पारंपरिक चिकित्सा का महत्व भी बना रहे। इससे मरीज़ों को ज़्यादा सुरक्षित इलाज और यह स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी कि कौन-सी दवाएं वास्तव में असरदार हैं।

आज कई देश प्रमाण-आधारित चिकित्सा की ओर बढ़ रहे हैं; ऐसे में चीन का यह तरीका दुनिया भर में पारंपरिक उपचारों (global health policy) को परखने के लिए एक उदाहरण बन सकता है। भारत जैसे देश के लिए भी इस तरीके को अपनाना आवश्यक है जो पारंपरिक दवाओं का एक बड़ा बाज़ार है। (स्रोत फीचर्स)

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पृथ्वी पर ‘आज़माइशी’ जीवन की खोज 

डॉ. इरफ़ान ह्यूमन

जीवाश्म (fossils) वे अश्मीभूत अवशेष या निशान होते हैं जो किसी प्राचीन सजीव के मरने के बाद लाखों- करोड़ों वर्षों तक सुरक्षित रह जाते हैं। ज़रूरी नहीं कि जीवाश्म हमेशा पूरे के पूरे जीव के रूप में मिलें, बल्कि इनके कुछ हिस्से अश्मीभूत रूप मिल सकते हैं, जैसे हड्डियां या दांत, खोल या कवच (सीप, घोंघे के), पत्ती या लकड़ी की छाप, पदचिह्न, शरीर की छाप (जैसे एडिआकारा के जीवों की)। एडिआकारा के जीवाश्म अब तक खोजे गए सबसे अजीब जीवाश्मों में गिने जाते हैं। इनमें अजीब क्या है? जियोलॉजिकल सोसाइटी ऑफ अमेरिका (Geological Society of America) के स्रोत बताते हैं कि ये कोमल, मुलायम शरीर वाले जीव थे, जिनके जीवाश्म आश्चर्यजनक रूप से अत्यंत बारीक विवरणों के साथ सुरक्षित मिले हैं, वह भी ऐसी चट्टानों में जहां सामान्यत: संरक्षण संभव ही नहीं माना जाता।

दरअसल, जिन जीवों के पास कठोर खोल या हड्डियां नहीं होतीं, जैसे जेलीफिश (soft bodied organisms), वे जीव लगभग कभी भी जीवाश्म रिकॉर्ड में सुरक्षित नहीं मिल पाते। फिर, बलुआ-पत्थर में संरक्षण और भी कठिन होता है क्योंकि यह मोटे कणों से बनी चट्टान होती है, जिनमें पानी आसानी से रिस सकता है। ये चट्टानें आम तौर पर लहरों और तूफानों से प्रभावित अशांत वातावरण में बनती हैं। ऐसे हालातों में नाज़ु़क जैविक अवशेष जीवाश्म बनने से बहुत पहले ही सड़-गलकर नष्ट हो जाते हैं। फिर भी, पृथ्वी के इतिहास के एक चरण में लगभग 57 करोड़ वर्ष पहले कुछ असाधारण हुआ। इसे एडिआकारन काल (Ediacaran period) कहा जाता है। इस दौरान समुद्र तल पर रहने वाले कोमल शरीर वाले जीव रेत में दब गए और अभूतपूर्व सटीकता (exceptional fossilization) के साथ संरक्षित हो गए।

लगभग 63.5 करोड़ वर्ष पूर्व से 54.1 करोड़ वर्ष पूर्व तक, एडिआकारन काल पृथ्वी के इतिहास (geological time scale) का एक अत्यंत महत्वपूर्ण चरण था। एडिआकारन काल में पहली बार बड़े, जटिल और नग्न आंखों से देखे जा सकने वाले जीव प्रकट हुए। इस काल में अधिकांश जीवों के शरीर में न तो हड्डियां थीं, न कठोर खोल थे, बस त्रि-सममिति, सर्पिल, पत्तीनुमा और फ्रैक्टल जैसी विचित्र संरचनाएं थीं। अत: एडिआकारन काल वह समय था जब जीवन ने पहली बार जटिल बनने की हिम्मत की। यह प्रीकैम्ब्रियन युग (Precambrian era) का अंतिम दौर था, जिसके बाद कैंब्रियन युग शुरू हुआ।

ये जीव कैंब्रियन जैविक विस्फोट (Cambrian explosion) से केवल कुछ करोड़ वर्ष पहले जीवित थे। कैंब्रियन विस्फोट के दौरान जटिल व विविध जंतु जीवन का तेज़ी से उदय हुआ। लंबे समय तक इसे एक अचानक हुई जैविक क्रांति माना जाता रहा। लेकिन अब वैज्ञानिक इसे एक लंबी, धीरे-धीरे विकसित प्रक्रिया (gradual evolution) का परिणाम मानते हैं।

येल विश्वविद्यालय (Yale University) की जीवाश्म विज्ञानी डॉ. लिडिया टार्हन (Lydia Tarhan) इस प्रक्रिया को ‘लॉन्ग फ़्यूज़’ कहती हैं, जिसमें एडिआकारा जीव समूह के जानवर  आकार, जटिलता और पारिस्थितिक भूमिकाओं के क्रमिक विस्तार का एक शुरुआती चरण दर्शाते हैं। कुल मिलाकर यह काल जटिल पशु जीवन के लिए ‘भूमिका तैयार करने वाला मंच’ था।

अश्मीकरण की अनोखी प्रक्रिया (fossilization process)

इन जीवों का संरक्षण कैसे हुआ, यह समझना विकासक्रम (evolutionary history) में उनके स्थान को जानने के लिए बेहद ज़रूरी है। डॉ. लिडिया टार्हन और उनके सहयोगियों द्वारा किया गया एक अध्ययन, जो जियोलॉजी पत्रिका (Geology journal) के 15 दिसम्बर, 2025 के अंक में प्रकाशित हुआ, इस प्रक्रिया पर नई रोशनी डालता है। अध्ययन का शीर्षक है: Authigenic clays shaped Ediacara-style exceptional fossilization।

अध्ययन में शोधकर्ताओं (scientific study) ने एक नई रासायनिक तकनीक अपनाई। उन्होंने न्यूफाउंडलैंड और उत्तर-पश्चिमी कनाडा से मिले एडिआकारा जीवाश्मों में लीथियम समस्थानिकों का विश्लेषण किया। इनमें वे जीवाश्म भी शामिल थे जो रेतीले और कीचड़युक्त दोनों प्रकार के तलछट में सुरक्षित थे। इन समस्थानिकों से यह पता लगाने में मदद मिली कि क्या मिट्टी के खनिजों ने अश्मीभूत करने में भूमिका निभाई और क्या ये मिट्टियां ज़मीन से बहकर आई थीं (डिट्राइटल क्ले – detrital clay) या समुद्र तल के भीतर ही बनी थीं (ऑथिजेनिक क्ले)।

पता चला कि डिट्राइटल मिट्टी के कण पहले से ही उस तलछट में मौजूद थे, जिसने इन जीवों को ढंका था। इन्हीं कणों की सतह पर नई मिट्टियां समुद्र तल के भीतर ही बनने लगीं। सिलिका और लौह से भरपूर समुद्री जल तथा एडिआकारन काल के महासागरों की असामान्य रसायनिकी (ocean chemistry) ने इन ऑथिजेनिक मिट्टियों को बढ़ने में मदद की।

असल में, ये मिट्टियां प्राकृतिक सीमेंट (natural cementation) की तरह काम करने लगीं। इन्होंने रेत के कणों को आपस में बांध दिया और कोमल ऊतकों की महीन आकृतियों और छापों को रेत-पत्थर में स्थायी रूप से सुरक्षित कर दिया। डॉ. टार्हन भविष्य में इसी लीथियम समस्थानिक तकनीक (geochemical analysis) को अन्य क्षेत्रों और कालों के जीवाश्मों पर लागू करने की योजना बना रही हैं, ताकि यह देखा जा सके कि क्या ऐसी ही प्रक्रियाएं कहीं और भी सक्रिय थीं। फिलहाल, यह अध्ययन हमें उस दौर की पृथ्वी की कहीं अधिक स्पष्ट तस्वीर (ancient Earth history) देता है, जब जंतु जीवन के विकास में एक निर्णायक मोड़ आया था।

यह खोज उस पुरानी धारणा (scientific theory) को चुनौती देती है कि आखिर एडिआकारा बायोटा (Ediacara biota) इसलिए सुरक्षित रहे क्योंकि उनके शरीर असाधारण रूप से मज़बूत या रासायनिक रूप से प्रतिरोधी थे। इसके बजाय, अब यह स्पष्ट होता है कि इनका जीवाश्म रिकॉर्ड (preservation conditions) में बच पाना असाधारण पर्यावरणीय परिस्थितियों का परिणाम था।

कहां मिलते हैं ये जीवाश्म

एडिआकारा बायोटा के जीवाश्म (global fossil sites) ऑस्ट्रेलिया, रूस, कनाडा, भारत, नामीबिया जैसे कई देशों में मिले हैं। भारत में मध्य प्रदेश (भीमबैठका) और राजस्थान (जोधपुर सैंडस्टोन) (India fossil sites) के प्राचीन तलछटों में इनके पाए जाने का दावा है।

वैज्ञानिकों के लिए अब भी यह पहेली है कि ये जीव आधुनिक जानवरों के पूर्वज थे या नहीं? या ये जीवन की कोई अलग, अब विलुप्त शाखा (extinct life forms) थे! इसी कारण इन्हें कभी-कभी ‘आज़माइशी जीवन रूप’ (एक्सपेरिमेंटल लाइफ फॉर्म्स – experimental life forms) भी कहा जाता है।

जो भी हो, हम आज जो जीवन देखते हैं, वह जीवाश्मों की डायरी (history of life on Earth) पढ़कर ही समझा गया है, वरना पृथ्वी का अतीत पूरी तरह रहस्य बना रहता! (स्रोत फीचर्स)

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समुद्र की गहराइयों में ऑक्सीजन कैसे आई

प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) में 4000 मीटर की गहराई पर ऑक्सीजन की खोज की सबसे पहली खबर 2024 में नेचर जियोसाइन्स जर्नल (Nature Geoscience journal) में प्रकाशित हुई थी। यह खोज ए. स्वीटमैन की टीम ने की थी। इसके साथ ही वैज्ञानिकों के बीच गहमागहमी शुरू हो गई। कारण यह था कि इतनी गहराई पर ऑक्सीजन का पाया जाना एक रहस्य जैसा था क्योंकि वहां सूरज की रोशनी तो पहुंचती नहीं जो प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis process) की क्रिया को ऊर्जा दे सके। गौरतलब है कि धरती पर ऑक्सीजन मूलत: पेड़-पौधों द्वारा सूरज के प्रकाश की उपस्थिति में सम्पन्न प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया से ही पैदा होती है। लिहाज़ा, यह सवाल स्वाभाविक है कि इतनी गहराई के अंधकार में कौन-सी प्रक्रिया ऑक्सीजन उत्पादन (oxygen production mystery) को अंजाम दे रही है।

अब वैज्ञानिक समुद्र की गहराई (deep ocean research) में और प्रयोगशाला में समुद्री गहराई की परिस्थितियां निर्मित करके इस सवाल का जवाब पाने की कोशिश करेंगे। इसके लिए वैज्ञानिक एक शोध जहाज़ नौटिलस पर सवार होकर हवाई और मेक्सिको के बीच स्थित क्लेरियन-क्लिपरटन क्षेत्र (Clarion Clipperton Zone) में जाएंगे जहां पहली खोज की गई थी और समुद्र में कुछ खोजी यंत्र उतारकर नमूने एकत्रित करेंगे और वहां कई चीज़ों का मापन भी करेंगे।

ये खोजी यंत्र पानी की अम्लीयता (water acidity pH level) का मापन करेंगे। यदि अम्लीयता अधिक मिलती है तो कहा जा सकेगा कि वहां हाइड्रोजन की उपस्थिति बहुत ज़्यादा है अर्थात वहां पानी के अणु टूट रहे हैं।

मूल अध्ययन के दौरान ऑक्सीजन उस क्षेत्र में मिली थी जहां कई धातुओं (metal nodules) से बनी डल्लियां (जैसे बड़ी होती है) मिली थीं। इनमें मैंगनीज़ और कोबाल्ट जैसी मूल्यवान धातुएं भी पाई गई थीं। ये डल्लियां वहां करोड़ों साल पहले बनी होंगी। वैज्ञानिकों ने इसके आधार पर अनुमान लगाया था कि शायद यही धातुएं पानी के विघटन को उत्प्रेरित कर रही हैं – लगभग उसी तरह जैसे प्रयोगशाला में पानी के विद्युत विच्छेदन से हाइड्रोजन और ऑक्सीजन बनती है। यह एक संभावना मात्र है। यह भी हो सकता है कि वहां मौजूद सूक्ष्मजीव (deep sea microbes) यह ऑक्सीजन बना रहे हों। मौजूदा खोजबीन इन दो संभावनाओं के बीच निर्णय करने का प्रयास है। इसके लिए कई कसौटियों पर आधारित मापन ज़रूरी है और खोजी यंत्रों पर तमाम किस्म के उपकरण (scientific instruments) लगाए गए हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्राचीन ग्रीक पुजारिनें अनुष्ठान पेय कैसे बनाती थीं

प्राचीन समय में ग्रीक के एक शहर एल्यूसिस (Eleusis Greece) में एक अनुष्ठान हुआ करता था, जिसे नाम दिया गया है एल्यूसिनियन मिस्ट्रीज़ (Eleusinian Mysteries)। मिस्ट्रीज़ इसलिए कि एक तो उस समय सख्त पाबंदियों के कारण इस संस्कार में होने वाली चीज़ों का खुलासा करने की मनाही थी, और अब भी इसके कई पहलू वैज्ञानिकों के लिए रहस्य ही बने हुए हैं। इन रहस्यों में से एक है इस अनुष्ठान के दौरान पीया जाने वाली पेय, काइकॉन (Kykeon drink), जिसे दीक्षा लेने वाले लोगों द्वारा एक देवी के सम्मान में पीया जाता था। ऐसा माना जाता था कि देवी अपना गम ग़लत करने के लिए काइकॉन पीती थीं। जिन्होंने भी काइकॉन पीया था उनके बयानों से पता चलता है कि इसे पीने के बाद एक अलग ही अनुभव होता है; जैसे आप किसी दूसरी ही दुनिया में पहुंच गए हो। उनके ये विवरण ऐसे लगते थे जैसे अनुभव अक्सर लायसर्जिक एसिड डाईइथाइलएमाइड (LSD) जैसे मतिभ्रम उत्पन्न करने वाले ड्रग्स (hallucinogenic drugs) लेने पर होते हैं।

लेकिन अब ऐसा लगता है कि वैज्ञानिकों (modern research) ने अलौकिक दुनिया में ले जाने वाले इस पेय को बनाने का नुस्खा पता कर लिया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि प्राचीन ग्रीक पुजारिनें जौ पर पनपने वाली एक परजीवी फफूंद से काइकॉन बनाती थीं, जो LSD जैसा असर देती थीं और जिसे पीकर लोगों को अजीबोगरीब चीज़ें दिखती थी और विचित्र अनुभव (psychedelic experience) होते थे।

दरअसल हर संस्कृति, समुदाय में दुनिया और उसके क्रियाकलापों को समझाने के लिए कुछ पारंपरिक-पौराणिक कहानियां (Greek mythology) प्रचलित होती हैं। प्राचीन ग्रीकवासियों के पास भी कुछ कहानियां थी। जैसे एक कहानी के अनुसार, पाताललोक का शासक हेडिस पृथ्वी की फसल की देवी डिमीटर की बेटी पर्सेफोन (Persephone myth) का हरण कर लेता है। देवता हेडिस के साथ समझौता करते हैं, और तय होता है कि पर्सेफोन हर साल के कुछ दिन अपनी मां के साथ पृथ्वी पर बिताएगी और साल के बाकी दिन पाताल में रहेगी। जब पर्सेफोन पाताल में होती, देवी डिमीटर दुख में इतना डूब जाती हैं कि पृथ्वी पर फसलें उगना बंद हो जाती हैं। अपना दुख दूर करने के लिए देवी डिमीटर काइकॉन नामक पेय पीती हैं। ग्रीक पुराणों (ancient myths) में यह मौत और पुनर्जन्म के चक्र का एक कहानी-फलसफा है जिसे एल्यूसिनियन संस्कार के समय दीक्षा लेने वालों को रस्मी तौर पर सुनाया जाता था।

हालांकि इस संस्कार की रस्मों को गोपनीय रखे जाने के कड़े नियम थे, लेकिन फिर भी कहीं-कहीं थोड़ा उल्लेख मिल जाता है। जैसे सातवीं सदी ईसा पूर्व की एक इबारत (ancient text) में काइकॉन बनाने के नुस्खे के बारे में अंदाज़ा मिलता है। इबारत में, डिमीटर बताती हैं कि काइकॉन में “जौ, पानी और थोड़ा पुदीना” होता है। इस इबारत के आधार पर वैज्ञानिकों का अंदाज़ा था कि इस पेय में जंगली घास और अनाजों पर पनपने वाली फफूंद एर्गोट मतिभ्रम करने वाली अलौकिक अनुभूति की ज़िम्मेदार होती होगी। जैसा कि अब वैज्ञानिक जानते हैं कि कुछ विशिष्ट परिस्थितियों में, जैसे कि क्षारीय माध्यम में, एर्गोट से लायसर्जिक एसिड एमाइड्स (lysergic acid amides) बन सकते हैं। लायसर्जिक एसिड एमाइड्स LSD जैसे ही रसायन होते हैं और वैसा ही प्रभाव देते हैं। लेकिन यह भी पता है कि यदि एर्गोट को ठीक से प्रोसेस नहीं किया जाए तो इसके विषैले यौगिक (toxic compounds) अपना असर दिखाते हैं, नतीजतन ऐंठन, गैंग्रीन जैसी समस्या हो सकती है और यहां तक कि मौत भी हो सकती है।

उक्त जानकारी के आधार पर, काइकॉन का नुस्खा पता कर रहे शोधकर्तांओं (scientists study) को इतना अंदाज़ा तो था कि प्राचीन पुजारिनें राख से बने क्षारीय घोल की मदद से एर्गोट से लायसर्जिक एसिड एमाइड्स हासिल करती होंगी। लेकिन ठीक तरीका स्पष्ट नहीं हो पाया था, क्योंकि ज़रा भी गड़बड़ी जानलेवा हो सकती थी।

यह पता करने के लिए शोधकर्ताओं ने एर्गोट फफूंद को पीसकर पाउडर बनाया और अलग-अलग क्षारीयता और सांद्रता वाले राख के घोल में मिला दिया। इसके बाद, उन्होंने इस मिश्रण को अलग-अलग समयावधि के लिए उबाला। इस तरह उन्होंने नमूनों को 48 अलग-अलग तरीकों (scientific testing) से गर्म किया।

उन्हें मात्र एक तरीके से एर्गोट से ऐसा यौगिक मिला जो विषैलेपन से मुक्त था और मतिभ्रम जैसा असर देता था (psychoactive compound)। शोधकर्ताओं को एक निश्चित क्षारीयता वाले राख के घोल में एर्गोट मिलाकर, उसे 120 मिनट तक उबालने पर लायसर्जिक एसिड एमाइड्स प्राप्त हुए थे (chemical process)।

साइंटिफिक रिपोर्ट्स (Scientific Reports journal) में प्रकाशित इन नतीजो से पता चलता है कि हज़ारों साल पहले भी लोग LSD जैसे यौगिक बनाकर उनका उपयोग (ancient chemistry) करते थे। लेकिन कुछ वैज्ञानिक इन निष्कर्षों के प्रति थोड़ा चेताते हैं: उनका कहना है कि यह अध्ययन महज संभावना बताता है कि ग्रीकवासी पेय बनाने के लिए ऐसा करते होंगे, लेकिन वे वास्तव में ऐसा करते थे या नहीं, पता नहीं (research limitations)।

एक रास्ता तो यह हो सकता है कि एल्यूसिस में मिले प्राचीन बर्तनों (archaeological evidence) में एर्गोट के अवशेष खोजे जाएं। यदि मिलते हैं तो पक्के तौर पर कुछ कहा जा सकेगा। आगे शोधकर्ताओं का इरादा भी ऐसे ही अवशेष तलाश करने का है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या ‘विज्ञान-समर्थित’ सप्लीमेंट्स सच में भरोसेमंद हैं?

दियों से अश्वगंधा (Withania somnifera) की जड़ आयुर्वेद में तंदुरुस्ती और मनदुरुस्ती के लिए इस्तेमाल होती रही है। आज यह एक लोकप्रिय वेलनेस ट्रेंड (wellness trend) बन चुकी है। सोशल मीडिया और विज्ञापनों में इसे तनाव कम करने, नींद सुधारने, ऊर्जा बढ़ाने और दिमाग तेज़ करने जैसे कई फायदों से जोड़ा जा रहा है, जिससे इसकी लोकप्रियता काफी बढ़ गई है। लेकिन वैज्ञानिक रूप से इसके फायदे और असर भली-भांति साबित (scientific evidence) नहीं हुए हैं।

हाल के कई क्लीनिकल परीक्षणों (clinical trials) की समीक्षा से यह संकेत मिलता है कि अश्वगंधा तनाव, चिंता और अवसाद (stress anxiety depression) कम करने में मदद करता है। लेकिन इन अध्ययनों की अपनी सीमाएं हैं: वे छोटे स्तर पर किए गए हैं और उनके तरीके अलग-अलग हैं; इसलिए पक्के निष्कर्ष निकालना मुश्किल है। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे पूरी तरह प्रमाणित इलाज नहीं, बल्कि एक संभावित सहायक सप्लीमेंट (dietary supplement) मानते हैं, जिस पर अभी और अधिक शोध की ज़रूरत है।

अश्वगंधा की बढ़ती लोकप्रियता के चलते नियामक संस्थाओं (regulatory authorities) के बीच बहस भी पैदा हो गई है। फ्रांस और डेनमार्क जैसे देशों ने खासकर गर्भवती महिलाओं, बच्चों और कुछ बीमारियों से ग्रस्त लोगों के लिए इसकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। डेनमार्क ने तो 2023 में अश्वगंधा युक्त उत्पादों पर प्रतिबंध भी लगा दिया था। वहीं भारत का आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) इसे सामान्य रूप से सुरक्षित मानता है, लेकिन यह भी कहता है कि कुछ लोगों में इसके साइड इफेक्ट हो सकते हैं।

गौरतलब है कि अश्वगंधा एक बड़े और तेज़ी से बढ़ते सप्लीमेंट बाज़ार (supplement market) का हिस्सा है। आजकल कोलाजेन, मशरूम एक्सट्रैक्ट, प्रोबायोटिक्स, मैग्नीशियम और ओमेगा-3 जैसे सप्लीमेंट भी काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। अमेरिका और युरोप में बड़ी संख्या में लोग नियमित रूप से इनका सेवन करते हैं, और आने वाले समय में यह बाज़ार बहुत तेज़ी से बढ़ने वाला है। इनकी लोकप्रियता का बड़ा कारण यह दावा है कि ये विज्ञान-समर्थित हैं, यानी इनके फायदे वैज्ञानिक शोध (evidence based claims) से साबित हुए हैं।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि कई सप्लीमेंट्स के पीछे का विज्ञान उतना साफ और स्पष्ट नहीं होता, जितना विज्ञापनों (marketing claims) में दिखाया जाता है। शुरुआत में सप्लीमेंट्स का इस्तेमाल विटामिन की कमी को पूरा करने के लिए होता था, जैसे रिकेट्स के लिए विटामिन डी का। लेकिन समय के साथ बाज़ार ऐसे उत्पादों की ओर बढ़ गया जो सामान्य सेहत सुधारने (general wellness) के लिए होते हैं, न कि किसी खास बीमारी के इलाज के लिए। दिक्कत यह है कि इनके ‘ऊर्जा बढ़ाने’ या ‘इम्युनिटी मज़बूत करने’ (immunity booster) जैसे दावों को सही तरह से मापना मुश्किल है।

नियम-कानून इस मामले को और जटिल बना देते हैं। कई देशों में सप्लीमेंट्स को दवाओं (food vs medicine regulation) की बजाय खाद्य पदार्थ माना जाता है, जहां उनकी सुरक्षा को प्रमाणित करना तो ज़रूरी होता है, लेकिन असर को साबित करना ज़रूरी नहीं होता। अमेरिका में स्थिति यह है कि यदि कंपनियां किसी बीमारी के इलाज का दावा न करें, तो अनुमति लिए बिना उसे लेकर सामान्य स्वास्थ्य से जुड़े दावे कर सकती हैं। इससे ये उत्पाद जल्दी बाज़ार में आ जाते हैं और निगरानी भी सीमित हो सकती है। वहीं युरोप में कंपनियों को ऐसे दावों के लिए ज़्यादा मज़बूत वैज्ञानिक प्रमाण (scientific proof) देने पड़ते हैं, लेकिन वहां भी कई बार अधूरी जानकारी के आधार पर ही निर्णय लिए जाते हैं।

एक और बड़ी समस्या यह है कि सप्लीमेंट्स एक जैसे नहीं होते। उनकी मात्रा, बनाने का तरीका और पौधे के किस हिस्से का उपयोग किया गया है (dosage variation), ये सब अलग-अलग हो सकते हैं। इसके चलते अलग-अलग अध्ययनों की आपस में तुलना करना मुश्किल हो जाता है (research variability)। उदाहरण के लिए, अश्वगंधा से जुड़ी कुछ सुरक्षा चिंताएं उन शोधों पर आधारित थीं, जिनमें बहुत अधिक मात्रा या पूरे पौधे का इस्तेमाल किया गया था, जो सामान्य उपयोग से अलग हो सकता है।

ऐसे सबूतों को समझना वैज्ञानिकों के लिए भी आसान नहीं होता। कई बार एक ही विषय पर अलग-अलग अध्ययन अलग नतीजे देते हैं, क्योंकि उनकी गुणवत्ता, सैंपल और तरीके अलग होते हैं। ऐसे में नियम बनाने वाली संस्थाओं को तय करना पड़ता है कि किस अध्ययन पर ज़्यादा भरोसा किया जाए। विशेषज्ञों के अनुसार, ये फैसले पूरी तरह अंतिम सच तय करने के बारे में नहीं होते, बल्कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर सबसे सही लगने वाले निष्कर्ष (data interpretation)  तक पहुंचने की कोशिश होते हैं।

बहरहाल, विज्ञान-समर्थित सप्लीमेंट्स (science backed supplements) की बढ़ती लोकप्रियता से यह स्पष्ट होता है कि लोग अब अपनी सेहत पर खुद नियंत्रण रखना (self-care trend) चाहते हैं। लेकिन यह भी सामने आता है कि वैज्ञानिक शोध और विज्ञापनों के दावों में फर्क है। कुछ सप्लीमेंट्स सच में फायदेमंद हो सकते हैं, लेकिन कई के लिए सबूत अभी सीमित या पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। इसलिए किसी नुस्खे के विज्ञान-समर्थित होने के दावे का मतलब यह नहीं है कि वह हमेशा असरदार ही होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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