उंगलियां चटकाने का सुख और कष्ट

डॉ. सुशील जोशी

उंगलियां चटकाना तो सभी जानते हैं। हालांकि कुछ लोग आदतन ऐसा करते हैं जबकि कुछ नहीं करते। इसके अलग-अलग तरीके भी होते हैं; कुछ लोग उंगलियों को सीधी रखकर उन्हें खींचते हैं, तो कुछ लोग उंगलियों को जोड़ों पर से मोड़कर उन्हें दबाते हैं। परिणाम कुल मिलाकर एक ही होता है – उंगलियों से चटक की आवाज़ आती है और कहते हैं कि इससे सुकून मिलता है। तो सवाल यह उठता है कि यह आवाज़ कहां से आती है और सुकून क्यों मिलता है। साथ में सवाल यह भी है कि क्या उंगलियां चटकाना (knuckle cracking) लंबे समय में नुकसानदायक भी हो सकता है।

दरअसल, उंगलियां चटकाने पर तमाम तरह की क्रियाएं होने लगती हैं। सबसे पहले तो यह देखिए कि चटक की आवाज़ कहां से निकलती है। बात की शुरुआत यह बताकर करना मुनासिब होगा कि वैज्ञानिकों-चिकित्सकों-अस्थि विशेषज्ञों के बीच इस सम्बंध में आम सहमति नहीं है।

हमारे शरीर के जोड़ों में हड्डियों को आपस में जोड़ने की तीन व्यवस्थाएं होती हैं। एक होती है जिसमें हड्डियां तंतुओं या रेशों के ज़रिए जुड़ी होती हैं। कपाल (cranium) की हड्डियों के बीच जोड़ इसी प्रकार के होते हैं। इन जोड़ों में गति नहीं होती। दूसरी होती है जिसमें हड्डियों को उपास्थियों के ज़रिए जोड़ा जाता है। इनमें थोड़ी गति संभव होती है। और तीसरी व्यवस्था में हड्डियों के जोड़ों पर एक रेशेदार कैप्सूल में तरल भरा होता है। कोहनी, घुटनों, कलाइयों, ऐड़ियों के जोड़ इसी प्रकार के होते हैं। हमारी उंगलियों के जोड़ों में भी एक तरल भरा होता है जो उन्हें गति करने में घर्षण से बचाता है। इस तरल को सिनोवियल द्रव (synovial fluid) कहते हैं। इसके अलावा यह एक नरम गद्दी की तरह कार्य करता है और उपास्थियों को पोषण भी पहुंचाता है। जोड़ों में यह तरल न हो या कम हो तो कई तरह की दिक्कतें हो सकती है।

हाथ की संरचना और खास तौर से उसमें हड्डियों की जमावट चित्र 1 की तरह होती है। कलाई और हथेली के जोड़ पर कई सारी हड्डियां होती हैं जिन्हें कार्पल्स कहते हैं। कार्पल्स अनियमित आकार की हड्डियां होती हैं जो अनियमित ढंग जमी होती हैं। इसके बाद आती हैं बेलनाकार मेटाकार्पल्स (metacarpels) जो हथेलियों में जमी होती हैं, और अलग-अलग उंगली की हड्डियों से जुड़ी होती हैं। चार उंगली और एक अंगूठे के लिए पांच मेटाकार्पल्स होती हैं। फिर आती हैं उंगलियों की हड्डियां – फैलेंजेस (phalanges)। चारों उंगलियों में तीन-तीन फेलेंजेस होती हैं जबकि अंगूठे में मात्र 2। मेटाकार्पल्स से लेकर फैलेंजेस तक के सारे जोड़ सिनोवियल होते हैं। चटकाने की मुख्य क्रिया को मेटाकार्पल और फैलेंजेस के जोड़ों पर अंजाम दिया जाता है। इन्हें संक्षेप में एमसीपी (MCP) जोड़ कहते हैं।

चटकाने की क्रिया

उंगलियां चटकाने पर काफी अनुसंधान हुए हैं। इस सामान्य सी क्रिया पर ध्यान देने का प्रमुख कारण यह रहा है कि इसे लेकर तमाम धारणाएं-मान्यताएं हैं, खास तौर से इसके कारण होने वाले नुकसान को लेकर।

1947 में जे. बी. रोस्टन और आर. व्हीलर हैन्स ने जर्नल ऑफ एनाटॉमी में पहली बार MCP जोड़ों की क्रमिक रेडियोग्राफी (sequential radiography) के आधार पर उंगलियां चटकाने के चार चरणों का विवरण दिया था:

विश्राम की अवस्था, जब जोड़ पर कोई बल नहीं लगाया जा रहा है और सतहें लगभग परस्पर संपर्क में होती हैं;

जब थोड़ा बल लगाया जाता है तो जोड़ की सतहें एक-दूसरे से दूर जाने लगती हैं;

बल का परिमाण एक सीमा से अधिक होने पर सतहें इतनी दूर हो जाती हैं कि बीच में एक खाली जगह बन जाती है। तब चटकने की अवस्था आती है;

अंतिम चरण बहाली का होता है जिसके दौरान उंगलियों को फिर से नहीं चटकाया जा सकता। यह चरण लगभग 20 मिनट का होता है।

आवाज़ का उद्गम

एक मत यह है कि सिनोवियल द्रव में गैसें (मुख्यत: कार्बन डाईऑक्साइड और नाइट्रोजन) घुली होती हैं। जब जोड़ों को तेज़ी से खींचा जाता है तो बीच की जगह में एक खाली स्थान पैदा हो जाता है। इस निर्वात की वजह से गैस के बुलबुले (gas bubbles) सिनोवियल द्रव से बाहर निकलकर इस जगह में भर जाते हैं। फिर जब बुलबुले खूब फूल जाते हैं तो अपने ही तनाव की वजह से गुब्बारे की तरह फूट जाते हैं। आवाज़ इन्हीं बुलबुलों के फूटने की होती है। और यही कारण है कि एक बार चटकाने के बाद कुछ समय तक ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि बुलबुलों को फिर से बनने में समय लगता है।

लेकिन… विज्ञान में लेकिन तो हमेशा बना रहता है।  

रोस्टन और हैन्स की परिकल्पना थी कि जोड़ों की सतहों के बीच खाली स्थान पर जलवाष्प (watervapour) भरी होती है। उनका मत था कि आवाज़ जोड़ों की तेज़ गति के कारण उत्पन्न कंपनों से पैदा होती है।

इस संदर्भ में ए. अन्सवर्थ, डी. डावसन और वी. राइट ने अपने प्रयोगों के परिणाम 1971 में एनल्स ऑफ दी रुमेटिक डिसीसेज़ में प्रकाशित करके बताया था कि बुलबुलों का बनना और फूटना ही चटकने की आवाज़ का स्रोत है। जैसे-जैसे जोड़ की सतहें एक-दूसरे से दूर हटती हैं, वहां कम दबाव का क्षेत्र (low pressure zone) बन जाता है। परिणामस्वरूप, द्रव का वाष्पीकरण होता है और द्रव में घुली गैसें बुलबुले बन जाती हैं।

हालांकि इस बात पर सहमति है कि उंगली चटकाने के दौरान जोड़ों पर बुलबुले बनते हैं लेकिन बुलबुलों के बनने की क्रियाविधि और आवाज़ का स्रोत विवाद का विषय रहा है।

जैसे 2015 में अलबर्टा विश्वविद्यालय के ग्रेगरी कॉचुक और उनके साथियों ने चटकाने की प्रक्रिया का एमआरआई अध्ययन किया। यह अध्ययन दस MCP जोड़ों पर किया गया था। उन्होंने चटकने वाली उंगली को एक लंबी लचीली नली में पिरोकर उसका एमआरआई अध्ययन (MRI scan) किया था। शोधकर्ताओं ने पाया कि आवाज़ आने के बाद भी बुलबुला मौजूद था। यानी आवाज़ बुलबुले के निर्माण के समय आई थी, न कि बुलबुला फटने के कारण।

कॉचुक व साथियों ने बुलबुला बनने के कारण के रूप में ट्राइबोन्यूक्लिएशन (tribonucleation) नामक क्रियाविधि सुझाई थी। इसमें होता यह है कि दो सतहें एक आसंजन (चिपकू) बल द्वारा चिपकी होती हैं। जब उन्हें अलग-अलग करने के लिए लगाया जा रहा बल इस आसंजन बल से अधिक हो जाता है तो सतहें अलग-अलग होने लगती हैं लेकिन उन्हें चिपकाकर रखने वाला द्रव उतनी तेज़ी से फैल नहीं पाता। लिहाज़ा वहां वाष्प की एक गुहा (कैविटी) बन जाती है। द्रव में मौजूद गैसें बुलबुले के रूप में बाहर निकलने लगती हैं। इस प्रक्रिया को ट्रायबोन्यूक्लिएशन कहते हैं। लेकिन चटकने की आवाज़ इस खाली स्थान के बनने के समय ही पैदा हो जाती है, उसके वापिस पिचकने से पहले।

इसके बाद 2017 में रॉबर्ट बूटिन और उनके साथियों ने चटकते जोड़ों में सोनोग्राफी की मदद से इकोजेनिक क्षेत्रों की पहचान की। ये वे क्षेत्र होते हैं जो सोनोग्राफी (sonography) करते समय ध्वनि तरंगों को परावर्तित कर देते हैं। उनके अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि बुलबुले बनने में ट्रायबोन्यूक्लिएशन की प्रक्रिया ही क्रियाशील है।

जब कुछ शोधकर्ताओं ने चटकती उंगलियों की जांच अल्ट्रासोनोग्राफी (ultrasonography) से की तो कुछ अलग ही तस्वीर सामने आई। इस अनुसंधान में 40 सहभागी थे (23 पुरुष और 17 महिलाएं)। इनमें से 30 आदतन उंगलियां चटकाने वाले थे जबकि 10 को ऐसी कोई आदत नहीं थी। शोधकर्ताओं ने इन सबका चिकित्सा इतिहास रिकॉर्ड किया – जैसे वे कितनी बार उंगलियां चटकाते हैं, उनकी हाथों की पकड़ कितनी मज़बूत है वगैरह। इसके बाद सभी सहभागियों के एमसीपी जोड़ की अल्ट्रासोनोग्राफी चटकाने के पहले, उसके दौरान और उसके बाद की गई।

प्रयोग के दौरान 40 सहभागियों के 400 एमसीपी जोड़ों का अवलोकन किया गया। 400 एमसीपी में 62 के तोड़ने-मरोड़ने पर चटक की आवाज़ सुनाई पड़ी। साथ में अल्ट्रासाउंड तस्वीर में चटकाने की क्रिया के दौरान एक चमक दिखाई दी। अल्ट्रासाउंड तस्वीरों में उत्पन्न चमक की मदद से रेडियोलॉजिस्ट सुनाई पड़ने वाली चटक को 94 प्रतिशत सटीकता से पहचान पाए। इससे इतना तो पता चलता है कि चटकने की आवाज़ का सम्बंध जोड़ में गैस के बुलबुले के दबाव में परिवर्तन से जुड़ा है। अलबत्ता, अभी भी यह कहना मुश्किल है कि पहले क्या होता है – चटकने की आवाज़ या चमक। लेकिन अल्ट्रासोनोग्राफी जांच ने इतना तो स्पष्ट कर ही दिया कि चटकने की आवाज़ गैस का बुलबुला फटने से 10 मिलीसेकंड पहले सुनाई पड़ती है। बुलबुले का फटना सोनोग्राम (sonogram) में एक चमक के रूप में दिखता है।

इस मामले में अलबर्टा विश्वविद्यालय के इमेजिंग विशेषज्ञ रिचर्ड थॉमसन ने यह विचार प्रस्तुत किया है कि हो सकता है कि आवाज़ सुनाई पड़ने से पहले ही बुलबुले का बनना शुरू हो जाता है लेकिन अल्ट्रासाउंड तस्वीर में वह पूरा बनने के बाद ही नज़र आता है। यही वह क्षण होता है जब आपको आवाज़ सुनाई पड़ती है। वैसे थॉमसन ने इसी तरह के शोध के लिए एमआरआई का उपयोग किया था। चूंकि उसमें प्रति सेकंड बहुत ज़्यादा तस्वीरें नहीं मिलती हैं (जो उस अध्ययन की सीमा थी) इसलिए वे यह नहीं बता पाए थे कि पहले आवाज़ आती है या बुलबुला बनता है।

और इस सिलसिले में सबसे हालिया शोध चंद्रन सूजा और अब्दुल बरकत (2018) का रहा है। इन्होंने साइन्टिफिक रिपोर्ट्स में उंगलियां चटकाने की आवाज़ की व्याख्या करते हुए एक गणितीय मॉडल प्रकाशित किया था। उनका मत था कि एमआरआई या सिनेरेडियोग्राफी जैसी तकनीकों में विभेदन बहुत कम है (क्रमश: 80-100 फ्रेम प्रति सेकंड और 100 फ्रेम प्रति सेकंड)। जबकि चटकने की आवाज़ का स्रोत पकड़ने के लिए कम से कम 1200 फ्रेम प्रति सेकंड का विभेदन चाहिए। इसलिए उन्होंने एक गणितीय मॉडल (mathematical model) विकसित किया।

उन्होंने दर्शाया कि उनके मॉडल में बुलबुले के आंशिक फूटने के ध्वनि हस्ताक्षर वैसे ही रहे जैसे प्रयोगों में देखे गए थे। तो संभव है कि वाष्प गुहा (vapour cavity) बनने और आंशिक रूप से बुलबुलों के फूटने को मिलाकर चटक की आवाज़ आती हो।

उंगलियां चटकाने का सुख

तो, सवाल यह है कि यदि जोड़ों में सिर्फ गैस के बुलबुले पिचक और फूट रहे हैं तो सुकून क्यों मिलता है।

इस संदर्भ में कैलिफोर्निया के अस्थि सर्जन रोजे मेलिकन का मत है कि जोड़ों की त्वरित हरकत वहां उपस्थित तंत्रिकाओं को भी उत्तेजित कर सकती है, जिसकी वजह से दर्द में कमी आती है और एंडॉर्फिन (endorphin) नामक पदार्थ मुक्त होते हैं। वैसे यह बात अभी प्रमाणित नहीं हुई है।

लगता है कि मामला सिर्फ शरीर की अंदरुनी क्रियाओं यानी कार्यिकी का न हो। कुछ मनोवैज्ञानिक पहलू भी इसमें जुड़े हैं। जैसे एक तो यह है कि उंगलियां चटकाना कुछ लोगों के लिए एक आदत बन जाती है। और जब इससे सुकून मिलता है तो इस आदत को बढ़ावा मिलता है। कुछ लोगों को सिर्फ चटकने की आवाज़ सुनना अच्छा लगने लगता है। लेकिन कहते हैं कि कभी-कभी आसपास के लोगों को इससे परेशानी होती है।

नुकसान

अक्सर अत्यधिक उंगलियां चटकाने वालों को टोका जाता है। कहा जाता है कि इससे नुकसान होगा, उंगलियां कमज़ोर पड़ जाएंगी, गठिया (arthritis) का खतरा बढ़ जाएगा। इस मामले में किए गए कई अध्ययनों में ऐसी सारी चेतावनियों को खारिज किया गया है। हां, कुछ अध्ययनों में यह बात ज़रूर सामने आई है कि आदतन उंगलियां चटकाने से व्यक्ति की उंगलियों में सूजन आ सकती है या पकड़ कमज़ोर पड़ सकती है।

उंगलियां चटकाने के हानिकारक असर को लेकर कई प्रयोग किए गए हैं। इनमें से सबसे मशहूर प्रयोग कैलिफोर्निया के एक चिकित्सक डॉ. डोनाल्ड एल. उन्गर ने किया था। वे यह देखना चाहते थे कि क्या उंगलियां चटकाने से गठिया (आर्थ्राइटिस) होता है। उन्होंने पूरे 50 साल तक अपने बाएं हाथ की उंगलियों को रोज़ाना कम से कम दो बार चटकाया जबकि दाएं हाथ को अछूता छोड़ रखा। बाद में जब उन्होंने दोनों हाथों का एक्सरे (X-Ray) निकाला तो उनमें कोई अंतर नहीं था। किसी में भी गठिया का कोई प्रमाण नहीं था।

खैर, यह तो हुई एक व्यक्ति के निजी प्रयोग की बात लेकिन ज़्यादा व्यापक अध्ययनों के परिणाम भी ऐसे ही रहे हैं।

उदाहरण के लिए, 2017 में हैंड सर्जरी एंड रिहैबिलिटेशन जर्नल में प्रकाशित एक पर्चे में 35 उंगलियां चटकाने वालों और न चटकाने वालों की तुलना की गई थी। आदतन उंगलियां चटकाने वाले लोग दिन में कम से कम पांच बार ऐसा करते थे। यह देखा गया कि उंगलियां चटकाने वालों में मेटाकार्पल के सिरों की उपास्थियां (cartilages) अपेक्षाकृत मोटी हो गई थीं। अलबत्ता, उनके हाथों की पकड़ पर कोई नकारात्मक असर नहीं हुआ था।

ऐसा एक प्रयोग 1975 में रॉबर्ट स्वीज़ी और स्टुअर्ट स्वीज़ी ने किया था। इसके परिणाम वेस्टर्न जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुए थे। इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि कम उम्र में उंगलियां चटकाने की आदत से बुढ़ापे में एमसीपी जोड़ों में किसी क्षतिकारक परिवर्तन का कोई प्रमाण नहीं है।

दूसरी ओर, जे. कोस्टेलोन और डी. एक्सलरॉड द्वारा एनल्स ऑफ दी रुमेटिक डिसीज़ेस में 1990 में प्रकाशित अध्ययन में 45 वर्ष से अधिक उम्र के 300 मरीज़ों को शामिल किया गया था। 300 में से 74 आदतन उंगलियां चटकाने वाले थे जबकि 226 गैर-चटकाने वाले। दोनों समूहों के हाथों में अतिरिक्त गठिया का कोई लक्षण नहीं दिखा। अलबत्ता, आदतन उंगलियां चटकाने वालों के हाथों में सूजन और पकड़ की कमज़ोरी की संभावना ज़्यादा पाई गई। एक अवलोकन यह था कि उंगलियां चटकाने की आदत का सम्बंध शारीरिक श्रम वाले काम, नाखून चबाने, धूम्रपान और शराब पीने से होता है।

बैंगलुरु प्रयोग

यह प्रयोग एस. कांचन तथा आर. मेघना द्वारा बेंगलुरु में 18-25 वर्ष के 150 कॉलेज छात्रों पर किया गया था। जर्नल ऑफ इकोफिज़ियोलॉजी एंड हेल्थ में 2025 में प्रकाशित इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि आदतन उंगलियां चटकाने के प्रमुख हाथ (यानी जिस हाथ का वह व्यक्ति प्रमुखता से इस्तेमाल करता है – डॉमिनेन्ट हाथ) के एमसीपी जोड़ों की गतिशीलता में कमी आती है और पकड़ की मज़बूती (hand grip) भी कम हो जाती है।

2001 में क्रिस्टोफर पीटरसन, चेरिल बार्नेस और लोरेटा डेविस ने उंगलियां चटकाने को लेकर एक अलग ही किस्म का अध्ययन किया था। पीडियॉट्रिक डर्मेटोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन में जोड़ों पर आने वाले उभारों (नकल पैड्स) पर ध्यान दिया गया था। प्राय: इन सूजननुमा उभारों का कारण पता नहीं चल पाता। और इनके प्रभावों की बात बहुत कम हुई है। यह अध्ययन एक ही मरीज़ (14 वर्षीय बच्ची) पर किया गया था जिसकी कई उंगलियों के जोड़ों पर 3 साल से गठान जैसी दिख रही थीं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये गठानें (knots) उसकी उंगलियां चटकाने की आदत के चलते उभरी हैं।

ऐसा ही लीक से हटकर एक और अध्ययन गौरतलब है। एडवर्ड रॉस, जेनिफर पॉग-मिलर और रॉबर्ट नेप्पो का यह अध्ययन क्लीनिकल किडनी जर्नल में 2023 में प्रकाशित हुआ था। देखा गया कि किडनी रोग के अंतिम दौर के मरीज़ों में सेकंडरी हायपरथॉयराइडिज़्म (यानी थॉयराइड की अति-सक्रियता) प्रकट होती है और मांसपेशियों और कंकाल तंत्र पर उसके विविध लक्षण नज़र आते हैं। इन शोधकर्ताओं के कई मरीज़, जो डायलिसिस पर थे, ने स्वत: बताया था कि उनमें अब उंगलियां चटकाने की क्षमता नहीं रही। आश्चर्य की बात यह रही कि पैराथॉयराइड ग्रंथि को सर्जरी के ज़रिए निकाल देने के बाद उंगली चटकाने की क्षमता लौट आई। मतलब है कि पैराथॉयराइड से सम्बंधित खनिज लवण तथा अस्थि विकारों (bone disorders) का असर उंगलियां चटकाने के कार्यिकीय व यांत्रिकी आधार पर होता है।

कुल मिलाकर लगता है कि उंगलियां चटकाने के तात्कालिक या दीर्घावधि नुकसान का कोई सुस्पष्ट प्रमाण नहीं है। हालांकि कुछेक अध्ययनों में नकारात्मक परिणाम दिखे हैं। लेकिन सभी शोधकर्ता यह चेतावनी दोहराते हैं कि शरीर के बाकी जोड़ों के साथ खिलवाड़ सही नहीं है क्योंकि उनमें से कई जोड़ सिनोवियल जोड़ (synovial joints) नहीं होते। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अब लैब में बनेंगे ‘मिनी’ मस्तिष्क!

हालिया हुए एक शोध में विज्ञान और चिकित्सा जगत को एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त हुई है। नेचर में प्रकाशित शोध के अनुसार प्रयोगशाला में मानव मस्तिष्क के हू-ब-हू छोटे मॉडल  विकसित कर लिए गए हैं। इन्हें ‘ब्रेन ऑर्गेनॉइड’ (brain organoid) या ‘मिनी ब्रेन’ कहा जाता है। 

पिछले कुछ अन्य अध्ययनों में भी ऐसे मिनी ब्रेन विकसित किए गए थे लेकिन वे थोड़े समय में – केवल कुछ हफ्तों-महीनों के भीतर – नष्ट हो जाते थे। उनकी मदद से मस्तिषक के केवल शुरुआती विकास का अध्ययन ही मुमकिन था। लेकिन इस ताज़ा अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस ‘मिनी ब्रेन’ (mini brain) को पांच साल से अधिक समय तक सफलतापूर्वक जीवित और विकासमान रखा।  

हारवर्ड युनिवर्सिटी की प्रोफेसर पाओला अर्लोटा और उनकी टीम ने 34 मिनी ब्रेन विकसित करके उनका अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि प्रयोगशाला में विभाजन कर रहे कोशिकाओं के समूह समय के साथ बिल्कुल उसी गति और क्रम से वृद्धि कर रहे थे जैसे मां के गर्भ में बच्चे (human embryo) का मस्तिष्क विकसित होता है। विकास के चरण कुछ इस प्रकार थे – 15 दिन से 2 महीने में पहली तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 3 से 6 महीने में दूसरी तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 12 महीने में नवजात शिशु के मस्तिष्क जैसी स्थिति और पांच साल तक कोशिकाओं के चारों तरफ प्रोटीन की सुरक्षा परत बनना (myelination) और परिपक्व होना। 

शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग भी किया। उन्होंने नई (15 दिन पुरानी) और परिपक्व (9 से 12 महीने पुरानी) कोशिकाओं का एक साथ 15 दिनों तक विभाजन करवाया। नतीजा यह था कि नई कोशिकाओं ने शुरुआती तंत्रिका कोशिकाएं बनाई, जबकि परिपक्व कोशिकाओं ने उनकी परिपक्वता के अनुसार परिपक्व तंत्रिका कोशिकाओं का ही विकास किया। इस प्रयोग से यह साबित हुआ कि मस्तिष्क की कोशिकाओं में जैविक स्मृति (biological memory) होती है, और वे नए माहौल में भी अपनी जैविक उम्र के अनुसार ही काम करती हैं।

पिछले अध्ययनों में मस्तिष्क की मुख्य कोशिकाएं पोषण की कमी से जल्दी नष्ट हो जाती थीं। इससे निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने एक खास संशोधित तरल (ब्रेनफिज़) (brainphys) का इस्तेमाल किया। ब्रेनफिज़ की मदद से तंत्रिका कोशिकाएं न केवल लंबे समय तक क्रियाशील रहीं, बल्कि उनके बीच जटिल विद्युतीय संकेतों (complex electric signals) का प्रेषण भी होने लगा। 

शोधकर्ताओं को लगता है कि यह अनुसंधान शिज़ोफ्रेनिया और ऑटिज़्म जैसी मानसिक और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के कारणों और लक्षणों को बेहतर तरीके से समझने में सहायक होगा, क्योंकि ये बीमारियां एक खास उम्र के बाद ही सामने आती हैं। इसके अलावा, मरीज़ों की स्टेम कोशिकाओं (stem cells) से मिनी ब्रेन विकसित करके नई दवाइयों का सुरक्षित परीक्षण भी संभव हो सकेगा।

भविष्य में शोधकर्ता संवेदनाओं से युक्त ऐसे मिनी ब्रेन बनाने की कोशिश करने जा रहे हैं जो सुनने, देखने, और छूने जैसे संकेतों को महसूस करने में भी सक्षम हों। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चौदह वर्ष की बहस के बाद एक बीमारी का नया नाम

ऋषि राज राय

पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, जिसे PCOS कहा जाता था, अब आधिकारिक रूप से पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) कहलाएगा। यह घोषणा 12 मई 2026 को लैंसेट में प्रकाशित एक अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्र में हुई। इस नाम-परिवर्तन के पीछे चौदह वर्षों की प्रक्रिया है, जिसमें छह महाद्वीपों से 22,000 से अधिक मरीज़ों, डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और मरीज़-संगठनों की राय ली गई। अगुवाई ऑस्ट्रेलिया के मोनाश विश्वविद्यालय की हेलेना टीड ने की, और फिनलैंड के ओलू विश्वविद्यालय की तेरही पिल्टोनन सहायक रहीं।नाम बदलने का कारण वैज्ञानिक असंतोष था। PCOS का नाम अंडाशय पर बनने वाले सिस्ट (गांठ – त्वचा के नीचे या शरीर के अंदर स्थित एक बंद थैली जिसमें तरल पदार्थ, हवा या मुलायम पदार्थ भरा होता है) पर आधारित था। लेकिन ये गांठें असल में गांठें नहीं होतीं। ये अपरिपक्व फॉलिकल (पुटिकाएं) (immature follicle) होती हैं, जिन्हें अल्ट्रासाउंड जांच में गांठ (सिस्ट) जैसा दिखने के कारण यह नाम मिला था। इसी शोध समूह का एक अध्ययन दिखाता है कि इस बीमारी वाली महिलाओं में असामान्य अंडाशयी सिस्ट का प्रसार बाकी आबादी से अलग नहीं है। यानी नाम जिस लक्षण पर आधारित था, वह न रोग-विशिष्ट था, न अनन्य।

इस बीमारी की असली प्रकृति अंडाशय तक सीमित नहीं है। यह एक बहु-तंत्रगत अंत:स्रावी-चयापचय अवस्था है, जिसमें इंसुलिन प्रतिरोध, एंड्रोजेन हार्मोन की अधिकता, हाइपोथैलेमस-पिट्यूटरी अनियमितता, त्वचा के लक्षण, वज़न में परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य पर असर वगैरह शामिल हैं। PMOS (Polyendocrine Metabolic Ovarian Syndrome) वाली महिलाओं में टाइप-2 डायबिटीज़ का जोखिम कई गुना अधिक होता है, हृदय रोग का जोखिम बढ़ा हुआ होता है, और मानसिक अवसाद कहीं ज़्यादा आम है। इनमें से कोई भी अकेले अंडाशय की बीमारी नहीं है।

पुराने नाम (PCOS) ने तीन बड़ी समस्याएं पैदा की थीं। पहली, निदान में देरी। लक्षण चूंकि त्वचा, वज़न, बालों, या मनःस्थिति के होते हैं, महिलाएं अलग-अलग विशेषज्ञों के पास चक्कर काटती रहती हैं, और स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynaecologist) के पास पहुंचने पर ही कभी-कभार निदान हो पाता है। दूसरी, टुकड़ों-टुकड़ों में इलाज। एक डॉक्टर बालों की समस्या, दूसरा अनियमित माहवारी, तीसरा वज़न की दिक्कत पर ध्यान देता; कोई पूरी तस्वीर नहीं देखता था। और तीसरी लांछन का डर। ‘ओवेरियन’ (ovarian) शब्द के कारण कई देशों में महिलाओं को अपनी बीमारी बताने में शर्म आती थी।

नाम-परिवर्तन की प्रक्रिया अपने आप में गौरतलब है। इसमें अमेरिकन एंडोक्राइन सोसाइटी, अंतर्राष्ट्रीय एंड्रोजेन एक्सेस और PCOS सोसाइटी, और ब्रिटेन के वेरिटी सहित 56 अकादमिक, चिकित्सा और मरीज़ संगठनों ने भाग लिया। वर्ष 2017, 2023 और 2025 में तीन वैश्विक सर्वेक्षण हुए। अंतिम सर्वेक्षण में लगभग 14,360 मरीज़ और स्वास्थ्य पेशेवर शामिल हुए। कार्यशालाओं में विश्व के हर क्षेत्र से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ। जब पूछा गया कि नए नाम से क्या उम्मीद करनी चाहिए, तो तीन बातें सबसे ऊपर थीं: नया नाम लांछन कम करे, आसानी से समझ आए और वैज्ञानिक रूप से सही हो।

नाम बदलने पर आपत्ति भी दर्ज हुई। अमेरिका के दो प्रमुख मरीज़-संगठन नेताओं, अंजेला ग्रासी और साशा ऑटी का कहना है कि PMOS “बहुत बदला हुआ तो है लेकिन पर्याप्त नहीं बदला है।” उनका मुख्य तर्क यह है कि नए नाम में ‘ओवेरियन’ शब्द बरकरार है, जो बीमारी के पुरुष रूप की संभावना को अनदेखा करता है।

हाल के अध्ययन बताते हैं कि PMOS वाली महिलाओं के पुरुष रक्त-सम्बंधियों में भी इंसुलिन प्रतिरोध, कम उम्र में गंजापन, और चयापचय जोखिम बढ़ा हुआ मिलता है। यानी बीमारी की जड़ में जो अंत:स्रावी चयापचय (endocrine system) असंतुलन है, वह सिर्फ अंडाशय में नहीं होता बल्कि पुरुषों में भी हो सकता है।

भारत के लिए यह बहस विशेष रूप से प्रासंगिक है। यहां PMOS का प्रसार 8 से 22 प्रतिशत के बीच आंका गया है; और शहरी युवा महिलाओं में यह और अधिक हो सकता है। लेकिन भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था इसे अभी भी मुख्यतः स्त्री रोग (gynaecological) के रूप में देखती है, न कि चयापचय (metabolism) से सम्बंधित बीमारी के रूप में। परिणाम यह है कि करोड़ों महिलाएं बिना निदान के जीती हैं, या केवल जन्म-नियंत्रण गोलियों से लक्षण दबाती हैं, जबकि चयापचय जोखिम पीछे-पीछे बढ़ता रहता है। नए नाम का असर तभी होगा जब सरकारी दिशानिर्देश, मेडिकल कॉलेजों का पाठ्यक्रम, और आयुष्मान भारत जैसे कार्यक्रम इसे चयापचय बीमारी की तरह देखना शुरू करें।

नए नाम से निदान के मानदंड (diagnosis) और इलाज तुरंत नहीं बदलेंगे। जो बदलेगा वह है भाषा, और भाषा के साथ ध्यान की दिशा। लैंसेट में शोध दल ने साफ किया है कि कई वर्षों तक दोनों नाम साथ चलेंगे, चिकित्सा रिकॉर्ड में दोनों दिखाई देंगे, और नए नाम को धीरे-धीरे अपनाया जाएगा।

वैसे चिकित्सा के इतिहास (Medical history) में यह पहला नाम-परिवर्तन नहीं है। बाइपोलर डिसऑर्डर (पहले उन्मादी अवसाद या मैनिक डिप्रेशन कहा जाता था), डाउन सिंड्रोम (पहले मंगोलिज़्म या मंगोलियन पागलपन), और पेट के अल्सर (पूर्व में अपच) के मामले में हर बार नाम केवल शब्द नहीं था। नाम ने तय किया कि डॉक्टर क्या देखेंगे, शोधकर्ता क्या पूछेंगे, और मरीज़ अपनी बीमारी को कैसे समझेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दिल की धड़कन दिमाग के काम को प्रभावित करती है

क प्रयोग चल रहा है। इसमें शामिल प्रतिभागी को एक आसान-सा काम दिया गया है। सामने एक पर्दे पर दो वर्ग दिख रहे हैं। जैसे ही किसी वर्ग का रंग बदले, प्रतिभागी को एक बटन दबा देना है। अलबत्ता, प्रतिभागी को यह मालूम नहीं है कि दो में से एक वर्ग का रंग तब बदलता है जब उसका दिल सिकुड़ता (heart contraction) है और दूसरे का रंग दो धड़कनों के बीच कभी बदलता है। लेकिन दिमाग इस कारस्तानी को पकड़ लेता है। सैकड़ों ऐसे परीक्षणों में देखा गया कि दिमाग उन दो वर्गों के लिए अलग-अलग प्रतिक्रिया देता है।

2024 में न्यूरोइमेज में प्रकाशित इस अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि दिल की धड़कन खामोशी से दिमाग द्वारा सूचनाओं की प्रोसेसिंग को प्रभावित करती है। इससे एक और चिंताजनक सरोकार उभरता है: शरीर की जिन अंदरुनी लयों (internal rythm) को सामान्यत: पृष्ठभूमि में चल रहा शोर (बैकग्राउंड नॉइस) माना जाता है, वे शायद तंत्रिका विज्ञान में किए जा रहे प्रयोगों को प्रभावित करती हैं। कई शोधकर्ताओं ने इस मामले में चेतावनी प्रकट की है और एक शोध पत्र में तो अध्ययनों में इन लयों का हिसाब रखने और उन्हें परिणामों की व्याख्याओं में शामिल करने के लिए मानक दिशानिर्देश भी प्रस्तुत किए गए हैं।

वैज्ञानिकों को यह बात तो सालों से पता रही है कि दिमाग शरीर के अंदर से मिलने वाले संदेशों का ध्यान रखता है। इसे इंटरोसेप्शन (Introception) कहते हैं। उदाहरण के लिए, दिल की हर धड़कन रक्त वाहिनियों के ज़रिए दबाव की एक तरंग प्रेषित करती है और दिमाग में उपस्थित संवेदी मार्गों को सक्रिय कर देती है। ये दिमाग में फीडबैक का सबब बनते हैं। अब नई बात यह है कि ये संदेश प्रयोगों को प्रभावित कर सकते हैं; ऐसे प्रयोगों को भी जिनका सम्बंध इंटरोसेप्शन से नहीं है।

न्यूरोइमेज में प्रकाशित अध्ययन में वर्गों के रंग परिवर्तन को भांपने की प्रतिभागियों की क्षमता पर दिल की धड़कन के समय अंतराल से कोई फर्क नहीं देखा गया। लेकिन खोपड़ी पर लगे इलेक्ट्रो-एन्सिफेलोग्राफी (ईईजी) यंत्र की रिकॉर्डिंग ने कुछ अलग ही कहानी बयान कर दी।  विज़ुअल कॉर्टेक्स (मस्तिष्क का वह हिस्सा जो आंखों से मिलने वाले संकेतों को पकड़ता और समझता है) (visual cortex) ने तब कम सशक्त प्रतिक्रिया दी जब रंग परिवर्तन दिल के सिकुड़ने के दौरान हुआ। शोधकर्ताओं का मत है कि शायद जब रंग परिवर्तन का संदेश आया तो दिल के सिकुड़ने का संदेश दिमाग का ध्यान आकर्षित करने के लिए होड़ कर रहा था।

इसी तरह के मुद्दे ब्रेन-स्कैनिंग (एमआरआई वगैरह) अनुसंधान में भी उभरे हैं। जैसे यह पता चला है कि दिल की धड़कन और श्वसन ऐसी गतियां और उतार-चढ़ाव उत्पन्न कर सकते हैं जो फंक्शनल एमआरआई डैटा (funtional MRI data) में विकृतियां पैदा कर दें। और तो और, इन विकृतियों को सुधारने की मानक विधियां शायद पूरी तरह कारगर नहीं हैं। 

ये परिणाम सुझाते हैं कि तंत्रिका वैज्ञानिकों को अपने डैटा में दिल की धड़कन से सम्बंधित प्रभावों से निपटना होगा। कई शोधकर्ता ऐसा करते भी हैं लेकिन अप्रैल में सायकोफिज़ियोलॉजी में प्रकाशित पर्चा और अधिक मानकीकरण की ज़रूरत रेखांकित करता है। ईईजी और मैग्नेटोएन्सिफेलोग्राफी पर दिल की धड़कन के असर सम्बंधी 132 इंसानी अध्ययनों की समीक्षा में पता चला कि ये सभी बहुत अलग-अलग विधियों का उपयोग करते हैं, और प्राय: रिपोर्ट भी नहीं करते। इसके चलते कभी-कभी इनके परिणामों की आपस में तुलना मुश्किल या नामुमकिन हो जाती है। इसे ध्यान में रखते हुए मैंक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमैन कॉग्निटिव एंड ब्रेन साइन्सेस के पी. स्टाइनफैथ और उनके साथियों ने एक मानक प्रोटोकॉल (standard protocol) प्रकाशित किया है। (स्रोत फीचर्स)

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मैच में कूलिंग ब्रेक और ठंडक का विज्ञान

फुटबॉल, हॉकी, बास्केटबॉल, टेनिस, बेडमिंटन जैसे खेलों में खिलाड़ियों (sportsman) को काफी भाग-दौड़ करनी पड़ती है। इस वजह से शरीर काफी गर्म हो जाता है और ठंडक देने के लिए व्यवस्था करनी होती है। इस मकसद से 2026 के फुटबॉल विश्व कप में हाइड्रेशन ब्रेक (hydration break) रखे गए थे। फीफा का कहना है कि ये ब्रेक खिलाड़ियों की भलाई को ध्यान में रखकर जोड़े गए थे।

अलबत्ता, देखा यह गया कि खेल रुकते ही ड्रिंक्स मैदान पर पहुंचते, खिलाड़ी मैदान पर ही बने रहते और विज्ञापनों का सिलसिला शुरू हो जाता। कई खेलकूद विज्ञानियों का कहना है कि जिस ढंग से ये ब्रेक्स लागू किए गए वे शरीर के बढ़ते तापमान और उसकी वजह से पैदा होने वाले तनाव को संभालने में नाकाम थे।

दरअसल, कूलिंग ब्रेक्स(cooling breaks) गर्मी के तनाव से उत्पन्न जोखिम के हिसाब से निर्धारित होने चाहिए और उन्हें कारगर ढंग से ठंडक प्रदान करनी चाहिए। लेकिन देखा गया कि इन ब्रेक्स के समय खिलाड़ी धूप में ही खड़े रहकर आगे की रणनीति के निर्देश सुनते रहते थे। ठंडक के लिए सबसे पहली ज़रूरत होगी कि खिलाड़ी छाया में बैठ जाएं।

इस संदर्भ में फीफा (FIFA) के अपने चिकित्सा दिशानिर्देश काफी स्पष्ट हैं: कूलिंग ब्रेक्स का एकमात्र मकसद ऊष्मा-जनित बीमारियों की रोकथाम है और ऐसे ब्रेक्स तभी दिए जाने चाहिए जब पर्यावरणीय ऊष्मा-जनित तनाव एक हद से ज़्यादा हो जाए। इस हद को वेट-बल्ब तापमान 32 डिग्री सेल्सियस माना जाता है। वेट-बल्ब तापमान हवा में नमी की मात्रा और तापमान दोनों का मिला-जुला पैमाना है। हम इंसान अपने शरीर को ठंडा रखने के लिए मूलत: पसीने के वाष्पीकरण पर निर्भर हैं। यदि हवा में पहले से ही ज़्यादा नमी (उमस) है तो पसीने का वाष्पीकरण धीमा पड़ जाता है। इसलिए तापमान अपेक्षाकृत कम हो और हवा में नमी ज़्यादा हो तो गर्मी ज़्यादा महसूस होती है। वेट-बल्ब तापमान (wet bulb temperature) हमें इसी संतुलन की सूचना देता है।

तो फीफा के दिशानिर्देशों के अनुसार कूलिंग ब्रेक की ज़रूरत तब होती है जब वेट-बल्ब तापमान 32 डिग्री से ज़्यादा हो जाए। लेकिन देखा यह गया है कि सारे मैचों में कूलिंग ब्रेक निश्चित अंतराल पर आ जाते हैं, यहां तक कि नियंत्रित जलवायु वाले स्टेडियम में भी। यानी इन ब्रेक्स का सम्बंध ऊष्मीय तनाव (humidity stress) से नहीं रह गया है बल्कि ये रस्म बन गए हैं।

इस बात से तो इन्कार नहीं किया जा सकता कि एथलीट्स (athletes) के लिए गर्मी से परास्त होना आम बात है। लेकिन जर्नल ऑफ साइन्स एंड मेडिसिन इन स्पोर्ट्स तथा ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में एच. ए. ब्राउन व उनके साथियों के शोधपत्र में इस मामले में एक परीक्षण के परिणाम प्रकाशित किए हैं जो ऐसे कूलिंग ब्रेक्स के अर्थहीन होने की बात कहते हैं।

ब्राउन एवं उनके साथियों ने कुछ प्रतिभागियों के साथ एक प्रयोग किया था। यह 40 डिग्री सेल्सियस तथा 41 प्रतिशत आर्द्रता पर खेले गए 90 मिनट के एक फुटबॉल मैच का सिमुलेशन (simulation) था। इस दौरान उन्होंने ठंडक के तीन तरीके अपनाए थे – निष्क्रिय ब्रेक, सक्रिय ठंडक वाले ब्रेक तथा रिकवरी पीरियड। तीनों में ज़बरदस्त अंतर देखने को मिले।

चलते खेल में छोटे-छोटे ब्रेक्स जिनमें बर्फ में भीगे तौलियों और कोल्ड-ड्रिंक्स का इस्तेमाल किया गया था और साथ में थोड़ा लंबा हाफ-टाइम ब्रेक (long half-time break) दिया गया था, उनमें शरीर का केंद्रीय तापमान भी कम रहा और कार्डियो-वैसक्यूलर तनाव (cardiovascular stress) भी काफी कम रहा। दूसरी ओर, ठंडक देने के सक्रिय प्रयासों के बिना मिले ब्रेक्स ने नगण्य राहत पहुंचाई। 

दरअसल, महत्व खेल के दौरान मिलने वाली रुकावट का नहीं है, बल्कि इसका है कि इस रुकावट का इस्तेमाल कैसे किया जाता है। ब्राउन का कहना है कि ठंडक हासिल करने के सक्रिय प्रयासों के बिना ऐसे ब्रेक्स बेकार ही होंगे। और यह बात सिर्फ खिलाड़ियों के लिए नहीं बल्कि सामान्य मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है – चाहे वे निर्माण स्थलों के मज़दूर हों, खेत पर काम कर रहे श्रमिक हों। इन सभी के लिए हस्तक्षेप की रणनीति एक सी होगी। इसमें विश्राम, कार्यिकीय क्षति की रोकथाम और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए पानी की आपूर्ति जैसे तत्व शामिल होंगे।

ब्राउन के मुताबिक फुटबॉल पर ध्यान देना इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण है कि जब आप ऐसे प्रतिष्ठित आयोजनों में सही तरीके नहीं अपनाते तो एक गलत संदेश देते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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मस्तिष्क हिसाब रखता है कि नींद कब पूरी हो गई

नींद की कमी (sleep deprivation) बड़ी समस्या है और कई हादसों का कारण बनती है। हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में नींद की गुणवत्ता और नींद की कमी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। वॉशिंगटन युनिवर्सिटी की तंत्रिका वैज्ञानिक याओ चेन और उनकी टीम ने चूहों पर शोध करके यह जानने की कोशिश की कि मस्तिष्क कैसे भांप लेता है कि अब जागने का वक्त हो गया है।

वैसे तो नींद पर काफी अध्ययन हुए हैं लेकिन ज़्यादातर शोध मस्तिष्क की नींद से जागने की क्रियाविधि या फिर लंबे समय तक नींद की कमी से होने वाले बदलावों पर केंद्रित रहे हैं। इसलिए यह पहेली ही रही कि मस्तिष्क यह हिसाब-किताब कैसे रखता है कि एक लगातार नींद में कितनी देर सो लिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि वैज्ञानिकों को ऐसे रासायनिक संकेत मिले हैं जो मस्तिष्क में ‘नींद के टाइमर’ (sleep timer) की तरह काम करते हैं।

शोधकर्ताओं ने चूहों के मस्तिष्क में प्रोटीन काइनेज़-A (PKA) (protein kinase) नामक एंज़ाइम के असर की जांच की। इसके असर को वास्तविक समय में जांचने के लिए एक खास फ्लोरेसेंट सेंसर (flourescent sensor) का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, पहले से ही पता था कि यह एंज़ाइम मनुष्यों में जाग्रत अवस्था से जुड़ा है। यह मस्तिष्क की कोशिकाओं की सतह पर प्रोटीन टैग (रासायनिक चिंह) जोड़ता है। जांच में पाया गया कि जाग्रत चूहों में ये प्रोटीन टैग लगातार बन रहे थे और उनका स्तर अधिक और स्थिर था। दूसरी ओर, नींद की अवस्था में इनका स्तर वक्त के साथ नींद के पूरे सत्र में धीरे-धीरे कम होता गया। जब नींद में व्यवधान पैदा हुआ तो टैग का स्तर (जो कम हो रहा था) अचानक बढ़कर चरम सीमा तक पहुंच गया और वापिस नींद लगने पर टैग का स्तर फिर से धीरे-धीरे घटने लगा।  

शोधकर्ताओं के अनुसार यह प्रोटीन टैग नींद की कुल अवधि के साथ-साथ व्यवधान की आवृत्ति का भी हिसाब रखता है। चूंकि यह टैग नींद में आए व्यवधानों (disturbances) का भी हिसाब रखता है, तो इसकी मदद से प्रति क्षण यह बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी समय चूहे के जाग जाने की कितनी संभाविता है बनिस्बत यह देखकर कि कोई चूहा कितनी देर से सो रहा है।

अलबत्ता, टैगिंग का स्तर (tagging level) किसी अलार्म की तरह काम नहीं करता जो आपको झटके से जगा दे। वह काम तो कोई शोर भी कर सकता है। दरअसल, टैगिंग बताता है कि आपका शरीर कब कार्यिकीय रूप से जागने के लिए तैयार है।

जब शोधकर्ताओं ने चूहों को देर तक जगाए रखने के बाद सोने दिया, तो PKA संकेत सामान्य ऊंघने की तुलना में कम हो गया। इससे पता चलता है कि PKA संकेत यह भी बता सकता है कि नींद के कितने घाटे की पूर्ति हो गई है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जानकारी भविष्य में रोज़ाना की अधूरी नींद और नींद की गुणवत्ता (sleep quality) की जांच विकसित करने में मददगार हो सकती है। भविष्य में, ड्राइवरों, आपातकर्मियों, तनाव व कम नींद वाले कामों में लगे लोगों की जांच हो सकेगी और नींद की कमी से होने वाले जोखिम और बड़े हादसों से बचा जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नीट घोटाला और स्वास्थ्य-सेवा क्षेत्र का अधोपतन

डॉ. अनंत फड़के

स वर्ष मेडिकल कॉलेजों में स्नातक (MBBS) और स्नातकोत्तर (PG) प्रवेश के लिए होने वाली नीट परीक्षा (NEET Examination) व्यवस्था पूरी तरह विफल साबित हुई। इसके विरोध में दिल्ली में जंतर-मंतर पर और अन्य शहरों में हुए जेन-ज़ी आंदोलनों और अन्य दबावों के चलते इस परीक्षा प्रणाली को रद्द किया जाएगा या इसमें सुधार किए जाएंगे। लेकिन केवल इतना करने से प्रवेश-प्रक्रिया में फैला भ्रष्टाचार और अव्यवस्था समाप्त नहीं होगी। इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण, कॉर्पोरेटीकरण, चिकित्सा शिक्षा के निजीकरण और महंगे निजी कोचिंग संस्थानों (private coaching centres) के बढ़ते प्रभाव जैसे मूल कारणों को समाप्त करना होगा। आइए संक्षेप में समझें कि यह स्थिति क्यों है।

सरकारी अस्पतालों की जगह निजी अस्पतालों का विस्तार

1980 तक सबसे आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं मुख्य रूप से शहरों के छोटे-बड़े सरकारी अस्पतालों और कुछ बड़े चैरिटेबल (परमार्थ) अस्पतालों में उपलब्ध थीं। यहां इलाज के लिए मुख्यतः गरीब और मध्यम वर्ग (poor & middle class) के लोग आते थे, लेकिन समाज के अन्य वर्ग भी इन अस्पतालों में इलाज करवाते थे।

पिछले 40–45 वर्षों में नई और अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीकों के आने से स्वास्थ्य सेवाओं का स्वरूप बदल गया। सही समय पर बीमारी की पहचान और इलाज पहले की तुलना में अधिक आसान हो गया। लेकिन इसका लाभ सभी लोगों तक पहुंचाने के लिए सरकार को पुराने सरकारी अस्पतालों का आधुनिकीकरण करना चाहिए था और पर्याप्त संख्या में नए सरकारी अस्पताल भी खोलने चाहिए थे। साथ ही, ईमानदारी से काम करने वाले चैरिटेबल अस्पतालों (cheritable hospitals) को भी ऐसी सुविधाएं विकसित करने के लिए सरकारी सहायता (subsidy) मिलनी चाहिए थी। लेकिन 1980 के बाद सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में भी निजीकरण (privatization) की नीति अपनाई और धीरे-धीरे अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हटना शुरू कर दिया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 1980 से ही सिफारिश की है कि सरकार का स्वास्थ्य पर कुल खर्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 5 प्रतिशत होना चाहिए। लेकिन भारत में केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त स्वास्थ्य खर्च बढ़ने की बजाय 2014 के बाद GDP के लगभग 1.3 प्रतिशत पर ही स्थिर रहा। 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार 2025 तक सरकारी स्वास्थ्य खर्च को GDP के 2.5 प्रतिशत तक पहुंचाया जाना था और इसमें केंद्र सरकार का हिस्सा 1 प्रतिशत होना था। लेकिन पिछले पांच वर्षों में केंद्र सरकार का स्वास्थ्य खर्च GDP के 0.3 प्रतिशत से भी कम रहा है।

कॉर्पोरेट स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार

सरकार को सभी स्तरों पर आधुनिक चिकित्सा तकनीक के लिए पर्याप्त निवेश करना चाहिए था। लेकिन 1990 के बाद यह निवेश मुख्य रूप से बड़ी कॉर्पोरेट कम्पनियों (corporate companies) ने किया है। पहले भी दवा उद्योग में कॉर्पोरेट निवेश था। बाद में आधुनिक पैथॉलॉजी लैब, रक्त जांच केंद्र, स्कैन सेंटर और बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल भी तेज़ी से बढ़ने लगे। कई ऐसे अस्पताल, जो केवल नाम के लिए चैरिटेबल थे लेकिन वास्तव में लाभ कमाने के उद्देश्य से चलते थे, उनमें भी कानूनी रास्ते निकालकर कॉर्पोरेट कम्पनियों ने निवेश किया। 1991 से 2024 के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में कॉर्पोरेट निवेश लगभग ₹500 करोड़ से बढ़कर ₹50,000 करोड़ तक पहुंच गया।

कई विकसित देशों और वियतनाम जैसे देशों में यह नियम है कि डॉक्टर वैज्ञानिक दिशानिर्देशों के अनुसार ही यह तय करेंगे कि कौन-सी जांच या प्रक्रिया वास्तव में आवश्यक है। लेकिन भारत में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है। इसलिए बहुत कम विशेषज्ञ इन वैज्ञानिक दिशानिर्देशों का पालन करते हैं। 1980 के बाद मरीज़ों को किसी विशेष लैब में भेजने के बदले डॉक्टरों को कमीशन (कट) (commision) मिलने की प्रथा भी बढ़ी। परिणाम यह हुआ कि वास्तव में ज़रूरत हो या न हो, अधिक से अधिक जांच और प्रक्रियाएं करवाकर अधिक लाभ कमाना कई निजी अस्पतालों का मुख्य उद्देश्य बन गया। ऐसे मुनाफा-केंद्रित (profit-centred) अस्पतालों में काम करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या लगातार बढ़ती गई। उनके साथ काम करके कमाई करने वाले अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ती गई।

मुनाफाकेंद्रित निजी मेडिकल कॉलेजों की बढ़ोतरी

ऐसे डॉक्टर तैयार करने के लिए, जो बाद में कॉर्पोरेट अस्पतालों (corporate hospitals) में काम करें, हर साल 10-20 लाख रुपए फीस लेने वाले निजी मेडिकल कॉलेजों की संख्या लगातार बढ़ती गई। इसका समर्थन यह कहकर किया जाता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश के अनुसार हर 1000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए, और केवल सरकारी मेडिकल कॉलेजों के माध्यम से इतने डॉक्टर तैयार करना संभव नहीं है। इसलिए निजी मेडिकल कॉलेजों को बढ़ावा देना ज़रूरी बताया जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन निजी कॉलेजों (private college) से पढ़कर निकलने वाले अधिकांश डॉक्टर उन गरीब ग्रामीण या शहरी इलाकों में काम करने नहीं जाते, जहां डॉक्टरों की सबसे अधिक कमी है। कई विद्यार्थी कोचिंग पर 3-5 लाख खर्च करते हैं, और फिर निजी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और पीजी करने में 2-5 करोड़ तक खर्च हो सकता है। इतना खर्च करने के बाद कई डॉक्टर मुख्यतः शहरों के अमीर लोगों का इलाज करते हैं और कॉर्पोरेट अस्पतालों की मुनाफाखोरी का हिस्सा बन जाते हैं।

अनावश्यक जांच और इलाज का खर्च केवल अमीर लोग ही उठा सकते हैं। लेकिन उनके लिए भी यह अनुचित है और कभी-कभी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है। गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए तो यह खर्च भारी कर्ज़ का कारण बन सकता है।

निजी मेडिकल शिक्षा का तेज़ी से विस्तार

इस लाभ कमाने वाली व्यवस्था में शामिल होने की इच्छा रखने वाले डॉक्टरों की संख्या लगातार बढ़ती गई। 1980 में देश में लगभग 110 एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज (allopathic medical college) थे। इनमें हर वर्ष लगभग 10,000 विद्यार्थी प्रवेश लेते थे। इनमें से केवल 10 प्रतिशत विद्यार्थी निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ते थे। पीजी शिक्षा में हर वर्ष लगभग 3–4 हज़ार डॉक्टर प्रवेश लेते थे और उनमें से केवल 5 प्रतिशत निजी मेडिकल कॉलेजों में जाते थे। लेकिन 2025–26 तक देश में लगभग 800 एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज हो गए और उनमें लगभग सवा लाख विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। इनमें से लगभग 50 प्रतिशत विद्यार्थी निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे हैं और हर साल 10–20 लाख फीस दे रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सरकार ने पर्याप्त संख्या में सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं खोले। इस कारण केवल योग्यता और मेहनत के आधार पर अच्छे मेडिकल करियर (medical carrer) का अवसर पर्याप्त नहीं बढ़ पाया।

इसी तरह, 2025–26 में पीजी मेडिकल शिक्षा में लगभग 75 से 80 हज़ार डॉक्टरों ने प्रवेश लिया, जिनमें लगभग आधे निजी मेडिकल कॉलेजों में गए।

नीट परीक्षा और कोचिंग उद्योग

मेडिकल प्रवेश की प्रतिस्पर्धा (competition) लगातार बढ़ती गई। राष्ट्रीय स्तर पर एक समान प्रवेश प्रक्रिया बनाने के लिए 2016 में नीट परीक्षा शुरू की गई। पहले वर्ष इस परीक्षा में लगभग आठ लाख विद्यार्थी बैठे थे। 2025 तक यह संख्या बढ़कर 22 लाख हो गई। इतनी बड़ी संख्या और इतनी कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण महंगे निजी कोचिंग संस्थानों का तेज़ी से विस्तार हुआ। 2025 तक यह नया कोचिंग उद्योग लगभग 25,000 करोड़ का हो गया। ऑनलाइन कोचिंग के लिए 15–20 हज़ार तक फीस ली जाती है, जबकि अच्छे कोचिंग संस्थानों (coaching institutes) की फीस लगभग एक लाख या उससे अधिक होती है। यह धारणा बनने लगी कि जितनी अधिक फीस, सफलता की संभावना उतनी अधिक। कुछ संस्थान ‘निश्चित चयन’ कराने का दावा करते हैं और उनके लिए विद्यार्थी 3–5 लाख तक खर्च करते हैं। यदि इनमें से कुछ विद्यार्थियों को ज़्यादा पैसे देकर प्रश्नपत्र लीक होने का लाभ भी मिलता हो, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

केवल नीट में सुधार से समस्या हल नहीं होगी

नीट परीक्षा में हुए घोटाले ने यह स्पष्ट कर दिया कि अखिल भारतीय प्रवेश प्रणाली (all india admission system)की अपनी सीमाएं और गंभीर जोखिम हैं। इस विरोध के कारण वर्तमान व्यवस्था में सुधार होना चाहिए या आवश्यकता हो तो नई प्रवेश प्रणाली बनानी चाहिए। लेकिन केवल इससे प्रवेश प्रक्रिया में फैला भ्रष्टाचार (corruption) समाप्त नहीं होगा। असल में यह प्रतियोगिता ऐसे पेशे में प्रवेश पाने की है जहां बहुत अधिक पैसा और प्रतिष्ठा मिलती है। इसलिए निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाने की होड़ लगातार बढ़ रही है। भले ही बहुत से विद्यार्थियों को यह बात पूरी तरह समझ में न आती हो, लेकिन वर्तमान व्यवस्था की यही वास्तविकता है। इसलिए समस्या की जड़ पर प्रहार करना आवश्यक है।

क्या किया जाए?

1. सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े पैमाने पर निवेश (high investement) किया जाए। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा स्वास्थ्य पर खर्च में बड़ी वृद्धि की जाए। सरकारी अस्पतालों का विस्तार हो, उनमें आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हों और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था जनता के लिए पारदर्शी तथा जवाबदेह रहे। साथ ही, ईमानदारी से काम करने वाले चैरिटेबल अस्पतालों को भी सुविधाएं विकसित करने के लिए सरकारी सहायता मिले।

2. सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाई जाए। पर्याप्त नए सरकारी मेडिकल कॉलेज खोले जाएं। साथ ही, निजी मेडिकल कॉलेजों को भी सरकारी कॉलेजों के बराबर ही फीस लेने की अनुमति हो। यदि इससे कई निजी मेडिकल कॉलेज बंद भी हो जाएं, तो इससे जनता का नुकसान नहीं होगा। बल्कि मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं (medical entrance exam) के अत्यधिक महत्व और उनमें होने वाले भ्रष्टाचार को कम करने में मदद मिलेगी।

3. निजी स्वास्थ्य सेवाओं को वैज्ञानिक नियमों के अनुसार चलाया जाए। निजी अस्पतालों में इलाज केवल वैज्ञानिक चिकित्सा दिशानिर्देशों (scientific medical guidelines) के अनुसार ही किया जाए और मरीज़ों से केवल निर्धारित तथा पारदर्शी दरों पर ही शुल्क लिया जाए। यदि निजी स्वास्थ्य सेवाओं में मुनाफाखोरी, मरीजों का आर्थिक शोषण और अनावश्यक जांच तथा इलाज के माध्यम से कमाई पर रोक लगाई जाए, तो कॉर्पोरेट अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर बनने की वर्तमान अंधी दौड़ और अत्यधिक व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा भी आपो-आप कम हो जाएगी।

कुल मिलाकर, केवल मेडिकल प्रवेश परीक्षा में हुए भ्रष्टाचार पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे मौजूद मूल कारणों – स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण, चिकित्सा शिक्षा के निजीकरण, सरकारी निवेश की कमी और कॉर्पोरेट मुनाफाखोरी (corporate profit making) – को भी दूर करना आवश्यक है। ऐसा होने पर ही प्रवेश प्रक्रिया में ईमानदारी आएगी और चिकित्सा व्यवस्था अधिक न्यायपूर्ण तथा जनहितैषी (public friendly) बन सकेगी। (स्रोत फीचर्स)

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कैंसर से जंग में एक नई उम्मीद – एटलस

चिकित्सा जगत में कैंसर (cancer)जैसी घातक बीमारी के सटीक उपचार के लिए शोधकर्ता लगातार नई संभावनाएं खोजने में लगे हुए हैं। इस कोशिश में शोधकर्ताओं के लिए एक सवाल पहेली बना हुआ है “क्या कारण है कैंसर के जोखिम का असर अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग होता है। कोई व्यक्ति तो कैंसर रोगी बन जाता है, वहीं कोई अन्य व्यक्ति सारे जोखिमों के बावजूद इस खतरनाक बीमारी से बचा रहता है?” जैसे कई सालों से धूम्रपान (smoking) करने वाले दो व्यक्तियों में से एक तो कैंसर का मरीज़ बन जाता है, और दूसरा बिलकुल स्वस्थ रहता है।

हाल ही में, साइंस जर्नल में बताया गया है कि कैंसर रिसर्च यूके (ब्रिटेन) और नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (अमेरिका) मिलकर एटलस (ATLAS) परियोजना के अंतर्गत एक अंतर्राष्ट्रीय शोध करने जा रहे हैं। लगभग ढाई करोड़ डॉलर का यह शोध कैंसर ग्रैण्ड चैलेंजेस (cancer grand challenges) द्वारा वित्तपोषित है। एटलस वह अंतर्राष्ट्रीय परियोजना है जिसके तहत हज़ारों वैज्ञानिक मिलकर एक स्वस्थ मानव शरीर की समस्त कोशिकाओं की पहचान करने का प्रयास कर रहे हैं।

डॉ. पॉल बस्टर्ड और उनकी टीम एक कैंसर एंटीबॉडी एटलस (cancer antibody atlas) बनाने में जुटी है, जिससे पता लगाया जा सकेगा कि प्राकृतिक तौर पर भारी जोखिम वाले व्यक्ति कैंसर से कैसे बचे रहते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस सवाल का जवाब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में हो सकता है। आम तौर पर बाहरी रोगजनकों से बचाव के लिए शरीर की बी-कोशिकाएं एंटीबॉडी बनाती हैं, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यही बी कोशिकाएं अपने ही प्रतिरक्षा तंत्र के खिलाफ काम करने वाली ऑटो-एंटीबॉडी (autiantibody) बनाने लगती हैं (यही ऑटो-एंटीबॉडी स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला कर देती हैं, जिससे ऑटोइम्यून बीमारियां होती हैं)।

वैज्ञानिकों का मानना है कि ये ऑटो-एंटीबॉडी शरीर में दो तरह की हो सकती हैं – कैंसर को बढ़ावा देने वाली या कैंसर से बचाने वाली। अनुमान है कि कैंसर को बढ़ावा देने वाली ऑटो-एंटीबॉडी ट्यूमर से बचाव करने वाले प्रतिरक्षा रसायनों (साइटोकाइंस) (cytokines) को खत्म कर सकती हैं, जिसके चलते कैंसर कोशिकाएं शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र से बचकर ट्यूमर बना लेती हैं। वहीं दूसरी ओर, बचाव करने वाली ऑटो-एंटीबॉडी कैंसर-कारी कोशिकाओं को शुरुआत में ही पहचान कर खत्म कर सकती हैं, या फिर कैंसर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकती हैं।

दरअसल, इस अध्ययन का विचार कोविड-19 (COVID-19) महामारी के दौरान किए गए एक अध्ययन से उभरा है। वैज्ञानिकों ने उस अध्ययन में पाया था कि गंभीर हालत वाले 10 से 15 प्रतिशत मरीज़ों में कुछ ऐसी ऑटो-एंटीबॉडीज़ थीं जो वायरस से लड़ने वाले उनके अपने प्रतिरक्षा रसायनों (टाइप-1 इंटरफेरॉन) का खात्मा कर रही थीं। इसलिए वे मरीज़ कोविड के प्रति बहुत ज़्यादा संवेदनशील हो गए थे। अब शोधकर्ता कैंसर में भी इनकी भूमिका समझने की कोशिश कर रहे हैं।  

पांच साल तक चलने वाले इस अध्ययन के शुरुआती चरण में दुनिया भर के 16,000 से ज़्यादा लोगों के खून के नमूनों की जांच की जाएगी। इसमें मुख्य रूप से तीन विशेष समूहों को शामिल किया जाएगा: 100 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोग, स्मोकर्स जो कैंसर-मुक्त हैं, और ऐसे जुड़वां बच्चे जिनमें सिर्फ एक कैंसर-रोगी है। खून के नमूनों में 20,000 से ज़्यादा अलग-अलग प्रोटीनों (proteins) का परीक्षण किया जाएगा। आगे चलकर 50,000 से ज़्यादा लोगों को शामिल किया जाएगा।

वैज्ञानिकों का मकसद ट्यूमर के विकास में प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली ऑटो-एंटीबॉडीज़ की भूमिका की पहचान करना है। इससे समय रहते कैंसर के जोखिम का सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा, कैंसर रोकथाम उपचार और दवाइयों का विकास हो सकेगा और वर्तमान इम्यूनोथेरेपी (immunotherapy) में सुधार किए जा सकेंगे। साथ ही, यदि कुछ हानिकारक ऑटो-एंटीबॉडीज़ की पहचान हुई, तो उन्हें जड़ से खत्म करने के उपचार भी विकसित किए जा सकते हैं। यह शोध कैंसर के खिलाफ जंग में एक नई उम्मीद साबित हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोशिकाओं के ऊर्जा तंत्र की सुरक्षा में मददगार ल्यूसीन

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

मारे शरीर की कोशिकाओं में मौजूद प्रोटीन अंगों के सुचारू कामकाज और उनके विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। प्रोटीन के निर्माण में 20 से ज़्यादा अमीनो एसिड्स (amino acids) की भूमिका होती है, ये प्रोटीन के बिल्डिंग (building blocks) ब्लॉक होते हैं। अमीनो एसिड शृंखला का क्रम ही कोशिकाओं में हर प्रोटीन की बनावट और कार्य तय करता है।

इनमें से कई अमीनो एसिड विशिष्ट कार्यों में अहम भूमिका निभाते हैं। मसलन, ग्लाइसिन (glycine) नामक अमीनो एसिड रक्त कोशिकाओं के लिए बहुत आवश्यक हैं; ल्यूसीन (leucine) अमीनो एसिड मांसपेशियों के विकास, ऊतकों की मरम्मत और ऊर्जा निर्माण में शामिल होता है। शरीर में आठ और अनिवार्य अमीनो एसिड होते हैं जिन्हें शरीर खुद नहीं बना सकता। अंगों को कार्यक्षम रखने के लिए इन्हें बाहर से यानी आहार (या पूरक) के रूप में लेना पड़ता है।

हर अंग के लिए ऊर्जा माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria) से बनती है (प्राचीन ग्रीक में, माइटो का मतलब है धागे जैसा और कॉन्ड्रियन का मतलब है दाने)। माइटोकॉन्ड्रिया धागे जैसे अनोखे कोशिकांग होते हैं जो हर कोशिका में हज़ारों की संख्या में पाए जाते हैं। ये हमारे शरीर के ज़्यादातर अंगों के ऊर्जा के स्रोत होते हैं।

माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका में ऊर्जा की आपूर्ति बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। ये एडिनोसीन ट्राइफॉस्फेट (ATP) अणु बनाते हैं, जो कोशिका के लिए ऊर्जा का स्रोत है। कुल मिलाकर माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका की बैटरी होते हैं, जो ATP का इस्तेमाल करके उसे चार्ज करते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया और मूल कोशिका के बीच का जुड़ाव बहुत ज़रूरी है क्योंकि ऑक्सीकरण (oxidation) और श्वसन के दौरान इस कोशिकांग की झिल्ली खराब हो सकती है, जिससे कोशिका का काम प्रभावित हो सकता है।

उदाहरण के लिए, एक वयस्क मनुष्य के हृदय में 2 अरब से ज़्यादा मांसपेशीय कोशिकाएं होती हैं जो बिना रुके काम करती रहती हैं, और इनमें से हर कोशिका में 5000 से 8000 माइटोकॉन्ड्रिया होते हैं। हृदय के धड़कने के लिए ज़रूरी ज़्यादातर ऊर्जा इन्हीं माइटोकॉन्ड्रिया से मिलती है।

शरीर के हर अंग को सुचारू काम करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा चाहिए होती है। जब किसी अंग को ज़्यादा ऊर्जा चाहिए होती है तो नए माइटोकॉन्ड्रिया बनते हैं, लेकिन साथ ही ज़्यादा कार्यभार के कारण हुई क्षति के चलते कुछ माइटोकॉन्ड्रिया को खत्म भी करना पड़ता है।

इस प्रक्रिया के दौरान माइटोकॉन्ड्रिया बनाने वाले प्रोटीन खत्म हो जाते हैं। मुद्दे की बात यह है कि माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली (membrane) के प्रोटीन खत्म नहीं होने चाहिए। बल्कि ज़रूरत उन्हें अधिक संख्या में खत्म होने से बचाने के तरीके खोजे जाने की है। वैज्ञानिक ऐसे तरीकों की खोज कर रहे हैं जिनसे इन बाहरी भित्तियों को तनाव के कारण पूरी तरह ठप्प होने से बचाया जा सके, क्योंकि इससे चयापचय और बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं।

ल्यूसीन की भूमिका

यहीं पर अहम अमीनो एसिड ल्यूसीन काम आता है। यह शाखित शृंखला वाले अमीनो एसिड (BCAA) परिवार का हिस्सा है, जिसमें आइसोल्यूसीन (Isoleucine) और वैलीन (valine) जैसे अमीनो एसिड भी शामिल हैं। इनकी ज़रूरत मांसपेशियों, तंत्रिका तंत्र, हृदय और मस्तिष्क जैसे अंगों के विकास और कामकाज के लिए होती है।

BCAA मानव शरीर में नहीं बनते हैं, इसलिए इन्हें आहार (भोजन) के माध्यम से ग्रहण करना पड़ता है। इनके बिना, माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली ठीक से बन नहीं पाती या टिकी नहीं रह पाती। पिछले वर्ष जर्मनी के कोलोन विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एक्सेलेंस क्लस्टर ऑन एजिंग एंड एजिंग-एसोसिएटेड डिसीज़ेस के एक दल ने अध्ययन के लिए सी. एलिगेंस (Caenorhabditis elegans) नाम के छोटे गोल कृमि को मॉडल जीव के तौर पर चुना। नेचर सेल बायोलॉजी में प्रकाशित उनके नतीजों से पता चला कि BCAA ल्यूसीन एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है और माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली के प्रोटीन को समय-पूर्व खराब होने से रोकता है। ल्यूसीन इस काम को अंजाम SEL1L नामक प्रोटीन के साथ मिलकर देता है। SEL1L प्रोटीन क्षतिग्रस्त या विकृत प्रोटीन्स को पहचानता और हटाता है।

इस तरह, ल्यूसीन कोशिकाओं और अंगों को सुरक्षा प्रदान करता है और ज़्यादा ऊर्जा भी देता है। यह जानना अध्ययन का विषय हो सकता है कि क्या दूसरे BCAA भी कोशिकाओं की सुरक्षा   में ऐसी ही अहम भूमिका निभाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अंडाशय की नई प्रतिरक्षात्मक भूमिका

लंबे समय से प्रजनन वैज्ञानिक  मानते आए हैं कि प्रजनन उम्र (reproductive age) समाप्त होते ही महिलाओं में अंडाशय (ovary) की भूमिका शून्य हो जाती है, लगभग अपेंडिक्स की तरह। लेकिन हाल ही में हुए एक शोध ने इस पुरानी समझ को चुनौती दी है। फाइनबर्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन की डॉ. फ्रांसिस्का डंकन और उनकी टीम ने पाया कि रजोनिवृत्ति (menopause)) के बाद अंडाशय शरीर में नई जिम्मेदारी संभालने लगता है जो महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) से जुड़ी हो सकती है।

चूहों और इंसानों के अंडाशयों पर किया गया यह अध्ययन मॉलीक्यूलर ह्यूमन रीप्रोडक्शन में प्रकाशित हुआ है। दरअसल, पांच साल पहले, डॉ. डंकन ऐसी  कोशिकाओं के एक अध्ययन में जुड़ी थीं जिन्होंने विभाजन करना बंद कर दिया हो (इन्हें सेनेसेंट कोशिकाएं कहते हैं)। ऐसी कोशिकाओं की संख्या ऊतकों में बढ़ती जाने के साथ जरावस्था के लक्षण प्रकट होते हैं (senescent cells)।

इस अध्ययन के दौरान वे अंडाशय की पूरी उम्र में सेनेसेन्ट कोशिकाओं का अध्ययन करना चाहती थी। लेकिन स्वस्थ अंडाशय पर शोध संभव न होने के कारण उन्होंने रजोनिवृत्त हो चुकी (postmenopause) 50 से 75 वर्ष की महिलाओं के अंडाशय का अध्ययन किया। इन महिलाओं के अंडाशय चिकित्सकीय कारणों से निकाले गए थे।

उन्होंने पाया कि उम्र के साथ अंडाशय में अलग-अलग प्रकार के प्रोटीन बन रहे थे। डॉ. डंकन कहती हैं – यदि ये अंग उम्र के साथ नए प्रोटीन बना रहा है, तो इसका मतलब है कि इसमें बढ़ती उम्र के साथ कुछ-न-कुछ बदलाव आ रहे हैं। यह जानकारी पुरानी सोच से अलग और चौंकाने वाली थी, क्योंकि अगर रजोनिवृत्ति के बाद अंडाशय कुछ काम नहीं कर रहा होता तो उसमें उम्र के साथ कोई बदलाव नहीं आना चाहिए। 

और गहराई से अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं ने चूहों के तीन समूहों पर शोध किया। इनमें भी एक उम्र के बाद अंडाशय अंडा निर्माण बंद कर देता है, हालांकि उनमें इंसानों जैसे रजोनिवृत्ति वाले लक्षण – जैसे एस्ट्रोजन के स्तर में तेज़ गिरावट नहीं होती।

शोधकर्ताओं ने युवा चूहों, प्रजनन काल के आखिरी दौर वाले चूहों, और प्रजनन काल पार कर चुके चूहों के अंडाशय निकाले। प्रत्येक चूहे के एक अंडाशय के आरएनए (RNA) का अनुक्रमण करके उसके जीन्स की सक्रियता मापी। वहीं, दूसरे अंडाशय में अलग-अलग कोशिकाओं को पहचानने और फाइब्रोसिस (fibrosis) की वृद्धि मापने के लिए सूक्ष्मदर्शी से जांच की गई। फाइब्रोसिस ऊतकों के सख्त होने की प्रक्रिया है, जो बढ़ती उम्र के साथ स्वाभाविक रूप से होती है।

देखा गया कि चूहों के अंडाशयों में बढ़ती उम्र के साथ प्रजनन क्रिया से जुड़े रसायन कम हो गए थे। लेकिन प्रजनन काल पार कर चुके चूहों के अंडाशय में युवा चूहों की तुलना में अलग-अलग तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाओं का भंडार पाया गया।

बूढ़े चूहों के अंडाशय में ऐसे जीन भी भारी मात्रा में सक्रिय थे जो शोथ (सूजन) (inflammation) बढ़ाने वाले  रसायन बनाते हैं। ये रसायन शरीर के रक्त प्रवाह के ज़रिए दूसरे अंगों तक पहुंच सकते हैं। 

यह शोध रजोनिवृत्ति के बाद अंडाशय को एक नाकारा अंग समझने के बजाय एक नई संभावना की ओर इशारा करता है। इससे संकेत मिलता है कि अंडाशय अपना मूल काम (अंडा निर्माण) समाप्त होने के बाद एक नई भूमिका अपना सकता है। अनुमान है कि यदि उम्रदराज अंडाशय रक्तप्रवाह में ये शोथ बढ़ाने वाले अणु छोड़ रहे हैं तो शायद इसी कारण महिलाओं को, उम्र पुरुषों की तुलना में लंबी होने के बावजूद, बुढ़ापे के दौरान होने वाली जीर्ण बीमारियों का अधिक सामना करना पड़ता है।

कई सालों से रजोनिवृत्त महिलाओं के अंडाशय आम तौर पर किसी भी सर्जरी के दौरान निकाल दिए जाते हैं, क्योंकि प्रजनन काल खत्म होने के बाद अंडाशय को बेकार और कैंसरकारी (cancerous) समझा जाता रहा है। यह शोध महिलाओं के शरीर को समझने में मददगार साबित हुआ है। हालांकि अभी भी महिलाओं की शारीरिक रचना को पूरी तरह नहीं समझा जा सका है लेकिन इतना स्पष्ट है कि महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए रजोनिवृत्ति के दौरान व उसके बाद में होने वाली समस्याओं का बारीकी से अध्ययन करने और समझ विकसित करने की ज़रूरत है।(स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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