तीसरी पास कृषि वैज्ञानिक दादाजी खोब्रागड़े – गायत्री क्षीरसागर

तीसरी पास और कृषि वैज्ञानिक? बात कुछ अजीब लगती है। किंतु शोध कार्य करने के लिए केवल तीन बातें ज़रूरी होती हैं – इच्छा शक्ति, जिज्ञासा और कुछ नया सीखने की मानसिकता। इन्हीं तीन खूबियों के चलते नांदेड़, महाराष्ट्र के तीसरी पास दादाजी रामाजी खोब्रागड़े ने धान की नौ किस्में विकसित कीं।

दादाजी को स्कूल में भर्ती होने और सीखने की तीव्र इच्छा थी, किंतु परिवार की गरीबी के कारण वे तीसरी कक्षा तक ही पढ़ पाए। बचपन से ही उन्होंने अपने पिता के साथ खेती करके कृषि का व्यावहारिक ज्ञान प्राप्त किया। सन 1983 में धान के खेत में काम करते समय उनका ध्यान कुछ ऐसी बालियों की ओर गया जो सामान्य बालियों से अलग थीं। दादाजी ने इस धान को सहेज कर उगाया तब उनके ज़ेहन में आया कि धान की इस किस्म की भरपूर फसल मिल सकती है। उन्होंने चार एकड़ में इस धान को लगाया और उन्हें 90 बोरी धान प्राप्त हुआ। सन 1989 में जब वे इस धान को बेचने के लिए कृषि उपज मंडी में ले गए तब इस किस्म का कोई नाम न होने के कारण उन्हें कुछ दिक्कतें आर्इं। उस समय एचएमटी की घड़ियां बहुत लोकप्रिय होने के कारण इस बढ़िया और खुशबूदार चावल की किस्म का नाम एचएमटी रखा गया। उदारमना दादाजी ने इस धान का बीज अपने गांव के अन्य किसानों को दे दिया जिससे उन किसानों को बहुत आर्थिक लाभ हुआ। इस तरह दादाजी का गांव एचएमटी धान के लिए मशहूर हो गया।

दादाजी केवल इतने पर ही नहीं रुके। उन्होंने अपने काम को बढ़ावा देते हुए अपनी चार एकड़ ज़मीन को प्रयोगशाला बनाया। किसी आधुनिक तकनीक की सहायता के बिना अगले 10 वर्षों में उन्होंने धान की नौ नई किस्में विकसित कीं जिन्हें उन्होंने अपने नाती-पोतों और गांव के नाम दिए – एचएमटी, विजय, नांदेड़, नांदेड़-92, नांदेड हीरा, डीआरके, नांदेड़ दीपक, काटे एचएमटी और डीआरके-2।

आज कई प्रदेशों के किसान धान की इन नई किस्मों का उत्पादन करके अच्छी कमाई कर रहे हैं। ये नई किस्में लोगों को भी पसंद आ रही हैं। किंतु तीसरी तक पढ़े दादाजी को यह ज्ञान नहीं था कि अपने द्वारा विकसित नई किस्मों का पेटेंट कैसे करवाएं। इसका कई लोगों ने फायदा उठाया और नतीजा यह हुआ कि दादाजी को उनके शोधकार्य के लिए उचित मेहनाताना कभी भी नहीं मिला। किंतु कई प्रकार की आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए दादाजी ने अपना शोध कार्य जारी रखा। कुछ दिनों बाद बेटे की बीमारी के कारण दादाजी को अपनी प्रयोगशाला यानी ज़मीन गिरवी रखनी पड़ी और हालत अधिक खराब होने पर उसे बेचना ही पड़ा।

अब ऐसा लगने लगा था कि दादाजी का शोध कार्य हमेशा के लिए रुक जाएगा, किंतु उनके एक रिश्तेदार ने उन्हें डेढ़ एकड़ ज़मीन दे दी। पहले की प्रयोगशाला की तुलना में यह ज़मीन छोटी होते हुए भी दादाजी अपनी ज़बरदस्त इच्छाशक्ति और ध्येय तक पहुंचने की ज़िद के आधार पर नए-नए प्रयोग करते रहे। उनके ज्ञान और शोध कार्य को समाज ने लगातार नज़रअंदाज़ किया किंतु विकट आर्थिक स्थिति में भी दादाजी ने किसी भी प्रकार के मान-सम्मान की उम्मीद नहीं रखी।

छोटे गांव में रह कर लगातार शोध कार्य करने के लिए उन्हें सन 2005 में नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन का पुरस्कार दिया गया। इसी प्रकार, तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम के हाथों उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार दिया गया। इसके बाद दादाजी का नाम पूरे देश में जाना जाने लगा। सन 2006 में महाराष्ट्र सरकार ने उन्हें कृषिभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया। इस अवसर पर उन्हें केवल 25 हज़ार रुपए नकद और सोने का मेडल दिया गया। कुछ समय बाद दादाजी की आर्थिक हालत और भी खराब हो गई और उन्होंने अपना सोने का मेडल बेचने का विचार किया। किंतु उन्हें गहरा धक्का तब लगा जब यह पता चला कि वह मेडल खालिस सोने का नहीं था। जब इस मुद्दे को मीडिया ने और जनप्रतिनिधियों ने उठाया तब उन्हें उचित न्याय मिला।

सन 2010 में अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका फोर्ब्स ने दुनिया के सबसे उत्तम ग्रामीण उद्यमियों की सूची में दादाजी को शामिल किया, तब हमारे प्रशासन की नींद खुली। इसके बाद सारी मशीनरी इस या उस बहाने से दादाजी को सम्मानित करने के आयोजनों में जुट गई। उन्हें सौ से अधिक पुरस्कार दिए गए, अनगिनत शालें, हार और तोहफे दिए गए किंतु उनके शोध कार्य को आगे बढ़ाने के लिए जिस प्रकार की आर्थिक सहायता की आवश्यकता थी, वह नहीं मिली। उन्हें अपनी ज़िंदगी का अंतिम पड़ाव गरीबी और अभाव में बिताना पड़ा। 3 जून 2018 को उनका निधन हो गया।

आज भारत में ही नहीं, अपितु सारी दुनिया में कई शोधकर्ताओं का नाम होता है, किंतु कई शोधकर्ताओं को उनके शोध कार्य का उचित आर्थिक मुआवज़ा और समाज में सम्मान नहीं मिल पाता। हमारे देश में कई किसान फसलों के साथ नए-नए प्रयोग कर रहे हैं किंतु जानकारी के अभाव में उनके द्वारा विकसित फसलों को पहचान नहीं मिल पाती और उनका ज्ञान उन्हीं तक सिमट कर रह जाता है। यह आवश्यक है कि अनुभवों से उपजे उनके ज्ञान को सहेजा जाए। दादाजी खोब्रागडे के समान ऐसे अनेक व्यक्ति हैं जो अनपढ़ होते हुए भी अपनी शोध प्रवृत्ति और जिज्ञासा के चलते समाज के विकास के लिए प्रयास कर रहे हैं। ऐसे व्यक्तियों को सभी स्तरों से सहायता प्राप्त होने पर नई खोजें करने के लिए प्रोत्साहन मिल सकेगा।

यदि भारत को सही अर्थों में एक विकसित देश बनाना है तो यह ज़रूरी है कि बिलकुल निचले स्तर के व्यक्ति के मन में भी शोध कार्य के प्रति रुचि जागृत हो। इसके साथ ही यह भी आवश्यक है कि गांवों और छोटे-बड़े शहरों में शोध कार्य के प्रति रुचि रखने वाले और खोजी प्रवृत्ति के ऐसे व्यक्तियों को यथोचित सम्मान और उचित पारिश्रमिक देकर उनके साथ न्याय किया जाए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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विज्ञान के दर्शन और इतिहास के पुरोधा: देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय – डॉ. रामकृष्ण भट्टाचार्य

यह आलेख दी एशियाटिक सोसाइटी, कोलकाता और ऑल इंडिया पीपुल्स साइंस नेटवर्क द्वारा 19-20 नवंबर 2018 को आयोजित जन्म शताब्दी सेमिनार-सह-कार्यशाला के अवसर पर दिए गए मुख्य भाषण पर आधारित है।

ह मेरे लिए गौरव की बात है कि मुझे एशियाटिक सोसाइटी, कोलकाता के तत्वावधान में देबीप्रसाद चट्टोपाध्याय (1918-1993) पर आयोजित संगोष्ठी में मुख्य भाषण देने के लिए आमंत्रित किया गया है। स्वयं देबीप्रसादजी युवावस्था से ही एशियाई अध्ययन के इस सबसे पुराने केंद्र से जुड़े और अपने जीवन के अंतिम दिन तक जुड़े रहे। वे हमेशा कृतज्ञतापूर्वक याद करते थे कि कैसे प्रोफेसर निहार रंजन राय (1903-1981) ने काम के दौरान सोसाइटी लाइब्रेरी में उनकी पढ़ाई में मदद की और इस काम की बदौलत अंग्रेज़ी में लोकायत (1959) के रूप में एक महान कृति हमारे सामने आई।

देबीप्रसादजी का सम्बंध उस पीढ़ी से था जिसे सही मायने में यंग बंगाल नामक समूह का उन्नीसवीं सदी में पुनर्जन्म कहा जा सकता है। उनकी जीवन शैली में उसी तरह की लापरवाही नज़र आती है; धर्म और पारंपरिक मूल्यों के प्रति वही अश्रद्धा, और खुली सोच और यथार्थ का वैसा ही गुणगान।

कलाकार, निबंधकार, चित्रकार, नाटककार, कवि और अन्य प्रतिभाएं लगभग 1940 के दशक में संस्कृति के सभी क्षेत्रों में दिखाई देने लगी थीं। जाने-माने विद्वान गोपाल हलधर ने इस घटना को माक्र्सवादी पुनर्जागरण का नाम दिया है।

देबीप्रसादजी इस दूसरे पुनर्जागरण के उत्पाद थे। उन्होंने अपने साहित्यिक जीवन की शुरुआत आधुनिक घराने के एक कवि के रूप में की थी। वे स्वयं को समर सेन का चेला कहते थे। 1960 के दशक में समर सेन के साथ गंभीर राजनीतिक मतभेद होने के बाद भी आपसी सम्मान और सौहार्द पर आधारित उनके रिश्ते पर न तो कोई प्रभाव पड़ा और ना ही कोई बाधा आई।

जैसा कि उनके शानदार अकादमिक कैरियर से पता चलता है, देबीप्रसादजी जीवन भर दर्शनशास्त्र के छात्र रहे। हालांकि, उनकी शुरुआती युवावस्था में साहित्य और कला, विशेष रूप से कविता, ज़्यादा प्रमुख रहे। 1940 के दशक के अंत और 1950 के दशक के पूर्वार्ध में वे अधिकतर बांगला भाषा में कविता, पेंटिंग और यहां तक कि फिल्मों पर लेखन में व्यस्त रहे। कुछ समय के लिए उनकी रुचि सिगमंड फ्रायड और उनकी मनोविश्लेषण प्रणाली में भी रही। लेकिन मार्क्सवादी नामक पत्रिका के पन्नों पर भवानी शंकर सेनगुप्ता द्वारा उनकी पुस्तक यौन जिज्ञासा की तीखी समीक्षा ने उनको फ्रायड के विचारों से दूर कर दिया। मार्क्सवादी अनौपचारिक ढंग से भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की पत्रिका थी। इसके बाद 1951 में, प्राचीन काल में भारतीय दर्शन और भौतिकवाद के बारे में भवानी सेन के साथ विवाद सुलझने के बाद, स्वयं भवानी सेन ने उन्हें इस बात के लिए तैयार किया कि वे प्राचीन भारतीय सोच की सकारात्मक विरासत को सबके सामने लाएं ताकि भारतीयों के बीच व्याप्त रूढ़िवाद का मुकाबला किया जा सके। भवानी सेन के साथ इस विवाद की चर्चा देबीप्रसाद की अग्रंथिता वितर्क, अबाभास, 2012 में संकलित है। (देबीप्रसादजी ने ये बातें अपने आलेख ए क्रिएटिव मार्क्सट एज़ आई न्यू हिम में दर्ज की हैं। यह आलेख उन्होंने भवानी सेन के स्मरण में प्रकाशित पुस्तक ट्रिब्यूट: भवानी सेन (1972) में लिखा था।

लोकायती देबीप्रसाद

यह देबीप्रसादजी के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था। वे 1940 के दशक के अंत से ही युवा पाठकों के लिए लोकप्रिय विज्ञान के लेखन कार्य में व्यस्त रहे। उन्होंने पाठकों के लिए एक-दो नहीं बल्कि कई शृंखलाओं का संपादन किया। वे पहले से ही साहित्यकार के रूप में इतने प्रसिद्ध थे कि लखनऊ में 1954 में आयोजित अखिल भारतीय बंगाली साहित्य सम्मेलन के 30वें सत्र में उन्हें किशोर साहित्य अनुभाग का अध्यक्ष मनोनीत किया गया था। उस समय उनकी आयु केवल 36 वर्ष थी। सम्मेलन में दिया गया उनका भाषण एक क्लासिक रहा है। सोमेश चट्टोपाध्याय और शांतनु चक्रवर्ती द्वारा संपादित लोकायत देबीप्रसाद (1994) में इसे शामिल किया गया।

बहरहाल, 1953-54 से उन्होंने खुद को प्राचीन भारतीय दर्शन में भौतिकवादी परंपरा के अध्ययन की ओर समर्पित कर दिया था। एक मार्क्सवादी-लेनिनवादी होने के नाते उन्होंने सभी प्रमुख ग्रंथों का अध्ययन किया। इससे सीखी बातों को प्राचीन भारतीय विचारों पर लागू करना उनकी सबसे बड़ी चुनौती थी। इंग्लैंड यात्रा और बर्मिंगहैम के प्रोफेसर जॉर्ज थॉमसन के साथ चर्चा उन्हें सही परिप्रेक्ष्य हासिल करने में मददगार हुई। इसका परिणाम उनकी बांगला पुस्तक लोकायत दर्शन (1956) और उसके बाद अंग्रेज़ी में आई लोकायत (1959) के रूप में देखने को मिला। इसकी देश-विदेश में खूब सराहना भी हुई और विरोध की कुछ आवाज़ें भी उठी। पूरी दुनिया में विद्वानों और सामान्य पाठकों से मिली प्रशंसा ने इन आवाज़ों को दबा दिया। लोकायत आज भी एक बेस्टसेलर है और भारत में भौतिकवादी परंपरा में रुचि रखने वाले विद्यार्थी आज भी इस किताब को पढ़ते हैं। 1959 के बाद से भले ही इस क्षेत्र में कई महत्वपूर्ण अध्ययन सामने आए हैं, लेकिन इस काम का मूल्य कभी कम नहीं होगा।

दर्शन से विज्ञान के इतिहास की ओर

यह तो स्पष्ट नहीं है कि देबीप्रसाद जी ने अपने अनुसंधान का फोकस दर्शन शास्त्र से हटाकर विज्ञान के इतिहास की ओर क्यों मोड़ा। न तो उन्होंने इसके बारे में कुछ लिखा है और न ही उनके सहयोगियों को विज्ञान के इतिहास में उनकी दिलचस्पी के बारे में कुछ पता है। उनकी किताब व्हाट इज़ लिविंग एंड व्हाट इज़ डेड इन इंडियन फिलॉसफी (1976) और हिस्ट्री ऑफ़ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी इन एनशंट इंडिया (खंड 1, 1986) के बीच साइंस एंड सोसाइटी इन एनशंट इंडिया (1977) नाम से एक किताब प्रकाशित हुई थी। इस पुस्तक की प्रस्तावना में वे लिखते हैं, वर्तमान अध्ययन का उद्देश्य मेरी हाल ही में प्रकाशित व्हाट इज़ लिविंग एंड व्हाट इज़ डेड इन इंडियन फिलॉसफी को संपूर्णता प्रदान करना है। जैसा कि शीर्षक से स्पष्ट है वह पुस्तक विशेष रूप से दर्शन शास्त्र पर केंद्रित थी। यहां तक कि साइंस एंड सोसाइटी इन एनशंट इंडिया की योजना भी मूल रूप से तीन खंडों में बनाई गई थी, जिसमें तीसरा खंड प्राचीन भारतीय चिकित्सा के बुनियादी सिद्धांतों में न्याय-वैशेषिका दर्शन के स्रोतों पर चर्चा करना था। हालांकि, जैसा कि उन्होंने बाद में कहा, विचार करने पर उन्होंने तीसरे खंड को अलग-अलग दो पुस्तकों के रूप में लिखने का फैसला किया था – साइंस एंड काउंटर आइडियोलॉजी और दी सोर्स-बुक्स रीएक्ज़ामिन्ड। उनका ऐसा मानना था कि यह तकनीकी विवरणों से भरा है इसलिए सामान्य पाठकों के रुचि का नहीं होगा। अलबत्ता, वह तीसरी पुस्तक कभी नहीं लिखी गई।

इस बात पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि देबीप्रसाद जी ने सिर्फ विद्वानों के लिए ही नहीं लिखा; उनके ज़हन में हमेशा सामान्य पाठक थे। यह एक ऐसा गुण था जो अकादमिक लोगों के कामों में प्राय: देखने को नहीं मिलता है। यह शायद प्रोफेसर वाल्टर रूबेन का प्रभाव था।

जिस तरह से कुछ लोगों की भूख खाना खाने के साथ बढ़ती है, उसी तरह देबीप्रसाद जी द्वारा चरक संहिता और सुश्रुत संहिता का अध्ययन उन्हें न्याय-वैशेषिका दर्शन से विज्ञान की अन्य शाखाओं की ओर ले गया। जैसे खगोल विज्ञान, वनस्पति विज्ञान, गणित आदि। चिकित्सा संहिताओं से जोड़कर न्याय-वैशेषिका की चर्चा का वादा पूरा नहीं किया गया। उन्होंने एक सर्वथा नए दृष्टिकोण से प्राचीन भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी का इतिहास लिखने की ज़रूरत महसूस की। उन्होंने महसूस किया कि इतिहास के मौजूदा लेखन अपर्याप्त हैं और उनमें पुरातात्विक जानकारी तथा अन्य सांसारिक मुद्दों को शामिल नहीं किया गया है, जैसे शहरों का विकास, लोहे का उपयोग वगैरह। इतिहास में इस नई रुचि के चलते उन्होंने 1982 में एक एंथॉलॉजी (ग्रंथ सूचियों) के दो खंड संपादित किए – स्टडीज़ इन दी हिस्ट्री ऑफ साइंस इन इंडिया। पहले खंड में उन्होंने एक लम्बा परिचय देते हुए कार्य योजना की रूपरेखा प्रस्तुत की। इसमें उन्होंने जोसेफ नीडहैम की पुस्तक दी ग्रैंड टाइट्रेशन से एक लम्बा उद्धरण दिया था (जो इस भव्य वक्तव्य के साथ समाप्त होता है आधुनिक सार्वभौमिक विज्ञान अवश्य, लेकिन पाश्चात्य विज्ञान कदापि नहीं!)। आगे उन्होंने अपने पाठकों से कहा था; यह पुस्तक भारतीय इतिहास में विज्ञान नामक प्रोजेक्ट का एक हिस्सा है, जिस पर हम काम करते रहे हैं। प्रोजेक्ट के दायरे की व्याख्या करने से पहले, प्रोजेक्ट की प्रासंगिकता पर कुछ कहना उपयोगी होगा। जैसा कि प्रोफेसर जोसेफ नीडहैम ने स्पष्ट किया है, इस तरह के किसी भी प्रोजेक्ट की मुख्य मान्यताएं इस प्रकार हैं: (1) सामाजिक विकास ने मानव के प्रकृति सम्बंधी ज्ञान और बाहरी दुनिया पर उसके नियंत्रण में क्रमिक वृद्धि की है, (2) यह विज्ञान एक अंतिम मूल्य है और इसके उपयोग से एक एकता बनती है जिसमें विभिन्न सभ्यताओं (जो एक-दूसरे से अलग-थलग नहीं रही हैं) के बराबर योगदान शामिल हैं जो सभी नदियों की तरह समुद्र में मिलते रहे हैं और आज भी मिल रहे हैं। (3) इस प्रगतिशील प्रक्रिया के साथ यह मानव समाज लगातार बढ़ती एकता, जटिलता और संगठित स्वरूपों की ओर बढ़ रहा है।

देबीप्रसादजी के प्रोजेक्ट का साकार रूप 1986 में हिस्ट्री (हिस्ट्री ऑफ साइन्स इन एनशंट इंडिया) के पहले खंड के रूप में सामने आया। अर्थात दर्शन शास्त्र ही उन्हें विज्ञान के इतिहास की ओर ले गया था। अलबत्ता, यह नई रुचि सर्वग्राही साबित हुई और इसके परिणामस्वरूप अध्येताओं के एक ऐसे समूह का गठन हुआ जिन्होंने सही मायने में भारत में विज्ञान और प्रौद्योगिकी के इतिहास को उजागर करने के लिए साझा प्रयास किए। इस पुस्तक में चरक संहिता और न्यायसूत्र के साथ-साथ वैशेषिका के ज्ञान शास्त्र का मुद्दा उन्होंने अपने करीबी सहयोगी मृणाल कांति गंगोपाध्याय के लिए छोड़ दिया था। मृणाल कांति का उल्लेख उन्होंने सदा मेरे युवा मित्र और शिक्षक के रूप में किया है। 

विज्ञान के दर्शन और इतिहास दोनों क्षेत्रों में देबीप्रसादजी के योगदान को संक्षेप में इस तरह प्रस्तुत किया जा सकता है:

– चट्टोपाध्याय ने भारत में भौतिकवाद के अध्ययन को उस समय प्रचलित अतिशयोक्ति पूर्ण प्रस्तुतीकरण से बचाया। 1956 से लोकायत पर अपने काम (बंगला लोकायत) के माध्यम से, उन्होंने भारत में दर्शनों के मानचित्र पर चार्वाक/लोकायत प्रणाली को मज़बूती से स्थापित करने में सफलता प्राप्त की।

– उन्होंने ही इस बात पर ज़ोर दिया था चार्वाक दार्शनिक ज्ञान अर्जित करने की एक विधि के रूप में प्रमाणों के आधार पर निष्कर्ष के विरोध में नहीं थे। हालांकि सुरेंद्रनाथ दासगुप्ता, रिचर्ड गार्बे, मैसूर हिरियाना और सतकारी मुखर्जी ने पहले ही इस बात को पहचान लिया था, लेकिन इन सबने इसको ज़ोर देकर नहीं कहा था। देबीप्रसादजी ने इस सम्बंध में पुरंदर के कथन के आधार पर इसे दृढ़ता से प्रस्तुत किया था। पुरंदर का यह वक्तव्य शांतरक्षिता के तत्वसंग्रह पर कमलशिला की टीका में दर्ज हुआ था। मृणाल कांति गंगोपाध्याय ने भी भारतीय तर्कशास्त्र के अपने अध्ययन में इस तथ्य को दोहराया है।

– उन्होंने दर्शनशास्त्र और विज्ञान के बीच एक मज़बूत कड़ी स्थापित की।

– उन्होंने विज्ञान के इतिहास में प्रौद्योगिकी की भूमिका के महत्व को रेखांकित किया।

– उन्होंने प्राचीन भारत में भौतिकवाद, नास्तिकता, तर्कवाद जैसी धाराओं पर व्यवस्थित शोध की परंपरा शुरू की (जैसे उनकी पुस्तक इंडियन एथीज़्म: ए मार्क्सट एनालिसिस, 1969)। इससे इस प्रचलित धारणा को चुनौती मिली कि भारत मात्र अध्यात्म, आस्था और भक्ति की भूमि है। प्रोफेसर मृणाल कांति गंगोपाध्याय से लेकर ट्रिएस्ट (इटली) के डॉ. कृष्णा डेल टोसो तक कई विद्वान इस दूसरे भारत की अवधारणा पर काम करने में लगे हुए हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पी. सी. वैद्य: एक गांधीवादी भौतिक शास्त्री – अपराजित रामनाथ

क भारी-भरकम गोलाकार तारे पर विचार कीजिए जो बाह्य अंतरिक्ष में विपुल मात्रा में विकिरण छोड़ रहा है। ऐसे किसी तारे के आसपास गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र का व्यवहार कैसा होगा? अल्बर्ट आइंस्टाइन द्वारा 1915 में प्रतिपादित क्रांतिकारी सामान्य सापेक्षता सिद्धांत को लागू करके कई सवालों को संबोधित किया जा सकता था। उपरोक्त सवाल उनमें से एक महत्वपूर्ण सवाल था। और इसका समाधान सबसे पहले गणितज्ञ और खगोलविद पी.सी. वैद्य (1918-2010) ने निकाला था। इसे वैद्य मेट्रिक्स के नाम से जाना जाता है। मई में उनकी जन्म शती थी।

सामान्य सापेक्षता के सिद्धांत को दस ‘क्षेत्र समीकरणों’ द्वारा व्यक्त किया जाता है जो समूचे ब्रह्मांड में वैध हैं। ये समीकरण कतिपय सरलीकृत मान्यताओं के अंतर्गत कुछ सटीक समाधान की गुंजाइश प्रदान करते हैं। पहला सटीक समाधान सिद्धांत के प्रतिपादन के फौरन बाद सामने आया था जब जर्मन वैज्ञानिक कार्ल श्वाजऱ्चाइल्ड ने अंतरिक्ष में विकिरण का उत्सर्जन न करने वाले किसी गोलाकार पिंड के आसपास के क्षेत्र का विवरण प्रस्तुत किया था।

इसके पूरे 26 साल बाद वैद्य ने 1943 में विकिरण करते गोलाकार पिंड के क्षेत्र की गणना की थी। 1960 के दशक में रेडियो दूरबीनों की मदद से दूरस्थ निहारिकाओं के मध्य में क्वासर (क्वासी-स्टेलर रेडियो स्रोतों) की खोज की गई जो विशाल मात्रा में ऊर्जा उत्पन्न करते हैं। वैद्य ने बाद में याद करके बताया था, “न्यूटन का (गुरुत्वाकर्षण) सिद्धांत इन पिंडों के अत्यंत तीव्र गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र के संदर्भ में अपर्याप्त साबित हुआ था और (इनके विवरण के लिए) आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत की आवश्यकता थी।”

वैद्य का समाधान इन परिस्थितियों के अध्ययन के लिए आदर्श था, और इसके चलते वे उच्च-ऊर्जा खगोल-भौतिकविदों की दुनिया में शामिल कर लिए गए।

महान, अनोखे

आने वाले दशकों में उन्होंने सामान्य सापेक्षता और खगोल-भौतिकी के संगम बिंदु पर कई महत्वपूर्ण योगदान दिए। उन्होंने सटीक समाधानों के अलावा अति-विशाल पिंडों और ब्लैक होल्स जैसे विषयों पर काम किया। अकेले या अपने शोध छात्रों के साथ काम करते हुए उन्होंने नेचर, फिजि़कल रिव्यू लेटर्स, एस्ट्रोफिजि़कल जर्नल और करंट साइन्स जैसी शोध पत्रिकाओं में कई शोध पत्र प्रकाशित किए।

वैद्य एक संस्था-निर्माता भी थे। इंडियन एसोसिएशन फॉर जनरल रिलेटिविटी के संस्थापक सदस्य के रूप में उन्होंने भारत में इस क्षेत्र में काम कर रहे वैज्ञानिकों को साथ लाने का महत्वपूर्ण कार्य किया। इन वैज्ञानिकों में सी.वी. विश्वेश्वरा, नरेश दधीच और जयंत नार्लीकर जैसे वैज्ञानिक शामिल थे। जयंत नार्लीकर आगे चलकर इंटरयुनिवर्सिटी सेंटर फॉर एस्ट्रोनॉमी एंड एस्ट्रोफिजि़क्स (IUCAA, पुणे) के प्रथम निदेशक बने।

हालांकि भारत में सामान्य सापेक्षता अनुसंधान के शुरुआती केंद्र जयंत नार्लीकर के पिता वी.वी. नार्लीकर और एन. आर. सेन के नेतृत्व में स्थापित हुए थे, अगली पीढ़ी पर वैद्य का ज़बर्दस्त प्रभाव रहा। सामान्य सापेक्षता के क्षेत्र में कार्यरत वैज्ञानिक कलकत्ता (अब कोलकाता) के गणितज्ञ अमल कुमार रायचौधरी के साथ-साथ वैद्य को अपना मार्गदर्शक मानते थे और 1985 में इन दोनों वैज्ञानिकों के सम्मान में पुस्तिका का प्रकाशन किया गया था।

इस बात में कोई संदेह नहीं कि पी. सी. वैद्य अव्वल दर्जे के वैज्ञानिक थे और आइंस्टाइन से लेकर स्टीफन हॉकिंग और गुरुत्वाकर्षण तरंगों की खोज करने वाली लिगो टीम तथा अन्य प्रायोगिक वैज्ञानिकों की परंपरा के हिस्से थे। और फिर भी – हालांकि मैं प्रशिक्षण और पेशे से विज्ञान का इतिहासकार हूं – मैंने चंह महीनों पहले तक पी.सी. वैद्य का नाम तक नहीं सुना था। मैंने उनका नाम पहली बार तब सुना जब एक मित्र ने हॉकिंग के जीवन और कार्य पर व्याख्यान देते हुए उनका जि़क्र किया।

यह मेरे अज्ञान का द्योतक हो सकता है किंतु एक गैर-वैज्ञानिक जनमतसंग्रह से लगता है कि बात इतनी ही नहीं है। गुजरात का यह महान व्यक्तित्व भारत के घर-घर में सी.वी. रामन, मेघनाथ साहा, एस.एस. भटनागर, सुब्रामण्यन चंद्रशेखर या होमी भाभा जैसा नाम नहीं बन पाया।

इसे कैसे समझें? इसका कुछ सम्बंध तो इस बात से है कि जिस परिवेश में उन्होंने अपना कैरियर बनाया और जिस असाधारण जीवन शैली को उन्होंने अपनाया। कई स्रोतों से हम उस कैरियर को पुनर्निर्मित कर सकते हैं। इनमें उनकी गुजराती स्मरण पुस्तिका चॉक एंड डस्टर तथा उनके सम्बंधियों और सहकर्मियों द्वारा लिखे गए जीवन वृत्त शामिल हैं।

शुरुआती वर्ष

प्रहलाद चुन्नीलाल वैद्य (कुछ लोगों के लिए वैद्य साहेब) का जन्म 1918 में जूनागढ़ रियासत के एक गांव शाहपुर में हुआ था। वे एक डाक अधिकारी के द्वितीय पुत्र थे। बचपन में ही उनके माता-पिता गुज़र गए और उनका लालन-पालन भावनगर के नज़दीक कुछ रिश्तेदारों ने किया, जहां 1933 तक वे अल्फ्रेड हाई स्कूल में पढ़े।

उनके भाई मधुसूदन को बंबई (अब मुंबई) में स्कूल शिक्षक की नौकरी मिल गई और पी. सी. वैद्य ने अपनी स्कूल शिक्षा वहीं पूरी की। रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ साइन्स से बी.एससी. (और आगे चलकर एम.एससी.) करने से पहले वे जोगेश्वरी स्थित इस्माइल यूसुफ कॉलेज में पढ़े। स्नातक शिक्षा के दौरान उन्हें डिस्टिंक्शन मिला और स्नातकोत्तर परीक्षा में बंबई विश्वविद्यालय के टॉपर रहे।

इस दौर में उनके व्यक्तित्व पर एक गहरी छाप बंबई विश्वविद्यालय में 1937 में वी.वी. नार्लीकर (कैंब्रिज विश्वविद्यालय में अध्ययन के बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में प्रोफेसर) द्वारा दिए गए व्याख्यानों ने डाली। यहीं पी.सी. वैद्य ने पहली बार सुना था कि विकिरण करते तारों के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र का विवरण अब तक सामान्य सापेक्षता के परिप्रेक्ष्य में नहीं दिया गया है।

उनके अकादिमक कैरियर के बावजूद, जिस ढंग से पी.सी. वैद्य का शोध कैरियर शुरू हुआ, उसमें संयोग का कुछ पुट अवश्य है। भावनगर में पी. सी. वैद्य और उनके भाई पर गांधी के विचारों का काफी असर पड़ा था। अब राजकोट में एक कॉलेज शिक्षक के रूप में थोड़े दिन काम करने के बाद उन्होंने अपने कैरियर में एक गैर-परंपरागत कदम उठाया। 1941 में उन्होंने बंबई लौटकर एक गांधी-प्रेरित स्वैच्छिक संस्था स्थापित की। अहिंसक व्यायाम संघ नामक यह संस्था सत्याग्रहियों के प्रशिक्षण के लिए बनाई गई थी।

यह कई भारतीय युवाओं के लिए जुनून का दौर था क्योंकि इसी समय भारतीय नेताओं ने ब्रिटेन द्वारा भारत को एकतरफा ढंग से द्वितीय विश्व युद्ध में झोंकने के निर्णय के खिलाफ संघर्ष करते हुए भारत छोड़ो आंदोलन की घोषणा कर दी थी। यह पी. सी. वैद्य के लिए निराशा का कारण बना कि व्यायाम संघ की प्रेरक शक्ति पृथ्वी सिंह की वैचारिक उलझनों के चलते संस्था को समेट दिया गया। सिंह का वैचारिक झुकाव कम्यूनिज़्म की ओर था और वे ब्रिटिशों का विरोध करने में खुद को असमर्थ पा रहे थे क्योंकि ब्रिटिश तब सोवियत संघ के सहयोगी थे।

खुद को मझधार में पाकर, पी. सी. वैद्य ने वी.वी. नार्लीकर का रुख किया। उन्होंने बनारस में नार्लीकर को चिट्ठी लिखकर पूछा कि क्या वे एक अनौपचारिक शोध छात्र के रूप में उनके साथ काम कर सकते हैं। अपनी बचत के भरोसे पी.सी. वैद्य अपने परिवार को लेकर बनारस आ गए, जहां उन्होंने नार्लीकर के मार्गदर्शन में काम करते हुए 1942 से कई शोध पत्र प्रकाशित किए। इनमें से एक – इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइन्स द्वारा प्रकाशित करंट साइन्स में 1943 में प्रकाशित शोध पत्र – उनकी पहली बड़ी सफलता थी। इस शोध पत्र का शीर्षक था: दी एक्सटरनल फील्ड ऑफ ए रेडिएटिंग स्टार इन जनरल रिलेटिविटी। इस पर्चे ने विज्ञान जगत को वैद्य मेट्रिक्स की सूचना दी।

वैद्य ने 1950 के शुरुआती दशक में प्रकाशित शोध पत्रों में इसे विस्तार दिया। ऐसे में कोई अचरज नहीं कि पी.सी. वैद्य ने नार्लीकर के साथ बिताए अपने वर्षों को ‘काशी यात्रा’ की संज्ञा दी जिसने उन्हें अगले जीवन के लिए नहीं बल्कि इसी जीवन के शेष वर्षों के लिए तैयार किया।

संस्था निर्माण

जब बचत के पैसे चुक गए, तो वैद्य ने सूरत के एक कॉलेज में अध्यापक की नौकरी ले ली। आगे चलकर उन्होंने नवोदित टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च (TIFR) में एक शोध छात्र के रूप में दाखिला लिया और 1948 में पीएच.डी. पूरी की। टीआईएफआर उस समय विकसित हो रहा था और वैद्य को होमी भाभा के साथ काम करने का मौका मिला। यह बात शायद अविश्वसनीय लगे किंतु पी.सी. वैद्य को बंबई छोड़ना पड़ा था क्योंकि परिवार के रहने के लिए वहां उन्हें मकान नहीं मिला।

तब पी. सी. वैद्य गुजरात में आनंद के नज़दीक उभरते शैक्षणिक शहर वल्लभ विद्यानगर में नए-नए खुले विट्ठलभाई पटेल कॉलेज में प्रोफेसर बने। उनके जीवन पर बनी आयूका-विज्ञान प्रसार की एक फिल्म में उन्होंने बताया है कि उस समय वे बगैर छत के कमरे में पढ़ाया करते थे। मगर वहां उन्होंने अपने छात्रों की जो बुनियाद तैयार की वह बहुत मज़बूत थी। जैसा कि उनके भतीजे अरुण वैद्य (जो स्वयं एक प्रतिष्ठित गणितज्ञ हैं) ने बताया, पी. सी. वैद्य न सिर्फ अपने शोध कार्य के लिए बल्कि उनके द्वारा आयोजित खेलकूद शिविरों व अन्य गतिविधियों के लिए भी याद किए जाते हैं। लगता है व्यायाम संघ के उनके दिन फालतू नहीं गए।

अन्य कॉलेजों में अध्यापन करने के बाद, वैद्य ने गुजरात विश्वविद्यालय में गणित विभाग स्थापित करने में योगदान दिया (1959)। यहीं उन्होंने अपना शेष कार्य-जीवन व्यतीत किया। यहां उन्होंने कई शोध छात्र तैयार किए। आगे चलकर उन्हें प्रशासनिक जि़म्मेदारियां सौंपी गई। 1971 में वे गुजरात लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष बने और 1977 में संघ लोक सेवा आयोग के सदस्य निर्वाचित किए गए। इसके बाद वे गुजरात विश्वविद्यालय के उपकुलपति रहे।

वैज्ञानिक अनुसंधान के क्षेत्र में अपनी हैसियत और उच्च पदों पर आसीन रहने के बावजूद, पी. सी. वैद्य कभी अपनी जड़ें नहीं भूले। आजीवन गांधीवादी रहे वैद्य की पहचान खादी के कुर्ते, सफेद गांधी टोपी और सायकिल से जुड़ी रही। जिन संस्थाओं की स्थापना को लेकर वे गर्व महसूस करते थे वे हर स्तर पर गणित शिक्षण को बेहतर बनाने से सम्बंधित थीं। इनमें गुजरात गणित मंडल (स्थापना 1963) शामिल है जो आज भी एक जीवंत संस्था है। इसी वर्ष उन्होंने एक पत्रिका सुगणितम की स्थापना की थी जो शिक्षकों व छात्रों के लिए गणित का एक उम्दा संसाधन है।

विनम्रता

वैद्य उस समय तक एक परिपक्व शोधकर्ता बन चुके थे जब नव-स्वतंत्र भारत विज्ञान में भारी निवेश कर रहा था। वैज्ञानिक एवं प्रौद्योगिकी अनुसंधान परिषद (CSIR) प्रयोगशालाओं के अपने नेटवर्क में विस्तार कर रहा था, अंतरिक्ष कार्यक्रम आकार ले रहा था और परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम पर पैसे और प्रतिष्ठा की बौछार की जा रही थी। मगर इन सबका एक उपयोगितावादी रुझान था जबकि वैद्य ज़्यादा ‘बुनियादी’ अनुसंधान कर रहे थे।

जैसा कि एक भौतिक शास्त्री साथी ने मुझे बताया था, पी. सी. वैद्य का क्षेत्र (सामान्य सापेक्षता) अपेक्षाकृत गूढ़ था। यह विषय भारत में स्नातकोत्तर स्तर भी कहीं-कहीं ही पढ़ाया जाता था। ज़ाहिर है, इसने लोगों का ध्यान उस तरह नहीं खींचा जैसे परमाणु ऊर्जा या रॉकेट खींचते हैं। परिणाम यह रहा कि वैद्य ने अपना लगभग पूरा कैरियर विज्ञान के मान्य केंद्रों से दूर ही व्यतीत किया और शोध में उनके योगदान को बहुत थोड़े से वैज्ञानिक ही समझते हैं।

अलबत्ता, वैद्य का कैरियर सिर्फ इन परिस्थितियों का नहीं बल्कि उनके निर्णयों का भी परिणाम था। वैद्य ने कभी सार्वजनिक परिदृश्य में रहने की इच्छा नहीं की। वे एक ‘जड़ें जमाए विश्व नागरिक’ थे जो पूरी दुनिया से संवाद करते थे किंतु सबसे प्रसन्न अपनी धरती पर ही रहते थे। वे अपनी मातृभाषा और अपने आसपास के लोगों की भाषा की मदद से ज्ञान का प्रजातांत्रीकरण करना चाहते थे। वे गांधीवादी परंपरा में ‘रचनात्मक कार्यकर्ता’ थे।

1990 के दशक के अंतिम वर्षों में भी, बुलेटिन ऑफ दी एस्ट्रॉनॉमिकल सोसायटी ऑफ इंडिया के संपादक के पत्र के जवाब में अपनी निशस्त्र कर देने वाली विनम्रता के साथ उन्होंने कहा था, “मैं हमेशा से स्वयं को एक शिक्षक मानता आया हूं और इतने वर्षों तक गणित पढ़ाकर ही अपनी जीविका अर्जित की है। यदि प्रतिष्ठित खगोल शास्त्रीय सोसायटी मुझे एक प्रतिष्ठित खगोल शास्त्री मानती है, तो मुझे गर्व महसूस हुआ और मैंने सोचना शुरू किया कि यह गणित शिक्षक एक खगोल शास्त्री के रूप में कैसे तबदील हो गया।” शायद यह तबदीली सितारों पर अंकित थी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।

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प्रोफेसर सी.वी. विश्वेश्वरा – टी.वी. वेंकटेश्वरन, दिनेश शर्मा एवं नवनीत कुमार गुप्ता

ब्लैक होल एवं आइंस्टाइन के सामान्य सापेक्षता सिद्धांत पर महत्वपूर्ण शोधकार्य करने वाले प्रोफेसर सी. वी. विश्वेश्वरा का पिछले वर्ष निधन हो गया। उन्होंने कई वर्षों तक गुरुत्व तरंगों और ब्लैक होल के सिद्धांत पर शोध कार्य कर नई संकल्पना का विकास किया था।

सन 1970 में विश्वेश्वरा ने ब्लैक होल और गुरुत्व तरंगों सम्बंधी नई संकल्पना को प्रस्तुत कर सैद्धांतिक भौतिकी में योगदान दिया। बाइनरी ब्लैक होल में, गुरुत्व तरंगें दोगुनी गति से उत्पन्न होती हैं। इस प्रक्रिया में यह प्रणाली अपनी घूर्णन ऊर्जा खो देती है जिससे दो ब्लैक होल पास आते हैं और बहुत अधिक विकिरण उत्सर्जित करते हैं जिससे भंवरसा बनता है। इससे तरंगों का गुंजन पैदा होता है। इन तरंगों का आयाम और आवृत्ति तब तक बढ़ती है जब तक ये दोनों पिंड आपस में मिल न जाएं। पिंडों के आपस में मिलने से पहले सापेक्ष वेग प्रकाश की गति के नज़दीक पहुंचने लगता है।

विलय के परिणामस्वरूप एक नए ब्लैेक होल का निर्माण होता है। यह नया ब्लैक होल गुरुत्व विकिरण उत्सर्जित करता है जिसका द्रव्यमान और घूर्णन सम्बंधी गुणधर्म निर्णायक ब्लैक होल की तरह होता है। इसे अर्ध सामान्य मोड या रिंगडाउन संकेत कहते हैं। रिंगडाउन संकेत हथौड़े की चोट से उत्पन्न विकिरण के जैसा होता है।  

विश्वेश्वरा के सैद्धांतिक योगदान से हम समझ पाए कि किस प्रकार दो ब्लैक होल आपस में एक दूसरे से टकरा सकते हैं। उन्होंने यह भी बताया कि किस प्रकार से ब्लैक होल से फैलने वाली गुरुत्व तरंगों में रिंगडाउन संकेत के गुणधर्म हो सकते हैं। इसमें वही लचीलापन होता है जो कि गुरुत्व तरंगों में पाया जाता है। उनका यह शोध पत्र सन् 1970 में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका नेचर में प्रकाशित हुआ था।

16 मार्च, 1936 को जन्मे विश्वेश्वरा का आरंभिक जीवन बैंगलुरु में बीता और उनकी प्राथमिक शिक्षा भी इसी शहर में हुई। उनके स्कूल के शिक्षक द्वारा भौतिकी को रोचक तरीके से समझाए जाने के कारण उन्हें भौतिकी विषय से लगाव हो गया। इसी तरह गणित विषय में भी उनकी दिलचस्पी थी। भौतिकी को विशेष विषय लेकर उन्होंने स्नातक की पढ़ाई पूरी की।

बैंगलुरु में एम.एससी. करने के बाद, वे उच्च शिक्षा के लिए कोलंबिया विश्वविद्यालय गए। मैरीलैंड विश्वविद्यालय में प्रोफेसर चाल्र्स मिसेनर के मार्गदर्शन में उन्होंने ब्लैक होल की स्थिरता पर काम करते हुए पीएच.डी. की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने ब्लैक होल स्थिरता के साथ ही ब्लैक होल भौतिकी में महत्वपूर्ण योगदान दिया।

अमेरिका में कई विश्वविद्यालयों के विभागों में कार्य करने के बाद उन्होंने भारत आकर बैंगलुरु के रामन अनुसंधान संस्थान में अपनी सेवाएं दीं। बाद में उन्होंने भारतीय खगोल भौतिकी संस्थान में वरिष्ठ प्रोफेसर के रूप में भी कार्य किया। वे बैंगलुरु स्थित जवाहरलाल नेहरू तारामंडल एवं विज्ञान केंद्र के संस्थापकनिदेशक थे।

इन विषयों पर लिखी गई उनकी लोकप्रिय पुस्तकों, ‘आइंस्टाइन्स एनिग्मा ऑर ब्लैक होल इन माय बबल बाथऔर युनिवर्स अनवाइल्ड दी कॉस्मॉस इन माय बबल बाथको दुनिया भर में काफी पढ़ा और सराहा गया। (स्रोत फीचर्स)

 

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। 

फोटो क्रेडिट : scientific world