सुंदरलाल बहुगुणा: पर्यावरण व वन संरक्षक – भारत डोगरा


सुंदरलाल बहुगुणा (1927-2021)

योवृद्ध पर्यावरणविद और चिपको आंदोलन के अग्रणी सुंदरलाल बहुगुणा का 21 मई को 94 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। इसके दो हफ्ते पहले उन्हें कोविड-19 के चलते ऋषिकेश के एक अस्पताल में भर्ती किया गया था। जंगलों और नदियों को बचाने के उनके प्रयासों और मानव कल्याण में उनके महान योगदान के लिए उन्हें हमेशा याद किया जाएगा।

उनका जन्म टिहरी गढ़वाल में गंगा किनारे एक गांव में हुआ था। जब वे स्कूली छात्र थे तब उनकी मुलाकात प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी श्रीदेव सुमन से हुई, जिन्होंने आगे चलकर कारावास के दौरान अपने जीवन का बलिदान कर दिया था। समाज के प्रति समर्पित उनके जीवन से बहुगुणा जी प्रेरित हुए और उन्होंने सुमन जी का अनुसरण करने का फैसला किया। वे गोपनीय ढंग से सुमन जी से सम्बंधित खबरें भेजने लगे, जिसके कारण उन्हें पुलिसिया कार्रवाई का सामना करना पड़ा। बचने के लिए वे लाहौर चले गए, लेकिन जब टिहरी साम्राज्य में स्वतंत्रता आंदोलन चरम पर था तब वे लौट आए।

पहले तो उन्हें टिहरी में प्रवेश नहीं करने दिया गया, लेकिन किसी तरह वे संघर्षों में शामिल हुए और आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

आज़ादी के बाद उन्होंने खुद को विभिन्न सामाजिक उद्देश्यों के लिए समर्पित कर दिया। अपनी निर्विवाद ईमानदारी और गहन समर्पण भाव के कारण उस समय वे गढ़वाल के सामाजिक-राजनीतिक दुनिया के उभरते हुए सितारे थे। उन्हें विमला नौटियाल जी के पिता की ओर से शादी का प्रस्ताव आया, लेकिन विमला जी तब तक सामाजिक कार्यकर्ता और स्वतंत्रता सेनानी सरला बहन की शिष्या बन गर्इं थी और राजनीति की चमक-दमक से दूर ग्रामीणों की सेवा के प्रति समर्पित थीं। उन्होंने सुंदरलाल जी के सामने यह शर्त रखी कि वे उनसे शादी तभी करेंगी जब वे राजनीति की चमक-दमक छोड़ उनके साथ दूर-दराज़ के ग्रामीण क्षेत्र में लोगों की सेवा करने के लिए राज़ी होंगे।

सुंदरलाल जी इस बात पर राज़ी हो गए। शादी के बाद वे दोनों घनसाली के पास स्थित सिलयारा गांव में ग्रामीणों की सेवा करने के लिए बस गए। यह गांव बालगंगा नदी के निकट था। वहां उन्होंने सिलयारा आश्रम बसाया, जो सामाजिक गतिविधियों का प्रशिक्षण केंद्र बना। दोनों ने ही दृढ़ता से महात्मा गांधी को अपना मुख्य शिक्षक और प्रेरणा स्रोत माना।

चीन के आक्रमण के बाद गांधीवादी विनोबा भावे ने हिमालयी क्षेत्र में गांधीवादी सामाजिक कार्यकर्ताओं से व्यापक स्तर पर सामाजिक कार्य करने का आह्वान किया था। तब विमला जी की सहमति से वे उत्तराखंड के कई हिस्सों, खासकर गढ़वाली क्षेत्र में अधिक यात्राएं करने लगे और आश्रम की बागडोर विमला जी ने संभाल ली। इन यात्राओं से सामाजिक और पर्यावरणीय सरोकारों में उनकी भागीदारी बढ़ी।

सुंदरलाल जी और विमला जी दोनों ही ने शराब विरोधी आंदोलनों और अस्पृश्यता को चुनौती देने वाले दलित आंदोलनों में भाग लिया। इस दौरान हेंवलघाटी जैसे क्षेत्र में कई युवा कार्यकर्ताओं के साथ उनके प्रगाढ़ सम्बंध बने। सत्तर के दशक के अंत में अद्वानी और सालेट जैसे जंगलों को बचाने के लिए हेंवलघाटी क्षेत्र में चिपको आंदोलन की शुरुआत की गई, जिसने लोगों में बहुत उत्साह पैदा किया। यह आंदोलन कांगर और बडियारगढ़ जैसे सुदूर जंगलों तक भी फैला, जहां सुंदरलाल बहुगुणा ने बहुत कठिन परिस्थितियों में घने वन क्षेत्र में लंबे समय तक उपवास किया। साथ ही साथ उन्होंने सरकार के वरिष्ठ लोगों के साथ संवाद बनाए रखा। खासकर, प्रधान मंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी के मन में उनके लिए बहुत सम्मान था। उनके प्रयासों से बहुत बड़ी सफलता हासिल हुई – सरकार हिमालय क्षेत्र के एक बड़े इलाके में पेड़ों की कटाई रोकने के लिए तैयार हो गई।

इस सफलता के बाद उन्होंने जंगलों और पर्यावरण को बचाने में लोगों की भागीदारी का संदेश फैलाने के लिए भूटान और नेपाल सहित कश्मीर से लेकर कोहिमा तक हिमालयी क्षेत्र के एक बड़े हिस्से की बहुत लंबी और कठिन यात्रा की। कई चरणों में की गई इस यात्रा के दौरान उनकी जान पर कई बार खतरे आए, लेकिन वे रुके नहीं और अपनी यात्रा पूरी की।

उन्होंने पर्यावरण संरक्षण के साथ-साथ टिकाऊ आजीविका की सुरक्षा पर भी ज़ोर दिया। उन्होंने विस्थापन का पुरज़ोर विरोध किया और वन श्रमिकों को संगठित किया। उन्होंने कई रचनात्मक कार्य भी किए। जैसे, खत्म होते जंगलों को पुर्नजीवित करना और जैविक/प्राकृतिक/पारंपरिक खेती को बढ़ावा देना।

जल्द ही वे हिमालयी क्षेत्र में बांध परियोजनाओं द्वारा होने वाली सामाजिक और पर्यावरणीय हानि को रोकने के आंदोलन में गहन रूप से जुड़ गए, खासकर विशाल और अत्यधिक विवादास्पद टिहरी बांध परियोजना विरोधी आंदोलन से। उच्च-स्तरीय आधिकारिक रिपोर्टों द्वारा इसके हानिकारक प्रभावों की पुष्टि किए जाने के बावजूद इस परियोजना को बढ़ावा दिया जा रहा था। यह उनका यह बहुत लंबा और कठिन संघर्ष रहा। सुंदरलाल बहुगुणा ने अपना आश्रम छोड़ दिया और विमला जी के साथ कई महीनों तक गंगा नदी के तट पर डेरा डाले रहे।

भले ही उनका यह लंबा संघर्ष उच्च जोखिम वाले बांध बनने से न रोक सका, लेकिन बेशक उनके इस संघर्ष ने इन महत्वपूर्ण मुद्दों के प्रति दूर-दूर तक जागरूकता फैलाई।

सुंदरलाल बहुगुणा जी भारत के कई हिस्सों और यहां तक कि विदेशों में भी वन संरक्षण और पर्यावरण संघर्ष के एक प्रेरणा स्रोत बन कर उभरे। जैसे, पश्चिमी घाट क्षेत्र के वनों को बचाने के लिए छेड़े गए अप्पिको आंदोलन के वे एक महत्वपूर्ण प्रेरणा स्रोत थे। उन्हें महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलनों में आमंत्रित किया गया और पर्यावरणीय मुद्दों पर व्यापक तौर पर उनकी राय ली गई। उन्हें पद्मविभूषण सहित कई प्रतिष्ठित पुरस्कारों से नवाज़ा गया।

अपनी आजीविका के लिए उन्होंने आजीवन हिंदी और अंग्रेज़ी में अंशकालिक पत्रकार और लेखक के रूप में काम किया। उनके साक्षात्कारों के अलावा उनके लेख और रिपोर्ट कई प्रमुख समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए हैं। विमला जी ने मुझे बताया कि उनके पूर्व में प्रकाशित लेखन के कम से कम दो संग्रह छपकर आने वाले हैं।

उन्होंने भूदान आंदोलन और हिमालयी क्षेत्र में टिकाऊ आजीविका और पर्यावरण संरक्षण के संयोजन के साथ एक वैकल्पिक विकास रणनीति विकसित करने जैसे कई रचनात्मक कार्यों में योगदान दिया।

उन्होंने अपने जीवन के आखिरी दिन देहरादून में अपनी बेटी के घर बिताए। पिछले वर्ष जब मैंने सुंदरलाल जी और विमला जी की जीवनी लिखी, और अपनी पत्नी मधु के साथ उन्हें यह पुस्तक भेंट करने के लिए देहरादून गया तो वे कमज़ोर होने के बावजूद बातचीत करने के लिए बड़े उत्सुक और खुश थे। उनकी बेटी माधुरी और विमला जी द्वारा उनकी बहुत देखभाल की जा रही थी।

यहां यह भी याद रखना महत्वपूर्ण होगा कि सत्तर सालों के साथ के दौरान उनकी पत्नी विमला जी ने उनके सभी प्रयासों में साथ और योगदान दिया। वे सभी संघर्षों, बाधाओं और उपलब्धियों में हमेशा साथ रहे। वे अपने पीछे विमला जी और एक बेटी माधुरी और दो बेटे राजीव और प्रदीप छोड़ गए हैं। पर्यावरण संरक्षण और लोगों की टिकाऊ आजीविका के लिए काम करते रहना ही उनके लिए हमारी सबसे अच्छी श्रद्धांजलि होगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्रटज़ेन: ओज़ोन ह्रास की जागरूकता के प्रणेता

त 28 जनवरी को पॉल जे. क्रटज़ेन ने 87 वर्ष की आयु में इस दुनिया से रुखसती ले ली। क्रटज़ेन ने ही हमें इस बात से अवगत कराया था कि वायुमंडल में मौजूद प्रदूषक पृथ्वी की ओज़ोन परत को क्षति पहुंचाते हैं। इस काम के लिए उन्हें 1995 में दो अन्य शोधकर्ताओं के साथ रसायन विज्ञान के नोबेल पुरस्कार से नवाज़ा गया था। पृथ्वी पर जैविक, रासायनिक और भूगर्भीय गतिविधियों पर मनुष्य के वर्चस्व के मद्देनज़र इस युग के लिए उन्होंने एक नया शब्द ‘एंथ्रोपोसीन’ गढ़ा था। ।

वर्ष 2000 में मेक्सिको में हुए एक सम्मेलन में क्रटज़ेन ने सबसे पहले एंथ्रोपोसीन शब्द का उपयोग किया था और बताया था कि हम ‘एंथ्रोपोसीन युग’ में रह रहे हैं। इस शब्द को तुरंत ही लोगों ने अपना लिया, और इस शब्द ने कई विषयों में बहस छेड़ दी।

पृथ्वी पर एंथ्रोपोसीन युग (या मानव वर्चस्व का युग) की शुरुआत बीसवीं सदी के मध्य से मानी जाती है, जब से मनुष्यों ने पृथ्वी पर मौजूद संसाधनों का अंधाधुंध दोहन शुरू किया। इस विचार के ज़रिए क्रटज़ेन ने पृथ्वी की जलवायु परिवर्तन की स्थिति और पर्यावरणीय दबावों पर अपनी चिंता जताई थी।

क्रटज़ेन का जन्म 1933 में एम्स्टर्डम में हुआ था। सिविल इंजीनियरिंग की शिक्षा हासिल करने के बाद 1960 के दशक में उन्होंने एक कंप्यूटर प्रोग्रामर के रूप में काम करते हुए स्टॉकहोम विश्वविद्यालय से मौसम विज्ञान का अध्ययन किया। स्नातक शिक्षा के दौरान उन्होंने अपने प्रोग्रामिंग और वैज्ञानिक कौशल दोनों का उपयोग कर समताप मंडल का एक कंप्यूटर मॉडल बनाया था। वायुमंडल में विभिन्न ऊंचाइयों पर ओज़ोन के वितरण समझाते हुए उन्होंने पाया कि नाइट्रोजन के ऑक्साइड्स ओज़ोन को क्षति पहुंचाने वाली अभिक्रियाओं में उत्प्रेरक की भूमिका निभाते हैं। 1970 के दशक की शुरुआत में जब सुपरसोनिक विमानों द्वारा उत्सर्जित नाइट्रोजन ऑक्साइड्स के स्तर पर चर्चा शुरू हुई, तब क्रटज़ेन ने पाया कि मानवजनित उत्सर्जन समताप मंडल में मौजूद ओज़ोन परत को नुकसान पहुंचाता है। उसी समय दो अन्य शोधकर्ता मारियो जे. मोलिना और एफ. शेरवुड रॉलैंड ने पाया था कि प्रणोदक, विलायकों और रेफ्रिजरेंट के रूप में इस्तेमाल किए जाने वाले क्लोरीन युक्त यौगिक भी ओज़ोन परत के ह्रास में योगदान देते हैं। 1985 में वैज्ञानिकों ने अंटार्कटिक के ऊपर ओज़ोन परत में एक ‘सुराख’ पाया था।

क्रटज़ेन 1970-1980 के दशक में ओज़ोन ह्रास पर होने वाली सार्वजनिक बहसों में काफी सक्रिय रहे। 1980 में उन्होंने जर्मनी के मैक्स प्लैंक इंस्टीट्यूट फॉर केमिस्ट्री में निदेशक का पदभार संभाला। वे पृथ्वी के वायुमंडल की सुरक्षा के लिए निवारक उपायों को ध्यान में रखकर गठित एक जर्मन संसदीय आयोग के सदस्य भी थे। इस आयोग द्वारा वर्ष 1989 में प्रकाशित रिपोर्ट ने वातावरण और जलवायु नीतियों का प्रारूप बनाने को दिशा दी। क्रटज़ेन ने 1987 में मॉन्ट्रियल संधि की नींव रखने में मदद की, जिसके तहत हस्ताक्षरकर्ता देश ओज़ोन-क्षयकारी पदार्थों के इस्तेमाल को धीरे-धारे कम करते हुए खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। इस संधि के तहत हानिकारक क्लोरीन यौगिकों पर प्रतिबंध लगा, सुपरसोनिक विमान सीमित हुए। नतीजतन, ओज़ोन परत में अब कुछ सुधार दिखाई दे रहे हैं।

नाभिकीय जाड़े के बारे में सर्वप्रथम आगाह करने वाले क्रटज़ेन ही थे। 1970 के दशक में वे कोलोरेडो स्थित नेशनल सेंटर फॉर एटमॉस्फेरिक रिसर्च के लिए काम कर रहे थे, तभी उन्होंने यूएस नेशनल ओशेनिक एंड एटमॉस्फेरिक एडमिनिस्ट्रेशन के साथ मिलकर समताप मंडलीय अनुसंधान कार्यक्रम की शुरुआत की थी। इसी समय उनकी रुचि निचले वायुमंडल (क्षोभमंडल) और जलवायु परिवर्तन के रसायन विज्ञान को जानने में बनी, और उन्होंने तब वायु प्रदूषण के स्रोतों की पड़ताल की। उन्होंने पाया कि अधिकतर ऊष्णकबंधीय इलाकों में वायु प्रदूषण का स्रोत कृषि और वनों की कटाई से निकलने वाले बायोमास का अत्यधिक उपयोग है। और उन्होंने बताया कि क्षोभमंडल में इस अत्यधिक प्रदूषण का प्रभाव ऊष्णकटिबंधीय इलाकों और दक्षिणी गोलार्ध में अधिक दिखता है, जहां अन्य मानवजनित प्रदूषण (जैसे जीवाश्म र्इंधन का उपयोग) उत्तरी औद्योगिक देशों की तुलना में कम था।

इसने क्रटज़ेन को आग के तूफानों का अध्ययन करने के लिए प्रेरित किया, जो नाभिकीय युद्ध के कारण शुरू हो सकते हैं। ऐसी आग से निकलने वाले धुएं में उपस्थित कार्बन-कण सूर्य के प्रकाश से ऊष्मा अवशोषित करते हैं, और धुएं को ऊपर उठाते हैं। इस तरह यह धुंआ पृथ्वी के ऊपर लंबे समय तक बना रहेगा और पृथ्वी की सतह को ठंडा करेगा। 1982 में उन्होंने जॉन बर्क के साथ लिखे एक लेख ‘ट्वाइलाइट एट नून’ (दोपहर में धुंधलका) में नाभिकीय शीतकाल के बारे में चेताया था। इसी से प्रेरित होकर सोवियत संघ के प्रमुख मिखेल गोर्बाचेव ने 1987 में अमेरिकी राष्ट्रपति रोनाल्ड रीगन के साथ परमाणु हथियार-नियंत्रण समझौते पर हस्ताक्षर किए थे।

वर्ष 2000 में औपचारिक सेवानिवृत्ति के बाद क्रटज़ेन ने अपना काम जारी रखा। 2006 में उन्होंने जिओइंजीनियरिंग में अनुसंधान का आव्हान किया; उनका कहना था कि यदि उत्सर्जन थामने के प्रयास असफल रहे तो यही एकमात्र विकल्प बचेगा। ऐसे एक विकल्प पर विचार हुआ था: सल्फर डाइऑक्साइड को समताप मंडल में छोड़ा जाए, जो वहां सल्फेट में परिवर्तित हो जाएगी। ये सल्फेट कण पृथ्वी को सूरज से बचाएंगे और ग्रीनहाउस प्रभाव का मुकाबला करेंगे। क्रटज़ेन इस विचार के समर्थक नहीं थे, लेकिन वे इस तरह के प्रयोग करके देखना चाहते थे। आज, कुछ लोग इस विचार पर काम कर रहे हैं, तो कुछ अन्य इसे उत्सर्जन पर नियंत्रण की दिशा से भटकाव मानते हैं।

क्रटज़ेन एक रचनात्मक वैज्ञानिक और जोशीले व्यक्ति थे। कई वैज्ञानिक और सार्वजनिक बहसों में मानवजनित चुनौतियों को वे सामने लाए। कोविड-19 महामारी भी एंथ्रोपोसीन-जनित है। क्रटज़ेन की अपेक्षा होती कि हम विज्ञान, समाज और पृथ्वी को लेकर ज़्यादा ज़िम्मेदारी से काम करें। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।