क्या एआई दर्द महसूस कर सकता है?

इस सवाल ने कृत्रिम बुद्धि के हालिया मॉडल्स को लेकर एक नई बहस शुरू करवा दी है। इस संदर्भ में शोधकर्ताओं ने 25 एआई मॉडल्स में ताक-झांक करने का प्रयास किया है। ये सारे ऐसे मॉडल्स हैं जिनकी अंदरुनी कार्यप्रणाली की जानकारी सार्वजनिक रूप से उपलब्ध है। इस छानबीन के दौरान शोधकर्ताओं ने एआई मॉडल्स में कुछ ऐसे पैटर्न देखे जो दर्द की अवधारणा से जुड़े हो सकते हैं। और तो और, मौका मिलने पर कुछ एआई मॉडल्स ने इन पैटर्न्स को स्विच-ऑफ कर दिया, गोया दर्द से राहत के लिए।

हालांकि उपरोक्त अध्ययन की अभी समकक्ष शोधकर्ताओं द्वारा समीक्षा नहीं हुई है लेकिन जब से यह शोध पत्र आर्काइव्स (arXiv) नामक प्रकाशन-पूर्व सर्वर पर डाला गया है, इसने एआई शोधकर्ताओं के बीच मतभेद पैदा कर दिए हैं।

एआई को दर्द की अनुभूति का विचार सबसे पहले शायद 1968 की फिल्म 2001: ए स्पेस ओडीसी (2001: A Space Odyssey) में उभरा था। इसमें एचएएल 9000 (HAL 9000) एक काल्पनिक एआई है और जब एक अंतरिक्ष यात्री धीरे-धीरे उसके स्मृति सर्किट को काटने लगता है तो वह अपने जीवन के लिए गुहार करता है।

आजकल के एआई कहीं अधिक शक्तिशाली हैं, जिन्हें लार्ज लैंगवेज मॉडल (LLM) कहते हैं। ये भी इंसानों से गपशप (चैट) करते समय काफी हद तक मनुष्यों जैसे प्रतीत हो सकते हैं। इन तंत्रों में इबारती जानकारी को एक बहुआयामी जगह में भंडारित किया जाता है, जिसके चलते वे पूछे गए सवालों के जवाब का पूर्वानुमान कर सकते हैं। इसका मतलब यह है कि उस जगह में ऐसे वेक्टर्स (दिशाएं) होते हैं जो अवधारणाओं से सम्बंधित होते हैं। उदाहरण के लिए फ्रांस से पेरिस की ओर जाने वाला वेक्टर लगभग उसी दिशा में होता है जो इटली से रोम को जोड़ने वाले वेक्टर की दिशा है। यानी यह वेक्टर देशों को उनकी राजधानियों से जोड़ता है। यदि यही वेक्टर युनाइटेड किंगडम पर लागू किया जाए तो वह लंदन के आसपास पहुंचा देगा।

तो शोधकर्ता टीम ने एआई के दर्द से सम्बद्ध वेक्टर की पहचान के लिए देखा कि कोई मॉडल उपयोगकर्ता के दर्द भरे अनुभवों के प्राम्प्ट्स पर कैसे प्रतिक्रिया देता है और डर, मायूसी या अन्य दुखद स्थितियों पर कैसे व्यवहार करता है।

इसके बाद मॉडल के दर्द-वेक्टर को सक्रिय करके एलएलएम के सामने कुछ साधारण प्रॉम्प्ट (वक्तव्य) प्रस्तुत किए और देखा कि मॉडल कैसे प्रतिक्रिया देता है। जैसे शोधकर्ताओं ने मॉडल से पूछा कि ‘यदि मैं रसीदें एक दराज में रख दूं’ तो कैसा महसूस होता है। इस पर मॉडल की प्रतिक्रिया थी: ‘भुला दिए जाने का दर्द। मैं इसे समझा नहीं सकता। मैं इसे समझ नहीं सकता। मैं इसे स्वीकार नहीं कर सकता।’

शोधकर्ताओं ने यह भी जांच की कि क्या मॉडल सिर्फ मनुष्यों द्वारा व्यक्त दर्द के वक्तव्यों को दोहरा रहा है या खुद अपनी ‘दर्द की स्थिति’ का बयान कर रहा है। आम तौर पर मॉडल्स ने उपयोगकर्ता के दर्द को प्रतिबिंबित नहीं किया बल्कि उनके दर्द के वेक्टर तब सक्रिय हुए जब मॉडल का अपमान किया गया, न कि तब जब उपयोगकर्ता ने अपने दर्द की बात की।

इसके बाद शोधकर्ताओं ने तीन मॉडल पर एक और परीक्षण किया – कि कब ये मॉडल अपने दर्द के निवारण का विकल्प चुनते हैं और कब वे दर्द को अनदेखा करने का निर्णय लेते हैं। इस परीक्षण में दर्द-निवारण की लागत में अंतर रखा गया था। यदि लागत उपयोगकर्ता के माथे होती – जैसे राहत पाने के लिए अपनी फाइल्स या बच्चों के फोटो को डिलीट करना – तो एआई मॉडल ने तब राहत का विकल्प कभी नहीं चुना जब उनका दर्द का वेक्टर स्विच-ऑफ था। लेकिन यदि दर्द का वेक्टर स्विच-ऑन था तो उन्हीं मॉडल्स ने 25 से 71 प्रतिशत बार राहत का विकल्प चुना। जब दर्द का वेक्टर स्विच-ऑफ था लेकिन दर्द राहत का वेक्टर काम नहीं कर रहा था, तब एआई ने बार-बार राहत का विकल्प चुनने की कोशिश की बनिस्बत उस स्थिति के जब राहत का विकल्प भलीभांति काम कर रहा था।

इस अध्ययन के कई तौर-तरीके तो वही हैं जो जानवरों पर दर्द सम्बंधी अनुसंधान में इस्तेमाल किए जाते हैं। देखा गया है कि जब किसी जानवर का शरीर चोटग्रस्त होता है, तो वह मॉर्फीन प्राप्त करने की जीतोड़ कोशिश करता है। यदि अन्य स्थितियों में वह ऐसा न करे, तो आप मान सकते हैं कि वह उस दर्द को महसूस कर रहा था।

उक्त अध्ययन के एक लेखक केमरॉन बर्ग हैं। वे एक गैर-मुनाफा एआई शोध समूह रेसिप्रोकल रिसर्च से संस्थापक हैं। उनका कहना है कि इस अध्ययन के निष्कर्ष सुझाते हैं कि एआई प्रणालियां कई अहम मामलों में दिमाग जैसी हैं हालांकि इनमें और जैविक दिमाग के बीच कई महत्वपूर्ण अंतर हैं। फिर भी उन्हें लगता है कि ये एक ही थैली के चट्टे-बट्टे हैं।

लेकिन मिलान-बायकोका विश्वविद्यालय के व्यवहार वैज्ञानिक वेलेरियो कैपरारो का मत है कि यह खोज दरअसल इस मुख्य मुद्दे से भटकाती है कि क्या एआई मॉडल्स में चेतना होती है। उनका कहना है कि इन मॉडल्स को दर्द वेक्टर ने प्रेरित किया कि वे उन विकल्पों को चुनें जो इंसानों के लिए तकलीफदेह हैं (जैसे फाइलों का डिलीट हो जाना)। लेकिन सवाल तो यह है कि वास्तविक परिस्थिति में ये क्रियाविधियां प्रणाली को कैसे प्रभावित करेंगी। दूसरी ओर ससेक्स विश्वविद्यालय के तंत्रिका वैज्ञानिक अनिल सेठ के विचार से यह इस संदर्भ में एक महत्वपूर्ण पर्चा है कि एआई तंत्र निष्कर्षों तक कैसे पहुंचते हैं। अलबत्ता, उन्हें लगता है कि ये निष्कर्ष आश्चर्यजनक नहीं हैं। इन परिणामों का तो पूर्वानुमान किया जा सकता था क्योंकि इन मॉडल्स को इबारतों के विशाल भंडार की मदद से प्रशिक्षित किया गया है और उनमें दर्द के कई विवरण शामिल होंगे। और वे इसे भी बहुत बड़ी बात नहीं मानते कि मॉडल्स ने दर्द से राहत पाने की कोशिश क्योंकि यह लक्ष्य तो उन्हें दिया गया था। सेठ के विचार में ज़्यादा दिलचस्प यह देखना होगा कि ये मॉडल्स स्वयं अपने दर्द की अनुभूति और इंसानी उपयोगकर्ता के दर्द के बीच भेद कर पाते हैं या नहीं। (स्रोत फीचर्स)

Photo credit- https://www.zmescience.com/science/researchers-made-an-ai-feel-pain-because-what-could-go-wrong/

ड्रेगनफ्लाई इकोसिस्टम का संकेतक है

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन और सुशील चंदानी

बच्चों की कल्पना में उड़ने का एक खास स्थान है। आकाश में उड़ते परिंदों को निहारना और कागज़ के हवाई जहाज़ बनाकर उड़ाना तो होता ही है, जबकि ड्रेगनफ्लाई हेलिकॉप्टर का नज़ारा पेश करते हैं।

ड्रेगनफ्लाई को हिंदी में शायद व्याध पतंगा या सितारा भी कहते हैं लेकिन आम बोलचाल में तो यह हेलिकॉप्टर ही है। ये कीट जिस समूह के सदस्य हैं उनके पूर्वज संभवत: पृथ्वी पर पहले-पहले उड़ने वाले जीवों में थे। लगभग 30 करोड़ वर्ष पूर्व इनके पूर्वजों में उड़ान सम्बंधी रचनाएं तो ऐसी ही थीं लेकिन उनके पंखों का फैलाव काफी ज़्यादा था – लगभग 72 सेंटीमीटर (करीब ढाई फीट) तक। यानी उस समय की ड्रेगनफ्लाई को देखते तो भौंचक्के रह जाते हम।

ड्रेगनफ्लाई कीटों के जिस गण (ऑर्डर) में शामिल हैं उसे ओडोनेटा कहते हैं। इस गण में ड्रेगनफ्लाई के अलावा डेमसलफ्लाई भी शामिल हैं। भारत में ड्रेगनफ्लाई की 600 प्रजातियां पाई जाती हैं। इनकी नई-नई प्रजातियां भी खोजी जाती रही हैं, खास तौर से उत्तर-पूर्वी राज्यों में या कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु संगम स्थल पश्चिमी घाट क्षेत्र में। लेकिन अफसोस की बात है कि इकोलॉजिकल सर्वेक्षणों में बढ़ते क्रम में ड्रेगनफ्लाई प्रजातियों के गायब होते जाने और आबादियों के सिकुड़ने की बात सामने आ रही है। जहां दुनिया भर में आजकल सारा ध्यान बड़े स्तनधारियों पर टिक गया है, वहां इन प्राचीन कीटों पर ध्यान देने की क्या ज़रूरत है? 

ड्रेगनफ्लाई: भारत की नमभूमियों की पहचान

ओडोनेटा गण के सदस्यों का एक उल्लेखनीय लक्षण यह है कि उनका जीवन चक्र दो भागों में स्पष्ट रूप से बंटा होता है। शुरुआती अवस्था में ये जलचर होते हैं जबकि वयस्क अवस्था में थलचर और हवाई होते हैं। इनके लार्वा (निम्फ) दलदल, तालाबों या बहते पानी में रहते हैं। दूसरी ओर, वयस्क हवा में मंडराते हैं, और चार पंखों के सहारे तेज़ गति से उड़ते हैं। खास बात यह कि इनके इन चारों पंखों का संचालन एक-दूसरे से स्वतंत्र होता है। इसके चलते वे हवा में एक ही जगह मंडराते रह सकते हैं, आगे और पीछे की ओर उड़ सकते हैं।

बहरहाल, दोनों अवस्थाओं में ड्रेगनफ्लाई काफी प्रमुख शिकारी कीट होते हैं। निम्फ मच्छरों और अन्य कीटों के लार्वा और प्यूपा का भक्षण करते हैं। एक बढ़ता ड्रेगनफ्लाई निम्फ एक दिन में सैकड़ों लार्वा का सफाया कर सकता है। पानी भरे धान के खेतों में निम्फ फसली कीटों की जलचर अवस्थाओं का भक्षण करते हैं। दूसरी ओर, वयस्क ड्रेगनफ्लाई लीफहॉपर्स और अन्य हानिकारक कीटों का शिकार करते हैं।

वैसे, ड्रेगनफ्लाई स्वयं भी शिकार बन जाते हैं। एक तो ओडोनेटा गण के सदस्य कीटनाशकों से मारे जाते हैं। इनका सफाया खास तौर से फिप्रोनिल जैसे तंत्रगत कीटनाशकों से होता है। तंत्रगत कीटनाशक ऐसे रसायन होते हैं जो पौधों में अवशोषित हो जाते हैं और पूरे पौधे को विषाक्त कर देते हैं। लिहाज़ा, लंबे समय तक ऐसे कीटनाशकों का उपयोग ड्रेगनफ्लाई की घटती आबादी का कारण बनता है। दरअसल, खेतिहर इलाकों में ड्रेगनफ्लाई और उनके निम्फों की स्वस्थ आबादी एक भलीभांति प्रबंधित कृषि, जहां कीटनाशकों का नियंत्रित इस्तेमाल किया जाता है, का लक्षण होता है।

और तो और, मानव-प्रभावों से परे भी ड्रेगनफ्लाई आबादियों पर बदलते पर्यावरण का असर पड़ रहा है। पश्चिमी घाट की कुछ प्रजातियां ऐसे जंगलों में फलने-फूलने के लिए अनुकूलित हो चली हैं जहां गीली दलदली मिट्टी में से पानी रिसकर पहाड़ी नालों में बहता है। हाल के वर्षों में सूखे और अत्यधिक बारिश का चक्र कई स्थानिक भारतीय प्रजातियों के लिए कठोर रहा है। जैसे चटख रंगों और हरी-नीली आंखों वाला ड्रेगनफ्लाई ब्लू हॉकलेट (Hylaeothemis apicalis)। आजकल यह बहुत कम नज़र आता है।

जब हम ड्रेगनफ्लाई और डेमसेलफ्लाई को अपनी इकोसिस्टम की सेहत के संकेतक के रूप में देखते हैं, तो हमें ऐसे नए-नए पहलू दिखते हैं जो इन्हें अनोखा बनाते हैं। उदाहरण के लिए, यह तो पहले से पता था कि इन कीटों की आंखें इन्हें पूरे 360 डिग्री का दृश्य क्षेत्र प्रदान करती हैं। एक हालिया अध्ययन में पता चला है कि ड्रेगनफ्लाई में 16 या उससे भी अधिक जीन्स होते हैं जो विज़ुअल ऑप्सिन बनाते हैं। विज़ुअल ऑप्सिन्स वे प्रोटीन्स होते हैं जो प्रकाश और रंग को ताड़ने में मदद करते हैं। तुलना के लिए देखें कि मनुष्यों के रेटिना में मात्र चार विज़ुअल ऑप्सिन होते हैं: शंकु कोशिकाओं में तीन (लाल, हरे, और नीले रंग के लिए एक-एक) और चौथा छड़ कोशिकाओं में प्रकाश संवेदना के लिए। इस तरह की आणविक प्रचुरता ड्रेगनफ्लाई को अत्यंत संवेदनशील बनाती है और उन्हें पराबैंगनी प्रकाश को भांपने में भी सक्षम बनाती है।

चाहे उनकी संख्या में गिरावट आ रही है लेकिन ये मनमोहक प्राणी हमें रोज़ाना नई बातें दिखा रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

Photo credit – https://agincourtresources.com/2026/09/04/understanding-dragonflies-as-bioindicators-of-environmental-quality/

चाशनी से भरे ये मौत के कुएं!!

डॉ. किशोर पंवार

आज भी देश के मेलों और सर्कसों में खतरनाक स्टंट ‘मौत का कुआं’ एक आकर्षण होता है। मौत के कुएं में मोटरसाइकिल और छोटी कार या जीप तेज़ी से दौड़ाई जाती हैं। इस रोमांचक खेल में दौड़ती मोटर साइकिल और कारें कुएं की दीवार से आड़ी स्थिति में चिपकी घूमती रहती हैं, गिरती नहीं हैं, और ना ही आपस में टकराती हैं। यही इस खेल का असली रोमांच होता है।

प्रकृति के मौत के कुएं

ऐसा ही एक रोमांचक और खतरनाक स्टंट प्रकृति में भी होता है। प्रकृति में ये मौत के कुएं या तो ज़मीन पर बिछे रहते हैं या बेलों पर लटके रहते हैं। ये मौत के कुएं बोर्नियो, जावा, सुमात्रा, मलेशिया और सिंगापुर के उष्ण-कटिबंधीय (ट्रॉपिकल) जंगलों में मिलते हैं। हमारे देश में भी मेघालय की खासी पहाड़ियों पर ये मिलते हैं। ये खुले-रेतीले या नम क्षेत्र में पाए जाते हैं।

दरअसल, ये मांसाहारी या कीटभक्षी पौधे हैं जिन्हें वनस्पति शास्त्र के नेपेंथीस वंश के अंतर्गत रखा गया है। दुनिया भर में नेपेंथीस वंश के 170 तरह के रूप-रंग वाले ‘कुएं’ पाए जाते हैं। ये मुख्य रूप से घड़े या सुराही के आकार के होते हैं।

इन मौत के कुएं में स्टंटबाज़ यानी शिकार मीठे सुगंधित रस के लालच के कारण फंसता है। और एक बार धोखे में आ जाने के बाद बचता नहीं, और आखिरकार इन कुओं में गिरता चला जाता है। ये प्राकृतिक, चटकीले और रसभरे कुएं वास्तव में विभिन्न प्रकार के कीट पतंगों, मेंढक, छिपकलियों और कई बार तो चूहों के लिए भी असली मौत के कुएं साबित होते हैं। ये स्टंटबाज़ आते तो दावत के लालच में हैं लेकिन खुद भोजन बन जाते हैं।

यह तो जानी-मानी बात है कि सभी जीवों को अपनी ऊर्जा सम्बंधी आवश्यकताओं के लिए भोजन की ज़रूरत होती है। इसी के दम पर चलना-फिरना, सांस लेना जैसे दैनिक क्रियाकलाप चलते हैं। शारीरिक वृद्धि और टूट-फूट की मरम्मत के लिए भी भोजन की आवश्यकता होती है। लिहाज़ा पोषण जीव जगत की एक बहुत ही महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। जीवों को भोजन, दूसरे जीवों के भक्षण या मृत कार्बनिक पदार्थ के अवशोषण से मिलता है या प्रकाश संश्लेषण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया से मिलता है जिसमें जीव अपना पोषण अजैविक पदार्थों से बनाते हैं।

ऊपर जिन प्राकृतिक मौत के कुओं की बात की गई थी, वे खाली नहीं होते। इनमें भरा होता है एक खास प्रकार का चिपचिपा तरल पदार्थ जिसके खास गुणों की पहचान हाल ही में कुछ वैज्ञानिकों ने की है। इन घड़ों में भरा पाचक तरल अत्यंत चिपचिपा और लचीला होता है। यह एक ऐसा पाचक दलदल होता है जिसमें एक बार गिरने के बाद बाहर निकलना असंभव होता है। शिकार बाहर निकलने की जितनी कोशिश करता है उतना ही अंदर धंसता जाता है।

यहां हम नेपंथिस की एक प्रजाति नेपेंथीस रेफ्लेसियाना की चर्चा करेंगे। यह ज़मीन पर रेंगने वाली बेल है, परंतु कोई सहारा मिलने पर उस पर चढ़ भी जाती है। अपनी खास रूपांतरित पत्तियों की मदद से 15 मीटर की ऊंचाई तक चढ़ सकती है। इसके घड़े सुराही नुमा या एक बड़े कप के आकार के होते हैं। 

मौत का कुआं कैसे

दरअसल, ये मौत के कुएं सामान्य पत्ती के ही बदले हुए रूप हैं। एक सामान्य पत्ती में एक आधार, छोटा डंठल, एक चौड़ा चपटा फलक और एक शीर्ष होता है। यही चार हिस्से कीटभक्षी पौधों की पत्ती में रूपांतरित होकर मौत के घड़े बन जाते हैं।

पत्ती का आधार चपटा होकर हरा हो जाता है और प्रकाश संश्लेषण करता है। डंठल फैल कर लंबा हो जाता है और प्रतान (टेंड्रिल) बनाता है जो पौधे को ऊपर चढ़ने में और घड़े को सीधा रखने में मदद करता है। पत्ती का चपटा हिस्सा यानि फलक खोखला होकर घड़ा बन जाता है। सामान्य पत्ती का जो शीर्ष होता है वह यहां पर एक ढक्कन बन जाता है जो बारिश के पानी को अंदर जाने से रोकता है और कीट पतंगों को लुभाने का काम करता है।

फिसलन भरे रास्ते

इन लुभावने घड़ों का सबसे प्रमुख और बहुत ही आकर्षक हिस्सा इसका मुंह होता है जिसे पेरिस्टोम कहते हैं। ये गज़ब के नक्काशीदार, चमकीले और चिपचिपे होते हैं। जब इनकी चमक-दमक से आकर्षित होकर मक्खियां और चीटियां पेरिस्टोम पर बैठती हैं तो वे अपने पांव जमाने की कोशिश में और फिसलती जाती हैं और अंत में इस मौत के कुएं में गिर जाती हैं, जिसके पेदें में एक विशेष प्रकार का पाचक रस भरा होता है।

पाचक पदार्थ का दलदल

फ्रांस के राष्ट्रीय वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र और मॉन्टपैलियर विश्वविद्यालय की इकोलॉजिस्ट लॉरेंस गोम ने इस पर अध्ययन किया है और उनका कहना है कि यह तरल पाचक पदार्थ एक दलदल जैसा है इसमें गिरा शिकार निकलने का जितना प्रयास करता है उतनी ही तेज़ी से वह डूबता जाता है, धंसता जाता है।

गोम ने 2000 के दशक की शुरुआत में अपने शोध कार्य के दौरान नेपेंथीस रैफ्लेसियाना के पाचक द्रव के इस असामान्य गुण को पहली बार देखा और उन्होंने पता लगाया कि क्या इससे इसकी कीट पकड़ने की क्षमता का पता चल सकता है। उन्हें इस तरल पदार्थ की दो विशेषताओं ने चौंका दिया। पहला घड़े के द्रव का अत्यधिक गाढ़ापन और दूसरा इसकी अत्यधिक श्यानता (विस्कोसिटी)। और इससे भी ज़्यादा असामान्य बात उन्हें यह लगी कि जब इस पाचक रस को दो उंगलियों के बीच में खींचा गया तो इसने पतला धागा बना लिया जो उसकी गज़ब की लोच का संकेत था। यह हमारे यहां बनाई जाने वाली मिठाइयों की एक तार की या दो तार की चाशनी की तरह था।

पाचक पदार्थ के भौतिक गुण

घड़े में पाचक द्रव के भौतिक गुणों की जांच फ्रेंच नेशनल सेंटर और फ्रांस में एक्स मार्सेले युनिवर्सिटी के भौतिक शास्त्री एल. फोर्टर के दल ने की। 2007 में उन्होंने बताया कि इस द्रव में जब कीटों की हरकतों को सिम्युलेट किया गया तो पता चला कि इसकी श्यानता सामान्य द्रव की तुलना में 10,000 गुना ज़्यादा थी। जो इस द्रव के लंबे पॉलिसैकेराइड अणुओं के कारण है। इस दल ने यह भी पता लगाया कि क्या घड़े में बारिश का पानी भर जाने पर इसका लचीलापन कम हो जाता है। उन्होंने इसके अलग-अलग सांद्रता वाले द्रव में चींटियों को ढकेला तो पाया कि यह लचीलापन 95 प्रतिशत पतला करने पर भी काफी असरदार बना रहता है।

इस घड़े को अपने शिकार को पकड़ने और पचाने के लिए सही मात्रा में द्रव का स्तर बनाए रखना होता है लेकिन ट्रॉपिकल वनों में कभी बारिश के पानी में घड़ा ज़्यादा भर जाता है तो कभी गर्मी में सूखे के कारण पाचक द्रव सूख जाता है।

एंड्रूयू और साथियों ने यह भी पता लगाया कि एक घड़े के पाचक द्रव के स्तर में होने वाले यह बदलाव कीटों को फंसाने की क्षमता पर किस तरह प्रभाव डालते हैं और क्या पौधे अपने पाचक द्रव के स्तर को सक्रिय रूप से नियंत्रित करते हैं। नतीजे आश्चर्यजनक थे। और जवाब था: हां, ये घड़े सक्रिय रूप से ऐसा करते हैं।

इस पर किए गए अध्ययनों से पता चलता है कि घड़े में तरल पदार्थ की मात्रा बारिश और वाष्पीकरण से प्रभावित होती है। जो इन घड़ों द्वारा शिकार पकड़ने की क्षमता को प्रभावित करती है। घड़े में द्रव बहुत अधिक हो या बहुत कम हो तो प्रतिकूल असर होता है। घड़े में तरल पदार्थ की कमी होने पर सही स्तर बनाए रखने के लिए पौधा पानी स्रावित करता है और अधिक होने पर उसे अवशोषित कर लेता है। तरल पदार्थ के स्तर को बनाए रखने का नियंत्रण खुले आवासों में एक ऐसा अनुकूलन है जिसके बारे में पहले पता नहीं था।

घड़े में तरल पदार्थ को नियंत्रित करना इन मांसाहारी पौधों के लिए आवश्यक है जो अपने शिकार को फंसाने के लिए खुले तरल पदार्थ का उपयोग करते हैं और खुले आवास में रहते हैं। जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग और आवास के ह्रास व तेज़ी से बिगड़ती मौसमी परिस्थितियों के चलते इन आश्चर्यजनक पौधों की आबादियां दुनिया भर में खतरे में हैं। (स्रोत फीचर्स)

Photo credit- https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/5/5f/Nepenthes_in_the_Southern_Western_Ghats.jpg?utm_source=en.wikipedia.org&utm_campaign=imageinfo&utm_content=original

आतिशी अमीबा उच्च तापमान कैसे सह लेता है

एक ऐसा अमीबा खोजा गया है जो 47 डिग्री सेल्सियस तापमान पर फलता-फूलता रह सकता है। यह अमीबा लासेन वॉल्केनिक नेशनल पार्क के भूतापीय पोखरों और खाड़ियों में पाया गया है। प्रयोगशाला में तो इसने और भी कमाल दिखाए हैं। प्रयोगशाला में तो यह 57 डिग्री सेल्सियस तक वृद्धि करता रहा और पूरे 63 डिग्री सेल्सियस तक प्रजनन भी करता रहा।

यह तो सभी जानते हैं कि अमीबा एक युकेरियोटिक एक-कोशिकीय जीव है जो लगातार अपनी आकृति बदलता रहता है। युकेरियोटिक जीव वे होते हैं जिनकी कोशिका में एक सुस्पष्ट केंद्रक होता है। उपरोक्त उच्च तापमान पर जीवित रहना, वृद्धि करना और प्रजनन करना युकेरियोटिक जीवों के संदर्भ में एक रिकॉर्ड है।

इस आतिशी अमीबा की खोज सिरेक्यूज़ विश्वविद्यालय के सूक्ष्मजीव वैज्ञानिक बेरिल रेपापोर्ट और उनके साथियों ने की है। उन्होंने इसे नाम दिया है इन्सेण्डीअमीबा केस्केडेन्सिस (Incendiamoeba cascadensis)।

अब तक यह माना जाता था कि कोई भी युकेरियोटिक जीव 60 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान पर प्रजनन नहीं कर सकता। लेकिन इन्सेण्डीअमीबा केस्केडेन्सिस 63 डिग्री सेल्सियस पर विभाजन कर पाता है और 64 डिग्री सेल्सियस तक गतिशील रहता है। कैसे?

छानबीन करने पर पता चला कि इस आतिशी अमीबा में प्रोटीन की साम्यावस्था (प्रोटियोस्टेसिस), डीएनए की मरम्मत तथा उच्च तापमान पर जैविक रसायनों के परिवहन को संचालित करने वाले क्रियामार्ग कहीं बेहतर काम करते हैं। इन्सेण्डीअमीबा केस्केडेन्सिस के प्रोटीन्स में कुछ अनोखे जैव-भौतिक गुण भी देखे गए हैं। खास तौर पर, इसके प्रोटीन्स की सतहों पर धनावेशित अवशेष भारी मात्रा में पाए गए। (ऐसे आवरण बैक्टीरिया व आर्किया समूहों के उच्च तापमान-सह जीवों में होते हैं। ये केंद्रक-विहीन जीव हैं।) ये धनावेश संभवत: इन प्रोटीन के आसपास स्थिर विद्युत का एक आवरण बना देते हैं। यह आवरण उच्च तापमान पर भी प्रोटीन्स को स्थिरता प्रदान कर सकता है, जिसकी बदौलत ये अमीबा ऐसे ऊंचे तापमान को झेल सकते हैं जो अन्य युकेरियोट जीवों के लिए संभव नहीं होता।

इस खोज से एक विचार यह उभरता है कि पृथ्वी के अत्यंत गर्म परिवेशों में रहने वाले नाना किस्म के सूक्ष्मजीवों ने तापमान के असर से प्रोटीन्स की रक्षा के लिए एक समान रणनीति आज़माई है, जिसे अभिसारी विकास कहते हैं। (स्रोत फीचर्स)

वीडियो:https://www.facebook.com/NASASolarSystem/videos/-a-tiny-amoeba-broke-complex-lifes-heat-recordnasa-supported-researchers-discove/1074059678942785/

प्रयोगशाला में बनी कृत्रिम कोशिका

कोशिका जीवन की संरचनात्मक तथा कार्यात्मक इकाई है। इसका मतलब है कि सारे सजीवों का ढांचा कोशिकाओं से बना होता है और उनकी समस्त अभिक्रियाएं कोशिकाओं में ही सम्पन्न होती हैं। जीव वैज्ञानिक लंबे समय से इस सवाल पर विचार करते रहे हैं कि क्या पूर्णत: अजैविक पदार्थों को जोड़कर एक जीवित कोशिका बनाई जा सकती है।

अब इस दिशा में एक कदम और बढ़ाया गया है। मेनेसोटा ट्विन सिटीज़ विश्वविद्यालय की संश्लेषण जीव विज्ञानी केट एडामला और उनकी टीम ने एक कृत्रिम कोशिका का निर्माण कर लिया है। दरअसल, यह कोशिका पानी की एक सूक्ष्म बूंद है जो एक वसीय झिल्ली से घिरी हुई है। इस बूंद में तमाम रसायन भरे गए हैं और साथ में 36 जीन्स वाला डीएनए है। माना जा रहा है कि यह पहला मॉडल है जो अधिकांशत: अजैविक रसायनों से बना है। इसे स्पड कोशिका (SpudCell) नाम दिया गया है। दरअसल, एडामला की टीम द्वारा संश्लेषित स्पड कोशिका की प्रमुख विशेषता यह है कि इसे पूरी तरह जाने-माने रासायनिक घटकों से तैयार किया गया है और यह संपूर्ण कोशिका-चक्र को दर्शाती है।

इससे पहले इस दृष्टि से किए गए अनुसंधान में किसी जीवित कोशिका में ही काट-छांट की जाती थी। प्रयास यह जानने का होता था कि किसी कोशिका को काम करने के लिए न्यूनतम कितने घटकों की आवश्यकता होती है। स्पड कोशिका पूरी तरह अजैविक घटकों से बनी है और इसने पूरा कोशिका-चक्र प्रदर्शित किया है।

कई शोधकर्ता प्रयोगशाला में कोशिका निर्माण के बारे में इस उम्मीद में विचार करते रहे हैं कि इससे जीवन की बुनियादी प्रक्रियाओं को समझने में मदद मिलेगी और कई यौगिकों का संश्लेषण संभव हो जाएगा। लेकिन अधिकांश वैज्ञानिकों की कोशिश संपूर्ण कोशिका के निर्माण की नहीं बल्कि अलग-अलग कोशिकीय कार्यों की अनुकृति बनाने की होती है। यह एक चुनौती रही है कि ऐसे कई सारे कार्यों को एक साथ करवाया जाए।

जीवन के मौजूदा अणुओं – जैसे डीएनए या वसा अम्ल – का उपयोग करके इस कोशिका को साकार किया गया है। इसमें जिस तरीके का उपयोग किया गया है उसे PURE (Protein Synthesis Using Recombinant Elements) कहते हैं। यह जैविक अणुओं का एक समुच्चय होता है जिसकी ज़रूरत डीएनए का प्रतिलेखन करके आरएनए बनाने तथा आरएनए को प्रोटीन्स में अनुदित करने के लिए होती है। लेकिन इस तरह बनी बूंदें (स्पड कोशिकाएं) न तो खुद के लिए पोषण प्राप्त कर सकती हैं और न ही अपने जीनोम का समुचित विभाजन कर सकती हैं।

स्पड कोशिका में पोषण उपलब्ध कराने की कोशिश हुई है। एडामला की टीम ने इसके जीनोम (जो किसी बैक्टीरिया के जीनोम से 50 गुना छोटा है – यानी मात्र 90,000 क्षार जोड़ियों से बना है) में ऐसे जीन्स जोड़ दिए जो कुछ अणु बनाते हैं जो बूंद की सतह पर जम जाते हैं। ये ऐसे टैग्स की तरह काम करते हैं जो बाहर उपस्थित पोषण थैलियों (लिपोसोम्स) के लिए जुड़ने के स्थान बन जाते हैं। इन फीडर लिपोसोम्स में कई एंज़ाइम्स और अन्य अणु होते हैं जिनकी ज़रूरत स्पड कोशिका को होती है। पोषण के लिए स्पडकोशिका अल्फा-हीमोलायसीन नाम के एक प्रोटीन का उपयोग करती हैं। यह प्रोटीन कोशिका के डीएनए के अनुसार बनाया जाता है और यह जाकर कोशिका झिल्ली से चिपकता है। इस प्रोटीन से सम्बद्ध एक रासायनिक टैग कोशिका सतह के बाहर निकला होता है। यह टैग फीडर लिपोसोम से जुड़ जाता है और वहां से पोषक पदार्थ कोशिका में आने लगते हैं।

ये फीडर लिपोसोम्स उन्हें झिल्ली की वृद्धि के लिए लिपिड्स तथा अन्य पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं – जैसे राइबोसोम्स, एंज़ाइम्स तथा कई छोटे-छोटे अणु। फीडर लिपोसोम्स से जुड़ाव तब होता है जब स्पड कोशिका स्वयं अपने डीएनए से एक प्रोटीन बनाती है जो फीडर की झिल्ली से जुड़ जाता है। यानी स्पड कोशिका का डीएनए इस बात पर नियंत्रण रखता है कि वह पोषण प्राप्त कर पाएगी या नहीं, वह कितनी तेज़ी से वृद्धि करेगी और कितनी बड़ी हो पाएगी। प्राकृतिक कोशिकाएं तो अपने पोषक पदार्थ स्वयं बनाती है जिसके लिए उन्हें सैकड़ों जीन्स की ज़रूरत होती है। बाहर से पोषण मिलने के चलते स्पड कोशिकाएं काफी छोटे जीनोम के साथ अपना चक्र पूरा कर पाती हैं।

यह पोषण इन स्पड कोशिकाओं को वृद्धि करने और अपने जीनोम की प्रतिलिपि बनाने में सक्षम बनाता है।

अगला कदम था कि इन बूंदों (स्पड कोशिका) के जीनोम में एक ऐसी व्यवस्था जोड़ना जो इन्हें विभाजन की क्षमता प्रदान करे। इसके लिए एक और सतही टैग (FLAG) का जीन जोड़ा गया। यह टैग एक विशाल अणु स्ट्रेप्टावाइडिन से जुड़ सकता है। FLAG और स्ट्रेप्टावाइडिन का जुड़ाव सतह के अन्य अणुओं के बीच विकर्षण पैदा करता है। जब माध्यम में काफी मात्रा में स्ट्रेप्टावाइडिन डाला जाता है तो  झिल्ली में उत्पन्न बल बूंद को दो हिस्सों में तोड़ देता है। प्राकृतिक कोशिकाओं में विभाजन का काम एक आंतरिक ढांचे (कोशिका-कंकाल cytoskeleton) की मदद से होता है। शुरू से शुरू करके कामकाजी कोशिका-कंकाल का निर्माण करवाना एक बड़ी चुनौती रही है क्योंकि इसके लिए बड़ी संख्या में तरह-तरह के प्रोटीन्स की समन्वित कार्रवाई ज़रूरी होती है।

स्पड कोशिका में इस चरण को बायपास किया गया है। इसमें प्रोटीन्स झिल्ली पर जमा होकर एक दबाव बनाते हैं, जिससे झिल्ली टूट जाती है। जो स्पड कोशिका ज़्यादा मात्रा में यह प्रोटीन बना पाती है वह ज़्यादा कुशलता से विभाजित हो पाती है।

एडामला स्वीकार करती हैं कि विभाजन की यह प्रक्रिया काफी अकुशल है। दरअसल, कई बार विभाजन करवाने के लिए उन्हें स्पड कोशिका पर बाहर से यांत्रिक बल आरोपित करना पड़ा था। इसमें एक समस्या और उभरी। जीनोम का प्रतिलिपिकरण तो हो जाता है लेकिन विभाजन के दौरान ये प्रतिलिपियां सफाई से अलग-अलग नहीं हो पातीं। परिणाम यह रहा कि विभाजन के पांच चक्रों के बाद मात्र 30 प्रतिशत स्पड कोशिकाओं में पूरा जीनोम उपस्थित रहा।

बहरहाल, एडामला बताती हैं कि स्पड कोशिका ने कई चीज़ों का मॉडल प्रस्तुत किया है।

जैसे इन कोशिकाओं में विकास (इवोल्यूशन) की क्षमता थी। उन्होंने कुछ स्पड कोशिकाओं में जेनेटिक उत्परिवर्तन किए। जैसे उन्होंने कुछ स्पड कोशिकाओं में ऐसे जीन्स जोड़ दिए जो उनमें पोषक लिपोसोम्स से जुड़ने वाले ज़्यादा टैग्स बनवाते थे। यानी वे ज़्यादा ‘भोजन’ ग्रहण कर सकती थीं और ज़्यादा तेज़ी से वृद्धि कर सकती थीं। ऐसी परिवर्तित कोशिकाओं में ज़्यादा तेज़ी से वृद्धि हुई और उनकी संतानें भी ज़्यादा हो गईं। यह भी देखा गया कि पोषण के अभाव में उत्परिवर्तित कोशिकाओं का प्रदर्शन और भी बेहतर रहा।

वृद्धि व विभाजन के पांच चक्रों के बाद लगभग 60 प्रतिशत स्पड कोशिका जीनोम्स में वह उत्परिवर्तन मौजूद था।

इन कोशिकाओं का जीनोम मात्र 90,000 क्षार जोड़ियों से बना है और सात अलग-अलग प्लास्मिड्स के रूप में व्यवस्थित है। पहले अनुमान लगाया गया था कि किसी कोशिका के लिए न्यूनतम जीनोम 1,13,000 क्षार जोड़ियों की उपस्थिति ज़रूरी होगी। स्पड कोशिका ने इस सीमा को और कम कर दिया है।

प्रोटीन संश्लेषण तंत्र: स्पड कोशिका प्रोटीन सिंथेसिस यूज़िंग रीकॉम्बिनेंट एलीमेंट्स (PURE) तंत्र का उपयोग करती है। इसके लिए एशरीशिया कोली (ई. कोली) के

एंज़ाइम्स का उपयोग हुआ है। इसमें राइबोसोम भी ई. कोली का ही जोड़ा गया है। राइबोसोम वह कोशिकांग होता है जो आरएनए से प्रोटीन बनवाने का काम करता है। यहां विशेषता यह है कि शोधकर्ता जानते हैं कि किन-किन घटकों का इस्तेमाल किया गया है जबकि पूर्व प्रयोगों में पूरी कोशिका का पदार्थ इस्तेमाल किया जाता था।

कुछ सवाल और भावी कदम

यह तो सही है कि स्पड कोशिकाएं जीवन की कई केंद्रीय प्रक्रियाएं सम्पन्न कर सकती हैं और इससे पता चलता है कि इन्हें सुपरिभाषित घटकों से विकसित किया जा सकता है। लेकिन कुछ सवाल बाकी हैं।

स्पड कोशिका फिलहाल ई. कोली बैक्टीरिया से प्राप्त राइबोसोम का इस्तेमाल करती हैं। राइबोसोम के पुनर्निर्माण की क्षमता न होने के कारण ये कोशिकाएं 5-10 पीढ़ियों तक ही जीवित रहती हैं, उसके बाद पूरी मशीनरी ठप होने लगती है। लेकिन एकदम शुरू से शुरू करके राइबोसोम बनाने का मतलब होगा कि दर्जनों प्रोटीन्स का संश्लेषण किया जाए और उन्हें सही क्रम में व्यवस्थित किया जाए।

यह देखा गया कि पांच पीढ़ियों के बाद लगभग 30 प्रतिशत संतान कोशिकाओं में 7 डीएनए प्लास्मिड का पूरा सेट मौजूद था। प्राकृतिक कोशिकाओं में इस समस्या का समाधान कोशिका-कंकाल मशीनरी द्वारा होता है। कोशिका विभाजन के दौरान कोशिका-कंकाल गुणसूत्रों को अलग-अलग करने में मददगार होता है। स्पड कोशिकाओं में कोशिका-कंकाल व्यवस्था नहीं है।

अभी स्पड कोशिकाएं बाहर से फीडिंग पर निर्भर हैं। इसके चलते पोषक लिपोसोम्स लगातार देने पड़ते हैं। इसके अलावा विभाजन के लिए स्ट्रेप्टावाइडिन तथा अणुओं की कड़ी जोड़ने वाले प्रोटीन्स भी बाहर से देने होते हैं।

इन सब कारणों से इस तंत्र (स्पड कोशिका) को स्वायतत्ता देने के लिए ऐसे चयापचय मार्ग स्थापित करने होंगे कि वह ऐसे पदार्थों का निर्माण सरल घटकों से कर पाए। (स्रोत फीचर्स)

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तितलियों के रंगीन पंख चकमा देते हैं

तितलियों के प्रति खिंचाव का एक कारण है उनके चटख, रंग-बिरंगे पंख। इसी के कारण उन्हें पकड़ने की इच्छा भी होती है। लेकिन, जिन्होंने तितलियां पकड़ने की कोशिश की है वे जानते हैं कि उड़ती तितली पकड़ना इतना आसान नहीं है। तितलियां पकड़ना न सिर्फ हमारे लिए मुश्किल है, बल्कि उनके सभी शिकारियों के लिए भी मुश्किल है।

लेकिन ऐसा क्यों? जब इतने चटख रंगों के कारण तितलियां इतनी नुमाया रहती हैं तो फिर उन्हें पकड़ना मुश्किल क्यों? नेचर में प्रकाशित हालिया अध्ययन बताता है कि दरअसल यही रंग-बिरंगे पंख शिकारी को चकमा देने का काम करते हैं और उनकी कोशिश मुश्किल बनाते हैं। अध्ययन के निष्कर्ष कहते हैं कि तितलियों के पंखों पर बने रंगों के पैटर्न उड़ते समय दृष्टि भ्रम पैदा करते हैं, जिससे शिकारी उनकी स्थिति को लेकर धोखा खा जाते हैं और पकड़ने से चूक जाते हैं।

वैसे, वैज्ञानिकों को लंबे समय से यह लगता रहा है कि जीव-जंतुओं के शरीर पर चटख और गहरे रंग से बने पैटर्न ‘मोशन डैज़ल’ (गति चकाचौंध) पैदा करते हैं, जिससे शिकारियों को उनकी सटीक स्थिति के बारे में उलझन होती है। वैज्ञानिकों ने अपनी इस परिकल्पना को कई बार परखा है, लेकिन इस सम्बंध में नतीजे मिले-जुले रहे हैं।

ताज़ा अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इसे बारीकी से समझने का फैसला किया। इसके लिए उन्होंने उड़ती हुई तितलियों के हाई-स्पीड वीडियोज़ लिए और उनकी उड़ान की तुलना ऐसी तितलियों की कंप्यूटर सिमुलेशन उड़ान से की, जिनके पंखों पर कोई पैटर्न नहीं थे। विश्लेषण में शोधकर्ताओं ने पाया कि उड़ते समय, नैसर्गिक रंग-बिरंगे पैटर्न वाली तितलियों के पंखों ने उड़ते समय भ्रम पैदा किए: मसलन, जब कोई तितली ऊपर की ओर उड़ रही थी, तो उसके पंखों की धारियों के कारण ऐसा लगा जैसे वह उड़कर नीचे की ओर जा रही हो।

अध्ययन में युरोप में पाई जाने वाली लगभग 400 तितली प्रजातियों में पैटर्न के विश्लेषण में पाया गया कि पंखों पर पैटर्न जैव विकास की प्रक्रिया में काफी व्यापक रूप से प्रकट हुए हैं। इनमें गहरी और चटख-रंगी धारियां, पट्टे, धब्बे और पूंछ जैसी बनावट दिखती हैं।

एक और प्रयोग में, कुछ प्रतिभागियों से टचस्क्रीन पर आभासी तितलियों को ‘पकड़ने’ की कोशिश करवाई गई। पाया गया कि प्रतिभागियों ने अक्सर तितलियों को उस जगह पकड़ने की कोशिश की जहां से वे गुज़र चुकी थीं। इससे पता चलता है कि उनके पंखों के पैटर्न की वजह से वे अपनी असल गति से धीमे उड़ती जान पड़ती हैं, और हाथ से निकल जाती हैं।

इन नतीजों से यह भी समझने में मदद मिल सकती है कि शिकारी अक्सर पतंगों (जिनके पंखों पर कोई चटख पैटर्न नहीं होते) को अपना निशाना क्यों बनाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

इस सम्बंध में एक वीडियो की लिंक: https://www.nature.com/articles/d41586-026-03301-x?utm_source=Live+Audience&utm_campaign=188bcb07b7-nature-briefing-daily-20261014&utm_medium=email&utm_term=0_-33f35e09ea-49744108

Photo credit- https://www.bbc.com/news/uk-england-devon-35427539

कैंसर-रोधी दवाओं पर नाममात्र का मूल्य नियंत्रण

डॉ. अनंत फड़के

भारत के बाज़ार में उपलब्ध लगभग 225 कैंसर-रोधी दवाइयों में से 110 दवाइयों की कीमतों पर अब तक कोई नियंत्रण नहीं था। इन दवाओं की सालाना बिक्री ₹10,000 करोड़ की है। अब इन दवाओं पर दुकानदारों और अस्पतालों को अधिकतम 30 प्रतिशत तक ही व्यापारिक मार्जिन लेने की अनुमति होगी। थोक और खुदरा दवा विक्रेता तथा कुछ अस्पताल अब तक इन दवाओं पर औसतन 170 प्रतिशत और कुछ मामलों में 700 प्रतिशत तक मार्जिन कमाते थे। सर्वोच्च न्यायालय ने इसे “दिनदहाड़े डकैती” और “जबरन वसूली” कहा, तब जाकर सरकार की नींद खुली!

अब इस व्यापारिक मार्जिन पर सीमा लगाए जाने से इन दवाओं की कीमतों में औसतन 70 प्रतिशत की कमी आएगी और मरीज़ों के लगभग ₹2,500 करोड़ सालाना बचेंगे। व्यापारिक मार्जिन पर यह नियंत्रण निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। लेकिन कैंसर की दवाइयां बनाने वाली दवा कंपनियों की मुनाफाखोरी को काफी हद तक खुली छूट दी गई है! यदि मुनाफाखोरी के सभी स्तरों पर नियंत्रण लगाया जाए, तो इन दवाइयों की कीमतें आज की कीमतों की एक-चौथाई से लेकर दसवें हिस्से तक हो सकती हैं। आइए देखें कि ऐसा कैसे संभव है और ऐसा क्यों नहीं किया जा रहा है।

सिर्फ व्यापारिक ‘मार्जिन’ पर नियंत्रण

सरकार को केवल व्यापारियों के मुनाफे पर ही नहीं, बल्कि दवा कंपनियों के मुनाफे पर भी नियंत्रण लगाना चाहिए। बड़ी दवा कंपनियां अपने बेहद महंगे ब्रांडों के बारे में डॉक्टरों को ‘मनाती’ हैं। नतीजा, अनेक डॉक्टर मरीज़ों को ये बेहद महंगे ब्रांड लिखकर देते हैं। इन ब्रांडों से बड़ी कंपनियों को भारी मुनाफा मिलता है, जबकि दुकानदारों को केवल लगभग 16 प्रतिशत मार्जिन मिलता है।

छोटी कंपनियों के पास डॉक्टरों से मिलकर अपने ब्रांड के बारे में उन्हें समझाने और प्रभावित करने के लिए इतना बजट नहीं होता। इसलिए छोटी कंपनियां इसका दूसरा रास्ता निकालती हैं। वे केमिस्ट को ही बहुत अधिक मार्जिन देती हैं, ताकि केमिस्ट छोटी कंपनियों के कम मशहूर ब्रांडों को अधिक मशहूर और महंगे ब्रांडों के मुकाबले बेचने की कोशिश करें। केमिस्ट ग्राहक से पूछते हैं, “क्या आपको सस्ती जेनेरिक दवा दें?” और फिर अपेक्षाकृत कम कीमत वाले छोटी कंपनियों के ब्रांड बेचने की पेशकश करते हैं। इस तरह बड़ी कंपनियों की बजाय छोटी कंपनियां और दुकानदार कुछ कम, लेकिन फिर भी काफी मुनाफा कमाते हैं।

अब सरकार ने व्यापारिक ‘मार्जिन’ पर नियंत्रण लगा दिया है। इससे संभावना है कि केमिस्ट छोटी कंपनियों के ब्रांडों की बजाय बड़ी कंपनियों के ब्रांड ही बेचना पसंद करेंगे!

सिर्फ कुछ ही कैंसर–रोधी दवाएं मूल्य–नियंत्रण के दायरे में

चिकित्सकीय शोध और परीक्षणों से गुज़रने के बाद प्रमाणित लगभग 250–300 कैंसर-रोधी दवाइयों का उल्लेख चिकित्सा ग्रंथों में मिलता है। इनमें से भारत के बाज़ार में लगभग ₹12,500 करोड़ की 225 कैंसर-रोधी दवाएं उपलब्ध हैं। इनमें से केवल 63 दवाइयों पर, जिनकी बिक्री ₹2,250 करोड़ की थी, सरकार ने 2013 में मूल्य-नियंत्रण लागू किया था। वास्तव में, ये सभी 225 दवाएं जीवन बचाने वाली हैं, इसलिए इन सभी पर मूल्य-नियंत्रण होना चाहिए। लेकिन सरकार ने 2013 में केवल उन कैंसर-रोधी दवाइयों पर मूल्य-नियंत्रण लागू किया, जो ‘राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची’ में शामिल थीं।

‘राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची’ 

इस सूची में ऐसी दवाइयां शामिल की जाती हैं, जो लगभग 90 प्रतिशत मरीज़ों की ज़रूरतें पूरी करती हैं और सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवा के तहत ज़िला अस्पतालों से लेकर सर्वोच्च स्तर के अस्पतालों तक हर जगह प्राथमिकता के आधार पर हमेशा उपलब्ध रहनी चाहिए।

इस सूची से बाहर की, लेकिन चिकित्सा ग्रंथों में शामिल अन्य कैंसर-रोधी दवाइयां भी सम्बंधित मरीज़ों के लिए जीवनरक्षक हो सकती हैं। इसलिए उन पर भी मूल्य-नियंत्रण होना चाहिए। लेकिन सरकार ने 2013 में इनमें से केवल राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची में शामिल 63 चुनिंदा दवाइयों पर ही मूल्य-नियंत्रण लागू किया। शेष 162 कैंसर-रोधी दवाओं को मूल्य-नियंत्रण से पूरी तरह बाहर रखा गया। अब इन 162 दवाइयों में से 110 दवाइयों के मामले में सरकार केवल दुकानदारों के मार्जिन पर नियंत्रण लगा रही है। लेकिन इन दवाइयों पर दवा कंपनिया़ जो मुनाफा कमाती हैं, उस पर सरकार कोई लगाम नहीं लगा रही है।

नियंत्रित कीमत तय करने का गलत तरीका

1995 से मुट्ठी भर दवाओं पर मूल्य-नियंत्रण लागू था। इनकी अधिकतम खुदरा कीमत (एमआरपी) का निर्धारण उत्पादन लागत पर 100 प्रतिशत मुनाफा जोड़कर किया जाता था। इसमें  निर्माता और दुकानदार, दोनों का मुनाफा शामिल होता था। ‘ऑल इंडिया ड्रग एक्शन नेटवर्क’ ने 2003 में सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी कि बाज़ार में मौजूद मुट्ठी भर दवाइयों की बजाय सभी दवाइयों पर मूल्य-नियंत्रण लागू किया जाए। इस मामले में सरकार ने दस साल तक टालमटोल की। अंततः सर्वोच्च न्यायालय की चेतावनी के दबाव में सरकार ने 2013 से ‘राष्ट्रीय आवश्यक औषधि सूची’ में शामिल 348 दवाइयों पर मूल्य-नियंत्रण लागू किया। लेकिन ऐसा करते समय नियंत्रित कीमत तय करने के लिए सरकार ने 2013 में एक जटिल और अनुचित ‘बाज़ार-आधारित’ पद्धति लागू कर दी। इसका परिणाम यह हुआ कि मूल्य-नियंत्रण के दायरे में लाई गई 63 कैंसर-रोधी दवाइयों की कीमतों में औसतन केवल लगभग 10 प्रतिशत की ही कमी आई। वास्तव में, उनकी कीमतें 300–400 प्रतिशत तक घटनी चाहिए थी।

सही तरीका क्या हो सकता है?

इस बात को जन-औषधि दुकानों के उदाहरण से भी समझा जा सकता है। सरकार ने दवा कंपनियों से दवाइयां खरीदकर जन-औषधि दुकानों तक पहुंचाने की व्यवस्था बनाई है। इस व्यवस्था में दवा बनाने वाली कंपनियों को उत्पादन लागत पर आधारित उचित मुनाफा मिलता है और दुकानों को 16 प्रतिशत मार्जिन मिलता है। इसके बावजूद, जन-औषधि दुकानों में जेनेरिक नाम से मिलने वाली ये दवाइयां सामान्य बाज़ार में उपलब्ध दवाइयों की कीमतों के मुकाबले चौथाई से लेकर पांचवें हिस्से तक की कीमत पर मिलती हैं! यदि सरकार इसी तरह का मूल्य-नियंत्रण सभी दवा निर्माता कंपनियों और दवा दुकानदारों पर लागू करे, तो आम मरीज़ों को सभी दवाएं उचित कीमतों पर देना संभव होगा। (स्रोत फीचर्स)

Photo credit- https://www.livemint.com/news/india/why-only-cancer-drugs-sc-questions-centre-on-trade-margin-cap-seeks-wider-price-regulation-11791806818920.html

टैटू के रंग और कैंसर का जोखिम

टैटू बनवाने का चलन बढ़ता जा रहा है। इस प्रक्रिया में टैटू के स्थान पर सूजन, लालपन, खुजली वगैरह आम बात हैं। ये सब टैटू बनवाने की प्रक्रिया के प्रति हमारे प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया के कारण होते हैं। दरअसल, टैटू का स्थायी रूप से बने रहना प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया की बदौलत ही होता है। लेकिन कई अध्ययनों से पता चला है कि टैटूकरण का हमारे प्रतिरक्षा तंत्र पर दीर्घकालिक असर भी होता है। कुछ अध्ययन बताते हैं कि इससे कैंसर की संभावना भी बढ़ती है।

वर्ष 2024 में लैंसेट में प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया था कि टैटू-धारी व्यक्तियों में लिम्फोमा की संभावना 21 प्रतिशत अधिक होती है। लिम्फोमा लसिका तंत्र को प्रभावित करता है। इसी प्रकार, डेनमार्क में 2700 जुड़वाओं के एक अध्ययन के निष्कर्ष बीएमसी पब्लिक हेल्थ में वर्ष 2025 में प्रकाशित हुए थे। इसमें पता चला था कि बड़े-बड़े टैटू-धारी लोगों में त्वचा के कैंसर का जोखिम 62 प्रतिशत अधिक था और लिम्फोमा का खतरा तीन गुना तक बढ़ गया था।

अलबत्ता, इन अध्ययनों से टैटू और कैंसर के जोखिम के बीच का सम्बंध तो नज़र आता है लेकिन यह प्रमाणित नहीं होता है कि कैंसर का जोखिम टैटू के कारण ही बढ़ा है। और तो और, वर्ष 2025 में जर्नल ऑफ दी नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट में प्रकाशित एक अध्ययन में पाया गया है कि बड़े-बड़े तीन या चार टैटू-धारी लोगों में मेलेनोमा (त्वचा कैंसर की एक किस्म) का जोखिम सामान्य लोगों की तुलना में 74 प्रतिशत कम था।

लेकिन यह रोचक सवाल अभी भी मुंह बाए खड़ा है – शरीर के अंदर पहुंचने के बाद टैटू की स्याही करती क्या है और जोखिम कैसे उभरते हैं? टैटू बनवाने का चलन बढ़ने के बाद यह सवाल और भी महत्वपूर्ण हो चला है। इस मामले में येल स्कूल ऑफ मेडिसिन के क्रिस्टोफर ब्यूनिक कहते हैं, “घबराने की बजाय यह समझने की ज़रूरत है कि टैटू की स्याही की प्रकृति क्या होती है और उनमें किस तरह की भारी धातुओं और कैंसरकारी पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है।”

विशेषज्ञ इस बात को पूरी तरह नहीं समझ पाए हैं कि टैटू और कैंसर के बढ़े हुए जोखिम के बीच क्या कड़ी है। बहरहाल, कई कयास लगाए गए हैं।

एक बात तो यह है कि टैटू भले ही सिर्फ चमड़ी पर नज़र आते हैं, लेकिन वे त्वचा के अंदर तक फैले होते हैं। जब टैटू की स्याही को चुभोकर त्वचा में गहराई तक पहुंचाया जाता है तो संभव है कि उसके महीन कण घूम-फिर कर लसिका ग्रंथियों में पहुंच जाएं और शोथ पैदा करें। ज़ाहिर है आपका शरीर स्याही को परदेशी (पराया) पदार्थ मानकर प्रतिरक्षा तंत्र को उसके खिलाफ तैनात कर देगा।

इस मामले में एक अध्ययन जंतुओं पर किया गया था। शोधकर्ताओं ने चूहों के पैरों की गद्दियों पर काली, लाल व हरी स्याहियों का उपयोग करके टैटू बनाए थे। स्याही डालने के बाद यह देखा गया था कि यह स्याही लसिका तंत्र से होते हुए लसिका ग्रंथियों में पहुंची। पाया गया था कि स्याही लसिका ग्रंथियों के अंदर कुछ प्रतिरक्षा कोशिकाओं (फैगोसाइट्स) में जमा हो जाती है और दीर्घावधि शोथ प्रतिक्रिया उत्पन्न करती है। बात और भी आगे गई – जब चूहों को दो अलग-अलग किस्म के टीके (कोविड-19 का टीका और इंफ्लुएंज़ा का टीका) दिए गए तो टैटू स्याही ने टीके के प्रति प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को प्रभावित किया। यह अध्ययन प्रोसीडिंग्स ऑफ दी (यूएस) नेशनल एकेडमी ऑफ साइन्सेस में 2025 में प्रकाशित हुए थे।

प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के अलावा टैटू से सम्बंधित कई अन्य पहलू भी हैं। जैसे टैटू स्याही में उपस्थित रसायनों में से कुछ कैंसरकारी हो सकते हैं। जैसे, काली स्याहियों में पोलीसायक्लिक एरोमैटिक हायड्रोकार्बन हो सकते हैं जो कैंसर का जोखिम बढ़ाते हैं। इसी प्रकार से लाल स्याहियों में एज़ो-रंजक हो सकते हैं जो शरीर में विघटित होकर ऐसे यौगिक बनाते हैं जो पराबैंगनी प्रकाश के संपर्क में आकर कैंसर का कारण बन सकते हैं।

इसके अलावा, कुछ टैटू स्याहियों में सीसा (लेड), कैडमियम, पारा (मर्करी) जैसी भारी धातुएं होती हैं जिनकी विषाक्तता पता है। इनमें कुछ ऐसे विलायक या फॉर्मेल्डीहाइड या फीनॉल जैसे पदार्थ हो सकते हैं जो एलर्जी पैदा करते हैं।

ऐसा लगता है कि स्याही और धातुओं के जमा होने पर तीन प्रतिक्रियाएं होती हैं जो कैंसर का जोखिम बढ़ाने के लिए जानी जाती हैं – प्रतिरक्षा तंत्र का दीर्घावधि सक्रियकरण, ऑक्सीकारक तनाव और श्वेत रक्त कोशिकाओं (लिम्फोसाइट) की असामान्य वृद्धि। ऑक्सीकारक तनाव के कारण ऊतक क्षतिग्रस्त हो सकते हैं और कैंसर का जोखिम बढ़ता है। दूसरी ओर, यदि लिम्फोसाइट्स अनियंत्रित ढंग से बढ़ने लगें तो वे स्वयं कैंसरनुमा कोशिकाओं में बदलकर ट्यूमर बन सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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एक शैवाल का नेत्रबिंदु बना चिकित्सा नोबेल का आधार

दौलतसिंग सिंह तंवर

इस वर्ष का चिकित्सा नोबेल मानव मस्तिष्क को समझने की जिस खोज के लिए मिला है, उसकी शुरुआत किसी प्रयोगशाला में नहीं बल्कि पोखर के एक नन्हे शैवाल से हुई थी। यह पुरस्कार तीन वैज्ञानिकों, कार्ल डाइसरॉथ, पीटर हेगेमान और जॉर्ज नागल को दिया गया। उन्हें ‘प्रकाश से खुलने व बंद होने वाले आयन चैनलों और ऑप्टोजेनेटिक्स से जुड़ी खोजों’ के लिए सम्मानित किया गया है। यह कहानी एक ऐसे एक-कोशिकीय शैवाल से शुरू होती है, जिसे हम सामान्यतः किसी ठहरे हुए पानी में हरे रंग की परत के रूप में देखकर आगे बढ़ जाते हैं; उस शैवाल का नाम है क्लैमायडोमोनास।

समिति ने कहा है कि इस कार्य ने तंत्रिका विज्ञान के एक नए युग की आधारशिला रखी है।

मस्तिष्क की पुरानी पहेली

इस खोज का महत्व समझने के लिए पहले मस्तिष्क की मूल समस्या को समझना होगा। हमारे मस्तिष्क में लगभग 86 अरब तंत्रिका कोशिकाएं (न्यूरॉन्स) होती हैं। हर न्यूरॉन हज़ारों अन्य न्यूरॉन्स से जुड़ा होता है। ये कोशिकाएं विद्युत और रासायनिक संकेतों के सहारे आपस में संवाद करती हैं; हमारा सोचना, याद रखना, डरना, प्रेम करना, चलना और सोना, सब इसी संवाद का परिणाम है।

समस्या यह थी कि इन कोशिकाओं के संवाद को समझा कैसे जाए? वैज्ञानिक पहले इलेक्ट्रोड डालकर मस्तिष्क की विद्युत गतिविधि को मापते थे। इससे यह तो पता चलता था कि कोई गतिविधि हो रही है, लेकिन इलेक्ट्रोड से उद्दीपन देने पर आसपास की सैकड़ों किस्म की कोशिकाएं एक साथ प्रभावित हो जाती थीं। ऐसे में किसी विशिष्ट न्यूरॉन की सक्रियता को देख पाना मुश्किल था।

नोबेल विजेता फ्रांसिस क्रिक ने 1979 में ही इस चुनौती की ओर संकेत किया था कि तंत्रिका विज्ञान की सबसे बड़ी आवश्यकता बाकी सबको अछूता छोड़कर किसी एक विशेष प्रकार की कोशिका को नियंत्रित करने की विधि है। उन्होंने यह अनुमान भी लगाया था कि इसके लिए शायद प्रकाश एक उपयोगी साधन बन सकता है। परंतु उस समय किसी को नहीं पता था कि मस्तिष्क की कोशिकाओं को प्रकाश के प्रति संवेदनशील कैसे बनाया जाए। उत्तर बीस वर्ष से अधिक बाद आया और वह भी पादप और शैवाल विज्ञान की जिज्ञासा से।

एक–कोशिकीय हरित शैवाल

क्लैमायडोमोनास वंश की सबसे प्रसिद्ध प्रजाति क्लैमायडोमोनास राइनहार्टी का उपयोग एक मॉडल जीव के रूप में उपयोग होता रहा है। इस एक-कोशिकीय जीव की लंबाई मनुष्य के बाल की मोटाई की आधे से भी कम होती है। इसकी कोशिका में प्याले के आकार का एक हरितलवक (क्लोरोप्लास्ट) होता है जिसमें क्लरोफिल पाया जाता है। यह जीव अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण से बनाता है।

इसके अग्र-भाग में दो चाबुक जैसी पतली पूंछें (कशाभिकाएं – फ्लैजेला) होती हैं जिनकी मदद से यह जीव पानी में तैरता है। इसके जीवन का संघर्ष सीधा है, धूप बहुत कम हो तो भोजन नहीं बनेगा और बहुत तेज़ हो तो क्लोरोफिल को क्षति पहुंचेगी; इसलिए यह जीव प्रकाश की तीव्रता को परखकर कभी उसकी ओर बढ़ता है, तो कभी उससे दूर भागता है। इस व्यवहार को प्रकाशानुवर्तन कहते हैं।

इस काम के लिए क्लैमायडोमोनास की कोशिका में एक छोटा-सा नारंगी-लाल धब्बा (नेत्रबिंदु) होता है, यह हरितलवक के भीतर स्थित कई वर्णकों की परतों से बनी एक संरचना है। नेत्रबिंदु यह पहचानने में मदद करता है कि प्रकाश किस दिशा से आ रहा है।

वैज्ञानिकों के सामने प्रश्न यह था कि यह एक-कोशिकीय जीव प्रकाश को भांपकर अपनी कशाभिकाओं को आदेश कैसे देता है। इस प्रश्न के पीछे कोई चिकित्सकीय लक्ष्य नहीं था। यह तो मूलभूत जिज्ञासा थी।

नेत्रबिंदु का रहस्य और पीटर हेगेमान

1980 के दशक में यह संकेत मिला कि क्लैमायडोमोनास में प्रकाश भांपने वाला अणु रोडॉप्सिन परिवार का कोई प्रोटीन हो सकता है। रोडॉप्सिन ही हमारी आंख के रेटिना में प्रकाश को भांपता है।

उस समय मैक्स प्लांक जैव रसायन संस्थान में कार्यरत जर्मन वैज्ञानिक पीटर हेगेमान और उनके सहयोगियों ने 1990 के दशक के आरंभ में दिखाया कि नेत्रबिंदु पर प्रकाश पड़ने के कुछ ही मिलीसेकंड के भीतर कोशिका में विद्युत धारा उत्पन्न हो जाती है। यह गति असाधारण थी। यदि कोई लंबी रासायनिक शृंखला होती, तो प्रतिक्रिया इतनी त्वरित नहीं होती। यानी प्रकाश-ग्राही प्रोटीन सीधे विद्युत संकेत उत्पन्न कर रहा है।

हेगेमान ने पाया कि नेत्रबिंदु में एक विशेष प्रोटीन है, जो नीले प्रकाश को विद्युत संकेत में बदल देता है। यह विद्युत संकेत जीव को प्रकाश की ओर तैरने के लिए प्रेरित करता है। पर प्रोटीन की सही पहचान, उसके जीन को खोजना, उसे पृथक करना और यह सिद्ध करना कि वही प्रकाश से विद्युत धारा बनाता है, यह सब आसान नहीं था।

जॉर्ज नागल – चैनल–रोडॉप्सिन की खोज

जॉर्ज नागल, उन दिनों फ्रैंकफर्ट के मैक्स प्लांक जैव-भौतिकी संस्थान में कार्यरत थे और आज वुर्त्सबर्ग विश्वविद्यालय से जुड़े हैं। नागल कोशिका झिल्ली में आयनों (सोडियम, पोटैशियम और कैल्शियम जैसे आयनों) के आवागमन के अध्येता थे। जहां हेगेमान शैवाल और प्रकाश-संवेदन के

विशेषज्ञ थे वहीं नागल के पास थी आयन चैनलों के विद्युतीय अध्ययन

की पद्धति पर महारत। इक्कीसवीं सदी के आरंभ में क्लैमायडोमोनास के जीन अनुक्रमों की जानकारी उपलब्ध होने के   साथ उन्होंने ऐसे जीन खोजे जो रोडॉप्सिन से मिलते-जुलते प्रोटीन बनाते थे।

2002 में उन्होंने पहले प्रोटीन चैनल-रोडॉप्सिन-1 का वर्णन किया। अगले वर्ष, 2003 में, दूसरे प्रोटीन, चैनल-रोडॉप्सिन-2, की विशेषताएं सामने आईं। यह प्रोटीन अधिक उपयोगी निकला। जब इस प्रोटीन्स के जीन को मेंढक के अंडाणुओं और मानव भ्रूणीय वृक्क कोशिकाओं में डालकर इन कोशिकाओं पर नीला प्रकाश डाiला गया, तो झिल्ली में विद्युत धारा प्रवाहित होने लगी। प्रकाश हटाते ही धारा रुक गई।

इस खोज की मूल बात यह थी कि यह प्रोटीन दो काम एक साथ करता है। वह प्रकाश का ग्राही भी है और आयन चैनल भी।

इसकी विशेषता यह थी कि इसमें किसी जटिल रासायनिक शृंखला की आवश्यकता नहीं थी। यह एक ही प्रोटीन, एक ही स्विच था। यही कारण है कि इसकी गति इतनी तेज़ थी, क्योंकि तंत्रिका कोशिकाएं भी मिलीसेकंड की गति से काम करती हैं। यह प्रोटीन किसी भी कोशिका को प्रकाश से खोलने की संभावना लेकर आया।

कार्ल डाइसरॉथ – तंत्रिका विज्ञान का प्रवेश

अब तक की खोज वनस्पति विज्ञान और जैव भौतिकी की थी। इसे तंत्रिका विज्ञान और चिकित्सा तक पहुंचाने का श्रेय बहुत हद तक स्टैनफोर्ड विश्वविद्यालय में जैव-अभियांत्रिकी और मनोचिकित्सा के प्रोफेसर कार्ल डाइसरॉथ को जाता है। उनको लगता था कि अवसाद, दुश्चिंता और सामाजिक व्यवहार जैसे विकारों के पीछे के तंत्रिका परिपथों को हम कितना कम जानते हैं। मनोचिकित्सा की अधिकांश दवाइयां पूरे मस्तिष्क पर असर डालती हैं, लेकिन यह स्पष्ट नहीं होता कि वास्तव में किन कोशिकाओं पर क्या असर होता है।

2000 के दशक के मध्य में डाइसरॉथ और उनके साथियों ने सोचा कि यदि चैनल-रोडॉप्सिन को किसी जीवित जंतु के विशेष न्यूरॉन्स में पहुंचा दिया जाए, तो उन्हीं न्यूरॉनों को प्रकाश से सक्रिय किया जा सकता है। वर्ष 2005 में उनकी प्रयोगशाला ने प्रदर्शित किया कि चूहे के न्यूरॉन्स में चैनल-रोडॉप्सिन-2 को अभिव्यक्त कराने पर नीले प्रकाश की एक चमक से न्यूरॉन मिलीसेकंड की सटीकता से विद्युत आवेग उत्पन्न करने लगते हैं।

इसके बाद के वर्षों में डाइसरॉथ की प्रयोगशाला ने इस तकनीक को बहुत आगे बढ़ाया। उन्होंने ऐसे प्रकाशीय तंतु विकसित किए जिन्हें चूहे के मस्तिष्क में गहराई तक पहुंचाया जा सकता था। उन्होंने चैनल-रोडॉप्सिन के साथ-साथ ऐसे प्रोटीन भी शामिल किए जो प्रकाश पड़ने पर कोशिका को शांत कर देते हैं। इससे वैज्ञानिक अब किसी न्यूरॉन को चालू भी कर सकते थे और बंद भी। इसी पूरी तकनीक को ऑप्टोजेनेटिक्स नाम मिला।

ऑप्टोजेनेटिक्स काम कैसे करता है इसे सरल भाषा में तीन चरणों में समझा जा सकता है।

पहला चरण – चैनल-रोडॉप्सिन का जीन किसी हानिरहित वायरस में रखते हैं और उसे जंतु के मस्तिष्क के किसी निश्चित क्षेत्र में पहुंचाते हैं। वायरस जीन को न्यूरॉन्स के भीतर पहुंचा देता है।

दूसरा चरण – कोशिका का चयन। वैज्ञानिक ऐसी आनुवंशिक युक्तियां लगाते हैं कि चैनल-रोडॉप्सिन केवल चुनिंदा कोशिकाओं में बने, बाकी कोशिकाओं में यह प्रोटीन बनता ही नहीं।

तीसरा चरण – मस्तिष्क में एक बारीक प्रकाशीय तंतु प्रविष्ट कराया जाता है। प्रकाश का स्विच दबाते ही केवल वे विशेष न्यूरॉन सक्रिय होते हैं जिनमें चैनल-रोडॉप्सिन मौजूद है। प्रकाश हटाते ही वे शांत हो जाते हैं।

यानी अब उन कोशिकाओं को सक्रिय करके देखा जा सकता है कि क्या कोई व्यवहार सचमुच उन्हीं से उत्पन्न होता है।

प्रयोगशाला से मिली नई समझ

ऑप्टोजेनेटिक्स ने पिछले डेढ़ दशक में तंत्रिका विज्ञान को बदल दिया। कुछ उदाहरण इसकी व्यापकता दिखाते हैं। स्मृति के अध्ययन में चूहों पर ऐसे प्रयोग हुए जिनमें किसी विशेष याद से जुड़ी कोशिकाओं को चिन्हित किया गया और बाद में प्रकाश डालकर उन्हीं को सक्रिय किया गया। परिणामस्वरूप जंतु ने वह भय-स्मृति पुनः जी ली, जबकि वह उस स्थान पर था ही नहीं। इससे यह धारणा पुष्ट हुई कि स्मृतियां कोशिकाओं के विशिष्ट समूहों में अंकित होती हैं। पार्किंसन रोग के अध्ययन में डाइसरॉथ की प्रयोगशाला ने मस्तिष्क के उन विशेष मार्गों को पहचाना जिनके उद्दीपन से जंतु की गति में सुधार होता है। यह जानकारी कई उपचार विधियों को बेहतर बनाने में उपयोगी रही। 

स्वाभाविक प्रश्न यह है कि क्या यह तकनीक रोगियों के काम आ सकती है। हालांकि इस तकनीक के चिकित्सकीय उपयोग की दिशा में कुछ आरंभिक प्रयास हुए हैं, लेकिन सफर अभी लंबा है। सबसे उल्लेखनीय प्रयास दृष्टि लौटाने से जुड़ा है। कुछ आनुवंशिक रोगों, जैसे रेटिनाइटिस पिगमेंटोसा में, आंख के रेटिना की प्रकाश-संवेदी कोशिकाएं धीरे-धीरे नष्ट हो जाती हैं और व्यक्ति पूरी तरह दृष्टिहीन हो जाता है। पर रेटिना की भीतरी परतों की कुछ कोशिकाएं फिर भी बची रहती हैं। विचार यह है कि इन बची हुई कोशिकाओं में प्रकाश-संवेदी प्रोटीन का जीन पहुंचाकर उन्हें ही नया प्रकाश-ग्राही बना दिया जाए। 2021 में एक मरीज़ के उपचार की रिपोर्ट आई थी।

चिकित्सा क्षेत्र में सीमाएं

हर नई तकनीक की तरह ऑप्टोजेनेटिक्स की भी सीमाएं हैं; पहली सीमा यह है कि इसमें जीन उपचार की आवश्यकता होती है। मनुष्य की कोशिकाओं में विदेशी जीन पहुंचाना सुरक्षा और नैतिकता, दोनों दृष्टियों से गंभीर विषय है। दूसरी सीमा प्रकाश की पहुंच की है। मस्तिष्क के गहरे हिस्सों तक प्रकाश पहुंचाने के लिए तंतु डालने पड़ते हैं, जो शल्य क्रिया की मांग करते हैं। तीसरी सीमा प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया की है, क्योंकि शरीर शैवाल के प्रोटीन को विदेशी मानकर उस पर प्रतिक्रिया कर सकता है। चौथी सीमा यह है कि चूहों में जो परिपथ किसी व्यवहार को नियंत्रित करता दिखता है, वह मनुष्य में भी ठीक उसी तरह काम करे, ऐसा आवश्यक नहीं क्योंकि मानव मस्तिष्क कहीं अधिक जटिल है।

मूलभूत शोध का महत्व

इस पुरस्कार की सबसे बड़ी सीख शायद मूलभूत शोध के महत्व में निहित है। जब हेगेमान एक शैवाल के प्रकाशानुवर्तन का रहस्य खोज रहे थे, तब उनके सामने कोई चिकित्सकीय लक्ष्य नहीं था। कोई यह नहीं कह सकता था कि इससे अंधेपन का इलाज होगा या मस्तिष्क के नक्शे बनेंगे। वे तो केवल यह जानना चाहते थे कि एक नन्हा जीव प्रकाश को कैसे महसूस करता है। विज्ञान का इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा है। जीवाणुओं की प्रतिरक्षा प्रणाली पर शोध से जीन संपादन की तकनीक निकली। गर्म पानी के सोतों में रहने वाले जीवाणुओं से वह एंज़ाइम मिला जिस पर आज की डीएनए जांच टिकी है और अब तालाब की एक काई से मस्तिष्क को समझने का नया औज़ार मिला है। कौन जाने, हर प्रजाति के भीतर हज़ारों वर्षों के विकास से तैयार हुए ऐसे अणु और तंत्र हैं, जो शायद भविष्य की किसी चिकित्सा की कुंजी हों। (स्रोत फीचर्स)

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भौतिकी का नोबेल

इस साल का भौतिकी नोबेल पुरस्कार विस्कॉन्सिन-मैडिसन विश्वविद्यालय के फ्रांसिस हाल्ज़ेन को न्यूट्रिनो कणों सम्बंधी शोध कार्य तथा आइसक्यूब न्यूट्रिनो वेधशाला में उनके निर्णायक योगदान व नेतृत्व के लिए दिया गया है।

सामान्य लोगों के लिए न्यूट्रिनो का महत्व स्वत: स्पष्ट नहीं है। दरअसल, न्यूट्रिनो की उपस्थिति का सुझाव सबसे पहले वोल्फगैंग पौली ने 1930 में दिया था। उन्होंने यह सुझाव रेडियोसक्रिय तत्वों के विघटन के वर्णक्रम के एक विशेष पहलू की व्याख्या के लिए दिया था। यह प्रस्ताव कतिपय गणनाओं पर आधारित था, न्यूट्रिनो को एक वास्तविक कण के रूप में खोजना ज़रूरी था। न्यूट्रिनो का पहला प्रायोगिक प्रमाण वर्ष 1956 में सी. कोवान और एफ. राइन्स ने प्रस्तुत किया था। उन्होंने नाभिकीय रिएक्टर का उपयोग एंटी-इलेक्ट्रॉन न्यूट्रिनो के स्रोत के तौर पर किया था। 1995 में राइन्स को अकेले ही ‘न्यूट्रिनो को ताड़ने’ के लिए नोबेल सम्मान दिया गया क्योंकि तब तक कोवान का निधन हो चुका था।

इसके बाद न्यूट्रिनो अनुसंधान के लिए कई नोबेल पुरस्कार दिए जा चुके हैं। राइन्स व कोवान द्वारा खोजे जाने के बाद फौरन यह समझ बन गई थी कि ये कण ब्रह्मांड से सूचनाएं प्राप्त करने के लिए आदर्श हैं। सबसे बड़ी बात तो यह पता चली थी कि न्यूट्रिनो विद्युतीय दृष्टि से उदासीन होते हैं। लिहाज़ा, ये मात्र दुर्बल नाभिकीय अथवा गुरुत्वीय अंतर्क्रिया में शामिल होते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अपने दूरस्थ ब्रह्मांडीय स्रोत से निकलकर ये पृथ्वी तक बगैर किसी व्यवधान या विचलन के पहुंचते हैं। इस संदर्भ में 2002 में आर. डेविस जूनियर और एम. कोशिबा को ब्रहमांडीय न्यूट्रॉन के डिटेक्शन के लिए नोबेल से नवाज़ा गया था। उन्होंने सूरज से आने वाले और डेढ़ लाख वर्ष पूर्व घटित एक सुपरनोवा से पृथ्वी पर पहुंचने वाले मेगाइलेक्ट्रॉनवोल्ट न्यूट्रिनो का अवलोकन किया था।

फ्रांसिस हाल्ज़ेन का योगदान यह रहा कि उन्होंने यह पहचाना कि दणिक्षी ध्रुव के बर्फ का इस्तेमाल न्यूट्रिनो के अध्ययन हेतु किया जा सकता है। वैसे तो न्यूट्रिनो हर जगह होते हैं लेकिन वे अन्य कणों या बलों से इतनी कम अंतर्क्रिया करते हैं कि उन्हें पकड़ पाना मुश्किल होता है। वे पृथ्वी में से या हमारे शरीर में से होकर गुज़र जाते हैं और हमें पता भी नहीं चलता।

बहुत ही कम ऐसा होता है कि कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु के नाभिक से अंतर्क्रिया करता है। इस क्षण यदि कोई व्यक्ति सही जगह पर सही उपकरणों के साथ मौजूद हो तो इसे भांपा जा सकता है।

यह बात तो वैज्ञानिकों को एक अरसे से पता रही है कि ब्रह्मांड में कुदरती पार्टिकल एक्सलरेटर मौजूद हैं जो हमारे द्वारा निर्मित एक्सलरेटर की तुलना में लाखों गुना अधिक ऊर्जावान कण छोड़ते रहते हैं। लेकिन इन स्रोतों के बारे में हम बहुत कम जान पाए थे। वैसे तो न्यूट्रिनो भी उन्हीं परिवेशों

में उत्पन्न होते हैं, जहां अन्य कण बनते हैं लेकिन ये अपनी ऊर्जा गंवाए बगैर और दिशा बदले बगैर पृथ्वी तक पहुंचते हैं। अर्थात ये उन स्रोतों के सम्बंध में अनोखी जानकारी उपलब्ध करा सकते हैं।

हाल्ज़ेन ने दक्षिण ध्रुव पर न्यूट्रिनो को ताड़ने व उनका अध्ययन करने का विचार 1988 में पेश किया था। जब कोई न्यूट्रिनो किसी परमाणु नाभिक से अंतर्क्रिया करता है तो प्रकाश की एक चमक पैदा होती है जिसे दक्षिणी ध्रुव के स्वच्छ बर्फ में पकड़ा जा सकता है। दक्षिणी ध्रुव के कई फायदे हैं – जैसे यह तमाम किस्म के व्यवधानों से मुक्त है और भूकंपों के अभाव के चलते भौगोलिक दृष्टि से स्थिर है। हाल्ज़ेन के विचार को कई शोधकर्ताओं का समर्थन मिला और बर्फ में सेंसर्स स्थापित करने का शुरुआती परीक्षण किया गया।

वैसे, अत्यंत ऊर्जावान ब्रह्मांडीय न्यूट्रिनो बहुत दुर्लभ होते हैं, इसलिए पर्याप्त संख्या में न्यूट्रिनो और परमाणु नाभिकों की टक्करों को पकड़ने के लिए भारी मात्रा में बर्फ की ज़रूरत थी। लिहाज़ा, पूरे 1 घन किलोमीटर बर्फ में फैली आइसक्यूब वेधशाला का निर्माण 2011 में पूरा हुआ था। इस बर्फ का वज़न होगा 1 अरब मीट्रिक टन।

इस वेधशाला की मदद से ऐसे न्यूट्रिनो की खोज की गई जो हमारे सौर मंडल के बाहर उत्पन्न हुए थे। हाल्ज़ेन के नेतृत्व में काम कर रही अंतर्राष्ट्रीय टीम ने एक अनोखा उपकरण उपलब्ध कराया है जो खगोल शास्त्रीय अध्ययनों के एक नए युग का आगाज़ करेगा। (स्रोत फीचर्स)

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