लाल लेट्यूस को हरा बनाकर बढ़ाया सब्ज़ी का पोषण

दौलत सिंह तंवर 

जापान के त्सुकुबा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने हाल ही में जीनोम संपादन (gene editing) की मदद से लाल पत्तों वाली लेट्यूस का लाल रंग गायब कर दिया, नतीजतन पत्तियां हरी हो गईं। लेकिन असली कहानी रंग बदलने की नहीं, बल्कि इसके साथ पौधे के भीतर हुए एक अप्रत्याशित बदलाव की है। दरअसल, सब्ज़ियों की दुनिया में रंग सिर्फ दिखावे की बात नहीं है। यह अक्सर पौधे के भीतर चल रही जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं का संकेत भी होता है।

लेट्यूस की पत्तियों का रंग बदलते ही पौधे में दूसरे फायदेमंद यौगिक पहले से कहीं ज़्यादा मात्रा में जमा होने लगे। लाल पत्तों वाली लेट्यूस का रंग एंथोसायनिन नाम के पॉलीफेनॉलिक रंजक की वजह से होता है। एंथोसायनिन एक ऐसा प्राकृतिक रंजक है, जो कई फलों, फूलों और सब्ज़ियों में पाया जाता है और अपने एंटीऑक्सीडेंट गुणों के लिए जाना जाता है। पौधों में यह यौगिक फिनाइलएलानीन नामक अमीनो एसिड से शुरू होने वाली एक लंबी जैव-रासायनिक शृंखला के ज़रिए बनता है। इस शृंखला के दौरान रास्ते में कई फ्लेवोनॉइड्स भी बनते हैं। फ्लेवोनॉइड्स पौधों में पाए जाने वाले यौगिकों का एक बड़ा समूह है, जो कई जैविक भूमिकाएं निभाते हैं। सामान्य स्थिति में ये फ्लेवोनॉइड्स आगे चलकर एंथोसायनिन में बदल जाते हैं। यानी एंथोसायनिन (anthocyanin) असल में इस शृंखला का अंतिम उत्पाद है।

शोधकर्ताओं ने क्रिस्पर कास-9 (CRISPR-CAS9) नामक आधुनिक जीनोम संपादन तकनीक की मदद से डीएफआर नाम के एंज़ाइम को बनाने वाले जीन को निशाना बनाया। यह एंज़ाइम एंथोसायनिन बनने से ठीक पहले वाले चरण के लिए ज़िम्मेदार होता है, यानी फ्लेवोनॉइड्स के एंथोसायनिन में तब्दील होने के चरण पर। जब वैज्ञानिकों ने इस जीन को निष्क्रिय किया, तो एंथोसायनिन बनने की प्रक्रिया रुक गई। नतीजतन, पौधे की पत्तियों से लाल रंग पूरी तरह उड़ गया और वे हरी दिखने लगीं।

यहां एक दिलचस्प बात सामने आई। जब एंथोसायनिन बनने का रास्ता बंद हुआ तो पौधे में इस रासायनिक शृंखला के मध्यवर्ती पदार्थ (यानी फ्लेवोनॉइड्स) ही जमा होने लगे। पाया गया कि संशोधित पौधों में क्वेरसेटिन जैसे फ्लेवोनॉइड्स की मात्रा काफी बढ़ गई। क्वेरसेटिन को भी अपने एंटीऑक्सीडेंट और सूजनरोधी गुणों (anti-inflammatory quality) के लिए जाना जाता है, और यह कई स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों में पाया जाता है।

इस पूरे प्रयोग की एक और खास बात यह रही कि जीन में इतना बड़ा बदलाव करने के बावजूद पौधे की वृद्धि पर कोई नकारात्मक असर नहीं देखा गया। संशोधित लेट्यूस (modified lettuce) सामान्य लेट्यूस की तरह ही बढ़ी और उसकी पैदावार में कोई फर्क नहीं पड़ा। यह बात विशेष महत्व रखती है, क्योंकि अक्सर किसी जीन में बदलाव करने से पौधे की उत्पादकता प्रभावित होने का खतरा बना रहता है। यहां ऐसा नहीं हुआ, जिससे यह तकनीक व्यावहारिक इस्तेमाल के लिहाज़ से काफी आकर्षक बन जाती है।

यह अध्ययन सिर्फ लेट्यूस के रंग बदलने की कहानी भर नहीं है, यह दिखाता है कि किसी सब्ज़ी के भीतर पोषक तत्वों के संतुलन को सोच-समझकर नियंत्रित किया जा सकता है। अभी तक ऐसा माना जाता रहा है कि लाल लेट्यूस में हरी लेट्यूस के मुकाबले ज़्यादा पॉलीफेनॉल बनाने की क्षमता होती है। इस अध्ययन ने दिखाया कि इसी क्षमता का इस्तेमाल करके अंतिम उत्पाद (एंथोसायनिन) की बजाय, बीच के फायदेमंद यौगिकों (फ्लेवोनॉइड्स) को बढ़ाया जा सकता है, भले ही पत्तियां हरी ही क्यों न दिखें। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तरीका भविष्य में ऐसी सब्ज़ियां विकसित करने में मदद कर सकता है, जिनका पोषण-प्रोफाइल (nutrition-profile) ज़रूरत के हिसाब से कस्टमाइज़ किया जा सके। चूंकि फ्लेवोनॉइड का उत्पादन रोशनी की तीव्रता और तापमान जैसी परिस्थितियों से गहराई से प्रभावित होता है, इसलिए इन परिस्थितियों को सटीक रूप से नियंत्रित करके मनचाहे पोषक गुणों वाली सब्ज़ियां उगाना आसान हो जाएगा।

यह अध्ययन उत्साहजनक तो है, लेकिन यह देखना होगा कि यह जीन-संशोधित हरी लेट्यूस सामान्य हरी किस्मों के मुकाबले पोषण के लिहाज़ से कितनी बेहतर साबित होती है।

इसके अलावा, किसी भी जीनोम संपादित फसल के व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले उसे खाद्य सुरक्षा और नियामक मानकों (food safety & standards) की कसौटी पर परखा जाता है। विभिन्न देशों में जीन-संपादित फसलों को लेकर नियम अलग-अलग हैं, और इससे तय होगा कि यह तकनीक कितनी जल्दी किसानों और उपभोक्ताओं तक पहुंच पाती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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इस वर्ष के इगनोबेल हकदार

प्रतिका गुप्ता

नोबेल पुरस्कार (nobel prize) से तो सभी वाकिफ हैं। यह विज्ञान के क्षेत्र में संजीदगी से किए गए अहम शोधकार्य के लिए दिया जाता है, जिसमें सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ-साथ वैज्ञानिकों को गोल्ड मेडल और लगभग 10 लाख डॉलर की राशि भी मिलती है। यह भी सर्वमान्य है कि डीएनए की संरचना का खुलासा करना शोध का एक महत्वपूर्ण विषय है। लेकिन क्या आपको लगता है कि नाक छिनकना भी शोध का विषय हो सकता है?

नोबेल पुरस्कार के विपरीत, इगनोबेल पुरस्कार उतनी ही संजीदगी से किए गए ऐसे शोधकार्यों के लिए दिए जाते हैं जो पहले पल में तो लोगों को गुदगुदाते हैं लेकिन दूसरे ही पल लोगों को विचार करने पर मजबूर करते हैं। वास्तव में, इगनोबेल (Ig Nobel) पुरस्कार ‘ignoble’ शब्द पर तंज है जिसका मतलब होता है अप्रतिष्ठित। लेकिन, इगनोबेल पुरस्कार पाने वाले को भी काफी प्रतिष्ठा मिलती है, भले ही नकद राशि न मिलती हो। ये पुरस्कार इस बात को रेखांकित करते हैं कि महज भारी-भरकम और संजीदा लगने वाले विषय ही अहम नहीं होते और सिर्फ उन्हीं पर संजीदगी से शोधकार्य नहीं किए जाते, बल्कि हमारे मन में उठने वाले छोटे-छोटे सवाल भी उतने ही अहम होते हैं और उनके जवाब उतनी ही संजीदगी (scholarly diligence) से खोजना होते हैं।

इस वर्ष भी एनल्स ऑफ इंप्रॉबेबल जर्नल ने 10 क्षेत्रों में इन शोधकार्यों को इगनोबेल के सम्मान से नवाज़ा है। खुद देखिए कि बात कहां से निकलकर कहां तक पहुंच सकती है।

1. बायोमैकेनिक्स: चुंबन की वैज्ञानिक परिभाषा

इस वर्ष बायोमैकेनिक्स का इगनोबेल पुरस्कार मैटिल्डा ब्रिंडल, कैथरीन टैलबोट और स्टुअर्ट वेस्ट को चुंबन की एक सटीक वैज्ञानिक परिभाषा (kissing definition) देने के लिए मिला है। इस परिभाषा के अनुसार “चुंबन एक ऐसी गैर-आक्रामक क्रिया है जिसमें एक ही प्रजाति के जीवों के बीच मुंह-से-मुंह (या होंठ-से-होंठ) का सीधा संपर्क हो, होंठो/मुंह में कुछ हलचल हो और यह संपर्क या हलचल भोजन के खाने-खिलाने के लिए न हो।” न सिर्फ मनुष्यों बल्कि कई प्रजातियों में इस तरह का व्यवहार देखा गया है जिसमें दो जीवों के बीच मुंह से मुंह का संपर्क होता है; चुंबन को सटीक रूप से परिभाषित करने से इसे विभिन्न प्रजातियों के बीच बेहतर समझा जा सकेगा और इसके उद्भव और कारणों के बारे में सोचा जा सकेगा। शोधकर्ताओं की उक्त परिभाषा के अनुसार अब तक ज्ञात जीवों में ध्रुवीय भालू, कुछ पक्षी, चींटियां और कुछ अन्य प्राइमेट भी चुंबन करते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाने की कोशिश की कि यह व्यवहार कब विकसित हुआ। उन्होंने पाया है कि यह व्यवहार लगभग 2.5 करोड़ साल पहले वानरों (एप्स) के पूर्वजों से आया है। अब समझना बाकी है कि इस व्यवहार की भूमिका क्या है।

2. अर्थशास्त्र: अमीरी और अनैतिक व्यवहार 

अर्थशास्त्र का इगनोबेल पुरस्कार पॉल पिफ और उनके साथियों को उस शोध के लिए मिला है जिसमें उन्होंने सामाजिक-आर्थिक स्थिति और अनैतिक व्यवहार के बीच सम्बंध की पड़ताल की है। उन्होंने पाया कि गरीबों की तुलना में अमीर लोग (wealthy people) अधिक अनैतिक व्यवहार करते हैं। ये निष्कर्ष उनके द्वारा किए गए सात अध्ययनों के आधार पर दिए गए हैं। पहले दो अध्ययनों में उन्होंने इन दोनों वर्गों के लोगों का व्यवहार चौराहे पर वाहन चलाते समय देखा; उन्होंने पाया कि अमीर लोग चौराहे पर अपनी बारी आने के पहले ही दूसरे वाहनों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। तीसरे अध्ययन में प्रतिभागियों को कुछ परिस्थितियां देकर उन पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई – अमीर लोगों ने अधिक अनैतिक निर्णय लिए। चौथे अध्ययन में सिर्फ और सिर्फ बच्चों के लिए रखी कैंडी को अमीरों की भूमिका निभा रहे प्रतिभागियों ने अधिक लिया। पांचवे अध्ययन में बातचीत के दौरान अपनी बात मनवाने के लिए झूठ बोलने की प्रवृत्ति अमीरों में अधिक दिखी। छठवे अध्ययन में खेल जीतने के लिए चीटिंग करने का व्यवहार अमीरों में अधिक दिखा। और सातवें अध्ययन में कार्यस्थल पर अमीर अधिक अनैतिक व्यवहार (unethical behaviour) करते पाए गए।

3. रसायन विज्ञान: प्रोटीन से भरपूर कॉकरोच का दूध

रसायन विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध के लिए मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने बताया कि Diploptera punctata नामक कॉकरोच का दूध (cockroch milk) गाय के दूध से भी तीन गुना अधिक पौष्टिक है। यह कॉकरोच आम घरों में मिलने वाले कॉकरोच से अलग है और अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देता है। दरअसल, मादा कॉकरोच अपने शरीर में विकसित हो रहे भ्रूणों को एक विशेष पोषक तरल से भोजन देती है। भ्रूण जब इस तरल को ग्रहण करते हैं तो उनकी आंत में यह प्रोटीन, वसा और शर्करा से भरपूर छोटे-छोटे क्रिस्टलों के रूप में जमा हो जाता है। ये क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलकर बढ़ते भ्रूण को पोषण देते हैं।

2016 में भारतीय और फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी की मदद से इन क्रिस्टलों की संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि यह तरल अत्यधिक पौष्टिक है: यह गाय के दूध की तुलना में तीन गुना से अधिक पोषण और ऊर्जा दे सकता है। घबराइए नहीं, वैज्ञानिक सीधे इस दूध उपयोग मनुष्य के इस्तेमाल के लिए नहीं सोच रहे हैं, बल्कि इसके घटकों के आधार पर पोषक पेय (nutritious drink) तैयार करने का विचार है।

4. चिकित्सा: नाक कैसे छिनकें

चिकित्सा का इगनोबल पुरस्कार जापानी चिकित्सक टोकुजी उन्नो के 1977 के उस अध्ययन के लिए मिला है जिसमें उन्होंने बताया था कि नाक कैसे साफ करें। रोज़ाना नाक की सफाई श्वासनली और फेफड़ों के संक्रमण के जोखिम को कम करती है, और जब सर्दी-ज़ुकाम होता है तो नाक तो छिनकनी पड़ती है। उन्नो यही जानना चाह रहे थे कि किस तरह नाक की सफाई (nostril hygiene) स्वस्थ रहने में मदद कर सकती है। इसके लिए उन्होंने देखा कि कितनी तेज़ी और ताकत से हवा बाहर करने पर, एक बार में एक नथुने से छिनकने पर, या दोनों नथुनों से छिनकने पर नाक की सफाई में क्या अंतर पड़ता है। उन्होंने यह सब 14 से 48 वर्ष की आयु के 15 लोगों पर करके देखा। नाक से निकलने वाली हवा की गति मापने के लिए दो न्यूमोटैकोमीटर (pnuemotachometer) लगाए गए और नाक से निकली हवा की मात्रा तथा समय भी दर्ज किया गया। साथ ही कान की बाहरी नलिका में दबाव परिवर्तन को एक कैथेटर और संवेदनशील प्रेशर ट्रांसड्यूसर से मापा गया। उन्होंने पाया कि दोनों नथुने खुले रखते हुए नाक साफ करने की बजाय एक बार में एक नथुने को खुला रखकर नाफ साफ करने से ज़्यादा अच्छे से सफाई होती है।

5. जीव विज्ञान: सांप कब काट सकता है

यह तो कहा ही जाता है कि सांप तभी काटता है जब आपका पैर उस पर पड़ जाए। जीव विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन के लिए दिया गया जिसमें शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि विषैले सांप पर पांव कहां पड़ने पर उसके द्वारा काटने की संभावना अधिक होती है। उन्होंने ब्राज़ील के विषैले सांप पिट वाइपर (pit viper snake) के व्यवहार का अध्ययन किया और उसकी लंबाई, लिंग, उम्र, तापमान, दिन का समय तथा मनुष्य द्वारा दी गई उत्तेजनाओं जैसे कारकों को देखा। प्रयोगों में सांपों के साथ नियंत्रित मानव-संपर्क की परिस्थितियां बनाई गईं और यह देखा गया कि कहां पांव पड़ने पर सांप रक्षा के लिए काटता (defensive snakebite) है। पाया गया कि सिर पर पांव पड़ने पर काटने की संभावना लगभग 44 प्रतिशत थी, शरीर के बीच के हिस्से पर 20 प्रतिशत और पूंछ पर 11 प्रतिशत थी। छोटे सांपों, विशेषकर नवजातों में काटने की प्रवृत्ति भी अधिक पाई गई। हालांकि पशु-नैतिकता सरोकारों के चलते इस अध्ययन को साइंटिफिक रिपोर्ट्स ने फरवरी 2025 में वापस ले लिया।

6. भौतिकी: छींटे-मुक्त युरिनल 

भौतिकी का इगनोबेल पुरस्कार ऐसे युरिनल डिज़ाइन (splash-free urinal design) करने के लिए दिया है जिससे आसपास फैलने वाले छींटे और गंदगी न के बराबर फैलें। शोधकर्ताओं ने ऐसा अनुभव किया था कि कितनी भी सावधानी से युरिनल में पेशाब की जाए, आसपास के फर्श पर छींटे फैल ही जाते हैं और सार्वजनिक शौचालयों की सफाई का मुद्दा बना रहता है। यदि सफाईकर्मी हर व्यक्ति के जाने के बाद सफाई करते रहें तो यह उनके लिए भी थकाऊ होता है, और सफाई बरकरार रखने में संसाधन, पैसा और ऊर्जा भी लगती ही है। इसी के समाधान में उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि छींटे छिटककर बाहर आते ही क्यों हैं और इस आधार पर नए युरिनल डिज़ाइन पेश किए; इन डिज़ाइन का नाम उन्होंने नॉटी-लू (Nauti-Loo), कॉर्नुकोपिया (Cornucopeea) और यूरिन-नो (Urine-no) नाम दिए हैं। इसके लिए उन्होंने किसी तरल के सतह से टकराने के कोण और छींटों के उचकने के बीच के सम्बंध का गणितीय मॉडल बनाया और पाया कि किसी सतह पर किसी तरल की जितनी सीधी धार (90 डिग्री के कोण से) पड़ेगी छींटे उतने ज़्यादा छिटकते हैं, सतह पर धार यदि कम कोण (30 डिग्री से कम) से टकराए तो छींटे कम उछलते हैं। इसके आधार पर उन्होंने तिरछी सतहों वाले तीन युरिनल डिज़ाइन तैयार किए और उनका परीक्षण किया। नई डिज़ाइनों से प्रचलित युरिनल की तुलना महज़ 1.4 प्रतिशत छींटे बाहर आए।

7. तकनीक: मच्छर की सूंडी से 3-डी प्रिंटिंग

तकनीक का इगनोबेल पुरस्कार वैज्ञानिकों की उस कोशिश को मिला जिसमें मरी हुई मादा मच्छर की सूंड को 3-डी प्रिंटर की बेहद सूक्ष्म नोज़ल के रूप में इस्तेमाल किया गया। मच्छर की सूंड बहुत पतली होने के साथ काफी मज़बूत भी होती है। कई कीटों के सूंड (मुखांगों) की संरचना और यांत्रिक गुणों की तुलना करने पर मादा मच्छर की सूंड सबसे उपयुक्त लगी। उन्होंने प्रयोगशाला में पाले गए मृत मच्छरों से सूंड अलग करके डिस्पेंसिंग नोज़ल से जोड़ा और डायरेक्ट-इंक-राइटिंग 3-डी प्रिंटर (direct-ink-writing 3-D printer) में लगाया और अलग-अलग गति संयोजन से प्रिंट करके देखा। उन्होंने पाया कि इस नोज़ल व्यवस्था से लगभग 20 माइक्रोमीटर पतली लकीरें प्रिंट की जा सकती हैं, जो आम व्यावसायिक नोज़लों की तुलना में काफी पतली लकीरें हैं।

8. घ्राण विज्ञान: संतान की गंध 

घ्राण विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन को मिला है जिसमें शोधकर्ताओं ने यह जांचा कि माता-पिता अपनी संतानों के शरीर की गंध को अलग-अलग उम्र में किस तरह महसूस करते हैं। पोलैंड में किए गए अध्ययन में 235 माता-पिता ने कुल 367 संतानों के शरीर की गंध की सुखदता (pleasing body odor) का आकलन किया। संतानों की उम्र एक महीने से 35 वर्ष तक थी। प्रतिभागियों ने अपनी संतानों की गंध को 0 से 20 के पैमाने पर बेहद बुरी से बहुत अच्छी तक अंक दिए। शोधकर्ताओं ने संतानों की उम्र, माता-पिता और संतान का लिंग, साथ बिताया समय तथा माता-पिता और-संतान के बीच सम्बंध जैसे कारकों को भी विश्लेषण में शामिल किया। पाया गया कि संतान की उम्र बढ़ने के साथ उसके शरीर की गंध को सुखद मानने की प्रवृत्ति घटती गई। शिशुओं की गंध को 93.7 प्रतिशत माता-पिता ने सुखद या बहुत सुखद बताया, जबकि किशोरावस्था से बड़ी संतानों के लिए यह आंकड़ा 75.2 प्रतिशत था। शोधकर्ताओं का कहना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच सम्बंधों में गंध की भूमिका हो सकती है।

9. शांति: दुश्मन का दुश्मन दोस्त क्यों

शांति का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध को मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने दोस्ती और दुश्मनी के बीच एक दिलचस्प सामाजिक मनोविज्ञान का अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं ने छह अध्ययनों में कुल 1183 प्रतिभागियों से पूछा कि वे अपने आदर्श दोस्त (ideal friend) में क्या गुण चाहते हैं। प्रतिभागी अमेरिका और भारत के छात्र तथा सामान्य समुदाय के थे। उनसे यह भी पूछा गया कि उनका दोस्त उनके साथ, किसी अजनबी के साथ या उनके दुश्मन के साथ कैसा व्यवहार करे तो उन्हें ठीक लगेगा। सामान्य स्थिति में लोगों ने दयालु और भरोसेमंद दोस्त को अधिक पसंद किया। लेकिन जब सवाल किसी दुश्मन के प्रति व्यवहार का था, तो तस्वीर बदल गई। कुछ प्रतिभागियों ने ऐसे दोस्त को पसंद किया जो उनके दुश्मन के प्रति थोड़ा रूखा और सख्त रवैया रखते हों। शोधकर्ताओं ने इसे “embedded dyad” यानी दोस्ती को व्यापक सामाजिक नेटवर्क के भीतर देखने के दृष्टिकोण से समझाया। कोई दोस्त केवल हमारे साथ ही ताल्लुक नहीं रखता बल्कि वह हमारे प्रतिद्वंद्वियों से भी मिलता-जुलता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर हम पर पड़ सकता है।

10. मृदा विज्ञान: जांघियों से मिट्टी की सेहत 

मृदा विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार मिट्टी में दबाए गए सूती जांघियों और टी-बैग्स के ज़रिए मिट्टी की जैविक सक्रियता और गुणवत्ता (soil biological activity & quality) का अध्ययन करने के लिए मिला है। विचार सरल था: मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव जितने सक्रिय होंगे, सूती कपड़े जैसे जैविक पदार्थ की अपघटन गति उतनी ही तेज़ होगी। शोधकर्ताओं ने शौकिया वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे मानकीकृत सूती जांघिए और टी-बैग्स वगैरह अपने आसपास की विभिन्न तरह की मिट्टियों (जैसे बाग-बगीचे, मैदान, खेत आदि) में गाड़ दें और लगभग दो महीने बाद उन्हें निकालें, ताकि यह देखा जा सके कि कपड़ा कितना सड़-गल गया और कितना बाकी है। दुनिया भर के  लगभग 1000 शौकिया वैज्ञानिकों ने 2000 से अधिक जांघिए और हज़ारों टी-बैग्स दफनाए। पाया गया कि निजी बगीचों, जहां पेड़-पौधों की प्रजातियों में विविधता थी, में कपड़ा सबसे अधिक तेज़ी से अपघटित हुआ, जबकि लॉन (जिस पर सिर्फ एक तरह के पौघे – हरी घास या दूब – उगी थी) में अपघटन (decomposition) धीमी गति से हुआ। मिट्टी की गुणवत्ता के लिहाज़ से यह अहम है।

चलते–चलते

विगत 3 सितंबर को स्विट्जरलैंड के ज़्यूरिख में इस वर्ष के इगनोबेल पुरस्कार दिए गए। अपने 36 वर्ष के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब एनल्स ऑफ इंप्रोबेबल ने यह समारोह बोस्टन के बाहर आयोजित किया गया। इसका कारण पिछले दो वर्ष का अनुभव रहा: विगत दो सालों में अमेरिका में सख्त किए गए वीज़ा नियमों और विभिन्न देशों के बीच चल रहे युद्ध एवं संघर्ष के चलते कई विजेता चाहकर भी समारोह में शामिल नहीं हो पा रहे थे। और, इगनोबेल पुरस्कार के संस्थापक मार्क अब्राहम्स (mark abrahams) के लिए यह चिंता का विषय था कि यह समारोह जो हल्के-फुल्के और मज़ेदार अंदाज़ में सम्पन्न होता है उस पर संघर्ष और नीतियां हावी हो रही हैं, विजेता शामिल नहीं हो पा रहे हैं और मेहमानों के लिए देश का दौरा करना असुरक्षित हो गया है।

इस वर्ष विजेता तो शामिल हो ही पाए, साथ ही समारोह में नोबेल पुरस्कार विजेता एशर डफलो, अभिजीत बनर्जी, मिशेल मेयर एवं टिम हंट भी शामिल रहे जिन्होंने इगनोबेल पुरस्कार विजेताओं को मशरूम-आकार की ट्रॉफी दी। आमंत्रित अतिथियों ने 24/7 की तर्ज पर व्याख्यान भी दिए: तयशुदा विषय पर पहले तो 24 सेकंड में और फिर 7 शब्दों में विषय समझाया गया। समारोह की शुरुआत ‘लैबोरेटरी ऑफ स्मॉल डिसास्टर’ की थीम पर डांस परफॉर्मेंस हुई, फंजाई थीम पर ओपेरा संगीत (fungi themed opera)सम्पन्न हुआ, और समारोह का समापन दर्शकों ने कागज़ के हवाई-जहाज़ उड़ाकर किया। हर इवेंट की शुरुआत फोर-पीस ऑर्केस्ट्रा द्वारा की गई, और विजेताओं की वेशभूषा उनके शोध विषय से सम्बंधित थी।

अगले वर्ष ये पुरस्कार बेल्जियम के एंटवर्प (antwerp) में 5 सितंबर को दिए जाएंगे। आप यदि दर्शकों में शामिल होना चाहें तो मई में टिकट बुकिंग उनकी वेबसाइट पर प्रारंभ होगी। और, आप चाहें तो किसी मज़ेदार लेकिन संजीदा शोध को अगले वर्ष के लिए नामित (nominate) भी कर सकते हैं, क्या पता आपका नामित शोध पुरस्कार पा जाए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्रतिरक्षा ‘रीसेट’ करने वाली इम्यून थेरपी

एक ताज़ा शोध के क्लीनिकल ट्रायल (Clinical trial) में चिकित्सा जगत को बड़ी उपलब्धि हासिल हुई है। शोधकर्ताओं ने शरीर के भीतर ही बीमारी से लड़ने वाली प्रतिरक्षा कोशिकाओं को तैयार करने के लिए एक संशोधित वायरस का सफल परीक्षण किया है। नेचर में प्रकाशित अध्ययन के शुरुआती नतीजे दर्शाते हैं कि इस खास तकनीक के जरिए भविष्य में गंभीर ऑटोइम्यून बीमारियों (autoimmune diseases) का इलाज आज के मुकाबले अधिक सटीक, किफायती और त्वरित हो सकता है।

ऑटोइम्यून बीमारियों में शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र (immune system) खुद अपनी ही स्वस्थ कोशिकाओं पर हमला करने लगता है। मल्टीपल स्क्लेरोसिस (एमएस) जैसी स्थिति में शरीर की विकृत बी-कोशिकाएं ऐसी ऑटो-एंटीबॉडी बनाती हैं जो मस्तिष्क, मेरु-दंड और तंत्रिकाओं को नुकसान पहुंचाती हैं।

इस अध्ययन में एमएस, तंत्रिका को नुकसान पहुंचाने वाली और शोथ बढ़ाने वाली ऑटोइम्यून बीमारियों के 16 मरीज़ों को शामिल किया गया। मरीज़ों को चीन की बायोटेक्नोलॉजी कंपनी द्वारा विकसित ‘लेंटीवायरस’ (एक सुरक्षित और आनुवंशिक रूप से संशोधित वायरस) (lentivirus) की एक खुराक दी गई। शरीर में प्रवेश करते ही इस वायरस ने टी-कोशिकाओं को आनुवंशिक निर्देश दिए, जिससे वे CAR-T कोशिकाओं (Chimaeric Antigen Receptor – T cells) में बदल गई। नतीजतन, नई CAR-T कोशिकाओं ने विकृत बी-कोशिकाओं को नष्ट कर दिया। इसके बाद शरीर में नई स्वस्थ बी-कोशिकाएं बनीं और उन्होंने ऑटो-एंटीबॉडी बनाना बंद कर दिया। शोधकर्ताओं ने इसे ‘इम्यून रीसेट’ (immune reset) नाम  दिया है।

छह महीने की निगरानी के दौरान एमएस के मरीज़ों में शारीरिक गतिशीलता, सोचने-समझने की क्षमता में सुधार देखा गया और लगातार थकान में भी कमी आई। इसके अलावा, अन्य ऑटोइम्यून बीमारियों के मरीज़ों में शोथ (inflammation) की कमी और शारीरिक ताकत में बढ़ोतरी दर्ज की गई।

पारंपरिक CAR-T थेरपी (फिलहाल ब्लड कैंसर के इलाज में इस्तेमाल हो रही है) में मरीज़ का खून निकालकर टी-कोशिकाओं को अलग किया जाता है। उसके बाद प्रयोगशाला में कोशिकाओं को (शरीर से बाहर) संशोधित करके शरीर में डाला जाता है। लिहाज़ा, शरीर के भीतर कोशिकाएं तैयार करने की यह तकनीक (इन-विवो) पारंपरिक थेरपी (conventional therapy) के मुकाबले सस्ती और तेज़ होगी। (साल 2025 में लेंटीवायरस आधारित CAR-T थेरपी से ब्लड कैंसर का सफल इलाज किया जा चुका है।)

परीक्षण के दौरान दुष्प्रभाव बेहद मामूली रहे – जैसे थोड़े समय के लिए हल्का बुखार, सूजन या श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्या में अस्थायी कमी। वैसे, विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि यह थेरपी शरीर के भीतर ही डीएनए में बदलाव करती है, इसलिए भविष्य में ट्यूमर या कैंसर (tumor) बनने का जोखिम हो सकता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, ट्यूमर और दीर्घकालिक जोखिमों को खारिज करने और सुरक्षा के प्रमाण हेतु मरीज़ों की कम से कम 10 वर्ष तक निगरानी ज़रूरी है। शोधकर्ताओं के मुताबिक मरीज़ों की निगरानी जारी है और जल्द ही बड़े पैमाने पर ट्रायल (large scale trials) शुरू किए जाएंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अंतरिक्ष यात्री कमज़ोर क्यों हो जाते हैं?

यह तो देखा गया है कि जब अंतरिक्ष यात्री लंबी अंतरिक्ष यात्रा (space travel) के बाद धरती पर लौटते हैं तो उनके शरीर में कमज़ोरी के लक्षण दिखाई देते हैं। अब शोधकर्ताओं ने नेचर कम्यूनिकेशन्स में बताया है कि इसकी वजह यह है कि अंतरिक्ष के कम गुरुत्वाकर्षण (gravity) के असर से माइटोकॉण्ड्रिया के कामकाज में क्षीणता आती है। माइटोकॉण्ड्रिया समस्त जीवों की कोशिका का एक महत्वपूर्ण अंग होता है जो उन्हें ऊर्जा मुहैया कराता है। वैसे यह बात तो पूर्व में अंतरिक्ष यात्रियों तथा अंतरिक्ष में भेजे गए कई चूहों और कोशिकाओं के अध्ययन से पता थी कि अल्प गुरुत्व की परिस्थिति में माइटोकॉण्ड्रिया क्षतिग्रस्त हो जाते हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि इस क्षति की क्रियाविधि क्या है। अब जापान के नेशनल साइंटिफिक रिसर्च इंस्टीट्यूट (राइकेन) के आणविक जीव वैज्ञानिक शिनतारो इवासाकी की टीम ने इसका और बारीकी से अध्ययन किया है। इसमें उन्होंने राइबोसोम पर ध्यान दिया।

कोशिकाओं में प्रोटीन संश्लेषण तीन चरणों में होता है। सबसे पहले आनुवंशिक सामग्री (डीएनए) के आधार पर एक अन्य अणु आरएनए बनाया जाता है। आरएनए कोशिका द्रव्य में उपस्थित राइबोसोम (ribosome) से जुड़ जाता है। फिर राइबोसोम से आरएनए के खंड कोशिका द्रव्य में से उपयुक्त अमीनो अम्लों को लाकर राइबोसोम पर सही क्रम में जमाते हैं और इन अमीनो अम्लों को जोड़कर प्रोटीन बनता है। इवासाकी देखना चाहते थे कि कम या शून्य गुरुत्व (zero gravity) का राइबोसोम के कामकाज पर क्या असर होता है।

उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर कुछ कोशिकाएं 24 या 48 घंटों तक संवर्धित कीं और उन्हें फ्रीज़ कर दिया। साथ ही साथ, कुछ कोशिकाओं को सेंट्रीफ्यूज में रखकर संवर्धित किया। सेंट्रीफ्यूज (centrifuge) लगभग धरती जैसी गुरुत्व परिस्थिति बनाता है।

जब सारे नमूनों का धरती पर लाकर विश्लेषण किया गया तो पता चला कि जिन कोशिकाओं को अल्प-गुरुत्व में रखा गया था उनमें सेंट्रीफ्यूज में रखी कोशिकाओं की अपेक्षा माइटोकॉण्ड्रियल एम-आरएनए (mitochondrial m-RNA) कण कम थे और उनके माइटोकॉण्ड्रिया के राइबोसोम ने कम प्रोटीन बनाए थे।

इसी प्रकार के असर एक कृमि सी. एलेगेन्स पर देखे गए। ऐसे कुछ कृमियों को अंतरिक्ष स्टेशन के अल्प गुरुत्व में चार दिन रखा गया था जबकि कुछ को सेंट्रीफ्यूज में पाला गया था।

इवासाकी की टीम ने ऐसे ही कुछ प्रयोग धरती की एक प्रयोगशाला में किए थे। इसके लिए उन्होंने क्लिनोस्टेट नाम के उपकरण का इस्तेमाल किया था, जो अल्प-गुरुत्व की परिस्थिति पैदा करता है। जब मानव कोशिकाओं को 24 घंटे क्लिनोस्टेट (clinostat) में रखा गया तो उनमें 13 प्रोटीन का उत्पादन कम हुआ। 48 घंटे और 72 घंटे रखने पर तो माइटोकॉण्ड्रियल प्रोटीन्स का उत्पादन और भी कम हुआ।

इस असर की एक क्रियाविधि भी सुझाई गई है कि गुरुत्वाकर्षण के चलते कोशिकाएं के आपस में चिपकने के ज़रिए माइटोकॉण्ड्रिया पर असर होता है। गुरुत्वाकर्षण शून्य कर दिया जाए, तो यह असर भी क्षीण हो जाता है और प्रोटीन (protein) उत्पादन कम हो जाता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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उंगलियां चटकाने का सुख और कष्ट

डॉ. सुशील जोशी

उंगलियां चटकाना तो सभी जानते हैं। हालांकि कुछ लोग आदतन ऐसा करते हैं जबकि कुछ नहीं करते। इसके अलग-अलग तरीके भी होते हैं; कुछ लोग उंगलियों को सीधी रखकर उन्हें खींचते हैं, तो कुछ लोग उंगलियों को जोड़ों पर से मोड़कर उन्हें दबाते हैं। परिणाम कुल मिलाकर एक ही होता है – उंगलियों से चटक की आवाज़ आती है और कहते हैं कि इससे सुकून मिलता है। तो सवाल यह उठता है कि यह आवाज़ कहां से आती है और सुकून क्यों मिलता है। साथ में सवाल यह भी है कि क्या उंगलियां चटकाना (knuckle cracking) लंबे समय में नुकसानदायक भी हो सकता है।

दरअसल, उंगलियां चटकाने पर तमाम तरह की क्रियाएं होने लगती हैं। सबसे पहले तो यह देखिए कि चटक की आवाज़ कहां से निकलती है। बात की शुरुआत यह बताकर करना मुनासिब होगा कि वैज्ञानिकों-चिकित्सकों-अस्थि विशेषज्ञों के बीच इस सम्बंध में आम सहमति नहीं है।

हमारे शरीर के जोड़ों में हड्डियों को आपस में जोड़ने की तीन व्यवस्थाएं होती हैं। एक होती है जिसमें हड्डियां तंतुओं या रेशों के ज़रिए जुड़ी होती हैं। कपाल (cranium) की हड्डियों के बीच जोड़ इसी प्रकार के होते हैं। इन जोड़ों में गति नहीं होती। दूसरी होती है जिसमें हड्डियों को उपास्थियों के ज़रिए जोड़ा जाता है। इनमें थोड़ी गति संभव होती है। और तीसरी व्यवस्था में हड्डियों के जोड़ों पर एक रेशेदार कैप्सूल में तरल भरा होता है। कोहनी, घुटनों, कलाइयों, ऐड़ियों के जोड़ इसी प्रकार के होते हैं। हमारी उंगलियों के जोड़ों में भी एक तरल भरा होता है जो उन्हें गति करने में घर्षण से बचाता है। इस तरल को सिनोवियल द्रव (synovial fluid) कहते हैं। इसके अलावा यह एक नरम गद्दी की तरह कार्य करता है और उपास्थियों को पोषण भी पहुंचाता है। जोड़ों में यह तरल न हो या कम हो तो कई तरह की दिक्कतें हो सकती है।

हाथ की संरचना और खास तौर से उसमें हड्डियों की जमावट चित्र 1 की तरह होती है। कलाई और हथेली के जोड़ पर कई सारी हड्डियां होती हैं जिन्हें कार्पल्स कहते हैं। कार्पल्स अनियमित आकार की हड्डियां होती हैं जो अनियमित ढंग जमी होती हैं। इसके बाद आती हैं बेलनाकार मेटाकार्पल्स (metacarpels) जो हथेलियों में जमी होती हैं, और अलग-अलग उंगली की हड्डियों से जुड़ी होती हैं। चार उंगली और एक अंगूठे के लिए पांच मेटाकार्पल्स होती हैं। फिर आती हैं उंगलियों की हड्डियां – फैलेंजेस (phalanges)। चारों उंगलियों में तीन-तीन फेलेंजेस होती हैं जबकि अंगूठे में मात्र 2। मेटाकार्पल्स से लेकर फैलेंजेस तक के सारे जोड़ सिनोवियल होते हैं। चटकाने की मुख्य क्रिया को मेटाकार्पल और फैलेंजेस के जोड़ों पर अंजाम दिया जाता है। इन्हें संक्षेप में एमसीपी (MCP) जोड़ कहते हैं।

चटकाने की क्रिया

उंगलियां चटकाने पर काफी अनुसंधान हुए हैं। इस सामान्य सी क्रिया पर ध्यान देने का प्रमुख कारण यह रहा है कि इसे लेकर तमाम धारणाएं-मान्यताएं हैं, खास तौर से इसके कारण होने वाले नुकसान को लेकर।

1947 में जे. बी. रोस्टन और आर. व्हीलर हैन्स ने जर्नल ऑफ एनाटॉमी में पहली बार MCP जोड़ों की क्रमिक रेडियोग्राफी (sequential radiography) के आधार पर उंगलियां चटकाने के चार चरणों का विवरण दिया था:

विश्राम की अवस्था, जब जोड़ पर कोई बल नहीं लगाया जा रहा है और सतहें लगभग परस्पर संपर्क में होती हैं;

जब थोड़ा बल लगाया जाता है तो जोड़ की सतहें एक-दूसरे से दूर जाने लगती हैं;

बल का परिमाण एक सीमा से अधिक होने पर सतहें इतनी दूर हो जाती हैं कि बीच में एक खाली जगह बन जाती है। तब चटकने की अवस्था आती है;

अंतिम चरण बहाली का होता है जिसके दौरान उंगलियों को फिर से नहीं चटकाया जा सकता। यह चरण लगभग 20 मिनट का होता है।

आवाज़ का उद्गम

एक मत यह है कि सिनोवियल द्रव में गैसें (मुख्यत: कार्बन डाईऑक्साइड और नाइट्रोजन) घुली होती हैं। जब जोड़ों को तेज़ी से खींचा जाता है तो बीच की जगह में एक खाली स्थान पैदा हो जाता है। इस निर्वात की वजह से गैस के बुलबुले (gas bubbles) सिनोवियल द्रव से बाहर निकलकर इस जगह में भर जाते हैं। फिर जब बुलबुले खूब फूल जाते हैं तो अपने ही तनाव की वजह से गुब्बारे की तरह फूट जाते हैं। आवाज़ इन्हीं बुलबुलों के फूटने की होती है। और यही कारण है कि एक बार चटकाने के बाद कुछ समय तक ऐसा नहीं कर सकते क्योंकि बुलबुलों को फिर से बनने में समय लगता है।

लेकिन… विज्ञान में लेकिन तो हमेशा बना रहता है।  

रोस्टन और हैन्स की परिकल्पना थी कि जोड़ों की सतहों के बीच खाली स्थान पर जलवाष्प (watervapour) भरी होती है। उनका मत था कि आवाज़ जोड़ों की तेज़ गति के कारण उत्पन्न कंपनों से पैदा होती है।

इस संदर्भ में ए. अन्सवर्थ, डी. डावसन और वी. राइट ने अपने प्रयोगों के परिणाम 1971 में एनल्स ऑफ दी रुमेटिक डिसीसेज़ में प्रकाशित करके बताया था कि बुलबुलों का बनना और फूटना ही चटकने की आवाज़ का स्रोत है। जैसे-जैसे जोड़ की सतहें एक-दूसरे से दूर हटती हैं, वहां कम दबाव का क्षेत्र (low pressure zone) बन जाता है। परिणामस्वरूप, द्रव का वाष्पीकरण होता है और द्रव में घुली गैसें बुलबुले बन जाती हैं।

हालांकि इस बात पर सहमति है कि उंगली चटकाने के दौरान जोड़ों पर बुलबुले बनते हैं लेकिन बुलबुलों के बनने की क्रियाविधि और आवाज़ का स्रोत विवाद का विषय रहा है।

जैसे 2015 में अलबर्टा विश्वविद्यालय के ग्रेगरी कॉचुक और उनके साथियों ने चटकाने की प्रक्रिया का एमआरआई अध्ययन किया। यह अध्ययन दस MCP जोड़ों पर किया गया था। उन्होंने चटकने वाली उंगली को एक लंबी लचीली नली में पिरोकर उसका एमआरआई अध्ययन (MRI scan) किया था। शोधकर्ताओं ने पाया कि आवाज़ आने के बाद भी बुलबुला मौजूद था। यानी आवाज़ बुलबुले के निर्माण के समय आई थी, न कि बुलबुला फटने के कारण।

कॉचुक व साथियों ने बुलबुला बनने के कारण के रूप में ट्राइबोन्यूक्लिएशन (tribonucleation) नामक क्रियाविधि सुझाई थी। इसमें होता यह है कि दो सतहें एक आसंजन (चिपकू) बल द्वारा चिपकी होती हैं। जब उन्हें अलग-अलग करने के लिए लगाया जा रहा बल इस आसंजन बल से अधिक हो जाता है तो सतहें अलग-अलग होने लगती हैं लेकिन उन्हें चिपकाकर रखने वाला द्रव उतनी तेज़ी से फैल नहीं पाता। लिहाज़ा वहां वाष्प की एक गुहा (कैविटी) बन जाती है। द्रव में मौजूद गैसें बुलबुले के रूप में बाहर निकलने लगती हैं। इस प्रक्रिया को ट्रायबोन्यूक्लिएशन कहते हैं। लेकिन चटकने की आवाज़ इस खाली स्थान के बनने के समय ही पैदा हो जाती है, उसके वापिस पिचकने से पहले।

इसके बाद 2017 में रॉबर्ट बूटिन और उनके साथियों ने चटकते जोड़ों में सोनोग्राफी की मदद से इकोजेनिक क्षेत्रों की पहचान की। ये वे क्षेत्र होते हैं जो सोनोग्राफी (sonography) करते समय ध्वनि तरंगों को परावर्तित कर देते हैं। उनके अध्ययन के निष्कर्ष दर्शाते हैं कि बुलबुले बनने में ट्रायबोन्यूक्लिएशन की प्रक्रिया ही क्रियाशील है।

जब कुछ शोधकर्ताओं ने चटकती उंगलियों की जांच अल्ट्रासोनोग्राफी (ultrasonography) से की तो कुछ अलग ही तस्वीर सामने आई। इस अनुसंधान में 40 सहभागी थे (23 पुरुष और 17 महिलाएं)। इनमें से 30 आदतन उंगलियां चटकाने वाले थे जबकि 10 को ऐसी कोई आदत नहीं थी। शोधकर्ताओं ने इन सबका चिकित्सा इतिहास रिकॉर्ड किया – जैसे वे कितनी बार उंगलियां चटकाते हैं, उनकी हाथों की पकड़ कितनी मज़बूत है वगैरह। इसके बाद सभी सहभागियों के एमसीपी जोड़ की अल्ट्रासोनोग्राफी चटकाने के पहले, उसके दौरान और उसके बाद की गई।

प्रयोग के दौरान 40 सहभागियों के 400 एमसीपी जोड़ों का अवलोकन किया गया। 400 एमसीपी में 62 के तोड़ने-मरोड़ने पर चटक की आवाज़ सुनाई पड़ी। साथ में अल्ट्रासाउंड तस्वीर में चटकाने की क्रिया के दौरान एक चमक दिखाई दी। अल्ट्रासाउंड तस्वीरों में उत्पन्न चमक की मदद से रेडियोलॉजिस्ट सुनाई पड़ने वाली चटक को 94 प्रतिशत सटीकता से पहचान पाए। इससे इतना तो पता चलता है कि चटकने की आवाज़ का सम्बंध जोड़ में गैस के बुलबुले के दबाव में परिवर्तन से जुड़ा है। अलबत्ता, अभी भी यह कहना मुश्किल है कि पहले क्या होता है – चटकने की आवाज़ या चमक। लेकिन अल्ट्रासोनोग्राफी जांच ने इतना तो स्पष्ट कर ही दिया कि चटकने की आवाज़ गैस का बुलबुला फटने से 10 मिलीसेकंड पहले सुनाई पड़ती है। बुलबुले का फटना सोनोग्राम (sonogram) में एक चमक के रूप में दिखता है।

इस मामले में अलबर्टा विश्वविद्यालय के इमेजिंग विशेषज्ञ रिचर्ड थॉमसन ने यह विचार प्रस्तुत किया है कि हो सकता है कि आवाज़ सुनाई पड़ने से पहले ही बुलबुले का बनना शुरू हो जाता है लेकिन अल्ट्रासाउंड तस्वीर में वह पूरा बनने के बाद ही नज़र आता है। यही वह क्षण होता है जब आपको आवाज़ सुनाई पड़ती है। वैसे थॉमसन ने इसी तरह के शोध के लिए एमआरआई का उपयोग किया था। चूंकि उसमें प्रति सेकंड बहुत ज़्यादा तस्वीरें नहीं मिलती हैं (जो उस अध्ययन की सीमा थी) इसलिए वे यह नहीं बता पाए थे कि पहले आवाज़ आती है या बुलबुला बनता है।

और इस सिलसिले में सबसे हालिया शोध चंद्रन सूजा और अब्दुल बरकत (2018) का रहा है। इन्होंने साइन्टिफिक रिपोर्ट्स में उंगलियां चटकाने की आवाज़ की व्याख्या करते हुए एक गणितीय मॉडल प्रकाशित किया था। उनका मत था कि एमआरआई या सिनेरेडियोग्राफी जैसी तकनीकों में विभेदन बहुत कम है (क्रमश: 80-100 फ्रेम प्रति सेकंड और 100 फ्रेम प्रति सेकंड)। जबकि चटकने की आवाज़ का स्रोत पकड़ने के लिए कम से कम 1200 फ्रेम प्रति सेकंड का विभेदन चाहिए। इसलिए उन्होंने एक गणितीय मॉडल (mathematical model) विकसित किया।

उन्होंने दर्शाया कि उनके मॉडल में बुलबुले के आंशिक फूटने के ध्वनि हस्ताक्षर वैसे ही रहे जैसे प्रयोगों में देखे गए थे। तो संभव है कि वाष्प गुहा (vapour cavity) बनने और आंशिक रूप से बुलबुलों के फूटने को मिलाकर चटक की आवाज़ आती हो।

उंगलियां चटकाने का सुख

तो, सवाल यह है कि यदि जोड़ों में सिर्फ गैस के बुलबुले पिचक और फूट रहे हैं तो सुकून क्यों मिलता है।

इस संदर्भ में कैलिफोर्निया के अस्थि सर्जन रोजे मेलिकन का मत है कि जोड़ों की त्वरित हरकत वहां उपस्थित तंत्रिकाओं को भी उत्तेजित कर सकती है, जिसकी वजह से दर्द में कमी आती है और एंडॉर्फिन (endorphin) नामक पदार्थ मुक्त होते हैं। वैसे यह बात अभी प्रमाणित नहीं हुई है।

लगता है कि मामला सिर्फ शरीर की अंदरुनी क्रियाओं यानी कार्यिकी का न हो। कुछ मनोवैज्ञानिक पहलू भी इसमें जुड़े हैं। जैसे एक तो यह है कि उंगलियां चटकाना कुछ लोगों के लिए एक आदत बन जाती है। और जब इससे सुकून मिलता है तो इस आदत को बढ़ावा मिलता है। कुछ लोगों को सिर्फ चटकने की आवाज़ सुनना अच्छा लगने लगता है। लेकिन कहते हैं कि कभी-कभी आसपास के लोगों को इससे परेशानी होती है।

नुकसान

अक्सर अत्यधिक उंगलियां चटकाने वालों को टोका जाता है। कहा जाता है कि इससे नुकसान होगा, उंगलियां कमज़ोर पड़ जाएंगी, गठिया (arthritis) का खतरा बढ़ जाएगा। इस मामले में किए गए कई अध्ययनों में ऐसी सारी चेतावनियों को खारिज किया गया है। हां, कुछ अध्ययनों में यह बात ज़रूर सामने आई है कि आदतन उंगलियां चटकाने से व्यक्ति की उंगलियों में सूजन आ सकती है या पकड़ कमज़ोर पड़ सकती है।

उंगलियां चटकाने के हानिकारक असर को लेकर कई प्रयोग किए गए हैं। इनमें से सबसे मशहूर प्रयोग कैलिफोर्निया के एक चिकित्सक डॉ. डोनाल्ड एल. उन्गर ने किया था। वे यह देखना चाहते थे कि क्या उंगलियां चटकाने से गठिया (आर्थ्राइटिस) होता है। उन्होंने पूरे 50 साल तक अपने बाएं हाथ की उंगलियों को रोज़ाना कम से कम दो बार चटकाया जबकि दाएं हाथ को अछूता छोड़ रखा। बाद में जब उन्होंने दोनों हाथों का एक्सरे (X-Ray) निकाला तो उनमें कोई अंतर नहीं था। किसी में भी गठिया का कोई प्रमाण नहीं था।

खैर, यह तो हुई एक व्यक्ति के निजी प्रयोग की बात लेकिन ज़्यादा व्यापक अध्ययनों के परिणाम भी ऐसे ही रहे हैं।

उदाहरण के लिए, 2017 में हैंड सर्जरी एंड रिहैबिलिटेशन जर्नल में प्रकाशित एक पर्चे में 35 उंगलियां चटकाने वालों और न चटकाने वालों की तुलना की गई थी। आदतन उंगलियां चटकाने वाले लोग दिन में कम से कम पांच बार ऐसा करते थे। यह देखा गया कि उंगलियां चटकाने वालों में मेटाकार्पल के सिरों की उपास्थियां (cartilages) अपेक्षाकृत मोटी हो गई थीं। अलबत्ता, उनके हाथों की पकड़ पर कोई नकारात्मक असर नहीं हुआ था।

ऐसा एक प्रयोग 1975 में रॉबर्ट स्वीज़ी और स्टुअर्ट स्वीज़ी ने किया था। इसके परिणाम वेस्टर्न जर्नल ऑफ मेडिसिन में प्रकाशित हुए थे। इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि कम उम्र में उंगलियां चटकाने की आदत से बुढ़ापे में एमसीपी जोड़ों में किसी क्षतिकारक परिवर्तन का कोई प्रमाण नहीं है।

दूसरी ओर, जे. कोस्टेलोन और डी. एक्सलरॉड द्वारा एनल्स ऑफ दी रुमेटिक डिसीज़ेस में 1990 में प्रकाशित अध्ययन में 45 वर्ष से अधिक उम्र के 300 मरीज़ों को शामिल किया गया था। 300 में से 74 आदतन उंगलियां चटकाने वाले थे जबकि 226 गैर-चटकाने वाले। दोनों समूहों के हाथों में अतिरिक्त गठिया का कोई लक्षण नहीं दिखा। अलबत्ता, आदतन उंगलियां चटकाने वालों के हाथों में सूजन और पकड़ की कमज़ोरी की संभावना ज़्यादा पाई गई। एक अवलोकन यह था कि उंगलियां चटकाने की आदत का सम्बंध शारीरिक श्रम वाले काम, नाखून चबाने, धूम्रपान और शराब पीने से होता है।

बैंगलुरु प्रयोग

यह प्रयोग एस. कांचन तथा आर. मेघना द्वारा बेंगलुरु में 18-25 वर्ष के 150 कॉलेज छात्रों पर किया गया था। जर्नल ऑफ इकोफिज़ियोलॉजी एंड हेल्थ में 2025 में प्रकाशित इस अध्ययन का निष्कर्ष था कि आदतन उंगलियां चटकाने के प्रमुख हाथ (यानी जिस हाथ का वह व्यक्ति प्रमुखता से इस्तेमाल करता है – डॉमिनेन्ट हाथ) के एमसीपी जोड़ों की गतिशीलता में कमी आती है और पकड़ की मज़बूती (hand grip) भी कम हो जाती है।

2001 में क्रिस्टोफर पीटरसन, चेरिल बार्नेस और लोरेटा डेविस ने उंगलियां चटकाने को लेकर एक अलग ही किस्म का अध्ययन किया था। पीडियॉट्रिक डर्मेटोलॉजी में प्रकाशित इस अध्ययन में जोड़ों पर आने वाले उभारों (नकल पैड्स) पर ध्यान दिया गया था। प्राय: इन सूजननुमा उभारों का कारण पता नहीं चल पाता। और इनके प्रभावों की बात बहुत कम हुई है। यह अध्ययन एक ही मरीज़ (14 वर्षीय बच्ची) पर किया गया था जिसकी कई उंगलियों के जोड़ों पर 3 साल से गठान जैसी दिख रही थीं। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये गठानें (knots) उसकी उंगलियां चटकाने की आदत के चलते उभरी हैं।

ऐसा ही लीक से हटकर एक और अध्ययन गौरतलब है। एडवर्ड रॉस, जेनिफर पॉग-मिलर और रॉबर्ट नेप्पो का यह अध्ययन क्लीनिकल किडनी जर्नल में 2023 में प्रकाशित हुआ था। देखा गया कि किडनी रोग के अंतिम दौर के मरीज़ों में सेकंडरी हायपरथॉयराइडिज़्म (यानी थॉयराइड की अति-सक्रियता) प्रकट होती है और मांसपेशियों और कंकाल तंत्र पर उसके विविध लक्षण नज़र आते हैं। इन शोधकर्ताओं के कई मरीज़, जो डायलिसिस पर थे, ने स्वत: बताया था कि उनमें अब उंगलियां चटकाने की क्षमता नहीं रही। आश्चर्य की बात यह रही कि पैराथॉयराइड ग्रंथि को सर्जरी के ज़रिए निकाल देने के बाद उंगली चटकाने की क्षमता लौट आई। मतलब है कि पैराथॉयराइड से सम्बंधित खनिज लवण तथा अस्थि विकारों (bone disorders) का असर उंगलियां चटकाने के कार्यिकीय व यांत्रिकी आधार पर होता है।

कुल मिलाकर लगता है कि उंगलियां चटकाने के तात्कालिक या दीर्घावधि नुकसान का कोई सुस्पष्ट प्रमाण नहीं है। हालांकि कुछेक अध्ययनों में नकारात्मक परिणाम दिखे हैं। लेकिन सभी शोधकर्ता यह चेतावनी दोहराते हैं कि शरीर के बाकी जोड़ों के साथ खिलवाड़ सही नहीं है क्योंकि उनमें से कई जोड़ सिनोवियल जोड़ (synovial joints) नहीं होते। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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अब लैब में बनेंगे ‘मिनी’ मस्तिष्क!

हालिया हुए एक शोध में विज्ञान और चिकित्सा जगत को एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त हुई है। नेचर में प्रकाशित शोध के अनुसार प्रयोगशाला में मानव मस्तिष्क के हू-ब-हू छोटे मॉडल  विकसित कर लिए गए हैं। इन्हें ‘ब्रेन ऑर्गेनॉइड’ (brain organoid) या ‘मिनी ब्रेन’ कहा जाता है। 

पिछले कुछ अन्य अध्ययनों में भी ऐसे मिनी ब्रेन विकसित किए गए थे लेकिन वे थोड़े समय में – केवल कुछ हफ्तों-महीनों के भीतर – नष्ट हो जाते थे। उनकी मदद से मस्तिषक के केवल शुरुआती विकास का अध्ययन ही मुमकिन था। लेकिन इस ताज़ा अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस ‘मिनी ब्रेन’ (mini brain) को पांच साल से अधिक समय तक सफलतापूर्वक जीवित और विकासमान रखा।  

हारवर्ड युनिवर्सिटी की प्रोफेसर पाओला अर्लोटा और उनकी टीम ने 34 मिनी ब्रेन विकसित करके उनका अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि प्रयोगशाला में विभाजन कर रहे कोशिकाओं के समूह समय के साथ बिल्कुल उसी गति और क्रम से वृद्धि कर रहे थे जैसे मां के गर्भ में बच्चे (human embryo) का मस्तिष्क विकसित होता है। विकास के चरण कुछ इस प्रकार थे – 15 दिन से 2 महीने में पहली तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 3 से 6 महीने में दूसरी तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 12 महीने में नवजात शिशु के मस्तिष्क जैसी स्थिति और पांच साल तक कोशिकाओं के चारों तरफ प्रोटीन की सुरक्षा परत बनना (myelination) और परिपक्व होना। 

शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग भी किया। उन्होंने नई (15 दिन पुरानी) और परिपक्व (9 से 12 महीने पुरानी) कोशिकाओं का एक साथ 15 दिनों तक विभाजन करवाया। नतीजा यह था कि नई कोशिकाओं ने शुरुआती तंत्रिका कोशिकाएं बनाई, जबकि परिपक्व कोशिकाओं ने उनकी परिपक्वता के अनुसार परिपक्व तंत्रिका कोशिकाओं का ही विकास किया। इस प्रयोग से यह साबित हुआ कि मस्तिष्क की कोशिकाओं में जैविक स्मृति (biological memory) होती है, और वे नए माहौल में भी अपनी जैविक उम्र के अनुसार ही काम करती हैं।

पिछले अध्ययनों में मस्तिष्क की मुख्य कोशिकाएं पोषण की कमी से जल्दी नष्ट हो जाती थीं। इससे निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने एक खास संशोधित तरल (ब्रेनफिज़) (brainphys) का इस्तेमाल किया। ब्रेनफिज़ की मदद से तंत्रिका कोशिकाएं न केवल लंबे समय तक क्रियाशील रहीं, बल्कि उनके बीच जटिल विद्युतीय संकेतों (complex electric signals) का प्रेषण भी होने लगा। 

शोधकर्ताओं को लगता है कि यह अनुसंधान शिज़ोफ्रेनिया और ऑटिज़्म जैसी मानसिक और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के कारणों और लक्षणों को बेहतर तरीके से समझने में सहायक होगा, क्योंकि ये बीमारियां एक खास उम्र के बाद ही सामने आती हैं। इसके अलावा, मरीज़ों की स्टेम कोशिकाओं (stem cells) से मिनी ब्रेन विकसित करके नई दवाइयों का सुरक्षित परीक्षण भी संभव हो सकेगा।

भविष्य में शोधकर्ता संवेदनाओं से युक्त ऐसे मिनी ब्रेन बनाने की कोशिश करने जा रहे हैं जो सुनने, देखने, और छूने जैसे संकेतों को महसूस करने में भी सक्षम हों। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चौदह वर्ष की बहस के बाद एक बीमारी का नया नाम

ऋषि राज राय

पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, जिसे PCOS कहा जाता था, अब आधिकारिक रूप से पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) कहलाएगा। यह घोषणा 12 मई 2026 को लैंसेट में प्रकाशित एक अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्र में हुई। इस नाम-परिवर्तन के पीछे चौदह वर्षों की प्रक्रिया है, जिसमें छह महाद्वीपों से 22,000 से अधिक मरीज़ों, डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और मरीज़-संगठनों की राय ली गई। अगुवाई ऑस्ट्रेलिया के मोनाश विश्वविद्यालय की हेलेना टीड ने की, और फिनलैंड के ओलू विश्वविद्यालय की तेरही पिल्टोनन सहायक रहीं।नाम बदलने का कारण वैज्ञानिक असंतोष था। PCOS का नाम अंडाशय पर बनने वाले सिस्ट (गांठ – त्वचा के नीचे या शरीर के अंदर स्थित एक बंद थैली जिसमें तरल पदार्थ, हवा या मुलायम पदार्थ भरा होता है) पर आधारित था। लेकिन ये गांठें असल में गांठें नहीं होतीं। ये अपरिपक्व फॉलिकल (पुटिकाएं) (immature follicle) होती हैं, जिन्हें अल्ट्रासाउंड जांच में गांठ (सिस्ट) जैसा दिखने के कारण यह नाम मिला था। इसी शोध समूह का एक अध्ययन दिखाता है कि इस बीमारी वाली महिलाओं में असामान्य अंडाशयी सिस्ट का प्रसार बाकी आबादी से अलग नहीं है। यानी नाम जिस लक्षण पर आधारित था, वह न रोग-विशिष्ट था, न अनन्य।

इस बीमारी की असली प्रकृति अंडाशय तक सीमित नहीं है। यह एक बहु-तंत्रगत अंत:स्रावी-चयापचय अवस्था है, जिसमें इंसुलिन प्रतिरोध, एंड्रोजेन हार्मोन की अधिकता, हाइपोथैलेमस-पिट्यूटरी अनियमितता, त्वचा के लक्षण, वज़न में परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य पर असर वगैरह शामिल हैं। PMOS (Polyendocrine Metabolic Ovarian Syndrome) वाली महिलाओं में टाइप-2 डायबिटीज़ का जोखिम कई गुना अधिक होता है, हृदय रोग का जोखिम बढ़ा हुआ होता है, और मानसिक अवसाद कहीं ज़्यादा आम है। इनमें से कोई भी अकेले अंडाशय की बीमारी नहीं है।

पुराने नाम (PCOS) ने तीन बड़ी समस्याएं पैदा की थीं। पहली, निदान में देरी। लक्षण चूंकि त्वचा, वज़न, बालों, या मनःस्थिति के होते हैं, महिलाएं अलग-अलग विशेषज्ञों के पास चक्कर काटती रहती हैं, और स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynaecologist) के पास पहुंचने पर ही कभी-कभार निदान हो पाता है। दूसरी, टुकड़ों-टुकड़ों में इलाज। एक डॉक्टर बालों की समस्या, दूसरा अनियमित माहवारी, तीसरा वज़न की दिक्कत पर ध्यान देता; कोई पूरी तस्वीर नहीं देखता था। और तीसरी लांछन का डर। ‘ओवेरियन’ (ovarian) शब्द के कारण कई देशों में महिलाओं को अपनी बीमारी बताने में शर्म आती थी।

नाम-परिवर्तन की प्रक्रिया अपने आप में गौरतलब है। इसमें अमेरिकन एंडोक्राइन सोसाइटी, अंतर्राष्ट्रीय एंड्रोजेन एक्सेस और PCOS सोसाइटी, और ब्रिटेन के वेरिटी सहित 56 अकादमिक, चिकित्सा और मरीज़ संगठनों ने भाग लिया। वर्ष 2017, 2023 और 2025 में तीन वैश्विक सर्वेक्षण हुए। अंतिम सर्वेक्षण में लगभग 14,360 मरीज़ और स्वास्थ्य पेशेवर शामिल हुए। कार्यशालाओं में विश्व के हर क्षेत्र से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ। जब पूछा गया कि नए नाम से क्या उम्मीद करनी चाहिए, तो तीन बातें सबसे ऊपर थीं: नया नाम लांछन कम करे, आसानी से समझ आए और वैज्ञानिक रूप से सही हो।

नाम बदलने पर आपत्ति भी दर्ज हुई। अमेरिका के दो प्रमुख मरीज़-संगठन नेताओं, अंजेला ग्रासी और साशा ऑटी का कहना है कि PMOS “बहुत बदला हुआ तो है लेकिन पर्याप्त नहीं बदला है।” उनका मुख्य तर्क यह है कि नए नाम में ‘ओवेरियन’ शब्द बरकरार है, जो बीमारी के पुरुष रूप की संभावना को अनदेखा करता है।

हाल के अध्ययन बताते हैं कि PMOS वाली महिलाओं के पुरुष रक्त-सम्बंधियों में भी इंसुलिन प्रतिरोध, कम उम्र में गंजापन, और चयापचय जोखिम बढ़ा हुआ मिलता है। यानी बीमारी की जड़ में जो अंत:स्रावी चयापचय (endocrine system) असंतुलन है, वह सिर्फ अंडाशय में नहीं होता बल्कि पुरुषों में भी हो सकता है।

भारत के लिए यह बहस विशेष रूप से प्रासंगिक है। यहां PMOS का प्रसार 8 से 22 प्रतिशत के बीच आंका गया है; और शहरी युवा महिलाओं में यह और अधिक हो सकता है। लेकिन भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था इसे अभी भी मुख्यतः स्त्री रोग (gynaecological) के रूप में देखती है, न कि चयापचय (metabolism) से सम्बंधित बीमारी के रूप में। परिणाम यह है कि करोड़ों महिलाएं बिना निदान के जीती हैं, या केवल जन्म-नियंत्रण गोलियों से लक्षण दबाती हैं, जबकि चयापचय जोखिम पीछे-पीछे बढ़ता रहता है। नए नाम का असर तभी होगा जब सरकारी दिशानिर्देश, मेडिकल कॉलेजों का पाठ्यक्रम, और आयुष्मान भारत जैसे कार्यक्रम इसे चयापचय बीमारी की तरह देखना शुरू करें।

नए नाम से निदान के मानदंड (diagnosis) और इलाज तुरंत नहीं बदलेंगे। जो बदलेगा वह है भाषा, और भाषा के साथ ध्यान की दिशा। लैंसेट में शोध दल ने साफ किया है कि कई वर्षों तक दोनों नाम साथ चलेंगे, चिकित्सा रिकॉर्ड में दोनों दिखाई देंगे, और नए नाम को धीरे-धीरे अपनाया जाएगा।

वैसे चिकित्सा के इतिहास (Medical history) में यह पहला नाम-परिवर्तन नहीं है। बाइपोलर डिसऑर्डर (पहले उन्मादी अवसाद या मैनिक डिप्रेशन कहा जाता था), डाउन सिंड्रोम (पहले मंगोलिज़्म या मंगोलियन पागलपन), और पेट के अल्सर (पूर्व में अपच) के मामले में हर बार नाम केवल शब्द नहीं था। नाम ने तय किया कि डॉक्टर क्या देखेंगे, शोधकर्ता क्या पूछेंगे, और मरीज़ अपनी बीमारी को कैसे समझेंगे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दिल की धड़कन दिमाग के काम को प्रभावित करती है

एक प्रयोग चल रहा है। इसमें शामिल प्रतिभागी को एक आसान-सा काम दिया गया है। सामने एक पर्दे पर दो वर्ग दिख रहे हैं। जैसे ही किसी वर्ग का रंग बदले, प्रतिभागी को एक बटन दबा देना है। अलबत्ता, प्रतिभागी को यह मालूम नहीं है कि दो में से एक वर्ग का रंग तब बदलता है जब उसका दिल सिकुड़ता (heart contraction) है और दूसरे का रंग दो धड़कनों के बीच कभी बदलता है। लेकिन दिमाग इस कारस्तानी को पकड़ लेता है। सैकड़ों ऐसे परीक्षणों में देखा गया कि दिमाग उन दो वर्गों के लिए अलग-अलग प्रतिक्रिया देता है।

2024 में न्यूरोइमेज में प्रकाशित इस अध्ययन के परिणाम बताते हैं कि दिल की धड़कन खामोशी से दिमाग द्वारा सूचनाओं की प्रोसेसिंग को प्रभावित करती है। इससे एक और चिंताजनक सरोकार उभरता है: शरीर की जिन अंदरुनी लयों (internal rythm) को सामान्यत: पृष्ठभूमि में चल रहा शोर (बैकग्राउंड नॉइस) माना जाता है, वे शायद तंत्रिका विज्ञान में किए जा रहे प्रयोगों को प्रभावित करती हैं। कई शोधकर्ताओं ने इस मामले में चेतावनी प्रकट की है और एक शोध पत्र में तो अध्ययनों में इन लयों का हिसाब रखने और उन्हें परिणामों की व्याख्याओं में शामिल करने के लिए मानक दिशानिर्देश भी प्रस्तुत किए गए हैं।

वैज्ञानिकों को यह बात तो सालों से पता रही है कि दिमाग शरीर के अंदर से मिलने वाले संदेशों का ध्यान रखता है। इसे इंटरोसेप्शन (Introception) कहते हैं। उदाहरण के लिए, दिल की हर धड़कन रक्त वाहिनियों के ज़रिए दबाव की एक तरंग प्रेषित करती है और दिमाग में उपस्थित संवेदी मार्गों को सक्रिय कर देती है। ये दिमाग में फीडबैक का सबब बनते हैं। अब नई बात यह है कि ये संदेश प्रयोगों को प्रभावित कर सकते हैं; ऐसे प्रयोगों को भी जिनका सम्बंध इंटरोसेप्शन से नहीं है।

न्यूरोइमेज में प्रकाशित अध्ययन में वर्गों के रंग परिवर्तन को भांपने की प्रतिभागियों की क्षमता पर दिल की धड़कन के समय अंतराल से कोई फर्क नहीं देखा गया। लेकिन खोपड़ी पर लगे इलेक्ट्रो-एन्सिफेलोग्राफी (ईईजी) यंत्र की रिकॉर्डिंग ने कुछ अलग ही कहानी बयान कर दी।  विज़ुअल कॉर्टेक्स (मस्तिष्क का वह हिस्सा जो आंखों से मिलने वाले संकेतों को पकड़ता और समझता है) (visual cortex) ने तब कम सशक्त प्रतिक्रिया दी जब रंग परिवर्तन दिल के सिकुड़ने के दौरान हुआ। शोधकर्ताओं का मत है कि शायद जब रंग परिवर्तन का संदेश आया तो दिल के सिकुड़ने का संदेश दिमाग का ध्यान आकर्षित करने के लिए होड़ कर रहा था।

इसी तरह के मुद्दे ब्रेन-स्कैनिंग (एमआरआई वगैरह) अनुसंधान में भी उभरे हैं। जैसे यह पता चला है कि दिल की धड़कन और श्वसन ऐसी गतियां और उतार-चढ़ाव उत्पन्न कर सकते हैं जो फंक्शनल एमआरआई डैटा (funtional MRI data) में विकृतियां पैदा कर दें। और तो और, इन विकृतियों को सुधारने की मानक विधियां शायद पूरी तरह कारगर नहीं हैं। 

ये परिणाम सुझाते हैं कि तंत्रिका वैज्ञानिकों को अपने डैटा में दिल की धड़कन से सम्बंधित प्रभावों से निपटना होगा। कई शोधकर्ता ऐसा करते भी हैं लेकिन अप्रैल में सायकोफिज़ियोलॉजी में प्रकाशित पर्चा और अधिक मानकीकरण की ज़रूरत रेखांकित करता है। ईईजी और मैग्नेटोएन्सिफेलोग्राफी पर दिल की धड़कन के असर सम्बंधी 132 इंसानी अध्ययनों की समीक्षा में पता चला कि ये सभी बहुत अलग-अलग विधियों का उपयोग करते हैं, और प्राय: रिपोर्ट भी नहीं करते। इसके चलते कभी-कभी इनके परिणामों की आपस में तुलना मुश्किल या नामुमकिन हो जाती है। इसे ध्यान में रखते हुए मैंक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर ह्यूमैन कॉग्निटिव एंड ब्रेन साइन्सेस के पी. स्टाइनफैथ और उनके साथियों ने एक मानक प्रोटोकॉल (standard protocol) प्रकाशित किया है। (स्रोत फीचर्स)

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मैच में कूलिंग ब्रेक और ठंडक का विज्ञान

फुटबॉल, हॉकी, बास्केटबॉल, टेनिस, बेडमिंटन जैसे खेलों में खिलाड़ियों (sportsman) को काफी भाग-दौड़ करनी पड़ती है। इस वजह से शरीर काफी गर्म हो जाता है और ठंडक देने के लिए व्यवस्था करनी होती है। इस मकसद से 2026 के फुटबॉल विश्व कप में हाइड्रेशन ब्रेक (hydration break) रखे गए थे। फीफा का कहना है कि ये ब्रेक खिलाड़ियों की भलाई को ध्यान में रखकर जोड़े गए थे।

अलबत्ता, देखा यह गया कि खेल रुकते ही ड्रिंक्स मैदान पर पहुंचते, खिलाड़ी मैदान पर ही बने रहते और विज्ञापनों का सिलसिला शुरू हो जाता। कई खेलकूद विज्ञानियों का कहना है कि जिस ढंग से ये ब्रेक्स लागू किए गए वे शरीर के बढ़ते तापमान और उसकी वजह से पैदा होने वाले तनाव को संभालने में नाकाम थे।

दरअसल, कूलिंग ब्रेक्स(cooling breaks) गर्मी के तनाव से उत्पन्न जोखिम के हिसाब से निर्धारित होने चाहिए और उन्हें कारगर ढंग से ठंडक प्रदान करनी चाहिए। लेकिन देखा गया कि इन ब्रेक्स के समय खिलाड़ी धूप में ही खड़े रहकर आगे की रणनीति के निर्देश सुनते रहते थे। ठंडक के लिए सबसे पहली ज़रूरत होगी कि खिलाड़ी छाया में बैठ जाएं।

इस संदर्भ में फीफा (FIFA) के अपने चिकित्सा दिशानिर्देश काफी स्पष्ट हैं: कूलिंग ब्रेक्स का एकमात्र मकसद ऊष्मा-जनित बीमारियों की रोकथाम है और ऐसे ब्रेक्स तभी दिए जाने चाहिए जब पर्यावरणीय ऊष्मा-जनित तनाव एक हद से ज़्यादा हो जाए। इस हद को वेट-बल्ब तापमान 32 डिग्री सेल्सियस माना जाता है। वेट-बल्ब तापमान हवा में नमी की मात्रा और तापमान दोनों का मिला-जुला पैमाना है। हम इंसान अपने शरीर को ठंडा रखने के लिए मूलत: पसीने के वाष्पीकरण पर निर्भर हैं। यदि हवा में पहले से ही ज़्यादा नमी (उमस) है तो पसीने का वाष्पीकरण धीमा पड़ जाता है। इसलिए तापमान अपेक्षाकृत कम हो और हवा में नमी ज़्यादा हो तो गर्मी ज़्यादा महसूस होती है। वेट-बल्ब तापमान (wet bulb temperature) हमें इसी संतुलन की सूचना देता है।

तो फीफा के दिशानिर्देशों के अनुसार कूलिंग ब्रेक की ज़रूरत तब होती है जब वेट-बल्ब तापमान 32 डिग्री से ज़्यादा हो जाए। लेकिन देखा यह गया है कि सारे मैचों में कूलिंग ब्रेक निश्चित अंतराल पर आ जाते हैं, यहां तक कि नियंत्रित जलवायु वाले स्टेडियम में भी। यानी इन ब्रेक्स का सम्बंध ऊष्मीय तनाव (humidity stress) से नहीं रह गया है बल्कि ये रस्म बन गए हैं।

इस बात से तो इन्कार नहीं किया जा सकता कि एथलीट्स (athletes) के लिए गर्मी से परास्त होना आम बात है। लेकिन जर्नल ऑफ साइन्स एंड मेडिसिन इन स्पोर्ट्स तथा ब्रिटिश जर्नल ऑफ स्पोर्ट्स मेडिसिन में एच. ए. ब्राउन व उनके साथियों के शोधपत्र में इस मामले में एक परीक्षण के परिणाम प्रकाशित किए हैं जो ऐसे कूलिंग ब्रेक्स के अर्थहीन होने की बात कहते हैं।

ब्राउन एवं उनके साथियों ने कुछ प्रतिभागियों के साथ एक प्रयोग किया था। यह 40 डिग्री सेल्सियस तथा 41 प्रतिशत आर्द्रता पर खेले गए 90 मिनट के एक फुटबॉल मैच का सिमुलेशन (simulation) था। इस दौरान उन्होंने ठंडक के तीन तरीके अपनाए थे – निष्क्रिय ब्रेक, सक्रिय ठंडक वाले ब्रेक तथा रिकवरी पीरियड। तीनों में ज़बरदस्त अंतर देखने को मिले।

चलते खेल में छोटे-छोटे ब्रेक्स जिनमें बर्फ में भीगे तौलियों और कोल्ड-ड्रिंक्स का इस्तेमाल किया गया था और साथ में थोड़ा लंबा हाफ-टाइम ब्रेक (long half-time break) दिया गया था, उनमें शरीर का केंद्रीय तापमान भी कम रहा और कार्डियो-वैसक्यूलर तनाव (cardiovascular stress) भी काफी कम रहा। दूसरी ओर, ठंडक देने के सक्रिय प्रयासों के बिना मिले ब्रेक्स ने नगण्य राहत पहुंचाई। 

दरअसल, महत्व खेल के दौरान मिलने वाली रुकावट का नहीं है, बल्कि इसका है कि इस रुकावट का इस्तेमाल कैसे किया जाता है। ब्राउन का कहना है कि ठंडक हासिल करने के सक्रिय प्रयासों के बिना ऐसे ब्रेक्स बेकार ही होंगे। और यह बात सिर्फ खिलाड़ियों के लिए नहीं बल्कि सामान्य मानव स्वास्थ्य की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है – चाहे वे निर्माण स्थलों के मज़दूर हों, खेत पर काम कर रहे श्रमिक हों। इन सभी के लिए हस्तक्षेप की रणनीति एक सी होगी। इसमें विश्राम, कार्यिकीय क्षति की रोकथाम और स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए पानी की आपूर्ति जैसे तत्व शामिल होंगे।

ब्राउन के मुताबिक फुटबॉल पर ध्यान देना इस लिहाज़ से महत्वपूर्ण है कि जब आप ऐसे प्रतिष्ठित आयोजनों में सही तरीके नहीं अपनाते तो एक गलत संदेश देते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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मस्तिष्क हिसाब रखता है कि नींद कब पूरी हो गई

नींद की कमी (sleep deprivation) बड़ी समस्या है और कई हादसों का कारण बनती है। हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट में नींद की गुणवत्ता और नींद की कमी के बारे में कुछ महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त हुई है। वॉशिंगटन युनिवर्सिटी की तंत्रिका वैज्ञानिक याओ चेन और उनकी टीम ने चूहों पर शोध करके यह जानने की कोशिश की कि मस्तिष्क कैसे भांप लेता है कि अब जागने का वक्त हो गया है।

वैसे तो नींद पर काफी अध्ययन हुए हैं लेकिन ज़्यादातर शोध मस्तिष्क की नींद से जागने की क्रियाविधि या फिर लंबे समय तक नींद की कमी से होने वाले बदलावों पर केंद्रित रहे हैं। इसलिए यह पहेली ही रही कि मस्तिष्क यह हिसाब-किताब कैसे रखता है कि एक लगातार नींद में कितनी देर सो लिया। महत्वपूर्ण बात यह है कि वैज्ञानिकों को ऐसे रासायनिक संकेत मिले हैं जो मस्तिष्क में ‘नींद के टाइमर’ (sleep timer) की तरह काम करते हैं।

शोधकर्ताओं ने चूहों के मस्तिष्क में प्रोटीन काइनेज़-A (PKA) (protein kinase) नामक एंज़ाइम के असर की जांच की। इसके असर को वास्तविक समय में जांचने के लिए एक खास फ्लोरेसेंट सेंसर (flourescent sensor) का इस्तेमाल किया गया। हालांकि, पहले से ही पता था कि यह एंज़ाइम मनुष्यों में जाग्रत अवस्था से जुड़ा है। यह मस्तिष्क की कोशिकाओं की सतह पर प्रोटीन टैग (रासायनिक चिंह) जोड़ता है। जांच में पाया गया कि जाग्रत चूहों में ये प्रोटीन टैग लगातार बन रहे थे और उनका स्तर अधिक और स्थिर था। दूसरी ओर, नींद की अवस्था में इनका स्तर वक्त के साथ नींद के पूरे सत्र में धीरे-धीरे कम होता गया। जब नींद में व्यवधान पैदा हुआ तो टैग का स्तर (जो कम हो रहा था) अचानक बढ़कर चरम सीमा तक पहुंच गया और वापिस नींद लगने पर टैग का स्तर फिर से धीरे-धीरे घटने लगा।  

शोधकर्ताओं के अनुसार यह प्रोटीन टैग नींद की कुल अवधि के साथ-साथ व्यवधान की आवृत्ति का भी हिसाब रखता है। चूंकि यह टैग नींद में आए व्यवधानों (disturbances) का भी हिसाब रखता है, तो इसकी मदद से प्रति क्षण यह बेहतर अनुमान लगाया जा सकता है कि किसी समय चूहे के जाग जाने की कितनी संभाविता है बनिस्बत यह देखकर कि कोई चूहा कितनी देर से सो रहा है।

अलबत्ता, टैगिंग का स्तर (tagging level) किसी अलार्म की तरह काम नहीं करता जो आपको झटके से जगा दे। वह काम तो कोई शोर भी कर सकता है। दरअसल, टैगिंग बताता है कि आपका शरीर कब कार्यिकीय रूप से जागने के लिए तैयार है।

जब शोधकर्ताओं ने चूहों को देर तक जगाए रखने के बाद सोने दिया, तो PKA संकेत सामान्य ऊंघने की तुलना में कम हो गया। इससे पता चलता है कि PKA संकेत यह भी बता सकता है कि नींद के कितने घाटे की पूर्ति हो गई है।

वैज्ञानिकों का मानना है कि यह जानकारी भविष्य में रोज़ाना की अधूरी नींद और नींद की गुणवत्ता (sleep quality) की जांच विकसित करने में मददगार हो सकती है। भविष्य में, ड्राइवरों, आपातकर्मियों, तनाव व कम नींद वाले कामों में लगे लोगों की जांच हो सकेगी और नींद की कमी से होने वाले जोखिम और बड़े हादसों से बचा जा सकेगा। (स्रोत फीचर्स)

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