ऋषि राज राय

पॉलीसिस्टिक ओवरी सिंड्रोम, जिसे PCOS कहा जाता था, अब आधिकारिक रूप से पॉलीएंडोक्राइन मेटाबोलिक ओवेरियन सिंड्रोम (PMOS) कहलाएगा। यह घोषणा 12 मई 2026 को लैंसेट में प्रकाशित एक अंतर्राष्ट्रीय शोध पत्र में हुई। इस नाम-परिवर्तन के पीछे चौदह वर्षों की प्रक्रिया है, जिसमें छह महाद्वीपों से 22,000 से अधिक मरीज़ों, डॉक्टरों, शोधकर्ताओं और मरीज़-संगठनों की राय ली गई। अगुवाई ऑस्ट्रेलिया के मोनाश विश्वविद्यालय की हेलेना टीड ने की, और फिनलैंड के ओलू विश्वविद्यालय की तेरही पिल्टोनन सहायक रहीं।नाम बदलने का कारण वैज्ञानिक असंतोष था। PCOS का नाम अंडाशय पर बनने वाले सिस्ट (गांठ – त्वचा के नीचे या शरीर के अंदर स्थित एक बंद थैली जिसमें तरल पदार्थ, हवा या मुलायम पदार्थ भरा होता है) पर आधारित था। लेकिन ये गांठें असल में गांठें नहीं होतीं। ये अपरिपक्व फॉलिकल (पुटिकाएं) (immature follicle) होती हैं, जिन्हें अल्ट्रासाउंड जांच में गांठ (सिस्ट) जैसा दिखने के कारण यह नाम मिला था। इसी शोध समूह का एक अध्ययन दिखाता है कि इस बीमारी वाली महिलाओं में असामान्य अंडाशयी सिस्ट का प्रसार बाकी आबादी से अलग नहीं है। यानी नाम जिस लक्षण पर आधारित था, वह न रोग-विशिष्ट था, न अनन्य।
इस बीमारी की असली प्रकृति अंडाशय तक सीमित नहीं है। यह एक बहु-तंत्रगत अंत:स्रावी-चयापचय अवस्था है, जिसमें इंसुलिन प्रतिरोध, एंड्रोजेन हार्मोन की अधिकता, हाइपोथैलेमस-पिट्यूटरी अनियमितता, त्वचा के लक्षण, वज़न में परिवर्तन और मानसिक स्वास्थ्य पर असर वगैरह शामिल हैं। PMOS (Polyendocrine Metabolic Ovarian Syndrome) वाली महिलाओं में टाइप-2 डायबिटीज़ का जोखिम कई गुना अधिक होता है, हृदय रोग का जोखिम बढ़ा हुआ होता है, और मानसिक अवसाद कहीं ज़्यादा आम है। इनमें से कोई भी अकेले अंडाशय की बीमारी नहीं है।
पुराने नाम (PCOS) ने तीन बड़ी समस्याएं पैदा की थीं। पहली, निदान में देरी। लक्षण चूंकि त्वचा, वज़न, बालों, या मनःस्थिति के होते हैं, महिलाएं अलग-अलग विशेषज्ञों के पास चक्कर काटती रहती हैं, और स्त्री रोग विशेषज्ञ (Gynaecologist) के पास पहुंचने पर ही कभी-कभार निदान हो पाता है। दूसरी, टुकड़ों-टुकड़ों में इलाज। एक डॉक्टर बालों की समस्या, दूसरा अनियमित माहवारी, तीसरा वज़न की दिक्कत पर ध्यान देता; कोई पूरी तस्वीर नहीं देखता था। और तीसरी लांछन का डर। ‘ओवेरियन’ (ovarian) शब्द के कारण कई देशों में महिलाओं को अपनी बीमारी बताने में शर्म आती थी।
नाम-परिवर्तन की प्रक्रिया अपने आप में गौरतलब है। इसमें अमेरिकन एंडोक्राइन सोसाइटी, अंतर्राष्ट्रीय एंड्रोजेन एक्सेस और PCOS सोसाइटी, और ब्रिटेन के वेरिटी सहित 56 अकादमिक, चिकित्सा और मरीज़ संगठनों ने भाग लिया। वर्ष 2017, 2023 और 2025 में तीन वैश्विक सर्वेक्षण हुए। अंतिम सर्वेक्षण में लगभग 14,360 मरीज़ और स्वास्थ्य पेशेवर शामिल हुए। कार्यशालाओं में विश्व के हर क्षेत्र से प्रतिनिधित्व सुनिश्चित हुआ। जब पूछा गया कि नए नाम से क्या उम्मीद करनी चाहिए, तो तीन बातें सबसे ऊपर थीं: नया नाम लांछन कम करे, आसानी से समझ आए और वैज्ञानिक रूप से सही हो।
नाम बदलने पर आपत्ति भी दर्ज हुई। अमेरिका के दो प्रमुख मरीज़-संगठन नेताओं, अंजेला ग्रासी और साशा ऑटी का कहना है कि PMOS “बहुत बदला हुआ तो है लेकिन पर्याप्त नहीं बदला है।” उनका मुख्य तर्क यह है कि नए नाम में ‘ओवेरियन’ शब्द बरकरार है, जो बीमारी के पुरुष रूप की संभावना को अनदेखा करता है।
हाल के अध्ययन बताते हैं कि PMOS वाली महिलाओं के पुरुष रक्त-सम्बंधियों में भी इंसुलिन प्रतिरोध, कम उम्र में गंजापन, और चयापचय जोखिम बढ़ा हुआ मिलता है। यानी बीमारी की जड़ में जो अंत:स्रावी चयापचय (endocrine system) असंतुलन है, वह सिर्फ अंडाशय में नहीं होता बल्कि पुरुषों में भी हो सकता है।
भारत के लिए यह बहस विशेष रूप से प्रासंगिक है। यहां PMOS का प्रसार 8 से 22 प्रतिशत के बीच आंका गया है; और शहरी युवा महिलाओं में यह और अधिक हो सकता है। लेकिन भारत की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था इसे अभी भी मुख्यतः स्त्री रोग (gynaecological) के रूप में देखती है, न कि चयापचय (metabolism) से सम्बंधित बीमारी के रूप में। परिणाम यह है कि करोड़ों महिलाएं बिना निदान के जीती हैं, या केवल जन्म-नियंत्रण गोलियों से लक्षण दबाती हैं, जबकि चयापचय जोखिम पीछे-पीछे बढ़ता रहता है। नए नाम का असर तभी होगा जब सरकारी दिशानिर्देश, मेडिकल कॉलेजों का पाठ्यक्रम, और आयुष्मान भारत जैसे कार्यक्रम इसे चयापचय बीमारी की तरह देखना शुरू करें।
नए नाम से निदान के मानदंड (diagnosis) और इलाज तुरंत नहीं बदलेंगे। जो बदलेगा वह है भाषा, और भाषा के साथ ध्यान की दिशा। लैंसेट में शोध दल ने साफ किया है कि कई वर्षों तक दोनों नाम साथ चलेंगे, चिकित्सा रिकॉर्ड में दोनों दिखाई देंगे, और नए नाम को धीरे-धीरे अपनाया जाएगा।
वैसे चिकित्सा के इतिहास (Medical history) में यह पहला नाम-परिवर्तन नहीं है। बाइपोलर डिसऑर्डर (पहले उन्मादी अवसाद या मैनिक डिप्रेशन कहा जाता था), डाउन सिंड्रोम (पहले मंगोलिज़्म या मंगोलियन पागलपन), और पेट के अल्सर (पूर्व में अपच) के मामले में हर बार नाम केवल शब्द नहीं था। नाम ने तय किया कि डॉक्टर क्या देखेंगे, शोधकर्ता क्या पूछेंगे, और मरीज़ अपनी बीमारी को कैसे समझेंगे। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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