चौदह वर्ष की बहस के बाद एक बीमारी का नया नाम

ऋषि राज राय

पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, जिसे PCOS कहा जाता था, अब आधिकारिक रूप से पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) कहलाएगा। यह घोषणा 12 मई 2026 को लैंसेट में प्रकाशित एक अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्र में हुई। इस नाम-परिवर्तन के पीछे चौदह वर्षों की प्रक्रिया है, जिसमें छह महाद्वीपों से 22,000 से अधिक मरीज़ों, डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और मरीज़-संगठनों की राय ली गई। अगुवाई ऑस्ट्रेलिया के मोनाश विश्वविद्यालय की हेलेना टीड ने की, और फिनलैंड के ओलू विश्वविद्यालय की तेरही पिल्टोनन सहायक रहीं।नाम बदलने का कारण वैज्ञानिक असंतोष था। PCOS का नाम अंडाशय पर बनने वाले सिस्ट (गांठ – त्वचा के नीचे या शरीर के अंदर स्थित एक बंद थैली जिसमें तरल पदार्थ, हवा या मुलायम पदार्थ भरा होता है) पर आधारित था। लेकिन ये गांठें असल में गांठें नहीं होतीं। ये अपरिपक्व फॉलिकल (पुटिकाएं) (immature follicle) होती हैं, जिन्हें अल्ट्रासाउंड जांच में गांठ (सिस्ट) जैसा दिखने के कारण यह नाम मिला था। इसी शोध समूह का एक अध्ययन दिखाता है कि इस बीमारी वाली महिलाओं में असामान्य अंडाशयी सिस्ट का प्रसार बाकी आबादी से अलग नहीं है। यानी नाम जिस लक्षण पर आधारित था, वह न रोग-विशिष्ट था, न अनन्य।

इस बीमारी की असली प्रकृति अंडाशय तक सीमित नहीं है। यह एक बहु-तंत्रगत अंत:स्रावी-चयापचय अवस्था है, जिसमें इंसुलिन प्रतिरोध, एंड्रोजेन हार्मोन की अधिकता, हाइपोथैलेमस-पिट्यूटरी अनियमितता, त्वचा के लक्षण, वज़न में परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य पर असर वगैरह शामिल हैं। PMOS (Polyendocrine Metabolic Ovarian Syndrome) वाली महिलाओं में टाइप-2 डायबिटीज़ का जोखिम कई गुना अधिक होता है, हृदय रोग का जोखिम बढ़ा हुआ होता है, और मानसिक अवसाद कहीं ज़्यादा आम है। इनमें से कोई भी अकेले अंडाशय की बीमारी नहीं है।

पुराने नाम (PCOS) ने तीन बड़ी समस्याएं पैदा की थीं। पहली, निदान में देरी। लक्षण चूंकि त्वचा, वज़न, बालों, या मनःस्थिति के होते हैं, महिलाएं अलग-अलग विशेषज्ञों के पास चक्कर काटती रहती हैं, और स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynaecologist) के पास पहुंचने पर ही कभी-कभार निदान हो पाता है। दूसरी, टुकड़ों-टुकड़ों में इलाज। एक डॉक्टर बालों की समस्या, दूसरा अनियमित माहवारी, तीसरा वज़न की दिक्कत पर ध्यान देता; कोई पूरी तस्वीर नहीं देखता था। और तीसरी लांछन का डर। ‘ओवेरियन’ (ovarian) शब्द के कारण कई देशों में महिलाओं को अपनी बीमारी बताने में शर्म आती थी।

नाम-परिवर्तन की प्रक्रिया अपने आप में गौरतलब है। इसमें अमेरिकन एंडोक्राइन सोसाइटी, अंतर्राष्ट्रीय एंड्रोजेन एक्सेस और PCOS सोसाइटी, और ब्रिटेन के वेरिटी सहित 56 अकादमिक, चिकित्सा और मरीज़ संगठनों ने भाग लिया। वर्ष 2017, 2023 और 2025 में तीन वैश्विक सर्वेक्षण हुए। अंतिम सर्वेक्षण में लगभग 14,360 मरीज़ और स्वास्थ्य पेशेवर शामिल हुए। कार्यशालाओं में विश्व के हर क्षेत्र से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ। जब पूछा गया कि नए नाम से क्या उम्मीद करनी चाहिए, तो तीन बातें सबसे ऊपर थीं: नया नाम लांछन कम करे, आसानी से समझ आए और वैज्ञानिक रूप से सही हो।

नाम बदलने पर आपत्ति भी दर्ज हुई। अमेरिका के दो प्रमुख मरीज़-संगठन नेताओं, अंजेला ग्रासी और साशा ऑटी का कहना है कि PMOS “बहुत बदला हुआ तो है लेकिन पर्याप्त नहीं बदला है।” उनका मुख्य तर्क यह है कि नए नाम में ‘ओवेरियन’ शब्द बरकरार है, जो बीमारी के पुरुष रूप की संभावना को अनदेखा करता है।

हाल के अध्ययन बताते हैं कि PMOS वाली महिलाओं के पुरुष रक्त-सम्बंधियों में भी इंसुलिन प्रतिरोध, कम उम्र में गंजापन, और चयापचय जोखिम बढ़ा हुआ मिलता है। यानी बीमारी की जड़ में जो अंत:स्रावी चयापचय (endocrine system) असंतुलन है, वह सिर्फ अंडाशय में नहीं होता बल्कि पुरुषों में भी हो सकता है।

भारत के लिए यह बहस विशेष रूप से प्रासंगिक है। यहां PMOS का प्रसार 8 से 22 प्रतिशत के बीच आंका गया है; और शहरी युवा महिलाओं में यह और अधिक हो सकता है। लेकिन भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था इसे अभी भी मुख्यतः स्त्री रोग (gynaecological) के रूप में देखती है, न कि चयापचय (metabolism) से सम्बंधित बीमारी के रूप में। परिणाम यह है कि करोड़ों महिलाएं बिना निदान के जीती हैं, या केवल जन्म-नियंत्रण गोलियों से लक्षण दबाती हैं, जबकि चयापचय जोखिम पीछे-पीछे बढ़ता रहता है। नए नाम का असर तभी होगा जब सरकारी दिशानिर्देश, मेडिकल कॉलेजों का पाठ्यक्रम, और आयुष्मान भारत जैसे कार्यक्रम इसे चयापचय बीमारी की तरह देखना शुरू करें।

नए नाम से निदान के मानदंड (diagnosis) और इलाज तुरंत नहीं बदलेंगे। जो बदलेगा वह है भाषा, और भाषा के साथ ध्यान की दिशा। लैंसेट में शोध दल ने साफ किया है कि कई वर्षों तक दोनों नाम साथ चलेंगे, चिकित्सा रिकॉर्ड में दोनों दिखाई देंगे, और नए नाम को धीरे-धीरे अपनाया जाएगा।

वैसे चिकित्सा के इतिहास (Medical history) में यह पहला नाम-परिवर्तन नहीं है। बाइपोलर डिसऑर्डर (पहले उन्मादी अवसाद या मैनिक डिप्रेशन कहा जाता था), डाउन सिंड्रोम (पहले मंगोलिज़्म या मंगोलियन पागलपन), और पेट के अल्सर (पूर्व में अपच) के मामले में हर बार नाम केवल शब्द नहीं था। नाम ने तय किया कि डॉक्टर क्या देखेंगे, शोधकर्ता क्या पूछेंगे, और मरीज़ अपनी बीमारी को कैसे समझेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दिल की धड़कन दिमाग के काम को प्रभावित करती है

क प्रयोग चल रहा है। इसमें शामिल प्रतिभागी को एक आसान-सा काम दिया गया है। सामने एक पर्दे पर दो वर्ग दिख रहे हैं। जैसे ही किसी वर्ग का रंग बदले, प्रतिभागी को एक बटन दबा देना है। अलबत्ता, प्रतिभागी को यह मालूम नहीं है कि दो में से एक वर्ग का रंग तब बदलता है जब उसका दिल सिकुड़ता (heart contraction) है और दूसरे का रंग दो धड़कनों के बीच कभी बदलता है। लेकिन दिमाग इस कारस्तानी को पकड़ लेता है। सैकड़ों ऐसे परीक्षणों में देखा गया कि दिमाग उन दो वर्गों के लिए अलग-अलग प्रतिक्रिया देता है।

2024 में न्यूरोइमेज में प्रकाशित इस अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि दिल की धड़कन खामोशी से दिमाग द्वारा सूचनाओं की प्रोसेसिंग को प्रभावित करती है। इससे एक और चिंताजनक सरोकार उभरता है: शरीर की जिन अंदरुनी लयों (internal rythm) को सामान्यत: पृष्ठभूमि में चल रहा शोर (बैकग्राउंड नॉइस) माना जाता है, वे शायद तंत्रिका विज्ञान में किए जा रहे प्रयोगों को प्रभावित करती हैं। कई शोधकर्ताओं ने इस मामले में चेतावनी प्रकट की है और एक शोध पत्र में तो अध्ययनों में इन लयों का हिसाब रखने और उन्हें परिणामों की व्याख्याओं में शामिल करने के लिए मानक दिशानिर्देश भी प्रस्तुत किए गए हैं।

वैज्ञानिकों को यह बात तो सालों से पता रही है कि दिमाग शरीर के अंदर से मिलने वाले संदेशों का ध्यान रखता है। इसे इंटरोसेप्शन (Introception) कहते हैं। उदाहरण के लिए, दिल की हर धड़कन रक्त वाहिनियों के ज़रिए दबाव की एक तरंग प्रेषित करती है और दिमाग में उपस्थित संवेदी मार्गों को सक्रिय कर देती है। ये दिमाग में फीडबैक का सबब बनते हैं। अब नई बात यह है कि ये संदेश प्रयोगों को प्रभावित कर सकते हैं; ऐसे प्रयोगों को भी जिनका सम्बंध इंटरोसेप्शन से नहीं है।

न्यूरोइमेज में प्रकाशित अध्ययन में वर्गों के रंग परिवर्तन को भांपने की प्रतिभागियों की क्षमता पर दिल की धड़कन के समय अंतराल से कोई फर्क नहीं देखा गया। लेकिन खोपड़ी पर लगे इलेक्ट्रो-एन्सिफेलोग्राफी (ईईजी) यंत्र की रिकॉर्डिंग ने कुछ अलग ही कहानी बयान कर दी।  विज़ुअल कॉर्टेक्स (मस्तिष्क का वह हिस्सा जो आंखों से मिलने वाले संकेतों को पकड़ता और समझता है) (visual cortex) ने तब कम सशक्त प्रतिक्रिया दी जब रंग परिवर्तन दिल के सिकुड़ने के दौरान हुआ। शोधकर्ताओं का मत है कि शायद जब रंग परिवर्तन का संदेश आया तो दिल के सिकुड़ने का संदेश दिमाग का ध्यान आकर्षित करने के लिए होड़ कर रहा था।

इसी तरह के मुद्दे ब्रेन-स्कैनिंग (एमआरआई वगैरह) अनुसंधान में भी उभरे हैं। जैसे यह पता चला है कि दिल की धड़कन और श्वसन ऐसी गतियां और उतार-चढ़ाव उत्पन्न कर सकते हैं जो फंक्शनल एमआरआई डैटा (funtional MRI data) में विकृतियां पैदा कर दें। और तो और, इन विकृतियों को सुधारने की मानक विधियां शायद पूरी तरह कारगर नहीं हैं। 

ये परिणाम सुझाते हैं कि तंत्रिका वैज्ञानिकों को अपने डैटा में दिल की धड़कन से सम्बंधित प्रभावों से निपटना होगा। कई शोधकर्ता ऐसा करते भी हैं लेकिन अप्रैल में सायकोफिज़ियोलॉजी में प्रकाशित पर्चा और अधिक मानकीकरण की ज़रूरत रेखांकित करता है। ईईजी और मैग्नेटोएन्सिफेलोग्राफी पर दिल की धड़कन के असर सम्बंधी 132 इंसानी अध्ययनों की समीक्षा में पता चला कि ये सभी बहुत अलग-अलग विधियों का उपयोग करते हैं, और प्राय: रिपोर्ट भी नहीं करते। इसके चलते कभी-कभी इनके परिणामों की आपस में तुलना मुश्किल या नामुमकिन हो जाती है। इसे ध्यान में रखते हुए मैंक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमैन कॉग्निटिव एंड ब्रेन साइन्सेस के पी. स्टाइनफैथ और उनके साथियों ने एक मानक प्रोटोकॉल (standard protocol) प्रकाशित किया है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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मैच में कूलिंग ब्रेक और ठंडक का विज्ञान

फुटबॉल, हॉकी, बास्केटबॉल, टेनिस, बेडमिंटन जैसे खेलों में खिलाड़ियों (sportsman) को काफी भाग-दौड़ करनी पड़ती है। इस वजह से शरीर काफी गर्म हो जाता है और ठंडक देने के लिए व्यवस्था करनी होती है। इस मकसद से 2026 के फुटबॉल विश्व कप में हाइड्रेशन ब्रेक (hydration break) रखे गए थे। फीफा का कहना है कि ये ब्रेक खिलाड़ियों की भलाई को ध्यान में रखकर जोड़े गए थे।

अलबत्ता, देखा यह गया कि खेल रुकते ही ड्रिंक्स मैदान पर पहुंचते, खिलाड़ी मैदान पर ही बने रहते और विज्ञापनों का सिलसिला शुरू हो जाता। कई खेलकूद विज्ञानियों का कहना है कि जिस ढंग से ये ब्रेक्स लागू किए गए वे शरीर के बढ़ते तापमान और उसकी वजह से पैदा होने वाले तनाव को संभालने में नाकाम थे।

दरअसल, कूलिंग ब्रेक्स(cooling breaks) गर्मी के तनाव से उत्पन्न जोखिम के हिसाब से निर्धारित होने चाहिए और उन्हें कारगर ढंग से ठंडक प्रदान करनी चाहिए। लेकिन देखा गया कि इन ब्रेक्स के समय खिलाड़ी धूप में ही खड़े रहकर आगे की रणनीति के निर्देश सुनते रहते थे। ठंडक के लिए सबसे पहली ज़रूरत होगी कि खिलाड़ी छाया में बैठ जाएं।

इस संदर्भ में फीफा (FIFA) के अपने चिकित्सा दिशानिर्देश काफी स्पष्ट हैं: कूलिंग ब्रेक्स का एकमात्र मकसद ऊष्मा-जनित बीमारियों की रोकथाम है और ऐसे ब्रेक्स तभी दिए जाने चाहिए जब पर्यावरणीय ऊष्मा-जनित तनाव एक हद से ज़्यादा हो जाए। इस हद को वेट-बल्ब तापमान 32 डिग्री सेल्सियस माना जाता है। वेट-बल्ब तापमान हवा में नमी की मात्रा और तापमान दोनों का मिला-जुला पैमाना है। हम इंसान अपने शरीर को ठंडा रखने के लिए मूलत: पसीने के वाष्पीकरण पर निर्भर हैं। यदि हवा में पहले से ही ज़्यादा नमी (उमस) है तो पसीने का वाष्पीकरण धीमा पड़ जाता है। इसलिए तापमान अपेक्षाकृत कम हो और हवा में नमी ज़्यादा हो तो गर्मी ज़्यादा महसूस होती है। वेट-बल्ब तापमान (wet bulb temperature) हमें इसी संतुलन की सूचना देता है।

तो फीफा के दिशानिर्देशों के अनुसार कूलिंग ब्रेक की ज़रूरत तब होती है जब वेट-बल्ब तापमान 32 डिग्री से ज़्यादा हो जाए। लेकिन देखा यह गया है कि सारे मैचों में कूलिंग ब्रेक निश्चित अंतराल पर आ जाते हैं, यहां तक कि नियंत्रित जलवायु वाले स्टेडियम में भी। यानी इन ब्रेक्स का सम्बंध ऊष्मीय तनाव (humidity stress) से नहीं रह गया है बल्कि ये रस्म बन गए हैं।

इस बात से तो इन्कार नहीं किया जा सकता कि एथलीट्स (athletes) के लिए गर्मी से परास्त होना आम बात है। लेकिन जर्नल ऑफ साइन्स एंड मेडिसिन इन स्पोर्ट्स तथा ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में एच. ए. ब्राउन व उनके साथियों के शोधपत्र में इस मामले में एक परीक्षण के परिणाम प्रकाशित किए हैं जो ऐसे कूलिंग ब्रेक्स के अर्थहीन होने की बात कहते हैं।

ब्राउन एवं उनके साथियों ने कुछ प्रतिभागियों के साथ एक प्रयोग किया था। यह 40 डिग्री सेल्सियस तथा 41 प्रतिशत आर्द्रता पर खेले गए 90 मिनट के एक फुटबॉल मैच का सिमुलेशन (simulation) था। इस दौरान उन्होंने ठंडक के तीन तरीके अपनाए थे – निष्क्रिय ब्रेक, सक्रिय ठंडक वाले ब्रेक तथा रिकवरी पीरियड। तीनों में ज़बरदस्त अंतर देखने को मिले।

चलते खेल में छोटे-छोटे ब्रेक्स जिनमें बर्फ में भीगे तौलियों और कोल्ड-ड्रिंक्स का इस्तेमाल किया गया था और साथ में थोड़ा लंबा हाफ-टाइम ब्रेक (long half-time break) दिया गया था, उनमें शरीर का केंद्रीय तापमान भी कम रहा और कार्डियो-वैसक्यूलर तनाव (cardiovascular stress) भी काफी कम रहा। दूसरी ओर, ठंडक देने के सक्रिय प्रयासों के बिना मिले ब्रेक्स ने नगण्य राहत पहुंचाई। 

दरअसल, महत्व खेल के दौरान मिलने वाली रुकावट का नहीं है, बल्कि इसका है कि इस रुकावट का इस्तेमाल कैसे किया जाता है। ब्राउन का कहना है कि ठंडक हासिल करने के सक्रिय प्रयासों के बिना ऐसे ब्रेक्स बेकार ही होंगे। और यह बात सिर्फ खिलाड़ियों के लिए नहीं बल्कि सामान्य मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है – चाहे वे निर्माण स्थलों के मज़दूर हों, खेत पर काम कर रहे श्रमिक हों। इन सभी के लिए हस्तक्षेप की रणनीति एक सी होगी। इसमें विश्राम, कार्यिकीय क्षति की रोकथाम और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए पानी की आपूर्ति जैसे तत्व शामिल होंगे।

ब्राउन के मुताबिक फुटबॉल पर ध्यान देना इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण है कि जब आप ऐसे प्रतिष्ठित आयोजनों में सही तरीके नहीं अपनाते तो एक गलत संदेश देते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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मस्तिष्क हिसाब रखता है कि नींद कब पूरी हो गई

नींद की कमी (sleep deprivation) बड़ी समस्या है और कई हादसों का कारण बनती है। हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में नींद की गुणवत्ता और नींद की कमी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। वॉशिंगटन युनिवर्सिटी की तंत्रिका वैज्ञानिक याओ चेन और उनकी टीम ने चूहों पर शोध करके यह जानने की कोशिश की कि मस्तिष्क कैसे भांप लेता है कि अब जागने का वक्त हो गया है।

वैसे तो नींद पर काफी अध्ययन हुए हैं लेकिन ज़्यादातर शोध मस्तिष्क की नींद से जागने की क्रियाविधि या फिर लंबे समय तक नींद की कमी से होने वाले बदलावों पर केंद्रित रहे हैं। इसलिए यह पहेली ही रही कि मस्तिष्क यह हिसाब-किताब कैसे रखता है कि एक लगातार नींद में कितनी देर सो लिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि वैज्ञानिकों को ऐसे रासायनिक संकेत मिले हैं जो मस्तिष्क में ‘नींद के टाइमर’ (sleep timer) की तरह काम करते हैं।

शोधकर्ताओं ने चूहों के मस्तिष्क में प्रोटीन काइनेज़-A (PKA) (protein kinase) नामक एंज़ाइम के असर की जांच की। इसके असर को वास्तविक समय में जांचने के लिए एक खास फ्लोरेसेंट सेंसर (flourescent sensor) का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, पहले से ही पता था कि यह एंज़ाइम मनुष्यों में जाग्रत अवस्था से जुड़ा है। यह मस्तिष्क की कोशिकाओं की सतह पर प्रोटीन टैग (रासायनिक चिंह) जोड़ता है। जांच में पाया गया कि जाग्रत चूहों में ये प्रोटीन टैग लगातार बन रहे थे और उनका स्तर अधिक और स्थिर था। दूसरी ओर, नींद की अवस्था में इनका स्तर वक्त के साथ नींद के पूरे सत्र में धीरे-धीरे कम होता गया। जब नींद में व्यवधान पैदा हुआ तो टैग का स्तर (जो कम हो रहा था) अचानक बढ़कर चरम सीमा तक पहुंच गया और वापिस नींद लगने पर टैग का स्तर फिर से धीरे-धीरे घटने लगा।  

शोधकर्ताओं के अनुसार यह प्रोटीन टैग नींद की कुल अवधि के साथ-साथ व्यवधान की आवृत्ति का भी हिसाब रखता है। चूंकि यह टैग नींद में आए व्यवधानों (disturbances) का भी हिसाब रखता है, तो इसकी मदद से प्रति क्षण यह बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी समय चूहे के जाग जाने की कितनी संभाविता है बनिस्बत यह देखकर कि कोई चूहा कितनी देर से सो रहा है।

अलबत्ता, टैगिंग का स्तर (tagging level) किसी अलार्म की तरह काम नहीं करता जो आपको झटके से जगा दे। वह काम तो कोई शोर भी कर सकता है। दरअसल, टैगिंग बताता है कि आपका शरीर कब कार्यिकीय रूप से जागने के लिए तैयार है।

जब शोधकर्ताओं ने चूहों को देर तक जगाए रखने के बाद सोने दिया, तो PKA संकेत सामान्य ऊंघने की तुलना में कम हो गया। इससे पता चलता है कि PKA संकेत यह भी बता सकता है कि नींद के कितने घाटे की पूर्ति हो गई है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जानकारी भविष्य में रोज़ाना की अधूरी नींद और नींद की गुणवत्ता (sleep quality) की जांच विकसित करने में मददगार हो सकती है। भविष्य में, ड्राइवरों, आपातकर्मियों, तनाव व कम नींद वाले कामों में लगे लोगों की जांच हो सकेगी और नींद की कमी से होने वाले जोखिम और बड़े हादसों से बचा जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

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नीट घोटाला और स्वास्थ्य-सेवा क्षेत्र का अधोपतन

डॉ. अनंत फड़के

स वर्ष मेडिकल कॉलेजों में स्नातक (MBBS) और स्नातकोत्तर (PG) प्रवेश के लिए होने वाली नीट परीक्षा (NEET Examination) व्यवस्था पूरी तरह विफल साबित हुई। इसके विरोध में दिल्ली में जंतर-मंतर पर और अन्य शहरों में हुए जेन-ज़ी आंदोलनों और अन्य दबावों के चलते इस परीक्षा प्रणाली को रद्द किया जाएगा या इसमें सुधार किए जाएंगे। लेकिन केवल इतना करने से प्रवेश-प्रक्रिया में फैला भ्रष्टाचार और अव्यवस्था समाप्त नहीं होगी। इसके लिए स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण, कॉर्पोरेटीकरण, चिकित्सा शिक्षा के निजीकरण और महंगे निजी कोचिंग संस्थानों (private coaching centres) के बढ़ते प्रभाव जैसे मूल कारणों को समाप्त करना होगा। आइए संक्षेप में समझें कि यह स्थिति क्यों है।

सरकारी अस्पतालों की जगह निजी अस्पतालों का विस्तार

1980 तक सबसे आधुनिक चिकित्सा सुविधाएं मुख्य रूप से शहरों के छोटे-बड़े सरकारी अस्पतालों और कुछ बड़े चैरिटेबल (परमार्थ) अस्पतालों में उपलब्ध थीं। यहां इलाज के लिए मुख्यतः गरीब और मध्यम वर्ग (poor & middle class) के लोग आते थे, लेकिन समाज के अन्य वर्ग भी इन अस्पतालों में इलाज करवाते थे।

पिछले 40–45 वर्षों में नई और अत्याधुनिक चिकित्सा तकनीकों के आने से स्वास्थ्य सेवाओं का स्वरूप बदल गया। सही समय पर बीमारी की पहचान और इलाज पहले की तुलना में अधिक आसान हो गया। लेकिन इसका लाभ सभी लोगों तक पहुंचाने के लिए सरकार को पुराने सरकारी अस्पतालों का आधुनिकीकरण करना चाहिए था और पर्याप्त संख्या में नए सरकारी अस्पताल भी खोलने चाहिए थे। साथ ही, ईमानदारी से काम करने वाले चैरिटेबल अस्पतालों (cheritable hospitals) को भी ऐसी सुविधाएं विकसित करने के लिए सरकारी सहायता (subsidy) मिलनी चाहिए थी। लेकिन 1980 के बाद सरकार ने स्वास्थ्य क्षेत्र में भी निजीकरण (privatization) की नीति अपनाई और धीरे-धीरे अपनी ज़िम्मेदारी से पीछे हटना शुरू कर दिया।

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 1980 से ही सिफारिश की है कि सरकार का स्वास्थ्य पर कुल खर्च सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 5 प्रतिशत होना चाहिए। लेकिन भारत में केंद्र और राज्य सरकारों का संयुक्त स्वास्थ्य खर्च बढ़ने की बजाय 2014 के बाद GDP के लगभग 1.3 प्रतिशत पर ही स्थिर रहा। 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के अनुसार 2025 तक सरकारी स्वास्थ्य खर्च को GDP के 2.5 प्रतिशत तक पहुंचाया जाना था और इसमें केंद्र सरकार का हिस्सा 1 प्रतिशत होना था। लेकिन पिछले पांच वर्षों में केंद्र सरकार का स्वास्थ्य खर्च GDP के 0.3 प्रतिशत से भी कम रहा है।

कॉर्पोरेट स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार

सरकार को सभी स्तरों पर आधुनिक चिकित्सा तकनीक के लिए पर्याप्त निवेश करना चाहिए था। लेकिन 1990 के बाद यह निवेश मुख्य रूप से बड़ी कॉर्पोरेट कम्पनियों (corporate companies) ने किया है। पहले भी दवा उद्योग में कॉर्पोरेट निवेश था। बाद में आधुनिक पैथॉलॉजी लैब, रक्त जांच केंद्र, स्कैन सेंटर और बड़े कॉर्पोरेट अस्पताल भी तेज़ी से बढ़ने लगे। कई ऐसे अस्पताल, जो केवल नाम के लिए चैरिटेबल थे लेकिन वास्तव में लाभ कमाने के उद्देश्य से चलते थे, उनमें भी कानूनी रास्ते निकालकर कॉर्पोरेट कम्पनियों ने निवेश किया। 1991 से 2024 के बीच स्वास्थ्य क्षेत्र में कॉर्पोरेट निवेश लगभग ₹500 करोड़ से बढ़कर ₹50,000 करोड़ तक पहुंच गया।

कई विकसित देशों और वियतनाम जैसे देशों में यह नियम है कि डॉक्टर वैज्ञानिक दिशानिर्देशों के अनुसार ही यह तय करेंगे कि कौन-सी जांच या प्रक्रिया वास्तव में आवश्यक है। लेकिन भारत में ऐसी कोई अनिवार्यता नहीं है। इसलिए बहुत कम विशेषज्ञ इन वैज्ञानिक दिशानिर्देशों का पालन करते हैं। 1980 के बाद मरीज़ों को किसी विशेष लैब में भेजने के बदले डॉक्टरों को कमीशन (कट) (commision) मिलने की प्रथा भी बढ़ी। परिणाम यह हुआ कि वास्तव में ज़रूरत हो या न हो, अधिक से अधिक जांच और प्रक्रियाएं करवाकर अधिक लाभ कमाना कई निजी अस्पतालों का मुख्य उद्देश्य बन गया। ऐसे मुनाफा-केंद्रित (profit-centred) अस्पतालों में काम करने वाले विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या लगातार बढ़ती गई। उनके साथ काम करके कमाई करने वाले अन्य विशेषज्ञ डॉक्टरों की संख्या भी बढ़ती गई।

मुनाफाकेंद्रित निजी मेडिकल कॉलेजों की बढ़ोतरी

ऐसे डॉक्टर तैयार करने के लिए, जो बाद में कॉर्पोरेट अस्पतालों (corporate hospitals) में काम करें, हर साल 10-20 लाख रुपए फीस लेने वाले निजी मेडिकल कॉलेजों की संख्या लगातार बढ़ती गई। इसका समर्थन यह कहकर किया जाता है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन की सिफारिश के अनुसार हर 1000 लोगों पर एक डॉक्टर होना चाहिए, और केवल सरकारी मेडिकल कॉलेजों के माध्यम से इतने डॉक्टर तैयार करना संभव नहीं है। इसलिए निजी मेडिकल कॉलेजों को बढ़ावा देना ज़रूरी बताया जाता है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इन निजी कॉलेजों (private college) से पढ़कर निकलने वाले अधिकांश डॉक्टर उन गरीब ग्रामीण या शहरी इलाकों में काम करने नहीं जाते, जहां डॉक्टरों की सबसे अधिक कमी है। कई विद्यार्थी कोचिंग पर 3-5 लाख खर्च करते हैं, और फिर निजी मेडिकल कॉलेज से एमबीबीएस और पीजी करने में 2-5 करोड़ तक खर्च हो सकता है। इतना खर्च करने के बाद कई डॉक्टर मुख्यतः शहरों के अमीर लोगों का इलाज करते हैं और कॉर्पोरेट अस्पतालों की मुनाफाखोरी का हिस्सा बन जाते हैं।

अनावश्यक जांच और इलाज का खर्च केवल अमीर लोग ही उठा सकते हैं। लेकिन उनके लिए भी यह अनुचित है और कभी-कभी स्वास्थ्य के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है। गरीब और मध्यम वर्ग के लोगों के लिए तो यह खर्च भारी कर्ज़ का कारण बन सकता है।

निजी मेडिकल शिक्षा का तेज़ी से विस्तार

इस लाभ कमाने वाली व्यवस्था में शामिल होने की इच्छा रखने वाले डॉक्टरों की संख्या लगातार बढ़ती गई। 1980 में देश में लगभग 110 एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज (allopathic medical college) थे। इनमें हर वर्ष लगभग 10,000 विद्यार्थी प्रवेश लेते थे। इनमें से केवल 10 प्रतिशत विद्यार्थी निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ते थे। पीजी शिक्षा में हर वर्ष लगभग 3–4 हज़ार डॉक्टर प्रवेश लेते थे और उनमें से केवल 5 प्रतिशत निजी मेडिकल कॉलेजों में जाते थे। लेकिन 2025–26 तक देश में लगभग 800 एलोपैथिक मेडिकल कॉलेज हो गए और उनमें लगभग सवा लाख विद्यार्थियों ने प्रवेश लिया। इनमें से लगभग 50 प्रतिशत विद्यार्थी निजी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ रहे हैं और हर साल 10–20 लाख फीस दे रहे हैं। ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि सरकार ने पर्याप्त संख्या में सरकारी मेडिकल कॉलेज नहीं खोले। इस कारण केवल योग्यता और मेहनत के आधार पर अच्छे मेडिकल करियर (medical carrer) का अवसर पर्याप्त नहीं बढ़ पाया।

इसी तरह, 2025–26 में पीजी मेडिकल शिक्षा में लगभग 75 से 80 हज़ार डॉक्टरों ने प्रवेश लिया, जिनमें लगभग आधे निजी मेडिकल कॉलेजों में गए।

नीट परीक्षा और कोचिंग उद्योग

मेडिकल प्रवेश की प्रतिस्पर्धा (competition) लगातार बढ़ती गई। राष्ट्रीय स्तर पर एक समान प्रवेश प्रक्रिया बनाने के लिए 2016 में नीट परीक्षा शुरू की गई। पहले वर्ष इस परीक्षा में लगभग आठ लाख विद्यार्थी बैठे थे। 2025 तक यह संख्या बढ़कर 22 लाख हो गई। इतनी बड़ी संख्या और इतनी कड़ी प्रतिस्पर्धा के कारण महंगे निजी कोचिंग संस्थानों का तेज़ी से विस्तार हुआ। 2025 तक यह नया कोचिंग उद्योग लगभग 25,000 करोड़ का हो गया। ऑनलाइन कोचिंग के लिए 15–20 हज़ार तक फीस ली जाती है, जबकि अच्छे कोचिंग संस्थानों (coaching institutes) की फीस लगभग एक लाख या उससे अधिक होती है। यह धारणा बनने लगी कि जितनी अधिक फीस, सफलता की संभावना उतनी अधिक। कुछ संस्थान ‘निश्चित चयन’ कराने का दावा करते हैं और उनके लिए विद्यार्थी 3–5 लाख तक खर्च करते हैं। यदि इनमें से कुछ विद्यार्थियों को ज़्यादा पैसे देकर प्रश्नपत्र लीक होने का लाभ भी मिलता हो, तो इसमें आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

केवल नीट में सुधार से समस्या हल नहीं होगी

नीट परीक्षा में हुए घोटाले ने यह स्पष्ट कर दिया कि अखिल भारतीय प्रवेश प्रणाली (all india admission system)की अपनी सीमाएं और गंभीर जोखिम हैं। इस विरोध के कारण वर्तमान व्यवस्था में सुधार होना चाहिए या आवश्यकता हो तो नई प्रवेश प्रणाली बनानी चाहिए। लेकिन केवल इससे प्रवेश प्रक्रिया में फैला भ्रष्टाचार (corruption) समाप्त नहीं होगा। असल में यह प्रतियोगिता ऐसे पेशे में प्रवेश पाने की है जहां बहुत अधिक पैसा और प्रतिष्ठा मिलती है। इसलिए निजी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश पाने की होड़ लगातार बढ़ रही है। भले ही बहुत से विद्यार्थियों को यह बात पूरी तरह समझ में न आती हो, लेकिन वर्तमान व्यवस्था की यही वास्तविकता है। इसलिए समस्या की जड़ पर प्रहार करना आवश्यक है।

क्या किया जाए?

1. सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं में बड़े पैमाने पर निवेश (high investement) किया जाए। केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा स्वास्थ्य पर खर्च में बड़ी वृद्धि की जाए। सरकारी अस्पतालों का विस्तार हो, उनमें आधुनिक तकनीकें उपलब्ध हों और सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था जनता के लिए पारदर्शी तथा जवाबदेह रहे। साथ ही, ईमानदारी से काम करने वाले चैरिटेबल अस्पतालों को भी सुविधाएं विकसित करने के लिए सरकारी सहायता मिले।

2. सरकारी मेडिकल कॉलेजों की संख्या बढ़ाई जाए। पर्याप्त नए सरकारी मेडिकल कॉलेज खोले जाएं। साथ ही, निजी मेडिकल कॉलेजों को भी सरकारी कॉलेजों के बराबर ही फीस लेने की अनुमति हो। यदि इससे कई निजी मेडिकल कॉलेज बंद भी हो जाएं, तो इससे जनता का नुकसान नहीं होगा। बल्कि मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं (medical entrance exam) के अत्यधिक महत्व और उनमें होने वाले भ्रष्टाचार को कम करने में मदद मिलेगी।

3. निजी स्वास्थ्य सेवाओं को वैज्ञानिक नियमों के अनुसार चलाया जाए। निजी अस्पतालों में इलाज केवल वैज्ञानिक चिकित्सा दिशानिर्देशों (scientific medical guidelines) के अनुसार ही किया जाए और मरीज़ों से केवल निर्धारित तथा पारदर्शी दरों पर ही शुल्क लिया जाए। यदि निजी स्वास्थ्य सेवाओं में मुनाफाखोरी, मरीजों का आर्थिक शोषण और अनावश्यक जांच तथा इलाज के माध्यम से कमाई पर रोक लगाई जाए, तो कॉर्पोरेट अस्पतालों में विशेषज्ञ डॉक्टर बनने की वर्तमान अंधी दौड़ और अत्यधिक व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा भी आपो-आप कम हो जाएगी।

कुल मिलाकर, केवल मेडिकल प्रवेश परीक्षा में हुए भ्रष्टाचार पर ध्यान देना पर्याप्त नहीं है। उसके पीछे मौजूद मूल कारणों – स्वास्थ्य सेवाओं के निजीकरण, चिकित्सा शिक्षा के निजीकरण, सरकारी निवेश की कमी और कॉर्पोरेट मुनाफाखोरी (corporate profit making) – को भी दूर करना आवश्यक है। ऐसा होने पर ही प्रवेश प्रक्रिया में ईमानदारी आएगी और चिकित्सा व्यवस्था अधिक न्यायपूर्ण तथा जनहितैषी (public friendly) बन सकेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कैंसर से जंग में एक नई उम्मीद – एटलस

चिकित्सा जगत में कैंसर (cancer)जैसी घातक बीमारी के सटीक उपचार के लिए शोधकर्ता लगातार नई संभावनाएं खोजने में लगे हुए हैं। इस कोशिश में शोधकर्ताओं के लिए एक सवाल पहेली बना हुआ है “क्या कारण है कैंसर के जोखिम का असर अलग-अलग लोगों पर अलग-अलग होता है। कोई व्यक्ति तो कैंसर रोगी बन जाता है, वहीं कोई अन्य व्यक्ति सारे जोखिमों के बावजूद इस खतरनाक बीमारी से बचा रहता है?” जैसे कई सालों से धूम्रपान (smoking) करने वाले दो व्यक्तियों में से एक तो कैंसर का मरीज़ बन जाता है, और दूसरा बिलकुल स्वस्थ रहता है।

हाल ही में, साइंस जर्नल में बताया गया है कि कैंसर रिसर्च यूके (ब्रिटेन) और नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट (अमेरिका) मिलकर एटलस (ATLAS) परियोजना के अंतर्गत एक अंतर्राष्ट्रीय शोध करने जा रहे हैं। लगभग ढाई करोड़ डॉलर का यह शोध कैंसर ग्रैण्ड चैलेंजेस (cancer grand challenges) द्वारा वित्तपोषित है। एटलस वह अंतर्राष्ट्रीय परियोजना है जिसके तहत हज़ारों वैज्ञानिक मिलकर एक स्वस्थ मानव शरीर की समस्त कोशिकाओं की पहचान करने का प्रयास कर रहे हैं।

डॉ. पॉल बस्टर्ड और उनकी टीम एक कैंसर एंटीबॉडी एटलस (cancer antibody atlas) बनाने में जुटी है, जिससे पता लगाया जा सकेगा कि प्राकृतिक तौर पर भारी जोखिम वाले व्यक्ति कैंसर से कैसे बचे रहते हैं। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि इस सवाल का जवाब शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली में हो सकता है। आम तौर पर बाहरी रोगजनकों से बचाव के लिए शरीर की बी-कोशिकाएं एंटीबॉडी बनाती हैं, लेकिन कुछ परिस्थितियों में यही बी कोशिकाएं अपने ही प्रतिरक्षा तंत्र के खिलाफ काम करने वाली ऑटो-एंटीबॉडी (autiantibody) बनाने लगती हैं (यही ऑटो-एंटीबॉडी स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला कर देती हैं, जिससे ऑटोइम्यून बीमारियां होती हैं)।

वैज्ञानिकों का मानना है कि ये ऑटो-एंटीबॉडी शरीर में दो तरह की हो सकती हैं – कैंसर को बढ़ावा देने वाली या कैंसर से बचाने वाली। अनुमान है कि कैंसर को बढ़ावा देने वाली ऑटो-एंटीबॉडी ट्यूमर से बचाव करने वाले प्रतिरक्षा रसायनों (साइटोकाइंस) (cytokines) को खत्म कर सकती हैं, जिसके चलते कैंसर कोशिकाएं शरीर के प्रतिरक्षा तंत्र से बचकर ट्यूमर बना लेती हैं। वहीं दूसरी ओर, बचाव करने वाली ऑटो-एंटीबॉडी कैंसर-कारी कोशिकाओं को शुरुआत में ही पहचान कर खत्म कर सकती हैं, या फिर कैंसर प्रतिरोधक क्षमता बढ़ा सकती हैं।

दरअसल, इस अध्ययन का विचार कोविड-19 (COVID-19) महामारी के दौरान किए गए एक अध्ययन से उभरा है। वैज्ञानिकों ने उस अध्ययन में पाया था कि गंभीर हालत वाले 10 से 15 प्रतिशत मरीज़ों में कुछ ऐसी ऑटो-एंटीबॉडीज़ थीं जो वायरस से लड़ने वाले उनके अपने प्रतिरक्षा रसायनों (टाइप-1 इंटरफेरॉन) का खात्मा कर रही थीं। इसलिए वे मरीज़ कोविड के प्रति बहुत ज़्यादा संवेदनशील हो गए थे। अब शोधकर्ता कैंसर में भी इनकी भूमिका समझने की कोशिश कर रहे हैं।  

पांच साल तक चलने वाले इस अध्ययन के शुरुआती चरण में दुनिया भर के 16,000 से ज़्यादा लोगों के खून के नमूनों की जांच की जाएगी। इसमें मुख्य रूप से तीन विशेष समूहों को शामिल किया जाएगा: 100 वर्ष से अधिक उम्र वाले लोग, स्मोकर्स जो कैंसर-मुक्त हैं, और ऐसे जुड़वां बच्चे जिनमें सिर्फ एक कैंसर-रोगी है। खून के नमूनों में 20,000 से ज़्यादा अलग-अलग प्रोटीनों (proteins) का परीक्षण किया जाएगा। आगे चलकर 50,000 से ज़्यादा लोगों को शामिल किया जाएगा।

वैज्ञानिकों का मकसद ट्यूमर के विकास में प्राकृतिक रूप से पाई जाने वाली ऑटो-एंटीबॉडीज़ की भूमिका की पहचान करना है। इससे समय रहते कैंसर के जोखिम का सटीक अनुमान लगाया जा सकेगा, कैंसर रोकथाम उपचार और दवाइयों का विकास हो सकेगा और वर्तमान इम्यूनोथेरेपी (immunotherapy) में सुधार किए जा सकेंगे। साथ ही, यदि कुछ हानिकारक ऑटो-एंटीबॉडीज़ की पहचान हुई, तो उन्हें जड़ से खत्म करने के उपचार भी विकसित किए जा सकते हैं। यह शोध कैंसर के खिलाफ जंग में एक नई उम्मीद साबित हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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कोशिकाओं के ऊर्जा तंत्र की सुरक्षा में मददगार ल्यूसीन

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

मारे शरीर की कोशिकाओं में मौजूद प्रोटीन अंगों के सुचारू कामकाज और उनके विकास में अहम भूमिका निभाते हैं। प्रोटीन के निर्माण में 20 से ज़्यादा अमीनो एसिड्स (amino acids) की भूमिका होती है, ये प्रोटीन के बिल्डिंग (building blocks) ब्लॉक होते हैं। अमीनो एसिड शृंखला का क्रम ही कोशिकाओं में हर प्रोटीन की बनावट और कार्य तय करता है।

इनमें से कई अमीनो एसिड विशिष्ट कार्यों में अहम भूमिका निभाते हैं। मसलन, ग्लाइसिन (glycine) नामक अमीनो एसिड रक्त कोशिकाओं के लिए बहुत आवश्यक हैं; ल्यूसीन (leucine) अमीनो एसिड मांसपेशियों के विकास, ऊतकों की मरम्मत और ऊर्जा निर्माण में शामिल होता है। शरीर में आठ और अनिवार्य अमीनो एसिड होते हैं जिन्हें शरीर खुद नहीं बना सकता। अंगों को कार्यक्षम रखने के लिए इन्हें बाहर से यानी आहार (या पूरक) के रूप में लेना पड़ता है।

हर अंग के लिए ऊर्जा माइटोकॉन्ड्रिया (mitochondria) से बनती है (प्राचीन ग्रीक में, माइटो का मतलब है धागे जैसा और कॉन्ड्रियन का मतलब है दाने)। माइटोकॉन्ड्रिया धागे जैसे अनोखे कोशिकांग होते हैं जो हर कोशिका में हज़ारों की संख्या में पाए जाते हैं। ये हमारे शरीर के ज़्यादातर अंगों के ऊर्जा के स्रोत होते हैं।

माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका में ऊर्जा की आपूर्ति बनाए रखने के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। ये एडिनोसीन ट्राइफॉस्फेट (ATP) अणु बनाते हैं, जो कोशिका के लिए ऊर्जा का स्रोत है। कुल मिलाकर माइटोकॉन्ड्रिया कोशिका की बैटरी होते हैं, जो ATP का इस्तेमाल करके उसे चार्ज करते हैं। माइटोकॉन्ड्रिया और मूल कोशिका के बीच का जुड़ाव बहुत ज़रूरी है क्योंकि ऑक्सीकरण (oxidation) और श्वसन के दौरान इस कोशिकांग की झिल्ली खराब हो सकती है, जिससे कोशिका का काम प्रभावित हो सकता है।

उदाहरण के लिए, एक वयस्क मनुष्य के हृदय में 2 अरब से ज़्यादा मांसपेशीय कोशिकाएं होती हैं जो बिना रुके काम करती रहती हैं, और इनमें से हर कोशिका में 5000 से 8000 माइटोकॉन्ड्रिया होते हैं। हृदय के धड़कने के लिए ज़रूरी ज़्यादातर ऊर्जा इन्हीं माइटोकॉन्ड्रिया से मिलती है।

शरीर के हर अंग को सुचारू काम करने के लिए पर्याप्त ऊर्जा चाहिए होती है। जब किसी अंग को ज़्यादा ऊर्जा चाहिए होती है तो नए माइटोकॉन्ड्रिया बनते हैं, लेकिन साथ ही ज़्यादा कार्यभार के कारण हुई क्षति के चलते कुछ माइटोकॉन्ड्रिया को खत्म भी करना पड़ता है।

इस प्रक्रिया के दौरान माइटोकॉन्ड्रिया बनाने वाले प्रोटीन खत्म हो जाते हैं। मुद्दे की बात यह है कि माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली (membrane) के प्रोटीन खत्म नहीं होने चाहिए। बल्कि ज़रूरत उन्हें अधिक संख्या में खत्म होने से बचाने के तरीके खोजे जाने की है। वैज्ञानिक ऐसे तरीकों की खोज कर रहे हैं जिनसे इन बाहरी भित्तियों को तनाव के कारण पूरी तरह ठप्प होने से बचाया जा सके, क्योंकि इससे चयापचय और बुढ़ापे से जुड़ी बीमारियां हो सकती हैं।

ल्यूसीन की भूमिका

यहीं पर अहम अमीनो एसिड ल्यूसीन काम आता है। यह शाखित शृंखला वाले अमीनो एसिड (BCAA) परिवार का हिस्सा है, जिसमें आइसोल्यूसीन (Isoleucine) और वैलीन (valine) जैसे अमीनो एसिड भी शामिल हैं। इनकी ज़रूरत मांसपेशियों, तंत्रिका तंत्र, हृदय और मस्तिष्क जैसे अंगों के विकास और कामकाज के लिए होती है।

BCAA मानव शरीर में नहीं बनते हैं, इसलिए इन्हें आहार (भोजन) के माध्यम से ग्रहण करना पड़ता है। इनके बिना, माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली ठीक से बन नहीं पाती या टिकी नहीं रह पाती। पिछले वर्ष जर्मनी के कोलोन विश्वविद्यालय के सेंटर फॉर एक्सेलेंस क्लस्टर ऑन एजिंग एंड एजिंग-एसोसिएटेड डिसीज़ेस के एक दल ने अध्ययन के लिए सी. एलिगेंस (Caenorhabditis elegans) नाम के छोटे गोल कृमि को मॉडल जीव के तौर पर चुना। नेचर सेल बायोलॉजी में प्रकाशित उनके नतीजों से पता चला कि BCAA ल्यूसीन एक सुरक्षा कवच की तरह काम करता है और माइटोकॉन्ड्रिया की बाहरी झिल्ली के प्रोटीन को समय-पूर्व खराब होने से रोकता है। ल्यूसीन इस काम को अंजाम SEL1L नामक प्रोटीन के साथ मिलकर देता है। SEL1L प्रोटीन क्षतिग्रस्त या विकृत प्रोटीन्स को पहचानता और हटाता है।

इस तरह, ल्यूसीन कोशिकाओं और अंगों को सुरक्षा प्रदान करता है और ज़्यादा ऊर्जा भी देता है। यह जानना अध्ययन का विषय हो सकता है कि क्या दूसरे BCAA भी कोशिकाओं की सुरक्षा   में ऐसी ही अहम भूमिका निभाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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अंडाशय की नई प्रतिरक्षात्मक भूमिका

लंबे समय से प्रजनन वैज्ञानिक  मानते आए हैं कि प्रजनन उम्र (reproductive age) समाप्त होते ही महिलाओं में अंडाशय (ovary) की भूमिका शून्य हो जाती है, लगभग अपेंडिक्स की तरह। लेकिन हाल ही में हुए एक शोध ने इस पुरानी समझ को चुनौती दी है। फाइनबर्ग स्कूल ऑफ मेडिसिन की डॉ. फ्रांसिस्का डंकन और उनकी टीम ने पाया कि रजोनिवृत्ति (menopause)) के बाद अंडाशय शरीर में नई जिम्मेदारी संभालने लगता है जो महिलाओं की प्रतिरक्षा प्रणाली (immune system) से जुड़ी हो सकती है।

चूहों और इंसानों के अंडाशयों पर किया गया यह अध्ययन मॉलीक्यूलर ह्यूमन रीप्रोडक्शन में प्रकाशित हुआ है। दरअसल, पांच साल पहले, डॉ. डंकन ऐसी  कोशिकाओं के एक अध्ययन में जुड़ी थीं जिन्होंने विभाजन करना बंद कर दिया हो (इन्हें सेनेसेंट कोशिकाएं कहते हैं)। ऐसी कोशिकाओं की संख्या ऊतकों में बढ़ती जाने के साथ जरावस्था के लक्षण प्रकट होते हैं (senescent cells)।

इस अध्ययन के दौरान वे अंडाशय की पूरी उम्र में सेनेसेन्ट कोशिकाओं का अध्ययन करना चाहती थी। लेकिन स्वस्थ अंडाशय पर शोध संभव न होने के कारण उन्होंने रजोनिवृत्त हो चुकी (postmenopause) 50 से 75 वर्ष की महिलाओं के अंडाशय का अध्ययन किया। इन महिलाओं के अंडाशय चिकित्सकीय कारणों से निकाले गए थे।

उन्होंने पाया कि उम्र के साथ अंडाशय में अलग-अलग प्रकार के प्रोटीन बन रहे थे। डॉ. डंकन कहती हैं – यदि ये अंग उम्र के साथ नए प्रोटीन बना रहा है, तो इसका मतलब है कि इसमें बढ़ती उम्र के साथ कुछ-न-कुछ बदलाव आ रहे हैं। यह जानकारी पुरानी सोच से अलग और चौंकाने वाली थी, क्योंकि अगर रजोनिवृत्ति के बाद अंडाशय कुछ काम नहीं कर रहा होता तो उसमें उम्र के साथ कोई बदलाव नहीं आना चाहिए। 

और गहराई से अध्ययन करने के लिए शोधकर्ताओं ने चूहों के तीन समूहों पर शोध किया। इनमें भी एक उम्र के बाद अंडाशय अंडा निर्माण बंद कर देता है, हालांकि उनमें इंसानों जैसे रजोनिवृत्ति वाले लक्षण – जैसे एस्ट्रोजन के स्तर में तेज़ गिरावट नहीं होती।

शोधकर्ताओं ने युवा चूहों, प्रजनन काल के आखिरी दौर वाले चूहों, और प्रजनन काल पार कर चुके चूहों के अंडाशय निकाले। प्रत्येक चूहे के एक अंडाशय के आरएनए (RNA) का अनुक्रमण करके उसके जीन्स की सक्रियता मापी। वहीं, दूसरे अंडाशय में अलग-अलग कोशिकाओं को पहचानने और फाइब्रोसिस (fibrosis) की वृद्धि मापने के लिए सूक्ष्मदर्शी से जांच की गई। फाइब्रोसिस ऊतकों के सख्त होने की प्रक्रिया है, जो बढ़ती उम्र के साथ स्वाभाविक रूप से होती है।

देखा गया कि चूहों के अंडाशयों में बढ़ती उम्र के साथ प्रजनन क्रिया से जुड़े रसायन कम हो गए थे। लेकिन प्रजनन काल पार कर चुके चूहों के अंडाशय में युवा चूहों की तुलना में अलग-अलग तरह की प्रतिरक्षा कोशिकाओं का भंडार पाया गया।

बूढ़े चूहों के अंडाशय में ऐसे जीन भी भारी मात्रा में सक्रिय थे जो शोथ (सूजन) (inflammation) बढ़ाने वाले  रसायन बनाते हैं। ये रसायन शरीर के रक्त प्रवाह के ज़रिए दूसरे अंगों तक पहुंच सकते हैं। 

यह शोध रजोनिवृत्ति के बाद अंडाशय को एक नाकारा अंग समझने के बजाय एक नई संभावना की ओर इशारा करता है। इससे संकेत मिलता है कि अंडाशय अपना मूल काम (अंडा निर्माण) समाप्त होने के बाद एक नई भूमिका अपना सकता है। अनुमान है कि यदि उम्रदराज अंडाशय रक्तप्रवाह में ये शोथ बढ़ाने वाले अणु छोड़ रहे हैं तो शायद इसी कारण महिलाओं को, उम्र पुरुषों की तुलना में लंबी होने के बावजूद, बुढ़ापे के दौरान होने वाली जीर्ण बीमारियों का अधिक सामना करना पड़ता है।

कई सालों से रजोनिवृत्त महिलाओं के अंडाशय आम तौर पर किसी भी सर्जरी के दौरान निकाल दिए जाते हैं, क्योंकि प्रजनन काल खत्म होने के बाद अंडाशय को बेकार और कैंसरकारी (cancerous) समझा जाता रहा है। यह शोध महिलाओं के शरीर को समझने में मददगार साबित हुआ है। हालांकि अभी भी महिलाओं की शारीरिक रचना को पूरी तरह नहीं समझा जा सका है लेकिन इतना स्पष्ट है कि महिलाओं के बेहतर स्वास्थ्य के लिए रजोनिवृत्ति के दौरान व उसके बाद में होने वाली समस्याओं का बारीकी से अध्ययन करने और समझ विकसित करने की ज़रूरत है।(स्रोत फीचर्स)

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‘हम साथ-साथ हैं’ की तड़प क्यों?

नुष्यों को साथियों के साथ रहना पसंद है। क्या इसके पीछे कोई जीव वैज्ञानिक कारण है?   इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने जानवरों और मनुष्यों पर कुछ दिलचस्प अध्ययन किए हैं। अध्ययन बताते हैं कि समूह में रहना, मिलना-जुलना केवल पसंद -नापसंद मामला नहीं है बल्कि रोटी-कपड़ा-मकान की तरह यह भी हमारे जीवन का आधार और मूल ज़रूरत है। 

तंत्रिका वैज्ञानिक चूहों और मनुष्यों के मस्तिष्क पर शोध करके यह समझने की कोशिश करने में जुटे हैं कि ‘अकेलापन दुख का और अपनों का साथ खुशी का कारण क्यों है?’ वैज्ञानिक बताते हैं कि हमारा शरीर बदलती बाहरी परिस्थितियों के अनुसार तापमान, रक्तचाप और शरीर के तरल पदार्थों का आंतरिक संतुलन बनाए रखता है।  इसे समस्थापन (होमियोस्टेसिस) कहते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि ठीक उसी प्रकार हमारा दिमाग भी सामाजिक जीवन और अकेलेपन के बीच संतुलन की तलाश करता है। इसे उन्होंने दिमाग की मानसिक समस्थिति (mental homeostasis) नाम दिया है। हालांकि, सामाजिक संतुलन की ज़रूरतें और सीमाएं हर व्यक्ति के लिए अलग-अलग हो सकती हैं। किसी को अकेले रहना ज़्यादा पसंद होगा, तो किसी को बड़े समूह या लोगों के आसपास, लोगों से मिल-जुलकर रहना पसंद होगा। 

वैज्ञानिक इसे ‘अपनों के साथ की लालसा’ कहते हैं। जब कोई व्यक्ति बहुत लंबे समय तक अकेले रहता है तो मस्तिष्क के एक हिस्से (हायपोथैलेमस) की कुछ खास कोशिकाएं सक्रिय हो जाती हैं। इन कोशिकाओं की सक्रियता के कारण अकेलापन झेल रहा व्यक्ति बेचैनी, उदासी और दुख महसूस करता है। दूसरी ओर, जब अपनों से मिलने पर अकेलापन दूर होता है तब मस्तिष्क की अन्य कोशिकाएं सक्रिय होती हैं। इससे डोपामाइन (dopamine) नाम का रसायन स्रावित होता है; जो वैसा ही सुखद एहसास देता है जैसा किसी भूखे को खाना मिलने पर होता है। 

कुदरत में कई जीवों को विभिन्न कारणों से समूह या साथ की ज़रूरत होती है। फिर चाहे वो कड़ाके की ठंड से बचने के लिए एक दूसरे से चिपककर बैठने वाले पक्षी हों, दुश्मनों से सुरक्षा के लिए रेगिस्तान में बड़े समूहों में रहने वाले मीरकैट और भोजन की तलाश/शिकार करने के लिए झुंड में रहने वाली नीलगाय, ज़ेबरा, या लक्कड़बग्घे। दूसरी ओर, कुछ जानवर ऐसे भी हैं जो ज़्यादातर अकेले रहते हैं, जैसे ओरांगुटान अकेले अपना खाना ढूंढते हैं, तेंदुए अकेले ही शिकार करते हैं।

दरअसल, वैज्ञानिक चूहों पर शोध करके यह जानना चाह रहे थे कि चूहे कब और कैसे अकेलापन महसूस करते हैं? इसके लिए उन्होंने पिंजरे के बीच में ऐसी जाली लगा दी जिससे चूहे एक-दूसरे को देख सकते थे, सुन सकते थे, सूंघ भी सकते थे – केवल छू नहीं सकते थे। परिणाम यह हुआ कि साथी चूहे सामने होते हुए भी वे अकेला और उदास (sad) महसूस कर रहे थे। उसके बाद वैज्ञानिकों ने अकेले रह रहे चूहों को दो खास सुरंग वाले रास्तों का विकल्प दिया। एक रास्ते में नर्म-मखमली चादर थी और दूसरा रास्ता सख्त था। उन्होंने पाया कि अकेलेपन से जुझ रहे चूहों ने सख्त रास्ते के बजाय नर्म-मखमली चादर वाले रास्ते को चुना। इससे यह साबित हुआ कि (चूहों में) अकेलापन(lonliness) दूर करने के लिए केवल देखना, सुनना या सूंघना काफी नहीं है बल्कि शारीरिक स्पर्श सबसे ज़्यादा ज़रूरी है। वैज्ञानिक बताते हैं कि मनुष्यों और चूहों की त्वचा में खास संवेदक और इंद्रियां (Sensors and senses) होती हैं जो स्नेह भरे स्पर्श से मस्तिष्क को तुरंत सक्रिय करके सुरक्षित महसूस करवाती हैं, इसे ‘स्पर्श की ताकत’ कहा गया।

वैज्ञानिकों ने नर और मादा चूहों में भी अकेलेपन के असर को देखा। उन्होंने पाया कि मादा चूहे लंबा वक्त अकेले बिताने के बाद ज़्यादा मिलनसार हो गईं। वहीं नर चूहे अकेले रहने से चिड़चिड़े, गुस्सैल, और अपने इलाके के प्रति संवेदनशील हो गए। 

मनुष्यों और चूहों के गहन मस्तिष्क क्षेत्र बहुत हद तक समान हैं। इसलिए चूहों के अकेलेपन वाले व्यवहार को मनुष्यों के अकेलेपन से होने वाले व्यवहारों और समस्याओं को समझने के लिए अध्ययन किया जा रहा है।

शोध बताते हैं कि जेल की अकेली कोठरी में सज़ा काट रहे कैदियों को बहुत लंबे समय तक अकेले रहने के कारण बाहरी दुनिया से डर लगने लगता है, उनका मस्तिष्क लगातार खतरा (danger) और बेचैनी महसूस करता है। मानसिक संतुलन बिगड़ने के साथ-साथ वे लोगों से मिलने और सामने आने से कतराने लगते हैं।

अकेलेपन से सेहत पर बुरा असर होने के कारण ज़िंदगी के साल भी कम होने लगते हैं। अकेलेपन से न सिर्फ मन दुखी रहता है बल्कि लंबे समय से अकेला महसूस करने वाले लोगों को दिल की बीमारी, स्ट्रोक, और कैंसर जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ सकता है। यानी समय के साथ ये मानसिक और शारीरिक पीड़ा (physical trauma) में बदल जाता है।

विशेषज्ञों की सलाह है कि संतुलन बनाए रखना ही अकेलेपन की समस्या का समाधान है। खुद की सामाजिक सीमाओं को पहचानकर थोड़ा समय खुद के साथ बिताएं, थोड़ा करीबी लोगों के साथ और कभी-कभी थोड़ा समय बड़े सामाजिक कार्यक्रमों में दें। इससे हर परिस्थिति में मस्तिष्क खुश रहना सीखता है। आखिर में, वैसे तो आजकल लोगों से जुड़े रहना तकनीकी साधनों से बहुत आसान हो गया है। लेकिन जब भी मौका हो, स्नेह-स्पर्श के ज़रिए अपनापन जताना हमारे तन, मन और मस्तिष्क के लिए किसी जड़ी-बूटी से कम नहीं हैं।  (स्रोत फीचर्स)

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जेनेरिक दवाइयों के उत्पादन पर संकट

डॉ. अनंत फड़के

जेनेरिक यानी मूल नाम (Generic Name) से बेची जाने वाली दवाइयां। ये दवाइयां ब्रांडेड दवाओं की तुलना में जनौषधी दुकानों में लगभग एक-चौथाई कीमत पर उपलब्ध होती हैं और उनकी गुणवत्ता भी ब्रांडेड दवाओं से कम नहीं होती — यह बात अब अधिकाधिक लोगों को समझ में आने लगी है। लेकिन अब जेनेरिक दवाओं के उत्पादन के सम्बंध में मात्र एक बड़ा प्रश्न खड़ा हो गया है। लेकिन इसके पहले कुछ बुनियादी चीजें समझ लेते हैं।

जेनेरिक दवाइयां और गुणवत्ता

जेनेरिक दवा शब्द के दो अर्थ हैं। पहला अर्थ यह है कि ‘जेनेरिक दवा’ यानी किसी दवा के आविष्कार के बाद शोधकर्ता कंपनी को पेटेंट कानून के तहत उस दवा के लिए जो पेटेंट प्राप्त होता है, उस पेटेंट की अवधि समाप्त हो चुकी हो। ऐसी दवा अब जेनेरिक कहलाती है और अन्य कंपनियां शोधकर्ता कंपनी से अनुमति लिए बिना उसका उत्पादन कर सकती हैं। भारतीय बाज़ार में उपलब्ध 90 प्रतिशत से अधिक दवाइयां ऐसी ही जेनेरिक दवाएं हैं, अर्थात उनकी पेटेंट अवधि समाप्त हो चुकी है। “मैं जेनेरिक दवाइयां नहीं लिखता” ऐसा कहने वाले अधिकांश डॉक्टर भी जेनेरिक (पेटेंट-मुक्त) दवाइयां ही लिखते हैं।

जेनेरिक दवा का दूसरा अर्थ है कि दवा के पैकेट पर उसका मूल यानी जेनेरिक नाम लिखा हो। सभी चिकित्सा पुस्तकों और वैज्ञानिक साहित्य में दवाइयों के जेनेरिक नामों का ही उपयोग किया जाता है। लेकिन शोधकर्ता कंपनियां जब कोई नई दवा बनाती हैं तो उसे अपना एक व्यावसायिक नाम (ब्रांड-नेम) दे देती हैं। उदाहरण के लिए, पार्क-डेविस कंपनी ने 1985 में रक्त में बढ़े हुए कोलेस्ट्रॉल को कम करने वाली एटरवेस्टैटिन (Atorvastatin) नामक दवा की खोज की थी, जिसके लिए उसे 1986 से 2011 तक पेटेंट प्राप्त था। लेकिन इस अवधि में कंपनी ने इसे एटरवेस्टैटिन नाम से नहीं, बल्कि ‘लिपिटॉर’ (Lipitor) ब्रांड नाम से महंगे दामों पर बेचकर भारी मुनाफा कमाया। 2011 में पेटेंट समाप्त होने के बाद एटरवेस्टैटिन जेनेरिक बन गई और अन्य कंपनियों ने उसका उत्पादन शुरू कर दिया। लेकिन उन्होंने भी उसे जेनेरिक नाम से बेचने के बजाय अलग-अलग ब्रांड नामों से बेचा। इन्हें ‘ब्रांडेड-जेनेरिक’ कहा जाता है।

इस प्रकार, लगभग 900 जेनेरिक दवाइयों से बनीं लगभग 60,000 ब्रांडेड-जेनेरिक दवाइयां भारत के बाज़ार में उपलब्ध हैं। अपना-अपना ब्रांड नाम डॉक्टरों के मन में बैठाने के लिए दवा कंपनियां भारी पैसा खर्च करती हैं और कई बार अनैतिक तरीके भी अपनाती हैं, ताकि डॉक्टर उनके ब्रांड की दवाएं लिखें। यह खर्च कंपनियों द्वारा दवाइयों की अधिक कीमत रखकर वसूला जाता है। इसके विपरीत, डॉक्टरों की शिक्षा जेनेरिक नामों के माध्यम से ही हुई होती है, इसलिए जेनेरिक नामों को डॉक्टरों के मन में बैठाने, याद रखवाने के लिए कंपनियों को अतिरिक्त पैसा खर्च नहीं करना पड़ता। यही कारण है कि जेनेरिक दवाएं अपेक्षाकृत काफी सस्ती होती हैं।

दवाइयां कैसे बनती हैं?

सभी दवाएं पहले पावडर के रूप में बनाई जाती हैं। बाद में उनसे गोलियां, कैप्सूल, इंजेक्शन, मलहम आदि विभिन्न ‘फॉर्म्युलेशन’ तैयार किए जाते हैं।

दवा कंपनियां कुछ दवा-पावडर स्वयं बनाती हैं, जबकि कुछ दवा-पावडर रासायनिक उद्योगों से खरीदे जाते हैं। लगभग 30 प्रतिशत दवा-पावडर चीन आदि देशों से आयात किए जाते हैं। अधिकांश छोटी और कई मंझोली दवा कंपनियां स्वयं पावडर नहीं बनातीं, बल्कि खुले बाज़ार से खरीदकर उनसे विभिन्न फॉर्म्युलेशन तैयार करती हैं। इसलिए भारत का अधिकांश दवा उद्योग ‘फॉर्म्युलेशन उद्योग’ है।

इन फॉर्म्युलेशन्स का निर्माण भी गुणवत्तापूर्ण तरीके से होना चाहिए। प्रत्येक दवा के गुणधर्म इंडियन फार्माकोपिया में निर्धारित मानकों के अनुरूप होने चाहिए। दवा की प्रत्येक खेप को निर्धारित परीक्षणों की कसौटी पर खरा उतरना होता है और निर्माता को अपने कारखाने की प्रयोगशाला में इसकी जांच करनी होती है।

उदाहरण के लिए, इंडियन फार्माकोपिया में यह निर्धारित है कि किसी गोली को पेट में टूटने और घुलने में कितना समय लगता है। उत्पादन कंपनी की कानूनी ज़िम्मेदारी होती है कि दवा इन मानकों पर खरी उतरे। यदि उत्पादन औषधि विज्ञान के अनुसार किया जाए तो छोटे कारखानों में भी यह सुनिश्चित करना संभव है। भारत के अधिकांश छोटे दवा-उद्योग ऐसा करते हैं, वैसे इस क्षेत्र में भी कुछ अप्रामाणिक उद्योग मौजूद हैं।

राज्य सरकारों के खाद्य एवं औषधि प्रशासन (FDA) के निरीक्षकों का दायित्व है कि वे कारखानों का निरीक्षण करें और बाज़ार से नमूने लेकर उनकी जांच कराएं। यद्यपि यह व्यवस्था संसाधनों की कमी और भ्रष्टाचार से प्रभावित है। फिर भी, 2024-25 में केंद्र सरकार द्वारा करवाई गई जांच में 1,16,323 नमूनों में से केवल 3104 (2.7 प्रतिशत) नमूने निम्न गुणवत्ता के पाए गए थे। आदर्श स्थिति में यह संख्या शून्य होनी चाहिए।

कुछ महीने पहले, एक सामाजिक संस्था द्वारा 22 आम दवाओं के 131 नमूनों की जांच प्रतिष्ठित प्रयोगशाला में कराई गई। जांच में पाया गया कि प्रसिद्ध ब्रांड नाम, कम प्रसिद्ध ब्रांड नाम और मात्र जेनेरिक नाम वाली दवाओं की गुणवत्ता में कोई अंतर नहीं था।

(विस्तार से यहां देखें – https://meshindia.org/citizens-generic-vs-branded-drugs-project/ ).

अतिरिक्त मानदंडजैविक तुल्यता

सरकार 384 ‘आवश्यक दवाइयों’ में से 140 दवाओं के लिए जेनेरिक कंपनियों की गोलियों पर जैविक तुल्यता यानी बायो-इक्विवेलेंस (Bio-equivalence) परीक्षण अनिवार्य करने की तैयारी कर रही है। किसी दवा की जैव-तुल्यता जांचने के लिए उसकी गोली स्वस्थ व्यक्ति को दी जाती है और निश्चित समयांतराल (जैसे 15 मिनट, आधा घंटा, एक घंटा आदि के) बाद उसके रक्त में दवा की मात्रा मापी जाती है। यदि शोधकर्ता कंपनी की गोली और जेनेरिक गोली की समान समयांतरालों पर रक्त में समान मात्रा पाई जाती है, तो जेनेरिक गोली को ‘जैविक-तुल्य’ माना जाता है। यह प्रश्न केवल गोलियों और कैप्सूलों पर लागू होता है; सिरप, इंजेक्शन, मलहम, ड्रॉप्स आदि पर नहीं। बड़ी शोधकर्ता कंपनियों का मत है कि केवल जैविक-तुल्य जेनेरिक गोलियां ही मूल दवा जितनी प्रभावी मानी जा सकती हैं। विकसित देशों ने इस सिद्धांत को स्वीकार किया है और वहां जैविक-तुल्यता परीक्षण पास करने के बाद ही जेनेरिक गोलियों को बिक्री की अनुमति मिलती है। भारत में भी लगभग 140 दवाओं के लिए इसे अनिवार्य बनाने की तैयारी चल रही है। लेकिन इसके सम्बंध में कई प्रश्न हैं।

1) क्या यह सभी दवाइयों के लिए आवश्यक है?: चंद ‘संवेदनशील’ दवाइयों के मामले में यकीनन रक्त में दवा की मात्रा का थोड़ा भी अंतर स्वीकार्य नहीं होता। ऐसी खास दवाइयों के लिए जैविक-तुल्यता परीक्षण आवश्यक होना चाहिए। लेकिन अन्य जेनेरिक दवाइयों के लिए ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है कि यदि वे जैविक-तुल्य न हों तो वे अप्रभावी हो जाती हैं। भारत में करोड़ों मरीज़ दशकों से ऐसी जेनेरिक गोलियां उपयोग कर रहे हैं जिनका जैविक-तुल्यता परीक्षण नहीं हुआ है, फिर भी ऐसे कोई प्रमाण नहीं मिले हैं कि वे असरहीन हैं।

2) अवैज्ञानिक मिश्रित दवाइयों का प्रश्न: भारतीय बाज़ार की लगभग 40 प्रतिशत ब्रांडेड-जेनेरिक दवाओं में दो या अधिक औषधियों का मिश्रण होता है। इनमें से अधिकांश मिश्रण वैज्ञानिक दृष्टि से उचित नहीं हैं। इनके लिए कोई मूल मानक ही उपलब्ध नहीं है, इसलिए इनके लिए जैव-तुल्यता का प्रश्न ही नहीं उठता। सरकार को पहले ऐसी अवैज्ञानिक मिश्रित दवाइयों पर प्रतिबंध लगाना चाहिए।

3) तकनीकी और आर्थिक बोझ: यदि जैविक-तुल्यता को अनिवार्य किया गया तो प्रत्येक कंपनी को प्रत्येक जेनेरिक दवा के लिए स्वयं वह तकनीक विकसित करनी होगी जिससे उसकी गोली जैविक-तुल्य बन सके। ये तकनीकी विवरण व्यावसायिक गोपनीयता का हिस्सा होते हैं। यदि 140 दवाओं का औसतन 10-10 कंपनियां उत्पादन करती हैं, तो लगभग 1400 कारखानों को यह तकनीक अलग-अलग विकसित करनी होगी। इससे अत्यधिक खर्च होगा।

4) छोटे उद्योगों पर मंडराता संकट: प्रत्येक निर्माता को अपनी गोली के जैविक-तुल्य होने का प्रमाणपत्र प्राप्त करना होगा, जिस पर लगभग 20-60 लाख रुपये का खर्च आएगा। भारत में लगभग 10,000 दवा उत्पादकों में से 2-3 हज़ार छोटी कंपनियां हैं। इनमें से अनेक इस खर्च को वहन नहीं कर पाएंगी और उत्पादन बंद करने को मजबूर हो जाएंगी। नतीजतन, सस्ती जेनेरिक दवाओं की उपलब्धता घटेगी और हज़ारों मजदूर बेरोज़गार हो सकते हैं। विकसित देश यह खर्च वहन कर सकते हैं, लेकिन क्या भारत भी कर पाएगा?

5) मानवगिनी पिगका नैतिक प्रश्न: जैविक-तुल्यता परीक्षण के लिए स्वस्थ मनुष्यों का उपयोग किया जाता है। सामान्यतः आर्थिक रूप से कमज़ोर लोग पैसे लेकर इसमें भाग लेते हैं। यदि प्रत्येक कंपनी को अलग-अलग परीक्षण करना पड़े, तो बड़ी संख्या में मानव वालंटीयर्स का उपयोग करना होगा। 140 दवाओं और औसतन 10 कंपनियों के हिसाब से लगभग 1400 मानव समूहों पर परीक्षण करने पड़ेंगे। यह गरीब लोगों का अतिरिक्त और नैतिक रूप से अनुचित उपयोग होगा।

विकल्प

अलबत्ता, यदि वास्तव में जैविक-तुल्यता का परीक्षण ज़रूरी हो, तो भी भारी खर्च और इतने बड़े पैमाने पर मानव परीक्षणों से बचा जा सकता है। इसके लिए सार्वजनिक क्षेत्र की किसी प्रयोगशाला में इन 140 दवाइयों को मूल दवाइयों के समकक्ष बनाने की तकनीक विकसित करके जैविक-तुल्यता  परीक्षण संभव है। केवल एक मानव समूह पर्याप्त होगा, यानी कुल लगभग 140 समूह। इसके बाद सरकार यह तकनीक उचित मूल्य पर जेनेरिक कंपनियों को उपलब्ध करा सकती है। दवा नियामक तंत्र यह सुनिश्चित करे कि कंपनियां सरकार द्वारा दिए गए मानकों के अनुसार ही उत्पादन करें। यदि ऐसा किया जाए तो जनता को सस्ती जेनेरिक दवाएं मिलती रहेंगी और छोटी जेनेरिक कंपनियां भी टिक सकेंगी। अन्यथा बड़ी दवा कंपनियों का प्रभुत्व और मज़बूत हो जाएगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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