बीजों की सुप्तावस्था के जैविक स्विच की खोज

अनुकूल समय की प्रतीक्षा में बीजों का कई दिनों, महीनों या वर्षों तक निष्क्रिय पड़े रहना किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसे बीज की सुप्तावस्था कहते हैं। बाहर से पूरी तरह से निर्जीव और शांत प्रतीत होने वाला छोटा-सा बीज, अपने भीतर जीवन की एक असीम संभावना को समेटे रहता है। वनस्पति विज्ञान के नज़रिए से, सुप्तावस्था कोई निष्क्रिय अवस्था नहीं है, बल्कि यह पौधे की उत्तरजीविता की रणनीति है। यह वह तंत्र है जो बीज को यह तय करने की क्षमता देता है कि उसे कब अंकुरित होना है और कब अपनी ऊर्जा को बचाकर सुप्त पड़े रहना है।

जैव विकास के लंबे सफर में पौधों में यह प्रणाली इसलिए विकसित हुई है ताकि उनके बीज प्रतिकूल मौसम में अंकुरित होकर नष्ट न हो जाएं। नमी, तापमान और प्रकाश की आदर्श स्थितियां मिलने तक बीज सुप्तावस्था में रहते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि बीज को यह कैसे पता चलता है कि बाहर का मौसम अंकुरण के लिए सुरक्षित है या नहीं? इसी गूढ़ प्रश्न का उत्तर अब वैज्ञानिकों ने एक ‘जैविक स्विच’ के रूप में खोज निकाला है।

आधुनिक कृषि के सामने बीजों, खासकर गेहूं के बीजों, का समय से पहले (पौधे पर लगे-लगे ही) अंकुरित होना एक अत्यंत गंभीर चुनौती बन चुका है। इस समस्या को ‘प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग’ कहा जाता है। कल्पना कीजिए कि गेहूं की फसल खेत में पूरी तरह से पककर कटाई के लिए तैयार है, लेकिन तभी अचानक बेमौसम बारिश हो जाती है या वातावरण में नमी का स्तर अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में, अगर बीजों का सुप्तावस्था तंत्र कमज़ोर है, तो वे बालियों में ही अंकुरित होने लगते हैं। इस अवांछित अंकुरण के कारण अनाज के भीतर मौजूद स्टार्च टूटने लगता है और महत्वपूर्ण एंज़ाइम सक्रिय हो जाते हैं, जिससे गेहूं की गुणवत्ता, उसका पोषण मूल्य और उसके पकाने सम्बंधी गुण पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। वैश्विक स्तर पर, प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग के कारण केवल गेहूं की फसल में हर साल अरबों डॉलर तक का नुकसान होता है।

इस समस्या के मुकम्मल समाधान की दिशा में वनस्पति विज्ञानियों और आनुवंशिकी विशेषज्ञों ने एक युगांतरकारी खोज की है। वैज्ञानिकों ने गेहूं (ट्रिटिकम एस्टिवम) के जीनोम में TaNAC018-7D नामक एक विशेष जीन की पहचान की है। यह जीन एक प्रतिलेखन कारक के रूप में कार्य करता है। प्रतिलेखन कारक वे विशेष प्रोटीन होते हैं जो डीएनए से जुड़कर यह नियंत्रित करते हैं कि कौन सा जीन ‘चालू’ होगा और कौन सा ‘बंद’। TaNAC018-7D एक मास्टर कंट्रोलर या जैविक स्विच की तरह काम करता है, जिसका मुख्य काम बीज के भीतर सुप्तावस्था (डॉरमेंसी) के स्तर को निर्देशित करना है। यह जीन ही अंततः निर्धारित करता है कि बारिश की कुछ बूंदों के संपर्क में आने के बाद बीज को तुरंत अंकुरित हो जाना चाहिए या अभी प्रतीक्षा करनी चाहिए।

इस जैविक स्विच की कार्यप्रणाली को गहराई से समझने के लिए, हमें बीजों के भीतर चल रही अभिक्रियाओं को समझना होगा। बीजों के अंकुरण और सुप्तावस्था के बीच का पूरा संतुलन मुख्य रूप से दो हार्मोन्स – एब्सिसिक एसिड (ABA) और जिबरेलिक एसिड (GA) – के बीच की रस्साकशी है। एब्सिसिक एसिड सुप्तावस्था का रक्षक है, यह बीज को सुप्त बनाए रखता है और अंकुरण को रोकता है। दूसरी ओर, जिबरेलिक एसिड अंकुरण को उकसाता है, यह सुप्तावस्था को तोड़कर बीज के भीतर मौजूद भ्रूण को वृद्धि करने का संकेत देता है। एक स्वस्थ और सुरक्षित बीज में, परिपक्वता के दौरान ABA का स्तर बहुत अधिक होता है और GA का स्तर नगण्य होता है। जब बीज पानी सोखता है तो ABA का स्तर तेज़ी से गिरता है और GA का स्तर बढ़ता है, जिससे अंकुरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

यहीं पर TaNAC018-7D जीन भूमिका निभाता है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि यह प्रतिलेखन कारक सीधे तौर पर उन जीन्स की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करता है जो ABA के निर्माण और संकेतन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। जब बीज बालियों में पक रहे होते हैं, तब TaNAC018-7D सक्रिय होकर यह सुनिश्चित करता है कि बीज के भीतर ABA का एक पर्याप्त और सुरक्षित स्तर बना रहे। इसके साथ ही, यह उन एंज़ाइमों की गतिविधि को भी धीमा कर देता है जो ABA को नष्ट कर सकते हैं। इस प्रकार, यह जीन बीजों की सुप्तावस्था को इतना मज़बूत बना देता है कि फसल कटाई के समय यदि अचानक बेमौसम बारिश हो भी जाए, तो बीजों के भीतर मौजूद ABA का कवच तुरंत न टूटे। इस तरह, बीज बालियों में अंकुरित होने से बच जाते हैं।

इस महत्वपूर्ण जीन की खोज की वैज्ञानिक यात्रा अपने आप में जीन मानचित्रण और आणविक जीवविज्ञान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। गेहूं का जीनोम अत्यंत विशाल और जटिल होता है (यह मानव जीनोम से भी कई गुना बड़ा है), इसलिए इसमें से एक विशिष्ट प्रतिलेखन कारक को ढूंढना भूसे के ढेर में सूई खोजने जैसा था। वैज्ञानिकों ने गेहूं की ऐसी किस्मों का विस्तृत आनुवंशिक अध्ययन किया जो प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी थीं, और उनकी तुलना उन किस्मों से की जो आसानी से अंकुरित हो जाती थीं। उन्नत तकनीकों का उपयोग करके, वे अंततः गुणसूत्र 7D पर उस सटीक स्थान तक पहुंचने में सफल रहे जहां TaNAC018-7D जीन स्थित है।

जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र अनियमित हो गया है। कभी अत्यधिक सूखा पड़ता है तो कभी फसल कटाई के समय भारी बारिश और ओलावृष्टि हो जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी हमने पिछले कुछ वर्षों में देखा है कि मार्च-अप्रैल के महीनों में, जब गेहूं व रबी की अन्य फसलें कटाई के लिए तैयार होती हैं, पश्चिमी विक्षोभ के कारण अचानक बारिश हो जाती है। ऐसी अनियमित मौसमी घटनाओं से निपटने के लिए हमें ऐसी फसलों की आवश्यकता है जो पर्यावरण के इन झटकों को सह सकें। TaNAC018-7D जीन हमें वह वैज्ञानिक औज़ार देता है जिससे हम ऐसी ‘क्लाइमेट-स्मार्ट’ फसलें विकसित कर सकते हैं।

इस खोज का सबसे बड़ा व्यावहारिक लाभ भविष्य की कृषि व्यवस्था को मिलेगा। पारंपरिक पादप प्रजनन तकनीकों की मदद से, कृषि वैज्ञानिक अब इस विशिष्ट जीन वाले गेहूं के पौधों का चयन कर सकते हैं और उन्हें उच्च उपज वाली लेकिन संवेदनशील किस्मों के साथ क्रॉस करा सकते हैं। क्रिस्पर-कास-9 जैसी आधुनिक जीन संपादन तकनीक का उपयोग करके, वैज्ञानिक सीधे तौर पर गेहूं की मौजूदा व्यावसायिक किस्मों में TaNAC018-7D जीन की अभिव्यक्ति को समायोजित कर सकते हैं। अर्थात हम ऐसे बीज डिज़ाइन कर सकते हैं जिनकी सुप्तावस्था कटाई के समय तक महफूज़ रहे, लेकिन जब किसान उन्हें अगले मौसम में बोने के लिए मिट्टी में डालें, तो वे आसानी से और समान रूप से अंकुरित हो जाएं। (स्रोत फीचर्स)

Picture credit – https://phys.org/news/2014-11-seed-dormancy-property-germination-million.html ( dormancy in seeds)

लाल लेट्यूस को हरा बनाकर बढ़ाया सब्ज़ी का पोषण

दौलत सिंह तंवर 

जापान के त्सुकुबा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने हाल ही में जीनोम संपादन (gene editing) की मदद से लाल पत्तों वाली लेट्यूस का लाल रंग गायब कर दिया, नतीजतन पत्तियां हरी हो गईं। लेकिन असली कहानी रंग बदलने की नहीं, बल्कि इसके साथ पौधे के भीतर हुए एक अप्रत्याशित बदलाव की है। दरअसल, सब्ज़ियों की दुनिया में रंग सिर्फ दिखावे की बात नहीं है। यह अक्सर पौधे के भीतर चल रही जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं का संकेत भी होता है।

लेट्यूस की पत्तियों का रंग बदलते ही पौधे में दूसरे फायदेमंद यौगिक पहले से कहीं ज़्यादा मात्रा में जमा होने लगे। लाल पत्तों वाली लेट्यूस का रंग एंथोसायनिन नाम के पॉलीफेनॉलिक रंजक की वजह से होता है। एंथोसायनिन एक ऐसा प्राकृतिक रंजक है, जो कई फलों, फूलों और सब्ज़ियों में पाया जाता है और अपने एंटीऑक्सीडेंट गुणों के लिए जाना जाता है। पौधों में यह यौगिक फिनाइलएलानीन नामक अमीनो एसिड से शुरू होने वाली एक लंबी जैव-रासायनिक शृंखला के ज़रिए बनता है। इस शृंखला के दौरान रास्ते में कई फ्लेवोनॉइड्स भी बनते हैं। फ्लेवोनॉइड्स पौधों में पाए जाने वाले यौगिकों का एक बड़ा समूह है, जो कई जैविक भूमिकाएं निभाते हैं। सामान्य स्थिति में ये फ्लेवोनॉइड्स आगे चलकर एंथोसायनिन में बदल जाते हैं। यानी एंथोसायनिन (anthocyanin) असल में इस शृंखला का अंतिम उत्पाद है।

शोधकर्ताओं ने क्रिस्पर कास-9 (CRISPR-CAS9) नामक आधुनिक जीनोम संपादन तकनीक की मदद से डीएफआर नाम के एंज़ाइम को बनाने वाले जीन को निशाना बनाया। यह एंज़ाइम एंथोसायनिन बनने से ठीक पहले वाले चरण के लिए ज़िम्मेदार होता है, यानी फ्लेवोनॉइड्स के एंथोसायनिन में तब्दील होने के चरण पर। जब वैज्ञानिकों ने इस जीन को निष्क्रिय किया, तो एंथोसायनिन बनने की प्रक्रिया रुक गई। नतीजतन, पौधे की पत्तियों से लाल रंग पूरी तरह उड़ गया और वे हरी दिखने लगीं।

यहां एक दिलचस्प बात सामने आई। जब एंथोसायनिन बनने का रास्ता बंद हुआ तो पौधे में इस रासायनिक शृंखला के मध्यवर्ती पदार्थ (यानी फ्लेवोनॉइड्स) ही जमा होने लगे। पाया गया कि संशोधित पौधों में क्वेरसेटिन जैसे फ्लेवोनॉइड्स की मात्रा काफी बढ़ गई। क्वेरसेटिन को भी अपने एंटीऑक्सीडेंट और सूजनरोधी गुणों (anti-inflammatory quality) के लिए जाना जाता है, और यह कई स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों में पाया जाता है।

इस पूरे प्रयोग की एक और खास बात यह रही कि जीन में इतना बड़ा बदलाव करने के बावजूद पौधे की वृद्धि पर कोई नकारात्मक असर नहीं देखा गया। संशोधित लेट्यूस (modified lettuce) सामान्य लेट्यूस की तरह ही बढ़ी और उसकी पैदावार में कोई फर्क नहीं पड़ा। यह बात विशेष महत्व रखती है, क्योंकि अक्सर किसी जीन में बदलाव करने से पौधे की उत्पादकता प्रभावित होने का खतरा बना रहता है। यहां ऐसा नहीं हुआ, जिससे यह तकनीक व्यावहारिक इस्तेमाल के लिहाज़ से काफी आकर्षक बन जाती है।

यह अध्ययन सिर्फ लेट्यूस के रंग बदलने की कहानी भर नहीं है, यह दिखाता है कि किसी सब्ज़ी के भीतर पोषक तत्वों के संतुलन को सोच-समझकर नियंत्रित किया जा सकता है। अभी तक ऐसा माना जाता रहा है कि लाल लेट्यूस में हरी लेट्यूस के मुकाबले ज़्यादा पॉलीफेनॉल बनाने की क्षमता होती है। इस अध्ययन ने दिखाया कि इसी क्षमता का इस्तेमाल करके अंतिम उत्पाद (एंथोसायनिन) की बजाय, बीच के फायदेमंद यौगिकों (फ्लेवोनॉइड्स) को बढ़ाया जा सकता है, भले ही पत्तियां हरी ही क्यों न दिखें। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तरीका भविष्य में ऐसी सब्ज़ियां विकसित करने में मदद कर सकता है, जिनका पोषण-प्रोफाइल (nutrition-profile) ज़रूरत के हिसाब से कस्टमाइज़ किया जा सके। चूंकि फ्लेवोनॉइड का उत्पादन रोशनी की तीव्रता और तापमान जैसी परिस्थितियों से गहराई से प्रभावित होता है, इसलिए इन परिस्थितियों को सटीक रूप से नियंत्रित करके मनचाहे पोषक गुणों वाली सब्ज़ियां उगाना आसान हो जाएगा।

यह अध्ययन उत्साहजनक तो है, लेकिन यह देखना होगा कि यह जीन-संशोधित हरी लेट्यूस सामान्य हरी किस्मों के मुकाबले पोषण के लिहाज़ से कितनी बेहतर साबित होती है।

इसके अलावा, किसी भी जीनोम संपादित फसल के व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले उसे खाद्य सुरक्षा और नियामक मानकों (food safety & standards) की कसौटी पर परखा जाता है। विभिन्न देशों में जीन-संपादित फसलों को लेकर नियम अलग-अलग हैं, और इससे तय होगा कि यह तकनीक कितनी जल्दी किसानों और उपभोक्ताओं तक पहुंच पाती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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इस वर्ष के इगनोबेल हकदार

प्रतिका गुप्ता

नोबेल पुरस्कार (nobel prize) से तो सभी वाकिफ हैं। यह विज्ञान के क्षेत्र में संजीदगी से किए गए अहम शोधकार्य के लिए दिया जाता है, जिसमें सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ-साथ वैज्ञानिकों को गोल्ड मेडल और लगभग 10 लाख डॉलर की राशि भी मिलती है। यह भी सर्वमान्य है कि डीएनए की संरचना का खुलासा करना शोध का एक महत्वपूर्ण विषय है। लेकिन क्या आपको लगता है कि नाक छिनकना भी शोध का विषय हो सकता है?

नोबेल पुरस्कार के विपरीत, इगनोबेल पुरस्कार उतनी ही संजीदगी से किए गए ऐसे शोधकार्यों के लिए दिए जाते हैं जो पहले पल में तो लोगों को गुदगुदाते हैं लेकिन दूसरे ही पल लोगों को विचार करने पर मजबूर करते हैं। वास्तव में, इगनोबेल (Ig Nobel) पुरस्कार ‘ignoble’ शब्द पर तंज है जिसका मतलब होता है अप्रतिष्ठित। लेकिन, इगनोबेल पुरस्कार पाने वाले को भी काफी प्रतिष्ठा मिलती है, भले ही नकद राशि न मिलती हो। ये पुरस्कार इस बात को रेखांकित करते हैं कि महज भारी-भरकम और संजीदा लगने वाले विषय ही अहम नहीं होते और सिर्फ उन्हीं पर संजीदगी से शोधकार्य नहीं किए जाते, बल्कि हमारे मन में उठने वाले छोटे-छोटे सवाल भी उतने ही अहम होते हैं और उनके जवाब उतनी ही संजीदगी (scholarly diligence) से खोजना होते हैं।

इस वर्ष भी एनल्स ऑफ इंप्रॉबेबल जर्नल ने 10 क्षेत्रों में इन शोधकार्यों को इगनोबेल के सम्मान से नवाज़ा है। खुद देखिए कि बात कहां से निकलकर कहां तक पहुंच सकती है।

1. बायोमैकेनिक्स: चुंबन की वैज्ञानिक परिभाषा

इस वर्ष बायोमैकेनिक्स का इगनोबेल पुरस्कार मैटिल्डा ब्रिंडल, कैथरीन टैलबोट और स्टुअर्ट वेस्ट को चुंबन की एक सटीक वैज्ञानिक परिभाषा (kissing definition) देने के लिए मिला है। इस परिभाषा के अनुसार “चुंबन एक ऐसी गैर-आक्रामक क्रिया है जिसमें एक ही प्रजाति के जीवों के बीच मुंह-से-मुंह (या होंठ-से-होंठ) का सीधा संपर्क हो, होंठो/मुंह में कुछ हलचल हो और यह संपर्क या हलचल भोजन के खाने-खिलाने के लिए न हो।” न सिर्फ मनुष्यों बल्कि कई प्रजातियों में इस तरह का व्यवहार देखा गया है जिसमें दो जीवों के बीच मुंह से मुंह का संपर्क होता है; चुंबन को सटीक रूप से परिभाषित करने से इसे विभिन्न प्रजातियों के बीच बेहतर समझा जा सकेगा और इसके उद्भव और कारणों के बारे में सोचा जा सकेगा। शोधकर्ताओं की उक्त परिभाषा के अनुसार अब तक ज्ञात जीवों में ध्रुवीय भालू, कुछ पक्षी, चींटियां और कुछ अन्य प्राइमेट भी चुंबन करते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाने की कोशिश की कि यह व्यवहार कब विकसित हुआ। उन्होंने पाया है कि यह व्यवहार लगभग 2.5 करोड़ साल पहले वानरों (एप्स) के पूर्वजों से आया है। अब समझना बाकी है कि इस व्यवहार की भूमिका क्या है।

2. अर्थशास्त्र: अमीरी और अनैतिक व्यवहार 

अर्थशास्त्र का इगनोबेल पुरस्कार पॉल पिफ और उनके साथियों को उस शोध के लिए मिला है जिसमें उन्होंने सामाजिक-आर्थिक स्थिति और अनैतिक व्यवहार के बीच सम्बंध की पड़ताल की है। उन्होंने पाया कि गरीबों की तुलना में अमीर लोग (wealthy people) अधिक अनैतिक व्यवहार करते हैं। ये निष्कर्ष उनके द्वारा किए गए सात अध्ययनों के आधार पर दिए गए हैं। पहले दो अध्ययनों में उन्होंने इन दोनों वर्गों के लोगों का व्यवहार चौराहे पर वाहन चलाते समय देखा; उन्होंने पाया कि अमीर लोग चौराहे पर अपनी बारी आने के पहले ही दूसरे वाहनों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। तीसरे अध्ययन में प्रतिभागियों को कुछ परिस्थितियां देकर उन पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई – अमीर लोगों ने अधिक अनैतिक निर्णय लिए। चौथे अध्ययन में सिर्फ और सिर्फ बच्चों के लिए रखी कैंडी को अमीरों की भूमिका निभा रहे प्रतिभागियों ने अधिक लिया। पांचवे अध्ययन में बातचीत के दौरान अपनी बात मनवाने के लिए झूठ बोलने की प्रवृत्ति अमीरों में अधिक दिखी। छठवे अध्ययन में खेल जीतने के लिए चीटिंग करने का व्यवहार अमीरों में अधिक दिखा। और सातवें अध्ययन में कार्यस्थल पर अमीर अधिक अनैतिक व्यवहार (unethical behaviour) करते पाए गए।

3. रसायन विज्ञान: प्रोटीन से भरपूर कॉकरोच का दूध

रसायन विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध के लिए मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने बताया कि Diploptera punctata नामक कॉकरोच का दूध (cockroch milk) गाय के दूध से भी तीन गुना अधिक पौष्टिक है। यह कॉकरोच आम घरों में मिलने वाले कॉकरोच से अलग है और अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देता है। दरअसल, मादा कॉकरोच अपने शरीर में विकसित हो रहे भ्रूणों को एक विशेष पोषक तरल से भोजन देती है। भ्रूण जब इस तरल को ग्रहण करते हैं तो उनकी आंत में यह प्रोटीन, वसा और शर्करा से भरपूर छोटे-छोटे क्रिस्टलों के रूप में जमा हो जाता है। ये क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलकर बढ़ते भ्रूण को पोषण देते हैं।

2016 में भारतीय और फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी की मदद से इन क्रिस्टलों की संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि यह तरल अत्यधिक पौष्टिक है: यह गाय के दूध की तुलना में तीन गुना से अधिक पोषण और ऊर्जा दे सकता है। घबराइए नहीं, वैज्ञानिक सीधे इस दूध उपयोग मनुष्य के इस्तेमाल के लिए नहीं सोच रहे हैं, बल्कि इसके घटकों के आधार पर पोषक पेय (nutritious drink) तैयार करने का विचार है।

4. चिकित्सा: नाक कैसे छिनकें

चिकित्सा का इगनोबल पुरस्कार जापानी चिकित्सक टोकुजी उन्नो के 1977 के उस अध्ययन के लिए मिला है जिसमें उन्होंने बताया था कि नाक कैसे साफ करें। रोज़ाना नाक की सफाई श्वासनली और फेफड़ों के संक्रमण के जोखिम को कम करती है, और जब सर्दी-ज़ुकाम होता है तो नाक तो छिनकनी पड़ती है। उन्नो यही जानना चाह रहे थे कि किस तरह नाक की सफाई (nostril hygiene) स्वस्थ रहने में मदद कर सकती है। इसके लिए उन्होंने देखा कि कितनी तेज़ी और ताकत से हवा बाहर करने पर, एक बार में एक नथुने से छिनकने पर, या दोनों नथुनों से छिनकने पर नाक की सफाई में क्या अंतर पड़ता है। उन्होंने यह सब 14 से 48 वर्ष की आयु के 15 लोगों पर करके देखा। नाक से निकलने वाली हवा की गति मापने के लिए दो न्यूमोटैकोमीटर (pnuemotachometer) लगाए गए और नाक से निकली हवा की मात्रा तथा समय भी दर्ज किया गया। साथ ही कान की बाहरी नलिका में दबाव परिवर्तन को एक कैथेटर और संवेदनशील प्रेशर ट्रांसड्यूसर से मापा गया। उन्होंने पाया कि दोनों नथुने खुले रखते हुए नाक साफ करने की बजाय एक बार में एक नथुने को खुला रखकर नाफ साफ करने से ज़्यादा अच्छे से सफाई होती है।

5. जीव विज्ञान: सांप कब काट सकता है

यह तो कहा ही जाता है कि सांप तभी काटता है जब आपका पैर उस पर पड़ जाए। जीव विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन के लिए दिया गया जिसमें शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि विषैले सांप पर पांव कहां पड़ने पर उसके द्वारा काटने की संभावना अधिक होती है। उन्होंने ब्राज़ील के विषैले सांप पिट वाइपर (pit viper snake) के व्यवहार का अध्ययन किया और उसकी लंबाई, लिंग, उम्र, तापमान, दिन का समय तथा मनुष्य द्वारा दी गई उत्तेजनाओं जैसे कारकों को देखा। प्रयोगों में सांपों के साथ नियंत्रित मानव-संपर्क की परिस्थितियां बनाई गईं और यह देखा गया कि कहां पांव पड़ने पर सांप रक्षा के लिए काटता (defensive snakebite) है। पाया गया कि सिर पर पांव पड़ने पर काटने की संभावना लगभग 44 प्रतिशत थी, शरीर के बीच के हिस्से पर 20 प्रतिशत और पूंछ पर 11 प्रतिशत थी। छोटे सांपों, विशेषकर नवजातों में काटने की प्रवृत्ति भी अधिक पाई गई। हालांकि पशु-नैतिकता सरोकारों के चलते इस अध्ययन को साइंटिफिक रिपोर्ट्स ने फरवरी 2025 में वापस ले लिया।

6. भौतिकी: छींटे-मुक्त युरिनल 

भौतिकी का इगनोबेल पुरस्कार ऐसे युरिनल डिज़ाइन (splash-free urinal design) करने के लिए दिया है जिससे आसपास फैलने वाले छींटे और गंदगी न के बराबर फैलें। शोधकर्ताओं ने ऐसा अनुभव किया था कि कितनी भी सावधानी से युरिनल में पेशाब की जाए, आसपास के फर्श पर छींटे फैल ही जाते हैं और सार्वजनिक शौचालयों की सफाई का मुद्दा बना रहता है। यदि सफाईकर्मी हर व्यक्ति के जाने के बाद सफाई करते रहें तो यह उनके लिए भी थकाऊ होता है, और सफाई बरकरार रखने में संसाधन, पैसा और ऊर्जा भी लगती ही है। इसी के समाधान में उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि छींटे छिटककर बाहर आते ही क्यों हैं और इस आधार पर नए युरिनल डिज़ाइन पेश किए; इन डिज़ाइन का नाम उन्होंने नॉटी-लू (Nauti-Loo), कॉर्नुकोपिया (Cornucopeea) और यूरिन-नो (Urine-no) नाम दिए हैं। इसके लिए उन्होंने किसी तरल के सतह से टकराने के कोण और छींटों के उचकने के बीच के सम्बंध का गणितीय मॉडल बनाया और पाया कि किसी सतह पर किसी तरल की जितनी सीधी धार (90 डिग्री के कोण से) पड़ेगी छींटे उतने ज़्यादा छिटकते हैं, सतह पर धार यदि कम कोण (30 डिग्री से कम) से टकराए तो छींटे कम उछलते हैं। इसके आधार पर उन्होंने तिरछी सतहों वाले तीन युरिनल डिज़ाइन तैयार किए और उनका परीक्षण किया। नई डिज़ाइनों से प्रचलित युरिनल की तुलना महज़ 1.4 प्रतिशत छींटे बाहर आए।

7. तकनीक: मच्छर की सूंडी से 3-डी प्रिंटिंग

तकनीक का इगनोबेल पुरस्कार वैज्ञानिकों की उस कोशिश को मिला जिसमें मरी हुई मादा मच्छर की सूंड को 3-डी प्रिंटर की बेहद सूक्ष्म नोज़ल के रूप में इस्तेमाल किया गया। मच्छर की सूंड बहुत पतली होने के साथ काफी मज़बूत भी होती है। कई कीटों के सूंड (मुखांगों) की संरचना और यांत्रिक गुणों की तुलना करने पर मादा मच्छर की सूंड सबसे उपयुक्त लगी। उन्होंने प्रयोगशाला में पाले गए मृत मच्छरों से सूंड अलग करके डिस्पेंसिंग नोज़ल से जोड़ा और डायरेक्ट-इंक-राइटिंग 3-डी प्रिंटर (direct-ink-writing 3-D printer) में लगाया और अलग-अलग गति संयोजन से प्रिंट करके देखा। उन्होंने पाया कि इस नोज़ल व्यवस्था से लगभग 20 माइक्रोमीटर पतली लकीरें प्रिंट की जा सकती हैं, जो आम व्यावसायिक नोज़लों की तुलना में काफी पतली लकीरें हैं।

8. घ्राण विज्ञान: संतान की गंध 

घ्राण विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन को मिला है जिसमें शोधकर्ताओं ने यह जांचा कि माता-पिता अपनी संतानों के शरीर की गंध को अलग-अलग उम्र में किस तरह महसूस करते हैं। पोलैंड में किए गए अध्ययन में 235 माता-पिता ने कुल 367 संतानों के शरीर की गंध की सुखदता (pleasing body odor) का आकलन किया। संतानों की उम्र एक महीने से 35 वर्ष तक थी। प्रतिभागियों ने अपनी संतानों की गंध को 0 से 20 के पैमाने पर बेहद बुरी से बहुत अच्छी तक अंक दिए। शोधकर्ताओं ने संतानों की उम्र, माता-पिता और संतान का लिंग, साथ बिताया समय तथा माता-पिता और-संतान के बीच सम्बंध जैसे कारकों को भी विश्लेषण में शामिल किया। पाया गया कि संतान की उम्र बढ़ने के साथ उसके शरीर की गंध को सुखद मानने की प्रवृत्ति घटती गई। शिशुओं की गंध को 93.7 प्रतिशत माता-पिता ने सुखद या बहुत सुखद बताया, जबकि किशोरावस्था से बड़ी संतानों के लिए यह आंकड़ा 75.2 प्रतिशत था। शोधकर्ताओं का कहना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच सम्बंधों में गंध की भूमिका हो सकती है।

9. शांति: दुश्मन का दुश्मन दोस्त क्यों

शांति का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध को मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने दोस्ती और दुश्मनी के बीच एक दिलचस्प सामाजिक मनोविज्ञान का अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं ने छह अध्ययनों में कुल 1183 प्रतिभागियों से पूछा कि वे अपने आदर्श दोस्त (ideal friend) में क्या गुण चाहते हैं। प्रतिभागी अमेरिका और भारत के छात्र तथा सामान्य समुदाय के थे। उनसे यह भी पूछा गया कि उनका दोस्त उनके साथ, किसी अजनबी के साथ या उनके दुश्मन के साथ कैसा व्यवहार करे तो उन्हें ठीक लगेगा। सामान्य स्थिति में लोगों ने दयालु और भरोसेमंद दोस्त को अधिक पसंद किया। लेकिन जब सवाल किसी दुश्मन के प्रति व्यवहार का था, तो तस्वीर बदल गई। कुछ प्रतिभागियों ने ऐसे दोस्त को पसंद किया जो उनके दुश्मन के प्रति थोड़ा रूखा और सख्त रवैया रखते हों। शोधकर्ताओं ने इसे “embedded dyad” यानी दोस्ती को व्यापक सामाजिक नेटवर्क के भीतर देखने के दृष्टिकोण से समझाया। कोई दोस्त केवल हमारे साथ ही ताल्लुक नहीं रखता बल्कि वह हमारे प्रतिद्वंद्वियों से भी मिलता-जुलता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर हम पर पड़ सकता है।

10. मृदा विज्ञान: जांघियों से मिट्टी की सेहत 

मृदा विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार मिट्टी में दबाए गए सूती जांघियों और टी-बैग्स के ज़रिए मिट्टी की जैविक सक्रियता और गुणवत्ता (soil biological activity & quality) का अध्ययन करने के लिए मिला है। विचार सरल था: मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव जितने सक्रिय होंगे, सूती कपड़े जैसे जैविक पदार्थ की अपघटन गति उतनी ही तेज़ होगी। शोधकर्ताओं ने शौकिया वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे मानकीकृत सूती जांघिए और टी-बैग्स वगैरह अपने आसपास की विभिन्न तरह की मिट्टियों (जैसे बाग-बगीचे, मैदान, खेत आदि) में गाड़ दें और लगभग दो महीने बाद उन्हें निकालें, ताकि यह देखा जा सके कि कपड़ा कितना सड़-गल गया और कितना बाकी है। दुनिया भर के  लगभग 1000 शौकिया वैज्ञानिकों ने 2000 से अधिक जांघिए और हज़ारों टी-बैग्स दफनाए। पाया गया कि निजी बगीचों, जहां पेड़-पौधों की प्रजातियों में विविधता थी, में कपड़ा सबसे अधिक तेज़ी से अपघटित हुआ, जबकि लॉन (जिस पर सिर्फ एक तरह के पौघे – हरी घास या दूब – उगी थी) में अपघटन (decomposition) धीमी गति से हुआ। मिट्टी की गुणवत्ता के लिहाज़ से यह अहम है।

चलते–चलते

विगत 3 सितंबर को स्विट्जरलैंड के ज़्यूरिख में इस वर्ष के इगनोबेल पुरस्कार दिए गए। अपने 36 वर्ष के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब एनल्स ऑफ इंप्रोबेबल ने यह समारोह बोस्टन के बाहर आयोजित किया गया। इसका कारण पिछले दो वर्ष का अनुभव रहा: विगत दो सालों में अमेरिका में सख्त किए गए वीज़ा नियमों और विभिन्न देशों के बीच चल रहे युद्ध एवं संघर्ष के चलते कई विजेता चाहकर भी समारोह में शामिल नहीं हो पा रहे थे। और, इगनोबेल पुरस्कार के संस्थापक मार्क अब्राहम्स (mark abrahams) के लिए यह चिंता का विषय था कि यह समारोह जो हल्के-फुल्के और मज़ेदार अंदाज़ में सम्पन्न होता है उस पर संघर्ष और नीतियां हावी हो रही हैं, विजेता शामिल नहीं हो पा रहे हैं और मेहमानों के लिए देश का दौरा करना असुरक्षित हो गया है।

इस वर्ष विजेता तो शामिल हो ही पाए, साथ ही समारोह में नोबेल पुरस्कार विजेता एशर डफलो, अभिजीत बनर्जी, मिशेल मेयर एवं टिम हंट भी शामिल रहे जिन्होंने इगनोबेल पुरस्कार विजेताओं को मशरूम-आकार की ट्रॉफी दी। आमंत्रित अतिथियों ने 24/7 की तर्ज पर व्याख्यान भी दिए: तयशुदा विषय पर पहले तो 24 सेकंड में और फिर 7 शब्दों में विषय समझाया गया। समारोह की शुरुआत ‘लैबोरेटरी ऑफ स्मॉल डिसास्टर’ की थीम पर डांस परफॉर्मेंस हुई, फंजाई थीम पर ओपेरा संगीत (fungi themed opera)सम्पन्न हुआ, और समारोह का समापन दर्शकों ने कागज़ के हवाई-जहाज़ उड़ाकर किया। हर इवेंट की शुरुआत फोर-पीस ऑर्केस्ट्रा द्वारा की गई, और विजेताओं की वेशभूषा उनके शोध विषय से सम्बंधित थी।

अगले वर्ष ये पुरस्कार बेल्जियम के एंटवर्प (antwerp) में 5 सितंबर को दिए जाएंगे। आप यदि दर्शकों में शामिल होना चाहें तो मई में टिकट बुकिंग उनकी वेबसाइट पर प्रारंभ होगी। और, आप चाहें तो किसी मज़ेदार लेकिन संजीदा शोध को अगले वर्ष के लिए नामित (nominate) भी कर सकते हैं, क्या पता आपका नामित शोध पुरस्कार पा जाए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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फफूंदनाशी के असर बीस पीढ़ियों तक

लंबे समय तक किए गए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि चूहों में फफूंदनाशी (Fungicide) के असर बीस पीढ़ियों तक बरकरार रहते हैं। किसी मादा चूहे (Female Rat) का संपर्क फफूंदनाशी से हो जाए, तो उसकी संतानों में गुर्दा रोग, मोटापे या प्रसव में दिक्कत जैसी परेशानियां पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है।

इस बात के प्रमाण बढ़ते क्रम में मिल रहे हैं कि कतिपय रसायनों से संपर्क कई आनुवंशिक परिवर्तन (Genetic changes) पैदा कर सकते हैं। ये रसायन वास्तव में किसी जीव के आनुवंशिक पदार्थ (डीएनए) (DNA) में कोई परिवर्तन नहीं करते। दरअसल, जन्तु कोशिकाओं के डीएनए पर कुछ मार्कर चस्पा हो जाते हैं जो अगली पीढ़ियों को भी हस्तांतरित होते रहते हैं। ये जीन्स की अभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं और इन्हें एपिजेनेटिक परिवर्तन (Epigenetic changes) कहते हैं।

इस सिलसिले में हालिया अध्ययन वॉशिंगटन स्टेट युनिवर्सिटी के माइकल स्किनर और उनके साथियों ने किया है। इन शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया कि यदि चूहों की एक पीढ़ी का संपर्क फफूंदनाशी विनक्लोज़ोलीन (Vinclozolin) से करवाया जाए, तो आने वाली 20 पीढ़ियों तक इसके असर बने रहते हैं। पता चला कि एक पीढ़ी के संपर्क के कारण आने वाली पीढ़ियों में शुक्राणुओं की मृत्यु और प्रसव में दिक्कत जैसी समस्याएं बनी रहती हैं। इसके अलावा मातृ व शिशु मृत्यु दर भी काफी अधिक होती है, बनिस्बत संपर्क से मुक्त चूहों में या 12वीं से पहले की पीढ़ी की तुलना में।

अभी चूहों से प्राप्त निष्कर्षों को इंसानों के संदर्भ में लागू करना जल्दबाज़ी होगी। वैसे मनुष्यों में भी इस तरह के एपिजेनेटिक परिवर्तनों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण देखा गया है – जैसे अकाल के दौरान गर्भधारण से पैदा हुए बच्चों में डायबिटीज़ (Diabetes) का जोखिम अधिक होता है। लिहाज़ा, इन परिणामों का इंसानों के लिए निहितार्थ अकल्पनीय नहीं है।

इतना तो बनता है कि वायु प्रदूषण पर विचार किया जाए और निगरानी की जाए कि हम पर्यावरण में किस तरह के रसायन छोड़ रहे हैं क्योंकि यह चिंताजनक है कि असर इतनी पीढ़ियों बाद भी नज़र आते हैं।

यह सही है कि फसलों के संदर्भ में विनक्लोज़ोलीन का इस्तेमाल काफी कम होने लगा है और कई देशों में इस पर प्रतिबंध भी लग चुका है।

स्किनर के दल ने प्रयोग 2017 में शुरू किए थे। उन्होंने गर्भवती चूहों को विनक्लोज़ोलीन और डीएमएसओ (DMSO) नामक एक विलायक का इंजेक्शन दिया। फिर इन चूहों का प्रजनन 23 पीढ़ियों तक असंपर्कित चूहों के साथ करवाया। पहले गर्भवती चूहे और उसकी संतान तथा नाती-पोतों (grand offspring) के बारे में माना गया कि उनका सीधे संपर्क हुआ था। इसके बाद की 20 पीढ़ियों को पूर्वज-संपर्कित माना गया।

इसी के साथ एक कंट्रोल समूह भी था – इन्हें सिर्फ डीएमएसओ का इंजेक्शन दिया गया था और चार पीढ़ियों तक प्रजनन करवाया गया था।

शोधकर्ता दल ने अगली पीढ़ी में क्षार अनुक्रमण की तकनीक से पता किया कि उनके जीनोम के किन खंडों में मिथाइल समूह जुड़े हैं (यानी मिथायलीकरण हुआ है)। उन्होंने पाया कि कंट्रोल की तुलना में संपर्कित चूहों की बाद की पीढ़ियों में अधिक हिस्सों में मिथायलीकरण (Methylation) हुआ है। अर्थात एपिजेनेटिक परिवर्तन कई पीढ़ियों तक बने रहते हैं।

फिर उन्होंने चूहों के गुर्दों, प्रोस्टेट, वृषण और अंडाशयों को देखा। पता चला कि इन अंगों को प्रभावित करने वाले रोगों की दर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती गई। मसलन जिन चूहों का विनक्लोज़ोलीन से प्रथम संपर्क पिता की ओर से करवाया गया था उनकी बीसवीं पीढ़ी में सभी 11 चूहों में अंडाशय में गड़बड़ी पाई गई जबकि कंट्रोल समूह के 19 में से 11 चूहों में। यह भी देखा गया कि संपर्कित चूहों में मोटापा (Obesity) और गुर्दा रोग भी ज़्यादा गंभीर थे। यही स्थिति प्रसव सम्बंधी दिक्कतों में देखी गई। टीम का मत है कि डीएनए मिथायलीकरण अंगों के सामान्य विकास व कामकाज को प्रभावित करता है।(स्रोत फीचर्स)

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धान वगैरह को हर साल रोपने से मुक्ति का रास्ता

यह कल्पना करना थोड़ा मुश्किल है कि हमारे पास अनाज (Grains) की ऐसी फसलें होंगी जिन्हें हर साल नए सिरे से बोने की ज़रूरत नहीं होगी; एक बार बो दिया और साल-दर-साल दाने लेते रहिए। फिलहाल तो धान, गेहूं, तुअर जैसी फसलों को हर साल बोना ही पड़ता है। क्या ऊपर की कल्पना साकार हो सकती है?

इस सिलसिले में चीन के वैज्ञानिकों ने 2018 में धान की एक ऐसी किस्म (PR23) प्रस्तुत की थी जिससे कई सालों तक उपज ली जा सकती थी। अलबत्ता, इसे बनाने में कई दशकों तक पारंपरिक ब्रीडिंग का सहारा लेना पड़ा था। इसके लिए शोधकर्ताओं ने धान की एक फसली किस्म का संकरण एक वन्य किस्म से किया था।

अब शोधकर्ताओं ने दर्शाया है कि यही काम द्रुत गति से किया जा सकता है यदि किसी उपयुक्त वन्य किस्म से जीन्स (Genes) चोरी कर लिए जाएं। फिर तो अलग-अलग इलाकों के लिए बहुवर्षी धान (Parennial Paddy) तैयार किए जा सकेंगे।

इस संदर्भ में हाल ही में साइन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र में वैज्ञानिकों की एक टीम ने बताया है कि जंगली धान (Wild Rice) (ओराइज़ा रुफिपोगोन – Oryza rufipogon) साल-दर-साल फूलता-फलता है और उन्होंने इसके लिए ज़िम्मेदार जीन्स भी खोज निकाले हैं। उन्होंने आम तौर पर फसल के रूप में उगाए जाने धान (ओराइज़ा सटाइवा- Oryza sativa) में ये जीन्स जोड़ने में भी सफलता प्राप्त कर ली है। इन जीन्स ने ओराइज़ा सटाइवा को बहुवर्षी गुण प्रदान कर दिए; यानी यह एक बार पुष्पन (Flowering) के बाद मरता नहीं बल्कि पुष्पन को रोककर फिर से सामान्य वृद्धि (वर्धी विकास) शुरू कर देता है। यह प्रगति तो ज़बर्दस्त है लेकिन एक दिक्कत बाकी है। जो नई वृद्धि शुरू होती है उसमें लगने वाले फूलों में दाने पैदा नहीं होते।

दरअसल, अनाजों को बहुवर्षी पौधों में तबदील करना सहस्राब्दियों में चुन-चुनकर किए गए प्रजनन को वापिस पलटने जैसा होगा। एकवर्षी पौधे (Annual Plants) ज़मीन के ऊपर तेज़ी से वृद्धि (Growth) करते हैं और वहुवर्षी पौधों की तुलना में कहीं अधिक दाने पैदा करते हैं क्योंकि वहुवर्षी पौधे अपने काफी सारे संसाधन जड़ों के विकास में निवेश करते हैं। जब इन पौधों के पालतू बनाया गया था, तब पुराने ज़माने के लोगों ने एकवर्षी पौधों को शायद उनकी अधिक दाना उत्पादन क्षमता के कारण ही चुना था।

नए अध्ययन में चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइन्स के सेंटर फॉर एक्सेलेंस इन मॉलीक्यूलर प्लांट साइन्सेस के बिन हान और जिया-वाई वांग ने उन जीन्स की तलाश की जो धान में वहुवर्षिता का नियमन करते हैं। इस तलाश में सबसे पहले तो वे ओ. रुफिपोगोन पर गए। उन्होंने अनुसंधान के दौरान विकसित एक किस्म का प्रजनन एक आम तौर पर अध्ययन की जाने वाली किस्म से करवाया ताकि ऐसी ढेर सारी संतानें पैदा कर सकें जिनमें से प्रत्येक में वन्य किस्म के डीएनए (DNA) का अलग-अलग छोटा-छोटा खंड हो। बड़े होने के बाद उन्होंने एक पौधा चुना जिसमें यह गुण था कि वह पुष्पन को रोककर वर्धी विकास जारी रख सके। इसे उन्होंने नाम दिया G43।

सारे धान के पौधों, चाहे वे कृष्य वार्षिक किस्म के हों, में एक मुख्तसर द्वितीय जीवन होता है। वार्षिक धान के पौधे से जब दानों की उपज प्राप्त कर ली जाती है, उसके बाद वे एक दूसरा शाखित तना पनपाते हैं, जिन्हें टिलर (Tiller)कहते हैं। इनसे भी एक कमतर उपज पैदा होती है जिसे रैटून राइस (Ratoon Rice) कहते हैं। इसे प्रक्रिया को रैटूनिंग (Ratooning) कहते हैं।

बहुवर्षी धान

बहरहाल, हान और वांग ने जो G43 धान विकसित किया था वह ऐसे टिलर्स पैदा करने में काफी उदार था – जहां एकवर्षी धान में 10-12 टिलर बनते हैं, वहीं G43 में 70 ऐसे द्वितीयक टिलर्स (Secondary Tillers) बने।

अब शोधकर्ताओं ने इसके लिए ज़िम्मेदार जीन्स का स्थान निश्चित किया – ये गुणसूत्र-1 पर पाए गए और शोधकर्ताओं ने इन्हें नाम दिया ‘एंडलेस ब्रांचेज़ एंड टिलर्स’ (EBT1)। इसके बाद उन्होंने दो विशिष्ट जीन्स की पहचान की – MIR156B और MIR156C। ये दोनों ही माइक्रो-आरएनए (Micro-RNA) का निर्माण करते हैं और ये माइक्रो-आरएनए विशिष्ट संदेशवाहक आरएनए (mRNA) से जुड़ जाते हैं। जुड़ने के बाद ये कुछ अन्य जीन्स की गतिविधि को ठप्प कर देते हैं जो युवा पौधे को परिपक्वता की ओर ले जाएंगे।

इसी प्रकार के MIR156 जीन्स घास की अन्य प्रजातियों में भी पाए जाते हैं। गौरतलब है कि गेहूं, धान आदि भी घास कुल में ही आते हैं। आम तौर पर इनकी अभिव्यक्ति फूल आने के बाद थम जाती है जिसके चलते वृद्धि रुक जाती है। लेकिन G43 में इनका व्यवहार अलग रहा। इनकी भी अभिव्यक्ति फूल आने के बाद कम हुई लेकिन फिर से बढ़ गई और टिलर्स का वर्धी विकास फिर चल निकला। शोधकर्ताओं का ख्याल है कि यदि अन्य बहुवर्षी अनाजों में ऐसी ही क्रियाविधि हुई तो अचरज नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए 1920 के दशक में मक्का की एक उत्परिवर्तित किस्म (Mutated Species) खोजी गई थी जो लगातार एक झाड़ीनुमा ढंग से बढ़ती है। Corngrass1 नामक इस उत्परिवर्ती में MIR156 जीन पाया जाता है और शायद इसका व्यवहार बहुवर्षी धान के समान ही होगा।

G43 किसी भी वार्षिक पौधे की तरह ही बढ़ता है – एक दम सीधा खड़ा। यह ज़मीन पर फैलकर नहीं बढ़ता, जिस गुण की वजह से ओ. रुफिपोगोन के द्वितीयक टिलर्स जड़ें उगाकर नए पौधे बन जाते हैं। पौधे की बनावट को बदलने के लिए हान और वांग की टीम ने ओ. रुफिपोगोन के दो जीन्स (PROG1 और TIG1) G43 में जोड़ दिए थे। इस तरह जो पौधा विकसित हुआ वह ज़मीन पर आड़ा विकसित हुआ। यह एक आशाजनक संकेत है।

लेकिन अभी एक बड़ी बाधा सामने है। हालांकि ये द्वितीयक टिलर्स काफी अच्छे से बढ़े लेकिन उनसे बने पौधों पर वंध्या फूल आए और दाने नहीं बने। यह समस्या तब भी आई जब ओ. रुफिपोगोन का समूचा EBT1 खंड एक वार्षिक किस्म में रोपा गया।

ज़ाहिर है, इस काम को अंजाम देने के लिए अन्य जीन्स की ज़रूरत है। हान और वांग इन जीन्स की तलाश में हैं ताकि द्वितीयक टिलर्स भी उपजाऊ फूल पैदा कर सकें। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://eng.ruralvoice.in/national/paddy-planting-leads-overall-2023-kharif-crops-sowing-in-india.html

https://www.science.org/content/article/rice-needs-be-replanted-every-year-genetic-tinkering-could-make-it-more-apples

मालवा के भूजल भंडारों का पुनर्भरण और गांधीसागर

डॉ. राम प्रताप गुप्ता (जून 2016 में स्रोत में प्रकाशित लेख)

आज़ादी के बाद के 20-25 वर्षों में सिंचाई सुविधाओं और विद्युत उत्पादन में वृद्धि के उद्देश्य से देश की सभी बड़ी नदियों पर उपयुक्त स्थानों पर बांध बनाए गए। इसी प्रक्रिया में मालवा की जीवनरेखा मानी जाने वाली चंबल नदी (Chambal River) के पानी के दोहन के उद्देश्य से चंबल घाटी विकास निगम के अन्तर्गत तीन बांध – गांधीसागर, राणा प्रताप सागर और जवाहर सागर – से नहरें निकालकर राजस्थान और मध्यप्रदेश में सिंचाई सुविधाएं प्रदान करना प्रस्तावित था। इनमें से गांधीसागर सबसे बड़ा बांध था; जिसमें दोहन किए जाने वाले पानी का 83 प्रतिशत भाग संग्रहित होता है।

इस प्रथम बांध (Dam) के महत्व का अंदाज़ा इससे भी लगता है कि सन 1954 में इसका शिलान्यास और सन 1960 में इसका उद्घाटन भी तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरु ने किया और कहा था कि गांधीसागर जैसे बांध तो नए भारत के नए तीर्थ हैं। गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने की दृष्टि से तत्कालीन जल इंजीनियरिंग सोच के आधार पर यह तय किया गया कि 4500 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में फैले चंबल नदी के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए ताकि सारा पानी गांधीसागर में ही आए। चंबल घाटी विकास परियोजना मध्यप्रदेश और राजस्थान की संयुक्त परियोजना है और इस हेतु किए गए समझौते में मध्यप्रदेश ने इस शर्त पर भी अपनी सहमति प्रदान कर दी थी। प्रशासन और जल संसाधन विभाग ने यह आकलन ज़रूरी नहीं समझा कि जलग्रहण क्षेत्र में वर्षाजल के दोहन पर रोक लगाने से इस क्षेत्र पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

गांधी सागर के निर्माण के पूर्व चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र मालवा अर्थात दक्षिणी-पश्चिमी मध्यप्रदेश के आठ ज़िलों – धार, इन्दौर, देवास, शाजापुर, उज्जैन, रतलाम, मंदसौर और नीमच – में भूजल का स्तर काफी ऊंचा रहता था। इस क्षेत्र की नदियों जैसे क्षिप्रा, छोटी कालीसिंध, शिवना और चंबल में ही नहीं, छोटे-छोटे नदी-नालों में भी वर्ष भर पानी बहता रहता था। उस समय तक कृषि में रासायनिक खाद का उपयोग शुरू नहीं हुआ था और जैविक खाद (Organic Manure) का ही उपयोग होने से मिट्टी में वर्षा के पानी को सोखने और धारण करने की क्षमता भी अच्छी थी, जिससे मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहती थी और असिंचित क्षेत्र में रबी की फसलें ली जाती थीं। मालवा के असिंचित क्षेत्र में पैदा होने वाले कठिया गेहूं की अपनी श्रेष्ठ गुणवत्ता तथा मालवा के प्रसिद्ध लड्डू-बाफलों में इसी का उपयोग होने से इसकी मांग भी बहुत थी और इसके उत्पादक कृषकों को इसकी अच्छी कीमत मिलती थी।

मालवा की इन्हीं विशिष्टताओं को किसी जन कवि ने इस तरह प्रस्तुत किया है-

“मालवा धरती धीर गंभीर

पग-पग रोटी, डग-डग नीर”

सन 1960 में गांधी सागर के निर्माण के बाद के कुछ वर्षों तक तो इसके जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के जल दोहन पर प्रतिबंध का कोई प्रतिकूल असर नहीं पड़ा। पूर्व में इस क्षेत्र में तालाब काफी संख्या में बने थे, इससे वर्षा का बड़ा भाग उनमें संग्रहित हो जाता था और मिट्टी में पर्याप्त मात्रा में नमी (Moisture) बनी रहने से वर्षा के दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध ने स्थानीय किसानों को विशेष प्रभावित नहीं किया। मालवा क्षेत्र की अनेक रियासतों – होल्कर, देवास सीनियर एवं जूनियर, ग्वालियर, रतलाम और सैलाना – में बंटे होने से इस क्षेत्र में गांधीसागर के निर्माण के पूर्व कितने तालाब थे, इसका कोई व्यवस्थित विवरण नहीं मिलता है। गांधीसागर जलाशय के 660 वर्ग कि.मी. क्षेत्र में 95 तालाब डूब में आए थे, इसी के आधार पर यह मोटा अनुमान लगाया जा सकता है कि उस समय चंबल के 4500 वर्ग कि.मी. में फैले जल ग्रहण क्षेत्र में लगभग 800 तालाब थे अर्थात मालवा क्षेत्र में तालाबों का जाल बिछा हुआ था। इसी कारण चंबल घाटी योजना के संदर्भ में चंबल के जल ग्रहण क्षेत्र में वर्षा जल दोहन हेतु किसी नई संरचना के निर्माण पर प्रतिबंध का अगले कुछ वर्षों तक तो कोई प्रतिकूल प्रभाव दिखाई नहीं दिया।

बाद के वर्षों में आबादी में तेज़ वृद्धि और रोज़गार हेतु अन्य व्यवसायों का सृजन नहीं होने से कृषि पर दबाव बढ़ता गया। पूर्व में किसी तालाब के जलग्रहण क्षेत्र में कृषि करने की इजाज़त नहीं दी जाती थी। समय के साथ कृषि भूमि की मांग में वृद्धि होने से सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत से किसान तालाबों के जलग्रहण क्षेत्र की भूमि पर भी खेती करने लगे, जिससे मिट्टी की ज़मीन से पकड़ कम हो गई और वह बहकर तालाबों में आने लगी और तालाब सिकुड़ने लगे। इस तरह मुक्त हुई ज़मीन के अधिक उपजाऊ (Fertile) होने से किसान उस पर भी खेती करने लगे। बाद में राजस्व अधिकारियों की मिलीभगत से इसे अपने नाम भी कराने लगे। इस प्रक्रिया में चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में कितने तालाब नष्ट हुए इसका कोई रिकार्ड नहीं है, परन्तु काफी संख्या में तालाब नष्ट होने का अनुमान है। प्रत्येक क्षेत्र में तालाब की भूमि पर खेती करने के उदाहरण मिल जाएंगे।

सन 1970 के आसपास मालवा क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हरित क्रांति के प्रवेश के चलते कृषि में पानी की मांग तेज़ी से बढ़ी। सिंचाई (Irrigation) की बढ़ती मांग की पूर्ति के लिए वर्षा के पानी के दोहन के सतही स्रोतों से वंचित किसानों के लिए भूजल का दोहन ही एक मात्र सहारा रहा। परिणामस्वरूप मालवा में कुओं और नलकूपों की संख्या तेज़ी से बढ़ने लगी। कुओं से सिंचित क्षेत्र का आकार सन 1966-67 में 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 629.5 हज़ार हैक्टर हो गया। जैसे-जैसे भूजल स्तर नीचे गिरता गया, वैसे-वैसे अधिक गहराई तक खोदने के बावजूद कुओं में पानी की उपलब्धता कठिन होती गई। ऐसे में किसानों ने नलकूपों का सहारा लेना शुरू कर दिया। आंकड़े बताते हैं कि सन 1966-67 में भूजल से सिंचित क्षेत्र 192.8 हज़ार हैक्टर था जो 1998-99 में बढ़कर 738.5 हज़ार हैक्टर (कुओं से 629.5 हज़ार हैक्टर और नलकूपों से 108.5 हज़ार हैक्टर) अर्थात लगभग 7 गुना हो गया। आगे भी यह प्रक्रिया धीमी गति से जारी रही है।

भूजल विशेषज्ञों का कहना है कि कुल भूजल भंडारों के 70 प्रतिशत भाग का दोहन ही सम्पोषणीय होता है, 70 से 90 प्रतिशत दोहन को सेमी क्रिटिकल, 70 से 100 प्रतिशत दोहन को क्रिटिकल तथा 100 प्रतिशत से अधिक दोहन को अतिदोहित भूजल की श्रेणी में रखा जाता है। मालवा में भूजल के दोहन की दृष्टि से ज़िले के आंकड़ों के बजाय विकास खण्ड स्तरीय आंकड़े अधिक उपयुक्त माने जाते है क्योंकि किसी-किसी ज़िले में किसी विकास खण्ड में भूजल भंडारों का दोहन 100 प्रतिशत से अधिक है तो कुछ विकास खंडों में 70 प्रतिशत से भी कम हो सकता है। जल संसाधन विभाग की रिपोर्ट डायनेमिक ग्राउंडवॉटर रिसोर्सेज़ ऑफ मध्य प्रदेश के अनुसार 2009 में मालवा में 34 विकास खंडों में भूजल का दोहन 70 प्रतिशत से अधिक था। भूजल के अतिदोहन से भूजल स्तर नीचे तो जा ही रहा है, उसमें फ्लोरोसिस का खतरा बढ़ता जा रहा है। रतलाम ज़िले को छोड़ शेष 7 ज़िलों में फ्लोराइड (Fluoride) की मात्रा ज़्यादा पाई गई है।

जब हरित क्रांति तकनीक (Green Revoltion Techniques)के फैलाव के कारण भूजल के अतिदोहन के बावजूद पानी की बढ़ती मांग पूरी नहीं हो सकी तो किसानों ने सस्ती बिजली का उपयोग कर क्षेत्र के नदी नालों से पानी पंप कर सिंचाई शुरू कर दी। ऐसे सिंचित क्षेत्र को राजस्व विभाग ‘अन्य स्रोतों से सिंचित’ मद में शामिल करता है। सन 1966-67 में कुओं, नलकूपों, नहरों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र मात्र 208.00 हज़ार हैक्टर था तथा नदी नालों से सीधे सिंचित क्षेत्र मात्र 10.90 हज़ार हैक्टर था। सन 1998-99 में कुओं, नलकूपों और तालाबों से सिंचित क्षेत्र का आकार बढ़कर 809.8 हज़ार हैक्टर अर्थात (1966-67 की तुलना में 3.9 गुना) हो गया, जबकि नदी नालों से सिंचित क्षेत्र सन 1996-97 में 10.9 हज़ार हैक्टर से बढ़कर 688.3 हज़ार हैक्टर हो गया (63 गुना से अधिक वृद्धि)। सन 1998-99 में सिंचित क्षेत्र में वृद्धि में नदी नालों से पानी पंप कर सिंचित क्षेत्र का योगदान 52.6 प्रतिशत रहा। इसके बाद तो नदी नाले सूखने लगे। इस तरह भूजल और सतही जल के अतिदोहन से मालवा की पारिस्थितिकी गड़बड़ा गई।

वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण ऊपर वर्णित समस्याएं तो उत्पन्न हुई ही हैं, गांधीसागर बांध में पर्याप्त मात्रा में पानी पहुंचाने का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो पाया है। गांधीसागर (Gandhisagar) में पानी संग्रहण की क्षमता 6.28 एम.ए.एफ. है, परंतु इसमें पानी आवक के आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो पाते हैं कि सन 1976-77 से सन 1985-86 के दशक में इसमें पानी की औसत आवक 3.31 एम.ए.एफ. और 1993-94 से 2002-03 के दशक में 3.28 एम.ए.एफ. रही है। डेम्स, रिवर्स एंड पीपुल के हिमांशु ठक्कर के अनुसार चंबल घाटी योजना के तीनों बांधों में 1985-86 से 2009-10 की अवधि में विद्युत उत्पादन करीब 3.86 मेगावाट से गिरकर 1.9 मेगावाट ही रह गया।

इस तरह गांधीसागर में पानी की आवक सुनिश्चित करने और निर्धारित मात्रा में बिजली उत्पादन का लक्ष्य भी पूरा नहीं हो सका है। साथ ही इसमें पानी की आवक के स्वरूप में भी परिवर्तन आ गया है। प्रारम्भिक वर्षों में तो जलग्रहण क्षेत्र में 10 इंच वर्षा के बाद ही गांधी सागर में आवक शुरू हो जाती थी, अब 20-22 इंच वर्षा के बाद ही पानी आना शुरू होता है। जल ग्रहण क्षेत्र की प्रारम्भिक वर्षा तो इस क्षेत्र की सूखी मिट्टी द्वारा सोखने और खाली हो चुके नदी नालों को भरने में ही खप जाती है। आवक चंबल में बाढ़ों के माध्यम से ही अधिक होती है।

सन 1961 से 1980 की 20 वर्षीय अवधि में चंबल में आने वाली बाढ़ों का औसत 3.15 प्रति वर्ष रहा जो 1981 से सन 2000 की 20 वर्षीय अवधि में बढ़कर 4.15 प्रति वर्ष हो गया। स्वाभाविक रूप से, बाढ़ों की संख्या में वृद्धि के साथ-साथ उनके साथ बहकर आने वाली मिट्टी की मात्रा में भी वृद्धि हुई होगी और इसी वजह से गांधीसागर की जल भरण क्षमता कम होती जा रही है।

ऐसे में एक प्रश्न उठता है कि क्या कोई ऐसा तरीका भी है जिसके माध्यम से चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के दोहन पर रोक को समाप्त किया जा सके ताकि मालवा पुन: हरा-भरा हो सके, इसमें डग-डग पर इसके नदी नालों में वर्ष भर पानी बहा करे और गांधीसागर में पानी की आवक पर कोई प्रतिकूल प्रभाव भी न पड़े?

इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए हमें राजस्थान और मध्यप्रदेश के समझौते के उस अंश पर पुनर्विचार करना होगा कि गांधीसागर में वर्षा के पानी की आवक बनाए रखने के लिए चंबल के जलग्रहण क्षेत्र में वर्षा के पानी के संग्रहण हेतु किसी संरचना का निर्माण नहीं किया जाएगा। यह भी समझना होगा कि पोखरों, स्टॉप डैम्स तथा जोहड़ों का निर्माण होने दिया जाए तो संभावित परिणाम क्या होंगे। संभावित असर के अनुमान के लिए यह देखना होगा कि जयपुर के तरुण भारत संघ द्वारा अलवर ज़िले की थानागाझी तहसील में जन सहयोग से वर्षा जल के संचयन हेतु बनाए गए तालाबों, पोखरों, जोहड़ों, स्टॉप डैम्स (Stop Dams) आदि संरचनाओं के निर्माण के क्या प्रभाव रहे हैं। उससे पूर्व अलवर के राजा द्वारा वनों पर जनता के अधिकारों को छीनकर अपने अधिकार में लेने के पश्चात् सन 1930 में उस समय बिछाई जा रही रेल पटरियों के लिए लकड़ी की आपूर्ति हेतु सारे जंगलों को काट दिया गया था। जिससे वर्षा का पानी तेज़ी से बहकर नदियों में जाने लगा। वनों के विनाश के साथ ही मिट्टी में जैविक अंशों की कमी से उसकी वर्षा के पानी को धारण करने की क्षमता भी कम हो गई। जिस तरह चंबल के पानी के दोहन हेतु गांधीसागर बांध बनाया गया, उसी तरह क्षेत्र में बहने वाली नदी अरवारी नदी पर भी बांध बनाया गया, परन्तु गांधीसागर की तरह वह भी अधिकांश वर्षों में खाली रहता था, प्रतिकूल पारिस्थितिकी प्रभावों के कारण उस क्षेत्र में खेती भी कम होती जा रही थी, लोग रोज़गार हेतु दिल्ली, जयपुर आदि की ओर पलायन कर रहे थे। अर्थात मालवा की तुलना में थानागाझी तहसील और अरवारी नदी के जलग्रहण क्षेत्र के लोग वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के कारण अपेक्षाकृत अधिक प्रतिकूल प्रभावों के शिकार हो रहे थे।

इसी पृष्ठभूमि में तरुण भारत संघ ने थानागाझी तहसील के गांव गोपालपुरा के मांगूलाल पटेल की सलाह पर उस क्षेत्र में तालाब, पोखर, जोहड़, स्टॉप डैम्स आदि बनाए। ऐसी संरचनाओं की संख्या करीब तीन हज़ार थी। राजस्थान के जल संसाधन विभाग ने यह कहते हुए कि इससे अरवारी नदी पर बने बांध में पानी की आवक पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, इन संरचनाओं के निर्माण का विरोध किया, किन्तु क्षेत्र में तालाब, पोखर आदि संरचनाओं का निर्माण तो एक जन आन्दोलन का अंग था, अत: सरकार उनके निर्माण को रोकने में असमर्थ रही। तरुण भारत संघ के नेतृत्व में क्षेत्र के 650 गांवों के निवासियों ने कुल 3000 संरचनाओं का निर्माण किया। यह सारा कार्य किसी इंजीनियर की सलाह के बगैर स्थानीय निवासियों के परम्परागत ज्ञान पर आधारित था। परिणाम यह हुआ कि कुछ ही समय बाद क्षेत्र की 5 सूख चुकी नदियों में पुन: वर्ष भर पानी बहने लगा और अरवारी नदी पर बने बांध में भी पर्याप्त पानी आने लगा। अरावली पर्वत के हरे-भरे हो जाने से वर्षा के पानी के धीमी गति से बहने तथा मिट्टी में नमी बढ़ने से वर्ष में दो फसलें लेना और पशुपालन भी आसान हो गया। क्षेत्र में प्रतिदिन करीब 20 हज़ार कि.ग्रा. दूध पैदा होने लगा। पूरे क्षेत्र के किसानों की आर्थिक स्थिति (Economical Condition) में काफी सुधार हुआ। अरवारी तहसील में वर्षा जल के दोहन हेतु संरचनाओं के निर्माण के अनुकूल प्रभावों पर पूरे भारत का ही नहीं, पूरे विश्व का ध्यान आकर्षित हुआ। क्षेत्र की जनता और तरुण भारत संघ के राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत करने के लिए तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन स्वयं क्षेत्र के ग्राम हमीरपुरा में पधारे। इस कार्य के लिए उन्हें डाउन टु अर्थ-जोसेफ सी. जॉन पुरस्कार भी दिया गया। विश्व की अन्य संस्थाओं ने भी श्री राजेन्द्र सिंह को पुरस्कृत किया।

चंबल के जलग्रहण क्षेत्र को भी थानागाझी तहसील में वर्षा के जल दोहन हेतु किए गए कार्य को दोहराना होगा। समाज के लोगों को वर्तमान में वर्षा जल के दोहन पर लगाई रोक के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक तथा क्षेत्र में वर्षा जल (Rainwater) के संचयन हेतु नई संरचनाओं के निर्माण के लिए प्रेरित करना मुश्किल नहीं होगा। सरकार भी इस कार्य में मदद कर सकती है। मालवा के नीमच तहसील के ग्राम बरलाई के किसानों ने वर्षा जल के संचयन हेतु सराहनीय कार्य किया है। ऐसा ही अन्य क्षेत्रों के किसान आसानी से कर सकेंगे। आवश्यकता है तो केवल राजेन्द्र सिंह जैसे व्यक्तित्व की जो इस क्षेत्र को इस दिशा में प्रेरित कर सकें। मालवा में वर्षा जल के दोहन पर प्रतिबंध के 55 वर्षों के प्रतिकूल प्रभावों के बाद अब इस क्षेत्र के पारिस्थितिकीविदों, किसानों और अन्य को इनसे मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ना ही होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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क्या कीटनाशकों से बढ़ रहा मधुमेह का खतरा?

सक्रिय जीवनशैली (active lifestyle)  और छरहरी काया वाले किसी किसान को टाइप-2 डायबिटीज़ हो जाए, हैरानी स्वाभाविक है। वजह अभी साफ नहीं है, लेकिन खेतों में रोज़ाना कीटनाशकों से संपर्क (pesticide exposure) को एक संदिग्ध कारण मानते हुए कुछ शोध कार्य हुए हैं।

दुनिया भर में कीटनाशकों का इस्तेमाल बहुत तेज़ी से बढ़ा है और अब हर साल इनका उपयोग लाखों टन है। प्राय: वैज्ञानिक इनके असर को सिर्फ तात्कालिक नुकसान (ज़हर या मस्तिष्क पर असर) तक ही देखते थे। अब समझा जा रहा है कि ये रसायन हमारे शरीर के सूक्ष्मजीवों (microbiome impact) को कैसे प्रभावित करते हैं, जिसके दीर्घकालिक असर हो सकते हैं।

उदर का सूक्ष्मजीव संसार (gut microbiome) हमारे शरीर में मौजूद लाखों-करोड़ों सूक्ष्मजीवों का एक जटिल समूह है, जो पाचन, रोग प्रतिरोधक क्षमता और शरीर के चयापचय में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसमें होने वाले बदलाव मधुमेह (diabetes risk)  और मानसिक समस्याओं को जन्म दे सकते हैं। हाल के शोध यह भी बताते हैं कि कीटनाशक इस संतुलन को बिगाड़ सकते हैं।

दक्षिण भारत के एक अध्ययन में एक दिलचस्प बात सामने आई। शहरों में डायबिटीज़ का सम्बंध मोटापे जैसे आम कारणों से दिखता है, लेकिन गांवों में बिना इन कारणों के भी मधुमेह के मामले काफी ज़्यादा थे। वैज्ञानिकों को लगा कि शायद पर्यावरण से जुड़े कारक (environmental factors) – जैसे कीटनाशक – इसमें भूमिका निभा रहे होंगे।

इसको और समझने के लिए वैज्ञानिकों ने चूहों पर एक आम कीटनाशक (क्लोरपायरीफॉस) (chlorpyrifos pesticide) के साथ प्रयोग किया। उन्होंने थोड़े समय के लिए अधिक मात्रा देने की बजाय, कई महीनों तक कम मात्रा में देकर इसका असर देखा, जैसा कि असल जीवन में होता है। नतीजे चौंकाने वाले थे – कीटनाशक ने उदर के सूक्ष्मजीव संसार (gut bacteria imbalance) को बदल दिया; अच्छे बैक्टीरिया कम हो गए और हानिकारक बैक्टीरिया बढ़ गए। इसके साथ ही चूहों में रक्त शर्करा बढ़ गई और मधुमेह जैसे लक्षण दिखने लगे, जबकि उनके वज़न में कोई वृद्धि नहीं हुई थी।

आगे के अध्ययन (scientific findings) से यह भी संकेत मिला कि जब आंत के सूक्ष्मजीव इन कीटनाशकों को तोड़ते हैं, तो ऐसे पदार्थ बनते हैं जो लीवर में ग्लूकोज़ बनने की प्रक्रिया को प्रभावित कर सकते हैं। जिससे रक्त शर्करा बढ़ सकती है।

अन्य अध्ययनों से यह भी पता चला है कि कीटनाशक सिर्फ आंत में मौजूद बैक्टीरिया की संख्या ही नहीं बदलते, बल्कि उनके काम करने के तरीके (microbial function) को भी प्रभावित करते हैं। जब इन बैक्टीरिया को अलग-अलग कीटनाशकों के संपर्क में रखा गया, तो यह देखा गया कि वे उन ज़रूरी पदार्थों का उत्पादन बदल देते हैं जो आंत की सेहत, शोथ को नियंत्रित करने और रोग प्रतिरोधक क्षमता बनाए रखने में मदद करते हैं। कुछ बैक्टीरिया तो इन कीटनाशकों को अपने अंदर जमा (bioaccumulation) भी कर लेते हैं, जिससे शरीर में उनका असर लंबे समय तक बना रह सकता है।

इन बदलावों का असर काफी दूर तक जा सकता है। हमारी आंत और मस्तिष्क के बीच एक सम्बंध (gut brain axis) होता है, जिसे ‘गट–ब्रेन एक्सिस’ कहा जाता है। अगर इसके कामकाज में गड़बड़ी आती है, तो यह हमारे मूड, व्यवहार और मस्तिष्क की सेहत को प्रभावित कर सकता है। जंतुओं पर किए गए कुछ अध्ययनों में यह भी देखा गया है कि कीटनाशकों के संपर्क से अवसाद जैसे लक्षण (depression symptoms) उभर सकते हैं।

हालांकि ये नतीजे महत्वपूर्ण हैं, वैज्ञानिकों का कहना है कि मनुष्यों में इनके पुख्ता सबूत (human studies) अभी नहीं मिले हैं। आंतों का सूक्ष्मजीव-संसार खान-पान, जीवनशैली और जीन्स से प्रभावित होता है, इसलिए यह तय करना मुश्किल है कि कीटनाशकों का असर कितना है। इसके अलावा, लोग लंबे समय तक कई तरह के रसायनों के संपर्क (chemical exposure) में रहते हैं, जिससे साफ निष्कर्ष निकालना और कठिन हो जाता है।

फिर भी, शुरुआती मानव अध्ययनों (early research evidence) से कुछ संकेत मिलते हैं। एक अध्ययन में सभी लोगों के शरीर में कीटनाशकों के अवशेष पाए गए, खासकर उन लोगों में जो ज़्यादा फल और सब्ज़ियां (fruit vegetable intake) खाते थे। इन अवशेषों का सम्बंध आंतों के सूक्ष्मजीव-संसार में बदलाव से भी देखा गया। इस संदर्भ में और शोध ज़रूरी है।

एक बड़ा सवाल अभी भी बाकी है – क्या सूक्ष्मजीव-संसार को पहुंचे नुकसान को फिर से ठीक किया जा सकता है? लोग अक्सर सोचते हैं कि प्रोबायोटिक्स (probiotics benefits) या खान-पान बदलकर इसे ठीक किया जा सकता है, लेकिन वैज्ञानिकों का कहना है कि आंतों का सूक्ष्मजीव-संसार बहुत जटिल (complex microbiome) होता है और इसे आसानी से बहाल करना संभव नहीं है।

फिलहाल विशेषज्ञ यही सलाह देते हैं कि कीटनाशकों से संपर्क कम से कम (reduce pesticide exposure) किया जाए। इसके लिए खेती के तरीकों में बदलाव (sustainable farming), खाने की आदतों में सुधार या सुरक्षा उपाय अपनाए जा सकते हैं। लेकिन खासकर किसानों के लिए इससे पूरी तरह बचना आसान नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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गाजर के डंठल-छिलकों से खाद्य सामग्री का निर्माण

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन

जैसे-जैसे दुनिया की आबादी (global population growth) बढ़ रही है, ज़्यादा दिन चलने वाले और पौष्टिक खाद्य की ज़रूरत भी बढ़ रही है। इस सम्बंध में, 2024 में लुबिस एवं साथियों द्वारा संपादित पुस्तक बायोमास कन्वर्ज़न एंड सस्टेनेबल बायोरिफाइनरी पठनीय है। यह किताब जैविक पदार्थ (बायोमास) अपशिष्ट का अन्य रूप में उपयोगी इस्तेमाल और बायोरिफाइनरी इस्तेमाल में हुई हालिया तरक्की पर प्रकाश डालती है, और प्रबंधित पुनर्उपयोग से जैविक अपशिष्ट और उप-उत्पादों को कम करने के तरीकों पर चर्चा करती है। विश्व स्वास्थ्य संगठन का कहना है कि जैसे-जैसे आबादी बढ़ रही है, जैविक कचरे को खाद्य उत्पादों में तब्दील करने के तरीके (food waste conversion) खोजना आवश्यक होता जा रहा है।

हमारे भोजन में कई तरह की सब्ज़ियां, अंडे और मांस शामिल होते हैं। इनको पकाने के लिए काटते या साफ करते समय हम इनका अखाद्य हिस्सा (food waste) (छीलकर या छांटकर) अलग करते हैं, और कचरे की तरह फेंक देते हैं। गाजर के साथ भी हम यही करते हैं, इसका छिलका, ऊपरी नोंक और डंठल तरफ का हिस्सा हम छील-काटकर अलग कर देते हैं। गाजर के कुछ हिस्सों से हम मिठाई भी बनाते हैं, और बाकी हिस्सा खाने लायक न होने के कारण फेंक देते हैं, जो बर्बाद ही जाता है। उपरोक्त पुस्तक में गगन जे. कौर और साथियों का आलेख इस मुद्दे पर विस्तार से बात करता है; शीर्षक है ‘असेसमेंट ऑफ कैरट रिजेक्ट्स एंड वेस्ट्स फॉर फूड प्रोडक्ट एंड एज़ ए बायोफ्यूल’ (carrot waste utilization, biofuel research)।

इसी संदर्भ में, दिसंबर 2025 में जर्नल ऑफ एग्रीकल्चरल एंड फूड केमिस्ट्री (Journal of Agricultural and Food Chemistry) में जर्मनी की गीसेन युनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट ऑफ फूड केमिस्ट्री (University of Giessen research) के मार्टिन गैंड के नेतृत्व में एक अंतर्राष्ट्रीय वैज्ञानिक दल का शोध पत्र छपा था। यह अध्ययन गाजर के कचरे से कवक पनपाने की बात करता है। कवकों (फफूंद) के पोषण प्राप्त करने के तरीके पौधों और जंतुओं से सर्वथा अलग हैं।

पौधों के विपरीत, कवक प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) नहीं करते। उनमें जड़ें भी नहीं होतीं कि जिनकी मदद से वे बढ़ सकें। बल्कि कवक तो बाहरी स्रोतों से अपना भोजन-पोषण प्राप्त करते हैं (fungal nutrition)। और तो और, जंतुओं से उलट, कवक पाचन के पहले भोजन ग्रहण नहीं करते, बल्कि वे जैविक चीज़ों को तोड़ने/पचाने के लिए अपने आसपास शक्तिशाली एंज़ाइम छोड़ते हैं और फिर मायसेलिया (mycelium network) की मदद से अपने आसपास मौजूद पोषण अवशोषित करते हैं। बताते चलें कि मायसेलिया कवक में जड़ जैसी संरचना होती है जो तंतुनुमा जाल बनाती है।

पोषण हासिल करने का अनोखा तरीका उन्हें विभिन्न पर्यावरणों (ecosystem adaptation) में पनपने के काबिल बनाता है और उनकी पारिस्थितिक भूमिकाओं (ecological role of fungi)  को मज़बूत करता है। कवक में लगभग हर जैविक चीज़ को अपघटित करने की ज़बरदस्त क्षमता भी होती है, जिसमें वह खाद्य कचरा (organic food waste) भी शामिल है जिसे हम पचा नहीं पाते।

कवक का एक आम उदाहरण मशरूम (mushroom fungi) है, जिसका इस्तेमाल शोरबा, तरी, पास्ता और पिज़्ज़ा बनाने में किया जाता है। यह पूरी तरह से शाकाहारी खाद्य है और इसमें विटामिन तथा एंटीऑक्सीडेंट (antioxidants) भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं। मशरूम ऐसे कवक हैं जो उपलब्ध बाहरी पोषक तत्वों का इस्तेमाल करके पनपते हैं, जिनमें खाद्य कचरा भी शामिल है। हमारे आहार में भी मशरूम शामिल हो सकते हैं। दिसंबर 2025 में एक शोध समूह ने विभिन्न देशों के 100 से ज़्यादा तरह के मशरूम का परीक्षण (edible mushrooms research)  किया और पाया कि वे गैर-खाद्य कचरे को उपयोगी बनाने में काफी असरदार हैं।

शोधकर्ताओं ने गाजर के कचरे (carrot waste recycling) पर अध्ययन केंद्रित किया, और देखा कि कवक उन्हें कैसे पचाते हैं और उससे खाने लायक चीज़ें बनाते हैं। उदाहरण के लिए, टीम ने गाजर के छिलके वगैरह पर पनपाए गुलाबी ओइस्टर मशरूम के मायसेलिया से वीगन पैटीज़ बनाई। ये वीगन पैटीज़ (vegan patties) कुछ व्यंजनों में सोया की जगह इस्तेमाल (soy protein alternative) की जा सकती हैं।

हममें से कई लोग अपने भोजन में कई तरह से गाजर (carrot recipes) खाते हैं; जैसे सब्ज़ी बनाकर, सलाद में या गाजर का हलवा वगैरह बनाकर। लेकिन रसोइए और आहारविद सलाह देंगे कि हमें इन व्यंजनों में मशरूम (mushroom nutrition)  का ज़्यादा इस्तेमाल करना चाहिए क्योंकि ये सेहत के लिए फायदेमंद हैं। कवक की मदद से खाद्य कचरे को प्रोटीन और विटामिन युक्त खाद्य (sustainable food production) में बदलकर भविष्य में शायद खाद्य सुरक्षा (food security) हासिल की जा सकती है। (स्रोत फीचर्स)

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कीटनाशकों का उपयोग मछलियों की उम्र घटा रहा है

साइंस पत्रिका (Science journal) में प्रकाशित हालिया शोध पत्र से पता चला है कि फसलों में इस्तेमाल होने वाला क्लोरपायरीफॉस नामक कीटनाशक (chlorpyrifos pesticide) मछलियों की कोशिकाओं को तेज़ी से बूढ़ा बना रहा है। इससे समय से पहले उनकी मृत्यु हो जाती है।

गौरतलब है कि क्लोरपायरीफॉस मनुष्यों, खासकर बच्चों, के तंत्रिका तंत्र को नुकसान पहुंचा सकता है। इस कारण युरोपियन यूनियन और यूएस के कई राज्यों में यह प्रतिबंधित (European Union ban)  है, जबकि कई देशों में इसका अब भी इस्तेमाल जारी है। आम तौर पर इसका उपयोग सेब, संतरा और गेहूं जैसी फसलों पर किया जाता है। बारिश के बाद यह रसायन बहकर नदियों और झीलों में पहुंच जाता है।

इसके दीर्घावधि असर को समझने के लिए वैज्ञानिक चुनशेंग लियू की टीम ने मीठे पानी की मछली (freshwater fish study) पर अध्ययन किया। चार वर्षों तक उन्होंने चीन के हुबेई प्रांत की तीन बड़ी झीलों से 24 हज़ार से अधिक मछलियां इकट्ठा कीं। इनमें से दो झीलों में सालों से खेती से प्रदूषित पानी आ रहा था, जबकि एक झील अपेक्षाकृत साफ थी।

उन्होंने पाया कि प्रदूषित झीलों में बड़ी और उम्रदराज मछलियां की संख्या काफी कम थी। तीन साल से अधिक उम्र की मछलियों की संख्या लगभग 96 प्रतिशत तक घट चुकी थी। यह भी दिखा कि जिन वर्षों में मछलियों के शरीर में क्लोरपायरीफॉस की मात्रा अधिक थी, उन वर्षों में बूढ़ी मछलियां सबसे कम मिलीं (fish population decline)।

जांच करने पर वैज्ञानिकों को प्रदूषित झीलों की मछलियों की कोशिकाओं में भारी मात्रा में लिपोफुसिन (lipofuscin accumulation) नाम का अपशिष्ट मिला, जो आम तौर पर उम्र बढ़ाने का काम करता है। इससे भी अधिक चिंता की बात टेलोमेयर में आए बदलाव (telomere shortening) थे। टेलोमेयर डीएनए के सिरों पर मौजूद सुरक्षा कवच होते हैं, जो उम्र के साथ धीरे-धीरे छोटे होते जाते हैं। जिन मछलियों पर क्लोरपायरीफॉस का असर पड़ा था, उनके टेलोमेयर सामान्य से कहीं ज़्यादा छोटे पाए गए। इनके छोटे हो जाने का मतलब है बीमारी और जल्दी मौत का खतरा। इससे साफ संकेत मिला कि यह कीटनाशक मछलियों की कोशिकाओं को तेज़ी से बूढ़ा कर रहा है।

पुष्टि के लिए प्रयोगशाला में भी परीक्षण (laboratory experiment) किया गया। मछलियों को बहुत ही कम मात्रा में क्लोरपायरीफॉस दिया गया – उतना ही जितना झीलों के पानी में था। चार महीने बाद साफ पानी में रखी सभी मछलियां ज़िंदा रहीं, लेकिन जिन टैंकों में कीटनाशक था, वहां बूढ़ी मछलियों में से लगभग आधी मर गईं और उनके टेलोमेयर लगभग एक-तिहाई तक छोटे हो चुके थे।

अध्ययन से स्पष्ट है कि रासायनिक प्रदूषण (chemical pollution) न केवल ज़हरीला होता है बल्कि जीवों को जल्दी बूढ़ा भी करता है। हालांकि अभी इंसानों पर इसके सीधे असर (human health impact) को लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता, लेकिन वैज्ञानिक चेताते हैं कि ऐसी ही जैविक प्रक्रियाएं इंसानों में भी होती हैं।

यदि कीटनाशकों का इस्तेमाल ऐसे ही चलता रहा, तो रसायन चुपचाप पूरे पारिस्थितिकी तंत्र (ecosystem damage) को बदल देंगे। (स्रोत फीचर्स)

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जलवायु बदलाव का समाधान आजीविका रक्षा से जुड़े

भारत डोगरा

जलवायु बदलाव (climate change) की समस्या के समाधान के रूप में विश्व स्तर पर दो तरह के प्रयास चर्चित हैं। पहला तो यह है कि इसके लिए ज़िम्मेदार ग्रीनहाऊस गैसों (greenhouse gases) के उत्सर्जन को कम किया जाए। दूसरा, कि इस समस्या का सामना करने के लिए लोगों व समुदायों की तैयारी बेहतर हो। इन दो पक्षों को प्रायः मिटिगेशन व एडाप्टेशन कहा जाता है व ये दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। आगे चुनौती ऐसा कार्यक्रम बनाने की है जिनसे लोगों की आजीविका भी बेहतर हो तथा साथ में जलवायु बदलाव संकट के इन दोनों पक्षों पर भी कार्य आगे बढ़ सके।

भारत जैसे विकासशील देशों (developing countries) के संदर्भ में तो यह चुनौती और भी अहम है क्योंकि जहां जलवायु बदलाव के संदर्भ में हमें अपनी ज़िम्मेदारी अवश्य निभानी है पर साथ में आजीविका व आर्थिक पक्ष (economic development) को भी आगे बढ़ाना है। ऐसे कार्यक्रम बनाने होंगे जिनमें उचित समन्वय बन सके। फिर भारत जैसे देश में यह समन्वय ग्रामीण क्षेत्रों में बनाना तो और भी ज़रूरी हो गया है।

यदि हम पहले पक्ष ‘मिटिगेशन’ या ग्रीनहाऊस गैसों के उत्सर्जन को कम करने की बात करें तो प्राकृतिक खेती (natural farming) व बागवानी (sustainable agriculture) को बढ़ाना इसमें अहम कदम है। प्राकृतिक खेती व बागवानी को बढ़ाकर कृषि पर ग्रीनहाऊस गैस का अत्यधिक उत्सर्जन करने वाले जीवाश्म ईंधन का जो बड़ा बोझ है, उसे कम किया जा सकता है। यदि किसी गांव में प्राकृतिक खेती के त्वरित प्रसार से रासायनिक खाद व कीटनाशक दवा आदि का उपयोग कम होता है तो जीवाश्म ईंधन का उपयोग व ग्रीनहाऊस गैसों का उत्सर्जन भी कम हो जाएगा। इसके अतिरिक्त अनेक छोटे औज़ारों के उपयोग को प्रोत्साहित कर बड़ी मशीनों व ट्रैक्टरों आदि में डीज़ल की अधिक खपत की संभावना भी कम होती है।

प्राकृतिक खाद (organic manure) के उपयोग से व प्राकृतिक खेती से खेतों की मिट्टी में जैविक तत्व बढ़ता है, उसकी मिट्टी में कार्बन संजोने की क्षमता (carbon sequestration) बढ़ती है व वायुमंडल में कार्बन डाईक्साइड का उत्सर्जन कम होता है।

किसान छोटे बगीचों में फलदार पेड़ लगा सकते हैं, गावों के आसपास मिश्रित स्थानीय प्रजातियों के वृक्ष (native species) इस तरह साथ-साथ लगाए जा सकते हैं कि वे एक साथ एक-दूसरे से सहयोग करते हुए पनप सकें।

दूसरी ओर, जलवायु बदलाव व उससे जुड़े प्रतिकूल मौसम और आपदाओं का सामना बेहतर ढंग से करने की क्षमता यानी एडाप्टेशन (climate resilience) के लिए जल व मिट्टी संरक्षण (water and soil conservation) सबसे महत्त्वपूर्ण है। जल व मिट्टी संरक्षण से सूखे व बाढ़ (drought and flood) दोनों तरह की आपदाओं को कम करने में मदद मिलती है व साथ में ग्रामीण आजीविकाओं का मज़बूत आधार तैयार होता है। सामान्य वर्ष में भी कुछ महीनों के लिए अनेक गांवों के जल-स्रोत सूख जाते हैं। यह स्थिति गांववासियों के लिए ही नहीं, पशु-पक्षियों के लिए भी बड़ा संकट बन जाती है।

वन्य जीव-जंतुओं (wildlife) व आवारा घूम रहे पशुओं के लिए भी प्यास का संकट बढ़ जाता है। जल-संरक्षण से यह संभावना बढ़ती है कि इन जल-स्रोतों में वर्ष भर पानी की उपस्थिति बनी रहेगी। जल संरक्षण से भूजल स्तर (groundwater level) ठीक बना रहता है जिससे कुंओं व हैंडपंप आदि से पानी मिलता रहता है। अधिक वर्षा के समय बहुत-सा पानी विभिन्न गांवों में व उनके जल-स्रोतों व खेतों में संरक्षित रह जाए तो विभिन्न स्थानों पर बाढ़ की संभावना अपने आप कम हो जाएगी।

प्रतिकूल मौसम (extreme weather) के समय में मिश्रित खेती (mixed cropping) की पद्धति से फसल के कुछ हिस्से को बचाने की संभावना बढ़ जाती है। मिश्रित खेती को कई स्तरों पर बढ़ावा देकर व छोटे किसानों को खेतों में अनाज, दलहन, तिलहन के साथ कई तरह की सब्ज़ियां व फल लगाने को प्रोत्साहित कर उन्हें प्रतिकूल मौसम में भी सशक्त रहने के लिए सक्षम बनाया जा सकता है।

प्राकृतिक खेती की इन तकनीकों से किसानों का खर्च बहुत कम (low-cost farming) हो सकता है। यदि खर्च कम होगा तो कर्ज़ की ज़रूरत भी कम हो जाएगी। इस तरह, छोटे किसान जलवायु बदलाव के अधिक कठिन दौर का सामना करने में सक्षम हो जाएंगे। दूसरी ओर, किसानों की बीज सम्बंधी आत्म-निर्भरता (seed self-reliance) को बढ़ाने पर भी अधिक ध्यान देना चाहिए। आत्म-निर्भरता बढ़ने से जलवायु बदलाव का सामना करने की क्षमता बढ़ जाती है।

जिन समुदायों में आपसी सहयोग व एकता (community cooperation) बढ़ती है, उनकी जलवायु बदलाव के दौर का आपसी सहयोग से बेहतर ढंग से सामना करने की क्षमता भी बढ़ती है। ज़रूरत है कि ग्रामीण समुदाय आपसी सहयोग को बढ़ाएं, उनके स्व-सहायता समूह (self-help groups) गठित किए जाएं, अधिक व्यापक स्तर पर भी संगठन बनाए जाएं, सबके सहयोग से सामाजिक उद्यम (social enterprises) स्थापित किए जाएं।

उपरोक्त सभी प्रयास सृजन संस्था ने निरंतर अपने कार्यक्रमों के ज़रिए किए हैं। इन कार्यक्रमों का मूल उद्देश्य ग्रामीण आजीविकाओं (जैसे कृषि, बागवानी, बकरी-पालन) को टिकाऊ तौर पर बेहतर और समृद्ध करना है व इसमें विशेष तौर पर कमज़ोर वर्ग व उसमें भी महिलाओं (women empowerment) पर विशेष ध्यान दिया जाता है। सृजन के कार्यक्रमों के अन्तर्गत छोटे बगीचों में फलदार पेड़ लगाने के अतिरिक्त तपोवन नामक मानव-निर्मित वन (community forests) अनेक गांवों में लगाए गए हैं जिनमें मिश्रित स्थानीय प्रजातियों के हज़ारों वृक्ष साथ-साथ लगाए गए हैं। कार्यक्रम जलवायु बदलाव के संकट के दोनों पहलुओं के लिहाज़ से बहुत मददगार सिद्ध हो रहा है।

इस तरह अनेक स्तरों पर जो कार्य ग्रामीण आजीविका आधार को मजबूत करते हैं, वे जलवायु बदलाव (climate action) की गंभीर समस्या के संदर्भ में भी मददगार होते हैं। एक ओर वे जलवायु बदलाव के संकट को कम करने में सहयोग करते हैं तो दूसरी ओर, प्रतिकूल मौसम और आपदाओं का सामना करने की ग्रामीण समुदायों की क्षमता को बढ़ाते भी हैं। इन कार्यक्रमों के इस व्यापक महत्व व समन्वय क्षमता को देखते हुए इन्हें सरकारी व सी.एस.आर. स्तर (CSR initiatives) पर अधिक सहयोग व समर्थन प्राप्त होना चाहिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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