जेनेरिक दवाइयों के उत्पादन पर संकट

डॉ. अनंत फड़के

जेनेरिक यानी मूल नाम (Generic Name) से बेची जाने वाली दवाइयां। ये दवाइयां ब्रांडेड दवाओं की तुलना में जनौषधी दुकानों में लगभग एक-चौथाई कीमत पर उपलब्ध होती हैं और उनकी गुणवत्ता भी ब्रांडेड दवाओं से कम नहीं होती — यह बात अब अधिकाधिक लोगों को समझ में आने लगी है। लेकिन अब जेनेरिक दवाओं के उत्पादन के सम्बंध में मात्र एक बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया है। लेकिन इसके पहले कुछ बुनियादी चीजें समझ लेते हैं।

जेनेरिक दवाइयां और गुणवत्ता

जेनेरिक दवा शब्द के दो अर्थ हैं। पहला अर्थ यह है कि ‘जेनेरिक दवा’ यानी किसी दवा के आविष्कार के बाद शोधकर्ता कंपनी को पेटेंट कानून के तहत उस दवा के लिए जो पेटेंट प्राप्त होता है, उस पेटेंट की अवधि समाप्त हो चुकी हो। ऐसी दवा अब जेनेरिक कहलाती है और अन्य कंपनियां शोधकर्ता कंपनी से अनुमति लिए बिना उसका उत्पादन कर सकती हैं। भारतीय बाज़ार में उपलब्ध 90 प्रतिशत से अधिक दवाइयां ऐसी ही जेनेरिक दवाएं हैं, अर्थात उनकी पेटेंट अवधि समाप्त हो चुकी है। “मैं जेनेरिक दवाइयां नहीं लिखता” ऐसा कहने वाले अधिकांश डॉक्टर भी जेनेरिक (पेटेंट-मुक्त) दवाइयां ही लिखते हैं।

जेनेरिक दवा का दूसरा अर्थ है कि दवा के पैकेट पर उसका मूल यानी जेनेरिक नाम लिखा हो। सभी चिकित्सा पुस्तकों और वैज्ञानिक साहित्य में दवाइयों के जेनेरिक नामों का ही उपयोग किया जाता है। लेकिन शोधकर्ता कंपनियां जब कोई नई दवा बनाती हैं तो उसे अपना एक व्यावसायिक नाम (ब्रांड-नेम) दे देती हैं। उदाहरण के लिए, पार्क-डेविस कंपनी ने 1985 में रक्त में बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को कम करने वाली एटरवेस्टैटिन (Atorvastatin) नामक दवा की खोज की थी, जिसके लिए उसे 1986 से 2011 तक पेटेंट प्राप्त था। लेकिन इस अवधि में कंपनी ने इसे एटरवेस्टैटिन नाम से नहीं, बल्कि ‘लिपिटॉर’ (Lipitor) ब्रांड नाम से महंगे दामों पर बेचकर भारी मुनाफा कमाया। 2011 में पेटेंट समाप्त होने के बाद एटरवेस्टैटिन जेनेरिक बन गई और अन्य कंपनियों ने उसका उत्पादन शुरू कर दिया। लेकिन उन्होंने भी उसे जेनेरिक नाम से बेचने के बजाय अलग-अलग ब्रांड नामों से बेचा। इन्हें ‘ब्रांडेड-जेनेरिक’ कहा जाता है।

इस प्रकार, लगभग 900 जेनेरिक दवाइयों से बनीं लगभग 60,000 ब्रांडेड-जेनेरिक दवाइयां भारत के बाज़ार में उपलब्ध हैं। अपना-अपना ब्रांड नाम डॉक्टरों के मन में बैठाने के लिए दवा कंपनियां भारी पैसा खर्च करती हैं और कई बार अनैतिक तरीके भी अपनाती हैं, ताकि डॉक्टर उनके ब्रांड की दवाएं लिखें। यह खर्च कंपनियों द्वारा दवाइयों की अधिक कीमत रखकर वसूला जाता है। इसके विपरीत, डॉक्टरों की शिक्षा जेनेरिक नामों के माध्यम से ही हुई होती है, इसलिए जेनेरिक नामों को डॉक्टरों के मन में बैठाने, याद रखवाने के लिए कंपनियों को अतिरिक्त पैसा खर्च नहीं करना पड़ता। यही कारण है कि जेनेरिक दवाएं अपेक्षाकृत काफी सस्ती होती हैं।

दवाइयां कैसे बनती हैं?

सभी दवाएं पहले पावडर के रूप में बनाई जाती हैं। बाद में उनसे गोलियां, कैप्सूल, इंजेक्शन, मलहम आदि विभिन्न ‘फॉर्म्युलेशन’ तैयार किए जाते हैं।

दवा कंपनियां कुछ दवा-पावडर स्वयं बनाती हैं, जबकि कुछ दवा-पावडर रासायनिक उद्योगों से खरीदे जाते हैं। लगभग 30 प्रतिशत दवा-पावडर चीन आदि देशों से आयात किए जाते हैं। अधिकांश छोटी और कई मंझोली दवा कंपनियां स्वयं पावडर नहीं बनातीं, बल्कि खुले बाज़ार से खरीदकर उनसे विभिन्न फॉर्म्युलेशन तैयार करती हैं। इसलिए भारत का अधिकांश दवा उद्योग ‘फॉर्म्युलेशन उद्योग’ है।

इन फॉर्म्युलेशन्स का निर्माण भी गुणवत्तापूर्ण तरीके से होना चाहिए। प्रत्येक दवा के गुणधर्म इंडियन फार्माकोपिया में निर्धारित मानकों के अनुरूप होने चाहिए। दवा की प्रत्येक खेप को निर्धारित परीक्षणों की कसौटी पर खरा उतरना होता है और निर्माता को अपने कारखाने की प्रयोगशाला में इसकी जांच करनी होती है।

उदाहरण के लिए, इंडियन फार्माकोपिया में यह निर्धारित है कि किसी गोली को पेट में टूटने और घुलने में कितना समय लगता है। उत्पादन कंपनी की कानूनी ज़िम्मेदारी होती है कि दवा इन मानकों पर खरी उतरे। यदि उत्पादन औषधि विज्ञान के अनुसार किया जाए तो छोटे कारखानों में भी यह सुनिश्चित करना संभव है। भारत के अधिकांश छोटे दवा-उद्योग ऐसा करते हैं, वैसे इस क्षेत्र में भी कुछ अप्रामाणिक उद्योग मौजूद हैं।

राज्य सरकारों के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के निरीक्षकों का दायित्व है कि वे कारखानों का निरीक्षण करें और बाज़ार से नमूने लेकर उनकी जांच कराएं। यद्यपि यह व्यवस्था संसाधनों की कमी और भ्रष्टाचार से प्रभावित है। फिर भी, 2024-25 में केंद्र सरकार द्वारा करवाई गई जांच में 1,16,323 नमूनों में से केवल 3104 (2.7 प्रतिशत) नमूने निम्न गुणवत्ता के पाए गए थे। आदर्श स्थिति में यह संख्या शून्य होनी चाहिए।

कुछ महीने पहले, एक सामाजिक संस्था द्वारा 22 आम दवाओं के 131 नमूनों की जांच प्रतिष्ठित प्रयोगशाला में कराई गई। जांच में पाया गया कि प्रसिद्ध ब्रांड नाम, कम प्रसिद्ध ब्रांड नाम और मात्र जेनेरिक नाम वाली दवाओं की गुणवत्ता में कोई अंतर नहीं था।

(विस्तार से यहां देखें – https://meshindia.org/citizens-generic-vs-branded-drugs-project/ ).

अतिरिक्त मानदंडजैविक तुल्यता

सरकार 384 ‘आवश्यक दवाइयों’ में से 140 दवाओं के लिए जेनेरिक कंपनियों की गोलियों पर जैविक तुल्यता यानी बायो-इक्विवेलेंस (Bio-equivalence) परीक्षण अनिवार्य करने की तैयारी कर रही है। किसी दवा की जैव-तुल्यता जांचने के लिए उसकी गोली स्वस्थ व्यक्ति को दी जाती है और निश्चित समयांतराल (जैसे 15 मिनट, आधा घंटा, एक घंटा आदि के) बाद उसके रक्त में दवा की मात्रा मापी जाती है। यदि शोधकर्ता कंपनी की गोली और जेनेरिक गोली की समान समयांतरालों पर रक्त में समान मात्रा पाई जाती है, तो जेनेरिक गोली को ‘जैविक-तुल्य’ माना जाता है। यह प्रश्न केवल गोलियों और कैप्सूलों पर लागू होता है; सिरप, इंजेक्शन, मलहम, ड्रॉप्स आदि पर नहीं। बड़ी शोधकर्ता कंपनियों का मत है कि केवल जैविक-तुल्य जेनेरिक गोलियां ही मूल दवा जितनी प्रभावी मानी जा सकती हैं। विकसित देशों ने इस सिद्धांत को स्वीकार किया है और वहां जैविक-तुल्यता परीक्षण पास करने के बाद ही जेनेरिक गोलियों को बिक्री की अनुमति मिलती है। भारत में भी लगभग 140 दवाओं के लिए इसे अनिवार्य बनाने की तैयारी चल रही है। लेकिन इसके सम्बंध में कई प्रश्न हैं।

1) क्या यह सभी दवाइयों के लिए आवश्यक है?: चंद ‘संवेदनशील’ दवाइयों के मामले में यकीनन रक्त में दवा की मात्रा का थोड़ा भी अंतर स्वीकार्य नहीं होता। ऐसी खास दवाइयों के लिए जैविक-तुल्यता परीक्षण आवश्यक होना चाहिए। लेकिन अन्य जेनेरिक दवाइयों के लिए ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि यदि वे जैविक-तुल्य न हों तो वे अप्रभावी हो जाती हैं। भारत में करोड़ों मरीज़ दशकों से ऐसी जेनेरिक गोलियां उपयोग कर रहे हैं जिनका जैविक-तुल्यता परीक्षण नहीं हुआ है, फिर भी ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिले हैं कि वे असरहीन हैं।

2) अवैज्ञानिक मिश्रित दवाइयों का प्रश्न: भारतीय बाज़ार की लगभग 40 प्रतिशत ब्रांडेड-जेनेरिक दवाओं में दो या अधिक औषधियों का मिश्रण होता है। इनमें से अधिकांश मिश्रण वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं हैं। इनके लिए कोई मूल मानक ही उपलब्ध नहीं है, इसलिए इनके लिए जैव-तुल्यता का प्रश्न ही नहीं उठता। सरकार को पहले ऐसी अवैज्ञानिक मिश्रित दवाइयों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।

3) तकनीकी और आर्थिक बोझ: यदि जैविक-तुल्यता को अनिवार्य किया गया तो प्रत्येक कंपनी को प्रत्येक जेनेरिक दवा के लिए स्वयं वह तकनीक विकसित करनी होगी जिससे उसकी गोली जैविक-तुल्य बन सके। ये तकनीकी विवरण व्यावसायिक गोपनीयता का हिस्सा होते हैं। यदि 140 दवाओं का औसतन 10-10 कंपनियां उत्पादन करती हैं, तो लगभग 1400 कारखानों को यह तकनीक अलग-अलग विकसित करनी होगी। इससे अत्यधिक खर्च होगा।

4) छोटे उद्योगों पर मंडराता संकट: प्रत्येक निर्माता को अपनी गोली के जैविक-तुल्य होने का प्रमाणपत्र प्राप्त करना होगा, जिस पर लगभग 20-60 लाख रुपये का खर्च आएगा। भारत में लगभग 10,000 दवा उत्पादकों में से 2-3 हज़ार छोटी कंपनियां हैं। इनमें से अनेक इस खर्च को वहन नहीं कर पाएंगी और उत्पादन बंद करने को मजबूर हो जाएंगी। नतीजतन, सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता घटेगी और हज़ारों मजदूर बेरोज़गार हो सकते हैं। विकसित देश यह खर्च वहन कर सकते हैं, लेकिन क्या भारत भी कर पाएगा?

5) मानवगिनी पिगका नैतिक प्रश्न: जैविक-तुल्यता परीक्षण के लिए स्वस्थ मनुष्यों का उपयोग किया जाता है। सामान्यतः आर्थिक रूप से कमज़ोर लोग पैसे लेकर इसमें भाग लेते हैं। यदि प्रत्येक कंपनी को अलग-अलग परीक्षण करना पड़े, तो बड़ी संख्या में मानव वालंटीयर्स का उपयोग करना होगा। 140 दवाओं और औसतन 10 कंपनियों के हिसाब से लगभग 1400 मानव समूहों पर परीक्षण करने पड़ेंगे। यह गरीब लोगों का अतिरिक्त और नैतिक रूप से अनुचित उपयोग होगा।

विकल्प

अलबत्ता, यदि वास्तव में जैविक-तुल्यता का परीक्षण ज़रूरी हो, तो भी भारी खर्च और इतने बड़े पैमाने पर मानव परीक्षणों से बचा जा सकता है। इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र की किसी प्रयोगशाला में इन 140 दवाइयों को मूल दवाइयों के समकक्ष बनाने की तकनीक विकसित करके जैविक-तुल्यता  परीक्षण संभव है। केवल एक मानव समूह पर्याप्त होगा, यानी कुल लगभग 140 समूह। इसके बाद सरकार यह तकनीक उचित मूल्य पर जेनेरिक कंपनियों को उपलब्ध करा सकती है। दवा नियामक तंत्र यह सुनिश्चित करे कि कंपनियां सरकार द्वारा दिए गए मानकों के अनुसार ही उत्पादन करें। यदि ऐसा किया जाए तो जनता को सस्ती जेनेरिक दवाएं मिलती रहेंगी और छोटी जेनेरिक कंपनियां भी टिक सकेंगी। अन्यथा बड़ी दवा कंपनियों का प्रभुत्व और मज़बूत हो जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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आंखें प्रकाश संश्लेषण करके अपनी सुरक्षा करेंगी

पौधे प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) नामक प्रक्रिया को अंजाम देते हैं, जिसमें वे सूरज की रोशनी की मदद से कार्बन डाईऑक्साइड और पानी की क्रिया करवाते हैं और कार्बोहायड्रेट बनाते हैं। लेकिन मनुष्यों समेत सभी जंतुओं के पास इस क्रिया के लिए ज़रूरी आणविक मशीनरी नहीं होती।

अब एक अनुसंधान दल ने चूहों और मनुष्यों की कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण करने वाली संरचना जोड़ने में सफलता प्राप्त कर ली है। इन कोशिकाओं को प्रयोगशाला में तैयार किया गया था। लेकिन यह मत सोचिए कि ये कोशिकाएं प्रकाश संश्लेषण करके कार्बोहायड्रेट बनाकर हमें पोषण प्रदान करेंगी। ये तो हमें मात्र शुष्क आंख (dry eyes) की समस्या से छुटकारा दिलाएंगी।

सेल नामक शोध पत्रिका में सिंगापुर राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के डेविड ताई लियोंग और कुओरान ज़िंग ने बताया है कि उनकी इस रणनीति से आंखों की कोशिकाएं एक ऐसा अणु बनाने लगीं जो शोथ में राहत देता है। इसके अलावा प्रकाश संश्लेषी मशीनरी जोड़ने के बाद शुष्क आंखों की वजह से होने वाली क्षति भी दुरुस्त हो गई।

वैसे तो प्रकाश संश्लेषण करने की क्षमता सिर्फ पौधों, शैवाल और कुछ सूक्ष्मजीवों में ही पाई जाती है। लेकिन कुछ समुद्री स्लग्स हैं जो शैवालों का क्लोरोप्लास्ट चुराकर कुछ अतिरिक्त पोषण प्राप्त कर लेते हैं। गौरतलब है कि क्लोरोप्लास्ट (chloroplast) ही वह कोशिकांग होता है जहां प्रकाश संश्लेषण की क्रिया सम्पन्न होती है।

इस सिलसिले में दो साल पहले टोक्यो विश्वविद्यालय (Tokyo university) के साचीहिरो मात्सुनागा की टीम ने यही करामात प्रयोगशाला में की थी। उन्होंने एक पूरा क्लोरोप्लास्ट मानव कोशिका में प्रत्यारोपित करके उसे दो दिन तक कामकाजी बनाए रखा था।

फिर कई अन्य शोधकर्ता सोचने लगे कि यदि हमारी कोशिकाओं में प्रकाश संश्लेषण की थोड़ी-बहुत क्षमता जोड़ दी जाए, तो वे ऐसे अणु बनाने लगेंगी जिनसे ऊर्जा मिलेगी या शोथ हल्का पड़ जाएगा।

मसलन, 2022 में चीन के एक दल ने गठिया पीड़ित चूहों के घुटनों के जोड़ में कुछ कण इंजेक्ट किए जिनमें प्रकाश संश्लेषी मशीनरी के कुछ हिस्से थे। शोधकर्ताओं ने नेचर में रिपोर्ट किया था कि इन चूहों के घुटनों में उपास्थियों की क्षति धीमी पड़ गई थी। दिक्कत यह है कि हमारे घुटनों को धूप बहुत कम मिलती है। इन चूहों को प्रतिदिन आधे घंटे लाल रोशनी में रखने पर ही उपरोक्त लाभ मिल पाया था।

अलबत्ता, आंखों की बात अलग है। उन पर तो दिन भर रोशनी पड़ती है। तो वर्तमान अध्ययन में लियोंग और ज़िंग ने पालक में से प्रकाश संश्लेषण मशीनरी के प्रमुख हिस्से (थाएलेकॉइड) पृथक किए। इन तश्तरीनुमा रचनाओं में क्लोरोफिल तथा ऊर्जा को कैद करने के लिए ज़रूरी अणु पाए जाते हैं। पूर्व के अध्ययनों में शोधकर्ताओं ने थाएलेकॉइड (thylakoid) के टुकड़ों का इस्तेमाल किया था। लेकिन लियोंग और ज़िंग की टीम ने पूरे के पूरे थायलेकॉइड निकाले और उन्हें छोटे-छोटे कणों में पैक कर दिया।

वैसे तो प्रकाश संश्लेषण का अंतिम उत्पाद ऊर्जा से भरपूर ग्लूकोज़ होता है लेकिन शोधकर्ताओं की रुचि इस प्रक्रिया के दो मध्यवर्ती अणुओं में थी – एटीपी और एनएडीपीएच। ये दोनों ही शोथ को कम कर सकते हैं और तथाकथित ऑक्सीडेंट्स से निजात पाने में कोशिकाओं की मदद कर सकते हैं। रोचक बात है कि शोधकर्ताओं ने पालक आधारित इस पदार्थ को नाम दिया है लीफ (लाइट रिएक्शन एनरिच्ड थायलेकॉइड एनएडीपीएच फाउंड्री – LEAF)।

शोधकर्ताओं का ख्याल था कि कोशिकाओं में एनएडीपीएच (NADPH) का उत्पादन बढ़ने से शुष्क आंख समस्या में मदद मिलेगी। शुष्क आंख समस्या में होता यह है कि पर्याप्त मात्रा में आंसू नहीं बनते जो आंखों में स्नेहक (लुब्रिकेशन) दे सकें। कभी-कभी आंसू बहुत गाढ़े बनते हैं। परिणाम यह होता है कि आंख की सतह में क्षति होने लगती है।

प्रयोग के दौरान चूहों की कल्चर्ड कोशिकाओं ने थायलेकॉइड को अवशोषित कर लिया और ज़्यादा एनएडीपीएच बनाने लगी। टीम ने यह भी देखा कि लीफ प्रदान करने पर शोथ सम्बंधी जीन्स की सक्रियता कम हुई और शोथ से लड़ने वाले तथा ऑक्सीकारकों से निपटने वाले जीन्स की सक्रियता बढ़ी। मानव कॉर्निया (human cornea) से ली गई मानव कोशिकाओं पर भी ऐसे ही असर देखे गए।

ऐसे ही प्रयोग जीवित चूहों पर करने पर LEAF का लाभदायक असर देखने को मिला। अब बारी है इंसानों पर परीक्षणों की। उससे पहले इस उपचार की सुरक्षा व दीर्घावधि असर पर भी विचार करना होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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घरेलू हिंसा: डॉक्टरों की जागरूकता व संवेदना ज़रूरी

प्रिया दुग्गल

सात साल की मुन्नी स्कूल से घर आती है। उसके जूते धूल से सने हुए और चोटियां ढीली पड़कर खुल-सी गई हैं। आते ही सबसे पहले उसकी नज़रें अपनी मां को ढूंढती हैं। लेकिन उसकी दादी उसके हाथ से बस्ता लेकर उसे हाथ-मुंह धोने को कहती हैं। अंदर कमरे में सन्नाटा और घुप अंधेरा पसरा है। वह देखती है कि उसकी मां औंधे मुंह लेटी हुई है – एक आंख सूजी हुई और काली है, गालों पर चोट/नील के निशान हैं। मुन्नी पीछे से अपनी मां को आगोश में भर लेती हैं, लेकिन उसी समय अचानक मुन्नी को पेट में तेज़ दर्द का एहसास होता है।

घर सुनसान-सा है। दादी उसे खाना खाने को बोलती हैं। फिर उसके पिता घर आते हैं और खाना खाकर दादी के कमरे में सो जाते हैं। ये सब देख कर मुन्नी के मन में सवालों का गुबार-सा उठता है, लेकिन कुछ तो है जो उसे सवाल करने से रोकता है।

अगली सुबह वह अपनी मां को पड़ोसन से बात करते हुए सुनती है। “रात को मैंने कुछ आवाज़ें सुनी। ऐसा लगा कल तुम्हारी बारी थी।” और दोनों हंसने लगीं। मुन्नी कुछ समझी नहीं, लेकिन उसे पेट में फिर वही दर्द होने लगा। चिल्ला-चोट, दर्द भरी आवाज़ें, गहरी चोट के निशान, और फिर हंसी की आवाज़ – ये सब उसे सामान्य लगने लगे थे। मुन्नी मानने लगी थी कि शायद ऐसा ही होता है। कोई नाराज नहीं होता, कोई रोकता नहीं। ये मारपीट-चिल्लाना मानों रोज़मर्रा में शामिल हो गया था, जैसे गर्मी में लू का चलना, या जैसे किसी दिन नल नहीं आना।

मुन्नी चींटियों को अपने से दुगना बड़ा टुकड़ा ढोते देखती है। मुन्नी सोचती है कि “अगर हर किसी की बारी आती है, तो क्या एक दिन उसकी भी बारी आएगी?”

चुप्पी (Silence), सफाई (Justification) और हंसी-मज़ाक (Humor) की आड़ के ज़रिए मुन्नी अनकहा सबक सीख लेती है, स्वीकार कर लेती है कि घरेलू हिंसा सामान्य है। इतना सब देखकर वह सीखती है कि विरोध और संघर्ष (Resistance) की बजाय सहन करना (Endurance) ज़्यादा आसान और सुरक्षित है। घर का वह सर्द, नीरस माहौल उसके मन में उठे सवालों को दबा देता है। और सबसे अहम सबक सिखाता है कि जब परिवार और आम समाज के लोग हिंसा (Domestic Voilence) को सामान्य मान लेते हैं तो वे लोग भी हिंसा को नज़रंदाज़ करने लगते हैं जो रोज़ाना इसके शिकार हो रहे होते हैं।

परामर्श कक्ष (Consulting room) में हिंसा से पीड़ित महिला शायद ही कभी सीधे अपनी आपबीती बताए। लेकिन इसे समझा जा सकता है। जैसे इससे पीड़ित कोई बार-बार चोटें दिखाने के लिए आता/ती है, वहीं अन्य लोगों की शिकायत सिरदर्द, नींद न आना या पेट की खराबी जैसी समस्याओं की होती है। जब तक डॉक्टर और नर्स इन चोटों के पीछे के गैर-ज़ाहिर कारण समझने के लिए प्रशिक्षित नहीं होते, यह हिंसा दबी-छुपी ही रहेगी। डॉक्टर/नर्स और मरीज़ के बीच होने वाली चंद बातों में ही वह मौका है जब परामर्शदाता सुरक्षित और सार्थक तरीके से हस्तक्षेप कर पाए, या पीड़िता अपनी आपबीती बता पाए।

महिला सुरक्षा: वैश्विक समस्या

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, लैंगिक आधार पर महिलाओं को किसी भी प्रकार का शारीरिक, मानसिक, या यौन नुकसान पहुंचाना या पहुंचाने की कोशिश करना महिला के खिलाफ हिंसा माना जाएगा। दुनिया भर में महिलाओं के प्रति इस दुर्व्यवहार को मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन (Violation of Human Rights) और जन-स्वास्थ्य के लिए संकट (Public Health Concern) माना गया है।

डबल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि हर तीन में से एक महिला अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी न कभी शारीरिक या यौन शोषण से जूझती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं। ये बताते हैं कि 18 से 49 वर्ष की लगभग 29 प्रतिशत महिलाओं ने 15 साल की उम्र के बाद कभी न कभी शारीरिक शोषण (Physical Violence) और 6 प्रतिशत महिलाओं ने यौन शोषण का सामना किया है।

इन आंकड़ों के बावजूद केवल 14 प्रतिशत महिलाएं ही इसके खिलाफ आवाज़ उठा पाई हैं। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पापुलेशन साइंसेस (2021) के आंकड़े बताते है कि भारत में अपने जीवन साथी द्वारा घरेलू हिंसा (Intimate Partner Violence) समाज के हर वर्ग और हर जगह फैली है। शोषण और हिंसा के स्वास्थ्य (शारीरिक और मानसिक) परिणाम इतने गंभीर और दीर्घकालिक होते हैं कि एक मज़बूत स्वास्थ्य व्यवस्था ही इसकी शुरुआती पहचान और रोकथाम करने में सहायक साबित होगी।

महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार सिर्फ कानून और व्यवस्था (Law & Order) की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक ‘हेल्थ इमरजेंसी’ (Health Emergency) है जो हौले-हौले अस्पतालों, डिलीवरी वार्डों, आपात कक्षों और मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों में नज़र आएगी। गौरतलब है कि स्वास्थ्यकर्मी (Healthcare Providers) ही वे पहले या कभी-कभी एकमात्र व्यक्ति होते है, जिनके सामने पीड़ित महिलाएं खुलकर अपना दर्द बयां कर पाती हैं। ऐसे मुश्किल समय में एक डॉक्टर की भूमिका या तो केवल मूक दर्शक की हो सकती है या एक सच्चे मददगार की।

मानसिक आघात और बीमारियों का सीधा सम्बंध

भारतीय महिलाओं में होने वाली हिंसा का सीधा सम्बंध मानसिक तौर पर बढ़ते अवसाद (Depression), दुश्चिंता (Anxiety) और गहरे मानसिक सदमे (Mental Trauma ) से है। हिंसा से पीड़ित महिलाएं लगातार एक मानसिक तनाव (Mental Stress) में जीती हैं।

भले ही शारीरिक हिंसा न हो, लेकिन बदसलूकी और ‘दबाकर रखना’ जैसे व्यवहार (Non-physical forms of Violence) समय के साथ मानसिक तकलीफ को और बढ़ा देते हैं। यह इस ओर इशारा करता है कि मार-पीट के इतर हिंसा का मानसिक स्वास्थ्य (Mental Health) पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। जीवन साथी द्वारा घरेलू हिंसा झेल रही लगभग सभी महिलाओं में मानसिक सदमे के लक्षण दिखते हैं। इन लक्षणों में रात में नींद न आना, चिड़चिड़ापन और अतीत के बुरे हादसे बार-बार याद आना शामिल हैं।

बात-बात में ताने देना, पाबंदियों से भरी ज़िंदगी, और मानसिक प्रताड़ना जैसे दुर्व्यवहार और मानसिक दबाव धीरे-धीरे शारीरिक समस्या (Physical Consequences) में तब्दील हो जाते हैं; जैसे हमेशा शरीर में दर्द या भारीपन महसूस होना। यह भावनात्मक आघात (Psychological abuse) और शारीरिक लक्षणों के आपसी सम्बंध को दर्शाता है। इसके साथ ही घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के बच्चों में भी आगे चलकर अवसाद और दुश्चिंता जैसी मानसिक बीमारियों की संभावना बढ़ती है। इससे ज़ाहिर होता है कि मानसिक असुरक्षा और आघात एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंच सकते हैं (Intergenerational transmission of violence)। 

पुरुषों की तुलना में महिलाएं अवसादरोधी (Antidepressent) दवाओं का ज़्यादा इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि वे शरीर की जीर्ण और आत्म-प्रतिरक्षा (शरीर प्रतिरक्षा क्षमता का खुद को नुकसान पहुंचाना) बीमारियों Chronic Illness & Auto-immune diseases) से जूझ रही हैं। यहां तक कि आजकल मल्टीपल स्क्लेरोसिस (Multiple Sclerosis) (केंद्रीय तंत्रिका की एक जीर्ण बीमारी) से पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज़्यादा ग्रस्त होती हैं। पहले यह पुरुषों और महिलाओं में लगभग बराबर देखी जाती थी। 

मशहूर लेखक और डॉक्टर, डॉ. गैबोर माटे तर्क देते हैं कि इंसानों का स्वास्थ्य उनके रिश्तों और आसपास के माहौल पर बहुत अधिक निर्भर रहता है। वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि लंबे समय तक मानसिक और भावनात्मक तनाव (Chronic Emotional stress) हमारे तंत्रिका, हॉर्मोनल, और प्रतिरक्षा तंत्र को इस हद तक असंतुलित कर देता है कि शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र खुद शरीर का दुश्मन बन बैठता है और जीर्ण समस्याएं पैदा होने लगती हैं।

अपनी किताब, व्हेन दी बॉडी सेस नो (जब शरीर ना कहे) (When The Body Says No) में वे लिखते हैं कि सदमा और लंबे समय तक तनाव शरीर की तनाव-प्रतिरोधी क्षमता को पूरी तरह से ध्वस्त कर देते हैं, और कई शारीरिक समस्याएं पैदा करते हैं। वे आगे लिखते हैं कि हमारे पुरुष-प्रधान समाज (Male dominated society) के मानदंड महिलाओं को ‘शॉक-एब्ज़ॉर्बर’ (Shock Absorber) की तरह प्रस्तुत करते हैं। अर्थात पुरुष-प्रधान समाज महिलाओं से उम्मीद रखता है कि वे खुद की ज़रूरतों, इच्छाओं, भावनाओं और मन की शांति को दरकिनार करके मात्र घर-परिवार की सुख-शांति को ही अपनी ज़िम्मेदारी समझें। समाज द्वारा थोपी गई इसी स्व-उपेक्षा (Self-supression) का नतीजा महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ता है।

स्वास्थ्य में व्यवस्थागत और सांस्कृतिक सीमाएं

यहां इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि चिकित्सक घरेलू हिंसा झेल रही महिलाओं की मदद तो करना चाहते हैं, लेकिन ढांचागत और सांस्कृतिक सीमाएं उन्हें रोकती हैं। मेडिकल की पढ़ाई (Traditional Medical Education) के दौरान स्वास्थ्य कर्मियों को जो अनुभव दिए जाते हैं उसमें और ज़मीनी हकीकत में बड़ा अंतर होता है।

मेडिकल की पढ़ाई में पूरा ध्यान बीमारियों, अंगों, पैथालॉजी जांच पर केंद्रित रहता है; उसमें मरीज़ की मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक स्थिति के लिए कोई जगह नहीं होती। नतीजतन, बाधाएं बरकरार रहती हैं। इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों को कोई खास प्रशिक्षण (Special Training) नहीं दिया जाता। साथ ही, कम समय में कई मरीज़ों को देखना (परामर्श का सीमित समय), निजी जीवन में दखलंदाजी का डर, कानूनी फसाद का डर, समस्या को उचित व्यक्ति/संस्था/जगह तक पहुंचाने सम्बंधी अपर्याप्त जानकारी, और खुलकर ऐसे गंभीर विषयों पर चर्चा करने में थोड़ी झिझक भी होती है।

इन कमियों को दूर करने के लिए संस्थाओं की प्रतिबद्धता (Institutional Commitment), कार्यबल के प्रशिक्षण (Workforce Education) और समग्र नीति निर्माण (Integrated Policy Development) ज़रूरी है। हालांकि कागज़ी कार्रवाइयां और समस्या को उचित जगह पहुंचाना ज़रूरी है, लेकिन साथ में चिकित्सा पाठ्यक्रमों और रोज़मर्रा के चिकित्सा अभ्यास में ‘ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड केयर’ (सदमा समझकर देखभाल) को शामिल करना भी उतना ही आवश्यक है। वैसे तो भारतीय स्वास्थ्य शिक्षा में विद्यार्थियों को आपातकालीन स्थितियों को संभालने, उनसे निपटने और उस समय शांत, सक्षम और निष्पक्ष बने रहने की पूरी तैयारी करवाई जाती है, लेकिन हिंसा जैसी गंभीर स्थितियों में डॉक्टरों का काम मरीज़ों को केवल दवाई देना, टांके लगाना या मेडिकल टेस्ट कराने तक सीमित नहीं रहना चाहिए।

डॉक्टर के लिए मरीज़ के इलाज के दौरान व्यावहारिक दूरी बनाने (Clinical Detachement) और पत्थर दिल (Apathy) होने के बीच एक बारीक लकीर होती है। और इस लकीर पर दृढ़ता और करुणा (Steadiness & Compassion) के साथ टिके रहना सीखना शायद ही औपचारिक शिक्षा का हिस्सा होता है। विद्यार्थियों को मरीज़ों के साथ भावनात्मक दूरी रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन उन्हें यह नहीं सिखाया जाता कि वे अपने सामने मौजूद मानवीय ज़रूरत को नज़रअंदाज़ किए बिना ऐसा कैसे करें। मेडिकल पाठ्यक्रम में सदमों पर विचार और चर्चाओं की जगह होने से हमारे स्वास्थ्यकर्मी काबिल होने के साथ-साथ संवेदनशील और नरम दिल भी बनेंगे।

कुछ अहम बदलाव

चिकित्सकों को सदमा सम्बंधी देखभाल में प्रशिक्षित होना चाहिए। यह पाया गया है कि डॉक्टरों का मरीज़ों और पीड़ितों के साथ शांत और सहानुभूतिपूर्ण बर्ताव मानसिक तनाव कम करता है और पीड़ितों द्वारा आगे सहायता लेने की संभावना बढ़ती है (चंद मिनटों की ही सही)। स्वास्थ्यकर्मी की नपी-तुली सजग उपस्थिति मात्र उपचार में मददगार नहीं होती बल्कि उपचार का हिस्सा होती है। स्वास्थ्य पेशेवरों के सहज संकेतों में शामिल हैं चेहरे के हावभाव, शांत लहज़ा, सम्मानपूर्वक बातचीच, साहस देने वाली प्रक्रिया/चर्चा, और सजग और ध्यान से समस्या सुनना। स्वास्थ्य कर्मी अपनी नियमित दिनचर्या में छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखते हुए ऐसे मौके बना सकते हैं।

पीड़िता की पहचान: ज़रूरी नहीं कि हर पीड़िता चोट के निशान के साथ ही डॉक्टर के सामने आए। कभी-कभी लक्षण मनो-शारीरिक होते हैं। डॉक्टरों के लिए यह ज़रूरी है वे मनो-शारीरिक लक्षणों (Psycosomatic Symptoms)और हिंसा की संभावना को सक्रिय रूप से पहचानें इसके लिए शांत और खुले मन से बातचीत करने का मौका दें। यह लक्षणों को समझने में मददगार हो सकता है।

हिंसा के आयाम को समझना: कुछ परिस्थितियों में पीड़िता हिंसा वाले माहौल या हिंसा करने वालों से दूरी नहीं बना पाती। कुछ ऐसी चीज़ें होती हैं जो पीड़िता को उसी परिस्थिति में थामे रखती हैं; जैसे डर, अकेलेपन की आशंका, आर्थिक-भावनात्मक निर्भरता (Financial-Emotion Dependency) , परिवर्तन की उम्मीदें, या प्यार। किसी को पूरी तरह छोड़ देने की प्रक्रिया काफी लंबी और दर्द भरी होती है। शोध बताते हैं कि पीड़िता किसी बुरे रिश्ते से पूरी तरह निकलने से पहले उसके पास कई बार वापिस लौटती और निकलती है।

यहां मुख्य बात यह है कि डॉक्टर को यह समझना चाहिए कि अगर उनका मरीज़ दुर्व्यवहार करने वाले व्यक्ति के पास वापस जाने का फैसला करता है, तो उनका यह फैसला डॉक्टर की देखभाल या उनकी अहमियत पर कोई सवाल नहीं उठाता।

कोई मरीज़ अपने उत्पीड़क के पास वापस चला चला जाए, वह भी जब स्वास्थ्य-कर्मी के पास लौटे, तो करुणा और सहारे का हकदार होता है, न कि निराशा का। ऐसी स्थिति में डॉक्टर को यह सोचने की बजाय कि “मैं नाकाम रहा, क्योंकि वे वापस चले गए,” यह सोचना चाहिए कि “जब भी वे तैयार होंगे तब मैं उनकी मदद कर सकता हूं।” 

समाधान की बजाय मदद करना: ऐसी परिस्थिति में किसी पीड़िता पर यह दबाव नहीं बना सकते कि वह सब कुछ पूरी तरह छोड़ दे; इसकी बजाय उन्हें लगातार सहायता, संबल और ज़रूरी सेवाएं उपलब्ध करा सकते हैं। भारतीय समाज में ज़्यादातर महिलाएं घर या रिश्ता छोड़ नहीं पाती या छोड़ना नहीं चाहती। स्वास्थ्य कर्मियों को इस वास्तविकता के लिए तैयार रहना चाहिए और उन चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो उनके नियंत्रण में हैं। ऐसी स्थिति में भी पीड़िता को सुरक्षित महसूस कराना, चिकित्सकीय देखभाल देना, उन्हें समझना और उनका मनोबल बढ़ाना जैसी सहयता (Mental Health Support) तो की ही जा सकती है।

बचपन के बुरे अनुभवों के बारे में जानना, सामाजिक तनावों के बारे में जानना और भावनात्मक पीड़ा को समझना जैसे छोटे-छोटे बदलाव भी मरीज़ पर अच्छा असर डाल सकते हैं।

सुरक्षित माहौल, न कि झटपट निर्णय: इन हालातों में आम तौर पर महिलाएं मानसिक स्वास्थ्य के लिए ‘काउन्सलर या मनेचिकित्सक’ (Counselor or Psychiatrist) के पास नहीं जा पातीं या जाने से कतराती हैं। इसलिए हिंसा से पीड़ित ज़्यादातर महिलाओं के पास डॉक्टर ही एकमात्र सहारा होता है। ऐसे में उनके लिए डॉक्टर के पास सहानुभूतिपूर्ण और एक ऐसी जगह की ज़रूरत होती है जहां कोई ठप्पा नहीं लगाया जाएगा। बिना ज़ोर-ज़बरदस्ती के देखभाल को प्राथमिकता देना, जांच से पहले सहमति लेना, और डॉक्टर के कक्ष में उनकी सीमाओं का सम्मान करना – ये सभी बातें उन्हें एक ऐसा सुरक्षित माहौल (Safe space) देती हैं, जो उन्हें अपने पारिवारिक परिवेश में नहीं मिल पाता।

हमेशा उपलब्ध रहना, बिना किसी पूर्वाग्रह के पेश आना और ज़ोर-ज़बर्दस्ती न करना – ये बातें किसी पीड़िता को दोबारा मदद लेने को तैयार कर सकती हैं। और कभी-कभी, किसी पीड़िता के लिए सबसे मददगार साबित होता है कि कोई उसकी कहानी पर विश्वास करे।

भावुक नहीं, संवेदनशील बने: दूसरों (पीड़िता) की परेशानी समझने के समय डॉक्टर खुद  की मनदुरुस्ती का भी ख्याल रखें, और यह समझें कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं। निराशा, उदासी या क्रोध को समझने के लिए चिंतनशील अभ्यास, पर्यवेक्षण या सहकर्मियों की सहायता महत्वपूर्ण है। मन को शांत और संवेदना के साथ-साथ ज़्यादा भावुक होने से बचाना भी ज़रूरी है। चुनौतीपूर्ण मामलों के बाद डायरी लिखना या दूसरे साथियों से चर्चा करना मददगार हो सकता है।

यह काम मानसिक और भावनात्मक रूप से थका देने वाला (Mentally & Emotionally Intensive) है। इसलिए डॉक्टरों को यह भी समझना होगा की ऐसी परिस्थितियों में पीड़ितों के फैसले उनकी देखभाल की काबिलियत नहीं दर्शाते। संयमित चिकित्सक के रूप में संयमित चिकित्सकीय स्थान बनाते समय अपने बारे में सोचना तनाव से बचाता है।

महिलाओं का सम्मान: चुप्पी तोड़ें, हिंसा अस्वीकार्य करें

ज़्यादातर भारतीय घरों में हिंसा केवल इसी वजह से होती आई है क्योंकि समाज और महिलाएं चुप्पी साध लेते हैं। नारी को पूजने वाले देश में जब महिलाओं के प्रति अत्याचार-दुर्व्यवहार होते हैं तो वही समाज आंखें फेर लेता है, जबकि ऐसा व्यवहार बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। यह विरोधाभास (Social Contradiction) परेशान करने वाला है।

महिलाओं के प्रति हिंसा को एक निजी मामला या नियति मानना स्वीकार्य नहीं है। हमें सिखाया जाता है कि घर की ‘इज्जत’ हर हाल, हर कीमत पर बनी रहनी चाहिए। लेकिन अत्याचारों को छुपाना और चुपचाप सहते रहना कोई सम्मानजनक बात नहीं है।

सांस्कृतिक बदलाव तब शुरू होगा जब हम महिलाओं को सिर्फ इज़्ज़त का समंदर, त्याग की मूर्ति, या महज़ पीड़ित के तौर पर नहीं, बल्कि एक संपूर्ण इंसान के तौर पर देखेंगे – जिनकी सुरक्षा और गरिमा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इस बदलाव की शुरुआत घर-स्कूलों की आम चर्चाओं से, और नई पीढ़ी को जागरूक करने से होती है। यह सिखाने से होती है कि प्यार का मतलब चुप्पी, डर और सहन करना नहीं है। 

जब तक यह बड़ा सामाजिक बदलाव (Cultural Shift) होता है तब तक स्वास्थ्य, केंद्रों और स्वास्थ्य कर्मियों से ही उम्मीद की जा सकती है कि वे इन महिलाओं के लिए सुरक्षा के ठिकाने बनें और मेडिकल पाठ्यक्रम में ‘सदमा को समझकर देखभाल’ (Trauma Informed Care) सिखाने को प्राथमिकता दी जाए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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‘एन्हांस्ड ओलंपिक’ अपने दावे पर खरे नहीं उतरे

ई 2026 के अंतिम सप्ताह में अमेरिका के लास वेगास में ओलंपिक खेलों की तर्ज पर ‘एन्हांस्ड ओलंपिक’ (Enhanced olympic) का आयोजन हुआ। इस आयोजन की खास बात थी कि इसमें खिलाड़ियों को प्रदर्शन बेहतर करने के लिए ड्रग (Drugs) लेकर खेलने पर कोई पाबंदी नहीं थी। खेलों में तैराकी, दौड़ और भारोत्तोलन जैसे खेल शामिल थे। यह खेल आयोजन ओलंपिक जितने बड़े स्तर का तो नहीं था; फिर भी इसमें लगभग 50 खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया।

हालांकि इस पर विशेषज्ञों और खेल संगठनों ने कई नैतिक और स्वास्थ्य सम्बंधी सवाल उठाए और इसकी तीखी आलोचना की थी। खेल फेडरेशन (Sports Federation) ने तो यहां तक कहा था कि एन्हांस्ड ओलंपिक में बनने वाला कोई भी वर्ल्ड रिकॉर्ड (World record) मान्य नहीं होगा। और अब इसके नतीजे भी कुछ खास अंतर नहीं झलकाते हैं। दरअसल खेल संगठकों और विशेषज्ञों की चिंता डोपिंग (Doping) को लेकर है। यदि मुकाबला करने वाले कुछ या शायद सभी लोग बेहतर प्रदर्शन (Better Performance) के लिए ड्रग्स लेंगे, तो इसके स्वास्थ्य सम्बंधी नुकसान भले ही तुरंत न दिखें लेकिन लंबे समय में दिखेंगे। यह खिलाड़ियों की सेहत के साथ खिलवाड़ होगा।

एन्हांस्ड खेलों के आयोजकों का कहना था कि इन खेलों में यूं ही कोई भी ड्रग्स नहीं लिया जाएगा, सिर्फ यूएस संघीय औषधि प्रशासन (US FDA) द्वारा मंज़ूर ड्रग्स लेने की ही इजाज़त होगी, वह भी मेडिकल पेशेवरों की देखरेख में, ताकि जोखिम कम किया जा सके। साथ ही एथलीटों (Atheletes) को यूएस फेडरल और नेवादा राज्य के कानूनों का पालन करना होगा। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यूएस एफडीए द्वारा जिन ड्रग्स को मंज़ूरी मिली है वे चिकित्सकीय उपयोग के लिए है, न कि एथलेटिक प्रदर्शन-वृद्धि के लिए। जैसे, एनाबॉलिक स्टेरॉयड (Anabolic Steroids) को मंज़ूरी यौवनारंभ में विलंब की समस्या के इलाज के लिए मिली है, जिसमें वृषण में हार्मोन बहुत ही कम या बिलकुल नहीं बनते।

और तो और, खेल के पहले इस बारे में कोई जानकारी स्पष्ट रूप से साझा नहीं थी कि कौन से ड्रग्स और कितनी मात्रा में लिए जा सकेंगे, और संभावित जोखिम को कम करने की आयोजकों और मेडिकल पेशेवरों की क्या योजना होगी। जैसे डोपिंग करने वाले एथलीट्स की खेल के बाद देखभाल कैसे होगी? ड्रग्स लेकर जीतने की बात जितनी सरल लगती है, उसके बाद उन्हें छोड़ने की राह उतनी ही मुश्किल होती है। इस बात को स्पष्टता से उजागर न करना ऐसा आभास दे सकता है कि प्रदर्शनवर्धक दवाओं (Performace enhancing drugs) का इस्तेमाल करना और उन्हें बंद करना बहुत आसान है, जबकि ऐसा है नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकल देख-रेख तात्कालिक जोखिम कम कर सकती है, लेकिन इस बात के प्रमाण मौजूद हैं कि डोपिंग से जुड़े कई परिणाम (मानसिक परेशानियां, अनुर्वरता, मांसेपशियों व अस्थि-तंत्र की चोटें) लंबे समय तक असर करते हैं।

एन्हांस्ड ओलंपिक में एथलीट्स ने संभवत: टेस्टोस्टेरॉन, ह्यूमन ग्रोथ हार्मोन, पेप्टाइड्स और स्टिमुलेंट्स लिए थे। टेस्टोस्टेरोन (Testosterone) समान्यत: स्रावित होने वाला यौन हार्मोन है। यह शरीर में मांसपेशियां और उनकी ताकत (Muscle power) बढ़ाता है। लेकिन इससे हृदय सम्बंधी एवं हॉर्मोन सम्बंधी शारीरिक परेशानियां, और उग्र व्यवहार, मूड में उतार-चढ़ाव एवं अवसाद जैसी मानसिक परेशानियां होने का जोखिम होता है। इसी तरह, एरिथ्रोपोइटिन (EPO) शरीर में स्रावित होने वाला एक नैसर्गिक हार्मोन है जो लाल रक्त कोशिकाओं का उत्पादन बढ़ाता है, नतीजतन शरीर में ऑक्सीजन ले जाने की क्षमता बढ़ती है। बाहर से अतिरिक्त rEPO लेने से ऑक्सीजन उपलब्धता बढ़ती है जो धावकों या साइकिल रेसर्स के लिए मददगार हो सकती है। लेकिन इससे खून गाढ़ा होने का खतरा रहता है, नतीजतन एथलीट्स को हृदय रोग हो सकते हैं।

और फिर, वैसे ही एथलीट्स कई शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य जोखिमों से घिरे होते हैं। अक्सर खिलाड़ियों को मांसपेशीय व अस्थि तंत्र की चोटों का खतरा होता है। रग्बी (Rugby) और अमेरिकन फुटबॉल (American football) जैसे खेलों में बार-बार सिर पर चोट लगने से तंत्रिका क्षति सम्बंधी बीमारियां (Neurological diseases) होने का खतरा होता है, जिन्हें ठीक होने में अरसा लगता है। फिर प्रतिस्पर्धाएं एथलीट्स के मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालती हैं। जिमनास्ट सिमोन बाइल्स, टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका और धावक नोआ लाइल्स ने अवसाद और दुश्चिंता (Depression & Anxiety) के बारे में सबके सामने बात रखी है। ऐसे में ड्रग्स आग में घी का काम करेंगे।

ऐसा नहीं है कि खिलाड़ियों को अपने स्वास्थ्य की चिंता नहीं है। कुछ खिलाड़ियों ने इस प्रतिस्पर्धा (Competition) का विरोध किया है। लेकिन कई खिलाड़ी, जिनके पास अपने को साबित करने के लिए जीवन के मात्र कुछ साल होते हैं, उनके पास यदि ड्रग्स लेकर जीतने की संभावना रहेगी तो वे इनमें दिलचस्पी दिखाएंगे। वैसे भी तवज्जो, शोहरत और पैसा उसे ही मिलता है जो खेल जीतता है। खेल की दुनिया में ऐसा दिखता है कि खिलाड़ी, खासकर ओलंपिक स्तर के खिलाड़ी, बहुत सम्पन्न घरों से नहीं होते हैं, और वे कोई न कोई काम करते हुए ही साथ-साथ प्रशिक्षण लेते हैं और खेलते हैं। जीत उन्हें आर्थिक सम्पन्नता हासिल करने में मदद कर सकती है। और यदि ड्रग्स जीतने की संभावना बढ़ाएंगे तो वे शायद न हिचकें।

लेकिन ऐसे आयोजन अक्सर खेल भावना और खेल कौशल (Sportsmanship & Proficiency) को कम करते हैं और उन्हें व्यावसायिक बनाते हैं। भारत में क्रिकेट के लिए शुरू हुए आईपीएल खेलों (IPL Games) से क्रिकेटरों को पैसा और शोहरत तो मिली लेकिन क्रिकेट एक बिज़नेस हो गया; सट्टेबाज़ी (Gambling) भी शुरू हो गई। और फिर, डोपिंग का संदेश क्या है? यही कि कोई भी खेल डोपिंग के बूते जीता जा सकता है? यकीनन, ये कुछ हद तक शरीर की ताकत और क्षमता बढ़ाने में मदद करते हैं, लेकिन असली सफलता के पीछे खिलाड़ी और प्रशिक्षक की सालों की मेहनत, अनुभव, प्रशिक्षण और कौशल काम आता है। एन्हांस्ड खेलों के नतीजे देखें तो यह बात और पुख्ता होती है। इन खेलों में डोपिंग वाले प्रतिभागियों में से मात्र एक प्रतिभागी जीता है, बाकी तीन वे प्रतिभागी जीते हैं जो बिना डोपिंग के खेल में शामिल हुए थे। प्रदर्शन बेहतर करने के लिए ड्रग्स की इजाज़त देकर एन्हांस्ड खेलों ने अनुशासन, तकनीकी दक्षता, मानसिक संयम और नियमों पर सामूहिक भरोसे को नज़रअंदाज़ किया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दिमाग की रक्षा में सफाई तंत्र

दिमाग का सफाई तंत्र उसकी तीन स्तरीय झिल्ली (मेनिन्जेस) (Maninges) में बसा होता है। यह तंत्र भौतिक क्षति से उसे महफूज़ रखने के अलावा रोगजनकों से भी सुरक्षा करता है। इस त्रि-स्तरीय झिल्ली की सबसे बाहरी परत में बड़ी-बड़ी रक्त शिराओं (वीनस साइनस) का एक जाल फैला होता है। पहले माना जाता था कि ये शिराएं मात्र रक्त प्रवाह का काम करती हैं। लेकिन नेचर में हाल में प्रकाशित एक शोध पत्र में इनकी विविध भूमिका पर प्रकाश डाला गया है।

शोध पत्र में बताया गया है कि ये शिराएं मस्तिष्क और खोपड़ी में तरल (Cerbrospinal fluid) की निकासी का काम करती हैं। अध्ययन में चूहों और मनुष्यों में वीनस साइनसों को खून तथा सेरेब्रोस्पाइनल द्रव को पम्प करके बाहर निकालते देखा गया। यह भी देखा गया कि ये शिराएं अपनी कोशिकाओं को इधर-उधर करके गश्ती प्रतिरक्षा कोशिकाओं के लिए जगह भी बनाती रहती हैं।

अध्ययन इस बात की पुष्टि करता है कि मस्तिष्क की सरहदें अत्यंत बारीकी से संचालित इंटरफेस हैं, न कि मात्र भौतिक आवरण। शोध पत्र के एक लेखक डोरियन मैकगैवर्न का कहना है कि दरअसल, वीनस साइनसों (Venous sinus) की गतिशील प्रकृति केंद्रीय तंत्रिका तंत्र की रक्षा के लिए अहम है क्योंकि शोथ तथा खोपड़ी में तरल पदार्थ का जमावड़ा और दबाव मस्तिष्क को क्षति पहुंचा सकता है और साइनस ऐसे तनाव होने पर मस्तिष्क के कार्य को जारी रखने में मदद करते हैं।

प्रयोग में शोधकर्ताओं ने जीवित, निश्चेतित चूहों में वीनस साइनसों की गतिविधियों का अवलोकन किया। इसके लिए उन्होंने खोपड़ी के एक वर्ग मिलीमीटर क्षेत्र को खुरचकर इतना पतला कर दिया था उसमें से लेज़र पुंज आसानी से गुज़र सके। यह लेज़र पुंज प्रतिरक्षा कोशिकाओं को प्रकाशित करेगा जिन्हें एक फ्लोरेसेंट प्रोटीन (Fluorescent proteins) से चिंहित कर दिया गया था। इस तकनीक को इंट्रावायटल इमेजिंग कहते हैं। इसकी मदद से शोधकर्ता खोपड़ी के अंदर स्थित, अरेखित (चिकनी) मांसपेशियों में लिपटी बड़ी शिराओं की धड़कन का अवलोकन कर पाए जब वे तरल की निकासी के लिए सिकुड़ और फैल रही थीं।

शोधकर्ता शिराओं की दीवारें निर्मित करने वाली एंडोथीलियल कोशिकाओं (Endothelial cells) का वीडियो बना पाए और देख पाए कि उनमें 1 माइक्रोमीटर व्यास तक के बारीक सुराख हैं। इन सुराखों को फेनेस्ट्रेशन (Fenestration) कहते हैं और ये तरल पदार्थ, अणुओं तथा सूक्ष्मजीवों को आर-पार जाने देते हैं। यह भी देखा गया कि शिराएं गश्ती प्रतिरक्षा कोशिकाओं के लिए जगह बनाने के लिए अपने आवरण को पुनर्व्यवस्थित भी कर पा रही थीं। शोधकर्ताओं ने इस विचित्र व्यवहार को रफ्लिंग (Ruffling) नाम दिया है।

मैकगैवर्न कहते हैं कि उन्होंने शिराओं को ऐसा करते पहली बार देखा है। उनके सुराख लगातार खुलते-बंद होते रहते हैं और इसका नियमन मुख्य रूप से प्रतिरक्षा कोशिकाएं करती हैं। ये प्रतिरक्षा कोशिकाएं लगातार साइनस की दीवारों की सतत निगरानी करती हैं और इससे पता चलता है कि साइनसों की एंडोथीलियल कोशिकाओं में इतना लचीलापन (Flexibility) होता है।(स्रोत फीचर्स)

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इंसान बेहोशी में भी सीख सकते हैं!

शीर्षक पढ़ते ही मन में यह सवाल उठता है: क्या ऐसा सचमुच मुमकिन है? हाल ही में हुए एक शोध में वैज्ञानिकों ने ऐसी ही चौंका देने वाली जानकारी को साझा करते हुए पुरानी समझ को चुनौती दी है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि साधारण बेहोशी वाली दवा देने के बावजूद भी इंसानी दिमाग (Human Brain) सामान्य अवस्था जैसा सक्रिय (Concious) रहता है। यहां तक कि दिमाग बेहोशी की हालत में भी संकेतों को समझता और आगे का अनुमान लगाता है। पिछले कुछ अध्ययनों में यह पता लगाया जा चुका है कि दिमाग के संवेदना-ग्राही हिस्से बेहोशी की हालत में इंद्रियों के संकेतों से सरल ध्वनियों को दर्ज कर सकते हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि क्या दिमाग बेहोशी की हालत में समझ और सीख भी सकता है।

इसी का पता लगाने के लिए बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के तंत्रिका वैज्ञानिक समीर शेठ और उनके साथियों ने सात ऐसे मरीज़ों पर अध्ययन किया, जिनका मिर्गी के इलाज के लिए मस्तिष्क का ऑपरेशन किया जा रहा था। सातों को प्रोपोफोल (Propofol) नामक दवा (जनरल एनेस्थीसिया) से बेहोश करके उनके दिमाग की गतिविधि को रिकॉर्ड किया गया।

इस अध्ययन को दो समूहों में बांटकर किया गया था। पहले समूह में, बेहोशी की हालत वाले तीन प्रतिभागियों को अलग-अलग आवृत्ति की बार-बार दोहराई जाने बीप सुनाई गई और बीच-बीच में कुछ अन्य ध्वनियां। दस मिनट तक मस्तिष्क की तंत्रिका गतिविधियां रिकॉर्ड करने से पता चला कि समय के साथ ‘बेहोश’ दिमाग के हिप्पोकैम्पस (Hippocampus) हिस्से में बीप को अन्य ध्वनियों से अलग पहचानने और उनकी अलग-अलग आवृत्तियों के बीच अंतर करने की क्षमता बढ़ती गई। अर्थात लगता है कि दिमाग अचेतन सीखने की क्षमता रखता है।

शेष चार प्रतिभागियों को कुछ वार्तालाप के हिस्से सुनाए गए। दिमागी रिकॉर्डिंग में देखा गया कि कुछ तंत्रिकाएं (Neurons) शब्दों के विशेष हिस्सों पर प्रतिक्रिया दे रहीं थीं (जैसे संज्ञाओं को बाकी शब्दों से अलग पहचानना)। एक शोधकर्ता के अनुसार, ‘बेहोशी (Unconcious) में भी प्रतिभागी यह अनुमान लगाने में समर्थ थे कि अगला शब्द क्या हो सकता है’। आखिर में, बेहोश प्रतिभागियों और सामान्य (बाहोश) प्रतिभागियों के आंकड़ों की तुलना की गई। देखा गया कि सामान्य और बेहोश, दोनों ही तरह के प्रतिभागियों के दिमागों का बर्ताव लगभग एक जैसा रहा।

यह दर्शाता है कि दिमाग का एक हिस्सा – हिप्पोकैम्पस (जो नई यादें बनाने और सीखने की क्षमता के लिए जिम्मेदार है), बेहोश हालत में भी जानकारी का आकलन और अनुमान लगाने में सक्षम है। वैज्ञानिक अभी अन्य तरह से काम करने वाले निश्चेतकों पर भी प्रयोग करना चाहेंगे ताकि और अधिक दृढ़ प्रमाण मिलें जो इस प्रयोग के परिणामों की पुष्टि कर सकें।

इस जानकारी का इस्तेमाल चिकित्सा क्षेत्र में किया जा सकता है। इन आंकड़ों की मदद से ऐसे मरीज़ों का उपचार संभव हो सकेगा जो कोमा या निष्क्रिय हालत से पीड़ित हैं। इससे दिमाग के क्षतिग्रस्त हिस्सों को छोड़कर, बाकी बचे हुए सही हिस्सों को कृत्रिम रूप से सक्रिय करने में मदद मिल सकेगी। (स्रोत फीचर्स)

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एड्स वायरस से निपटने का नया प्रयास

वैसे तो एड्स वायरस (ह्युमैन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस यानी एच.आई.वी.) (HIV) पर किए गए अनुसंधान ने हमें ऐसी कई दवाइयां मुहैया कराई हैं जो वायरस को काबू में रखती हैं और उसे हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को तहस-नहस करने से रोके रखती हैं। दुनिया भर में करीब 4 करोड़ लोग एच.आई.वी. के साथ जी रहे हैं और कोई इलाज नहीं खोजा जा सका है। आज तक इलाज करके मात्र 11 लोगों को वायरस से मुक्त किया जा सका है। यह स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण (Stem cell transplant) के ज़रिए संभव हुआ है। दिक्कत यह है कि स्टेम कोशिका उपचार का उपयोग आसान नहीं है।

अब एच.आई.वी./एड्स (AIDS) सम्मेलन में प्रस्तुत कुछ निष्कर्ष एक नई राह सुझा रहे हैं। कुछ अध्ययन प्रयोगशालाओं में किए गए हैं और कुछ अध्ययन मरीज़ों पर भी किए गए हैं। इनमें एक नए विचार का इस्तेमाल किया गया है।

आम तौर पर एड्स वायरस कोशिका में प्रवेश करने के बाद संक्रमित कोशिका में ऐसे परिवर्तन करता है कि वे उसकी उपस्थिति को भांपने और भांपकर स्वयं को नष्ट करने में असफल रहती हैं। यदि कोशिकाएं स्वयं को नष्ट करें तो उनके अंदर बैठे वायरस भी खत्म हो जाएंगे। यदि वायरस की इस करामात से पार पा लें तो काम आसान हो जाएगा।

यह सही है कि वर्तमान में उपलब्ध दवाइयां एच.आई.वी. का दमन इतनी हद तक कर देती है कि रक्त परीक्षण (Blood Test) में वह नज़र नहीं आता। लेकिन वह संक्रमित टी-कोशिकाओं (Infected T-cells) और मैक्रोफेजों में बना रहता है और अपना जेनेटिक कोड व्यक्ति के गुणसूत्रों में पिरो देता है। जैसे ही व्यक्ति उपचार बंद करता है ये सुप्त वायरस अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगते हैं और जल्दी ही लाखों वायरस रक्त में पहुंच जाते हैं। कई संक्रमित कोशिकाएं इन वायरसों को बाहर निकालने की प्रक्रिया में या प्रतिरक्षा तंत्र के हमले में मारी जाती हैं, लेकिन कुछ जीवित रह जाती है।

नई रणनीति टी-कोशिकाओं व मैक्रोफेज में पाए जाने वाले ऐसे सेंसर्स पर टिकी है जो सूक्ष्मजीवों को ताड़ते हैं। इन्हें कार्ड-8 (CARD8) कहते हैं। ये मुख्य रूप से प्रोटीएज़ (Protease) नामक एंज़ाइम को पहचानते हैं जो नव-निर्मित प्रोटीन्स को तोड़ता है ताकि नए वायरस बनाए जा सकें। जैसे ही कार्ड-8 किसी वायरस प्रोटीन की उपस्थिति भांपता है, वह एक किस्म की कोशिकीय खुदकुशी की प्रक्रिया शुरू करवा देता है जिसके चलते नए वायरसों का निर्माण अस्त-व्यस्त हो जाता है। इस प्रक्रिया को पायरोप्टोसिस (Pyroptosis) कहते हैं। 

एच.आई.वी. अपना प्रोटिएज़ दो एक-सी इकाइयों को जोड़कर बनाता है। 2021 में साइन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र में वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के लियांग शान और उनके साथियों ने बताया गया था कि कार्ड-8 (Card-8) सिर्फ दो इकाइयों के जुड़ने पर बने डाइमर को ही पहचानता है। वायरस इसका फायदा उठाते हैं – वे दो इकाइयों को जोड़ने की प्रक्रिया को तब तक मुल्तवी रखते हैं जब तक कि वायरस कण मेज़बान कोशिका से बाहर न झांकने लगे। शान की टीम ने यह भी बताया था कि दो वर्तमान एच.आई.वी. रोधी दवाइयां (एफेवाइरिनेज़़ और रिल्पिवायरिन) किसी तरह से डाइमर (Dimer) निर्माण की इस प्रकिया को जल्दी करवा देती हैं। उस समय तो किसी ने इस खोज की उपचारात्मक संभावना पर ध्यान नहीं दिया था लेकिन अब इस पर चर्चा हो रही है।

कई औषधि निर्माताओं ने ऐसी अधिक शक्तिशाली दवाइयों पर काम भी शुरू कर दिया है। जैसे टारगेटेड एक्टिवेटर ऑफ सेल किल (TACK) पर ध्यान दिया जा रहा है। 2023 में मर्क कंपनी ने साइन्स ट्रांसलेशन मेडिसिन में बताया था कि उसने ऐसा अणु खोज लिया है जो प्रोटिएज़ को डाइमराइज़ करवाने में एफेवाइरिनेज़ (Efavirenz) से कई गुना शक्तिशाली है। कंपनी इसका परीक्षण ऐसे लोगों पर कर रही है जिन्हें पहले कोई उपचार नहीं मिला है। 

दूसरी ओर, कोलंबिया विश्वविद्यालय के डेविड हो एक दोतरफा रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसमें TACK को एक अन्य तरीके के साथ जोड़ गया है। यह दूसरा तरीका है सुप्तावस्था पलट एजेंट (Latency reversal agents LRA) पर आधारित। ये ऐसे एजेंट होते हैं जो वायरस की सुप्तावस्था (latency) को समाप्त करके उन्हें अपनी प्रतिलिपियां बनाने को उकसाते हैं। इसके पीछे विचार यह है कि जिन कोशिकाओं में वायरस तेज़ी से प्रतिलिपियां बनाएंगे, उन्हें प्रतिरक्षा तंत्र नष्ट कर देगा या वे स्वयं ही फट जाएगी। लेकिन अब तक इस तरह से वायरस का जखीरा कम करने में सफलता सीमित रही है।

हो की प्रयोगशाला में बेहतर LRA बनाने पर काम चल रहा है। वहां सुप्त संक्रमित कोशिकाओं के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जो ऐसे कोशिकीय संकेतों को शुरू करवा दें जो वायरस को अपनी प्रतिलिपि बनाने को उकसाएं। लेकिन प्रयोगशाला में एच.आई.वी. संक्रमित लोगों से ली गई कोशिकाओं में अकेली एंटीबॉडी कारगर नहीं रही। ये कोशिकाएं ऐसे व्यक्तियों की थीं जो उपचार ले रहे थे और वायरस को पूरी तरह नियंत्रित कर रहे थे। लेकिन हो ने बताया है कि जब उन्होंने साथ में TACK औषधि मिला दी तो वायरल आरएनए (Viral RNA) की मात्रा तेज़ी से कम हुई।

हो का कहना है कि एच.आई.वी. संक्रमण की स्थिति पर असर डालने के लिए LRA और टैक का उपयोग शायद ज़रूरी न हो।

रिट्रोवायरस (Retrovirus) और अन्य मौकापरस्त संक्रमणों पर एक सम्मेलन में वॉशिंग्टन विश्वविद्यालय मेडिसिन की प्रिया लाल ने बताया कि उनकी टीम ने सात ऐसे एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्तियों को शामिल किया जो विभिन्न वायरस रोधी दवाइयों और एफेवाइरिनेज़ की मदद से वायरस पर काबू किए हुए थे। सुप्त रूप से संक्रमित कोशिकाओं के प्रति संवेदी तकनीकों की मदद से पता चला कि 4 महीने के उपरांत 6 व्यक्तियों में सुप्त संक्रमित कोशिकाएं 20 से 50 प्रतिशत तक कम हो गई थीं। शोधकर्ताओं ने स्वीकार किया है कि इतनी गिरावट किसी व्यक्ति को रोगमुक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है लेकिन यह इस विचार का प्रमाण है कि प्रोटिएज़ को सक्रिय करने वाले शक्तिशाली कारकों का विकास करना उपयोगी होगा। कई औषधि निर्माताओं ने इस दिशा में काम करना शुरू भी कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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स्वास्थ्य: मात्र सुविधाओं, व्यवस्थाओं से आगे

ग्लोरजियो विंस्टन गौड़ा

रवरी 2026 के पहले सप्ताह में मैंने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले के धरमजयगढ़ ब्लॉक के दूरदराज़ आदिवासी गांवों में कुछ समय बिताया था। उन दिनों मैंने जो देखा, जो अनुभव किया, उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य सम्बंधी कार्यों के प्रति मेरे नज़रिए को किसी व्याख्यान या पाठ्यपुस्तक से कहीं ज़्यादा प्रभावित किया। मैंने जो देखा, अनुभव किया उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य को एक नए नज़रिए से देखने-समझने में मेरी मदद की।

मैं सिद्धांतों यानी स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक निर्धारक, गरीबी, भौगोलिक स्थिति और शिक्षा आदि के संयुक्त प्रभाव का अच्छे से अध्ययन करके इस क्षेत्र में गया था। मैंने इसकी रूपरेखा तैयार की थी, इसके चित्र बनाए थे और भोपाल में अपने विश्वविद्यालय की कक्षाओं में इन ढांचों की रूपरेखा पर चर्चा भी की थी। लेकिन, इस मैदानी अध्ययन के बाद मुझे यह समझ में आया कि हर आंकड़े के पीछे एक उलझी हुई, सख्त और किसी भी रूपरेखा की तुलना में कहीं अधिक जटिल ज़िंदगी होती है।

ये कोई अनोखी जगहें नहीं हैं। ये साधारण गांव हैं। यहां अभी भी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं – जैसे, अच्छी सड़कें, मोबाइल सिग्नल, आसान पहुंच वाले अस्पताल और सुचारू संस्थाएं – जो हमें आसानी से उपलब्ध हैं और उन्हें हम उतना महत्व नहीं देते। दूरी हमेशा किलोमीटर में नहीं नापी जाती। कभी-कभी इसे ‘कितने वर्षों से उपेक्षित है’ के रूप में नापा जाता है, इसे हर महत्त्वपूर्ण सूची में हमेशा अंतिम स्थान पर रहने की संग्रहित तकलीफ के रूप में भी नापा जाता है।

हम अक्सरसमुदायआधारित तरीकोंके बारे में बातें करते हैं। लेकिन इन शब्दों का असली मतलब आपको तभी समझ आता है, जब आप अपना लैपटॉप छोड़कर, पक्की सड़कों पर चलना छोड़कर, घने जंगल से होते हुए किसी ऐसे गांव तक पहुंचते हैं, जहां पिछले मॉनसून के बाद से अब तक कोई एम्बुलेंस नहीं पहुंची है।

ओंगना गांव में एक मां के साथ हुई त्रासदी

ओंगना गांव में लगभग 1200 लोग रहते हैं। इनमें बिरहोर (हाशिए का एक जनजातीय समूह), ओरांव और कंवर समुदाय के लोग शामिल हैं। यहां तीन आंगनवाड़ी केंद्र हैं। जिनमें तीन से छह वर्ष की आयु के कुल 59 बच्चे पंजीकृत हैं। मेरे चारों दौरों के दौरान तीनों केंद्रों पर मुझे पांच या छह बच्चे ही मिले। यह पंजीकृत संख्या का मुश्किल से दस प्रतिशत था।

यहां की व्यवस्था इस अनुपस्थिति की आदी हो चुकी है। इस अनुपस्थिति के लिए हमेशा एक जैसी ही सफाई दी जाती है: आदिवासी परिवार अपने बच्चों को खेतों में, जंगलों में, या जहां दिन में काम पर जाते हैं, वहां अपने साथ ले जाते हैं। यह एक स्थापित तथ्य-सा बन गया है और इसे बिना किसी जांच के कार्यक्रम सम्बंधी रिपोर्टों में मान लिया जाता है। कोई नहीं पूछता कि ऐसे (आंगनवाडी) केंद्र के होने का मतलब क्या है, जहां रजिस्टर में खानापूर्ति कर दी जाती है किंतु बच्चे होते ही नहीं। इसे लेकर कोई भी इतना चिंतित नहीं है कि इसके कारणों का पता लगाए।

स्थानीय आशा कार्यकर्ताओं को ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण दिवस (VHSND) की तैयारी में मदद करते हुए मेरी मुलाकात एक महिला से हुई। वह 31 साल की थी, चार महीने की गर्भवती थी और वह सातवीं बार गर्भवती थी। इससे पहले के छह बच्चों में से चार जीवित थे। उसने प्रसव-पूर्व देखभाल के लिए पंजीकरण नहीं कराया था। उसका अपना आधार कार्ड भी खो गया था। ऐसा होने पर भारत में प्रशासनिक कामों में बड़ी अड़चनें आती हैं। आधार कार्ड होने से लगभग हर सरकारी लाभ को प्राप्त करना आसन हो जाता है – जैसे पोषण सहायता, नगद हस्तांतरण और अस्पताल में प्रसव सुविधा या प्रसव के दौरान मिलने वाली अन्य सुविधाएं। आधार कार्ड विहीन व्यक्ति व्यवस्था की नज़रों में ओझल हो जाते हैं, भले ही व्यवस्था उनसे चंद सौ मीटर दूरी पर ही क्यों न हो।

मितानिन (छत्तीसगढ़ में आशा कार्यकर्ता को मितानिन कहते हैं) और पड़ोसियों से बात करके मैंने उस महिला की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश की। वह और उसका पति शराब की लत से जूझ रहे थे। गरीबी और शराब पीने की लत इस कदर आपस में गुंथी हुई थी कि यह कहना मुश्किल था कि किस वजह से कौन सी समस्या पैदा हुई। इन समुदायों में नशे की लत के बारे में नैतिक दृष्टिकोण के अलावा शायद ही कभी किसी अन्य दृष्टिकोण से चर्चा की गई होगी। ओंगना में यह समस्या हर जगह देखने को मिलेगी और बीते सालों में यहां यह आम हो गई है। ये सभी चीज़ें दैनिक जीवन में इस तरह से घुलमिल गई हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों का इनसे कुछ लेना-देना ही नहीं रह गया है।

फिर यह भी पता चला, जिसके लिए मैं तैयार नहीं था, कि उसका छठा बच्चा, जो कि मात्र 9 महीने का था, पानी की टंकी में डूबकर मर गया था। क्योंकि, उसकी मां नशे की हालत में उस बच्चे को पानी पिलाने की कोशिश कर रही थी। उसके हाथों से छूटकर बच्चा टंकी में गिर गया था और उसे घंटों बाद इसका पता चला था, जब उसके बड़े बेटे ने टंकी की ओर इशारा करके पूछा कि बच्चा हिल क्यों नहीं रहा है।

मैं झूठ नहीं कहूंगा, पहले तो मैंने भी उसे नैतिक आधार पर तौला (जज किया)। यह मेरे जैसे एक ऐसे व्यक्ति की सहज प्रतिक्रिया होगी जो रोकथाम, ज़िम्मेदारी निभाने और इससे अलग क्या किया जा सकता है सोचने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। इसलिए, मेरे अंदर भी यह प्रवृत्ति सहज रूप से तुरंत आई और मुझे यह उचित भी लगी। मुझे यह समझने में अधिक समय लगा कि मेरे सामने वास्तव में क्या चल रहा है: मेरे सामने एक ऐसी महिला थी जो ऐसी दिल दहला देने वाली परिस्थितियों में जीवित बची हुई थी, जिसकी हममें से अधिकतर लोग कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। वह बिना किसी सहारे के, बिना किसी समझदार साथी के और बिना किसी समर्थन के, अपने शरीर में सातवां बच्चा पाल रही थी। वह एक ऐसी महिला थी जो पहले ही अपने दो बच्चे खो चुकी थी।

अगली सुबह जब वह स्वास्थ्य केंद्र पर नहीं आई, तो मैं एक पुरुष मितानिन प्रशिक्षक के साथ उसके घर गया। जब हम वहां पहुंचे, तो उसका पति दिन शुरू होने से पहले ही नशे में धुत था। वह एक टूटी हुई लकड़ी से उस महिला को पीटने की धमकी दे रहा था। उसने कहा कि उसकी पत्नी ने VHSND में जाने से इनकार कर दिया है। उसकी नशे की हालत में, हमारे पास सच्चाई जानने का कोई तरीका नहीं था। हालांकि, हम उसे शांत कराने में कामयाब रहे। मैं उस महिला को स्वास्थ्य केंद्र ले गया, जहां ग्रामीण स्वास्थ्य आयोजक (RHO, छत्तीसगढ़ में सहायक नर्स दाई/बहुउद्देशीय कार्यकर्ताओं का पदनाम) ने उसकी गर्भावस्था का पंजीकरण किया और आवश्यक जांचें कीं। इस सब में लगभग दो घंटे लगे। हमारे इस प्रयास ने उसे यह समझने में मदद की कि स्वास्थ्य केंद्र की देख-रेख में हुई गर्भावस्था और पहले की उन गर्भावस्थाओं के बीच क्या अंतर है जो बिना किसी स्वास्थ्य केंद्र की देख-रेख के हुई थीं।

पीछे मुड़कर देखता हूं तो सबसे ज़्यादा यही बात चौंकाती है कि यह सब लगभग न होने की कगार पर था – अगर उसका नाम मितानिन की सूची में न होता, अगर हमने उसकी गैरहाज़िरी पर ध्यान न दिया होता, अगर मैं अपने शुरुआती फैसले को ही आखिरी मान लेता और सोच लेता कि यह परिवार हमारी पहुंच से बाहर है।

हस्तक्षेप छोटा-सा था, लेकिन उसके लिए कितने ‘अगर-मगर’ पार करने पड़े थे।

प्राय: सार्वजनिक स्वास्थ्य का काम ऐसे ही परिवारों तक पहुंचना तो होता है, जिन्हें समाज पहले ही छोड़ चुका होता है, जिनकी कोई आवाज़ नहीं होती, जिनकी मुश्किलें किसी की नज़र में नहीं आतीं; और तो और, जिनका अस्तित्व तक जैसे किसी के लिए मायने नहीं रखता।

भौगोलिक परिस्थितियां

कनकुला धरमजयगढ़ से लगभग 28 किलोमीटर दूर है। यहां मोबाइल नेटवर्क नहीं आता है। यहां जाने वाली सड़क, सड़क कहने लायक भी नहीं है। कच्चा, पगडंडी सरीखा रास्ता घने जंगलों, सूखी नदी और धंसती रेत से होकर जाता है। इस इलाके में मोटरसाइकिल का जाना भी मुश्किल है। इस गांव में 61 परिवार हैं और आबादी 217 है। मानसून के दौरान, यह क्षेत्र स्वास्थ्य व्यवस्था के नक्शे से पूरी तरह गायब हो जाता है, क्योंकि, सारे रास्ते डूब जाते हैं और कोई भी स्वास्थ्य कार्यकर्ता हफ्तों तक यहां नहीं पहुंच पाता।

मैंने स्वास्थ्य सुविधाओं में बाधा पैदा करने वाली भौगोलिक कटाव की परिस्थितियों के बारे में पढ़ा था। लेकिन, मैंने कनकुला में इसे अलग तरह से समझा। कटाव सिर्फ दूरी से नहीं होता – वह उन तमाम चीज़ों के मिले-जुले असर से होता है जो वहां तक कभी पहुंच ही नहीं पाईं: हर वह संदेश/सूचना जो कभी पहुंची नहीं, हर वह कोशिश जो पहुंच योग्य इलाके की सीमा से आगे न बढ़ सकी, हर वह योजना जो सड़क के पास रहने वालों को ध्यान में रखकर बनाई गई है।

जब लोगों को टीकाकरण के लिए प्रेरित करने के लिए मैं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के साथ घर-घर गया तो पाया कि हर बार  आंगनवाड़ी  कार्यकर्ता दरवाज़ा खटखटाती, अंदर से “नहीं” का जवाब सुनकर आगे बढ़ जातीं। ना तो लोग ही अपने ‘न’ के जवाब का कोई स्पष्टीकरण देते और ना ही आंगनवाड़ी कार्यकर्ता उन्हें समझाने का प्रयास करती। जब मैंने पूछा कि वे आगे क्यों बढ़ जाती हैं, तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने सीधे कहा: “वे नहीं आएंगे।” उनकी आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी। बस एक निराशा थी – वह निराशा जो वर्षों तक वही दरवाज़े बार-बार खटखटाने और वही जवाब पाने के बाद पैदा होती है। उन्होंने यह विश्वास करना बंद कर दिया था कि कभी कोई दरवाज़ा खुलेगा। और, मैं इसके लिए उन्हें दोष नहीं दे सकता था।

मैंने खुद परिवारों से बात करने की अनुमति मांगी। मैंने पाया कि उनके मना करने का कारण बहुत सीधा और तर्कसंगत था। उनका कहना था कि “इंजेक्शन लगने के बाद बच्चों को बुखार आ जाता है। हम टीकाकरण नहीं करवाना चाहते।”

यह अज्ञानता नहीं थी। बल्कि, गांववासियों का एक अनुभवजन्य सत्य था। इन परिवारों ने बच्चों को टीके लगवाने के बाद हल्का बुखार आते देखा था। किसी ने उन्हें यह नहीं समझाया था कि वास्तव में टीका लगने के बाद बुखार आना सही है, यही होना चाहिए। बुखार एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही होती है, वह अभ्यास कर रही होती है, सुरक्षा के लिए तैयार हो रही होती है। इस सही जानकारी के अभाव में, उन्होंने अपना स्वयं का स्पष्टीकरण गढ़ लिया था और वह सुसंगत था। यह बात एक मां से दूसरी मां तक फैल गई और पूरे गांव ने इस पर बात को एक प्रामाणिक सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया। यह बात गांव के लोगों के लिए एक अनुभवजन्य सत्य की तरह विश्वसनीय और निर्विवादित थी। आप इसे केवल उनका ‘भ्रम’ कहकर खारिज नहीं कर सकते। यह ऐसी बात थी, जिस पर समुदाय के लोगों ने अपने पास उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर सोच-समझ कर अपनी यह धारणा बनाई थी।

यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक रचनावाद (social constructivism) का एक अच्छा उदाहरण है। बीमारी, उपचार और शरीर के बारे में हमारी मान्यताएं निर्वात में नहीं बनती हैं। वे साझा अनुभव, सामुदायिक चर्चा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक-दूसरे को सुनाई जाने वाली कहानियों के ज़रिए बनती हैं। कनकुला में, ‘टीके से बुखार आता है’ की धारणा कोई गलतफहमी नहीं थी; यह सामाजिक रूप से निर्मित सत्य था, जो इस गांव में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई गई कहानियों के आधार पर पुष्ट हुआ था। इसका कारण था कि यहां कोई भी बाहरी स्वास्थ्य सूचना कभी भी भरोसेमंद ढंग से लोगों के पास नहीं पहुंची थी। यह बात समझ लें तो आपके काम करने का तरीका बदल जाएगा। आप उन्हें गलत साबित करने के लिए उनके पास नहीं जाएंगे। बल्कि, आप उन्हें सुनने और समझने के लिए उनके पास जाएंगे – यह समझने के लिए कि लोगों ने जो देखा है, उसके आधार पर उन्हें वह बात क्यों सही लगी। फिर, जो समझ पहले से मौजूद है, उसके समांतर कुछ नया निर्माण करने के उद्देश्य से उनके बीच जाएंगे। सामुदायिक ज्ञान को अज्ञानता कहकर उसे खारिज करने से वह गायब नहीं हो जाता। यह बस संवाद का दरवाज़ा बंद करता है।

मैंने पहले पुरुषों के साथ समय बिताया। मैंने उन्हें सुना और बातचीत के माध्यम से उनके साथ एक सहजता स्थापित की। इस मेल-जोल को बढ़ाने की दिशा में, मैंने उनसे उन विषयों पर भी हंसी-मज़ाक किया जो स्वास्थ्य से नहीं जुड़े थे। फिर, मैंने उन्हें समझाया कि टीका कैसे काम करता है। मैंने उन्हें बुखार आने के कारणों के बारे में समझाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि सुबह जंगल जाने की योजना बना रहे तीन परिवार टीकाकरण करवाने के लिए आ गए।

बाद में, पुरुष RHO ने मुझे बताया कि ये परिवार वर्षों से टीकाकरण के दिन भाग जाते थे। किसी शत्रुता या हठधर्मी विरोध के कारण नहीं। बल्कि, इसलिए कि कभी किसी ने उन्हें इतने इत्मीनान और ईमानदारी से, टीकाकरण का फायदा नहीं समझाया था।

इन समुदायों और पूरे स्वास्थ्य तंत्र के बीच दूरी केवल भौगोलिक दूरी नहीं है। यह दूरी बरसों तक उन्हें नज़रअंदाज़ करने, सूचनाओं से वंचित रखने से पैदा हुई है। यह दूरी उन संस्थाओं ने पैदा की है जिन तक पहुंच पाना कभी आसान नहीं रहा और उन योजनाओं ने भी पैदा की जो इन्हें ध्यान में रखकर कभी बनाई ही नहीं गईं। इस दूरी को पाटना निरंतर चलने वाली, चमकदमक से रहित प्रक्रिया है। यह अक्सर रिपोर्टों में दर्ज़ नहीं होती, न ही इससे सुर्खियां बनती हैं। लेकिन मेरा मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की असली ज़मीन यहीं है। इस पर चर्चा घर के दरवाज़े पर, पहाड़ी पर, सूखी नदी के किनारे होती है और उन जगहों पर होती है जहां सड़क नहीं पहुंचती।

ज़मीनी स्तर पर कार्य

गरीबी, भौगोलिक स्थिति, साक्षरता, अवसर जैसे सामाजिक निर्धारकों पर कक्षाओं में होने वाली चर्चाएं गलत नहीं हैं। लेकिन जब तक कि आप इन्हें किसी खास व्यक्ति के संदर्भ में, किसी खास घर के संदर्भ में और किसी खास सुबह साकार होते नहीं देख लेते तब तक ये अमूर्त सिद्धांत ही बने रहते हैं। जैसे – एक शराबी पति, जिसके हाथ में टूटी हुई लकड़ी का टुकड़ा है। आंगनवाड़ी केंद्र में टूटा और बेकार पड़ा हुआ ग्रोथ मॉनिटरिंग यंत्र (विकास निगरानी उपकरण), जिसके चलते यह मापना मुश्किल हो जाता है कि स्वास्थ्य केंद्र पर आने वाले बच्चे उम्र के हिसाब बढ़ रहे हैं या नहीं। ये कोई अपवाद नहीं हैं। बल्कि, ये काम का अभिन्न हिस्सा हैं।

मैं बार-बार यही बात दोहराता हूं कि कितना कुछ सक्रिय मौजूदगी पर निर्भर करता है – सक्रिय मौजूदगी यानी शारीरिक, धैर्यपूर्ण और बिना चमक-दमक वाली उपस्थिति। कनकुला के परिवारों को किसी अभियान की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें बस एक ईमानदार बातचीत की ज़रूरत थी। ओंगना की महिला को किसी नई नीति की ज़रूरत नहीं थी। उसे बस किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो बिना किसी पूर्वाग्रह के एक आम मंगलवार की सुबह उसके दरवाज़े पर आए और उसे यह बताए कि उसकी गर्भावस्था कितना मायने रखती है, उसके लिए ज़रूरी स्वास्थ्य सम्बंधी प्रयास किए जा रहे हैं।

ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास जो ज्ञान होता है, वह किसी डैशबोर्ड (औपचारिक डिजिटल माध्यम) द्वारा नहीं समझा जा सकता है। क्योंकि, ज़मीनी स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही ये बात जानते हैं कि किन परिवारों ने दरवाज़े पर दी गई दस्तक का जवाब देना बंद कर दिया है और क्यों। वे जानते हैं कि जुलाई में कौन सी सड़कें नदी में डूब जाती हैं। वे जानते हैं कि किसका पति शराब पीता है, कौन-सा बच्चा तीन महीने से नहीं तौला गया है, कौन-सा परिवार मुलाकात का जवाब देगा और किन घरों को अतिरिक्त सहायता की ज़रूरत है। यह ज्ञान कारगर हस्तक्षेप का आधार बनता है, जो वास्तव में काम करता है। जब हम थकान के कारण या किसी अन्य कारण से कार्यकर्ताओं के अनुभवों को नज़रंदाज़ कर देते हैं, तो हम स्वास्थ्य प्रणाली में लंबे समय के अनुभव के साथ अर्जित महत्वपूर्ण जानकारी गंवा देते हैं। जबकि स्‍वास्‍थ्‍य प्रणाली इसी के आधार पर काम करती है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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भारत के मेडिकल कॉलेजों में कमज़ोर होती समग्र देखभाल

रॉयसन डिसूज़ा

85 साल के एक बुज़ुर्ग को उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) के लिए गांव के एक द्वितीयक (सेकंडरी) स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया। कथित तौर पर आत्महत्या के इरादे से कीटनाशक खाने के बाद उनके बाएं हाथ में गैंग्रीन (रक्त संचार रुकने से ऊतकों का मरना) हो गया था। वे ऐसे क्षेत्र के रहवासी हैं जहां बहुतायत में हाथी पाए जाते हैं और उनके यहां से नज़दीकी तृतीयक (टर्शियरी) स्वास्थ्य केंद्र 5 घंटे की दूरी पर है।

चूंकि आत्महत्या के मामलों को मेडिको-लीगल केस माना जाता है और स्वास्थ्य कार्यकर्ता इनमें हाथ डालने से घबराते हैं, इसलिए उन्हें एक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र से दूसरे उच्च स्वास्थ्य केंद्र रेफर किया जाता रहा; अंत में उन्हें मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती किया गया। तब तक कीटनाशक उनके शरीर में फैलकर अवशोषित हो चुका था, और उसके बुरे असर की शुरुआत हो चुकी थी। इस वजह से उन्हें गहन देखभाल इकाई (ICU) में रखने की ज़रूरत पड़ी।

इलाज के दौरान, उनके बाएं हाथ में खून पहुंचाने वाली एक मुख्य धमनी में रक्त का थक्का जम गया था, जिसकी वजह से उन्हें बहुत दर्द हो रहा था और हाथ का रंग बदल गया था। इस स्थिति को तुरंत संभाला गया और थक्का हटाने के लिए सर्जरी की गई। हालांकि, हाथ को जो नुकसान पहले ही हो चुका था उसे ठीक नहीं किया जा सकता था, और इससे हाथ में पूरी तरह से गैंग्रीन हो गया था। वे मेडिकल कॉलेज में कुछ और दिन भर्ती रहे, इस दौरान कई विभागों से उनके लिए परामर्श लेकर टेस्ट करवाए गए और फिर उन्हें मेडिकल कॉलेज से छुट्टी देकर रुलर पैलिएटिव केयर सेंटर में भेज दिया गया।

जब इस मरीज़ की देखभाल कर रहे डॉक्टरों ने सर्जिकल परामर्श के लिए मुझसे संपर्क किया, तो मुझे लगा कि शायद गैंग्रीन के बारे में बात करने हेतु किया होगा। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि यह संपर्क उस दर्द के लिए था जिसकी शिकायत मरीज़ अपने गुदा नाल (एनल कैनाल) में कर रहा था। मरीज़ को देखने और उसकी जांच करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मेडिकल कॉलेज ने मुख्य समस्या पर तो ध्यान ही नहीं दिया था और इससे मरीज़ की स्थिति पूरी तरह से बिगड़ चुकी थी और बाकी सभी जटिलताएं हुई थीं। मरीज़ ने कीटनाशक इसलिए खाया था क्योंकि उसे गुदा नाल में बहुत ज़्यादा दर्द और रक्तस्राव हो रहा था। जितने दिन वे भर्ती रहे किसी ने इस बारे में पूछने का सोचा तक नहीं। बस एक साधारण सी गुदा (रेक्टल) जांच से पता चल गया कि इसका असली कारण रेक्टल कैंसर था जो बहुत बढ़ चुका था और जिससे बहुत ज़्यादा दर्द और मल त्यागने में दिक्कत हो रही थी।

इस हादसे ने मुझे एक अत्यंत परेशानीजनक सवाल पर सोचने को मजबूर कर दिया कि हमारे मेडिकल संस्थानों में ‘समग्र देखभाल’ (कॉम्प्रिहेंसिव केयर) से हमारा क्या मतलब है – खासकर मेडिकल कॉलेज, जिन्हें गर्व होता है कि वे समग्र देखभाल और उपचार देते हैं।

समग्र देखभाल का महत्व

लंबे समय से भारत में मेडिकल कॉलेजों को हर मुमकिन चिकित्सकीय अवस्था की समग्र/तफसील से पड़ताल और प्रबंधन का केंद्र माना जाता रहा है। ये हर उस मरीज़ के लिए एक भरोसेमंद आखरी सहारा/उम्मीद होते हैं जिन्हें अलग-अलग स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों द्वारा (जब मामला उनके वश में नहीं रहता तब) यहां रेफर किया गया होता है।

मेडिकल कॉलेज में, मरीज़ को अलग-अलग स्तर के कई डॉक्टर देखते हैं। यह अक्सर मरीज़ के लिए परेशानी का सबब होता है, क्योंकि उसे एक ही जानकारी कई बार देनी पड़ती है और हरेक के हिसाब से जांच करानी पड़ती है। जिस मेडिकल कॉलेज में मैंने ट्रेनिंग ली, वहां अगर किसी मरीज़ का कोई (पूर्व) नियोजित ऑपरेशन होना होता था तो उसकी कम से कम पांच स्तरों पर जांच होती थी – पहले बाह्य मरीज़ क्लिनिक में प्रशिक्षु/कंसल्टेंट द्वारा, उसके बाद इंटर्न, जूनियर रेसिडेंट, सीनियर रेसिडेंट, कंसल्टेंट, और आखिर में एडमिशन के बाद यूनिट के हेड द्वारा।

यह व्यवस्था मुख्य रूप से जूनियर डॉक्टरों की ट्रेनिंग के लिए बनाई गई थी, लेकिन इससे भी ऊपर यह कारण था कि यह व्यवस्था मरीज़ का सही निदान करने और सबसे सही इलाज देने में एक असरदार प्रक्रिया के तौर पर काम करती है। उदाहरण के लिए, हर्निया के ऑपरेशन के लिए भर्ती हुए एक मरीज़ में आंत के कैंसर का पता इसलिए चला था क्योंकि एक प्रशिक्षु ने उसकी समग्र जांच की थी। वैसे, यह भी आम प्रथा है कि सर्जरी के मरीज़ों की डायबिटीज़, हाइपरटेंशन, दिल की बीमारी, या थायरॉइड जैसी कई अन्य मेडिकल स्थितियों की (संपूर्ण) जांच हो क्योंकि सर्जरी के समय इन स्थितियों के बारे में पता होना ज़रूरी होता है।

एक और उदाहरण देता हूं। मेरी रेसिडेंसी के दौरान एक मरीज़ को कोलेक्टोमी (कैंसर उपचार के लिए बड़ी आंत का हिस्सा निकालना) के लिए भर्ती किया गया था। इस ऑपरेशन में एक बड़ी दुविधा की स्थिति यह थी कि कहीं कैंसर दूसरे अंगों में फैला न हो। यदि फैल चुका है तो ऐसे में सर्जरी से इलाज/फायदा नहीं होगा। ऐसे में मरीज़ के लिए कीमोथेरेपी सही रहेगी।

कभी-कभी उन्नत किस्म के स्कैन भी लसिका ग्रंथियों जैसे छोटे अंगों में कैंसर के फैलाव को पकड़ नहीं पाते। मरीज़ की जांच की प्रक्रिया में टीम के सबसे जूनियर सदस्य ने लसिका ग्रंथि में कुछ संकेत देखे और कहा कि शायद कैंसर फैल रहा है। यह सही निकला, और मरीज़ को गैर-ज़रूरी सर्जरी से बचा लिया गया और उसे आगे यथोचित इलाज के लिए भेजा गया।

इससे सिर्फ 10 साल आगे चलें तो ऐसा लगता है कि मेडिकल कॉलेजों की समग्र जांच की बात पूरी तरह खत्म हो गई है। मरीज़ को समय देना, उनकी हिस्ट्री (बीमारी और उससे जुड़ी अन्य जानकारियां) लेना और जांच करना निहायत ज़रूरी है, जिसे कम करके नहीं आंका जा सकता। कई तरह के परीक्षण और स्कैन आ जाने के बावजूद, मरीज़ की हालत पता लगाने में एक अच्छी हिस्ट्री और जांच-पड़ताल करना बहुत ज़रूरी होता है।

शुरुआती उदाहरण में, अगर मरीज़ की पूरी हिस्ट्री ली गई होती, तो कोई भी यह बता देता कि उसकी समस्या मल त्यागने से जुड़ी थी, जिसमें रेक्टल जांच करनी पड़ती और बीमारी आसानी से पता चल जाती। मरीज़ को कई अलग-अलग विशेषज्ञ विभागों ने देखा, लेकिन किसी ने भी सबसे ज़रूरी बात जानने की ज़हमत नहीं उठाई कि असल में उसने अपनी जान लेने जैसा इतना बड़ा कदम उठाया क्यों?

हाल के दिनों में क्या बदला

मौजूदा चिकित्सा शिक्षा तंत्र लगातार जांच के दायरे में रहा है। (अधिक जानने के लिए निवारण की वेबसाइट पर ‘The Pathophysiology of Declining Medical Education in India/भारत में घटती मेडिकल शिक्षा की पैथोफिज़ियोलॉजी’ लेख पढ़ें – https://nivarana.org/reality-check/the-pathophysiology-of-declining-medical-education-in-india)

कई कारण हैं जिनमें से एक पर आम तौर पर बहस होती है: क्लीनिकल पोस्टिंग के दौरान मरीज़ों के साथ तफसील से समय बिताने पर ज़ोर न होना। एमबीबीएस के पाठ्यक्रम का एक बड़ा हिस्सा मरीज़ों पर केंद्रित पढ़ाई का है, जिसे क्लीनिक्स कहा जाता है। इसमें विद्यार्थियों को मरीज़ों से बात करने, उनकी जांच करने और एक अनुमानित निदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। फिर सीनियर डॉक्टर विद्यार्थियों के साथ मरीज़ के विवरण पर बात करते हैं, उन्हें हिस्ट्री लेने, जांच करने और सही निदान करने के लिए ज़रूरी जांचों का महत्व सिखाते हैं। इस आकलन में एक बड़ा हिस्सा मरीज़ों से बात करने और उनकी जांच-पड़ताल करने का होता है, और परीक्षण इसका सिर्फ एक सीमित हिस्सा होते हैं।

लेकिन आज की प्रैक्टिस में ऐसा लगता है मरीज़-केंद्रित आकलन/जांच पीछे छूट गई है, और प्रबंधन पूरी तरह से परीक्षण-आधारित हो गया है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में, व्यस्त दिनचर्या, ओपीडी और आकस्मिक चिकित्सा विभाग में भीड़भाड़, और बिस्तरों की कमी सर्वांगीण/संपूर्ण निदान (आकलन) को मुश्किल बना देती है, और अक्सर मरीज़ों के लक्षण नज़रअंदाज़ हो जाते हैं। इसके विपरीत, प्राइवेट अस्पताल सबसे गैर-ज़रूरी लक्षणों को बहुत अधिक तवज्जो देते हैं जिससे मरीज़ों को बेवजह बड़ी-बड़ी जांचें और सर्जरी करवानी पड़ती है।

उदाहरण के लिए, एक बिलकुल स्वस्थ अधेड़ आदमी फुंसी (फोड़ा) के साथ एक प्राइवेट क्लीनिक जाता है। सर्जन उसे बताता है कि यह जानलेवा हो सकता है और उसे तुरंत भर्ती करके, ऑपरेशन से इसे हटाने की ज़रूरत है। इसके बाद कुछ और दिनों तक भर्ती रहना होगा क्योंकि एंटीबायोटिक्स और ड्रेसिंग करने की ज़रूरत होगी।

सिस्टम में लापरवाह सरकारी स्वास्थ्य तंत्र और अति-सतर्क निजी स्वास्थ्य तंत्र के बीच सही संतुलन की कमी है।

एमबीबीएस पाठ्यक्रम मरीज़-केंद्रित होना चाहिए, न कि NEET सुपर स्पेशिलिटी-केंद्रित। युवा डॉक्टरों को मरीज़ों के टेस्ट-परीक्षण-स्कैन जैसी जांचों को कराने के लिए आतुर होने की बजाय उनका सर्वांगीण आकलन करने और ‘उनकी बात सुनने’ का महत्व सिखाया जाना चाहिए। आज मरीज़ों की सबसे आम शिकायत यह है कि डॉक्टर उनकी बात नहीं सुनते, या उन्हें बोलने का मौका नहीं देते। अक्सर, डॉक्टर की 80 प्रतिशत बातचीत मरीज़ की स्वास्थ्य रिपोर्टों को दिखाने वाली कंप्यूटर स्क्रीन को देखते हुए होती है। मरीज़ अभी भी एक और सिर्फ एक चीज़ चाहते हैं कि एक सहृदय/हमदर्द डॉक्टर उनका इलाज करे।

फैमिली डॉक्टर की कमी

30 या उससे ज़्यादा उम्र के ज़्यादातर लोग ऐसे डॉक्टर के आस-पास बड़े हुए हैं जो हमारी स्वास्थ्य ज़रूरतों का ध्यान रखते थे – जिन्हें हम अपना ‘फैमिली डॉक्टर’ कहते थे। वायरल बुखार, फूड पॉइज़निंग, डायरिया, पेट दर्द, त्वचा के संक्रमण, सिरदर्द, गैस्ट्राइटिस, या सीने में दर्द – ऐसा लगता था कि उनके पास सभी इलाज हैं। बहुत लंबे समय तक मुझे नहीं पता था कि हमारे फैमिली डॉक्टर असल में एक त्वचा रोग विशेषज्ञ हैं, क्योंकि वे हर एक मेडिकल स्थिति को बहुत अच्छी तरह से जानते थे और उनमें से ज़्यादातर का इलाज कर सकते थे। ट्रेनिंग का मकसद डॉक्टरों को हर काम/इलाज का जानकार बनाना है, भले ही वे किसी एक के विशेषज्ञ न हों।

एक मरीज़ का कई विभागों में, कई परामर्श सत्रों से गुज़रना और फिर भी मुख्य तकलीफ पता न चलना, एक नाकाम तंत्र का द्योतक है। हमारे जैसे देश में, फैमिली डॉक्टर एक अहम कड़ी है – आम बीमारियों को संभालने और स्पेशलिटी क्लीनिक और टर्शियरी केयर में रुकावट को कम करने के बीच।

इससे टेंशन वाले सामान्य सिरदर्द के लिए न्यूरोसर्जन, आम गैस्ट्राइटिस और फूड पॉइज़निंग को संभालने के लिए मेडिकल गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, और छोटे-मोटे यूरीन इंफेक्शन को संभालने के लिए यूरोलॉजिस्ट की ज़रूरत कम हो जाएगी। लगभग हर एमबीबीएस सुपर स्पेशलिटी और सब-स्पेशलिटी की तलाश में है, इसलिए देश में जल्द ही ऐसे ऑलराउंडर की कमी महसूस होने लगेगी जो मरीज़ों के लक्षणों का पता लगा सकें, ज़्यादातर बीमारियों का इलाज कर सकें, और ज़रूरी मामलों को विशेषज्ञ के पास भेज सकें।

भारत में अभी पारिवारिक चिकित्सा का पोस्टग्रेजुएट कोर्स होता है, लेकिन होना तो यह चाहिए कि मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करके निकलने वाला हर डॉक्टर एक काबिल पारिवारिक चिकित्सक हो। पारिवारिक चिकित्सा में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा जैसे कोर्स को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जो मरीज़ों पर ध्यान देने को अहमियत देते हैं। रूरल सेंसिटाइज़ेशन प्रोग्राम, रूरल हेल्थ फेलोशिप, ट्रैवल फेलोशिप और NIRMAN जैसे मौकों को ज़्यादा से ज़्यादा फैलाया जाना चाहिए ताकि युवा डॉक्टरों को समाज में ज़्यादा बड़ी और सार्थक भूमिकाएं निभाने के लिए प्रेरित किया जा सके।

समग्र देखभाल की बहाली

यदि मेडिकल कॉलेजों में ‘समग्र देखभाल’ के विचार को फिर से हासिल करना है, तो इसका हल ज़्यादा प्रोटोकॉल, ज़्यादा स्कैन या ज़्यादा सब-स्पेशलिटीज़ में नहीं हो सकता। इसकी शुरुआत क्लीनिकल मेडिसिन – मरीज़ की हिस्ट्री लेना, शारीरिक जांच करना और सतत देखभाल – की प्राथमिकता को एक ऐसी ज़रूरी काबिलियत के तौर पर फिर से स्थापित करने से होनी चाहिए, जिस पर कोई समझौता न हो।

सबसे पहले, चिकित्सा शिक्षा को इस तरह से डिज़ाइन किया जाना चाहिए कि मरीज़ों के साथ बिताए गए समय को महत्व दिया जाए। क्लीनिकल पोस्टिंग को सिर्फ औपचारिकता तक सीमित होने से बचाया जाना चाहिए। बेडसाइड टीचिंग, देखरेख में हिस्ट्री लेना और संपूर्ण शारीरिक जांच को उतनी ही गंभीरता से परखा जाना चाहिए, जितना प्रवेश परीक्षा और परीक्षा के अंकों को जांचा जाता है। ज़ाहिर है, जिस चीज़ का मूल्यांकन नहीं होता, उसकी कभी कद्र नहीं होती।

दूसरा, मेडिकल कॉलेजों को सिर्फ प्रक्रियाओं के नतीजों के लिए ही नहीं, बल्कि बीमारी की सही पहचान (नैदानिक पूर्णता) के लिए भी जवाबदेह होना चाहिए। अगर कोई मरीज़ बिना किसी एक पक्की पहचान/निदान हुए कई विभागों से गुज़रता है, तो इसकी समीक्षा होनी चाहिए – इसे सिर्फ ‘जटिलता’ कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। नियमित रूप से अलग-अलग विभागों के बीच ऑडिट और बातचीत होनी चाहिए, जिसमें यह पूछा जाए कि क्या छूटा, क्यों छूटा और पहला सवाल पूछने की ज़िम्मेदारी किसकी थी – इससे उपरोक्त गलतियों को दोबारा होने से रोका जा सकता है।

तीसरा, पारिवारिक चिकित्सा और जनरल डॉक्टर की ट्रेनिंग को केंद्र में रखा जाना चाहिए, न कि हाशिए पर। हर एमबीबीएस ग्रेजुएट को मेडिकल कॉलेज से इतना काबिल होकर निकलना चाहिए कि वह एक सक्षम फैमिली डॉक्टर के तौर पर काम कर सके – जो मरीज़ की बात सुन सके, जांच कर सके, प्राथमिकताओं को तय कर सके और ज़रूरत पड़ने पर सही जगह रेफर कर सके। पारिवारिक चिकित्सा के रास्तों, ग्रामीण फेलोशिप और समुदाय-आधारित ट्रेनिंग प्रोग्राम को बढ़ाना और मान्यता देना, स्वास्थ्य व्यवस्था को मज़बूत बनाने का एक अहम हिस्सा है।

चौथा, स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टरों को उस कानूनी डर से बचाना चाहिए, जिसकी वजह से वे देखभाल करने की बजाय मरीज़ों को दूसरे डॉक्टरों के पास भेज देते हैं। आत्महत्या की कोशिशों, पैलिएटिव देखभाल के मामलों और जटिल सामाजिक स्थितियों में कानूनी डर की बजाय नैतिक साहस की ज़रूरत होती है। कानूनी ढांचों और संस्थागत नेतृत्व को ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि मरीज़ की देखभाल करना, उसे दूसरे डॉक्टर के पास भेजने से ज़्यादा सुरक्षित लगे।

आखिर में, हमें एक कड़वी सच्चाई का सामना करना होगा: टेक्नॉलॉजी ने सोचने-समझने की क्षमता की जगह ले ली है। टेस्ट-स्कैन जैसी जांच-पड़ताल हमेशा क्लीनिकल तर्क के आधार पर होनी चाहिए – न कि उसकी जगह ले लेनी चाहिए। गुदा की जांच कोई महंगी नहीं है, इसमें किसी मशीन की ज़रूरत नहीं होती, फिर भी यह एक बुज़ुर्ग को अपना हाथ, अपनी गरिमा और अपनी बची हुई ज़िंदगी खोने से बचा सकती थी। किसी मेडिकल कॉलेज की असली पहचान इस बात से नहीं होती कि उसमें कितने विभाग हैं या उसके कितने आईसीयू कितने आधुनिक हैं, बल्कि इस बात से होती है कि जब कोई मरीज़ वहां आता है, तो क्या वह कॉलेज सबसे बुनियादी सवाल का जवाब दे पाता है: “समस्या क्या है?” और “अभी आपके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी क्या है?” जब तक हम ऐसी व्यवस्थाएं फिर से नहीं बनाते जो इस सवाल को पूछने की अनुमति दें और इसकी मांग भी करें तब तक ‘संपूर्ण देखभाल’ अस्पताल की दीवारों पर लिखा एक खोखला वादा ही बनकर रह जाएगा, जो मरीज़ के लिए कभी पूरा नहीं होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या खून के थक्के कृत्रिम तरीके से जम सकते हैं?

म तौर पर जब त्वचा कटने पर खून बहना शुरू हो जाता है तो सामान्यत: कुछ देर बाद बहाव बंद हो जाता है और चोट की जगह पर खून का थक्का जम जाता है। इसमें चोट के स्थान पर तो खून का बहाव रुक जाता है, जबकि दूसरे अंगों में रक्त संचार अपनी गति से होता रहता है। चिकित्सा विज्ञान में इसे हीमोस्टेसिस कहते हैं। रक्तस्राव रोकने की यह प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। सबसे पहले रक्त वाहिनियां सिकुड़ती हैं – यानी चोट के स्थान की रक्तवाहिनी सिकुड़ती है ताकि बहाव कम किया जा सके। इसके बाद प्लेटलेट्स चिपककर गुच्छा बना लेती हैं। प्लेटलेट्स रक्त की कोशिकाएं हैं जिनका मुख्य कार्य क्षतिग्रस्त रक्त नलिकाओं की मरम्मत करना है। इनके चिपककर गुच्छा बनाने से दीवार जैसी अस्थाई संरचना बन जाती है। अंत में, ‘फाइब्रिन जाल’ बनता है। प्लेटलेट्स के गुच्छे पर रेशेदार प्रोटीन फाइब्रिन एक जाली बना देता है। ये जालियां ही खून के थक्के को मज़बूत बनाकर रक्तस्राव बंद कर देती हैं।

हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार वैज्ञानिकों ने हीमोस्टेसिस को ज़्यादा प्रभावी बनाने का प्रयास किया है। उन्होंने ‘क्लिक केमिस्ट्री’ तकनीक का इस्तेमाल करके चूहों पर प्रयोग किए। दावा है कि रक्तस्राव रोकने की यह तकनीक जिसे ‘क्लिक क्लॉटिंग’ नाम दिया गया है, लाल रक्त कोशिकाओं को आपस में जोड़कर रक्त के थक्के कम समय में बना देती है। परीक्षण के दौरान, चूहों का रक्तस्राव प्राकृतिक प्रक्रिया के मुकाबले ज़्यादा तेजी से रुक गया। हालांकि प्राकृतिक रूप से यह कार्य प्लेटलेट्स कोशिकाओं का है, लेकिन उसमें थक्का बनने की क्रिया धीमी, कमज़ोर और अस्थायी होती है, और आपातकालीन स्थिति या गहरी चोट के दौरान व्यर्थ खून बहना जानलेवा साबित होता है।

पूर्व में, वैज्ञानिकों का ध्यान प्लेटलेट आधारित तकनीक पर था। लेकिन इस परीक्षण से वैज्ञानिकों को लगता है कि लाल रक्त कोशिकाओं को संशोधित कर सुरक्षित और बेहतर हीमोस्टेसिस किया जा सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि लाल रक्त कोशिकाएं अधिक लचीली और टिकाऊ होती हैं। इसलिए वैज्ञानिकों ने प्रभावी हीमोस्टेसिस के लिए लाल रक्त कोशिकाओं को बेहतर विकल्प माना।

क्या हैक्लिक केमिस्ट्री’?

दरअसल, ‘क्लिक केमिस्ट्री’ रासायनिक अभिक्रियाओं का समूह है जिसमें दो या अधिक अणु आपस में तुरंत और सटीक तरीके से जुड़ जाते हैं। यह बहुत तेज़, सरल और सुरक्षित है। इसमें कोशिकाओं में कुछ खास कार्यात्मक समूहों को डाले जाते हैं, जिससे वे समूह कार्य के अनुरूप, लक्ष्य अनुसार भूमिका निभाते हैं व दूसरे अणुओं या क्रियाओं से हस्तक्षेप नहीं करते। यह शरीर की सामान्य क्रियाओं में कोई बाधा नहीं डालती।

भविष्य में इस शोध के सफल होने से चिकित्सा में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। खून का बहाव चुटकियों में रोक सकेंगे। दुर्घटनाओं, युद्ध क्षेत्र, और लंबी सर्जरी के दौरान होने वाले गंभीर रक्तस्राव, जो जीवन और मृत्यु का फैसला करता है, का नियंत्रण हो पाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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