वन्य जीवों की घटती आबादी – सुदर्शन सोलंकी

वैश्विक स्तर पर 1970 से 2018 के बीच 48 वर्षों में वन्य जीवों की आबादी में 69 फीसदी की कमी हुई है। यह जानकारी विश्व प्रकृति निधि (डब्ल्यूडब्ल्यूएफ) द्वारा जारी लिविंग प्लेनेट रिपोर्ट 2022 से पता चली है। इस रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण अमेरिका और कैरिबियाई क्षेत्रों में वन्य जीव आबादी में सबसे बड़ी गिरावट हुई है; यहां पिछले पांच दशकों में करीब 94 फीसदी की गिरावट हुई। दक्षिण अफ्रीका में करीब 66 फीसदी व एशिया-प्रशांत में 55 फीसदी की कमी दर्ज की गई। चिंताजनक और चौंकाने वाली बात यह है कि दुनिया भर में नदियों में पाए जाने वाले जीवों की आबादी में करीब 83 फीसदी की कमी आई है।

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ यह रिपोर्ट हर दो वर्ष में प्रकाशित करता है। इसकी स्थापना वर्ष 1961 में हुई थी। इसका मुख्यालय स्विट्ज़रलैंड के ग्लैंड में है। निधि का मुख्य उद्देश्य प्रकृति का संरक्षण करना और पृथ्वी पर विविधता को होने वाले खतरों को कम करना है। लिविंग प्लेनेट इंडेक्स (एलपीआई) पिछले 50 वर्षों से स्तनधारी जीवों, पक्षियों, सरीसृपों, मछलियों और उभयचरों की आबादी की निगरानी कर रहा है। दुनिया भर में 5230 प्रजातियों की 31,821 आबादियों के निरीक्षण के आधार पर निष्कर्ष मिला है कि खास तौर से ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में कशेरुकी प्राणियों की आबादी में तेज़ी से गिरावट दर्ज हुई है। धरती की 70 फीसदी और ताज़े पानी की 50 फीसदी जैव विविधता खतरे में है।

भारत में करीब 12 फीसदी स्तनधारी वन्य जीव समाप्ति की कगार पर है। वहीं पिछले 25 वर्षों में मधुमक्खियों की करीब 40 फीसदी आबादी खत्म हो चुकी है।

वैश्विक स्तर पर वन्य जीवों की तेज़ी से घटती आबादी के लिए उनके आवासों की कमी, प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन और विभिन्न बीमारियां प्रमुख कारण हैं।

जैव विविधता एवं पारिस्थितिकी सेवाओं सम्बंधी अंतरसरकारी मंच (आईपीबीईएस) की एक रिपोर्ट के अनुसार विकसित और विकासशील देशों में रहने वाले अधिकांश लोग भोजन, दवा, ऊर्जा, मनोरंजन और मानव कल्याण से सम्बंधित कार्यों में लगभग 50 हज़ार वन्य जीव प्रजातियों का हर दिन उपयोग करते हैं।

दुनिया भर में जंगल वातावरण से 7.6 गीगाटन कार्बन डाईऑक्साइड सोखते हैं जो मनुष्य द्वारा पैदा हुई कार्बन डाईऑक्साइड का 18 फीसदी है। इस तरह जंगल धरती को 0.5 डिग्री सेल्सियस ठंडा रखते हैं। यह विडंबना ही है कि इसके बावजूद प्रति वर्ष हम 1 करोड़ हैक्टर जंगल नष्ट कर रहे हैं।

यदि वन व वन्य जीव नहीं होंगे तो जल, वायु व मृदा से मिलने वाले संसाधन नष्ट हो जाएंगे और इनके बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती। हाल के दशकों में मानव ने अपनी आवश्यकताओं के लिए प्राकृतिक संसाधनों का बहुत अधिक दोहन किया है, जिसके परिणामस्वरूप बड़े-बड़े जंगल खत्म होने की कगार पर है। कुछ वन्य प्राणियों की प्रजातियां विलुप्त हो गई और कुछ विलुप्ति की कगार पर हैं। वनों को काटकर हम न सिर्फ वन्य जीवों के आवास खत्म कर रहे हैं बल्कि वनों से मिलने वाली विविध संपदा भी खो रहे हैं।

मानव गतिविधियों के कारण भूमि पर पाए जाने वाले वन्य जीवों के अलावा जलीय जीवों के प्राकृतवास पर भी खतरा उत्पन्न हुआ है। जहाज़, स्टीमर आदि से ईंधन के रिसाव, विनाशकारी मत्स्याखेट, गहरे ट्रालरों का उपयोग एवं मूंगा चट्टानों के दोहन से समुद्र का पारिस्थितिकी तंत्र तबाह हो गया है।

स्पष्ट है मानवीय गतिविधियों के कारण पूरी दुनिया में वन्य जीवों की संख्या कम हो रही है। प्रकृति में जितने भी विनाशकारी परिवर्तन हो रहे हैं, वे सभी मनुष्य की ही देन हैं। तापमान का चरम पर जाना, चक्रवाती तूफान एवं कहीं सूखा तो कहीं मूसलाधार बारिशें, जिसके कारण बाढ़ जैसी विपदाओं का आना इत्यादि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हो रहा है जो वनों व वन्य जीवों की घटती आबादी का कारण है।

लुप्तप्राय पौधों और जानवरों की प्रजातियों की उनके प्राकृतिक निवास स्थान के साथ रक्षा करना ज़रूरी है। सबसे प्रमुख चिंता का विषय यह है कि वन्य जीवों के निवास स्थान की सुरक्षा किस प्रकार की जाए जिससे वन्य जीव और मनुष्य के बीच एक संतुलित तालमेल बना रहे, जीवन फलता-फूलता रहे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दृष्टिबाधितों के लिए नोट पहचानने की समस्याएं – सुबोध जोशी

आज हम वस्तुएं और सेवाएं पाने के लिए मुद्रा यानी करेंसी का इस्तेमाल करते हैं। मुद्रा का आविष्कार लगभग 5000 साल पहले हुआ था। इससे पहले वस्तु-विनिमय प्रणाली प्रचलित थी।

मुद्रा नोटों और सिक्कों के रूप में होती है जिन्हें पहचान कर इस्तेमाल करना किसी भी व्यक्ति के लिए बहुत ही आसान होता है। उन पर अंकों और अक्षरों में मूल्य विभिन्न भारतीय भाषाओं में लिखा रहता है। सिक्कों के इस्तेमाल से जुड़ी दिक्कतों की वजह से नोटों का इस्तेमाल ज़्यादा पसंद किया जाता है।

यह इतना आसान इसलिए है क्योंकि हम अपनी आंखों से देख सकते हैं। लेकिन दृष्टिहीनता, अल्पदृष्टि या वर्णान्धता (किसी एक या एक से अधिक रंगों का बोध नहीं हो पाना) से ग्रस्त व्यक्ति मुद्रा कैसे पहचानते हैं? क्या यह उनके लिए भी इतना ही आसान है?

दृष्टिबाधितों को भी मुद्रा के इस्तेमाल की ज़रूरत अन्य व्यक्तियों के समान ही होती है लेकिन मुद्रा को पहचानना उनके लिए आसान नहीं होता है। उनकी सुविधा के लिए सबसे आसान तरीका तो यह है कि कोई अन्य व्यक्ति उनकी मदद कर दे। लेकिन इसमें आत्मनिर्भरता और विश्वसनीयता के सवाल पैदा होते हैं। इसलिए दुनिया भर के देश उनकी सुविधा के लिए कई तरीके अपनाते हैं ताकि लेन-देन में वे मुद्रा की पहचान शीघ्रता और सुरक्षित ढंग से कर सकें। इन तरीकों में सुधार लाने और नए तरीके खोजने की कोशिशें भी जारी हैं।

एक तरीका यह है कि अलग-अलग मूल्य के नोट अलग-अलग आकार में जारी किए जाएं। भारत सहित कुछ देशों में मूल्य के अनुसार नोटों की लंबाई-चौड़ाई अलग-अलग है। इसके साथ ही, नेत्रहीन व्यक्ति नोटों को शीघ्र मापकर उनमें अंतर कर सके इसके लिए पहचान करने वाला एक छोटा कार्ड इस्तेमाल किया जा सकता है। इस कार्ड पर नोटों की लंबाई के अनुसार उनके मूल्य उभरे हुए अंकों में अंकित रहते हैं। कार्ड पर नोट रखकर उसका मूल्य स्पर्श द्वारा पहचाना जा सकता है। विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिका की मुद्रा के इस्तेमाल में दृष्टिबाधितों को सबसे ज़्यादा मुश्किल का सामना करना पड़ता है क्योंकि वहां विभिन्न मूल्यों के नोटों के आकार और रंग एक समान होते हैं।

दूसरा तरीका है नोटों पर कोने में या निश्चित स्थान पर ब्रेल डॉट्स के माध्यम से मूल्य अंकित करना जिन्हें नेत्रहीन व्यक्ति स्पर्श द्वारा पढ़ सकें। इसके लिए ब्रेल लिपि का ज्ञान होना आवश्यक है। कनाडा में यह तरीका इस्तेमाल किया जा रहा है।

तीसरा तरीका है ब्रेल डॉट्स की बजाय नोटों पर स्पर्श द्वारा पहचाने जाने योग्य चिन्ह अंकित करना। सबसे पहले नेदरलैंड द्वारा आज़माया गया यह तरीका ब्राज़ील और बहरीन ने भी अपनाया है। भारत में नए जारी किए गए 2000 के नोट पर एक आयत और सात उभरी हुई लकीरें, 500 के नोट पर एक गोला और पांच उभरी हुई लकीरें और 100 के नोट पर एक त्रिकोण और चार उभरी हुई लकीरें बनी हुई हैं। नए जारी किए गए 50 और 200 रुपए के नोटों पर नेत्रहीन व्यक्तियों की सुविधा के लिए ऐसी कोई लकीरें या चिन्ह नहीं हैं, जबकि पुरानी सीरीज़ के 50 के नोट में बाईं तरफ प्रतीक चिन्ह के ऊपर एक चौकोर चिन्ह बना हुआ था।

चौथा तरीका यह है कि नेत्रहीन व्यक्ति अपने किसी भरोसेमंद व्यक्ति की सहायता से मूल्य के अनुसार नोटों को अलग-अलग ढंग से मोड़कर अपने पास रखें। उदाहरण के लिए, 5 का नोट बिना मोड़े, 10 का नोट चौड़ाई में और 20 का नोट लंबाई में मोड़कर रखा जा सकता है। बड़े मूल्य के नोट लंबाई और चौड़ाई मिलाकर और अन्य अलग-अलग ढंग से मोड़े जा सकते हैं। अधिक प्रकार के मूल्य के नोट होने पर मोड़ने के तरीके जटिल हो सकते हैं या मोड़ने के तरीके कम भी पड़ सकते हैं।

पांचवे तरीके के रूप में कुछ खंडों वाले बटुए का उपयोग किया जा सकता है; प्रत्येक मूल्य के नोट एक अलग खंड में रखना नेत्रहीन व्यक्तियों की मदद कर सकता है। यह तरीका ज़्यादातर कारगर रहता है। लेकिन अधिक प्रकार के मूल्य के नोट होने पर नोट मोड़कर रखने वाले तरीके की तरह इस तरीके की भी जटिलताएं या सीमाएं प्रकट हो सकती हैं।

ऐसे कई ऐप विकसित किए गए हैं जिनकी मदद से नेत्रहीन व्यक्ति अपने मोबाइल फोन पर मुद्रा पहचान सकते हैं। यह ऐप कैमरे की मदद से मुद्रा की पहचान कर नोट का मूल्य बोलकर बताते हैं। कोई ऐप कितना कारगर होगा यह उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करता है।

मुद्रा पहचानने वाले उपकरण भी विकसित किए जा रहे हैं। इनमें एक खास तरह से नोट रखने पर यह उसके बारे में या तो बोलकर या बीप और कंपन के मिश्रण से जानकारी प्रदान कर सकते हैं। लेकिन इसके माध्यम से खराब गुणवत्ता वाले नोटों की पहचान करना मुश्किल होता है। ऐसे उपकरण का एक उदाहरण आईबिल बैंकनोट आइडेंटिफायर है। भारतीय रिज़र्व बैंक ने भी मोबाइल ऐडेड नोट आइडेंटिफायर (MANI) आरंभ किया है जो बिना इंटरनेट काम करता है। नोट के बारे में यह बोलकर जानकारी देता है और जो देख और सुन नहीं सकते उन्हें गैर-ध्वनिक तरीके (जैसे कंपन) से भी जानकारी देता है।

सबसे अच्छा यह होगा कि नोट को छूते ही उसे पहचाना जा सके। इससे मुद्रा पहचानने का काम बहुत तेज़ी से और अधिक सुरक्षित ढंग से करना संभव हो सकेगा। यह भी उल्लेखनीय है कि हाल के वर्षों में इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन को बढ़ावा मिलने से नकद रूप में मुद्रा का इस्तेमाल घट रहा है। इलेक्ट्रॉनिक लेन-देन का तरीका दृष्टिबाधितों के लिए बहुत मददगार साबित हो सकता है बशर्ते उसमें उनकी विशेष आवश्यकताओं का ध्यान रखा जाए। (स्रोत फीचर्स)

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जल संचयन की मदद से भूजल का पुनर्भरण – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

नए घर की तलाश करते समय जिस एक चीज़ पर ध्यान देना हम कभी नहीं भूलते, वह है “उस जगह भूजल स्तर कितनी गहराई पर है।” भूजल स्तर बताता है कि कितनी गहराई पर चट्टानों की दरारें और छिद्र पानी से भरे हैं। भूमि के अंदर संचित इस पानी को भूजल और जिन चट्टानों में यह पानी भरा होता है उन्हें एक्वीफर्स कहते हैं।

दुनिया की एक चौथाई आबादी के लिए पानी का प्रमुख स्रोत भूजल ही है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा भूजल उपयोगकर्ता है; वर्ष 2017 में लगभग 250 घन किलोमीटर पानी का ज़मीन से दोहन किया गया था। इसमें से लगभग 90 प्रतिशत पानी सिंचाई के लिए और शेष पानी शहरों और गांवों में इस्तेमाल किया गया था।

सिंधु-गंगा के मैदानी क्षेत्रों (उत्तरी मैदानी क्षेत्रों) की कृषि अर्थव्यवस्था भूजल पर टिकी है। लेकिन ऐसी आशंका है कि जल्द ही सिंधु-गंगा मैदानी क्षेत्र के एक्वीफर्स इतने व्यापक पैमाने पर सिंचाई के लिए पानी देने में सक्षम नहीं रहेंगे। जर्नल ऑफ हायड्रोलॉजी में पिछले वर्ष आईआईटी कानपुर के एस. के. जोशी व साथियों द्वारा प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार यह स्थिति पंजाब, हरियाणा और राजस्थान में तो दिखने भी लगी है। हरित क्रांति नलकूपों पर टिकी रही है। गिरता भूजल स्तर किसानों को उच्च शक्ति वाले सबमर्सिबल पंप उपयोग करने को मजबूर कर रहा है, जिससे स्थिति और बिगड़ गई है।

उपग्रह गुरुत्व मापन ने खतरनाक दर से गिरते भूजल स्तर के ठोस प्रमाण दिए हैं। इस डैटा को स्थानीय स्तर पर कुओं में भूजल स्तर के मापन से पुष्ट किया जाता है। इस शताब्दी में, भारत के उपरोक्त क्षेत्र में भूजल स्तर में गिरावट की औसत दर 1.4 से.मी. प्रति वर्ष रही है। अलबत्ता, उन क्षेत्रों में भूजल स्तर में कमी इतनी तेज़ी से नहीं हो रही है जहां भूजल खारा है।

भूजल स्तर में वृद्धि के उपाय

वर्षा और नदियों के पानी से एक्वीफर्स रिचार्ज हो जाते हैं। स्वतंत्रता के बाद से भारत ने पानी के वितरण के लिए नहरों के निर्माण में वृद्धि की है। इन नहरों से रिसता पानी भी भूजल स्तर को बढ़ाता है।

हमारे देश के कुछ क्षेत्रों के कुछ स्वस्थ एक्वीफर्स के पीछे एक महत्वपूर्ण कारक है भूजल रिचार्ज के लिए समुदाय आधारित अभियान। इसका सबसे अच्छा उदाहरण सौराष्ट्र के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में देखा जा सकता है। यहां मौसमी नदियों और नालों पर हज़ारों छोटे-बड़े चेक डैम बनाए गए हैं। ये पानी के प्रवाह को धीमा करते हैं और भूजल रिचार्ज में योगदान देते हैं और साथ ही मिट्टी के कटाव को रोकते हैं। गांवों में, बोरियों में रेत भरकर बारिश के बहते पानी के रास्ते में बोरी-बंधान बनाए जाते हैं।

क्या इन छोटे पैमानों पर किए गए जल संचयन के उपायों से कोई फर्क पड़ा है? सौराष्ट्र के भूजल स्तर और इसी तरह की जलवायु वाले मराठवाड़ा और विदर्भ क्षेत्रों के तुलनात्मक अध्ययनों में इन उपायों के सकारात्मक प्रभाव दिखे हैं। सुखद बात है कि पिछले एक दशक में महाराष्ट्र के इन क्षेत्रों ने भी भूजल रिचार्ज करने के अपने प्रबंधित कार्यक्रम शुरू किए हैं, जैसे जलयुक्त शिवार।

देश में तमिलनाडु-कर्नाटक के सीमांत क्षेत्र भी भूजल स्तर में उल्लेखनीय गिरावट का सामना कर रहे हैं। यहां भूजल क्रिस्टलीय चट्टानों में पाया जाता है। ये चट्टाने छिद्रयुक्त नहीं होतीं, इसलिए इनमें पानी केवल बीच की दरारों और टूटन में पाया जाता है। इन परिस्थितियों में, पोखर और तालाब भूजल रिचार्ज में ज़्यादा मददगार नहीं होते।

यहां ज़्यादातर रिचार्ज वर्षा और सिंचाई के पानी के पुनर्चक्रण से होता है। विडंबना देखिए कि बेंगलुरु जैसे शहरी क्षेत्र में भूजल रिचार्ज का प्रमुख स्रोत जल आपूर्ति के पाइपों से होने वाला रिसाव है। (स्रोत फीचर्स)

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मलेरिया टीके के आशाजनक परिणाम

मलेरिया एक बड़ी जन स्वास्थ्य समस्या है। हर वर्ष लाखों लोग मलेरिया का शिकार होते हैं। वर्ष 2020 में मलेरिया से 24 करोड़ लोग संक्रमित हुए थे और 6.27 लाख लोगों की मृत्यु हुई थी। यह आंकड़ा 2019 की तुलना में 12 प्रतिशत अधिक है। इसमें से अफ्रीका में होने वाली लगभग दो-तिहाई मौतें 5 वर्ष से कम आयु के बच्चों की हैं। मलेरिया परजीवियों ने कई दवाओं के विरुद्ध प्रतिरोध विकसित कर लिया है और इसे प्रसारित करने वाले मच्छरों ने तो कीटनाशकों को भी चकमा देने की क्षमता विकसित की है।

पिछले वर्ष WHO द्वारा अनुमोदित और जीएसके द्वारा निर्मित मलेरिया का टीका आया था लेकिन यह सिर्फ औसत दर्जे की सुरक्षा ही प्रदान करता है। युनिवर्सिटी ऑफ ऑक्सफोर्ड द्वारा तैयार किए गए टीके के परिणाम आना बाकी हैं।

लेकिन हाल ही में वैज्ञानिकों ने इसकी रोकथाम के लिए एक नए तरीके की खोज की है। अमेरिका में नौ वालंटियर्स पर किए गए एंटीबॉडी परीक्षण में सकारात्मक परिणाम देखने को मिले हैं। दी न्यू इंग्लैंड जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार प्रयोगशाला में विकसित मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़ की एक खुराक मलेरिया से 6 महीने तक सुरक्षा प्रदान कर सकती है।

दिक्कत यह है कि मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़ का उत्पादन काफी महंगा है और इन्हें इंट्रावीनस देना होता है, जिसके लिए चिकित्सकीय देखभाल ज़रूरी होती है। लिहाज़ा, संभवत: यह तकनीक केवल उच्च आय वाले लोगों और पर्यटकों के लिए उपयोगी होगी। शोधकर्ता यह टीका देने का आसान तरीका खोजने और इसकी लागत को कम करने का प्रयास कर रहे हैं।

यह पहली बार है कि वैज्ञानिकों ने मलेरिया से निपटने के लिए मोनोक्लोनल एंटीबॉडीज़ का उपयोग किया है। प्रयोगशाला में विकसित मोनोक्लोनल एंटीबॉडी सबसे घातक मलेरिया परजीवी, प्लाज़्मोडियम फाल्सीपैरम, को खत्म करने की क्षमता रखती है। यह बच्चों, गर्भवती महिलाओं और कमज़ोर स्वास्थ्य वाले लोगों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए प्रभावी है। इसको तैयार करने के लिए यूएस नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ एलर्जी एंड इंफेक्शियस डिसीज़ेस के रॉबर्ट सेडर की टीम ने CIS43LS नामक एंटीबॉडी एक ऐसे व्यक्ति के खून से प्राप्त की जिसे परीक्षण के दौरान मलेरिया का टीका दिया गया था। यह एंटीबॉडी परजीवी की बीजाणु अवस्था में सतह पर मौजूद प्रोटीन से जुड़ जाती है और उसे यकृत कोशिकाओं पर हमला करने से रोकती है। शोधकर्ताओं ने इस इस एंटीबॉडी को मानव शरीर में जल्द नष्ट होने से बचाने के लिए इसमें कुछ परिवर्तन किए हैं। पिछले वर्ष प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार इस एंटीबॉडी को मलेरिया परजीवी के संपर्क में आए 9 वालंटियर्स को दिया गया तो उनमें से किसी में भी संक्रमण नहीं हुआ।

बमाको स्थित युनिवर्सिटी ऑफ साइंस, टेक्नीक और टेक्नॉलॉजी द्वारा आयोजित क्लीनिकल परीक्षण में 330 वालंटियर्स को उच्च और कम मात्रा में एंटीबॉडी या प्लेसिबो की खुराक दी गई। इन वालंटियर्स के रक्त नमूनों की जांच में देखा गया कि 6 माह की अवधि में उच्च खुराक प्राप्त लोगों में से 18 प्रतिशत लोग संक्रमित हुए जबकि न्यून खुराक वालों में यह संख्या 36 प्रतिशत रही और प्लेसिबो प्राप्त में 78 प्रतिशत लोग संक्रमित हुए। वैज्ञानिकों ने पाया कि प्लेसिबो की तुलना में उच्च खुराक प्राप्त लोग संक्रमण को रोकने में 88 प्रतिशत और न्यून खुराक प्राप्त लोग 75 प्रतिशत सफल रहे। 6 महीने के अंत में ज़रूर प्रभाविता में कमी देखने को मिली। अलबत्ता परिणाम कुल मिलाकर सकारात्मक रहे।

वैसे कुछ अन्य वैज्ञानिक इन परिणामों को लेकर शंका में हैं। उनके अनुसार इस अध्ययन में परजीवियों का पता लगाने के लिए खून की सूक्ष्मदर्शी जांच का उपयोग किया गया था जो पोलीमरेज़ चेन रिएक्शन (पीसीआर) तकनीक से कम संवेदनशील है। शोधकर्ता अब संग्रहित नमूनों का पीसीआर विधि से भी अध्ययन कर रहे हैं।         

इसके अलावा कुछ अन्य वैज्ञानिकों का मानना है कि इस अध्ययन में शोधकर्ताओं ने केवल संक्रमण का मापन किया, बीमारी के प्रकोप पर ध्यान नहीं दिया जो बेहतर परिणाम दे सकता था। कुछ वैज्ञानिकों का ऐसा भी मानना है कि मोनोक्लोकल एंटीबॉडीज़ संक्रमण को रोकने में सक्षम हैं लेकिन इनकी भी कुछ कमियां हैं। सबसे बड़ी चुनौती इनकी लागत है। इसके आलावा, एंटीबॉडी को शरीर में प्रवेश कराने की इंट्रावीनस प्रक्रिया छोटे बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं है।

सेडर ने प्रयोगशाला में एक और एंटीबॉडी L9LS विकसित की है जो उसी प्रोटीन को लक्षित करती है और CIS43LS से तीन गुना अधिक शक्तिशाली है। हाल ही में किए गए एक अध्ययन में L9LS टीका पांच में से चार वालंटियर्स में से संक्रमण रोकने में सक्षम रहा। इसके अलावा इसे त्वचा के नीचे इंजेक्शन के माध्यम से दिया गया जो काफी तेज़ और कम जटिल प्रक्रिया है। वर्तमान में बच्चों में इंजेक्शन के माध्यम से L9LS टीके का परीक्षण किया जा रहा है। उम्मीद है कि अधिक उपयोग होने पर इसकी लागत को कम किया जा सकेगा। इसके अलावा सेडर वर्तमान में एक और टीका तैयार कर रहे हैं जो इससे भी अधिक शक्तिशाली होगा। (स्रोत फीचर्स)

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बढ़ी आबादी ने किया विशाल जीवों का सफाया

तकरीबन दो हज़ार साल पहले मानव जितने बड़े लीमर और विशाल एलिफेंट-बर्ड मेडागास्कर में विचरते थे। इसके एक हज़ार साल बाद ये यहां से लगभग विलुप्त हो गए थे। अब एक ताज़ा अध्ययन बताता है कि इस सामूहिक विलुप्ति का समय मेडागास्कर में मानव आबादी में उछाल के साथ मेल खाता है, जब मनुष्यों के दो छोटे समूह आपस में घुले-मिले और पूरे द्वीप पर फैल गए।

वर्ष 2007 में शोधकर्ताओं के एक दल ने मलागासी लोगों की वंशावली समझने के लिए मेडागास्कर आनुवंशिकी और नृवंशविज्ञान प्रोजेक्ट शुरू किया था। यद्यपि मेडागास्कर द्वीप अफ्रीका के पूर्वी तट से मात्र 425 किलोमीटर दूर स्थित है, लेकिन वहां बोली जीने वाली मलागासी भाषा 7000 किलोमीटर दूर तक हिंद महासागर क्षेत्र में बोली जाने वाली ऑस्ट्रोनेशियन भाषाओं के समान है। ऑस्ट्रोनेशियन भाषा समूह में मलय, सुडानी, जावानी तथा फिलिपिनो भाषाएं शामिल हैं। अलबत्ता, लंबे समय से यह एक रहस्य रहा है कि कौन लोग, कब और कैसे मेडागास्कर पहुंचे? और इन आगंतुकों ने कैसे बड़े पैमाने पर जीवों के विलुप्तिकरण को प्रभावित किया।

यह समझने के लिए मेडागास्कर आनुवंशिकी और नृवंशविज्ञान परियोजना के तहत शोधकर्ताओं ने 2007 से 2014 के बीच द्वीप के 257 गांवों से लोगों के लार के नमूने, संगीत, भाषा और अन्य समाज वैज्ञानिक डैटा एकत्र किया। 2017 में शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष निकाला कि आधुनिक मलागासी लोग पूर्वी अफ्रीका के बंटू-भाषी लोगों और दक्षिण-पूर्व एशिया में दक्षिणी बोर्नियो के ऑस्ट्रोनेशियन-भाषी लोगों से सबसे अधिक निकट से सम्बंधित हैं।

हालिया अध्ययन में, शोधकर्ताओं ने लार का आनुवंशिक विश्लेषण किया और कंप्यूटर मॉडल की मदद से मलागासी वंशावली तैयार की और अनुमान लगाया कि पीढ़ी-दर-पीढ़ी आबादी कैसे बदली।

शोधकर्ताओं ने पाया कि आधुनिक मलागासी आबादी सिर्फ चंद हज़ार एशियाई लोगों की वंशज है, जिन्होंने लगभग 2000 साल पहले अन्य समूहों के साथ घुलना-मिलना बंद कर दिया था।

हालांकि यह रहस्य तो अब भी है कि एशियाई लोग वास्तव में मेडागास्कर कब पहुंचे? लेकिन ये लोग 1000 साल पहले तक मेडागास्कर में फैल चुके थे। करंट बायोलॉजी में शोधकर्ता बताते हैं कि इस आगंतुक आबादी ने यहां की लगभग इतनी ही बड़ी अफ्रीकी आबादी के साथ घुलना-मिलना शुरू किया था, और लगभग 1000 साल पहले विशाल जीवों के विलुप्तिकरण के समय इनकी आबादी बढ़ने लगी थी।

पुरातात्विक प्रमाण बताते हैं कि मेडागास्कर की आबादी में विस्फोट के साथ लोगों की जीवनशैली भी बदली थी। पहले, मनुष्य वन्यजीवों के साथ रहते थे और शिकार वगैरह करते थे। लेकिन इस समय वे बड़ी बस्तियां बनाने लगे थे, धान उगाने लगे थे, और मवेशी चराने लगे थे।

इन सभी के आधार पर शोधकर्ताओं को लगता है कि जनसंख्या वृद्धि, जीवनशैली में परिवर्तन और गर्म व शुष्क जलवायु के मिले-जुले प्रभाव ने संभवतः विशाल जीवों का सफाया शुरू कर दिया था।

अन्य शोधकर्ता मानव आबादी में बढ़त और जीवों के विलुप्तिकरण के समय से तो सहमत हैं लेकिन उनका मानना है कि जीवों के विलुप्तिकरण में बदलती जलवायु की भूमिका इतनी अधिक नहीं रही। इसके अलावा वर्तमान आबादी के डैटा की मदद से इतिहास के बारे में कुछ कहने की अपनी सीमाएं हैं। यदि कब्रगाहों में से प्राचीन लोगों के डीएनए खोज कर उनका विश्लेषण किया जाता तो लोगों के मेडागस्कर पहुंचने और उनके स्थानीय लोगों से घुलने-मिलने के समय के बारे में कुछ पुख्ता तौर पर कहा जा सकता था।

बहरहाल, मेडागास्कर में विशाल जीवों के विलुप्तिकरण में मनुष्यों की भूमिका को समझना वर्तमान समय में ज़रूरी है, विशेष रूप से जब आज हाथी और गैंडे जैसे जीव खतरे में हैं। वास्तविक कारणों को जानकर हम इन जीवों के संरक्षण के बेहतर प्रयास कर सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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अकेले रह गए शुक्राणु भटक जाते हैं – डॉ. विपुल कीर्ति शर्मा

एक अध्ययन से पता चला है कि सांड के शुक्राणु तब अधिक प्रभावी ढंग से आगे बढ़ते हैं और निषेचन कर पाते हैं जब वे समूह में हों। यह जानकारी मनुष्यों में निषेचन को समझने के लिए महत्वपूर्ण हो सकती है। भौतिक विज्ञानी चिह-कुआन तुंग और सहकर्मियों ने फ्रंटियर्स इन सेल एंड डेवलपमेन्ट बायोलॉजी में बताया है कि कृत्रिम प्रजनन पथ में मादा के अंडे को निषेचित करने के लिए शुक्राणुओं के समूह अधिक सटीकता से आगे बढ़ते हैं बनिस्बत अकेले शुक्राणु के। ऐसा नहीं है कि मादा जननांग पथ में शुक्राणुओं के समूह तेज़तर गति से तैरते हों। लेकिन वे सही दिशा में सटीकता से आगे बढ़ते हैं।

र्दिष्ट स्थान पर पहुंचने के लिए दो बिंदुओं के बीच की सबसे छोटी दूरी एक सीधी रेखा होती है। पर वास्तव में अकेले शुक्राणु सीधी रेखा में न तैरकर घुमावदार रास्ता अपनाते हैं। किंतु, जब शुक्राणु दो या दो से अधिक के समूह में एकत्रित होते हैं, तो वे सीधे मार्ग पर तैरते हैं। समूह की सीधी चाल तभी फायदेमंद हो सकती है जब वे अंडाणु की ओर जा रहे हों। पूरी प्रक्रिया के अध्ययन हेतु शोधकर्ताओं ने एक प्रयोगात्मक सेटअप विकसित किया जिसमें बहते तरल पदार्थ का उपयोग किया गया था।

दरअसल, शुक्राणु गर्भाशय में पहुंचकर अंडवाहिनी से आ रहे अंडाणु की ओर जाते हैं। इस यात्रा के दौरान शुक्राणुओं को म्यूकस (श्लेष्मा) के प्रवाह के विरुद्ध तैरना और रास्ता बनाना होता है। तुंग और उनके सहयोगियों ने प्रयोगशाला में मादा जननांग की कृत्रिम संरचना वाला उपकरण बनाया। उपकरण एक उथला, संकीर्ण, 4-सेंटीमीटर लंबा चैनल था जो प्राकृतिक म्यूकस के समान एक गाढ़े तरल पदार्थ से भरा था जिसके बहाव को शोधकर्ता नियंत्रित कर सकते हैं।

शुक्राणु स्वाभाविक रूप से आगे ऊपर की ओर तैरने लगते हैं। अलबत्ता, प्रयोग में शुक्राणु के समूहों ने म्यूकस के प्रवाह में आगे बढ़ने में बेहतर प्रदर्शन किया। अकेले शुक्राणुओं के अन्य दिशाओं में भटक जाने की संभावना अधिक थी। कुछ अकेले शुक्राणु तेज़ तैरने के बावजूद, लक्ष्य से भटक गए।

जब शोधकर्ताओं ने अपने उपकरण में म्यूकस के प्रवाह को चालू किया, तो कई अकेले शुक्राणु बहाव के साथ बह गए। जबकि शुक्राणु समूहों की बहाव के साथ नीचे की ओर बहने की संभावना बहुत रही।

सांड के शुक्राणुओं पर किए गए इन प्रयोगों से वैज्ञानिकों को लगता है कि परिणाम मनुष्यों पर भी लागू होंगे। दोनों प्रजातियों के शुक्राणुओं के आकार समान होते हैं। तुंग कहते हैं, बहते तरल पदार्थ में शुक्राणु का अध्ययन उन समस्याओं पर प्रकाश डाल सकता है जो स्थिर तरल पदार्थों में नहीं दिखते। एक आशा यह है कि इससे मनुष्यों में बांझपन या निसंतानता के कारणों को समझने में मदद मिल सकती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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केला: एक पौष्टिक फल – डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

दक्षिण भारतीय पूजा और उत्सवों में केला एक अनिवार्य चीज़ है। लोग मंदिरों, शादी स्थलों और जश्नों के प्रवेश द्वारों को केले के पेड़ों से सजाते हैं, देवी-देवताओं को केला चढ़ाते हैं, और भोजन परोसने के लिए केले के पत्ते का उपयोग थाली की तरह करते हैं (तरल व्यंजनों तक के लिए कटोरी या चम्मच वगैरह का उपयोग नहीं करते)।

केले के पत्ते पर रसम भात खाना एक कला है। हालांकि इन दिनों किसी भी रेस्तरां में केले की ‘आधुनिक’ प्लेट (पत्तल) मिल सकती है, जिसमें सुविधा के लिए सूखे केले के पत्तों को आपस में सिल दिया जाता है।

एक पवित्र फल

विज्ञान लेखिका जे. मीनाक्षी बीबीसी में लिखती हैं कि केले का पेड़ प्रजनन और सम्पन्नता की दृष्टि से भगवान बृहस्पति के तुल्य माना जाता है। इसलिए इसे पवित्र माना जाता है।

डॉ. के. टी. अचया ने अपनी पुस्तक इंडियन फूड: ए हिस्टॉरिकल कम्पैनियन में लगभग 400 ईसा पूर्व बौद्ध साहित्य में केले का उल्लेख बताया था। अपनी पुस्तक में अचया बताते हैं कि केला न्यू गिनी द्वीप से समुद्री मार्ग से होकर दक्षिण भारत पहुंचा था। कुछ लोगों का दावा है कि केले का पालतूकरण सबसे पहले न्यू गिनी में किया गया था।

कई किस्में

मीनाक्षीजी ने हैदराबाद से नागरकोइल की यात्रा के दौरान पाया कि यहां केले की लगभग 12-15 किस्में पाई जाती हैं। केले के पौधे पश्चिमी घाट से सटे गर्म और नम क्षेत्रों में उगते हैं।

तो फिर, पूरे भारत में केला कहां-कहां उगाया जाता है? केला मुख्य रूप से प्रायद्वीपीय दक्षिणी तटीय इलाकों में – गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, ओडिशा और बंगाल के कुछ हिस्सों तथा असम और अरुणाचल जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में उगाया जाता है।

वैसे, मध्य और उत्तरी क्षेत्र (मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और पंजाब) में भी केला उगाया जाता है, लेकिन यहां इसकी किस्मों में न तो इतनी विविधता होती है और न ही इतनी अधिक मात्रा में उगाया जाता है।

भारत हर साल लगभग 2.9 करोड़ टन केले का उत्पादन करता है। इसके बाद दूसरे नंबर पर चीन 1.1 करोड़ टन का उत्पादन करता है। खाद्य और कृषि संगठन (एफएओ) का कहना है कि लगभग 135 देश केले का उत्पादन करते हैं, और केले के पौधे गर्म और नम परिस्थितियों में फलते-फूलते हैं। इस संदर्भ में दक्षिणपूर्वी एशियाई देश विशेष स्थान रखते हैं। इन देशों में केले की 300 से अधिक किस्में पाई जाती हैं, और कई किस्मों के पौधे देखने में भी सुंदर लगते हैं।

पोषण मूल्य

केले में ऐसा क्या है जिसने उन्हें स्वादिष्ट, पवित्र, औषधीय और पोषण के लिहाज़ से महत्वपूर्ण बनाया है? इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च (ICMR) की पुस्तक न्यूट्रीटिव वैल्यू ऑफ इंडियन फूड्स बताती है कि केले के 100 ग्राम खाने योग्य हिस्से में 10-20 मिलीग्राम कैल्शियम, 36 मिलीग्राम सोडियम, 34 मिलीग्राम मैग्नीशियम व 30-50 मिलीग्राम फॉस्फोरस होता है। ये सभी पोषक तत्व मिलकर केले को अत्यधिक पौष्टिक बनाते हैं।

डॉ. के. अशोक कुमार और उनके साथियों ने वर्ष 2018 में जर्नल ऑफ फार्माकोग्नॉसी एंड फायटोकेमिस्ट्री में प्रकाशित अपने पर्चे में केले की किस्मों में पोषक तत्वों की मात्रा बताई थी। यहां यह बताना प्रासंगिक होगा कि भारत में मिलने वाले सभी फलों में केला सबसे सस्ता है। यह भारत के अधिकांश हिस्सों, यहां तक कि ग्रामीण इलाकों में भी, पूरे वर्ष उपलब्ध रहता है। और केला बाज़ार में मिलने वाले कई अन्य फलों जैसे आम, संतरा की तुलना में अधिक पौष्टिक होता है। अन्य अधिकांश फल मौसमी और महंगे होते हैं, और केले की तुलना में कम पौष्टिक होते हैं।

केले का सिर्फ फल उपयोगी नहीं है। इसका छिलका भी बायोचार के रूप में उपयोग किया जाता है। इसके बायोचार का उपयोग उर्वरक के रूप में और बिजली उत्पन्न करने के लिए किया जाता है। इसकी मदद से इलेक्ट्रिक वाहन चलाने के भी प्रयास जारी हैं। (स्रोत फीचर्स)


नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) यानी कृत्रिम बुद्धि -4 – हरजिंदर सिंह ‘लाल्टू’

पिछले लेखों में हमने एआई के विज्ञान और दर्शन के पक्ष पर बात रखी थी। आम तौर पर लोग वैज्ञानिक खोज के व्यावहारिक इस्तेमाल को टेक्नॉलॉजी कह देते हैं। दरअसल बहुत सारी वैज्ञानिक जांच और खोज पहले से मौजूद टेक्नॉलॉजी की मदद से ही मुमकिन हो पाती है। एआई भी ऐसा एक क्षेत्र है जिसमें विज्ञान और टेक्नॉलॉजी परस्पर गड्ड-मड्ड हैं। टेक्नॉलॉजी महज तकनीक या औज़ार नहीं होती, बल्कि एक सांगठनिक खाके के साथ ही यह वजूद में आती है। और जैसा किसी भी टेक्नॉलॉजी के साथ होता है, जब यह सही तरीके से काम नहीं करती है तो भयंकर हादसे तक हो जाते हैं। टेक्नॉलॉजी जिस सामाजिक या सियासी खाके के साथ जुड़ी होती है, उसके निहित स्वार्थ तय करते हैं कि इसका फायदा किसे मिलेगा और नुकसान किसे होगा। एआई कुछ अलग नहीं है।

एआई के कई व्यावहारिक उपयोगों में एक यह है कि किसी तस्वीर में से चीज़ों की पहचान जल्द से जल्द कैसे की जाए। खास तौर पर किसी शख्स की पहचान करना आज एआई का आम इस्तेमाल बन गया है। दुनिया भर में सरकारें इस तकनीक का इस्तेमाल करती हैं। हमारे मुल्क में भी दिल्ली, बेंगलुरु जैसे बड़े हवाई अड्डों पर शक्ल की पहचान के कैमरे लगे हुए हैं, जिनके ज़रिए आप की तस्वीर कंप्यूटर में कैद हो जाती है। फिलहाल यह स्वैच्छिक तौर पर हो रहा है।

यह महज फोटो खींचने या वीडियो बनाने वाली बात नहीं है, जो सीसीटीवी (closed-circuit television) से होता है। जैसे हर शख्स का खास डीएनए होता है, या हाथ और उंगलियों की खास लकीरें होती हैं, वैसे ही चेहरे की खास पहचान होती है। शक्ल में हाड़-मांस-चमड़े के उतार-चढ़ाव को आकड़ों में दर्ज कर लिया जाता है। इसे मशीन विज़न सिस्टम कहा जाता है। आम नागरिकों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। पर अपने विरोधियों पर नज़र रखने के लिए सरकारें इस टेक्नॉलॉजी का भरपूर इस्तेमाल कर रही हैं। अगर यह महज आतंकवादियों की पहचान करने तक सीमित होता, तो अच्छी बात होती। खतरनाक बात यह है कि अगर दर्ज सूचना में गलती रह जाए और इस वजह से किसी की गलत पहचान हो तो नतीजे भयंकर हो सकते हैं। इसकी एक मिसाल ड्रोन (चालक-रहित हवाई जहाज़) के जरिए बमबारी या मिसाइलें दागने का है।

सोचने पर लगता है कि शक्ल से पहचान के लिए इकट्ठा किए गए आंकड़ों में ज़्यादा कुछ तो होगा नहीं, आखिर आंखें, नाक, होंठ, यही तो हैं – या दाढ़ी-मूंछ है या नहीं, बस। पर असल में शक्ल में उतार-चढ़ाव की जटिलता कल्पना से भी ज़्यादा है। हम अक्सर किसी एक आदमी को देखकर किसी और के बारे में सोचने लगते हैं। कभी-कभी तो गलती से किसी को कोई और समझ बैठते हैं। यानी बात सिर्फ शक्ल को ज़हन में दर्ज करने की नहीं है, बाद में याददाश्त भी होनी चाहिए कि दर्ज की हुई पहचान किसकी थी। औसतन इंसान की शक्ल का फैलाव तकरीबन आधा फुट की भुजा के वर्ग के आकार का है, और साथ में तीसरा आयाम उतार-चढ़ाव का है। एक ग्राफ पेपर पर इसे दिखाया जा सकता है। अगर ग्राफ में सबसे छोटा वर्ग 1 वर्ग मि.मी. का है तो फैलाव को हम 150-150 यानी 22,500 वर्गों में बांट सकते हैं। हर छोटे वर्ग में रंगों की मदद से उतार-चढ़ाव दिखाया जा सकता है। अगर हम 16 रंगों का इस्तेमाल करें तो यह 22,500X16=3,60,000 आंकड़े हो गए। इसके बाद बात आती है चमड़े की बनावट या गठन की। हर बिंदु पर यह बदलती है। बढ़ती उम्र के साथ इसमें बदलाव आते हैं। लब्बोलुबाब यह कि शक्ल की पहचान जितना आसान मसला लगता है, उतना है नहीं। जितनी जटिलता होगी, उतने ही ज़्यादा आंकड़े होंगे और उनका हिसाब रख पाना उतना ही धीमा होगा। इसलिए शक्ल की पहचान में तकरीबन सही नतीजे पर पहुंचना हाल में ही मुमकिन हो पाया है। इसके लिए न्यूरल नेटवर्क और डीप लर्निंग का इस्तेमाल हो रहा है। इसे मुख्यत: चार चरणों में रखा जा सकता है – पहले चरण में शक्ल की तस्वीर लेकर उसे आंकड़ों में तबदील किया जाता है। जिस तरह हमारे दिमाग में किसी छवि को संजोए रखने के लिए उसे टुकड़ों में बांट कर अलग-अलग कोनों में जमा रखा जाता है, वैसे ही कंप्यूटर में भी छवि को अलग-अलग खासियतों में बांट कर दर्ज किया जाता है। दूसरे चरण में पूरी शक्ल को एक से दूसरी ओर तक ट्रैक करते हुए टुकड़ों में छोटे से छोटे हिस्से की तस्वीर ली जाती है। इसे पहले पूरी तस्वीर से दर्ज किए आंकड़ों के पूरक की तरह मान सकते हैं। तीसरे चरण में आंकड़ों को इस तरह बांटा जाता है (सेग्मेंटेशन – segmentation) ताकि बाद में उन्हें किसी मॉडल में शामिल करने में आसानी हो। मसलन अगर किसी कैनवस के हर हिस्से में अलग-अलग अनुपात में नीला और पीला रंग मिलाकर बिखेरा गया है, तो हमें अलग-अलग गहराई में बिखरे हरे रंग की तस्वीर दिखती है। हम इसे दो सूचियों में बांटकर आंकड़ों में दर्ज़ कर सकते हैं। एक सूची नीले रंग के और दूसरी पीले रंग के अनुपात को दर्ज़ करेगी। बाद में हम इसी अनुपात में दोनों रंग मिलाकर मूल तस्वीर फिर से बना सकते हैं। आखिरी चरण दर्ज आंकड़ों से मूल शक्ल को तैयार करने (रेस्टोरेशन – restoration) का है।

ऐसा लगता है कि शक्ल की पहचान इतना भी मुश्किल काम नहीं है। पर आज तक एआई के शोध में यह सबसे जटिल और चुनौतियों से भरी पहेलियों में से एक है। ऊपर बताए हर चरण में जटिलताएं हैं। मसलन ट्रैकिंग को ही लें। जब कैमरा ट्रैक कर रहा है, सांस लेने-छोड़ने जैसी कई वजहों से शक्ल में त्वचा का खिंचाव बदल सकता है। कैमरे में तस्वीर का बनना रोशनी पर निर्भर है। किस तरह का प्रकाश कहां से शक्ल पर पहुंच रहा है, उसमें कितना दूसरी चीज़ों से बिखर कर आ रहा है, ये बातें ली गई तस्वीर का मान तय करती हैं। इसलिए एक ही चीज़ पर दोहराई गई ट्रैकिंग में हर बार अलग आंकड़े दर्ज होते हैं। तीसरे और चौथे चरणों में आंकड़ों को संजोने और उनकी काट-छांट में कैसे नेटवर्क इस्तेमाल किए गए हैं, इससे आंकड़ों की प्रोसेसिंग पर असर पड़ता है। यानी मूल शक्ल को तैयार करने में गलत नतीजे मिलना मुमकिन है।

शक्ल की पहचान सिर्फ इंसान के लिए नहीं, बल्कि कई तरह के संदर्भों में अहम है। जैसे बिना ड्राइवर वाली गाड़ी के कैमरों में जो कुछ दर्ज होता रहता है, उसे पहले से दर्ज तस्वीरों के साथ तुलना कर हिसाब लगाया जाता है कि गाड़ी को आगे बढ़ाना है या नहीं, और यदि बढ़ाना है तो कितनी रफ्तार से और कैसी सावधानियों के साथ बढ़ाना है आदि। पश्चिमी मुल्कों में ऐसी गाड़ियों के टेस्ट-ड्राइव के दौरान एकाध हादसे हुए हैं, यानी मशीन द्वारा सामने आ रही चीजों की सही पहचान नहीं हो पाई थी।

कुदरती चीज़ों को कंप्यूटरों में दर्ज कर बाद में उसकी सही पहचान कर पाना इसलिए भी मुश्किल है कि कुदरत में बहुत सारी बातें संजोग से होती हैं। एक गाड़ी के सामने पड़ा हुआ छोटा बेजान पत्थर कभी अचानक उछल सकता है, क्योंकि कहीं और से कुछ आ टकराए या पत्थर के अंदर किसी छेद में कुछ फूट पड़े – ऐसी कई बातें अचानक घट सकती हैं, जिनका हिसाब पहले से नहीं रखा जा सकता है। इसलिए न्यूरल नेटवर्क की गणनाओं में संभाविता के आधार पर बदलाव किए जाते हैं। एआई के शोध में यह भी एक चुनौतियों भरा काम है, क्योंकि संजोग को गणना में शामिल करने का मतलब अक्सर यह होता है कि आंकड़ों के कई समूह इकट्ठे किए जाएं और उनका सांख्यिकी के कायदों (जैसे औसत मान आदि) का इस्तेमाल कर विश्लेषण किया जाए। इससे आंकड़ों की तादाद कई गुना बढ़ जाती है। दूसरे गणितीय तरीकों को भी अपनाया जाता है, पर ऐसी हर कोशिश नई चुनौतियां पेश करती है।

कोई भी टेक्नॉलॉजी संदर्भ-निरपेक्ष नहीं होती है। इसलिए हर टेक्नॉलॉजी के विकास में ज़्यादा से ज़्यादा लोगों की भागीदारी होनी चाहिए ताकि लोग अपने भले-बुरे का फैसला कर सकें और विकास को सही दिशा दे सकें। एआई के गलत इस्तेमाल से अक्सर बड़ी तबाही हुई है। शक्ल की पहचान से आम जनता को एक दायरे में बांधे रखना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ जाता है। आज जो जंग लड़ी जाती हैं, उनमें पहले की जंगों जैसी आमने-सामने की मुठभेड़ नहीं होती। आज धरती के एक छोर से उड़कर ड्रोन दूसरे छोर तक पहुंचते हैं। उनमें लगे कैमरों से तस्वीरें पल भर में वापस कंट्रोल-रूम तक भेजी जाती हैं, जहां फटाफट कंप्यूटरों में एआई द्वारा बमबारी का निशाना तय कर लिया जाता है और मिसाइल दाग दी जाती है। जाहिर है, मिसाइल चलाने वालों और टार्गेट के बीच न सिर्फ बहुत बड़ी भौगोलिक, बल्कि विशाल मनोवैज्ञानिक दूरी होती है। पिछले दशक में किसी ज़मीनी जंग में शामिल एक फौजी से भी ज़्यादा हत्याएं ड्रोन और मिसाइल चलाने वाले आभासी पायलटों ने की हैं। अक्सर इनमें फौजी टार्गेट की जगह आम नागरिक मारे जाते हैं। हाल में अफगानिस्तान में अमेरिकी ड्रोन द्वारा गलत निशाना तय होने की वजह से एक दर्जन से ज़्यादा आम नागरिक मारे गए थे। आम तौर पर ऐसे ड्रोन चलाने वाले भी घोर मानसिक तकलीफों से गुज़रते हैं। कई तो काम छोड़कर जंगलों में जा छिपते हैं, क्योंकि निर्दोष नागरिकों की, जिनमें अक्सर बच्चे भी होते हैं, हत्या का बोझ मनोवैज्ञानिक नासूर बनकर उन्हें ताज़िंदगी कचोटता है।

ऐसी तमाम बातें दुनिया भर में लोकतांत्रिक सोच रखने वाले लोगों को परेशान करती रही हैं। एआई की तड़क-भड़क और शोर मोहक है, पर इसके नुकसान भी कम नहीं हैं। इस बारे में सचेत रहना हरेक नागरिक की ज़िम्मेदारी है। (स्रोत फीचर्स)

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जंतु बोलने लगे थे, जब कोई सुनने वाला न था

जीव जगत में बातूनी जीवों की बात करें तो मनुष्यों के अलावा तोता-मैना, डॉल्फिन का ख्याल उभरता है। कछुओं का ख्याल नहीं आता। लेकिन कछुए भी खट-खट, घुरघुराने और खिखियाने जैसी ध्वनि की मदद से संवाद करते हैं। और अब, कछुओं और अन्य शांत माने जाने वाले जानवरों की ‘आवाज़’ रिकॉर्ड करके वैज्ञानिकों ने पाया है कि भूमि पर विचरने वाले सभी कशेरुकी जीवों में आवाज़ विकसित होने का 40 करोड़ साल पुराना साझा इतिहास है।

ये नतीजे दर्शाते हैं कि जानवरों ने अपने विकास के दौरान बहुत पहले से ही आवाज़ निकालना शुरू कर दिया था – शायद तब से जब उनके कान ठीक तरह से विकसित भी नहीं हुए थे। और इससे लगता है कि कानों का विकास इन ध्वनियों को सुनने के लिए हुआ होगा।

कई साल पहले एरिज़ोना विश्वविद्यालय के वैकासिक पारिस्थितिकीविद जॉन वियन्स और उनके साथी झुओ चेन ने ध्वनि सम्बंधी (एकूस्टिक) संचार के विकास की शुरुआत पता करने का काम किया था – मूल रूप से उन ध्वनियों के बारे में जो जानवर फेफड़ों का उपयोग करके मुंह से निकालते हैं। वैज्ञानिक साहित्य खंगाल कर उन्होंने उस समय तक ज्ञात सभी ध्वनिक जानवरों का एक वंश वृक्ष तैयार किया था। उनका निष्कर्ष था कि इस तरह की ध्वनि निकालने की क्षमता कशेरुकी जीवों में 10 से 20 करोड़ वर्ष पूर्व कई बार स्वतंत्र रूप से उभरी थी।

लेकिन ज्यूरिख विश्वविद्यालय के वैकासिक जीवविज्ञानी गेब्रियल जोर्गेविच-कोहेन का ध्यान कछुए पर गया। हालांकि वियन्स और चेन ने पाया था कि कछुओं के 14 कुल में से केवल दो ही आवाज़ें निकालते हैं, लेकिन जोर्गेविच-कोहेन कछुओं के बारे में अधिक जानना चाह रहे थे। उन्होंने दो साल में 50 कछुआ प्रजातियों की ‘वाणि‌’ को रिकॉर्ड किया।

कछुओं की आवाज़ रिकॉर्ड करने के दौरान उन्हें तीन अन्य जीवों में भी ध्वनि के बारे में पता चला, जिनके बारे में माना जाता था कि वे आवाज़ नहीं निकालते: सिसीलियन नामक एक टांगविहीन उभयचर; तुआतारा नामक एक छिपकली जैसा सरीसृप; और लंगफिश, जिसे थलचर जानवरों का निकटतम जीवित रिश्तेदार माना जाता है।

53 कछुआ प्रजातियों में से मुट्ठी की साइज़ का दक्षिण अमेरिकी वुड कछुआ (राइनोक्लेमीस पंक्टुलेरिया) आवाज़ के लिहाज़ से सेलेब्रिटी साबित हुआ। इस कछुए ने 30 से अधिक आवाज़ें निकाली, जिसमें चरमराते दरवाज़े जैसी आवाज़ शामिल है जिसका उपयोग नर कछुए मादा को बुलाने/रिझाने के लिए करते हैं। सिर्फ युवा कछुओं में चीखने, रोने की आवाज़ें भी सुनी गईं। सामान्य तौर पर, कुछ ध्वनियां आक्रामक व्यवहार से सम्बंधित थीं (जैसे काटने की ध्वनि) जबकि अन्य ध्वनियां नए कछुओं (या जीवों) से मिलने पर अभिवादन जैसी प्रतीत हो रहा थीं। इनके साथ अक्सर सिर हिलाना भी देखा गया।

ध्वनि संचार पर मौजूदा डैटा में इस नए डैटा को जोड़ने पर लगभग 1800 प्रजातियों का एक व्यापक वैकासिक वृक्ष तैयार किया गया। नेचर कम्यूनिकेशंस में शोधकर्ता बताते हैं कि इस इस वैकासिक वृक्ष की प्रत्येक शाखा पर ऐसे जानवर मौजूद थे जो ध्वनियां निकालते थे। इससे लगता है कि ध्वनिक संचार तकरीबन 40 करोड़ साल पूर्व भूमि पर रहने वाले जानवरों और लंगफिश के साझा पूर्वज में सिर्फ एक बार विकसित हुआ था।

वैज्ञानिकों का कहना है कि यह काम मनुष्यों में संचार का विकास का पता लगाने में मदद कर सकता है। लेकिन ये निष्कर्ष बहस भी छेड़ सकते हैं। जैसे शोधकर्ताओं ने मान लिया है कि कई शांत प्रजातियों में सुनी गईं आवाज़ें अन्य जानवर सुनते हैं व उन पर प्रतिक्रिया देते हैं। लेकिन यह भी हो सकता है कि इन पर कोई ध्यान तक न देता हो।

शोधकर्ता इस दिशा में काम कर रहे हैं। वे रिकॉर्ड कर रहे हैं कि कैसे कछुए और अन्य शांत प्रजातियां इन ध्वनियों का उपयोग करती हैं। वे अन्य मछलियों की ध्वनियों के साथ भूमि पर पाए जाने वाले कशेरुकी जीवों और लंगफिश की आवाज़ की तुलना भी करना चाहते हैं और देखना चाहते हैं कि क्या ध्वनि विकास का वृक्ष और भी प्राचीन हो सकता है। क्या आवाज़ निकालने की हमारी क्षमता मछलियों के साथ साझा होती है? यदि हां, तो ध्वनिक संचार हमारे अनुमान से भी कहीं पहले विकसित हो गया होगा। (स्रोत फीचर्स)

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भौंरे खेल-खिलवाड़ करते हैं

जब भी खेलकूद की बात आती है, हमें बच्चों का ख्याल आता है। लेकिन क्या खेल सिर्फ मनुष्य के बच्चे खेलते हैं? हाल का एक अध्ययन बताता है कि प्रयोगशाला में भौंरे लकड़ी की छोटी-छोटी गेंदों को सिर्फ मज़े के लिए इधर-उधर लुढ़काते हैं। इससे समझ में आता है कि भौंरों का संरक्षण और कृत्रिम छत्तों में उनके साथ अच्छा सलूक ज़रूरी है।

जानवरों में, खेल मस्तिष्क के विकास में मदद करता है: जैसे, लोमड़ी के बच्चों में लड़ने का खेल खेलना सामाजिक कौशल सीखने में मदद करता है, और शिकार आसपास न हो तो भी डॉल्फिन और व्हेल उछलते-कूदते रहते हैं और गोल-गोल घूमते हैं। 2006 में हुए एक अध्ययन ने बताया था कि युवा ततैया (पॉलिस्टस डोमिनुला) लड़ने का खेल खेलते हैं।

वर्तमान अध्ययन में क्वीन मैरी युनिवर्सिटी के व्यवहार पारिस्थितिकीविद लार्स चिटका और उनके साथी देख रहे थे कि कैसे भौंरे (बॉम्बस टेरेस्ट्रिस) लकड़ी की गेंदों को खास जगह पर पहुंचाने का जटिल व्यवहार अपने साथियों से सीखते हैं। (यदि भौंरे गेंद को सही जगह पर पहुंचा देते थे, तो मीठे पेय का इनाम दिया जाता था।) इस अध्ययन के दौरान शोधकर्ताओं ने देखा कि कुछ भौंरे गेंदों को तब भी सरकाते रहे जब उन्हें कोई इनाम नहीं मिला। ऐसा लग रहा था कि भौंरों को गेंदों के पास लौटना, उनके साथ खेलना और उन्हें लुढ़कना अच्छा लग रहा था।

भौंरो के इस व्यवहार को तफसील से समझने के लिए दल की एक साथी समदी गालपायगे ने भौंरो के लिए एक सेटअप तैयार किया। एक-मंज़िला कमरे के एक छोर पर एक छत्ता था जिसके एकमात्र द्वार से बाहर निकलने पर रास्ते में क्रीड़ा कक्ष पड़ता था। कमरे के दूसरे छोर पर भौंरों के लिए पराग और मीठा पानी रखा गया था। क्रीड़ा कक्ष को दो भागों में बांटा गया था, हरेक भाग में भौंरों से थोड़ी बड़ी साइज़ की लकड़ी की गेंदें थी। गेंदें अपने आप नहीं लुढ़कती थीं, इसलिए भौंरो को उनके साथ खेलने के लिए तिकड़म भिड़ाना पड़ता था।

पहले प्रयोग में, शोधकर्ताओं ने कक्ष के एक भाग में गेंदों को इस तरह रखा कि वे अचर रहें और दूसरे भाग की गेंदें लुढ़काने पर लुढ़क सकती थीं। भोजन तक पहुंचने के लिए भौंरो को इस क्रीडा कक्ष – और गेंदों के बीच – से होकर जाना पड़ता था। प्रयोग में देखा गया कि भौरों ने कक्ष के उस भाग से जाना ज़्यादा पसंद किया जहां गेंद लुढ़क सकती थीं – इस भाग में उन्होंने औसतन 50 प्रतिशत अधिक बार प्रवेश किया। लगता है कि भौंरो को मात्र गोल चीज़ें नहीं, बल्कि लुढ़कने वाली चीज़ें अच्छी लगती हैं।

प्रत्येक भौंरे ने गेंद कितनी बार लुढ़काई इसकी गणना करने पर शोधकर्ताओं ने पाया कि कुछ ही भौंरो ने केवल एक या दो बार गेंद लुढ़काई, लेकिन बाकियों ने दिन में करीब 44 बार तक गेंदों को लुढ़काया था। बार-बार गेंद को लुढ़काना दर्शाता है कि उन्हें ऐसा करने में आनंद आ रहा था।

इस बात की पुष्टि करने के लिए शोधकर्ताओं ने भौंरो के साथ एक नए सेट-अप में प्रयोग किया। पिछले डिज़ाइन की तरह इस छत्ते से निकल कर भोजन तक पहुंचने के लिए भी भौंरो को क्रीडा कक्ष से होकर गुज़रना पड़ता था। लेकिन इस प्रयोग में, पहले 20 मिनट के लिए क्रीडा कक्ष का रंग पीला रखा गया था और उसमें गेंदें रखी गई थीं। फिर इसकी जगह कक्ष को गेंद-रहित नीले रंग का कर दिया गया। पीले रंग का सम्बंध गेंदों के साथ जोड़ने के लिए शोधकर्ताओं ने छह बार बारी-बारी नीले-पीले रंग के कक्षों की अदला-बदली की। अंत में, शोधकर्ताओं ने गेंदें हटाकर भौंरो को पीले या नीले रंग का कक्ष चुनने का विकल्प दिया।

एनिमल विहेवियर में शोधकर्ता बताते हैं कि लगभग 30 प्रतिशत अधिक भौंरो ने पीले रंग का कक्ष चुना; संभवतः इसलिए कि उन्हें गेंद लुढ़काने में मज़ा आ रहा था। शोधकर्ताओं ने गेंद-युक्त और गेंद-रहित कक्षों के रंग पलटकर प्रयोग दोहराया, तो भी ऐसे ही परिणाम मिले।

अध्ययन से यह भी पता चला कि युवा भौंरो ने गेंद को अधिक लुढ़काया। पक्षियों और स्तनधारियों में भी युवा जंतु अधिक खेलते हैं। शोधकर्ताओं को लगता है कि खेलने से जीवों के विकासशील मस्तिष्क को लाभ मिलता होगा – जैसे, मांसपेशियों के समन्वय को मज़बूत करने में। भौंरो का मस्तिष्क भी जीवन के शुरुआती दिनों (भोजन के लिए छत्ते से बाहर निकलने के पहले के समय) में नए कनेक्शन बनाने में अधिक सक्षम होता है। तो अगला सवाल यह है कि क्या गेंद लुढ़काने से भौंरो की फूलों से मकरंद प्राप्त करने की क्षमता में सुधार होता है?

वैसे, इस अध्ययन पर कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि हो सकता हैं गेंदें भौंरो के छत्ते के रख-रखाव सम्बंधी व्यवहार को उकसा रही हों – जैसे, छत्ते से मृत भौंरों की लाशों और अन्य मलबे को हटाना। वाकई भौंरे खेलने का आनंद ले रहे हैं यह दर्शाने के लिए खेल के अधिक उदाहरण देखने से मदद मिलेगी।

और भले ही भौंरे प्रयोग में खेल रहे हों, लेकिन अध्ययन से यह स्पष्ट नहीं है कि वे प्राकृतिक परिस्थितियों में भी ऐसा करेंगे या नहीं। संभव है कि प्रयोगशाला में भौंरो के पास खेलने के अधिक मौके होते हैं क्योंकि यहां वे शिकारियों से सुरक्षित होते हैं और उन्हें भोजन इकट्ठा करने की आवश्यकता नहीं पड़ती। जंगलों में कठिन प्रतिस्पर्धा होती है और वहां सिर्फ मनोरंजन के लिए खेलने-लुढ़काने के लिए वक्त मिलना मुश्किल है।

बहरहाल, यदि वे खेलते हैं, तो कीटों में नैतिक लिहाज़ से भी इसे देखना महत्वपूर्ण हो सकता है। जानवरों के चारे के लिए कीटों को पाला जा रहा है, और उनकी भलाई सुनिश्चित करने के कोई नियम नहीं हैं। औद्योगिक उद्देश्य से जब मधुमक्खियों को ट्रक में भरकर एक जगह से दूसरी जगह ले जाया जाता है तो वे तनावग्रस्त हो जाती हैं, और बीमारियों की चपेट में आने और कॉलोनी के ढहने की संभावना होती है। शोधकर्ताओं को उम्मीद है कि उनके निष्कर्ष जंगली कीटों के लिए और अधिक सहानुभूति पैदा करेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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