वन्यजीव व्यापार से बढ़ता संक्रमण का खतरा

आंकड़ों से पता चलता है कि स्तनधारियों (mammals species) की ही 2000 से अधिक (वन्य) प्रजातियों का कानूनी और गैर-कानूनी दोनों तरीकों से व्यापार किया जाता है। ज़ाहिर है इस व्यापार से वन्यजीवों का मनुष्य से संपर्क बढ़ा है। अब, एक हालिया अध्ययन में पता चला है कि वर्तमान में व्यापार किए जा रहे वन्य स्तनधारी जीवों में से लगभग आधे ऐसे हैं जिनमें कम से कम एक ऐसा रोगजनक (zoonotic pathogens) है जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकता है। यानी वन्यजीवों का व्यापार हमारी सेहत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। यह पहली बार है जब बड़े स्तर पर यह समझने की कोशिश की गई है कि वन्य-जीव व्यापार और तस्करी (illegal wildlife trafficking) बीमारियों के फैलाव से कितने जुड़े हैं।

यह तो हम जानते हैं कि एचआईवी, इबोला और कोविड-19 जैसी कई बीमारियां जीवों से मनुष्यों में आई हैं। लेकिन अब तक यह ठीक-ठीक नहीं पता था कि यह खतरा कितना बड़ा है। इस अध्ययन में पुराने व्यापार रिकॉर्ड और जीवों से फैलने वाली बीमारियों के डैटा को मिलाकर यह समझने की कोशिश की गई कि किन जीवों के व्यापार से बीमारियों के फैलने की संभावना ज़्यादा होती है।

अध्ययन स्तनधारी जीवों (wild mammals) पर केंद्रित रखा गया क्योंकि इनका उपयोग भोजन, फर, अनुसंधान और पारंपरिक दवाओं में ज़्यादा होता है, और ये जैविक रूप से मनुष्यों से करीब (genetic similarity) हैं। शोध में पाया गया कि व्यापार की जाने वाली 2000 से अधिक प्रजातियों में से लगभग 41 प्रतिशत में ऐसे रोगजनक होते हैं जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकते हैं (infection risk)। जबकि जिन प्रजातियों का व्यापार नहीं होता, उनसे खतरा सिर्फ 6.4 प्रतिशत के करीब है।

अध्ययन में वन्य-जीव व्यापार के तरीकों (trade practices) को भी बहुत महत्वपूर्ण पाया गया है। जीवित जीवों का व्यापार सबसे अधिक जोखिम भरा होता है, क्योंकि इससे मनुष्यों का सीधा संपर्क (direct exposure) संक्रमित जीवों से होता है। दिलचस्प बात यह है कि गैर-कानूनी व्यापार का असर उतना ज़्यादा नहीं पाया गया जितना पहले सोचा जाता था। इसका मतलब है कि कानूनी और नियंत्रित व्यापार (legal wildlife trade) भी बीमारियों के फैलाव में योगदान दे सकता है।

अध्ययन की एक और महत्वपूर्ण बात यह पता चली है कि जितने लंबे समय तक किसी प्रजाति का व्यापार होता रहता है, उतना ही उससे जुड़ा खतरा बढ़ता जाता है। यानी मनुष्यों और वन्य जीवों के बीच लगातार लंबे संपर्क से रोगजनकों को फैलने और इंसानों के अनुकूल बनने (pathogen adaptation) का ज़्यादा मौका मिलता है।

वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस शोध से सरकारें बेहतर नियम (wildlife regulations) बना पाएंगी ताकि भविष्य में महामारी (pandemic prevention) के खतरों को कम किया जा सके। अगर अधिक जोखिम वाली प्रजातियों और व्यापार के तरीकों की पहचान हो जाए, तो खतरनाक संपर्क को सीमित किया जा सकता है।

फिर भी सावधानी में ही सुरक्षा है। यह सोचना भी उतना आवश्यक है कि किन जीवों से हमें जीवनदायिनी या निहायत ज़रूरी चीज़ें हासिल हो रही हैं, और कितना व्यापार महज़ शौकिया चीज़ों (exotic pet trade) के लिए हो रहा है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या कीटनाशकों से बढ़ रहा मधुमेह का खतरा?

क्रिय जीवनशैली (active lifestyle)  और छरहरी काया वाले किसी किसान को टाइप-2 डायबिटीज़ हो जाए, हैरानी स्वाभाविक है। वजह अभी साफ नहीं है, लेकिन खेतों में रोज़ाना कीटनाशकों से संपर्क (pesticide exposure) को एक संदिग्ध कारण मानते हुए कुछ शोध कार्य हुए हैं।

दुनिया भर में कीटनाशकों का इस्तेमाल बहुत तेज़ी से बढ़ा है और अब हर साल इनका उपयोग लाखों टन है। प्राय: वैज्ञानिक इनके असर को सिर्फ तात्कालिक नुकसान (ज़हर या मस्तिष्क पर असर) तक ही देखते थे। अब समझा जा रहा है कि ये रसायन हमारे शरीर के सूक्ष्मजीवों (microbiome impact) को कैसे प्रभावित करते हैं, जिसके दीर्घकालिक असर हो सकते हैं।

उदर का सूक्ष्मजीव संसार (gut microbiome) हमारे शरीर में मौजूद लाखों-करोड़ों सूक्ष्मजीवों का एक जटिल समूह है, जो पाचन, रोग प्रतिरोधक क्षमता और शरीर के चयापचय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें होने वाले बदलाव मधुमेह (diabetes risk)  और मानसिक समस्याओं को जन्म दे सकते हैं। हाल के शोध यह भी बताते हैं कि कीटनाशक इस संतुलन को बिगाड़ सकते हैं।

दक्षिण भारत के एक अध्ययन में एक दिलचस्प बात सामने आई। शहरों में डायबिटीज़ का सम्बंध मोटापे जैसे आम कारणों से दिखता है, लेकिन गांवों में बिना इन कारणों के भी मधुमेह के मामले काफी ज़्यादा थे। वैज्ञानिकों को लगा कि शायद पर्यावरण से जुड़े कारक (environmental factors) – जैसे कीटनाशक – इसमें भूमिका निभा रहे होंगे।

इसको और समझने के लिए वैज्ञानिकों ने चूहों पर एक आम कीटनाशक (क्लोरपायरीफॉस) (chlorpyrifos pesticide) के साथ प्रयोग किया। उन्होंने थोड़े समय के लिए अधिक मात्रा देने की बजाय, कई महीनों तक कम मात्रा में देकर इसका असर देखा, जैसा कि असल जीवन में होता है। नतीजे चौंकाने वाले थे – कीटनाशक ने उदर के सूक्ष्मजीव संसार (gut bacteria imbalance) को बदल दिया; अच्छे बैक्टीरिया कम हो गए और हानिकारक बैक्टीरिया बढ़ गए। इसके साथ ही चूहों में रक्त शर्करा बढ़ गई और मधुमेह जैसे लक्षण दिखने लगे, जबकि उनके वज़न में कोई वृद्धि नहीं हुई थी।

आगे के अध्ययन (scientific findings) से यह भी संकेत मिला कि जब आंत के सूक्ष्मजीव इन कीटनाशकों को तोड़ते हैं, तो ऐसे पदार्थ बनते हैं जो लीवर में ग्लूकोज़ बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। जिससे रक्त शर्करा बढ़ सकती है।

अन्य अध्ययनों से यह भी पता चला है कि कीटनाशक सिर्फ आंत में मौजूद बैक्टीरिया की संख्या ही नहीं बदलते, बल्कि उनके काम करने के तरीके (microbial function) को भी प्रभावित करते हैं। जब इन बैक्टीरिया को अलग-अलग कीटनाशकों के संपर्क में रखा गया, तो यह देखा गया कि वे उन ज़रूरी पदार्थों का उत्पादन बदल देते हैं जो आंत की सेहत, शोथ को नियंत्रित करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने में मदद करते हैं। कुछ बैक्टीरिया तो इन कीटनाशकों को अपने अंदर जमा (bioaccumulation) भी कर लेते हैं, जिससे शरीर में उनका असर लंबे समय तक बना रह सकता है।

इन बदलावों का असर काफी दूर तक जा सकता है। हमारी आंत और मस्तिष्क के बीच एक सम्बंध (gut brain axis) होता है, जिसे ‘गट–ब्रेन एक्सिस’ कहा जाता है। अगर इसके कामकाज में गड़बड़ी आती है, तो यह हमारे मूड, व्यवहार और मस्तिष्क की सेहत को प्रभावित कर सकता है। जंतुओं पर किए गए कुछ अध्ययनों में यह भी देखा गया है कि कीटनाशकों के संपर्क से अवसाद जैसे लक्षण (depression symptoms) उभर सकते हैं।

हालांकि ये नतीजे महत्वपूर्ण हैं, वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्यों में इनके पुख्ता सबूत (human studies) अभी नहीं मिले हैं। आंतों का सूक्ष्मजीव-संसार खान-पान, जीवनशैली और जीन्स से प्रभावित होता है, इसलिए यह तय करना मुश्किल है कि कीटनाशकों का असर कितना है। इसके अलावा, लोग लंबे समय तक कई तरह के रसायनों के संपर्क (chemical exposure) में रहते हैं, जिससे साफ निष्कर्ष निकालना और कठिन हो जाता है।

फिर भी, शुरुआती मानव अध्ययनों (early research evidence) से कुछ संकेत मिलते हैं। एक अध्ययन में सभी लोगों के शरीर में कीटनाशकों के अवशेष पाए गए, खासकर उन लोगों में जो ज़्यादा फल और सब्ज़ियां (fruit vegetable intake) खाते थे। इन अवशेषों का सम्बंध आंतों के सूक्ष्मजीव-संसार में बदलाव से भी देखा गया। इस संदर्भ में और शोध ज़रूरी है।

एक बड़ा सवाल अभी भी बाकी है – क्या सूक्ष्मजीव-संसार को पहुंचे नुकसान को फिर से ठीक किया जा सकता है? लोग अक्सर सोचते हैं कि प्रोबायोटिक्स (probiotics benefits) या खान-पान बदलकर इसे ठीक किया जा सकता है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि आंतों का सूक्ष्मजीव-संसार बहुत जटिल (complex microbiome) होता है और इसे आसानी से बहाल करना संभव नहीं है।

फिलहाल विशेषज्ञ यही सलाह देते हैं कि कीटनाशकों से संपर्क कम से कम (reduce pesticide exposure) किया जाए। इसके लिए खेती के तरीकों में बदलाव (sustainable farming), खाने की आदतों में सुधार या सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं। लेकिन खासकर किसानों के लिए इससे पूरी तरह बचना आसान नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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देखभाल के नाम पर त्वचा खराब तो नहीं कर रहे?

प्रतिका गुप्ता

आजकल लोग अपनी त्वचा का कुछ ज़्यादा ही ख्याल रख रहे हैं। त्वचा का ख्याल रखना अच्छी बात है, लेकिन यह जानना भी उतना ही ज़रूरी है कि जितने और जिन तरीकों से आप त्वचा की देखभाल कर रहे हैं वास्तव में वे कहीं आपकी त्वचा के लिए हानिकारक तो नहीं।

सोशल मीडिया से मुतासिर (social media influence) होकर लोग अपनी त्वचा की देखभाल के लिए रोज़ाना जाने क्या-क्या करते हैं। लोग क्लींज़र, फेसवॉश, टोनर, सीरम, तरह-तरह के विटामिन और एंटीऑक्सीडेंट क्रीम (vitamin C cream), मॉइश्चराइज़र, सनस्क्रीन… वगैरह-वगैरह बाज़ार के उत्पाद तो लगाते ही हैं, साथ ही उनके द्वारा अपनाए जाने वाले घरेलू उबटनों और उपायों का भी अंत नहीं है। इसमें भी आंखों के लिए अलग, गले व गरदन के लिए अलग, हाथ-पैरों और बाहों के लिए अलग-अलग उत्पाद और देखभाल के तरीके सोशल मीडिया पर खूब छाए हैं। और सिर्फ बड़े ही नहीं, बच्चे भी सोशल मीडिया के प्रभाव क्षेत्र में हैं।

त्वचा रोग विशेषज्ञ (dermatologist advice) रजनी कट्टा बताती हैं कि उन्होंने पिछले पांच सालों में देखा है कि त्वचा की देखभाल के तरीके दिन-ब-दिन पेचीदा और कई-कई स्टेप्स वाले हो गए हैं। कोई-कोई मामलों में तो ये रोज़ाना 12-12 स्टेप्स तक जाते हैं। और लोग इनमें अधिकतर ऐसे उत्पाद लगा रहे होते हैं जिनके बारे में उन्होंने बस सोशल मीडिया पर देखा होता है, इनके बारे में कहीं कोई प्रामाणिक जानकारी नहीं होती। लेकिन क्या वाकई इतने उत्पाद और इतने स्टेप्स ज़रूरी हैं?

यदि आप किसी अच्छे त्वचा विशेषज्ञ से यह सवाल पूछेंगे तो उनका जवाब होगा – सामान्यत: नहीं। त्वचा विशेषज्ञ कहते हैं कि चेहरे या त्वचा को अच्छे से धोना, मॉइश्चराइज़र (skin moisturizer) लगाना और (सनस्क्रीन या किसी अन्य तरीके से) धूप से बचाना स्वस्थ त्वचा के लिए पर्याप्त है। लेकिन साथ में स्वस्थ और नियमित जीवनशैली और पोषणयुक्त भोजन बहुत ज़रूरी है। बल्कि, विशेषज्ञ कहते हैं, अधिक (और गलत) उत्पाद और देखभाल के गलत तरीके त्वचा को अस्वस्थ और बेजान बना सकते हैं। कट्टा का कहना है कि अक्सर सोशल मीडिया पर बताए जाने वाले उत्पादों और उनके फायदों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं होता। और सबसे बड़ी बात तो यह कि लोगों को यह एहसास ही नहीं होता कि वे ऐसे प्रोडक्ट लगा रहे हैं जो वास्तव में त्वचा को नुकसान पहुंचाते हैं।

दरअसल, आजकल दुनिया भर में त्वचा की देखभाल (स्किनकेयर) (global skincare trends) के प्रति पहले से कहीं ज़्यादा दिलचस्पी दिख रही है। टिकटॉक, इंस्टा, यूट्यूब-शॉर्ट्स जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म लोगों में जवां दिखने और चमकदार त्वचा पाने की चाहत बढ़ा रहे हैं, और फिर इसे पाने के लिए वे इसके उपाय और उत्पाद भी बता रहे हैं। लोगों में जवां दिखने की चाहत का आलम इस आंकड़े से समझा जा सकता है कि #SkinTok जैसे हैशटैग को हर महीने एक अरब से ज़्यादा बार देखा जाता है। ऐसा अनुमान है कि 2026 तक यह इंडस्ट्री (beauty industry growth) दुनिया भर में 200 अरब डॉलर से ज़्यादा का कारोबार करेगी।

त्वचा की बनावट

एसिड मेंटल
लिपिड लेयर
स्ट्रैटम
कॉर्नियम
एपिडर्मिस
डर्मिस
सूक्ष्मजीवीय संसार

विशेषज्ञों की सुनें तो उनका कहना है कि स्वस्थ त्वचा का मतलब सिर्फ निखरी और दमकती त्वचा (glowing skin) नहीं है बल्कि इससे परे है। स्वस्थ त्वचा आपके संपूर्ण स्वास्थ्य (overall health) को दुरुस्त रखती है। तो स्वस्थ त्वचा का मतलब क्या? इसे समझने के लिए हम त्वचा, उसकी बनावट और भूमिका के बारे में समझते हैं।

त्वचा शरीर का सुरक्षा कवच है, जो बाहरी रोगाणुओं, रसायनों और पराबैंगनी विकिरण (UV) एवं अन्य खतरों को शरीर में प्रवेश नहीं करने देता। त्वचा मुख्यत: तीन परतों से बनी होती है: हाइपोडर्मिस (सबसे निचली परत), डर्मिस (मध्य परत) और एपिडर्मिस (सबसे बाहरी परत)। एपिडर्मिस में लगातार कोशिकाएं मरती रहती हैं और इनके बदले नई त्वचा कोशिकाएं बनती हैं: रोज़ाना लगभग 40,000 कोशिकाएं मिटती-बनती हैं।

एपिडर्मिस में भी कई परतें होती हैं। इसकी सबसे बाहरी परत है स्ट्रैटम कॉर्नियम, जिसे आम तौर पर ‘स्किन बैरियर (त्वचा अवरोध)’ कहा जाता है। यह केरेटिन-युक्त चपटी, मृत कोशिकाओं (कॉर्नियोसाइट्स) (corneocytes structure) से बनी होती हैं, जो मज़बूत और जलरोधी होती हैं। कॉर्नियोसाइट्स के चारों ओर ‘सेरामाइड्स’ नामक लिपिड्स होते हैं, जो नमी को अंदर रोके रखते हैं और बाहरी हमलावरों को त्वचा के अंदर आने से रोकते हैं। और इसके ऊपर होती है वसा अम्लों, अमीनो अम्ल और तेल की परत, जिसे एसिड मेंटल (acid mantle skin) कहते हैं। यहां त्वचा के लिए फायदेमंद सूक्ष्मजीव पनपते हैं। यानी त्वचा किसी निर्जीव ढाल समान नहीं है, बल्कि वह एक फलता-फूलता इकोसिस्टम है जिसमें भौतिक, रासायनिक, सूक्ष्मजीवीय और प्रतिरक्षा क्रियाएं चलती रहती हैं।

त्वचा जटिल चीज़ों का एक तंत्र ज़रूर है, लेकिन है बहुत नाज़ुक है। लापरवाहियां इसे आसानी से तबाह कर सकती है। उदाहरण के लिए, झुर्रियां कम करने वाली और मुंहासों के दाग-धब्बे हटाने के लिए की जाने वाली कुछ प्रचलित कॉस्मेटिक प्रक्रियाएं (जैसे, केमिकल पील्स, जिसमें त्वचा की परत हटाई जाती है) अगर गलत तरीके से या बहुत ज़्यादा बार की जाएं तो ये त्वचा अवरोध (स्किन बेरियर) को स्थायी नुकसान पहुंचा सकती हैं और त्वचा को अतिसंवेदी बना सकती हैं। हालांकि, त्वचा खुद को ठीक कर सकती है, लेकिन कुछ उपचार इस क्षमता को भी खत्म कर सकते हैं। अस्वस्थ त्वचा अवरोध के लक्षण हैं त्वचा में रूखापन, खुजली, लाल चकते, मुंहासे और संक्रमण।

फिर, त्वचा अवरोध की क्षति न सिर्फ त्वचा को अस्वस्थ करती है बल्कि अधिक गंभीर बीमारियों का कारण भी बन सकती है – जैसे एटोपिक डर्मेटाइटिस, सोरायसिस और एलर्जी जैसी समस्याएं। अस्वस्थ त्वचा स्टैफिलोकॉकस ऑरियस जैसे बैक्टीरिया का त्वचा में प्रवेश करना आसान बना सकती है। स्टैफिलोकॉकस ऑरियस एक ऐसा बैक्टीरिया है जो फोड़े-फुंसी और रक्त संक्रमण पैदा करता है।

आम तौर पर लोग तीक्ष्ण साबुन, डिटर्जेंट और एस्ट्रिंजेंट का इस्तेमाल करते हैं। यह आम गलती शरीर के ऊतकों की नमी खत्म कर देती है। त्वचा से अतिरक्त तेल, मेकअप और मुंहासे पैदा करने वाले बैक्टीरिया हटाने के लिए लोग अल्कोहल और विच हेज़ल युक्त उत्पाद (जैसे मेकअप रिमूवर) इस्तेमाल करते हैं। लेकिन ये उत्पाद त्वचा से वे नैसर्गिक तेल भी हटा देते हैं जो स्किन बैरियर को सलामत रखते हैं। बहुत ज़्यादा गर्म पानी से नहाना भी त्वचा अवरोध को क्षति पहुंचा सकता है। अगर पानी इतना गर्म है कि उससे बर्तनों का तेल आसानी साफ हो जाता है, तो ज़ाहिर है, इतना गर्म पानी त्वचा के प्राकृतिक तेलों को भी हटा देगा। नतीजतन, त्वचा को नुकसान होगा।

एसिड मेंटल की परत त्वचा पर स्वस्थ सूक्ष्मजीवों को पनपने के लिए ज़रूरी स्थितियां बनाती है। यदि त्वचा साफ करने के लिए सख्त और तीक्ष्ण उत्पाद उपयोग करते हैं तो ये त्वचा का pH स्तर बढ़ा देते हैं। नतीजा यह होता है कि त्वचा पर फायदेमंद सूक्ष्मजीवों की कमी हो जाती है और नुकसानदेह सूक्ष्मजीव पनपने लगते हैं।

आजकल छोटे-छोटे बच्चे भी स्किन-केयर उत्पाद अपना रहे हैं। नॉर्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी के त्वचा विशेषज्ञ पीटर लियो कहते हैं कि बच्चों की त्वचा कोमल होती है। अच्छे से धोना, मॉइश्चराइज़ करना और सनस्क्रीन लगाना ही उनके लिए पर्याप्त और सुरक्षित है। बड़ों के लिए बने अन्य तमाम उत्पाद बच्चों की त्वचा पर बहुत बुरा असर डाल सकते हैं। अमेरिकन एकेडमी ऑफ डर्मेटोलॉजी की सलाह है कि दिन में दो बार किसी सौम्य साबुन/फेसवॉश से चेहरा धोकर मॉइश्चराइज़र लगाना चाहिए। और, यदि दिन का समय है तो, सनस्क्रीन लगाना चाहिए और त्वचा को धूप से बचाने के लिए ढंककर रखना चाहिए (कपड़े, टोपी या छाते से)।

धूप से बचाव

नीदरलैंड्स कैंसर इंस्टीट्यूट की त्वचा विशेषज्ञ एल्समीक प्लास्मीइर बताती है कि लंबे समय तक त्वचा का सीधे और बहुत ज़्यादा अल्ट्रावॉयलेट (पराबैंगनी) विकिरण के संपर्क में रहना खतरनाक है, चाहे वह संपर्क सीधे धूप के ज़रिए हो या टैनिंग बेड के ज़रिए। अल्ट्रावॉयलेट विकिरण मेलेनोमा का मुख्य कारण है। मेलेनोमा एक तरह का त्वचा कैंसर है जो सबसे घातक कैंसरों में से एक है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार 2022 में लगभग 60,000 लोगों की मृत्यु मेलेनोमा से हुई थी।

दरअसल, भारत में तो नहीं लेकिन, कुछ देशों में त्वचा को टैन करने का बहुत चलन है। लोग घंटों-घंटों समुद्र किनारे धूप सेंकते रहते हैं और त्वचा को टैन करते हैं। पृथ्वी तक पहुंचने वाली धूप में अल्ट्रावॉयलेट किरणें भी होती हैं; मुख्यत: दो प्रकार की अल्ट्रावॉयलेट विकिरण (UV) हम तक पहुंचते हैं, UVA और UVB। ये दोनों त्वचा को अलग-अलग तरीकों से प्रभावित करते हैं। UVA विकिरण ऑक्सीडेटिव तनाव पैदा करती हैं और कोलाजेन तथा इलास्टिन को तोड़कर त्वचा की डर्मिस को नुकसान पहुंचाते हैं। कोलाजेन और इलास्टिन ऐसे प्रोटीन हैं जो ऊतकों को आकार और लचीलापन देते हैं। और, UVB विकिरण केवल एपिडर्मिस तक पहुंचता है, लेकिन यह त्वचा को झुलसाता (सनबर्न) है और डीएनए को क्षति पहुंचाता है, जिससे त्वचा का कैंसर हो सकता है। इसके अलावा, दोनों प्रकार के UV विकिरण एक ऐसे प्रोटीन को बाधित करते हैं जो त्वचा की सुरक्षा परत में कोशिकाओं (कॉर्नियोसाइट्स) को आपस में जोड़े रखते हैं। नतीजतन, कॉर्नियोसाइट्स के आपसी जोड़ कमज़ोर हो जाते हैं, और त्वचा की सुरक्षा परत कमज़ोर पड़ जाती है।

कई लोग जो टैनिंग चाहते हैं, वे टैनिंग बेड निर्माता कंपनियों के झूठे दावों के झांसे में आ जाते हैं। कंपनियों का दावा रहता है कि टैनिंग बेड धूप की तुलना में ज़्यादा सुरक्षित हैं, क्योंकि वे डीएनए को नुकसान पहुंचाने वाले UVB विकिरण की तुलना में UVA विकिरण अधिक उत्सर्जित करते हैं। लेकिन नॉर्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी के त्वचा विशेषज्ञ पेद्राम गेरामी कहते हैं कि ये दावे अक्सर गलत साबित होते हैं। टैनिंग बेड से उत्सर्जित UVA की मात्रा धूप से मिलने वाले UVA की तुलना में लगभग 10 से 15 गुना ज़्यादा होती है।

गेरामी आगे बताते हैं कि जो लोग इनडोर टैनिंग बेड का इस्तेमाल करते हैं, उनमें मेलेनोमा होने की संभावना तीन गुना ज़्यादा पाई गई है। और तो और, टैनिंग बेड इस्तेमाल करने वालों के शरीर के उन हिस्सों में भी मेलेनोमा देखा गया जहां आम तौर पर धूप से कम नुकसान पहुंचता है, जैसे जांघों पर। WHO ने टैनिंग बेड को एस्बेस्टस और सिगरेट जितना हानिकारक बताया है और इसे कैंसर-कारी श्रेणी में रखा है।

लंबे समय तक किए गए कई क्लीनिकल ट्रायल से यह पता चला है कि सनस्क्रीन का इस्तेमाल करने से स्किन कैंसर का खतरा काफी कम हो जाता है। WHO लोगों को सन प्रोटेक्शन फैक्टर (SPF) 30 या उससे ज़्यादा वाले ब्रॉड-स्पेक्ट्रम सनस्क्रीन (जो दोनों तरह की UV किरणों को रोकती है) इस्तेमाल करने की सलाह देता है। लेकिन सनस्क्रीन लगा लेने का मतलब यह नहीं कि अब आप पूरी तरह सुरक्षित हैं, और कितना भी धूप के संपर्क में रह सकते हैं। शरीर को अच्छी तरह से ढंकने वाले कपड़े, छतरी या छायादार टोपी का इस्तेमाल और सुबह 10 बजे से दोपहर 2 बजे के बीच (जब सूरज सबसे तेज़ होता है) धूप में जाने से बचना भी ज़रूरी है। यह उपाय अपनाना इसलिए भी ज़रूरी है क्योंकि सनस्क्रीन की क्वालिटी में काफी अंतर हो सकता है। उदाहरण के लिए, ऑस्ट्रेलिया में कई लोकप्रिय सनस्क्रीन को मार्च में बाज़ार से इसलिए हटा दिया गया था क्योंकि ड्रग रेगुलेटर टेस्ट में पता चला था कि उनके बेस फॉर्मूलेशन में गड़बड़ियों के चलते उनमें SPF दावे से काफी कम था।

वैसे, सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर सनस्क्रीन के बारे में बहुत सारी गलत जानकारियां भी फैला रहे हैं। उनका कहना है कि सनस्क्रीन से स्किन कैंसर और विटामिन-डी की कमी होती है, जबकि वास्तविकता इसकी उलट है। ऐसी गलत बातें अक्सर उन लोगों को निशाना बनाती हैं, जो कभी त्वचा विशेषज्ञ के पास गए ही नहीं हैं। बल्कि सोशल मीडिया ने स्किनकेयर के नए-नए चलन चलाएं हैं – जैसे मॉइश्चराइज़र की जगह बीफ टैलो (जानवर की चर्बी) लगाना, रीजुरेन, ग्लास स्किन मास्क लगाना, रेड-लाइट थेरपी लेना, वगैरह-वगैरह।

लियो कहते हैं बाज़ार में हज़ारों ऐसे प्रोडक्ट मौजूद हैं जो उनमें मौजूद तरह-तरह के केमिकल का नाम लेकर दावा करते हैं कि वे आपकी त्वचा को जवां बनाए रखने और त्वचा को पहुंचे नुकसान को ठीक करते हैं। लेकिन उत्पादों में मौजूद तत्वों के पुख्ता वैज्ञानिक प्रमाण होने ज़रूरी हैं।

जैसे, मॉइश्चराइज़र के बारे में कई अध्ययनों से यह साबित हुआ है कि वे त्वचा की देखभाल करते हैं। अध्ययन बताते हैं कि एक सामान्य और संतुलित मॉइश्चराइज़र त्वचा अवरोध की हर परत में नमी बरकरार रखता है और उसे ठीक करने में मदद करता है। सबसे असरदार मॉइश्चराइज़र में तीन मुख्य अवयव होते हैं – इमोलिएंट्स, ह्यूमेक्टेंट्स और ऑक्लूसिव्स। इमोलिएंट्स, जैसे तेल, जो  त्वचा को नर्म व मुलायम बनाते हैं और त्वचा कोशिकाओं तथा लिपिड्स के बीच की खाली जगहों को भरकर पानी की कमी को दूर करते हैं। हाइलूरोनिक एसिड जैसे ह्यूमेक्टेंट्स बाहर की हवा या डर्मिस से नमी खींचकर त्वचा की ऊपरी परत तक पहुंचाते हैं। और, पेट्रोलियम जेली जैसे ऑक्लूसिव्स त्वचा के ऊपर एक सुरक्षा कवच बना देते हैं जो नमी को बाहर जाने से रोकते हैं।

इसके अलावा मॉइश्चराइज़र में रेटिनॉइड्स, एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं। रेटिनॉइड्स (विटामिन-ए से बने यौगिकों का एक समूह) कोशिकाओं के बनने और कोलाजेन के बनने को तेज़ करते हैं, जिससे झुर्रियां और काले धब्बे कम होते हैं, मुंहासों को थामते हैं। विटामिन-सी जैसे एंटीऑक्सीडेंट्स ‘मुक्त मूलकों (फ्री रेडिकल्स)’ के प्रवेश को रोकते हैं, जो लिपिड्स, डीएनए और प्रोटीन्स को क्षति पहुंचाते हैं।

नॉर्थ कैरोलिना स्टेट युनिवर्सिटी के त्वचा विशेषज्ञ ज्यूसेपे वालाकी का कहना है कि आप कितना भी बढ़िया मॉइश्चराइज़र लगा लें, लेकिन यदि आपकी जीवनशैली और खान-पान अस्त-व्यस्त और अस्वस्थ है, तो वे भी आपकी त्वचा को स्वस्थ नहीं रख सकते और आपके अस्त-व्यस्तता के बुरे असर को बेअसर नहीं कर सकते। उदाहरण के लिए, धूम्रपान करने से कोलाजेन और इलास्टिन कमज़ोर पड़ जाते हैं, और त्वचा तक पोषक तत्व पहुंचाने वाला रक्त प्रवाह भी मंद पड़ जाता है।

इसके अलावा त्वचा को स्वस्थ रखने का एक बहुत ज़रूरी हिस्सा है – पोषक तत्वों से भरपूर भोजन करना, जिसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स, अमीनो एसिड्स और फैट्स शामिल हों। विशेषज्ञ कहते हैं कि त्वचा हमारे शरीर का आईना है, इसे देखकर पता चल सकता है कि आपके शरीर में किस पोषक तत्व की कमी है। इस बात के भी प्रमाण मिल रहे हैं कि त्वचा और पेट का आपस में बहुत गहरा सम्बंध है। कुछ अध्ययनों में यह पाया गया है कि पेट के सूक्ष्मजीव संसार में बदलाव करने से त्वचा के लक्षण भी बदल जाते हैं।

इसलिए यदि आप अपनी त्वचा वाकई स्वस्थ रखना चाहते हैं तो सोशल मीडिया के झांसे या दुनिया के चलन में न आएं। और इन बातों का ख्याल रखें: अपनी दिनचर्या सही रखें; अच्छा भोजन खाएं; सौम्य साबुन या फेसवॉश से त्वचा धोएं; मॉइश्चराइज़र लगाएं; दिन के समय सनस्क्रीन लगाएं; और बाहर निकलते वक्त छाता, टोपी या कपड़े से शरीर को ढंककर रखें। ध्यान रहे, सोशल मीडिया से लेकर उत्पाद निर्माताओं को आपकी सेहत की बजाय पैसा बनाने की चिंता अधिक होती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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नवजात शिशुओं को बचाने में नाकाम विश्व

तत विकास लक्ष्यों (SDG) के तहत संयुक्त राष्ट्र (United Nations )ने 2015 में विश्व के लिए एक महत्वाकांक्षी लक्ष्य तय किया था: वर्ष 2030 तक नवजात शिशुओं की मृत्यु दर घटाकर प्रति 1000 जीवित जन्म पर 12 या उससे कम करना। नवजात शिशु मृत्यु दर यानी जन्म के पहले महीने (neonatal deaths) में होने वाली मृत्यु। लक्ष्य पूरा होने में सिर्फ 4 साल बाकी हैं, और 60 से ज़्यादा देशों के लिए इस लक्ष्य को पाना दूर की कौड़ी है। मसलन, केन्या 2014 के बाद से अब तक प्रति 1000 जीवित जन्मों पर सिर्फ एक मृत्यु कम कर पाया है। वहां नवजात शिशु मृत्यु दर 22 से घटकर महज़ 21 हुई है।

हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय मातृ एवं नवजात स्वास्थ्य सम्मेलन (maternal neonatal health conference) हुआ, जिसमें प्रगति की धीमी रफ्तार पर और इस बात पर चर्चा हुई कि इसे गति कैसे दी जाए। इस दिशा में काम कर रहे शोधकर्ता, नीति-निर्माता और पैरोकार का कहना है कि असल में हमें मृत्यु के कारण पता हैं, उनके उपाय भी पता हैं। लेकिन वित्तीय कमी (health funding crisis) और राजनीतिक इच्छाशक्ति का अभाव इस काम में रोड़े डालते हैं।

नवजात शिशु मृत्यु दर पर 17 मार्च को संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी रिपोर्ट बताती है कि अब भी हर साल 23 लाख नवजात शिशुओं की मृत्यु होती है (अकेले अफ्रीका में सालाना 11 लाख)। यह संख्या एड्स (AIDS deaths comparison) और कई अन्य गंभीर बीमारियों से होने वाली मौतों से कहीं ज़्यादा है। इन मौतों का सबसे बड़ा कारण है समय-पूर्व जन्म; 18 प्रतिशत मौतें इसी वजह से होती हैं। जन्म के समय दम घुटना व आघात (birth asphyxia), निमोनिया (pneumonia infection), मलेरिया और डायरिया मृत्यु के अन्य प्रमुख कारण हैं।

अफ्रीका में ज़्यादातर महिलाएं स्वास्थ्य केंद्रों या अस्पतालों में प्रसव (hospital delivery) करती हैं, जो घर की तुलना में कहीं ज़्यादा सुरक्षित जगह है। लेकिन फिर भी वहां हर साल 11 लाख नवजातों की मृत्यु होती है। अध्ययन बताते हैं कि इसका कारण स्वास्थ्य केंद्रों में मिलने वाली अपर्याप्त देखभाल (poor healthcare quality) है। एक अध्ययन में चार देशों – मलावी, तंजानिया, नाइजीरिया और केन्या – के 60 अस्पतालों की नवजात स्वास्थ्य इकाइयों में 18 महीनों (540 दिन) तक बिजली कटौती (power outage hospitals) पर नज़र रखी गई। पाया गया कि अस्पतालों में लगभग 200 दिनों तक बिजली कटौती हुई, जिससे इनक्यूबेटर, ऑक्सीजन सप्लाई और मॉनीटरिंग उपकरणों के काम करने में बाधा आई। प्रशिक्षित नर्सों (nurse shortage) की कमी एक और बड़ी समस्या है। तंजानिया में ही नवजातों की देखभाल के लिए 2000 से अधिक नर्सों की कमी है।

केन्या में, 1,30,000 नवजात शिशुओं के आंकड़ों (data analysis) के विश्लेषण से पता चला है कि जिन शिशुओं को इलाज के लिए दूसरे अस्पताल में रेफर किया गया, उनके मरने की संभावना उन शिशुओं की तुलना में तीन गुना ज़्यादा थी जिन्हें उसी अस्पताल में इलाज मिला जहां उनका जन्म हुआ था।

इसका एक कारण यह है कि अधिकतर गंभीर रूप से बीमार शिशुओं को ही रेफर किया जाता है। लेकिन आग में घी का काम करते हैं प्रसव वाले अस्पताल में मिली खराब या अपर्याप्त देखभाल (inadequate treatment), आवश्यक सुविधाओं-रहित वाहन (एंबुलेंस) और रेफर किए गए अस्पताल में भर्ती में देरी।

इन सब कारणों और समस्याओं के हल (healthcare solutions) हैं हमारे पास। 2019 में, 23 संगठनों (जिनमें से ज़्यादातर अफ्रीका के थे) ने मिलकर न्यूबॉर्न एसेंशियल सॉल्यूशंस एंड टेक्नॉलॉजीस (NEST360) नामक एक संगठन बनाया था, जिसका मकसद उन पांच देशों के 130 अस्पतालों में देखभाल को बेहतर करना है जहां नवजात शिशुओं की मृत्यु दर सबसे ज़्यादा है: केन्या, मलावी, नाइजीरिया, तंजानिया और इथियोपिया। NEST360 ने इन अस्पतालों में सस्ते उपकरण (जैसे इनक्यूबेटर और थर्मल गद्दे), सांस लेने के सहायक उपकरण और पीलिया के इलाज के लिए मशीनें वगैरह उपलब्ध करवाईं।

इसके अलावा उन्होंने डॉक्टरों और तकनीशियनों (medical training) को उपकरणों की देखभाल तथा कामकाजी रखने का प्रशिक्षण दिया। साथ ही उन्होंने उपकरण संचालकों को उपकरणों के सही इस्तेमाल के तरीके बताए। क्योंकि यदि उपकरणों का ठीक से इस्तेमाल न किया जाए, तो मामला और बिगड़ सकता है। जैसे, सांस लेने में सहायक उपकरणों के सुरक्षित उपयोग (oxygen monitoring) के लिए ऑक्सीजन के स्तर की सावधानीपूर्वक निगरानी की आवश्यक होती है, वर्ना यह आंखों को नुकसान पहुंच सकता है। NEST360 गैर-तकनीकी उपायों को भी अपनाने को बढ़ावा देता है। जैसे वे कंगारू मदर केयर – यानी शिशुओं का मां से सीधा (त्वचा से त्वचा) संपर्क।

यह भी देखा गया कि जन्म के समय शिशुओं का और अस्पताल या स्वास्थ्य केंद्रों से जुड़े डैटा (health data systems)  को व्यवस्थित और अपडेट रखना भी उपचार के सही फैसले लेने में मदद कर सकता है। इससे अस्पताल के कर्मचारियों को बेहतर फैसले लेने (data driven decisions) में मदद मिल सकती है क्योंकि इनसे पता चलता है कि कौन-सा उपाय काम कर रहा है और कौन-सा नहीं। ये डैटा सरकारी योजनाओं को दिशा दे सकते हैं।

65 सहभागी अस्पतालों के शुरुआती विश्लेषण से पता चलता है कि नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में काफी कमी आई है। सबसे ज़्यादा फायदा उन शिशुओं को हुआ है जो सबसे ज़्यादा जोखिम में थे, खासकर उन समय-पूर्व जन्मे बच्चों को फायदा हुआ जिन्हें सांस लेने में दिक्कत थी। मलावी (Malawi success case) इस मामले में सबसे अलग है: यहां 2019 और 2025 के बीच अस्पतालों में नवजात शिशुओं की मृत्यु दर में 23 प्रतिशत की कमी हुई है, और यह अफ्रीका के उन गिने-चुने देशों में से एक है जो 2030 तक SDG लक्ष्य को हासिल कर सकता है। अफ्रीका में प्रगति तो हो रही है लेकिन रफ्तार पर्याप्त नहीं है।

दक्षिण एशिया (South Asia progress) के कुछ देश इस दिशा में प्रगति पर हैं। दी लैंसेट में प्रकाशित अध्ययनों के निष्कर्ष बताते हैं कि पाकिस्तान ने 1990 से 2024 के बीच लगातार प्रगति की है, हालांकि वह अभी भी SDG लक्ष्य से बहुत पीछे है। दूसरी ओर, भारत, नेपाल और बांग्लादेश (India Nepal Bangladesh success) के प्रयास सफल दिखते हैं।

फंडिंग की कमी (global health funding) प्रगति में आड़े आ रही है। हेल्थ इकोनॉमिस्ट एलिस टारस कहती हैं कि हमेशा से नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य को मातृ और प्रजनन स्वास्थ्य (maternal health funding) की तुलना में कम फंडिंग मिली है। ऐसा मान लिया जाता है कि मातृ स्वास्थ्य को फंड करने से बच्चे अपने आप पूरी तरह सुरक्षा के दायरे में आ जाते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है।

वहीं, वैश्विक स्वास्थ्य सहायता (global aid cuts) में हुई भारी कटौती पिछले दो दशकों की प्रगति को बेअसर कर सकती है। फंडिंग के हालात पिछले साल और भी खराब हो गए। स्वास्थ्य से सम्बंधित एक गैर-मुनाफा संस्था PATH की हालिया रिपोर्ट के अनुसार, मातृ, नवजात और शिशु स्वास्थ्य (maternal child health funding) को मिलने वाली वित्तीय सहायता 2025 में लगभग आधी हो गई (1.66 अरब डॉलर से घटकर 85 करोड़ डॉलर हो गई)। रिपोर्ट का अनुमान है कि अगर इस कमी की भरपाई नहीं की गई, तो 2040 तक 80 लाख से ज़्यादा शिशुओं की और 10 लाख से ज़्यादा माताओं की मौत हो सकती है। अफ्रीका समेत सभी देशों की सरकारों को अपने-अपने स्वास्थ्य बजट (health budget increase) बढ़ाने की ज़रूरत है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जन-आंदोलन के रूप में स्वास्थ्य सेवा: शहीद अस्पताल

रोहित एम.

लौह अयस्क (iron ore mining) की लाल धूल से ढंकी हुई दल्ली राजहरा (Dalli Rajhara, Chhattisgarh) की सड़कों को देखकर ऐसा लगता है जैसे समय कहीं ठहर सा गया हो। इस छोटे से शहर में रहने और सांस लेने के कुछ ही पलों बाद एक अजीब से विलगाव का एहसास होना तय है।

इसमें जब उस मज़दूर आंदोलन (labor movement history), जिसने लगभग आधी सदी से इस शहर को आकार दिया है, की कहानी जुड़ जाती है तो दंतकथा बनना तय है। इस इतिहास का जीता-जागता साक्षी है शहीद अस्पताल (Shaheed Hospital model)। यह अस्पताल, जिसे मज़दूरों ने मज़दूरों के लिए बनाया था, जिसकी एक-एक ईंट मज़दूरों के योगदान से आई थी, एक असाधारण दौर की याद दिलाता है।

अस्पताल की पुरानी इमारत के प्रवेश द्वार पर लगी शिला-स्मारिका (memorial plaque) – जो 3 जून, 1983 को शहीद अस्पताल के उद्घाटन की याद दिलाती है – पर दो नाम खुदे हुए हैं: लहर सिंह (खदान मज़दूर) और हलालखोर (किसान और अर्रेझर गांव के बड़े-बुज़ुर्ग)। ये वे लोग थे जिन्होंने इस अस्पताल का उद्घाटन किया था।

दल्ली और राजहरा, भिलाई स्टील प्लांट (Bhilai Steel Plant – बीएसपी) के स्वामित्व वाली दो लौह अयस्क खदान इकाइयां हैं, जिनके नाम पर इस शहर का नाम ‘दल्ली राजहरा’ पड़ा है। यह बालोद ज़िले में स्थित एक छोटा सा कस्बा है, जो भिलाई से लगभग 90 किलोमीटर दक्षिण में स्थित है। 2011 की जनगणना के अनुसार यहां की आबादी लगभग 44,000 है।

शहीद अस्पताल में 100 से 150 किलोमीटर दूर तक के कस्बों और गांवों से लोग इलाज के लिए आते हैं। मंगलवार को छोड़कर, सप्ताह के बाकी सभी दिन अस्पताल की ‘बाह्य-रोगी’ (OPD) इमारत और रिसेप्शन लॉबी में खूब आवक-जावक रहती है। शहर से सटी हुई लौह अयस्क की खदानें — जिनका इतिहास इस जगह से गहराई से जुड़ा हुआ है — मंगलवार को बंद रहती हैं। इसी वजह से, शहीद अस्पताल में भी मंगलवार को सीमित सेवाएं ही उपलब्ध रहती हैं।

एक आम दिन में शहीद अस्पताल की लॉबी राजनांदगांव, रायपुर, बालोद, कांकेर, चरामा और अन्य जगहों से आए मज़दूरों, किसानों और छोटे-मोटे दुकानदारों (working class patients) से खचाखच भरी रहती है, जो अपने रजिस्ट्रेशन का इंतज़ार कर रहे होते हैं।

बाहर से देखने पर, शहीद अस्पताल नई और पुरानी इमारतों का एक मिला-जुला रूप लगता है, जिसमें घुमावदार सीढ़ियां, एक विशाल प्रतीक्षालय और अलग-अलग हिस्सों की ओर जाने वाले गलियारे हैं। अस्पताल का स्टाफ पूरी लगन से विभिन्न वार्डों में घूमता रहता है और बीमारों की देखभाल करता है। बाहरी दिखावों से परे, अस्पताल का इतिहास मुख्यत: बातों के ज़रिए ही फैलता जाता है, जिनमें संघर्षों (workers struggle) की यादें गुंथी होती हैं।

कहानियां मुंह-ज़ुबानी एक से दूसरे इंसान तक पहुंचती हैं — जैसे, छत के बहुत जल्दी बन जाने की कहानी, जिसको बनाने में दस हज़ार खदान मज़दूरों (mine workers protest) ने अपना काम रोककर योगदान दिया था; या फिर वह कहानी जिसमें अस्पताल को बिजली देने से मना कर दिया गया था, जिसके बाद खदानों के हर क्षेत्र के मज़दूरों ने मिलकर विरोध प्रदर्शन (workers protest movement) किया था। ये घटनाएं अस्पताल के स्टाफ और स्थानीय समुदाय की यादों में हमेशा-हमेशा के लिए रच-बस गई हैं।

मज़दूरों के ऐतिहासिक संघर्षों (trade union history) से निकले कई मूल्य शहीद अस्पताल के रोज़मर्रा के कामकाज में साफ झलकते हैं। अस्पताल का संचालन समितियों और एक मज़बूत आंतरिक लोकतंत्र प्रणाली (internal democracy system) के ज़रिए किया जाता है। नर्सें, सफाईकर्मी, डॉक्टर और अन्य स्टाफ अलग-अलग प्रशासनिक मामलों पर फैसले लेने में बराबर की हिस्सेदारी निभाते हैं।

बैठकों में वेतन, काम के घंटे, कार्यस्थल से जुड़े मुद्दे और अस्पताल के भावी कार्यों (organizational decisions) जैसे विषयों पर चर्चा की जाती है। “यहां कुछ ज़्यादा ही लोकतंत्र है”, ऐसी काना-फूसी अक्सर मैंने सुनी है; लोगों का कहना है कि निर्णय प्रक्रिया बहुत ज़्यादा थकाऊ और लंबी-लंबी बहसों (democratic process challenges) वाली होती है। हालांकि, आंतरिक लोकतंत्र के प्रति शहीद अस्पताल की प्रतिबद्धता पूरी तरह से अडिग है।

जग्गू राम साहू – जिन्हें प्यार से ‘जग्गू दादा’ कहते हैं — 70 वर्षीय रिटायर्ड खदान मज़दूर (retired mine worker) हैं जो अक्सर अस्पताल में अपनी साधारण-सी गुलाबी शर्ट पहने हुए दिखते हैं और मरीज़ों व स्टाफ, दोनों का ही बड़े प्यार से अभिवादन करते हैं। अब वे पूर्णकालिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (community health worker) के तौर पर काम करते हैं। एक बार मैंने उनसे अस्पताल के इतिहास के बारे में पूछा। उनका सीना गर्व से चौड़ा हो गया; वे कुर्सी की छोर पर बैठ गए और उन्होंने मुझे ‘लाल मैदान’ (Red Maidan protest) में हुई उस ऐतिहासिक बैठक के बारे में विस्तार से बताया।

खदानों में ठेके पर काम करने वाले मज़दूरों (contract labor issues) में लंबे समय से जो अलगाव की भावना पनप रही थी, वह 1977 के ‘लाल मैदान’ विरोध प्रदर्शन (1977 labor protest)  के रूप में सामने आई। इमर्जेंसी हटे अभी ज़्यादा समय नहीं गुज़रा था, और हवा में संघर्ष करने तथा मज़दूरों के जायज़ अधिकारों को वापस दिलाने का जोश भरा हुआ था। जग्गू दादा याद करते हुए बताते हैं, “उन दिनों जो मज़दूर पक्की नौकरी पर नहीं थे उन्हें महीने के 70 रुपए मिलते थे, जबकि पक्की नौकरी वाले मज़दूरों की तनख्वाह 300 रुपए थी। दरअसल, दोनों तरह के मज़दूर एक ही तरह का काम कर रहे थे।”

जग्गू दादा जब लाल मैदान विरोध प्रदर्शन (labor union protest) के उन जोशीले दिनों के बारे में बात करते हैं, तो उनकी आंखों में एक चमक दिखाई देती है। उन्हें याद है कि हज़ारों ठेका मज़दूर कई दिनों तक वहीं जमे रहे; वे नाचते-गाते थे और आपस में संगठित होने तथा यूनियन बनाने के बारे में चर्चा करते थे। वे बोनस, साइट पर जबरन खाली बैठाने के बदले मुआवज़ा और बारिश के पहले अपनी कच्ची झोपड़ियों की मरम्मत (labor welfare demands) के लिए भत्ते की मांग कर रहे थे।

लाल मैदान का यह विरोध प्रदर्शन आगे चलकर ‘छत्तीसगढ़ माइंस श्रमिक संघ’ (CMSS) में बदल गया। यह एक ऐसा मज़दूर संगठन था जिसने शंकर गुहा नियोगी को अपना नेता चुना, जो कि उस समय यूनियन संगठक और आंदोलनकर्ता के तौर पर जानी जाने वाली शख्सियत थे। जब मैंने जग्गू दादा से पूछा कि उन्हें शंकर गुहा नियोगी के बारे में कैसे पता चला और यह फैसला उन्होंने कैसे किया कि वही उनके नेता होंगे, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “आपको नेल्सन मंडेला (Nelson Mandela inspiration) के बारे में कैसे पता चला और आपने उनका सम्मान करने का फैसला कैसे किया? ठीक उसी तरह, हमें भी उस समय तक नियोगी जी के बारे में पता चल चुका था और हमने उन्हें अपना नेता चुन लिया।”

अधिकारों के लिए लड़ने वाली कार्यकर्ता और शिक्षाविद इलीना सेन, जो दल्ली राजहरा के ट्रेड यूनियन आंदोलन से काफी करीब से जुड़ी हुई थीं, अपनी संस्मरण किताब इनसाइड छत्तीसगढ़ – ए पॉलिटिकल मेमॉयर (Inside Chhattisgarh – A Political Memoir) में लिखती हैं: “1977 में जब नई यूनियन बनी, उसके कुछ ही समय बाद उसके नेताओं ने पास की दानीटोला खदानों का दौरा किया। वहां शंकर गुहा नियोगी अपने ससुराल में अपना स्वास्थ्य संभाल रहे थे। वे आंतरिक सुरक्षा रखरखाव अधिनियम (मीसा – MISA Act India) जैसे सख्त और भयावह कानून के तहत हिरासत से रिहा हुए थे और वहां ठीक हो रहे थे।” यहीं पर यूनियन नेताओं ने, जो कि नियोगी के काम और विचारों से अच्छी तरह वाकिफ थे, उनसे मज़दूर आंदोलन के बौद्धिक और संगठनात्मक विकास (labor movement leadership) की बागडोर संभालने की गुज़ारिश की।

यह आंदोलन जग्गू दादा जैसे कई लोगों के लिए ज़िंदगी बदलने वाला अनुभव (social movement impact) साबित हुआ। लोगों की मदद करने की अपनी दिली चाहत की वजह से उनका झुकाव ‘स्वास्थ्य विभाग’ की ओर हुआ। स्वास्थ्य विभाग मज़दूर संगठन द्वारा बनाए गए 17 विभागों में से एक था। ‘शहीद अस्पताल’ इसी स्वास्थ्य विभाग की एक पहल थी। इस अस्पताल का नाम उन 11 खदान मज़दूरों की शहादत (martyrs memorial) की याद में रखा गया था, जो 1977 में हुई पुलिस फायरिंग में मारे गए थे। यह घटना ऐतिहासिक ‘लाल मैदान’ सभा के बाद हुई थी।

जग्गू दादा ने 1981 में एक ‘स्वयंसेवी स्वास्थ्य कार्यकर्ता’ (volunteer health worker) के तौर पर अपने काम की शुरुआत की थी। उस समय, ट्रेड यूनियन दफ़्तर के परिसर में बनी एक कच्ची झोपड़ी (गैराज) में ही एक अस्थायी क्लीनिक चलाया जाता था। 2012 में अपनी सेवानिवृत्ति तक वे दिन के समय खदानों में काम करते, और साथ ही एक स्वयंसेवी स्वास्थ्य कार्यकर्ता के तौर पर भी अपनी सेवाएं देते रहे — यह एक ऐसा काम था जिसके प्रति उनके मन में गहरा जुनून था। सेवानिवृत्ति के बाद, वे एक ‘पूर्णकालिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता’ बन गए। उन्होंने शहीद अस्पताल की स्वास्थ्य टीमों के साथ मिलकर भोपाल गैस त्रासदी (Bhopal gas tragedy relief) और 1993 के लातूर भूकंप (Latur earthquake relief) जैसी आपदाओं के दौरान राहत कार्यों में हिस्सा लेने के लिए काम से लंबी-लंबी छुट्टियां भी लीं – इस कारण उनके वरिष्ठ अधिकारियों की त्यौरियां भी चढ़ गईं।

जग्गू दादा के लिए, सामाजिक सक्रियता (एक्टिविज़्म-activism) और स्वास्थ्य सेवा का काम आपस में गहराई से जुड़ा हुआ है। जब मैंने उनसे शंकर गुहा नियोगी द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत ‘संघर्ष और निर्माण’ (struggle and development concept) के बारे में पूछा, तो उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “हम अपने पेट की खातिर संघर्ष करते हैं, और समाज की सेवा के लिए अस्पताल में काम करते हैं।”

शहीद अस्पताल के वरिष्ठ सदस्यों से जग्गू दादा जैसी कहानियां अक्सर सुनने को मिलती रहती हैं।

कुलेश्वरी दीदी यानी कुलेश्वरी सोनवानी, जो इस समय अस्पताल की सबसे वरिष्ठ नर्स हैं, ने मुझे अपनी कहानी सुनाई, “शहीद अस्पताल के बिना मेरी अपनी कोई पहचान ही नहीं है।” वे उन चुनिंदा नर्सों में से हैं, जो उस शुरुआती दौर से ही अस्पताल के साथ जुड़ी रही हैं, जब यह ट्रेड यूनियन दफ्तर के गैराज में चलने वाला एक अस्थायी क्लीनिक हुआ करता था।

जब मैंने उनसे पूछा कि आज जो भव्य शहीद अस्पताल हमारे सामने खड़ा है, उसकी नींव कैसे रखी गई, तो उन्होंने मुझे कुसुम बाई (maternal death case) की कहानी सुनाई। उन्होंने बताया, “कुसुम बाई मज़दूर नेताओं में से एक थीं। मेडिकल सुविधाओं की कमी के चलते प्रसव के दौरान उनकी मौत हो गई। दल्ली राजहरा में बीएसपी के स्वास्थ्य केंद्र के डॉक्टरों ने उन्हें भर्ती करने से मना कर दिया था, क्योंकि उनके पास हेल्थ कार्ड (health access issue) नहीं था। कुसुम बाई की शोक सभा में मज़दूरों ने फैसला किया कि वे अपने और ऐसी ही मुश्किलों का सामना कर रहे अपने जैसे अन्य लोगों के लिए एक अस्पताल बनाएंगे।”

जब तक शहीद अस्पताल नहीं बना था, तब तक दल्ली राजहरा में ठेके पर काम करने वाले खदान मज़दूरों (contract workers healthcare) के लिए स्वास्थ्य सेवाएं लगभग न के बराबर थीं। उन्हें नियमित मज़दूरों की तरह कोई सुविधाएं या अधिकार नहीं मिलते थे। मज़दूरों के अपने अस्पताल बनाने के पक्के इरादे को कई युवा डॉक्टरों का साथ मिला – जैसे, बिनायक सेन (Binayak Sen), आशीष कुंडू, पवित्र गुहा, सैबल जाना, पुण्यब्रत गुन वगैरह। इन डॉक्टरों ने मज़दूरों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर उनके इस सामूहिक सपने को पूरा करने में मदद की।

69 साल की अनुभवी कार्यकर्ता कुलेश्वरी दीदी को अपनी ज़िंदगी के सफर में कई निजी मुश्किलों (domestic violence) का सामना करना पड़ा। उनके पति बिल्कुल नहीं चाहते थे कि वे शहीद अस्पताल में काम करें। उन्होंने मुझे बताया कि उस ज़माने में जो औरतें काम के लिए घर से बाहर निकलती थीं उन्हें ‘चरित्रहीन’ (women stigma) कहा जाता था। अपने पति के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, “उन्हें शराब की बहुत बुरी लत थी। वे देर रात घर लौटते थे और मुझे मारते-पीटते थे।” शक की वज़ह से कभी-कभी वे कुलेश्वरी दीदी की रात की ड्यूटी के वक्त अस्पताल में ही सोते थे। कई बार उन्होंने अपने घर के हिंसक माहौल से भागकर अस्पताल में ही पनाह ली। उनके पति शराब पर ही सारा पैसा उड़ा देते थे। उनके पति द्वारा नशे में की गई हिंसा आज भी उनकी यादों में ताज़ा है। वे बताती हैं, “उन दिनों के बारे में सोचते ही मैं सिहर उठती हूं।”

उस मुश्किल दौर में जब उनके परिवार ने उनका साथ छोड़ दिया था और कोई भी उनके साथ खड़ा नहीं था, तब अस्पताल के डॉक्टरों और कर्मचारियों ने ही हर तरह से उनकी मदद (support system) की थी। “मुझे नहीं लगता कि इस अस्पताल के बिना मैं इतने लंबे समय तक ज़िंदा रह पाती।” यह कहते हुए उनकी आंखे भर आईं थीं। उनके दो बेटे और एक बेटी थी। उनके एक बेटे ने आत्महत्या कर ली थी। जैसे-जैसे समय बीतता गया और कुलेश्वरी दीदी के बच्चे बड़े होते गए, घर में उनकी स्थिति और मज़बूत होती गई।

मिट्टी की एक छोटी-सी झोपड़ी में शुरू हुआ छोटा-सा दवाखाना (small clinic beginning) चार दशकों का सफर तय कर आज एक विशाल और शानदार अस्पताल (modern hospital setup) बन चुका है। हालांकि, शहीद अस्पताल के शुरुआती साल चुनौतियों से भरे थे। सुजाता दीदी, वे भी अनुभवी नर्स हैं और हाल ही में रिटायर हुई हैं, ने अस्पताल के शुरुआती दिनों की बहुत ही छोटी-छोटी बातें बताईं।

उस समय, पेशेवर स्टाफ को रखने के लिए बहुत कम पैसे (low funding healthcare) थे। स्वास्थ्य कार्यों में रुचि रखने वाले लोगों को अस्पताल चलाने के लिए स्वयंसेवक के तौर पर भर्ती किया गया। अपने संस्मरण में इलीना सेन लिखती हैं कि कैसे डेविड वर्नर (David Werner book) की किताब ‘जहां डॉक्टर न हो (व्हेयर देयर इज़ नो डॉक्टरWhere There Is No Doctor) स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण के लिए एक बुनियादी किताब बन गई थी। चूंकि कई कार्यकर्ताओं की औपचारिक शिक्षा सीमित थी, इसलिए जानकारी देने के लिए चर्चाओं और चित्रों का इस्तेमाल किया जाता था, साथ ही डॉक्टरों के साथ सैद्धांतिक और प्रैक्टिकल कक्षाएं भी होती थीं।

इसी तरह, एक ट्रेड-यूनियन बैठक के बाद सुजाता दीदी को क्लीनिक-डिस्पेंसरी में काम शुरू करने के लिए बुलाया गया। ‘वह एक ऐसा समय था जब हमें एक साथ कई काम (multi tasking healthcare) करने पड़ते थे। नर्सिंग के कामों के अलावा, हम बहुत दूर से पानी लाते थे, कपड़े धोते थे, खाना बनाते थे और क्लीनिक को संभालते थे।’ वे याद करते हुए बताती हैं कि अस्पताल की पुरानी मिट्टी की दीवारों (rural setup hospital) पर गोबर और मिट्टी से छबाई भी किया करते थे।

शुरुआती दिनों में, डॉक्टर, नर्स और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं सहित पूरा स्टाफ बहुत ही घनिष्ठ समुदाय की तरह रहता था। वे एक साथ रहते थे और अपना खाना आपस में बांटकर खाते थे। यहां तक कि डॉक्टर और नर्स भी अस्पताल की चादरें धोने जैसे कामों में हाथ बंटाते थे। उन्होंने याद करते हुए बताया, “हम शायद ही कभी अस्पताल से बाहर जाते थे। हमने कई-कई घंटों काम किया, सुबह 11 बजे से रात 12 बजे तक। और शुरू में, हमें कोई वेतन (unpaid work) नहीं मिलता था। हम तो बस अपने लोगों की मदद कर रहे थे।”

अब, 150 बिस्तरों वाला यह अस्पताल – जिसमें सर्जरी, जनरल मेडिसिन और प्रसूति एवं स्त्री रोग के लिए वार्ड हैं – इस क्षेत्र की नर्सों, सफाई कर्मचारियों, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, ट्रेड यूनियन कार्यकर्ताओं, कम्युनिस्ट डॉक्टरों, मज़दूरों और किसानों (people powered healthcare) के कंधों पर खड़ा हुआ है। इसकी फीस बहुत कम है, ताकि यहां के लोगों की आमदनी के हिसाब से उनकी जेब पर भारी न पड़े। इसका प्रशासन मुख्य रूप से ट्रेड यूनियन के नेताओं और अस्पताल के कर्मचारियों (collective management) द्वारा किया जाता है। शहीद अस्पताल के बाह्य-रोगी विभाग (OPD) में रोज़ाना तकरीबन 200 मरीज़ आते हैं।

इस शानदार काम की मज़बूत रीढ़ हैं 70 वर्षीय मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. सैबल जाना (Dr Saibal Jana), जिन्हें प्यार से ‘जाना सर’ कहते हैं। वे ऊर्जा के एक ऐसे स्रोत हैं जो शहीद अस्पताल के कामकाज को सुचारू रूप से चलाए रखता है।

पिछले 40 वर्षों से, डॉ. जाना ने अस्पताल को एकजुट रखा है, और खुद को मज़दूरों के संघर्षों (egalitarian values) से जुड़े समानतावादी मूल्यों के प्रति समर्पित कर दिया है। मज़बूत कद-काठी वाले, दिल खोलकर हंसने वाले और असीम ऊर्जा से भरे इस सज्जन को अक्सर क्लीनिकल राउंड के दौरान एक सादे सूती कुर्ते या शर्ट में देखा जा सकता है। चपटे फ्रेम वाले चश्मे के पीछे उनकी आंखें हर मरीज़ को पूरे ध्यान से देखती हैं। जैसा कि एक डॉक्टर ने मुझे बताया, “जाना सर मरीज़ों के चेहरों को बहुत ध्यान से देखने (clinical observation) पर ज़ोर देते हैं। उनके अनुसार, कई मामलों में, सिर्फ चेहरा देखकर ही बीमारी का एक मोटा-मोटा अंदाज़ा लगाया जा सकता है।”

लगातार खुद सीखते रहने की बदौलत वे एक ऐसे डॉक्टर बन गए जो इस क्षेत्र के लोगों की सभी चिकित्सकीय और सर्जिकल ज़रूरतों का इलाज करने में सक्षम हैं। शहीद अस्पताल के नेता के तौर पर, उन्होंने ‘जन स्वास्थ्य आंदोलन’ (public health movement) की अगुवाई की, जिसने इस क्षेत्र के मज़दूरों को प्रभावित करने वाले स्वास्थ्य से जुड़े विभिन्न मुद्दों के संदर्भ में अभियान चलाया।

इमारत के निर्माण से लेकर स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण तक, अस्पताल के विकास के हर चरण में उनकी सक्रिय भागीदारी रही। हर्निया का ऑपरेशन करते समय ऑपरेशन टेबल पर अरबपतियों के बारे में बात करने से लेकर, नियमित राउंड के दौरान स्वास्थ्य और इलाज जैसे विषयों पर बड़ी दवा कंपनियों (pharma industry critique) के नैरेटिव को सक्रिय रूप से चुनौती देने तक, डॉ. जाना शहीद अस्पताल के लिए एक नैतिक मार्गदर्शक की तरह हैं।

क्लीनिकल राउंड लेते समय, एक बार उन्होंने ट्रेड यूनियन नेता शंकर गुहा नियोगी की ‘अर्ध-मशीनीकरण’ (semi mechanization concept) की अवधारणा को दोहराते हुए कहा था, “अगर मशीनें गलती करें, तो शायद हमें कभी पता ही न चले। लेकिन अगर इंसान गलती करते हैं, तो उसे सुधारने की गुंजाइश हमेशा रहती है।” ‘अर्ध-मशीनीकरण’ आज के आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI debate) और तकनीकी क्रांतियों के दौर के लिए एक महत्वपूर्ण विचार है, जिसे फिर से सामने लाने की ज़रूरत है। यह CMSS के उस अभियान से विकसित हुआ था जो पूर्ण-मशीनीकरण के खिलाफ था, क्योंकि पूर्ण-मशीनीकरण से खदानों में कई नौकरियां खत्म हो जातीं।

उस समय, नियोगी ने तर्क दिया था कि भारत जैसे श्रम-अधिशेष (जहां श्रमिकों की बहुतायत हो – labor surplus economy) वाले देश के लिए पूर्ण-मशीनीकरण वांछनीय तकनीकी विकल्प नहीं है, और भविष्य में दल्ली राजहरा खदानों के लिए एक बेहतर रणनीति अर्ध-मशीनीकरण ही होगी।’ CMSS ने खनन में अर्ध-मशीनीकरण पर एक अध्ययन भी करवाया था, जिसमें दिल्ली के अर्थशास्त्रियों की एक शोध टीम शामिल थी। इलीना सेन अपने संस्मरणों में उनकी रिपोर्ट के बारे में लिखती हैं, “उनकी रिपोर्ट ने इस विकल्प की सराहना की और दिखाया कि लागत के लिहाज़ से अर्ध-मशीनीकरण सस्ता था, और साथ ही यह श्रमिकों के लिए भी अनुकूल था।”

इसी भावना के साथ, डॉ. जाना मशीनों से हासिल निष्कर्षों (human vs machine) के मुकाबले मानवीय अवलोकन को ज़्यादा महत्व देते हैं। अत्यधिक टेस्ट करवाने की बजाय बारीकी से शारीरिक जांच अपनाने से मरीज़ों को अनावश्यक स्वास्थ्य खर्चों से बचने में मदद मिल सकती है। एक अन्य अवसर पर, डॉ. जाना ने कहा था, ‘हमें उत्पादन की प्रक्रिया में अपनी चेतना (human intelligence) का उपयोग करने की ज़रूरत है। जो लोग मशीनों को बढ़ावा देना चाहते हैं, वे ही मानवीय मूल्यों के ऊपर मुनाफे को प्राथमिकता देते हैं। मशीन के पुर्ज़ों को समय-समय पर बदलना पड़ता है, और यह अपने आप में खर्चीली प्रक्रिया है।’

उन्होंने कहा था, “अंततः, निष्कर्षों तक पहुंचने के लिए मानवीय चेतना ही सबसे महत्वपूर्ण है।” यह पूंजी-प्रधान तकनीक (capital intensive technology) की बजाय लोगों के विज्ञान को सशक्त बनाने (people’s science centric approach) की दिशा में एक कदम है। कई मायनों में, डॉ. जाना के शब्द शहीद अस्पताल के मूल मूल्यों को पूरी तरह से समेटे हुए हैं।

शहीद अस्पताल में फुसफुहाटें (collective voice)  बयार बन जाती हैं। एक डाल से दूसरी डाल तक और एक पहाड़ से दूसरे पहाड़ तक, मशीनी खदानों की भूलभुलैया जैसी गुफाओं से एक गूंज उठती है और पहुंच जाती है अस्पताल के उस प्रांगण तक जहां शिशु जन्म लेते हैं। यह गूंज वास्तव में लामबंद होने, व्यवस्था को बदलने, उठ खड़े होने, विद्रोह करने और स्वयं को मुक्त कराने (people’s movement) की एक ज़ोरदार हुंकार है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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पारंपरिक दवाओं की प्रभाविता पर जांच

SHANGHAI, CHINA – DECEMBER 12: Employees work on the production line of traditional Chinese medicine ‘Tanreqing Zhusheye’ (sputum-heat clearing injection), which was listed on China’s diagnosis and treatment protocol for COVID-19 patients (Trial Version 9), at a workshop of Shanghai Kaibao Pharmaceutical Co., Ltd on December 12, 2022 in Shanghai, China. (Photo by VCG/VCG via Getty Images)

हालिया दिनों में चीन (China healthcare reforms) ने अपनी पारंपरिक चिकित्सा प्रणाली को वैज्ञानिक तरीके से परखने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। नए नियमों के तहत पारंपरिक चीनी चिकित्सा (TCM – Traditional Chinese Medicine) के इंजेक्शन बनाने वाली कंपनियों को यह साबित करना होगा कि उनके उत्पाद सुरक्षित हैं, असरदार हैं और उनका वैज्ञानिक आधार (scientific validation) है। अगर ऐसा नहीं हो पाता, तो उनके उत्पाद बाज़ार से हटाए जा सकते हैं।

गौरतलब है कि इंजेक्शन (medical injections) सामान्य दवाओं की तरह मुंह से नहीं लिए जाते, बल्कि सीधे मासंपेशियों या शिराओं में लगाए जाते हैं। नए नियम सिर्फ इंजेक्शनों पर लागू होंगे। इन्हें कई वर्षों से दिल और फेफड़ों की बीमारियों के इलाज या कैंसर के उपचार के साइड इफेक्ट (cancer treatment side effects) कम करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। अधिकांशत: ये मुंह से ली जाने वाली दवाइयों के ही सांद्रित रूप हैं। लेकिन समय के साथ इनकी प्रभाविता और सुरक्षा को लेकर सवाल उठे हैं, और कुछ मामलों में गंभीर दुष्प्रभाव भी सामने आए हैं।

इस कदम से यह लगता है कि चीन अब पारंपरिक चिकित्सा को परखने का तरीका (evidence based medicine) बदल रहा है। पहले TCM मुख्य रूप से लंबे अनुभव और परंपरागत ज्ञान पर आधारित थी, लेकिन अब इसे आधुनिक वैज्ञानिक मानकों (clinical standards) के अनुसार जांचा जा रहा है। यानी अब आधुनिक दवाओं की तरह ही इनके असर और उपयोगिता को प्रमाणों के आधार पर परखा जाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे यह साफ हो सकेगा कि कौन-से उपचार सच में काम करते हैं और कौन-से नहीं।

यह सख्ती 2019 में दवा कानूनों (drug regulation laws) में हुए बदलावों का हिस्सा है। इन बदलावों के तहत अब सभी नई दवाओं, चाहे वे पारंपरिक ही क्यों न हों, को सुरक्षा और प्रभावशीलता के आधुनिक मानकों पर खरा उतरना होगा। नए नियम अब उन पुराने TCM इंजेक्शनों (approved drugs review) पर भी लागू किए जा रहे हैं, जिन्हें पहले इन सख्त मानकों के बिना ही मंजूरी मिल गई थी।

हालांकि, कंपनियों को यह तय करने की छूट दी गई है कि वे अपने उत्पादों के लिए सबूत कैसे देंगे। कुछ निर्माता पहले से मौजूद क्लीनिकल डैटा (clinical data) या वास्तविक उपयोग के रिकॉर्ड का उपयोग कर सकते हैं जबकि कुछ को नए शोध – जैसे अन्य दवाओं से गहन तुलनात्मक परीक्षण (comparative trials) – का सहारा लेना पड़ेगा। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि अभी मौजूद TCM इंजेक्शनों में से लगभग एक-तिहाई तो बिना अतिरिक्त शोध के नए मानकों पर खरे उतरेंगे। कई सारे उत्पादों के पास पर्याप्त सबूत (insufficient evidence) नहीं हैं, इसलिए उनके बाज़ार से हटने की संभावना है।

सिर्फ सुरक्षा और असर साबित करना ही काफी नहीं होगा, कंपनियों को यह भी बताना होगा कि उनकी दवा शरीर में कैसे काम करती है। यह आसान नहीं है, क्योंकि इन दवाओं में अक्सर कई सक्रिय तत्व (active compounds) होते हैं। कई बार अलग-अलग तत्व मिलकर असर दिखाते हैं, इसलिए यह समझना मुश्किल होता है कि असली प्रभाव किस वजह से हो रहा है।

इन चुनौतियों के बावजूद कुछ वैज्ञानिक इसे एक अवसर के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि पारंपरिक दवाओं का गहराई से अध्ययन (pharmacological research) करने से नई औषधियों की खोज हो सकती है। इसका एक प्रसिद्ध उदाहरण आर्टेमिसिनिन (artemisinin malaria drug) है, जो मलेरिया की दवा है और एक ऐसे पौधे से निकली है जिसका इस्तेमाल लंबे समय से चीनी पारंपरिक चिकित्सा में होता रहा है।

वैसे, जल्द ही लागू होने वाले ये नए नियम समस्त दवाइयों पर लागू रहेंगे, सिर्फ पारंपरिक चिकित्सा पर नहीं। इसके पीछे उद्देश्य है कि दवाओं के मज़बूत वैज्ञानिक प्रमाण हों, ताकि लोगों का भरोसा बढ़े और पारंपरिक चिकित्सा का महत्व भी बना रहे। इससे मरीज़ों को ज़्यादा सुरक्षित इलाज और यह स्पष्ट जानकारी मिल सकेगी कि कौन-सी दवाएं वास्तव में असरदार हैं।

आज कई देश प्रमाण-आधारित चिकित्सा की ओर बढ़ रहे हैं; ऐसे में चीन का यह तरीका दुनिया भर में पारंपरिक उपचारों (global health policy) को परखने के लिए एक उदाहरण बन सकता है। भारत जैसे देश के लिए भी इस तरीके को अपनाना आवश्यक है जो पारंपरिक दवाओं का एक बड़ा बाज़ार है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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शराब कम करने में मददगार हार्मोन

यूं तो किसी भी जश्न (celebration culture) की जान होते हैं उससे जुड़े व्यंजन। लेकिन जश्न मनाने का एक चलन ‘पार्टी’ करने का भी है, जिसमें लोग शौकिया शराब पीते हैं। हज़ारों सालों से मद्यपान (drinking habit) की प्रवृत्ति मनुष्य ने दिखाई है और यदा-कदा त्यौहारों या जश्न में शराब पी जाती है। जैसे होली, शिवरात्रि में भांग तो घोटी जाती है लेकिन आजकल शराब की ओर भी काफी रुझान (alcohol trend) है। ऐसा ही एक सामूहिक जश्न अक्टूबरफेस्ट जर्मनी (Oktoberfest Germany) में मनाया जाता है, जिसमें लोग कई दिनों तक छककर शराब पीते हैं। लेकिन पीने की भी एक हद होती है, जिसके बाद पीने वाला कहता है अब बस। लेकिन ऐसा किसी को पता कब और कैसे चलता है कि बस अब बहुत पी ली है, अब और नहीं?

यही सवाल डेनमार्क (Denmark research)  के वैज्ञानिकों का शोध विषय बना। उनके शोध नतीजे बताते हैं कि जो हार्मोन गर्भावस्था के दौरान मॉर्निंग सिकनेस (सुबह—सुबह मितली) जैसा एहसास कराता है वही हार्मोन ‘बहुत हो गया’ का संकेत भी देता है।

दरअसल, गर्भावस्था के शुरुआती दौर में मॉर्निंग सिकनेस (morning sickness) का अनुभव होता है; ऐसा देखा गया है कि यह गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में ग्रोथ डिफरेंशिएशन फैक्टर-15 (GDF15) नामक हार्मोन के तेज़ी से बढ़ने के कारण होता है। वैसे तो यह हार्मोन शरीर के सारे ऊतक लगातार थोड़ी मात्रा में बनाते हैं लेकिन गर्भावस्था में अपरा यानी गर्भनाल इसका निर्माण काफी मात्रा में करने लगती है।

एक मत है कि मॉर्निंग सिकनेस सुरक्षा की दृष्टि से होती है: यह इशारा होता है कि गर्भवती मां खराब भोजन न खाए वरना भ्रूण को नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन GDF15 उन लोगों में भी मौजूद होता है जो गर्भवती नहीं हैं; लिहाज़ा, इसे भूख दबाने से भी जोड़ा गया है। दवा उद्योग इसे संभावित मोटापे-रोधी दवा के रूप में देख रहा है।

दरअसल युनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन (University of Copenhagen) के हार्मोन रोग विशेषज्ञ मैथ्यू गिलम पूर्व में एक अध्ययन में शामिल थे। उस अध्ययन में रॉकस्लाइड संगीत समारोह (music festival study) में जश्न मनाने वालों युवकों में विभिन्न हार्मोन्स के स्तरों की जांच की गई थी। जश्न में शामिल युवकों ने लगातार एक हफ्ते तक खूब ‘खाया-पीया’ था। अध्ययन में उनमें कई बदलाव दिखे थे; जिनमें से एक था GDF15 के स्तर में वृद्धि। इस अध्ययन ने गिलम को शराब के सेवन (alcohol effects) पर इस हार्मोन के प्रभाव के बारे में सोचने पर प्रेरित किया।

इस बारे में समझने के लिए गिलम और उनके साथियों (scientific study) ने कई अध्ययन किए। इस शृंखला में सबसे पहले उन्होंने एक बहुत छोटा अध्ययन किया। इसमें उन्होंने अक्टूबरफेस्ट में शामिल तीन लोगों के पार्टी से पहले और बाद के नमूने लिए। तीनों ने 3 दिन तक हर दिन लगभग 1 लीटर बीयर पी थी। विश्लेषण में इन लोगों में GDF15 का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया। हालांकि, अध्ययन बहुत छोटा था और यह भी स्पष्ट नहीं था कि यह बदलाव शराब पीने की वजह से ही हुआ है या अन्य अस्त-व्यस्त दिनचर्या की वजह से।

इसके बाद उन्होंने 12 मेडिकल विद्यार्थियों पर परीक्षण (clinical trial) किया, जिन्होंने पांच मानक पेग (60X5 मि.ली.) पिए थे। इन लोगों में GDF15 का स्तर बिल्कुल नहीं बढ़ा था। इससे ऐसा लगता है कि शराब के प्रति इस हार्मोन की प्रतिक्रिया शायद लगातार लंबे समय तक शराब पीने (chronic alcohol use) के बाद होती है, न कि थोड़े समय के लिए ज़्यादा शराब पीने से।

इस विचार को जांचने के लिए शोधकर्ताओं (alcohol addiction study) ने उन लोगों में GDF15 के स्तर को मापा जिन्हें शराब की लत थी। जिन वयस्कों को यह लत नहीं थी, उनकी तुलना में ज़्यादा शराब पीने वाले लोगों में GDF15 का स्तर औसतन लगभग पांच गुना ज़्यादा दिखा।

फिर उन्होंने लोगों के जेनेटिक और जीवनशैली से जुड़े डैटा का विश्लेषण किया। यूके बायोबैंक (UK Biobank data) से लिए गए इस डैटा का विश्लेषण करने पर उन्हें एक और दिलचस्प सम्बंध दिखा: जिन लोगों में एक ऐसा जेनेटिक उत्परिवर्तन होता है जो GFRAL (एक प्रोटीन रिसेप्टर जो GDF15 से जुड़ता है) को निष्क्रिय कर देता है, उन्होंने उत्परिवर्तन-रहित लोगों की तुलना में हर हफ्ते 26 मिलीलीटर ज़्यादा नीट शराब पी (250 मिलीलीटर वाइन या 500 मिलीलीटर बीअर के तुल्य)।

गिलम कहते हैं कि कुल मिलाकर ये नतीजे इस विचार (biological mechanism) की पुष्टि करते हैं कि लंबे समय तक शराब पीने की प्रतिक्रिया के रूप में GDF15 का स्तर बढ़ता है, और स्वस्थ लोगों में यह शराब पीने की मात्रा को नियंत्रित करता है। उनका अनुमान है कि जिन लोगों में जेनेटिक उत्परिवर्तन के कारण यह तंत्र काम नहीं करता या जिनमें शराब की लत के कारण GDF15 असंवेदी हो गया है, उनमें यह ‘फीडबैक लूप’ (feedback loop mechanism) काम नहीं करता, जिसकी वजह से शायद वे ज़्यादा शराब पीते हैं।

इसके बाद टीम ने चूहों (mouse experiment) पर भी परीक्षण किया। देखा कि क्या GDF15 शराब पीने की मात्रा कम कर सकता है, या यह सिर्फ भूख शांत करने में भूमिका निभाता है। उन्होंने चूहों को GDF15 का इंजेक्शन लगाया और मापा कि वे सादा पानी ज़्यादा पीते हैं या इथेनॉल (शराब) (ethanol alcohol) मिला हुआ। जैसी कि उम्मीद थी GDF15 ने चूहों की भूख तो कम की ही, साथ ही उनकी शराब पीने की मात्रा में भी कमी (reduced alcohol consumption) आई। यह कमी खाने में आई कमी से कहीं ज़्यादा थी। अन्य शोधकर्ताओं कहना है कि यह प्रयोग शराब पीने में GDF15 की भूमिका जानने की दिशा में एक अच्छा कदम है। लेकिन यह पुख्ता करने के लिए कि यह हार्मोन विशेष तौर पर शराब के प्रति कितना प्रभावी है, अलग-अलग तरह के खाद्य पदार्थों पर परीक्षण करने की ज़रूरत है।

एक संभावना यह भी है कि लगातार कई दिनों तक शराब पीने (liver damage risk) से लीवर को होने वाले नुकसान की वजह से GDF15 बन सकता है, लेकिन दूसरे अंग भी यह हार्मोन बना सकते हैं। इंसान हज़ारों सालों से शराब पीते आ रहे हैं, इसलिए यह मुमकिन है कि किसी चीज़ भी चीज़ की अति रोकने के लिए शरीर में कुछ तरीके (body regulation system) विकसित हुए हों।

शोधकर्ताओं को लगता है कि bioRxiv प्रीप्रिंट (bioRxiv research paper) में प्रकाशित इन नतीजों की मदद से शराब की लत का इलाज में करने में मदद मिल सकती है। लेकिन अभी वे गर्भवती महिलाओं में GDF15 का स्तर, जेनेटिक परिवर्तन और खान-पान में बदलाव (शराब सहित) (diet and alcohol behavior) का अध्ययन करने की योजना बना रहे हैं, ताकि यह देखा जा सके कि GDF15 क्रियामार्ग और शराब से तुष्टि के बीच कोई कार्य-कारण सम्बंध है या नहीं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या ‘विज्ञान-समर्थित’ सप्लीमेंट्स सच में भरोसेमंद हैं?

दियों से अश्वगंधा (Withania somnifera) की जड़ आयुर्वेद में तंदुरुस्ती और मनदुरुस्ती के लिए इस्तेमाल होती रही है। आज यह एक लोकप्रिय वेलनेस ट्रेंड (wellness trend) बन चुकी है। सोशल मीडिया और विज्ञापनों में इसे तनाव कम करने, नींद सुधारने, ऊर्जा बढ़ाने और दिमाग तेज़ करने जैसे कई फायदों से जोड़ा जा रहा है, जिससे इसकी लोकप्रियता काफी बढ़ गई है। लेकिन वैज्ञानिक रूप से इसके फायदे और असर भली-भांति साबित (scientific evidence) नहीं हुए हैं।

हाल के कई क्लीनिकल परीक्षणों (clinical trials) की समीक्षा से यह संकेत मिलता है कि अश्वगंधा तनाव, चिंता और अवसाद (stress anxiety depression) कम करने में मदद करता है। लेकिन इन अध्ययनों की अपनी सीमाएं हैं: वे छोटे स्तर पर किए गए हैं और उनके तरीके अलग-अलग हैं; इसलिए पक्के निष्कर्ष निकालना मुश्किल है। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे पूरी तरह प्रमाणित इलाज नहीं, बल्कि एक संभावित सहायक सप्लीमेंट (dietary supplement) मानते हैं, जिस पर अभी और अधिक शोध की ज़रूरत है।

अश्वगंधा की बढ़ती लोकप्रियता के चलते नियामक संस्थाओं (regulatory authorities) के बीच बहस भी पैदा हो गई है। फ्रांस और डेनमार्क जैसे देशों ने खासकर गर्भवती महिलाओं, बच्चों और कुछ बीमारियों से ग्रस्त लोगों के लिए इसकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। डेनमार्क ने तो 2023 में अश्वगंधा युक्त उत्पादों पर प्रतिबंध भी लगा दिया था। वहीं भारत का आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) इसे सामान्य रूप से सुरक्षित मानता है, लेकिन यह भी कहता है कि कुछ लोगों में इसके साइड इफेक्ट हो सकते हैं।

गौरतलब है कि अश्वगंधा एक बड़े और तेज़ी से बढ़ते सप्लीमेंट बाज़ार (supplement market) का हिस्सा है। आजकल कोलाजेन, मशरूम एक्सट्रैक्ट, प्रोबायोटिक्स, मैग्नीशियम और ओमेगा-3 जैसे सप्लीमेंट भी काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। अमेरिका और युरोप में बड़ी संख्या में लोग नियमित रूप से इनका सेवन करते हैं, और आने वाले समय में यह बाज़ार बहुत तेज़ी से बढ़ने वाला है। इनकी लोकप्रियता का बड़ा कारण यह दावा है कि ये विज्ञान-समर्थित हैं, यानी इनके फायदे वैज्ञानिक शोध (evidence based claims) से साबित हुए हैं।

हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि कई सप्लीमेंट्स के पीछे का विज्ञान उतना साफ और स्पष्ट नहीं होता, जितना विज्ञापनों (marketing claims) में दिखाया जाता है। शुरुआत में सप्लीमेंट्स का इस्तेमाल विटामिन की कमी को पूरा करने के लिए होता था, जैसे रिकेट्स के लिए विटामिन डी का। लेकिन समय के साथ बाज़ार ऐसे उत्पादों की ओर बढ़ गया जो सामान्य सेहत सुधारने (general wellness) के लिए होते हैं, न कि किसी खास बीमारी के इलाज के लिए। दिक्कत यह है कि इनके ‘ऊर्जा बढ़ाने’ या ‘इम्युनिटी मज़बूत करने’ (immunity booster) जैसे दावों को सही तरह से मापना मुश्किल है।

नियम-कानून इस मामले को और जटिल बना देते हैं। कई देशों में सप्लीमेंट्स को दवाओं (food vs medicine regulation) की बजाय खाद्य पदार्थ माना जाता है, जहां उनकी सुरक्षा को प्रमाणित करना तो ज़रूरी होता है, लेकिन असर को साबित करना ज़रूरी नहीं होता। अमेरिका में स्थिति यह है कि यदि कंपनियां किसी बीमारी के इलाज का दावा न करें, तो अनुमति लिए बिना उसे लेकर सामान्य स्वास्थ्य से जुड़े दावे कर सकती हैं। इससे ये उत्पाद जल्दी बाज़ार में आ जाते हैं और निगरानी भी सीमित हो सकती है। वहीं युरोप में कंपनियों को ऐसे दावों के लिए ज़्यादा मज़बूत वैज्ञानिक प्रमाण (scientific proof) देने पड़ते हैं, लेकिन वहां भी कई बार अधूरी जानकारी के आधार पर ही निर्णय लिए जाते हैं।

एक और बड़ी समस्या यह है कि सप्लीमेंट्स एक जैसे नहीं होते। उनकी मात्रा, बनाने का तरीका और पौधे के किस हिस्से का उपयोग किया गया है (dosage variation), ये सब अलग-अलग हो सकते हैं। इसके चलते अलग-अलग अध्ययनों की आपस में तुलना करना मुश्किल हो जाता है (research variability)। उदाहरण के लिए, अश्वगंधा से जुड़ी कुछ सुरक्षा चिंताएं उन शोधों पर आधारित थीं, जिनमें बहुत अधिक मात्रा या पूरे पौधे का इस्तेमाल किया गया था, जो सामान्य उपयोग से अलग हो सकता है।

ऐसे सबूतों को समझना वैज्ञानिकों के लिए भी आसान नहीं होता। कई बार एक ही विषय पर अलग-अलग अध्ययन अलग नतीजे देते हैं, क्योंकि उनकी गुणवत्ता, सैंपल और तरीके अलग होते हैं। ऐसे में नियम बनाने वाली संस्थाओं को तय करना पड़ता है कि किस अध्ययन पर ज़्यादा भरोसा किया जाए। विशेषज्ञों के अनुसार, ये फैसले पूरी तरह अंतिम सच तय करने के बारे में नहीं होते, बल्कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर सबसे सही लगने वाले निष्कर्ष (data interpretation)  तक पहुंचने की कोशिश होते हैं।

बहरहाल, विज्ञान-समर्थित सप्लीमेंट्स (science backed supplements) की बढ़ती लोकप्रियता से यह स्पष्ट होता है कि लोग अब अपनी सेहत पर खुद नियंत्रण रखना (self-care trend) चाहते हैं। लेकिन यह भी सामने आता है कि वैज्ञानिक शोध और विज्ञापनों के दावों में फर्क है। कुछ सप्लीमेंट्स सच में फायदेमंद हो सकते हैं, लेकिन कई के लिए सबूत अभी सीमित या पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। इसलिए किसी नुस्खे के विज्ञान-समर्थित होने के दावे का मतलब यह नहीं है कि वह हमेशा असरदार ही होगा। (स्रोत फीचर्स)

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तेहरान में ‘ब्लैक रेन’ से बढ़ा स्वास्थ्य संकट

हाल ही में ईरान की राजधानी तेहरान में मिसाइल हमलों (missile attacks) के बाद घना धुआं और काली बारिश (ब्लैक रेन-black rain) देखी गई है। इन हमलों में तेल भंडार और रिफाइनरियों को नुकसान पहुंचा, जिससे भारी प्रदूषण फैल गया। इसके चलते वर्षा पर्यावरण और मनुष्यों दोनों के लिए नुकसानदेह बारिश में बदल गई।

ब्लैक रेन का मतलब ऐसी बारिश से है जिसमें वायुमंडल में मौजूद प्रदूषक घुल जाते हैं। तेहरान में यह प्रदूषण जलते हुए तेल और ईंधन से पैदा हुआ है। जब ये पदार्थ जलते हैं, तो वायुमंडल में हाइड्रोकार्बन, सल्फर ऑक्साइड्स, नाइट्रोजन यौगिक और बेंज़ीन जैसे कई खतरनाक रसायन (toxic chemicals) फैल जाते हैं। जब बारिश इस प्रदूषित वायु से होकर गुज़रती है, तो ये कण उसमें घुल जाते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बारिश का पानी काला और हानिकारक बन जाता है।

बारिश का काला रंग मुख्य रूप से कालिख (soot) की वजह से होता है, जो अधूरी तरह से जलने पर बनने वाले बहुत छोटे कार्बन कण होते हैं। इसके अलावा, हमलों में टूटे-फूटे भवनों से निकली धूल और औद्योगिक कचरा भी इसमें मिल सकता है, जिससे यह और ज़्यादा हानिकारक बन जाता है। यानी ब्लैक रेन इस बात का संकेत है कि हवा अत्यधिक प्रदूषित (air pollution indicator) है।

तेहरान की भौगोलिक स्थिति ने इस समस्या को और भी गंभीर बना दिया है। यह शहर अल्बोर्ज़ पहाड़ों (Alborz mountains) के पास स्थित है, जहां तापमान व्युत्क्रमण (temperature inversion) की स्थिति बन जाती है। यानी गर्म हवा ऊपर और ठंडी हवा नीचे फंस जाती है, जिससे प्रदूषित हवा ऊपर नहीं उठ पाती और फैल नहीं पाती। नतीजतन, ज़हरीले कण भूमि के पास ही बने रहते हैं, जिससे खतरा और बढ़ जाता है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों (health experts) की चिंता यह है कि लोग प्रदूषित हवा में सांस ले रहे हैं और दूषित बारिश के संपर्क में आ रहे हैं। धुआं और बहुत बारीक कण सांस लेने में दिक्कत पैदा कर सकते हैं, खासकर उन लोगों के लिए जिन्हें पहले से दिल या फेफड़ों की बीमारी (heart and lung disease) है। गंभीर मामलों में यह हार्ट अटैक या स्ट्रोक का कारण भी बन सकता है। शिशु और बच्चे सबसे अधिक जोखिम में हैं, क्योंकि उनका शरीर अभी विकसित हो ही रहा है।

एक बड़ी चिंता अतिसूक्ष्म (PM2.5) कणों की है। ये सूक्ष्म कण फेफड़ों के अंदर गहराई तक पहुंच जाते हैं और खून में भी मिल सकते हैं। इससे हृदयरोग, उच्च रक्तचाप (high blood pressure) के अलावा मस्तिष्क (brain health risk) पर भी असर पड़ सकता है। इसके अलावा, बारिश में मौजूद रसायन त्वचा और आंखों में जलन (skin and eye irritation) पैदा कर सकते हैं और अधिक मात्रा में होने पर गंभीर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं।

बहरहाल, प्रशासन ने लोगों को सलाह दी है कि वे जितना हो सके घर के अंदर रहें और मौसम बदलने का इन्तज़ार करें।

तेहरान की यह स्थिति दिखाती है कि युद्ध (war environmental impact) के दौरान पर्यावरण को हुआ नुकसान बहुत जल्दी एक बड़े स्वास्थ्य संकट (public health crisis) में बदल सकता है, जिसके असर लंबे समय तक बने रह सकते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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एक गिलास दूध और एक छोटा-सा एंज़ाइम

ऋषि राज राय

ल्पना कीजिए, रात का खाना खत्म हुआ और सामने एक गिलास दूध हाज़िर हो गया। कुछ लोगों के लिए यह एक सुखद आदत है। लेकिन कुछ लोगों के पेट में दूध पहुंचते ही एक अजीब हलचल शुरू हो जाती है – गैस बनना, मरोड़ उठना, पेट फूलना और कभी-कभी दस्त भी लग जाते हैं। क्या इसके पीछे दूध दोषी है? या हमारे भीतर कुछ ऐसा है जो बदल चुका है, चुपके से, बिना बताए!

यह कहानी है लैक्टोज़ असहिष्णुता (lactose intolerance) की| एक ऐसी अवस्था जिसे अक्सर ‘दूध से एलर्जी’ (milk allergy) समझ लिया जाता है। लेकिन यह वास्तव में पाचन के जैव रसायन की एक बेहद रोचक और जैव विकास सम्बंधी गाथा है।

लैक्टोज़ क्या है?

Text Box: लैक्टेज़ कमी के लक्षण — दूध लेने के 30 मिनट से 2 घंटे के भीतर
- पेट फूलना और भारीपन
- गैस
- पेट में मरोड़ या ऐंठन
- दस्त (कभी-कभी तीव्र)
- मितली और बेचैनी
नोट: लक्षणों की तीव्रता व्यक्ति-व्यक्ति में अलग-अलग होती है और दूध की मात्रा पर निर्भर करती है।
दूध को संपूर्ण आहार (complete nutrition food) कहा जाता है, और इसका एक बड़ा कारण है उसमें मौजूद शर्करा, जिसे हम लैक्टोज़ कहते हैं। रासायनिक दृष्टि से यह एक डाईसेकराइड (disaccharide molecule) है, यानी दो सरल शर्करा अणुओं से मिलकर बना अणु। देखा जाए तो, साधारण शकर (सुक्रोज़) भी एक डाईसेकराइड होती है और ग्लूकोज़ तथा फ्रक्टोज़ के अणुओं के जुड़ने से बनती है:

शकर = ग्लूकोज़ + फ्रक्टोज़

इसी प्रकार से दूध में उपस्थित शर्करा (लैक्टोज़) भी दो शर्करा अणुओं से जुड़कर बनी होती है:

लैक्टोज़ = ग्लूकोज़ + गैलेक्टोज़

जब हम दूध पीते हैं तो आंतों (human digestive system) में लैक्टोज़ टूटकर ग्लूकोज़ और गैलेक्टोज़ बन जाते हैं। असहिष्णुता की कहानी यहीं से शुरू होती है।

लैक्टोज़ पाचन की दिक्कत

Text Box: तालिका 1 : लोग अक्सर लैक्टोज़ असहिष्णुता और दूध से एलर्जी, दोनों को एक मान लेते हैं, लेकिन ये बिल्कुल अलग-अलग हैं।
पहलू	लैक्टोज़ असहिष्णुता	दूध एलर्जी
कारण	लैक्टेज़ एंज़ाइम की कमी	प्रतिरक्षा तंत्र की प्रतिक्रिया
प्रभावित तंत्र	पाचन तंत्र	प्रतिरक्षा तंत्र
लक्षण	गैस, मरोड़, दस्त	पित्ती, सूजन, सांस में दिक्कत
खतरा	असहज, पर जानलेवा नहीं	गंभीर हो सकती है
उपचार	आहार परिवर्तन, एंज़ाइम सप्लीमेंट	सख्त परहेज़, एपिनेफ्रीन


हमारी छोटी आंत (small intestine) की भीतरी सतह पर असंख्य सूक्ष्म ऊंगली-नुमा संरचनाएं होती हैं जिन्हें विलाई कहते हैं। इन्हीं विलाई पर एक विशेष एंज़ाइम काम करता है लैक्टेज़ (lactase enzyme)। लैक्टेज़ ही वह सूक्ष्म रसायन है जिस पर दूध, खासकर लैक्टोज़, पचाने की पूरी ज़िम्मेदारी टिकी है।

लैक्टेज़ दरअसल लैक्टोज़ के दोनों अणुओं के बीच की रासायनिक कड़ी को तोड़ता है, जिससे ग्लूकोज़ और गैलेक्टोज़ अलग-अलग हो जाते हैं। ये दोनों सरल शर्कराएं आसानी से रक्तप्रवाह में अवशोषित होकर शरीर को ऊर्जा देती हैं।

यदि लैक्टेज़ पर्याप्त मात्रा में है तो लेक्टोज़ टूटता है, दूध पचता है, ऊर्जा मिलती है, सब सुचारू चलता है। यदि लैक्टेज़ पर्याप्त मात्रा में नहीं है तो कहानी बदल जाती है।

अपचित लैक्टोज़ जब छोटी आंत से आगे बड़ी आंत (large intestine) में पहुंचता है, तो वहां रहने वाले अरबों जीवाणु, जिन्हें सामूहिक रूप से आंतों का माइक्रोबायोटा (gut microbiota)  कहते हैं, इसे अपने भोजन के रूप में ‘किण्वित’ (bacterial fermentation) करने लगते हैं।

यह किण्वन क्रिया कई उत्पाद बनाती है – हाइड्रोजन गैस, कार्बन डाईऑक्साइड, और कभी-कभी मीथेन भी। साथ ही, लैक्टोज़ आंत में पानी को अपनी ओर खींचता है, जिससे दस्त की स्थिति diarrhea symptoms) बन सकती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि समस्या दूध में नहीं, बल्कि उसे पचाने की हमारी घटी हुई क्षमता में है।

ऐसा क्यों होता है?

मनुष्य, गाय, बकरी, हाथी वगैरह सभी स्तनधारी जीव (mammals) जन्म के बाद मां के दूध पर निर्भर रहते हैं। इसलिए प्रकृति ने शिशु को लैक्टेज़ का भरपूर उत्पादन करने की क्षमता दी है।

लेकिन जैसे-जैसे बच्चा ठोस आहार ग्रहण करने लगता है और दूध (animal milk nutrition) उसके जीवन का एकमात्र ऊर्जा-स्रोत नहीं रहता, शरीर लैक्टेज़ बनाने के लिए ज़िम्मेदार जीन (LCT) की सक्रियता को धीरे-धीरे कम करने लगता है। यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि एक स्वाभाविक, सुनियोजित जैविक प्रक्रिया है।

एक अनोखा मोड़

लगभग दस हज़ार वर्ष पहले, जब युरोप, अरब और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में पशुपालन और डेयरी संस्कृति का उदय हुआ, तो एक जेनेटिक उत्परिवर्तन हुआ जिसने प्रकृति की ‘लॉटरी’ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

जिन व्यक्तियों में यह उत्परिवर्तन था, उनके शरीर में वयस्क होने पर भी लैक्टेज़ बनता रहा। वे बड़े होने पर दूध पीते रह सकते थे और उन्हें पशुओं के दूध से अतिरिक्त कैलोरी, प्रोटीन और कैल्शियम मिलता था। यह अकाल और कठिन परिस्थितियों में उनके जीवित रहने में सहायक था। इस अतिरिक्त पोषण स्रोत ने इन व्यक्तियों को अधिक संतानें पैदा करने की संभावना दी, और यह जीन पीढ़ी-दर-पीढ़ी फैलता गया। इस परिघटना को लैक्टेज़ पर्सिस्टेंस (lactase persistence) या लैक्टोज़ सहिष्णुता कहते हैं।

लैक्टोज़ असहिष्णुता के प्रकार

प्राथमिक लैक्टोज़ असहिष्णुता (primary lactose intolerance): सबसे सामान्य प्रकार। उम्र के साथ LCT जीन की सक्रियता स्वाभाविक रूप से घटती है। यह जेनेटिक रूप से निर्धारित होती है और स्थायी होती है।

द्वितीयक लैक्टोज़ असहिष्णुता (secondary lactose intolerance): किसी संक्रमण, सीलिएक रोग, क्रोह्न रोग, या आंत की सूजन के कारण लैक्टेज़ उत्पादन अस्थायी रूप से कम हो जाता है। मूल रोग के उपचार के बाद यह प्राय: ठीक हो सकता है।

जन्मजात लैक्टोज़ असहिष्णुता (congenital lactose intolerance): यह अत्यंत दुर्लभ है। शिशु जन्म से ही लैक्टेज़ एंज़ाइम नहीं बना पाता। मां का दूध भी पच नहीं पाता, इसलिए इसमें तत्काल चिकित्सकीय हस्तक्षेप (medical treatment) आवश्यक होता है।

लैक्टोज़ असहिष्णुता का अर्थ जीवनभर दूध का पूर्ण परित्याग (dairy avoidance) नहीं है। कई व्यावहारिक रास्ते खुले हैं, जैसे:

 – लैक्टोज़-मुक्त दूध (lactose free milk)  और दुग्ध उत्पादों का उपयोग करें।

 – दही और पनीर (fermented dairy products)  अक्सर पच जाते हैं।

 – डेयरी-उत्पाद खाने से पहले लैक्टेज़ एंज़ाइम सप्लीमेंट (lactase supplements) लें। थोड़ी मात्रा से शुरू करें और धीरे-धीरे असर जांचें।

Text Box: तालिका 2: उपयोगी वैज्ञानिक तथ्य
कई लोग जो दूध नहीं पचा पाते, वे दही और पनीर आराम से खा लेते हैं। ऐसा क्यों?
उत्पाद	क्यों सहनशील?
दही	दही में लैक्टोबेसिलस जैसे बैक्टीरिया लैक्टोज़ को किण्वन के दौरान आंशिक रूप से तोड़ देते हैं, जिससे उसकी मात्रा घट जाती है।
पनीर	पनीर बनाने की प्रक्रिया में अधिकांश लैक्टोज़ मट्ठे के साथ निकल जाता है। परिपक्व पनीर में लैक्टोज़ नगण्य होता है।
घी	घी में लैक्टोज़ लगभग शून्य होता है - यह केवल वसा है। इसीलिए लैक्टोज़ असहिष्णु लोग भी घी सहन कर लेते हैं।

 – कैल्शियम के वैकल्पिक स्रोत (calcium rich foods) (तिल, पालक, सोयाबीन, बादाम दूध) अपनाएं।

 – किसी भी परिवर्तन से पहले चिकित्सक से परामर्श (medical consultation) अवश्य लें।

यहां एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी है: दूध और डेयरी उत्पाद कैल्शियम और विटामिन डी के प्रमुख स्रोत हैं। इन्हें बिना उचित विकल्पों के छोड़ना हड्डियों को प्रभावित कर सकता है, विशेषकर बच्चों और महिलाओं में।

Text Box: तालिका 3: लैक्टोज़ असहिष्णुता में क्षेत्रवार विविधता
क्षेत्र			लैक्टोज़ असहिष्णु आबादी
उत्तर युरोप		10–15%
भारतीय उपमहाद्वीप	~60–70%
पूर्व एशिया		~80–95%
उप-सहारा अफ्रीका	~70–80%
लैक्टोज़ असहिष्णुता के आंकड़ों global lactose intolerance statistics) से यह आश्चर्यजनक तथ्य सामने आता है कि दुनिया की लगभग 60–70 प्रतिशत वयस्क आबादी इसी अवस्था में है। तो फिर प्रश्न यह है कि क्या दूध न पचना असामान्य है, या वयस्क होने पर भी दूध पचना एक विशेष जेनेटिक अपवाद (genetic exception) है?

विज्ञान का उत्तर स्पष्ट है: दूध न पचना जैविक रूप से सामान्य है। जैव विकास (evolutionary biology) की दृष्टि से देखें तो लैक्टेज़ पर्सिस्टेंस  यानी वयस्कावस्था में भी लैक्टोज़ पचाने की क्षमता वास्तव में एक अपवाद है।

यह हमें यह भी याद दिलाता है कि ‘सामान्य’ की परिभाषा अक्सर हमारी सांस्कृतिक (cultural diet habits) और भौगोलिक पृष्ठभूमि (geographical food patterns) से आकार लेती है, विज्ञान से नहीं।

अंत में

दूध से दूरी बनाने की ज़रूरत शरीर की जैविक विविधता (human biological diversity) का एक ईमानदार संकेत है। हमारा शरीर समय के साथ बदलता है; जो शिशु अवस्था में सहज था, वह वयस्क होने पर बदल सकता है। एक व्यक्ति के लिए स्वाभाविक, दूसरे के लिए असहज हो सकता है। शरीर कोई एक स्थिर मशीन नहीं, बल्कि एक बदलती हुई जैविक कहानी (human biology) है — और हर कहानी का अपना स्वाद है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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