इंसान बेहोशी में भी सीख सकते हैं!

शीर्षक पढ़ते ही मन में यह सवाल उठता है: क्या ऐसा सचमुच मुमकिन है? हाल ही में हुए एक शोध में वैज्ञानिकों ने ऐसी ही चौंका देने वाली जानकारी को साझा करते हुए पुरानी समझ को चुनौती दी है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि साधारण बेहोशी वाली दवा देने के बावजूद भी इंसानी दिमाग (Human Brain) सामान्य अवस्था जैसा सक्रिय (Concious) रहता है। यहां तक कि दिमाग बेहोशी की हालत में भी संकेतों को समझता और आगे का अनुमान लगाता है। पिछले कुछ अध्ययनों में यह पता लगाया जा चुका है कि दिमाग के संवेदना-ग्राही हिस्से बेहोशी की हालत में इंद्रियों के संकेतों से सरल ध्वनियों को दर्ज कर सकते हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि क्या दिमाग बेहोशी की हालत में समझ और सीख भी सकता है।

इसी का पता लगाने के लिए बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के तंत्रिका वैज्ञानिक समीर शेठ और उनके साथियों ने सात ऐसे मरीज़ों पर अध्ययन किया, जिनका मिर्गी के इलाज के लिए मस्तिष्क का ऑपरेशन किया जा रहा था। सातों को प्रोपोफोल (Propofol) नामक दवा (जनरल एनेस्थीसिया) से बेहोश करके उनके दिमाग की गतिविधि को रिकॉर्ड किया गया।

इस अध्ययन को दो समूहों में बांटकर किया गया था। पहले समूह में, बेहोशी की हालत वाले तीन प्रतिभागियों को अलग-अलग आवृत्ति की बार-बार दोहराई जाने बीप सुनाई गई और बीच-बीच में कुछ अन्य ध्वनियां। दस मिनट तक मस्तिष्क की तंत्रिका गतिविधियां रिकॉर्ड करने से पता चला कि समय के साथ ‘बेहोश’ दिमाग के हिप्पोकैम्पस (Hippocampus) हिस्से में बीप को अन्य ध्वनियों से अलग पहचानने और उनकी अलग-अलग आवृत्तियों के बीच अंतर करने की क्षमता बढ़ती गई। अर्थात लगता है कि दिमाग अचेतन सीखने की क्षमता रखता है।

शेष चार प्रतिभागियों को कुछ वार्तालाप के हिस्से सुनाए गए। दिमागी रिकॉर्डिंग में देखा गया कि कुछ तंत्रिकाएं (Neurons) शब्दों के विशेष हिस्सों पर प्रतिक्रिया दे रहीं थीं (जैसे संज्ञाओं को बाकी शब्दों से अलग पहचानना)। एक शोधकर्ता के अनुसार, ‘बेहोशी (Unconcious) में भी प्रतिभागी यह अनुमान लगाने में समर्थ थे कि अगला शब्द क्या हो सकता है’। आखिर में, बेहोश प्रतिभागियों और सामान्य (बाहोश) प्रतिभागियों के आंकड़ों की तुलना की गई। देखा गया कि सामान्य और बेहोश, दोनों ही तरह के प्रतिभागियों के दिमागों का बर्ताव लगभग एक जैसा रहा।

यह दर्शाता है कि दिमाग का एक हिस्सा – हिप्पोकैम्पस (जो नई यादें बनाने और सीखने की क्षमता के लिए जिम्मेदार है), बेहोश हालत में भी जानकारी का आकलन और अनुमान लगाने में सक्षम है। वैज्ञानिक अभी अन्य तरह से काम करने वाले निश्चेतकों पर भी प्रयोग करना चाहेंगे ताकि और अधिक दृढ़ प्रमाण मिलें जो इस प्रयोग के परिणामों की पुष्टि कर सकें।

इस जानकारी का इस्तेमाल चिकित्सा क्षेत्र में किया जा सकता है। इन आंकड़ों की मदद से ऐसे मरीज़ों का उपचार संभव हो सकेगा जो कोमा या निष्क्रिय हालत से पीड़ित हैं। इससे दिमाग के क्षतिग्रस्त हिस्सों को छोड़कर, बाकी बचे हुए सही हिस्सों को कृत्रिम रूप से सक्रिय करने में मदद मिल सकेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एड्स वायरस से निपटने का नया प्रयास

वैसे तो एड्स वायरस (ह्युमैन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस यानी एच.आई.वी.) (HIV) पर किए गए अनुसंधान ने हमें ऐसी कई दवाइयां मुहैया कराई हैं जो वायरस को काबू में रखती हैं और उसे हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को तहस-नहस करने से रोके रखती हैं। दुनिया भर में करीब 4 करोड़ लोग एच.आई.वी. के साथ जी रहे हैं और कोई इलाज नहीं खोजा जा सका है। आज तक इलाज करके मात्र 11 लोगों को वायरस से मुक्त किया जा सका है। यह स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण (Stem cell transplant) के ज़रिए संभव हुआ है। दिक्कत यह है कि स्टेम कोशिका उपचार का उपयोग आसान नहीं है।

अब एच.आई.वी./एड्स (AIDS) सम्मेलन में प्रस्तुत कुछ निष्कर्ष एक नई राह सुझा रहे हैं। कुछ अध्ययन प्रयोगशालाओं में किए गए हैं और कुछ अध्ययन मरीज़ों पर भी किए गए हैं। इनमें एक नए विचार का इस्तेमाल किया गया है।

आम तौर पर एड्स वायरस कोशिका में प्रवेश करने के बाद संक्रमित कोशिका में ऐसे परिवर्तन करता है कि वे उसकी उपस्थिति को भांपने और भांपकर स्वयं को नष्ट करने में असफल रहती हैं। यदि कोशिकाएं स्वयं को नष्ट करें तो उनके अंदर बैठे वायरस भी खत्म हो जाएंगे। यदि वायरस की इस करामात से पार पा लें तो काम आसान हो जाएगा।

यह सही है कि वर्तमान में उपलब्ध दवाइयां एच.आई.वी. का दमन इतनी हद तक कर देती है कि रक्त परीक्षण (Blood Test) में वह नज़र नहीं आता। लेकिन वह संक्रमित टी-कोशिकाओं (Infected T-cells) और मैक्रोफेजों में बना रहता है और अपना जेनेटिक कोड व्यक्ति के गुणसूत्रों में पिरो देता है। जैसे ही व्यक्ति उपचार बंद करता है ये सुप्त वायरस अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगते हैं और जल्दी ही लाखों वायरस रक्त में पहुंच जाते हैं। कई संक्रमित कोशिकाएं इन वायरसों को बाहर निकालने की प्रक्रिया में या प्रतिरक्षा तंत्र के हमले में मारी जाती हैं, लेकिन कुछ जीवित रह जाती है।

नई रणनीति टी-कोशिकाओं व मैक्रोफेज में पाए जाने वाले ऐसे सेंसर्स पर टिकी है जो सूक्ष्मजीवों को ताड़ते हैं। इन्हें कार्ड-8 (CARD8) कहते हैं। ये मुख्य रूप से प्रोटीएज़ (Protease) नामक एंज़ाइम को पहचानते हैं जो नव-निर्मित प्रोटीन्स को तोड़ता है ताकि नए वायरस बनाए जा सकें। जैसे ही कार्ड-8 किसी वायरस प्रोटीन की उपस्थिति भांपता है, वह एक किस्म की कोशिकीय खुदकुशी की प्रक्रिया शुरू करवा देता है जिसके चलते नए वायरसों का निर्माण अस्त-व्यस्त हो जाता है। इस प्रक्रिया को पायरोप्टोसिस (Pyroptosis) कहते हैं। 

एच.आई.वी. अपना प्रोटिएज़ दो एक-सी इकाइयों को जोड़कर बनाता है। 2021 में साइन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र में वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के लियांग शान और उनके साथियों ने बताया गया था कि कार्ड-8 (Card-8) सिर्फ दो इकाइयों के जुड़ने पर बने डाइमर को ही पहचानता है। वायरस इसका फायदा उठाते हैं – वे दो इकाइयों को जोड़ने की प्रक्रिया को तब तक मुल्तवी रखते हैं जब तक कि वायरस कण मेज़बान कोशिका से बाहर न झांकने लगे। शान की टीम ने यह भी बताया था कि दो वर्तमान एच.आई.वी. रोधी दवाइयां (एफेवाइरिनेज़़ और रिल्पिवायरिन) किसी तरह से डाइमर (Dimer) निर्माण की इस प्रकिया को जल्दी करवा देती हैं। उस समय तो किसी ने इस खोज की उपचारात्मक संभावना पर ध्यान नहीं दिया था लेकिन अब इस पर चर्चा हो रही है।

कई औषधि निर्माताओं ने ऐसी अधिक शक्तिशाली दवाइयों पर काम भी शुरू कर दिया है। जैसे टारगेटेड एक्टिवेटर ऑफ सेल किल (TACK) पर ध्यान दिया जा रहा है। 2023 में मर्क कंपनी ने साइन्स ट्रांसलेशन मेडिसिन में बताया था कि उसने ऐसा अणु खोज लिया है जो प्रोटिएज़ को डाइमराइज़ करवाने में एफेवाइरिनेज़ (Efavirenz) से कई गुना शक्तिशाली है। कंपनी इसका परीक्षण ऐसे लोगों पर कर रही है जिन्हें पहले कोई उपचार नहीं मिला है। 

दूसरी ओर, कोलंबिया विश्वविद्यालय के डेविड हो एक दोतरफा रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसमें TACK को एक अन्य तरीके के साथ जोड़ गया है। यह दूसरा तरीका है सुप्तावस्था पलट एजेंट (Latency reversal agents LRA) पर आधारित। ये ऐसे एजेंट होते हैं जो वायरस की सुप्तावस्था (latency) को समाप्त करके उन्हें अपनी प्रतिलिपियां बनाने को उकसाते हैं। इसके पीछे विचार यह है कि जिन कोशिकाओं में वायरस तेज़ी से प्रतिलिपियां बनाएंगे, उन्हें प्रतिरक्षा तंत्र नष्ट कर देगा या वे स्वयं ही फट जाएगी। लेकिन अब तक इस तरह से वायरस का जखीरा कम करने में सफलता सीमित रही है।

हो की प्रयोगशाला में बेहतर LRA बनाने पर काम चल रहा है। वहां सुप्त संक्रमित कोशिकाओं के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जो ऐसे कोशिकीय संकेतों को शुरू करवा दें जो वायरस को अपनी प्रतिलिपि बनाने को उकसाएं। लेकिन प्रयोगशाला में एच.आई.वी. संक्रमित लोगों से ली गई कोशिकाओं में अकेली एंटीबॉडी कारगर नहीं रही। ये कोशिकाएं ऐसे व्यक्तियों की थीं जो उपचार ले रहे थे और वायरस को पूरी तरह नियंत्रित कर रहे थे। लेकिन हो ने बताया है कि जब उन्होंने साथ में TACK औषधि मिला दी तो वायरल आरएनए (Viral RNA) की मात्रा तेज़ी से कम हुई।

हो का कहना है कि एच.आई.वी. संक्रमण की स्थिति पर असर डालने के लिए LRA और टैक का उपयोग शायद ज़रूरी न हो।

रिट्रोवायरस (Retrovirus) और अन्य मौकापरस्त संक्रमणों पर एक सम्मेलन में वॉशिंग्टन विश्वविद्यालय मेडिसिन की प्रिया लाल ने बताया कि उनकी टीम ने सात ऐसे एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्तियों को शामिल किया जो विभिन्न वायरस रोधी दवाइयों और एफेवाइरिनेज़ की मदद से वायरस पर काबू किए हुए थे। सुप्त रूप से संक्रमित कोशिकाओं के प्रति संवेदी तकनीकों की मदद से पता चला कि 4 महीने के उपरांत 6 व्यक्तियों में सुप्त संक्रमित कोशिकाएं 20 से 50 प्रतिशत तक कम हो गई थीं। शोधकर्ताओं ने स्वीकार किया है कि इतनी गिरावट किसी व्यक्ति को रोगमुक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है लेकिन यह इस विचार का प्रमाण है कि प्रोटिएज़ को सक्रिय करने वाले शक्तिशाली कारकों का विकास करना उपयोगी होगा। कई औषधि निर्माताओं ने इस दिशा में काम करना शुरू भी कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

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स्वास्थ्य: मात्र सुविधाओं, व्यवस्थाओं से आगे

ग्लोरजियो विंस्टन गौड़ा

रवरी 2026 के पहले सप्ताह में मैंने छत्तीसगढ़ के रायगढ़ ज़िले के धरमजयगढ़ ब्लॉक के दूरदराज़ आदिवासी गांवों में कुछ समय बिताया था। उन दिनों मैंने जो देखा, जो अनुभव किया, उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य सम्बंधी कार्यों के प्रति मेरे नज़रिए को किसी व्याख्यान या पाठ्यपुस्तक से कहीं ज़्यादा प्रभावित किया। मैंने जो देखा, अनुभव किया उसने सार्वजनिक स्वास्थ्य को एक नए नज़रिए से देखने-समझने में मेरी मदद की।

मैं सिद्धांतों यानी स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक निर्धारक, गरीबी, भौगोलिक स्थिति और शिक्षा आदि के संयुक्त प्रभाव का अच्छे से अध्ययन करके इस क्षेत्र में गया था। मैंने इसकी रूपरेखा तैयार की थी, इसके चित्र बनाए थे और भोपाल में अपने विश्वविद्यालय की कक्षाओं में इन ढांचों की रूपरेखा पर चर्चा भी की थी। लेकिन, इस मैदानी अध्ययन के बाद मुझे यह समझ में आया कि हर आंकड़े के पीछे एक उलझी हुई, सख्त और किसी भी रूपरेखा की तुलना में कहीं अधिक जटिल ज़िंदगी होती है।

ये कोई अनोखी जगहें नहीं हैं। ये साधारण गांव हैं। यहां अभी भी बुनियादी सुविधाएं नहीं पहुंच पाई हैं – जैसे, अच्छी सड़कें, मोबाइल सिग्नल, आसान पहुंच वाले अस्पताल और सुचारू संस्थाएं – जो हमें आसानी से उपलब्ध हैं और उन्हें हम उतना महत्व नहीं देते। दूरी हमेशा किलोमीटर में नहीं नापी जाती। कभी-कभी इसे ‘कितने वर्षों से उपेक्षित है’ के रूप में नापा जाता है, इसे हर महत्त्वपूर्ण सूची में हमेशा अंतिम स्थान पर रहने की संग्रहित तकलीफ के रूप में भी नापा जाता है।

हम अक्सरसमुदायआधारित तरीकोंके बारे में बातें करते हैं। लेकिन इन शब्दों का असली मतलब आपको तभी समझ आता है, जब आप अपना लैपटॉप छोड़कर, पक्की सड़कों पर चलना छोड़कर, घने जंगल से होते हुए किसी ऐसे गांव तक पहुंचते हैं, जहां पिछले मॉनसून के बाद से अब तक कोई एम्बुलेंस नहीं पहुंची है।

ओंगना गांव में एक मां के साथ हुई त्रासदी

ओंगना गांव में लगभग 1200 लोग रहते हैं। इनमें बिरहोर (हाशिए का एक जनजातीय समूह), ओरांव और कंवर समुदाय के लोग शामिल हैं। यहां तीन आंगनवाड़ी केंद्र हैं। जिनमें तीन से छह वर्ष की आयु के कुल 59 बच्चे पंजीकृत हैं। मेरे चारों दौरों के दौरान तीनों केंद्रों पर मुझे पांच या छह बच्चे ही मिले। यह पंजीकृत संख्या का मुश्किल से दस प्रतिशत था।

यहां की व्यवस्था इस अनुपस्थिति की आदी हो चुकी है। इस अनुपस्थिति के लिए हमेशा एक जैसी ही सफाई दी जाती है: आदिवासी परिवार अपने बच्चों को खेतों में, जंगलों में, या जहां दिन में काम पर जाते हैं, वहां अपने साथ ले जाते हैं। यह एक स्थापित तथ्य-सा बन गया है और इसे बिना किसी जांच के कार्यक्रम सम्बंधी रिपोर्टों में मान लिया जाता है। कोई नहीं पूछता कि ऐसे (आंगनवाडी) केंद्र के होने का मतलब क्या है, जहां रजिस्टर में खानापूर्ति कर दी जाती है किंतु बच्चे होते ही नहीं। इसे लेकर कोई भी इतना चिंतित नहीं है कि इसके कारणों का पता लगाए।

स्थानीय आशा कार्यकर्ताओं को ग्राम स्वास्थ्य, स्वच्छता और पोषण दिवस (VHSND) की तैयारी में मदद करते हुए मेरी मुलाकात एक महिला से हुई। वह 31 साल की थी, चार महीने की गर्भवती थी और वह सातवीं बार गर्भवती थी। इससे पहले के छह बच्चों में से चार जीवित थे। उसने प्रसव-पूर्व देखभाल के लिए पंजीकरण नहीं कराया था। उसका अपना आधार कार्ड भी खो गया था। ऐसा होने पर भारत में प्रशासनिक कामों में बड़ी अड़चनें आती हैं। आधार कार्ड होने से लगभग हर सरकारी लाभ को प्राप्त करना आसन हो जाता है – जैसे पोषण सहायता, नगद हस्तांतरण और अस्पताल में प्रसव सुविधा या प्रसव के दौरान मिलने वाली अन्य सुविधाएं। आधार कार्ड विहीन व्यक्ति व्यवस्था की नज़रों में ओझल हो जाते हैं, भले ही व्यवस्था उनसे चंद सौ मीटर दूरी पर ही क्यों न हो।

मितानिन (छत्तीसगढ़ में आशा कार्यकर्ता को मितानिन कहते हैं) और पड़ोसियों से बात करके मैंने उस महिला की स्थिति को बेहतर ढंग से समझने की कोशिश की। वह और उसका पति शराब की लत से जूझ रहे थे। गरीबी और शराब पीने की लत इस कदर आपस में गुंथी हुई थी कि यह कहना मुश्किल था कि किस वजह से कौन सी समस्या पैदा हुई। इन समुदायों में नशे की लत के बारे में नैतिक दृष्टिकोण के अलावा शायद ही कभी किसी अन्य दृष्टिकोण से चर्चा की गई होगी। ओंगना में यह समस्या हर जगह देखने को मिलेगी और बीते सालों में यहां यह आम हो गई है। ये सभी चीज़ें दैनिक जीवन में इस तरह से घुलमिल गई हैं कि सार्वजनिक स्वास्थ्य हस्तक्षेपों का इनसे कुछ लेना-देना ही नहीं रह गया है।

फिर यह भी पता चला, जिसके लिए मैं तैयार नहीं था, कि उसका छठा बच्चा, जो कि मात्र 9 महीने का था, पानी की टंकी में डूबकर मर गया था। क्योंकि, उसकी मां नशे की हालत में उस बच्चे को पानी पिलाने की कोशिश कर रही थी। उसके हाथों से छूटकर बच्चा टंकी में गिर गया था और उसे घंटों बाद इसका पता चला था, जब उसके बड़े बेटे ने टंकी की ओर इशारा करके पूछा कि बच्चा हिल क्यों नहीं रहा है।

मैं झूठ नहीं कहूंगा, पहले तो मैंने भी उसे नैतिक आधार पर तौला (जज किया)। यह मेरे जैसे एक ऐसे व्यक्ति की सहज प्रतिक्रिया होगी जो रोकथाम, ज़िम्मेदारी निभाने और इससे अलग क्या किया जा सकता है सोचने के लिए प्रशिक्षित किया गया है। इसलिए, मेरे अंदर भी यह प्रवृत्ति सहज रूप से तुरंत आई और मुझे यह उचित भी लगी। मुझे यह समझने में अधिक समय लगा कि मेरे सामने वास्तव में क्या चल रहा है: मेरे सामने एक ऐसी महिला थी जो ऐसी दिल दहला देने वाली परिस्थितियों में जीवित बची हुई थी, जिसकी हममें से अधिकतर लोग कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। वह बिना किसी सहारे के, बिना किसी समझदार साथी के और बिना किसी समर्थन के, अपने शरीर में सातवां बच्चा पाल रही थी। वह एक ऐसी महिला थी जो पहले ही अपने दो बच्चे खो चुकी थी।

अगली सुबह जब वह स्वास्थ्य केंद्र पर नहीं आई, तो मैं एक पुरुष मितानिन प्रशिक्षक के साथ उसके घर गया। जब हम वहां पहुंचे, तो उसका पति दिन शुरू होने से पहले ही नशे में धुत था। वह एक टूटी हुई लकड़ी से उस महिला को पीटने की धमकी दे रहा था। उसने कहा कि उसकी पत्नी ने VHSND में जाने से इनकार कर दिया है। उसकी नशे की हालत में, हमारे पास सच्चाई जानने का कोई तरीका नहीं था। हालांकि, हम उसे शांत कराने में कामयाब रहे। मैं उस महिला को स्वास्थ्य केंद्र ले गया, जहां ग्रामीण स्वास्थ्य आयोजक (RHO, छत्तीसगढ़ में सहायक नर्स दाई/बहुउद्देशीय कार्यकर्ताओं का पदनाम) ने उसकी गर्भावस्था का पंजीकरण किया और आवश्यक जांचें कीं। इस सब में लगभग दो घंटे लगे। हमारे इस प्रयास ने उसे यह समझने में मदद की कि स्वास्थ्य केंद्र की देख-रेख में हुई गर्भावस्था और पहले की उन गर्भावस्थाओं के बीच क्या अंतर है जो बिना किसी स्वास्थ्य केंद्र की देख-रेख के हुई थीं।

पीछे मुड़कर देखता हूं तो सबसे ज़्यादा यही बात चौंकाती है कि यह सब लगभग न होने की कगार पर था – अगर उसका नाम मितानिन की सूची में न होता, अगर हमने उसकी गैरहाज़िरी पर ध्यान न दिया होता, अगर मैं अपने शुरुआती फैसले को ही आखिरी मान लेता और सोच लेता कि यह परिवार हमारी पहुंच से बाहर है।

हस्तक्षेप छोटा-सा था, लेकिन उसके लिए कितने ‘अगर-मगर’ पार करने पड़े थे।

प्राय: सार्वजनिक स्वास्थ्य का काम ऐसे ही परिवारों तक पहुंचना तो होता है, जिन्हें समाज पहले ही छोड़ चुका होता है, जिनकी कोई आवाज़ नहीं होती, जिनकी मुश्किलें किसी की नज़र में नहीं आतीं; और तो और, जिनका अस्तित्व तक जैसे किसी के लिए मायने नहीं रखता।

भौगोलिक परिस्थितियां

कनकुला धरमजयगढ़ से लगभग 28 किलोमीटर दूर है। यहां मोबाइल नेटवर्क नहीं आता है। यहां जाने वाली सड़क, सड़क कहने लायक भी नहीं है। कच्चा, पगडंडी सरीखा रास्ता घने जंगलों, सूखी नदी और धंसती रेत से होकर जाता है। इस इलाके में मोटरसाइकिल का जाना भी मुश्किल है। इस गांव में 61 परिवार हैं और आबादी 217 है। मानसून के दौरान, यह क्षेत्र स्वास्थ्य व्यवस्था के नक्शे से पूरी तरह गायब हो जाता है, क्योंकि, सारे रास्ते डूब जाते हैं और कोई भी स्वास्थ्य कार्यकर्ता हफ्तों तक यहां नहीं पहुंच पाता।

मैंने स्वास्थ्य सुविधाओं में बाधा पैदा करने वाली भौगोलिक कटाव की परिस्थितियों के बारे में पढ़ा था। लेकिन, मैंने कनकुला में इसे अलग तरह से समझा। कटाव सिर्फ दूरी से नहीं होता – वह उन तमाम चीज़ों के मिले-जुले असर से होता है जो वहां तक कभी पहुंच ही नहीं पाईं: हर वह संदेश/सूचना जो कभी पहुंची नहीं, हर वह कोशिश जो पहुंच योग्य इलाके की सीमा से आगे न बढ़ सकी, हर वह योजना जो सड़क के पास रहने वालों को ध्यान में रखकर बनाई गई है।

जब लोगों को टीकाकरण के लिए प्रेरित करने के लिए मैं आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के साथ घर-घर गया तो पाया कि हर बार  आंगनवाड़ी  कार्यकर्ता दरवाज़ा खटखटाती, अंदर से “नहीं” का जवाब सुनकर आगे बढ़ जातीं। ना तो लोग ही अपने ‘न’ के जवाब का कोई स्पष्टीकरण देते और ना ही आंगनवाड़ी कार्यकर्ता उन्हें समझाने का प्रयास करती। जब मैंने पूछा कि वे आगे क्यों बढ़ जाती हैं, तो आंगनवाड़ी कार्यकर्ता ने सीधे कहा: “वे नहीं आएंगे।” उनकी आवाज़ में कोई कड़वाहट नहीं थी। बस एक निराशा थी – वह निराशा जो वर्षों तक वही दरवाज़े बार-बार खटखटाने और वही जवाब पाने के बाद पैदा होती है। उन्होंने यह विश्वास करना बंद कर दिया था कि कभी कोई दरवाज़ा खुलेगा। और, मैं इसके लिए उन्हें दोष नहीं दे सकता था।

मैंने खुद परिवारों से बात करने की अनुमति मांगी। मैंने पाया कि उनके मना करने का कारण बहुत सीधा और तर्कसंगत था। उनका कहना था कि “इंजेक्शन लगने के बाद बच्चों को बुखार आ जाता है। हम टीकाकरण नहीं करवाना चाहते।”

यह अज्ञानता नहीं थी। बल्कि, गांववासियों का एक अनुभवजन्य सत्य था। इन परिवारों ने बच्चों को टीके लगवाने के बाद हल्का बुखार आते देखा था। किसी ने उन्हें यह नहीं समझाया था कि वास्तव में टीका लगने के बाद बुखार आना सही है, यही होना चाहिए। बुखार एक प्रक्रिया है, जिसके द्वारा रोग प्रतिरोधक क्षमता विकसित हो रही होती है, वह अभ्यास कर रही होती है, सुरक्षा के लिए तैयार हो रही होती है। इस सही जानकारी के अभाव में, उन्होंने अपना स्वयं का स्पष्टीकरण गढ़ लिया था और वह सुसंगत था। यह बात एक मां से दूसरी मां तक फैल गई और पूरे गांव ने इस पर बात को एक प्रामाणिक सत्य के रूप में स्वीकार कर लिया। यह बात गांव के लोगों के लिए एक अनुभवजन्य सत्य की तरह विश्वसनीय और निर्विवादित थी। आप इसे केवल उनका ‘भ्रम’ कहकर खारिज नहीं कर सकते। यह ऐसी बात थी, जिस पर समुदाय के लोगों ने अपने पास उपलब्ध साक्ष्य के आधार पर सोच-समझ कर अपनी यह धारणा बनाई थी।

यह सार्वजनिक स्वास्थ्य के संदर्भ में सामाजिक रचनावाद (social constructivism) का एक अच्छा उदाहरण है। बीमारी, उपचार और शरीर के बारे में हमारी मान्यताएं निर्वात में नहीं बनती हैं। वे साझा अनुभव, सामुदायिक चर्चा और पीढ़ी-दर-पीढ़ी एक-दूसरे को सुनाई जाने वाली कहानियों के ज़रिए बनती हैं। कनकुला में, ‘टीके से बुखार आता है’ की धारणा कोई गलतफहमी नहीं थी; यह सामाजिक रूप से निर्मित सत्य था, जो इस गांव में पीढ़ी-दर-पीढ़ी सुनाई गई कहानियों के आधार पर पुष्ट हुआ था। इसका कारण था कि यहां कोई भी बाहरी स्वास्थ्य सूचना कभी भी भरोसेमंद ढंग से लोगों के पास नहीं पहुंची थी। यह बात समझ लें तो आपके काम करने का तरीका बदल जाएगा। आप उन्हें गलत साबित करने के लिए उनके पास नहीं जाएंगे। बल्कि, आप उन्हें सुनने और समझने के लिए उनके पास जाएंगे – यह समझने के लिए कि लोगों ने जो देखा है, उसके आधार पर उन्हें वह बात क्यों सही लगी। फिर, जो समझ पहले से मौजूद है, उसके समांतर कुछ नया निर्माण करने के उद्देश्य से उनके बीच जाएंगे। सामुदायिक ज्ञान को अज्ञानता कहकर उसे खारिज करने से वह गायब नहीं हो जाता। यह बस संवाद का दरवाज़ा बंद करता है।

मैंने पहले पुरुषों के साथ समय बिताया। मैंने उन्हें सुना और बातचीत के माध्यम से उनके साथ एक सहजता स्थापित की। इस मेल-जोल को बढ़ाने की दिशा में, मैंने उनसे उन विषयों पर भी हंसी-मज़ाक किया जो स्वास्थ्य से नहीं जुड़े थे। फिर, मैंने उन्हें समझाया कि टीका कैसे काम करता है। मैंने उन्हें बुखार आने के कारणों के बारे में समझाया। जिसका परिणाम यह हुआ कि सुबह जंगल जाने की योजना बना रहे तीन परिवार टीकाकरण करवाने के लिए आ गए।

बाद में, पुरुष RHO ने मुझे बताया कि ये परिवार वर्षों से टीकाकरण के दिन भाग जाते थे। किसी शत्रुता या हठधर्मी विरोध के कारण नहीं। बल्कि, इसलिए कि कभी किसी ने उन्हें इतने इत्मीनान और ईमानदारी से, टीकाकरण का फायदा नहीं समझाया था।

इन समुदायों और पूरे स्वास्थ्य तंत्र के बीच दूरी केवल भौगोलिक दूरी नहीं है। यह दूरी बरसों तक उन्हें नज़रअंदाज़ करने, सूचनाओं से वंचित रखने से पैदा हुई है। यह दूरी उन संस्थाओं ने पैदा की है जिन तक पहुंच पाना कभी आसान नहीं रहा और उन योजनाओं ने भी पैदा की जो इन्हें ध्यान में रखकर कभी बनाई ही नहीं गईं। इस दूरी को पाटना निरंतर चलने वाली, चमकदमक से रहित प्रक्रिया है। यह अक्सर रिपोर्टों में दर्ज़ नहीं होती, न ही इससे सुर्खियां बनती हैं। लेकिन मेरा मानना है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य की असली ज़मीन यहीं है। इस पर चर्चा घर के दरवाज़े पर, पहाड़ी पर, सूखी नदी के किनारे होती है और उन जगहों पर होती है जहां सड़क नहीं पहुंचती।

ज़मीनी स्तर पर कार्य

गरीबी, भौगोलिक स्थिति, साक्षरता, अवसर जैसे सामाजिक निर्धारकों पर कक्षाओं में होने वाली चर्चाएं गलत नहीं हैं। लेकिन जब तक कि आप इन्हें किसी खास व्यक्ति के संदर्भ में, किसी खास घर के संदर्भ में और किसी खास सुबह साकार होते नहीं देख लेते तब तक ये अमूर्त सिद्धांत ही बने रहते हैं। जैसे – एक शराबी पति, जिसके हाथ में टूटी हुई लकड़ी का टुकड़ा है। आंगनवाड़ी केंद्र में टूटा और बेकार पड़ा हुआ ग्रोथ मॉनिटरिंग यंत्र (विकास निगरानी उपकरण), जिसके चलते यह मापना मुश्किल हो जाता है कि स्वास्थ्य केंद्र पर आने वाले बच्चे उम्र के हिसाब बढ़ रहे हैं या नहीं। ये कोई अपवाद नहीं हैं। बल्कि, ये काम का अभिन्न हिस्सा हैं।

मैं बार-बार यही बात दोहराता हूं कि कितना कुछ सक्रिय मौजूदगी पर निर्भर करता है – सक्रिय मौजूदगी यानी शारीरिक, धैर्यपूर्ण और बिना चमक-दमक वाली उपस्थिति। कनकुला के परिवारों को किसी अभियान की ज़रूरत नहीं थी। उन्हें बस एक ईमानदार बातचीत की ज़रूरत थी। ओंगना की महिला को किसी नई नीति की ज़रूरत नहीं थी। उसे बस किसी ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो बिना किसी पूर्वाग्रह के एक आम मंगलवार की सुबह उसके दरवाज़े पर आए और उसे यह बताए कि उसकी गर्भावस्था कितना मायने रखती है, उसके लिए ज़रूरी स्वास्थ्य सम्बंधी प्रयास किए जा रहे हैं।

ज़मीनी स्तर पर काम करने वाले सार्वजनिक स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के पास जो ज्ञान होता है, वह किसी डैशबोर्ड (औपचारिक डिजिटल माध्यम) द्वारा नहीं समझा जा सकता है। क्योंकि, ज़मीनी स्तर के स्वास्थ्य कार्यकर्ता ही ये बात जानते हैं कि किन परिवारों ने दरवाज़े पर दी गई दस्तक का जवाब देना बंद कर दिया है और क्यों। वे जानते हैं कि जुलाई में कौन सी सड़कें नदी में डूब जाती हैं। वे जानते हैं कि किसका पति शराब पीता है, कौन-सा बच्चा तीन महीने से नहीं तौला गया है, कौन-सा परिवार मुलाकात का जवाब देगा और किन घरों को अतिरिक्त सहायता की ज़रूरत है। यह ज्ञान कारगर हस्तक्षेप का आधार बनता है, जो वास्तव में काम करता है। जब हम थकान के कारण या किसी अन्य कारण से कार्यकर्ताओं के अनुभवों को नज़रंदाज़ कर देते हैं, तो हम स्वास्थ्य प्रणाली में लंबे समय के अनुभव के साथ अर्जित महत्वपूर्ण जानकारी गंवा देते हैं। जबकि स्‍वास्‍थ्‍य प्रणाली इसी के आधार पर काम करती है।(स्रोत फीचर्स)

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भारत के मेडिकल कॉलेजों में कमज़ोर होती समग्र देखभाल

रॉयसन डिसूज़ा

85 साल के एक बुज़ुर्ग को उपशामक देखभाल (पैलिएटिव केयर) के लिए गांव के एक द्वितीयक (सेकंडरी) स्वास्थ्य केंद्र में भर्ती कराया गया। कथित तौर पर आत्महत्या के इरादे से कीटनाशक खाने के बाद उनके बाएं हाथ में गैंग्रीन (रक्त संचार रुकने से ऊतकों का मरना) हो गया था। वे ऐसे क्षेत्र के रहवासी हैं जहां बहुतायत में हाथी पाए जाते हैं और उनके यहां से नज़दीकी तृतीयक (टर्शियरी) स्वास्थ्य केंद्र 5 घंटे की दूरी पर है।

चूंकि आत्महत्या के मामलों को मेडिको-लीगल केस माना जाता है और स्वास्थ्य कार्यकर्ता इनमें हाथ डालने से घबराते हैं, इसलिए उन्हें एक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र से दूसरे उच्च स्वास्थ्य केंद्र रेफर किया जाता रहा; अंत में उन्हें मेडिकल कॉलेज हॉस्पिटल में भर्ती किया गया। तब तक कीटनाशक उनके शरीर में फैलकर अवशोषित हो चुका था, और उसके बुरे असर की शुरुआत हो चुकी थी। इस वजह से उन्हें गहन देखभाल इकाई (ICU) में रखने की ज़रूरत पड़ी।

इलाज के दौरान, उनके बाएं हाथ में खून पहुंचाने वाली एक मुख्य धमनी में रक्त का थक्का जम गया था, जिसकी वजह से उन्हें बहुत दर्द हो रहा था और हाथ का रंग बदल गया था। इस स्थिति को तुरंत संभाला गया और थक्का हटाने के लिए सर्जरी की गई। हालांकि, हाथ को जो नुकसान पहले ही हो चुका था उसे ठीक नहीं किया जा सकता था, और इससे हाथ में पूरी तरह से गैंग्रीन हो गया था। वे मेडिकल कॉलेज में कुछ और दिन भर्ती रहे, इस दौरान कई विभागों से उनके लिए परामर्श लेकर टेस्ट करवाए गए और फिर उन्हें मेडिकल कॉलेज से छुट्टी देकर रुलर पैलिएटिव केयर सेंटर में भेज दिया गया।

जब इस मरीज़ की देखभाल कर रहे डॉक्टरों ने सर्जिकल परामर्श के लिए मुझसे संपर्क किया, तो मुझे लगा कि शायद गैंग्रीन के बारे में बात करने हेतु किया होगा। लेकिन मुझे हैरानी हुई कि यह संपर्क उस दर्द के लिए था जिसकी शिकायत मरीज़ अपने गुदा नाल (एनल कैनाल) में कर रहा था। मरीज़ को देखने और उसकी जांच करने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मेडिकल कॉलेज ने मुख्य समस्या पर तो ध्यान ही नहीं दिया था और इससे मरीज़ की स्थिति पूरी तरह से बिगड़ चुकी थी और बाकी सभी जटिलताएं हुई थीं। मरीज़ ने कीटनाशक इसलिए खाया था क्योंकि उसे गुदा नाल में बहुत ज़्यादा दर्द और रक्तस्राव हो रहा था। जितने दिन वे भर्ती रहे किसी ने इस बारे में पूछने का सोचा तक नहीं। बस एक साधारण सी गुदा (रेक्टल) जांच से पता चल गया कि इसका असली कारण रेक्टल कैंसर था जो बहुत बढ़ चुका था और जिससे बहुत ज़्यादा दर्द और मल त्यागने में दिक्कत हो रही थी।

इस हादसे ने मुझे एक अत्यंत परेशानीजनक सवाल पर सोचने को मजबूर कर दिया कि हमारे मेडिकल संस्थानों में ‘समग्र देखभाल’ (कॉम्प्रिहेंसिव केयर) से हमारा क्या मतलब है – खासकर मेडिकल कॉलेज, जिन्हें गर्व होता है कि वे समग्र देखभाल और उपचार देते हैं।

समग्र देखभाल का महत्व

लंबे समय से भारत में मेडिकल कॉलेजों को हर मुमकिन चिकित्सकीय अवस्था की समग्र/तफसील से पड़ताल और प्रबंधन का केंद्र माना जाता रहा है। ये हर उस मरीज़ के लिए एक भरोसेमंद आखरी सहारा/उम्मीद होते हैं जिन्हें अलग-अलग स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों द्वारा (जब मामला उनके वश में नहीं रहता तब) यहां रेफर किया गया होता है।

मेडिकल कॉलेज में, मरीज़ को अलग-अलग स्तर के कई डॉक्टर देखते हैं। यह अक्सर मरीज़ के लिए परेशानी का सबब होता है, क्योंकि उसे एक ही जानकारी कई बार देनी पड़ती है और हरेक के हिसाब से जांच करानी पड़ती है। जिस मेडिकल कॉलेज में मैंने ट्रेनिंग ली, वहां अगर किसी मरीज़ का कोई (पूर्व) नियोजित ऑपरेशन होना होता था तो उसकी कम से कम पांच स्तरों पर जांच होती थी – पहले बाह्य मरीज़ क्लिनिक में प्रशिक्षु/कंसल्टेंट द्वारा, उसके बाद इंटर्न, जूनियर रेसिडेंट, सीनियर रेसिडेंट, कंसल्टेंट, और आखिर में एडमिशन के बाद यूनिट के हेड द्वारा।

यह व्यवस्था मुख्य रूप से जूनियर डॉक्टरों की ट्रेनिंग के लिए बनाई गई थी, लेकिन इससे भी ऊपर यह कारण था कि यह व्यवस्था मरीज़ का सही निदान करने और सबसे सही इलाज देने में एक असरदार प्रक्रिया के तौर पर काम करती है। उदाहरण के लिए, हर्निया के ऑपरेशन के लिए भर्ती हुए एक मरीज़ में आंत के कैंसर का पता इसलिए चला था क्योंकि एक प्रशिक्षु ने उसकी समग्र जांच की थी। वैसे, यह भी आम प्रथा है कि सर्जरी के मरीज़ों की डायबिटीज़, हाइपरटेंशन, दिल की बीमारी, या थायरॉइड जैसी कई अन्य मेडिकल स्थितियों की (संपूर्ण) जांच हो क्योंकि सर्जरी के समय इन स्थितियों के बारे में पता होना ज़रूरी होता है।

एक और उदाहरण देता हूं। मेरी रेसिडेंसी के दौरान एक मरीज़ को कोलेक्टोमी (कैंसर उपचार के लिए बड़ी आंत का हिस्सा निकालना) के लिए भर्ती किया गया था। इस ऑपरेशन में एक बड़ी दुविधा की स्थिति यह थी कि कहीं कैंसर दूसरे अंगों में फैला न हो। यदि फैल चुका है तो ऐसे में सर्जरी से इलाज/फायदा नहीं होगा। ऐसे में मरीज़ के लिए कीमोथेरेपी सही रहेगी।

कभी-कभी उन्नत किस्म के स्कैन भी लसिका ग्रंथियों जैसे छोटे अंगों में कैंसर के फैलाव को पकड़ नहीं पाते। मरीज़ की जांच की प्रक्रिया में टीम के सबसे जूनियर सदस्य ने लसिका ग्रंथि में कुछ संकेत देखे और कहा कि शायद कैंसर फैल रहा है। यह सही निकला, और मरीज़ को गैर-ज़रूरी सर्जरी से बचा लिया गया और उसे आगे यथोचित इलाज के लिए भेजा गया।

इससे सिर्फ 10 साल आगे चलें तो ऐसा लगता है कि मेडिकल कॉलेजों की समग्र जांच की बात पूरी तरह खत्म हो गई है। मरीज़ को समय देना, उनकी हिस्ट्री (बीमारी और उससे जुड़ी अन्य जानकारियां) लेना और जांच करना निहायत ज़रूरी है, जिसे कम करके नहीं आंका जा सकता। कई तरह के परीक्षण और स्कैन आ जाने के बावजूद, मरीज़ की हालत पता लगाने में एक अच्छी हिस्ट्री और जांच-पड़ताल करना बहुत ज़रूरी होता है।

शुरुआती उदाहरण में, अगर मरीज़ की पूरी हिस्ट्री ली गई होती, तो कोई भी यह बता देता कि उसकी समस्या मल त्यागने से जुड़ी थी, जिसमें रेक्टल जांच करनी पड़ती और बीमारी आसानी से पता चल जाती। मरीज़ को कई अलग-अलग विशेषज्ञ विभागों ने देखा, लेकिन किसी ने भी सबसे ज़रूरी बात जानने की ज़हमत नहीं उठाई कि असल में उसने अपनी जान लेने जैसा इतना बड़ा कदम उठाया क्यों?

हाल के दिनों में क्या बदला

मौजूदा चिकित्सा शिक्षा तंत्र लगातार जांच के दायरे में रहा है। (अधिक जानने के लिए निवारण की वेबसाइट पर ‘The Pathophysiology of Declining Medical Education in India/भारत में घटती मेडिकल शिक्षा की पैथोफिज़ियोलॉजी’ लेख पढ़ें – https://nivarana.org/reality-check/the-pathophysiology-of-declining-medical-education-in-india)

कई कारण हैं जिनमें से एक पर आम तौर पर बहस होती है: क्लीनिकल पोस्टिंग के दौरान मरीज़ों के साथ तफसील से समय बिताने पर ज़ोर न होना। एमबीबीएस के पाठ्यक्रम का एक बड़ा हिस्सा मरीज़ों पर केंद्रित पढ़ाई का है, जिसे क्लीनिक्स कहा जाता है। इसमें विद्यार्थियों को मरीज़ों से बात करने, उनकी जांच करने और एक अनुमानित निदान करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। फिर सीनियर डॉक्टर विद्यार्थियों के साथ मरीज़ के विवरण पर बात करते हैं, उन्हें हिस्ट्री लेने, जांच करने और सही निदान करने के लिए ज़रूरी जांचों का महत्व सिखाते हैं। इस आकलन में एक बड़ा हिस्सा मरीज़ों से बात करने और उनकी जांच-पड़ताल करने का होता है, और परीक्षण इसका सिर्फ एक सीमित हिस्सा होते हैं।

लेकिन आज की प्रैक्टिस में ऐसा लगता है मरीज़-केंद्रित आकलन/जांच पीछे छूट गई है, और प्रबंधन पूरी तरह से परीक्षण-आधारित हो गया है। सरकारी मेडिकल कॉलेजों में, व्यस्त दिनचर्या, ओपीडी और आकस्मिक चिकित्सा विभाग में भीड़भाड़, और बिस्तरों की कमी सर्वांगीण/संपूर्ण निदान (आकलन) को मुश्किल बना देती है, और अक्सर मरीज़ों के लक्षण नज़रअंदाज़ हो जाते हैं। इसके विपरीत, प्राइवेट अस्पताल सबसे गैर-ज़रूरी लक्षणों को बहुत अधिक तवज्जो देते हैं जिससे मरीज़ों को बेवजह बड़ी-बड़ी जांचें और सर्जरी करवानी पड़ती है।

उदाहरण के लिए, एक बिलकुल स्वस्थ अधेड़ आदमी फुंसी (फोड़ा) के साथ एक प्राइवेट क्लीनिक जाता है। सर्जन उसे बताता है कि यह जानलेवा हो सकता है और उसे तुरंत भर्ती करके, ऑपरेशन से इसे हटाने की ज़रूरत है। इसके बाद कुछ और दिनों तक भर्ती रहना होगा क्योंकि एंटीबायोटिक्स और ड्रेसिंग करने की ज़रूरत होगी।

सिस्टम में लापरवाह सरकारी स्वास्थ्य तंत्र और अति-सतर्क निजी स्वास्थ्य तंत्र के बीच सही संतुलन की कमी है।

एमबीबीएस पाठ्यक्रम मरीज़-केंद्रित होना चाहिए, न कि NEET सुपर स्पेशिलिटी-केंद्रित। युवा डॉक्टरों को मरीज़ों के टेस्ट-परीक्षण-स्कैन जैसी जांचों को कराने के लिए आतुर होने की बजाय उनका सर्वांगीण आकलन करने और ‘उनकी बात सुनने’ का महत्व सिखाया जाना चाहिए। आज मरीज़ों की सबसे आम शिकायत यह है कि डॉक्टर उनकी बात नहीं सुनते, या उन्हें बोलने का मौका नहीं देते। अक्सर, डॉक्टर की 80 प्रतिशत बातचीत मरीज़ की स्वास्थ्य रिपोर्टों को दिखाने वाली कंप्यूटर स्क्रीन को देखते हुए होती है। मरीज़ अभी भी एक और सिर्फ एक चीज़ चाहते हैं कि एक सहृदय/हमदर्द डॉक्टर उनका इलाज करे।

फैमिली डॉक्टर की कमी

30 या उससे ज़्यादा उम्र के ज़्यादातर लोग ऐसे डॉक्टर के आस-पास बड़े हुए हैं जो हमारी स्वास्थ्य ज़रूरतों का ध्यान रखते थे – जिन्हें हम अपना ‘फैमिली डॉक्टर’ कहते थे। वायरल बुखार, फूड पॉइज़निंग, डायरिया, पेट दर्द, त्वचा के संक्रमण, सिरदर्द, गैस्ट्राइटिस, या सीने में दर्द – ऐसा लगता था कि उनके पास सभी इलाज हैं। बहुत लंबे समय तक मुझे नहीं पता था कि हमारे फैमिली डॉक्टर असल में एक त्वचा रोग विशेषज्ञ हैं, क्योंकि वे हर एक मेडिकल स्थिति को बहुत अच्छी तरह से जानते थे और उनमें से ज़्यादातर का इलाज कर सकते थे। ट्रेनिंग का मकसद डॉक्टरों को हर काम/इलाज का जानकार बनाना है, भले ही वे किसी एक के विशेषज्ञ न हों।

एक मरीज़ का कई विभागों में, कई परामर्श सत्रों से गुज़रना और फिर भी मुख्य तकलीफ पता न चलना, एक नाकाम तंत्र का द्योतक है। हमारे जैसे देश में, फैमिली डॉक्टर एक अहम कड़ी है – आम बीमारियों को संभालने और स्पेशलिटी क्लीनिक और टर्शियरी केयर में रुकावट को कम करने के बीच।

इससे टेंशन वाले सामान्य सिरदर्द के लिए न्यूरोसर्जन, आम गैस्ट्राइटिस और फूड पॉइज़निंग को संभालने के लिए मेडिकल गैस्ट्रोएंटेरोलॉजिस्ट, और छोटे-मोटे यूरीन इंफेक्शन को संभालने के लिए यूरोलॉजिस्ट की ज़रूरत कम हो जाएगी। लगभग हर एमबीबीएस सुपर स्पेशलिटी और सब-स्पेशलिटी की तलाश में है, इसलिए देश में जल्द ही ऐसे ऑलराउंडर की कमी महसूस होने लगेगी जो मरीज़ों के लक्षणों का पता लगा सकें, ज़्यादातर बीमारियों का इलाज कर सकें, और ज़रूरी मामलों को विशेषज्ञ के पास भेज सकें।

भारत में अभी पारिवारिक चिकित्सा का पोस्टग्रेजुएट कोर्स होता है, लेकिन होना तो यह चाहिए कि मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस करके निकलने वाला हर डॉक्टर एक काबिल पारिवारिक चिकित्सक हो। पारिवारिक चिकित्सा में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा जैसे कोर्स को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जो मरीज़ों पर ध्यान देने को अहमियत देते हैं। रूरल सेंसिटाइज़ेशन प्रोग्राम, रूरल हेल्थ फेलोशिप, ट्रैवल फेलोशिप और NIRMAN जैसे मौकों को ज़्यादा से ज़्यादा फैलाया जाना चाहिए ताकि युवा डॉक्टरों को समाज में ज़्यादा बड़ी और सार्थक भूमिकाएं निभाने के लिए प्रेरित किया जा सके।

समग्र देखभाल की बहाली

यदि मेडिकल कॉलेजों में ‘समग्र देखभाल’ के विचार को फिर से हासिल करना है, तो इसका हल ज़्यादा प्रोटोकॉल, ज़्यादा स्कैन या ज़्यादा सब-स्पेशलिटीज़ में नहीं हो सकता। इसकी शुरुआत क्लीनिकल मेडिसिन – मरीज़ की हिस्ट्री लेना, शारीरिक जांच करना और सतत देखभाल – की प्राथमिकता को एक ऐसी ज़रूरी काबिलियत के तौर पर फिर से स्थापित करने से होनी चाहिए, जिस पर कोई समझौता न हो।

सबसे पहले, चिकित्सा शिक्षा को इस तरह से डिज़ाइन किया जाना चाहिए कि मरीज़ों के साथ बिताए गए समय को महत्व दिया जाए। क्लीनिकल पोस्टिंग को सिर्फ औपचारिकता तक सीमित होने से बचाया जाना चाहिए। बेडसाइड टीचिंग, देखरेख में हिस्ट्री लेना और संपूर्ण शारीरिक जांच को उतनी ही गंभीरता से परखा जाना चाहिए, जितना प्रवेश परीक्षा और परीक्षा के अंकों को जांचा जाता है। ज़ाहिर है, जिस चीज़ का मूल्यांकन नहीं होता, उसकी कभी कद्र नहीं होती।

दूसरा, मेडिकल कॉलेजों को सिर्फ प्रक्रियाओं के नतीजों के लिए ही नहीं, बल्कि बीमारी की सही पहचान (नैदानिक पूर्णता) के लिए भी जवाबदेह होना चाहिए। अगर कोई मरीज़ बिना किसी एक पक्की पहचान/निदान हुए कई विभागों से गुज़रता है, तो इसकी समीक्षा होनी चाहिए – इसे सिर्फ ‘जटिलता’ कहकर नज़रअंदाज़ नहीं किया जाना चाहिए। नियमित रूप से अलग-अलग विभागों के बीच ऑडिट और बातचीत होनी चाहिए, जिसमें यह पूछा जाए कि क्या छूटा, क्यों छूटा और पहला सवाल पूछने की ज़िम्मेदारी किसकी थी – इससे उपरोक्त गलतियों को दोबारा होने से रोका जा सकता है।

तीसरा, पारिवारिक चिकित्सा और जनरल डॉक्टर की ट्रेनिंग को केंद्र में रखा जाना चाहिए, न कि हाशिए पर। हर एमबीबीएस ग्रेजुएट को मेडिकल कॉलेज से इतना काबिल होकर निकलना चाहिए कि वह एक सक्षम फैमिली डॉक्टर के तौर पर काम कर सके – जो मरीज़ की बात सुन सके, जांच कर सके, प्राथमिकताओं को तय कर सके और ज़रूरत पड़ने पर सही जगह रेफर कर सके। पारिवारिक चिकित्सा के रास्तों, ग्रामीण फेलोशिप और समुदाय-आधारित ट्रेनिंग प्रोग्राम को बढ़ाना और मान्यता देना, स्वास्थ्य व्यवस्था को मज़बूत बनाने का एक अहम हिस्सा है।

चौथा, स्वास्थ्य व्यवस्था में डॉक्टरों को उस कानूनी डर से बचाना चाहिए, जिसकी वजह से वे देखभाल करने की बजाय मरीज़ों को दूसरे डॉक्टरों के पास भेज देते हैं। आत्महत्या की कोशिशों, पैलिएटिव देखभाल के मामलों और जटिल सामाजिक स्थितियों में कानूनी डर की बजाय नैतिक साहस की ज़रूरत होती है। कानूनी ढांचों और संस्थागत नेतृत्व को ऐसा माहौल बनाना चाहिए कि मरीज़ की देखभाल करना, उसे दूसरे डॉक्टर के पास भेजने से ज़्यादा सुरक्षित लगे।

आखिर में, हमें एक कड़वी सच्चाई का सामना करना होगा: टेक्नॉलॉजी ने सोचने-समझने की क्षमता की जगह ले ली है। टेस्ट-स्कैन जैसी जांच-पड़ताल हमेशा क्लीनिकल तर्क के आधार पर होनी चाहिए – न कि उसकी जगह ले लेनी चाहिए। गुदा की जांच कोई महंगी नहीं है, इसमें किसी मशीन की ज़रूरत नहीं होती, फिर भी यह एक बुज़ुर्ग को अपना हाथ, अपनी गरिमा और अपनी बची हुई ज़िंदगी खोने से बचा सकती थी। किसी मेडिकल कॉलेज की असली पहचान इस बात से नहीं होती कि उसमें कितने विभाग हैं या उसके कितने आईसीयू कितने आधुनिक हैं, बल्कि इस बात से होती है कि जब कोई मरीज़ वहां आता है, तो क्या वह कॉलेज सबसे बुनियादी सवाल का जवाब दे पाता है: “समस्या क्या है?” और “अभी आपके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी क्या है?” जब तक हम ऐसी व्यवस्थाएं फिर से नहीं बनाते जो इस सवाल को पूछने की अनुमति दें और इसकी मांग भी करें तब तक ‘संपूर्ण देखभाल’ अस्पताल की दीवारों पर लिखा एक खोखला वादा ही बनकर रह जाएगा, जो मरीज़ के लिए कभी पूरा नहीं होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या खून के थक्के कृत्रिम तरीके से जम सकते हैं?

म तौर पर जब त्वचा कटने पर खून बहना शुरू हो जाता है तो सामान्यत: कुछ देर बाद बहाव बंद हो जाता है और चोट की जगह पर खून का थक्का जम जाता है। इसमें चोट के स्थान पर तो खून का बहाव रुक जाता है, जबकि दूसरे अंगों में रक्त संचार अपनी गति से होता रहता है। चिकित्सा विज्ञान में इसे हीमोस्टेसिस कहते हैं। रक्तस्राव रोकने की यह प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। सबसे पहले रक्त वाहिनियां सिकुड़ती हैं – यानी चोट के स्थान की रक्तवाहिनी सिकुड़ती है ताकि बहाव कम किया जा सके। इसके बाद प्लेटलेट्स चिपककर गुच्छा बना लेती हैं। प्लेटलेट्स रक्त की कोशिकाएं हैं जिनका मुख्य कार्य क्षतिग्रस्त रक्त नलिकाओं की मरम्मत करना है। इनके चिपककर गुच्छा बनाने से दीवार जैसी अस्थाई संरचना बन जाती है। अंत में, ‘फाइब्रिन जाल’ बनता है। प्लेटलेट्स के गुच्छे पर रेशेदार प्रोटीन फाइब्रिन एक जाली बना देता है। ये जालियां ही खून के थक्के को मज़बूत बनाकर रक्तस्राव बंद कर देती हैं।

हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार वैज्ञानिकों ने हीमोस्टेसिस को ज़्यादा प्रभावी बनाने का प्रयास किया है। उन्होंने ‘क्लिक केमिस्ट्री’ तकनीक का इस्तेमाल करके चूहों पर प्रयोग किए। दावा है कि रक्तस्राव रोकने की यह तकनीक जिसे ‘क्लिक क्लॉटिंग’ नाम दिया गया है, लाल रक्त कोशिकाओं को आपस में जोड़कर रक्त के थक्के कम समय में बना देती है। परीक्षण के दौरान, चूहों का रक्तस्राव प्राकृतिक प्रक्रिया के मुकाबले ज़्यादा तेजी से रुक गया। हालांकि प्राकृतिक रूप से यह कार्य प्लेटलेट्स कोशिकाओं का है, लेकिन उसमें थक्का बनने की क्रिया धीमी, कमज़ोर और अस्थायी होती है, और आपातकालीन स्थिति या गहरी चोट के दौरान व्यर्थ खून बहना जानलेवा साबित होता है।

पूर्व में, वैज्ञानिकों का ध्यान प्लेटलेट आधारित तकनीक पर था। लेकिन इस परीक्षण से वैज्ञानिकों को लगता है कि लाल रक्त कोशिकाओं को संशोधित कर सुरक्षित और बेहतर हीमोस्टेसिस किया जा सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि लाल रक्त कोशिकाएं अधिक लचीली और टिकाऊ होती हैं। इसलिए वैज्ञानिकों ने प्रभावी हीमोस्टेसिस के लिए लाल रक्त कोशिकाओं को बेहतर विकल्प माना।

क्या हैक्लिक केमिस्ट्री’?

दरअसल, ‘क्लिक केमिस्ट्री’ रासायनिक अभिक्रियाओं का समूह है जिसमें दो या अधिक अणु आपस में तुरंत और सटीक तरीके से जुड़ जाते हैं। यह बहुत तेज़, सरल और सुरक्षित है। इसमें कोशिकाओं में कुछ खास कार्यात्मक समूहों को डाले जाते हैं, जिससे वे समूह कार्य के अनुरूप, लक्ष्य अनुसार भूमिका निभाते हैं व दूसरे अणुओं या क्रियाओं से हस्तक्षेप नहीं करते। यह शरीर की सामान्य क्रियाओं में कोई बाधा नहीं डालती।

भविष्य में इस शोध के सफल होने से चिकित्सा में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। खून का बहाव चुटकियों में रोक सकेंगे। दुर्घटनाओं, युद्ध क्षेत्र, और लंबी सर्जरी के दौरान होने वाले गंभीर रक्तस्राव, जो जीवन और मृत्यु का फैसला करता है, का नियंत्रण हो पाएगा। (स्रोत फीचर्स)

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प्रोटीन, फाइबर और सेहत से भरपूर मटर

टर हमारे यहां खूब खाई जाती है। और अब वैज्ञानिक इसके फायदों के बारे में बता रहे हैं। मटर सस्ती, आसानी से उपलब्ध, लंबे समय टिकने योग्य और पोषक तत्वों से भरपूर है। नियमित रूप से खाएं तो यह सेहत के लिए काफी फायदेमंद हो सकती है।

मटर की सबसे बड़ी खासियत इसका प्रोटीन है। प्रोटीन शरीर की मांसपेशियों को मज़बूत रखने, रोगों से लड़ने, शरीर की मरम्मत करने और पेट को लंबे समय तक भरा रखने में मदद करते हैं। दाल या चने जितना तो नहीं, लेकिन मटर कई दूसरी सब्ज़ियों से अधिक प्रोटीन देती है। पकी हुई हरी मटर में भी और सूखी मटर में भी काफी प्रोटीन होता है।

मटर में शरीर के लिए ज़रूरी सभी महत्वपूर्ण अमीनो एसिड पाए जाते हैं। हालांकि, इसमें मेथियोनीन नाम का एक अमीनो एसिड कम होता है, इसलिए सिर्फ मटर को ही प्रोटीन का मुख्य स्रोत नहीं माना जाता। लेकिन अलग-अलग तरह का खाना खाएं, तो यह बड़ी समस्या नहीं है।

मटर की एक और बड़ी खासियत इसका फाइबर (रेशा पदार्थ) है। बहुत से लोग पर्याप्त फाइबर नहीं खा पाते, जबकि यह पाचन और शरीर की सेहत के लिए बहुत ज़रूरी है। फाइबर भोजन को पाचन तंत्र में सही तरीके से आगे बढ़ाने में मदद करता है, जिससे कब्ज़ की समस्या कम होती है।

मटर का फाइबर खास तौर पर फायदेमंद होता है क्योंकि इसमें दोनों तरह के फाइबर पाए जाते हैं – घुलनशील और अघुलनशील। अघुलनशील फाइबर पाचन को बेहतर बनाता है और मल को सही तरीके से बाहर निकालने में मदद करता है। वहीं घुलनशील फाइबर पानी में घुलकर जेल जैसा बन जाता है, जिससे खाना धीरे-धीरे पचता है। इससे ब्लड शुगर नियंत्रित रखने और कोलेस्ट्रॉल कम करने में मदद मिल सकती है।

वैज्ञानिक मटर में इसलिए भी रुचि ले रहे हैं क्योंकि यह पेट में मौजूद अच्छे बैक्टीरिया को फायदा पहुंचाती है। इसमें ऐसे फाइबर होते हैं जो अच्छे बैक्टीरिया के लिए भोजन का काम करते हैं और ये स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। यही कारण है कि अब ऐसे खाद्य पदार्थों पर अधिक ध्यान दिया जा रहा है, जो पेट के अच्छे बैक्टीरिया को बढ़ावा देते हैं।

मटर आयरन का भी अच्छा स्रोत है। आयरन की कमी दुनिया में सबसे आम पोषण समस्याओं में से एक है, खासकर महिलाओं में। मटर में गाजर और शिमला मिर्च जैसी कई सब्ज़ियों से अधिक आयरन होता है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि हरी मटर का एक अतिरिक्त फायदा यह भी है कि इसमें फाइटिक एसिड कम होता है। यह पदार्थ शरीर में आयरन के अवशोषण को कम करता है। हरी मटर में आयरन और फाइटिक एसिड का संतुलन बेहतर होता है, और शरीर इसमें मौजूद आयरन का आसानी से इस्तेमाल कर सकता है।

प्रोटीन, फाइबर और आयरन के अलावा मटर में पॉलीफिनॉल और फ्लेवोनॉयड जैसे पदार्थ भी होते हैं। ये शरीर में शोथ कम करने और कोशिकाओं को नुकसान से बचाने में मदद करते हैं। फ्लेवोनॉयड प्रचुर खाद्य पदार्थ दिल की सेहत बेहतर रखने, रक्त शर्करा नियंत्रित रखने और कुछ गंभीर बीमारियों के खतरे को कम करने में मदद कर सकते हैं।

पोषण के अलावा मटर की एक बड़ी खासियत यह भी है कि यह सस्ती और इस्तेमाल में आसान होती है। इसे ज़रूरत के हिसाब से थोड़ी-थोड़ी मात्रा में पकाया जा सकता है, इसलिए खाने की बर्बादी भी कम होती है।

मटर को खाने में शामिल करना आसान है और इसे बच्चों से लेकर बड़े तक सब पसंद करते हैं। और अब तो इसके फायदे पोषण विशेषज्ञ भी गिना रहे हैं। तो देरी किस बात की। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सेप्सिस का अदृश्य खतरा और हमारी स्वास्थ्य रणनीति

कुमार सिद्धार्थ एवं डॉ. सम्‍यक जैन

मारे देश के मौजूदा स्वास्थ्य परिदृश्य में, जहां डेंगू, मलेरिया, टीबी, हृदय रोग और मधुमेह़ जैसी बीमारियां पहले से ही भारी दबाव पड़ रही हैं, सेप्सिस एक ऐसा खतरा बनकर उभर रहा है जो अक्सर नज़र नहीं आता, लेकिन सबसे घातक साबित होता है। देश के अस्पतालों में सेप्सिस अब एक रोज़मर्रा की हकीकत बन चुका है। गहन चिकित्‍सा कक्ष (ICU) में भर्ती हर चौथा मरीज़ किसी न किसी संक्रमण से उपजी सेप्सिस जैसी गंभीर स्थिति में पाया जाता है। नवजात मृत्यु के कारणों की पड़ताल करें तो लगभग एक-तिहाई मौतें सीधे सेप्सिस से जुड़ी मिलती हैं।

ग्रामीण भारत में यह स्थिति और भी घातक रूप ले लेती है, जहां प्राथमिक स्वास्थ्य सुविधाएं सीमित हैं और संक्रमण की पहचान अक्सर देर से होती है। कई बार समय पर एंटीबायोटिक या सही हस्तक्षेप न मिलने पर मरीज़ कुछ ही घंटों में मौत के करीब पहुंच जाता है।

दरअसल, सेप्सिस को केवल संक्रमण की जटिलता मानना भ्रामक है। यह एक ऐसी स्थिति है जहां शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली अनियंत्रित होकर अपने ही अंगों पर हमला करने लगती है। शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया अनियंत्रित हो जाती है और संक्रमण से पैदा हुई सूजन पूरे शरीर में फैलकर दिल, फेफड़ों, गुर्दों और मस्तिष्क जैसे महत्वपूर्ण अंगों को नुकसान पहुंचा देती है। सरल शब्दों में, सेप्सिस संक्रमण के कारण शरीर का अपने ही खिलाफ सिर उठाना है। और, यही इसे इतना घातक और उग्र बना देता है।

हमारे देश में सेप्सिस की भयावहता इस बात से भी साफ होती है कि अस्पताल में भर्ती गंभीर मरीज़ों के लिए मृत्यु का बड़ा कारण अब यही बनता जा रहा है। नवजात शिशुओं में यह स्थिति कई बार जन्म के तुरंत बाद होने वाले संक्रमणों से उभरती है। प्रसूता-गर्भवती महिलाओं, बुजु़र्गों और कमज़ोर प्रतिरक्षा वाले लोगों के लिए इसका खतरा कई गुना बढ़ जाता है।

हमारे देश में सेप्सिस एक छिपी महामारी की तरह व्यवहार करता है। अन्य बीमारियों की अंतिम और सबसे घातक कड़ी अक्सर यही बनता है। इसलिए सेप्सिस को अब एक अलग स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में देखने और राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए विशेष रणनीति तैयार करने की ज़रूरत है।

आंकड़े बताते है कि दुनिया भर में सेप्सिस हर साल एक करोड़ से ज़्यादा लोगों की जान लेता है, जो वैश्विक मौतों का पांचवां हिस्सा है। विश्‍व स्‍वास्‍थ्‍य संगठन और ग्‍लोबल बर्डन ऑफ डिसीज़ के अध्ययन बताते हैं कि सेप्सिस की सर्वाधिक मार निम्न और मध्यम आय वाले देशों पर पड़ती है, जिनमें भारत भी शामिल है। अपने देश में वर्ष 2017 के अनुमान के अनुसार लगभग 1 करोड़ 13 लाख मामले और करीब 29 लाख मौतें इसी के कारण हुई हैं। आईसीयू आधारित शोध बताते हैं कि देश के गहन चिकित्सा कक्षों में हर दो में से एक मरीज़ किसी न किसी रूप में सेप्सिस से पीड़ित पाया जाता है, और ऐसे मरीज़ों की अस्पताल मृत्यु दर 30–40 प्रतिशत तक पहुंच जाती है। नवजात शिशुओं में यह बोझ और भी भारी है, जहां करीब एक-तिहाई मौतें संक्रमणजन्य सेप्सिस से जुड़ी पाई गई हैं।

लेकिन इस गंभीर बीमारी पर हो रहे शोध की स्थिति निराशाजनक है। दुनिया और भारत में, सेप्सिस पर होने वाला अधिकांश वैज्ञानिक कार्य अभी भी उस पुराने ढांचे पर टिका है, जिसमें चूहों, खरगोशों, गिनी पिगों, बकरियों, कुत्तों और कभी-कभी बंदरों तक पर प्रयोग किए जाते हैं। इन जानवरों को प्रयोगशाला की परिस्थितियों में जबरन संक्रमित किया जाता है, आंतों में छेद करके बैक्टीरिया फैलाया जाता है या उन्हें बैक्टीरियल ज़हर की उच्च खुराक दी जाती है। लेकिन मानव शरीर की प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया इन जानवरों से इतनी अलग है कि ऐसे प्रयोगों से मिलने वाले परिणाम मनुष्यों पर लगभग कभी लागू नहीं होते।

पिछले चार दशकों में डेढ़ सौ से अधिक ऐसी दवाएं रही हैं, जो चूहों या अन्य जंतुओं में सेप्सिस का इलाज करती दिखीं, पर मानव परीक्षण में पूरी तरह असफल रहीं। अंतर्राष्ट्रीय शोध संस्थानों, जैसे – स्टैनफोर्ड, हार्वर्ड, एनआईएच आदि का निष्कर्ष है कि जंतु-आधारित मॉडल सेप्सिस का मानव स्वरूप समझने के लिए विश्वसनीय साधन नहीं हैं।

अपने देश में भी स्थिति अलग नहीं है। आईसीएमआर के कई प्रतिष्ठित केंद्र, कुछ ऐम्‍स संस्थान और निजी बायोमेडिकल प्रयोगशालाएं आज भी जंतु-आधारित मॉडल को सेप्सिस अध्ययन का आधार बनाए हुए हैं। इन परीक्षणों की पारदर्शिता कम है और उनसे मिलने वाले वैज्ञानिक परिणाम अत्यंत सीमित। जिस बीमारी के कारण अस्पतालों में लाखों मरीज़ चुपचाप मौत के करीब पहुंच रहे हों, उसके शोध का तरीका अगर मानव-प्रासंगिक न हो तो समाधान हमेशा दूर ही बना रहेगा।

अलबत्ता, तस्वीर पूरी तरह निराशाजनक नहीं है। भारत में कुछ वैज्ञानिक संस्थान नई दिशाएं भी टटोल रहे हैं। आईआईटी मद्रास का ऑर्गन्स-ऑन-चिप्स कार्यक्रम, भारतीय विज्ञान संस्थान (आईआईएससी) का सेप्सिस प्रेडिक्शन मॉडल, ऐम्‍स दिल्ली में नवजात सेप्सिस के लिए विकसित बायोमार्कर और कुछ निजी प्रयोगशालाओं में एआई आधारित सेप्सिस अलर्ट सिस्टम ये सब संकेत देते हैं कि भारत आधुनिक, मानव-आधारित विज्ञान अपनाने की दिशा में आगे बढ़ सकता है। दुनिया भर में अब एआई-आधारित निदान और कम्प्यूटेशनल सिमुलेशन को भविष्य की दिशा माना जा रहा है। ये पद्धतियां न केवल अधिक विश्वसनीय हैं, बल्कि जानवरों पर होने वाली क्रूरता और वैज्ञानिक विफलताओं से भी मुक्त हैं।

भारत में सेप्सिस की भयावहता जितनी तेज़ी से बढ़ रही है, उतनी ही तेज़ी से हमें विज्ञान की दिशा बदलने की ज़रूरत है। आधुनिक तकनीकें हमारे सामने उपलब्ध हैं। ज़रूरत सिर्फ यह है कि हम पुरानी, अप्रासंगिक और अमानवीय शोध पद्धतियों को पीछे छोड़कर वैज्ञानिक रूप से अधिक सटीक, मानवीय और प्रभावी मॉडल अपनाएं। सेप्सिस के खिलाफ यह लड़ाई तभी जीती जा सकती है जब हम विज्ञान और संवेदना दोनों के सही मिश्रण के साथ आगे बढ़े। भारत को स्वास्थ्य विज्ञान के इस नए युग में कदम रखने की आवश्यकता है। यह  परिवर्तन न सिर्फ लाखों लोगों की जान बचा सकता है बल्कि अनगिनत जानवरों को अनावश्यक और पीड़ादायक प्रयोगों से भी मुक्त कर सकता है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कॉफी का दिमाग और मूड पर सकारात्मक प्रभाव

हाल ही प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, कॉफी (Coffee) पीने से बात सिर्फ ऊर्जा बढ़ाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह मूड को बेहतर करने, चिंता कम करने और मस्तिष्क के काम करने के तरीके पर भी असर डाल सकती है। एपीसी माइक्रोबायोम आयरलैंड के शोधकर्ताओं के अनुसार कैफीन-युक्त और कैफीन-मुक्त, दोनों तरह की कॉफी पेट के सूक्ष्मजीव-संसार को बदलकर मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बना सकती हैं।

नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित इस शोध में पेट-और मस्तिक (गट–ब्रेन) सम्बंध पर ध्यान दिया गया है। हालांकि कॉफी के फायदे पहले भी बताए जाते रहे हैं, लेकिन यह अध्ययन खास तौर पर दिखाता है कि कॉफी इस सम्बंध को कैसे सीधे प्रभावित करती है।

इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने 62 लोगों पर अध्ययन किया। इनमें से आधे लोग रोज़ 3–5 कप कॉफी पीते थे और बाकी कॉफी नहीं पीते थे। जब कॉफी पीने वालों ने दो हफ्ते तक कॉफी बंद की, तो उनके पेट के बैक्टीरिया में बदलाव दिखा। लेकिन जब दोनों समूहों ने कॉफी पीना शुरू किया, तो दोनों समूहों ने बेहतर मूड, कम तनाव (less stress) और कम अवसाद महसूस किया।

यह भी पता चला कि कॉफी पीने से पेट में पाचन और सेहत के लिए फायदेमंद बैक्टीरिया बढ़ते हैं। यही बदलाव मानसिक स्थिति (Mental Condition) को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि कॉफी का प्रकार भी मायने रखता है – कैफीन-मुक्त कॉफी से याददाश्त और सीखने की क्षमता बेहतर हुई, जिससे पता चलता है कि सिर्फ कैफीन ही नहीं, बल्कि कॉफी में मौजूद अन्य तत्व भी दिमाग के लिए फायदेमंद हैं।

कैफीन-युक्त कॉफी के कुछ अलग फायदे भी देखे गए। इसे पीने वाले लोगों में चिंता कम हुई, सतर्कता बढ़ी (more Attentive) और ध्यान बेहतर हुआ। साथ ही, यह शरीर में सूजन के खतरे को भी कम कर सकती है, जो जीर्ण बीमारियों से जुड़ी होती है।

यह नतीजे पहले के शोधों की भी पुष्टि करते हैं, जिनमें बताया गया था कि संतुलित मात्रा में कॉफी पीने से टाइप 2 डायबिटीज़, दिल की बीमारी और दिमाग से जुड़ी कुछ समस्याओं का खतरा कम हो सकता है। लेकिन यह नया अध्ययन खास तौर पर यह दिखाता है कि कॉफी तुरंत असर डालते हुए मूड और मानसिक स्पष्टता को भी बेहतर बना सकती है, और इसका सम्बंध पेट की सेहत से है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि कॉफी को सिर्फ जागने या ऊर्जा बढ़ाने वाला पेय नहीं समझना चाहिए, बल्कि यह शरीर के कई हिस्सों पर असर डालने वाला एक जटिल खाद्य तत्व है। यह पेट के अच्छे बैक्टीरिया (Good Bacteria) और उनके काम करने के तरीके को बदलकर शारीरिक और मानसिक सेहत दोनों को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।

यह सही है कि इसके लंबे समय के असर को समझने के लिए अभी और शोध की ज़रूरत है, लेकिन अब तक के नतीजे बताते हैं कि सीमित मात्रा में कॉफी पीना – चाहे उसमें कैफीन (Caffeine) हो या न हो – मूड सुधारने और रोज़मर्रा के तनाव को कम करने में मददगार हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हू-ब-हू एक जैसे जुड़वां के बीच पहचान का संकट

पिछले दिनों फ्रांस की एक अदालत में एक अजीबो-गरीब मामला उठा। पढ़ने में अत्यंत फिल्मी लगने वाला यह मामला जब यथार्थ में सामने आया तो खलबली मचना स्वाभाविक था।

हुआ यह कि हत्या के एक मामले में दो में से एक जुड़वा लिप्त था। बंदूक पर से डीएनए प्राप्त हुआ था। डीएनए वह आनुवंशिक पदार्थ होता है जिसकी मदद से सम्बंधित व्यक्ति की पहचान की जा सकती है। किया यह जाता है कि उस डीएनए के कुछ खंडों में क्षार का अनुक्रम पता किया जाता है। इस विधि में डीएनए के 30 विशिष्ट खंडों का क्षार अनुक्रम निकाला जाता है। ऐसा देखा गया है कि इन्हीं 30 खंडों में सबसे अधिक विविधताएं पाई जाती हैं – यानी इन हिस्सों में व्यक्ति-व्यक्ति में सबसे अधिक अंतर देखे जाते हैं और इनके आधार पर तुलना करके व्यक्ति की पहचान की जा सकती है।

लेकिन जब मामला हू-ब-हू एक जैसे या आइडेंटिकल जुड़वां का हो तो बात बदल जाती है। आइडेंटिकल जुड़वा एक ही अंडाणु के, एक ही शुक्राणु से निषेचन से बने भ्रूण के दो भागों में बंटकर अलग-अलग विकसित होने से बनते हैं। यानी इन दोनों में डीएनए एक समान होता है। तो डीएनए के 30 छोटे-छोटे खंडों की तुलना से व्यक्ति विशेष की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। तो क्या किया जाए?

इस संदर्भ में डीएनए के चंद खंडों की बजाय पूरे-के-पूरे डीएनए (यानी समूचे जीनोम) का विश्लेषण मददगार हो सकता है। इस तरीके में वैज्ञानिक यह पता कर सकते हैं कि निषेचित अंडे के विभाजन के बाद डीएनए में किस तरह के उत्परिवर्तन हुए हैं। 2014 में किए गए एक अध्ययन में दो वयस्क जुड़वा के डीएनए में मात्र 5 जेनेटिक अंतर देखे जा सके थे। समूचे जीनोम के विश्लेषण से कुछ मामलों में अदालतों को जुड़वा के बीच भेद करने में मदद ज़रूर मिली है लेकिन इस तरह के विश्लेषण के लिए ज़रूरी होता है कि पर्याप्त मात्रा में डीएनए मिल जाए, जो मिलना काफी मुश्किल होता है।

इस सिलसिले में कुछ शोधकर्ताओं ने माइटोकॉण्ड्रिया में पाए जाने वाले डीएनए की मदद ली है। गौरतलब है कि माइटोकॉण्ड्रिया कोशिकाओं में पाया जाने वाला एक ऐसा उपांग है जिसके पास अपना डीएनए होता है और यह केंद्रक में पाए जाने वाले डीएनए से स्वतंत्र होता है। माइटोकॉण्ड्रिया के डीएनए (mtDNA) में अपेक्षाकृत तेज़ी से परिवर्तन होते हैं। अर्थात जुड़वा संतानें mtDNA के मामले में ज़्यादा अंतर दर्शाती हैं। यूएस की अदालतें आजकल mtDNA के प्रमाणों को स्वीकारने लगी हैं।

इस संदर्भ में डीएनए विश्लेषण की एक और तकनीक पर शोध जारी है। यह देखा गया है कि उम्र के साथ कोशिकाओं के केंद्रक में डीएनए पर अलग-अलग स्थानों पर मिथाइल समूह चस्पा होने लगते हैं। यानी स्वयं डीएनए में तो कोई परिवर्तन नहीं होता लेकिन मिथाइल समूह चस्पा होने के कारण जीन्स की अभिव्यक्ति बदलने लगती है। इन परिवर्तनों को एपिजेनेटिक परिवर्तन कहते हैं और ये व्यक्ति के खानपान, धूम्रपान या शराब सेवन जैसे व्यवहारों के कारण अलग-अलग हो सकते हैं; जुड़वा के बीच भी अंतर आ जाते हैं। इनके आधार पर उन्हें अलग-अलग पहचाना जा सकता है। जैसे दक्षिण कोरिया में वैज्ञानिकों ने 54 नवजात आइडेंटिकल जुड़वा के जीनोम्स का विश्लेषण किया था। एपिजेनेटिक अंतरों के आधार पर वे 54 जुड़वाओं में से 50 के बीच भेद कर पाए थे। यही प्रयोग जब वयस्क जुड़वाओं पर किया गया तो 47 में से 41 जोड़ियों तथा 118 में से 105 जोड़ियों के जुड़वाओं की अलग-अलग पहचाने हो पाई थी।

फ्रांस की अदालत में तो मुकदमा जारी है लेकिन वैज्ञानिक अपने तईं कोशिशों में इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वन्यजीव व्यापार से बढ़ता संक्रमण का खतरा

आंकड़ों से पता चलता है कि स्तनधारियों (mammals species) की ही 2000 से अधिक (वन्य) प्रजातियों का कानूनी और गैर-कानूनी दोनों तरीकों से व्यापार किया जाता है। ज़ाहिर है इस व्यापार से वन्यजीवों का मनुष्य से संपर्क बढ़ा है। अब, एक हालिया अध्ययन में पता चला है कि वर्तमान में व्यापार किए जा रहे वन्य स्तनधारी जीवों में से लगभग आधे ऐसे हैं जिनमें कम से कम एक ऐसा रोगजनक (zoonotic pathogens) है जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकता है। यानी वन्यजीवों का व्यापार हमारी सेहत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। यह पहली बार है जब बड़े स्तर पर यह समझने की कोशिश की गई है कि वन्य-जीव व्यापार और तस्करी (illegal wildlife trafficking) बीमारियों के फैलाव से कितने जुड़े हैं।

यह तो हम जानते हैं कि एचआईवी, इबोला और कोविड-19 जैसी कई बीमारियां जीवों से मनुष्यों में आई हैं। लेकिन अब तक यह ठीक-ठीक नहीं पता था कि यह खतरा कितना बड़ा है। इस अध्ययन में पुराने व्यापार रिकॉर्ड और जीवों से फैलने वाली बीमारियों के डैटा को मिलाकर यह समझने की कोशिश की गई कि किन जीवों के व्यापार से बीमारियों के फैलने की संभावना ज़्यादा होती है।

अध्ययन स्तनधारी जीवों (wild mammals) पर केंद्रित रखा गया क्योंकि इनका उपयोग भोजन, फर, अनुसंधान और पारंपरिक दवाओं में ज़्यादा होता है, और ये जैविक रूप से मनुष्यों से करीब (genetic similarity) हैं। शोध में पाया गया कि व्यापार की जाने वाली 2000 से अधिक प्रजातियों में से लगभग 41 प्रतिशत में ऐसे रोगजनक होते हैं जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकते हैं (infection risk)। जबकि जिन प्रजातियों का व्यापार नहीं होता, उनसे खतरा सिर्फ 6.4 प्रतिशत के करीब है।

अध्ययन में वन्य-जीव व्यापार के तरीकों (trade practices) को भी बहुत महत्वपूर्ण पाया गया है। जीवित जीवों का व्यापार सबसे अधिक जोखिम भरा होता है, क्योंकि इससे मनुष्यों का सीधा संपर्क (direct exposure) संक्रमित जीवों से होता है। दिलचस्प बात यह है कि गैर-कानूनी व्यापार का असर उतना ज़्यादा नहीं पाया गया जितना पहले सोचा जाता था। इसका मतलब है कि कानूनी और नियंत्रित व्यापार (legal wildlife trade) भी बीमारियों के फैलाव में योगदान दे सकता है।

अध्ययन की एक और महत्वपूर्ण बात यह पता चली है कि जितने लंबे समय तक किसी प्रजाति का व्यापार होता रहता है, उतना ही उससे जुड़ा खतरा बढ़ता जाता है। यानी मनुष्यों और वन्य जीवों के बीच लगातार लंबे संपर्क से रोगजनकों को फैलने और इंसानों के अनुकूल बनने (pathogen adaptation) का ज़्यादा मौका मिलता है।

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस शोध से सरकारें बेहतर नियम (wildlife regulations) बना पाएंगी ताकि भविष्य में महामारी (pandemic prevention) के खतरों को कम किया जा सके। अगर अधिक जोखिम वाली प्रजातियों और व्यापार के तरीकों की पहचान हो जाए, तो खतरनाक संपर्क को सीमित किया जा सकता है।

फिर भी सावधानी में ही सुरक्षा है। यह सोचना भी उतना आवश्यक है कि किन जीवों से हमें जीवनदायिनी या निहायत ज़रूरी चीज़ें हासिल हो रही हैं, और कितना व्यापार महज़ शौकिया चीज़ों (exotic pet trade) के लिए हो रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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