जलचर स्तनधारियों को सिटेशियन कहते हैं। इनमें व्हेल, डॉल्फिन तथा पॉरपॉइज़ शामिल हैं। और इनमें भी वैज्ञानिक देखते आए हैं कि डॉल्फिन का भोजन हासिल करने का तरीका बहुत विचित्र है। आम तौर पर डॉल्फिन करती यह है कि किसी मछली का पीछा करेंगी। वे उस मछली को खाएंगी नहीं बल्कि उसने जो शिकार पकड़ा है उसे छीनकर खा जाएंगी? इसे चोर-परजीविता या क्लेप्टोपैरासिटिज़्म कहते हैं। 2015 में जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय के समुद्री जीव वैज्ञानिक जेनेट मैन ने बताया था कि ऑस्ट्रेलिया की शार्क बे में उन्होंने देखा है कि एक डॉल्फिन ने तीन पनकौओं की चोंच से मछली छीन ली। लेकिन समुद्री जीवों में यह व्यवहार बहुत कम देखने को मिलता है।
और अब तो इन्तहा हो गई है। एक डॉल्फिन विशेष (जिसे स्थानीय लोग बबल्स कहते हैं) ने अजीब व्यवहार का प्रदर्शन किया है। बबल्स किसी मछली का पीछा करेगी और फिर वह उसकी कै को चट कर जाएगी। सनशाइन कोस्ट विश्वविद्यालय की समुद्री जीव वैज्ञानिक एशिया आर्मस्ट्रॉन्ग को बबल्स के बारे में जानकारी 2017 में दक्षिणी ग्रेट बैरियर रीफ के लेडी एलियट द्वीप के नज़दीक बनाए गए एक वीडियो से मिली थी। यह एक बॉटलनोज़ डॉल्फिन (टर्सिओप्स ट्रन्केटस – Tursiops truncatus) थी। आर्मस्ट्रॉन्ग की टीम ने आगे खोजबीन की।
जून 2021 से अक्टूबर 2025 के बीच इस टीम ने बिगआई ट्रेवेली मछली (Caranx sexfasciatus) के झुंड में शिकार करती बबल्स की गतिविधियों को रिकॉर्ड किया। हालांकि डॉल्फिन कभी-कभार मछलियां खाती हैं लेकिन यहां सारी मछलियों को छोड़कर डॉल्फिन एक के पीछे पड़ गई। उसने ट्रेवेली का काफी नज़दीक से तब तक पीछा किया किया जब तक कि वह उल्टी करके भाग नहीं गई। तब उस डॉल्फिन ने वह कै खा डाली। और तो और, इस डॉल्फिन ने अगले तीस मिनट में यही वारदात 10 अन्य ट्रेवेली मछलियों के साथ दोहराई।
उसने मछली को खाने की बजाय उसके उल्टी करने का इन्तज़ार क्यों किया, इस मामले में आर्मस्ट्रॉन्ग ने एक परिकल्पना प्रस्तुत की है। हो सकता है कि अतीत में बबल्स उस ट्रेवेली को खाने के इरादे से ही झपटती रही होंगी लेकिन जब उसका पचा-पचाया भोजन (वमन) मिल गया तो उन्होंने रास्ता बदल लिया। वैसे भी ट्रेवेली काफी बड़ी होती है और उसे चबाने, हजम करने में समय और मेहनत लगती होगी। उसके मुकाबले उल्टी को संभालना ज़्यादा आसान साबित हुआ होगा।
अलबत्ता, इस चोर-परजीविता में भी बबल्स ने मेहनत तो की थी। ट्रेवेली समूह से उलझने से पहले बबल्स ने अपने सिर को दाएं-बाएं करते हुए क्लिक की ध्वनि उत्पन्न की। उसके बाद एक अकेली ट्रेवेली का पीछा करते वक्त उसने बार-बार क्लिकिंग ध्वनि निकाली और कई सारी निम्न आवृत्ति की ध्वनियां भी पैदा कीं। डॉल्फिन अपनी आवाज़ की प्रतिध्वनि की मदद से मछली के आकार, आकृति और संघटन में बारीक फर्क का अंदाज़ा लेती हैं। आर्मस्ट्रॉन्ग की टीम को लगता है कि सिर को दाएं-बाएं झटके देकर बबल्स को यह पता करने में मदद मिलती होगी कि किस ट्रेवेली ने अभी-अभी किसी शिकार को चट किया है। दूसरी ओर पीछा करने को दौरान उत्पन्न क्लिक ध्वनियां ट्रेवेली को उल्टी करने को उकसाती होंगी। वैसे शोधकर्ताओं को अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्लिक की आवाज़ें ट्रेवेली से उल्टी कैसे करवाती हैं। यह भी हो सकता है कि मछली डॉल्फिन से पीछा छुड़ाने के लिए वैसे ही उल्टी कर देती हो। बहरहाल, डॉल्फिन को तो भोजन मिल ही जाता है। (स्रोत फीचर्स)
अनुकूल समय की प्रतीक्षा में बीजों का कई दिनों, महीनों या वर्षों तक निष्क्रिय पड़े रहना किसी चमत्कार से कम नहीं है। इसे बीज की सुप्तावस्था कहते हैं। बाहर से पूरी तरह से निर्जीव और शांत प्रतीत होने वाला छोटा-सा बीज, अपने भीतर जीवन की एक असीम संभावना को समेटे रहता है। वनस्पति विज्ञान के नज़रिए से, सुप्तावस्था कोई निष्क्रिय अवस्था नहीं है, बल्कि यह पौधे की उत्तरजीविता की रणनीति है। यह वह तंत्र है जो बीज को यह तय करने की क्षमता देता है कि उसे कब अंकुरित होना है और कब अपनी ऊर्जा को बचाकर सुप्त पड़े रहना है।
जैव विकास के लंबे सफर में पौधों में यह प्रणाली इसलिए विकसित हुई है ताकि उनके बीज प्रतिकूल मौसम में अंकुरित होकर नष्ट न हो जाएं। नमी, तापमान और प्रकाश की आदर्श स्थितियां मिलने तक बीज सुप्तावस्था में रहते हैं। क्या आपने कभी सोचा है कि बीज को यह कैसे पता चलता है कि बाहर का मौसम अंकुरण के लिए सुरक्षित है या नहीं? इसी गूढ़ प्रश्न का उत्तर अब वैज्ञानिकों ने एक ‘जैविक स्विच’ के रूप में खोज निकाला है।
आधुनिक कृषि के सामने बीजों, खासकर गेहूं के बीजों, का समय से पहले (पौधे पर लगे-लगे ही) अंकुरित होना एक अत्यंत गंभीर चुनौती बन चुका है। इस समस्या को ‘प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग’ कहा जाता है। कल्पना कीजिए कि गेहूं की फसल खेत में पूरी तरह से पककर कटाई के लिए तैयार है, लेकिन तभी अचानक बेमौसम बारिश हो जाती है या वातावरण में नमी का स्तर अप्रत्याशित रूप से बढ़ जाता है। ऐसी स्थिति में, अगर बीजों का सुप्तावस्था तंत्र कमज़ोर है, तो वे बालियों में ही अंकुरित होने लगते हैं। इस अवांछित अंकुरण के कारण अनाज के भीतर मौजूद स्टार्च टूटने लगता है और महत्वपूर्ण एंज़ाइम सक्रिय हो जाते हैं, जिससे गेहूं की गुणवत्ता, उसका पोषण मूल्य और उसके पकाने सम्बंधी गुण पूरी तरह से नष्ट हो जाते हैं। वैश्विक स्तर पर, प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग के कारण केवल गेहूं की फसल में हर साल अरबों डॉलर तक का नुकसान होता है।
इस समस्या के मुकम्मल समाधान की दिशा में वनस्पति विज्ञानियों और आनुवंशिकी विशेषज्ञों ने एक युगांतरकारी खोज की है। वैज्ञानिकों ने गेहूं (ट्रिटिकम एस्टिवम) के जीनोम में TaNAC018-7D नामक एक विशेष जीन की पहचान की है। यह जीन एक प्रतिलेखन कारक के रूप में कार्य करता है। प्रतिलेखन कारक वे विशेष प्रोटीन होते हैं जो डीएनए से जुड़कर यह नियंत्रित करते हैं कि कौन सा जीन ‘चालू’ होगा और कौन सा ‘बंद’। TaNAC018-7D एक मास्टर कंट्रोलर या जैविक स्विच की तरह काम करता है, जिसका मुख्य काम बीज के भीतर सुप्तावस्था (डॉरमेंसी) के स्तर को निर्देशित करना है। यह जीन ही अंततः निर्धारित करता है कि बारिश की कुछ बूंदों के संपर्क में आने के बाद बीज को तुरंत अंकुरित हो जाना चाहिए या अभी प्रतीक्षा करनी चाहिए।
इस जैविक स्विच की कार्यप्रणाली को गहराई से समझने के लिए, हमें बीजों के भीतर चल रही अभिक्रियाओं को समझना होगा। बीजों के अंकुरण और सुप्तावस्था के बीच का पूरा संतुलन मुख्य रूप से दो हार्मोन्स – एब्सिसिक एसिड (ABA) और जिबरेलिक एसिड (GA) – के बीच की रस्साकशी है। एब्सिसिक एसिड सुप्तावस्था का रक्षक है, यह बीज को सुप्त बनाए रखता है और अंकुरण को रोकता है। दूसरी ओर, जिबरेलिक एसिड अंकुरण को उकसाता है, यह सुप्तावस्था को तोड़कर बीज के भीतर मौजूद भ्रूण को वृद्धि करने का संकेत देता है। एक स्वस्थ और सुरक्षित बीज में, परिपक्वता के दौरान ABA का स्तर बहुत अधिक होता है और GA का स्तर नगण्य होता है। जब बीज पानी सोखता है तो ABA का स्तर तेज़ी से गिरता है और GA का स्तर बढ़ता है, जिससे अंकुरण की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।
यहीं पर TaNAC018-7D जीन भूमिका निभाता है। शोधकर्ताओं ने पाया है कि यह प्रतिलेखन कारक सीधे तौर पर उन जीन्स की अभिव्यक्ति को नियंत्रित करता है जो ABA के निर्माण और संकेतन के लिए ज़िम्मेदार होते हैं। जब बीज बालियों में पक रहे होते हैं, तब TaNAC018-7D सक्रिय होकर यह सुनिश्चित करता है कि बीज के भीतर ABA का एक पर्याप्त और सुरक्षित स्तर बना रहे। इसके साथ ही, यह उन एंज़ाइमों की गतिविधि को भी धीमा कर देता है जो ABA को नष्ट कर सकते हैं। इस प्रकार, यह जीन बीजों की सुप्तावस्था को इतना मज़बूत बना देता है कि फसल कटाई के समय यदि अचानक बेमौसम बारिश हो भी जाए, तो बीजों के भीतर मौजूद ABA का कवच तुरंत न टूटे। इस तरह, बीज बालियों में अंकुरित होने से बच जाते हैं।
इस महत्वपूर्ण जीन की खोज की वैज्ञानिक यात्रा अपने आप में जीन मानचित्रण और आणविक जीवविज्ञान का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। गेहूं का जीनोम अत्यंत विशाल और जटिल होता है (यह मानव जीनोम से भी कई गुना बड़ा है), इसलिए इसमें से एक विशिष्ट प्रतिलेखन कारक को ढूंढना भूसे के ढेर में सूई खोजने जैसा था। वैज्ञानिकों ने गेहूं की ऐसी किस्मों का विस्तृत आनुवंशिक अध्ययन किया जो प्री-हार्वेस्ट स्प्राउटिंग के प्रति अत्यधिक प्रतिरोधी थीं, और उनकी तुलना उन किस्मों से की जो आसानी से अंकुरित हो जाती थीं। उन्नत तकनीकों का उपयोग करके, वे अंततः गुणसूत्र 7D पर उस सटीक स्थान तक पहुंचने में सफल रहे जहां TaNAC018-7D जीन स्थित है।
जलवायु परिवर्तन के कारण मौसम का चक्र अनियमित हो गया है। कभी अत्यधिक सूखा पड़ता है तो कभी फसल कटाई के समय भारी बारिश और ओलावृष्टि हो जाती है। भारतीय उपमहाद्वीप में भी हमने पिछले कुछ वर्षों में देखा है कि मार्च-अप्रैल के महीनों में, जब गेहूं व रबी की अन्य फसलें कटाई के लिए तैयार होती हैं, पश्चिमी विक्षोभ के कारण अचानक बारिश हो जाती है। ऐसी अनियमित मौसमी घटनाओं से निपटने के लिए हमें ऐसी फसलों की आवश्यकता है जो पर्यावरण के इन झटकों को सह सकें। TaNAC018-7D जीन हमें वह वैज्ञानिक औज़ार देता है जिससे हम ऐसी ‘क्लाइमेट-स्मार्ट’ फसलें विकसित कर सकते हैं।
इस खोज का सबसे बड़ा व्यावहारिक लाभ भविष्य की कृषि व्यवस्था को मिलेगा। पारंपरिक पादप प्रजनन तकनीकों की मदद से, कृषि वैज्ञानिक अब इस विशिष्ट जीन वाले गेहूं के पौधों का चयन कर सकते हैं और उन्हें उच्च उपज वाली लेकिन संवेदनशील किस्मों के साथ क्रॉस करा सकते हैं। क्रिस्पर-कास-9 जैसी आधुनिक जीन संपादन तकनीक का उपयोग करके, वैज्ञानिक सीधे तौर पर गेहूं की मौजूदा व्यावसायिक किस्मों में TaNAC018-7D जीन की अभिव्यक्ति को समायोजित कर सकते हैं। अर्थात हम ऐसे बीज डिज़ाइन कर सकते हैं जिनकी सुप्तावस्था कटाई के समय तक महफूज़ रहे, लेकिन जब किसान उन्हें अगले मौसम में बोने के लिए मिट्टी में डालें, तो वे आसानी से और समान रूप से अंकुरित हो जाएं। (स्रोत फीचर्स)
Picture credit – https://phys.org/news/2014-11-seed-dormancy-property-germination-million.html ( dormancy in seeds)
हाल ही में शोध पत्रिका नेचर में स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय के सर्जिउ पास्का व साथियों द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन में बताया गया है कि उन्होंने मानव मस्तिष्क की कोशिकाओं को एक जीवित चूहे (माउस) के मस्तिष्क में प्रत्यारोपित किया है।
गौरतलब है कि मानव मस्तिष्क से जुड़े विकारों को दूर करने के लिए उचित उपचार और दवाइयां विकसित करने के लिए मानव मस्तिष्क का विभिन्न परिस्थितियों में अध्ययन ज़रूरी है। अब तक जीवित मानव मस्तिष्क की कार्यिकी को समझना वैज्ञानिकों के लिए बहुत कठिन रहा है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने कई तरह के मॉडल विकसित किए हैं। इनमें से एक है पेट्री-डिश में बनाए जाने वाले मस्तिष्क ऑर्गेनॉइड। इसमें मनुष्य की त्वचा की कोशिकाओं को पहले तो स्टेम कोशिका में बदला जाता है जो फिर तंत्रिका कोशिकाएं बनाती हैं। इन्हें ब्रैन ऑर्गेनॉइड कहते हैं। ये मानव मस्तिष्क के विकास के कुछ पहलुओं को समझने में उपयोगी हैं, लेकिन इनमें जीवित मस्तिष्क जैसी प्राकृतिक परिस्थितियां नहीं होती: उन्हें मस्तिष्क में शरीर से आने वाले वास्तविक संकेत नहीं मिलते और उनमें सामान्य रक्त वाहिकाओं से रक्त आपूर्ति भी नहीं होती।
वैज्ञानिकों ने मानव मस्तिष्क की कोशिकाओं को माउस के मस्तिष्क में प्रत्यारोपित करने की कोशिश की है। लेकिन यहां एक समस्या सामने आई। माउस की अपनी मस्तिष्क कोशिकाएं भी लगातार विकसित हो रही थीं और मानव कोशिकाओं के साथ जगह के लिए प्रतिस्पर्धा कर रही थीं। चूंकि चूहे के मतिष्क की कोशिकाएं जल्दी वृद्धि करती हैं इस कारण मानव कोशिकाओं को पर्याप्त रूप से चूहे के मस्तिष्क में विकसित होने का अवसर नहीं मिल पा रहा था।
इस समस्या को दूर करने के लिए वैज्ञानिकों ने चूहे में कुछ आनुवंशिक परिवर्तन किए। इन परिवर्तनों के कारण उसके मस्तिष्क का एक हिस्सा खाली रह गया और पर्याप्त जगह उपलब्ध हो गई। जब इस जगह पर मानव मस्तिष्क की कोशिकाओं से विकसित किए गए ऑर्गेनॉइड को प्रत्यारोपित किया गया, तो वे अच्छी तरह विकसित हुए।
इस तरह वैज्ञानिकों के हाथों में चूहे और मानव कोशिकाओं से बना एक मिश्रित या शिमेरिक मस्तिष्क मॉडल आ गया। महत्वपूर्ण बात यह है कि मानव कोशिकाएं जीवित मस्तिष्क के वातावरण में विकसित हो रही थीं और उन्हें वहां मौजूद तंत्रिका तंत्र से संकेत तथा वाहिकाओं से रक्त आपूर्ति मिल रही थी।
इस शोध का एक नैतिक आयाम भी है। जब किसी जानवर के मस्तिष्क में मानव मस्तिष्क की कोशिकाएं प्रत्यारोपित की जाती हैं, तो यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या इससे उस जानवर के व्यवहार या चेतना में मानव जैसी कोई विशेषता विकसित हो सकती है। पास्का ने बताया कि इस अध्ययन में ऐसा कोई प्रमाण नहीं मिला कि मानव कोशिकाओं के प्रत्यारोपण से चूहे में मानव जैसी चेतना विकसित हुई हो या उसकी बौद्धिक क्षमता में कोई असाधारण वृद्धि हुई हो। वैसे भी इस प्रयोग का उद्देश्य माउस को बुद्धिमान बनाना नहीं, बल्कि मानव मस्तिष्क की कार्यिकी को समझना है। (स्रोत फीचर्स)
Picture credit – https://neurosciencenews.com/hybrid-human-brain-mouse-tissue-31216/ ( human cell in mice brain )
इस वर्ष के पहले नोबेल पुरस्कार की घोषणा कर दी गई है। जीव विज्ञान का नोबेल पुरस्कार संयुक्त रूप से कार्ल डाइसरॉथ (हॉवर्ड ह्यूजेस मेडिकल इंस्टीट्यूट तथा स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय), पीटर हेगेमन (बर्लिन के हम्बोल्ड विश्वविद्यालय) तथा जॉर्ज नागेल (वुर्ज़बर्ग विश्वविद्यालय) को प्रदान किया जाएगा। इन्हें यह पुरस्कार प्रकाश-चालित आयन मार्गों तथा ऑप्टोजेनेटिक्स की खोज के लिए दिया गया है।
ऑप्टोजेनेटिक्स एक ऐसी विधि है जिसकी मदद से यह समझना संभव हो गया है कि तंत्रिकाएं स्मृतियों, भावनाओं और व्यवहारों को कैसे आकार देती हैं और संजोती हैं।
शुरुआत हुई थी एक सरल से सवाल से। पीटर हेगेमन की जिज्ञासा यह जानने में थी कि एक-कोशिकीय शैवाल क्लैमायडोमोनास प्रकाश की ओर कैसे तैर जाती है। इसी बात को समझते-समझते हेगेमन और जॉर्ज नागेल ने एक चैनल-रोडॉप्सिन की खोज कर ली। चैनल-रोडॉप्सिन शैवालों में पाया जाने वाला एक अनोखा प्रोटीन है। यह कोशिकाओं की सतह पर पाया जाता है। जब कोशिका की सतह पर नीला प्रकाश पड़ता है तो इस प्रोटीन के ज़रिए एक प्रवाह मार्ग (चैनल) खुल जाता है और इस मार्ग से आवेशित आयन कोशिका में प्रवाहित होने लगते हैं। इस प्रवाह के कारण एक विद्युत आवेग उत्पन्न होता है। हेगेमन और नागेल ने पाया कि यह प्रोटीन किसी भी कोशिका में डाल दिया जाए, वह कोशिका प्रकाश संवेदी हो जाती है।
अगला कदम कार्ल डाइसरॉथ ने उठाया। उन्होंने क्लैमायडोमोनास के चैनल-रोडॉप्सिन का जीन एक चूहे की तंत्रिका कोशिकाओं में रोप दिया। इन कोशिकाओं पर नीली रोशनी डालकर वे तंत्रिका संकेत प्रेषित करवा पाए थे। यानी यह प्रोटीन एक प्रकाश-नियंत्रित स्विच की तरह काम करता है। यह खोज 2005 में करने के 2 साल बाद डाइसरॉथ ने जीवित चूहों की तंत्रिका कोशिकाओं में इस प्रकाश-चालित स्विच को जोड़कर काम करवाया।
तंत्रिका कोशिकाओं में प्रकाश की मदद से संकेतों का नियंत्रण करवाने की इस विधि को ऑप्टोजेनेटिक्स कहते हैं और यह अत्यंत प्रभावशाली तकनीक साबित हुई है। इसकी मदद से शोधकर्ता तंत्रिका सम्बंधी विकारों तक मनो-चिकित्सकीय संदर्भों में विशिष्ट स्मृतियों, भावनाओं और व्यवहारों के तंत्रिका सर्किट्स का खुलासा कर पाए हैं। और तो और, दृष्टि बाधित व्यक्तियों में इस तकनीक का उपयोग करके दृष्टि बहाल करने के प्रयास भी जारी हैं। इस तकनीक ने मस्तिष्क को लेकर हमारी समझ को नए आयाम दिए हैं। यह समझने की दिशा में रोज़ नई खोजें हो रही हैं कि हमारा अद्भुत दिमाग काम कैसे करता है। (स्रोत फीचर्स)
Picture Credit – https://www.nobelprize.org/uploads/2026/10/NP_POM_2026_3-2_01.jpg ( Nobel Prize in Physiology
विज्ञान की दुनिया में कई ऐसी समस्याएं हैं जो कि सालों से अनसुलझी रही हैं। इनमें से कई समस्याओं को सुलझाने के लिए बड़े-बड़े इनाम भी घोषित किए गए हैं। वैज्ञानिक अक्सर इन समस्याओं को सुलझाने के लिए अपने समय की मौजूदा तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं। हमारे अपने समय में जो एक तकनीक प्रभावी तौर पर उभरी है, वह है एआई यानी कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस या कृत्रिम बुद्धि। हाल ही में एक ऐसी ही समस्या पर एआई द्वारा सुझाए गए हल को लेकर विवाद खड़ा हो गया है।
नेवियर स्टोक्स पहेली
सामान्य वस्तुओं की गति को समझने के लिए हम न्यूटन के नियमों की मदद लेते हैं। लेकिन अगर इन नियमों को किसी तरल की गति को समझने के लिए इस्तेमाल किया जाए तो हमें जो गणितीय समीकरण मिलता है उसे नेवियर-स्टोक्स समीकरण के नाम से जाना जाता है। यह समीकरण विमान के डिज़ाइन में, मौसम की भविष्यवाणी में, रक्त के प्रवाह को समझने में एवं पानी और हवा के प्रवाह के अध्ययन में मदद करता है। इन तमाम परिस्थितियों एवं उनसे जुड़े सवालों के अलावा वैज्ञानिक इस सवाल से भी लगातार जूझते रहते हैं कि किसी एक वास्तविक परिस्थिति की व्याख्या करता हुआ उनका कोई गणितीय मॉडल या समीकरण किस हद तक विश्वसनीय है। उसकी हद क्या है?
नेवियर-स्टोक्स समस्या के साथ भी ऐसा ही है, या कहें, ऐसी ही था। लगभग 90 वर्षों से यह सवाल अनसुलझा था कि किसी तरल की सामान्य और सुचारु त्रि-आयामी गति क्या अचानक ऐसी स्थिति में पहुंच सकती है जहां गणितीय रूप से उसका व्यवहार बिगड़ जाए? नेवियर-स्टोक्स समीकरणों के संदर्भ में कहें तो क्या ऐसा हो सकता है कि कुछ समय बाद एक भले से दिखने वाले तरल का प्रवाह अचानक इतनी तेज़ी से बदल जाए कि नेवियर-स्टोक्स समीकरणों के अनुसार उसकी गति अनंत हो जाए?
अब चूंकि हकीकत में किसी भी वस्तु की गति अनंत नहीं हो सकती, ऐसे में अगर गणितीय मॉडल में तरल की गति अनंत हो जाती है तो इसे उस मॉडल की सीमा के रूप में देखा जाएगा।
ओपनएआई (OpenAI) कंपनी ने सितंबर 2026 के शुरुआती दिनों में यह दावा पेश किया कि उनके नए एआई मॉडल ने नेवियर-स्टोक्स समस्या को सुलझा दिया है। उनके दावे के मुताबिक, एक भले से दिखने वाले प्रवाह की गति भी गणितीय मॉडल के मुताबिक अनंत हो सकती है। इसके साथ ही ओपनएआई ने इस दावे का एक गणितीय प्रमाण भी प्रस्तुत किया है। अब यह दावा कितना सही है या गलत इसकी पड़ताल तो चल ही रही होगी, लेकिन ओपनएआई ने समस्या को सुलझाने के लिए जिस प्रक्रिया को अपनाया है उस पर भी सवाल उठ रहे हैं।
विवाद
जैसा है कि हम जानते हैं एआई मॉडल ट्रेनिंग या सीखने के लिए डैटा का इस्तेमाल करते हैं। इस सीखने-सिखाने के प्रक्रिया में लगभग हर स्तर पर इंसान व इंसानों के द्वारा सृजित ज्ञान का इस्तेमाल होता है। कई दफे तो बाकायदा हाथ पकड़कर एआई या एआई एजेंट को सही हल के बारे में बताया जाता है, जैसे किसी छोटे बच्चे का हाथ पकड़कर उसे चलना सिखाया जाता है।
ओपनएआई की घोषणा से कुछ घंटे पहले न्यूयार्क युनिवर्सिटी के गणितज्ञ ट्राइस्टन बकमास्टर ने एक सम्बंधित गणितीय परिणाम प्रकाशित किया था। जिस समस्या पर बकमास्टर अपने सहयोगी लेवेंट एल्पोग के साथ काम कर रहे थे, उसे ओयलर (Euler) पहेली के नाम से जाना जाता है। अलबत्ता, यह समस्या नेवियर-स्टोक्स समस्या से मुख्य तौर पर इस मामले में अलग है कि ओयलर पहेली में तरल की श्यानता (घर्षण) को नकार दिया जाता है। बकमास्टर व एल्पोग इस पहेली पर काम करने के दौरान एआई तकनीक का सहारा भी ले रहे थे। ओपनएआई के ही एक एआई एजेंट कोडेक्स (Codex) पर लगातार पिछले कई महीनों से वे अपने काम व उससे जुड़े मसौदों को साझा कर रहे थे।
बकमास्टर ने आरोप लगाया है कि ओपनएआई जिस रास्ते से नेवियर-स्टोक्स समस्या के हल तक पहुंचा है, वह उनके ओयलर समस्या के हल से जुड़ा हो सकता है जिस पर वे पहले से काम कर रहे थे। मुख्य तौर पर बकमास्टर का कहना है कि ओपनएआई एजेंट ने समस्या को सुलझाने की प्रक्रिया में उन मसौदों से भी सीखा होगा जो कि ओपनएआई के डैटाबेस में पहले से ही मौजूद हैं। ओपनएआई ने ऐसी किसी भी संभावना को नकारा है।
लेकिन शक बे-बुनियाद नहीं है और बहस जारी है। कई गणितज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ दशकों में नेवियर-स्टोक्स समस्या पर काफी हद तक समझ बनाई जा चुकी थी और यह समस्या बस हल होने की कगार पर ही थी। ऐसे में ओपनएआई का दावा ज्ञान-सृजन की बजाय बाज़ार में अपनी छवि चमकाने व मूल्य बढ़ाने का प्रयास अधिक नज़र आता है।
एक और बात जो ओपनएआई के सुझाए गए हल पर सवाल उठाती है वह है संसाधनों को लेकर। ओपनएआई ने दावा किया कि दशकों पुरानी इस समस्या को लगभग 4-5 दिनों में ही सुलझा दिया। ऐसा करने के लिए उसने मल्टीएजेंट व्यवस्था का सहारा लिया, जिन्होंने पहले-पहल समस्या के कुछ सरल स्वरूपों पर काम किया और फिर मुख्य समस्या पर। सभी गणितीय समस्याओं को मिलाकर एजेंटों ने लगभग 49 लाख संदेश एक-दूसरे को भेजे। इन संदेशों को तैयार करने में लगभग 300 अरब आउटपुट टोकन्स का इस्तेमाल हुआ। केवल नेवियर-स्टोक्स पहेली पर एजेंटों ने लगभग 27 लाख संदेश एक-दूसरे को भेजे व लगभग 130 अरब आउटपुट टोकन्स बनाए।
अब अगर इन तमाम संदेशों के पीछे काम कर रही तकनीक और उससे जुड़े खर्चों का हिसाब लगाया जाए तो अनुमानित एक करोड़ अमरीकी डॉलर से लेकर 2.25 करोड़ अमरीकी डॉलर के बीच बैठता है। इस पहेली को सुलझाने के लिए जो इनाम था (दस लाख अमरीकी डॉलर) वह इससे कहीं कम है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या यह वास्तव में एआई की ‘गणितीय समझ’ की सफलता है, या बहुत बड़ी कंप्यूटेशनल शक्ति से लाखों संभावित गणितीय हलों को छांटने की सफलता?
इन जैसे तमाम सवालों को लेकर एआई पर बहस अब और भी तीखी होती जा रही है। और यह बहस अब मात्र तकनीक तक ही सीमित नहीं रह गई है। इसके राजनीतिक, आर्थिक व सामाजिक पहलुओं व प्रभावों पर भी लगातार चर्चा हो रही है; कई अकादमिक समूह तो एआई व इससे जुड़ी कंपनियों के खिलाफ एक मुहिम-सी छेड़ते हुए नज़र आते हैं।
सितंबर 2026 के महीने में जहां एक ओर ओपनएआई सरीखी कंपनियां कठिन समस्याओं से जुड़े अपने दावों को लेकर सामने आती दिखलाई देती हैं तो इसी महीने में एसोसिएशन ऑफ ह्यूमन मैथेमेटिशियन्स (इन्सानी गणितज्ञ संगठन) नाम से एक संस्था/समूह का जन्म भी होता है। इससे जुड़े गणितज्ञ संस्था के बारे में बतलाते हुए कहते हैं कि “इस संस्था का मुख्य उद्देश्य गणित व इसके साधकों को एआई कंपनियों के चंगुल से बचाना है। इन एआई कंपनियों के काम करने के तरीके ना केवल गणित, बल्कि पर्यावरण व वृहद समाज के लिए भी घातक हैं। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए ज़रूरी है कि हम एआई माडलों के उपयोग में एक आलोचनात्मक नज़रिया अपनाएं; ना केवल शोध या उससे जुड़े कामों को करते हुए, बल्कि पढ़ने-पढ़ाने व उससे जुड़े कार्यकलापों में भी।”
एआई के दौर में पढ़ने-पढ़ाने के तरीकों पर विचार करने की ज़रूरत व ज़िम्मेदारी कई शिक्षण संस्थान महसूस भी कर रहे हैं। विश्व में तकनीकी ज्ञान सृजन व संचार के मामले में अग्रणी संस्थान MIT ने जनवरी 2026 में एक समिति का गठन किया था, जिसका उद्देश्य संस्थान में एआई के इस्तेमाल के संदर्भ में यह सुझाव देना था कि शिक्षण और मूल्यांकन को किस तरह बदला जाना चाहिए और उसके लिए संस्थागत नियम क्या होने चाहिए। इस समिति ने अपनी रपट अगस्त 2026 में सार्वजनिक कर दी है। एआई के प्रति इस रपट का नज़रिया एसोसिएशन ऑफ ह्यूमन मैथेमेटिशियन्स सरीखा तीखा तो नहीं है लेकिन समिति ने युवाओं पर हो रहे इसके असर और शिक्षकों व अन्य शैक्षणिक कर्मचारियों की ज़िम्मेदारियों की ओर इशारा करते हुए कहा है कि “ऐसा प्रतीत होता है कि एआई को तेज़ी से अपनाए जाने का प्रभाव पहले से ही विद्यार्थियों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है और इससे लंबे समय में नई चुनौतियां पैदा हो रही हैं। कुछ विद्यार्थी अपने शैक्षणिक कार्यों या भावनात्मक सहारे के लिए एआई पर निर्भर होते जा रहे हैं; उनमें अपने निर्णय और कार्य स्वयं करने की क्षमता, उद्देश्य-बोध और आत्मविश्वास की भावना कम हो रही है; और वे एआई से अत्यधिक प्रभावित दुनिया में अपने करियर की संभावनाओं को लेकर चिंतित हैं। शिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारियों को एआई से जुड़ी शैक्षणिक, सामाजिक और भावनात्मक चुनौतियों को पहचानने के लिए तैयार रहना चाहिए और विद्यार्थियों को आवश्यकता पड़ने पर उचित सहायता एवं सम्बंधित संसाधनों तक पहुंचने के लिए मार्गदर्शन देना चाहिए।”
यह रपट मानवता को केंद्र में रखकर तकनीक के इस्तेमाल की बात करती है। जिस तरह के बदलावों की अपेक्षा है उनकी ओर इशारा करते हुए कहा गया है कि एआई के इस दौर में “MIT में पढ़ाई जाने वाली अधिकांश कक्षाओं की सावधानीपूर्वक समीक्षा करनी होगी और कई मामलों में, उनमें पर्याप्त बदलाव भी करने होंगे, ताकि वे एआई के प्रभाव का सामना किसी गंभीर व्यवधान के बिना कर सकें। एआई उन शैक्षणिक मान्यताओं को चुनौती देगा, जिनके आधार पर पाठ्यक्रम की विषय-वस्तु, शिक्षण पद्धतियों और विद्यार्थियों के प्रदर्शन के आकलन के तरीकों का चुनाव किया गया है।”
संक्षेप में, अब समय आ गया है कि हम गहराई और व्यापकता के साथ इस बात पर विचार करें कि हम क्या पढ़ाते हैं और उसे कैसे पढ़ाते हैं। भविष्य की कक्षाओं की संरचना, मूल्यांकन पद्धतियां और नीतियां स्पष्ट उद्देश्य के साथ तैयार की जानी चाहिए। उन्हें केवल एआई की तत्काल वास्तविकताओं के जवाब में छोटे-मोटे बदलाव करके तैयार नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि हर पाठ्यक्रम में एक ही तरह के बदलाव करने होंगे।
कई अन्य देशों की तरह भारत में भी एआई की संभावनाओं को लेकर एक उत्साह का माहौल है। शिक्षा के क्षेत्र में भी इसे कई समस्याओं के समाधान के रूप में पेश किया जा रहा है। उम्मीद है, नीति-निर्माता इस तकनीक के व्यापक असर से जुड़ी चिंताओं पर भी विचार कर रहे होंगे। दुनिया भर में लोग एआई व उसके प्रभावों को लेकर चिंतित हैं और उनकी चिंता बेवजह नहीं है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit: https://openai.com/index/navier-stokes-solution/
जापान के त्सुकुबा विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने हाल ही में जीनोम संपादन (gene editing) की मदद से लाल पत्तों वाली लेट्यूस का लाल रंग गायब कर दिया, नतीजतन पत्तियां हरी हो गईं। लेकिन असली कहानी रंग बदलने की नहीं, बल्कि इसके साथ पौधे के भीतर हुए एक अप्रत्याशित बदलाव की है। दरअसल, सब्ज़ियों की दुनिया में रंग सिर्फ दिखावे की बात नहीं है। यह अक्सर पौधे के भीतर चल रही जटिल रासायनिक प्रक्रियाओं का संकेत भी होता है।
लेट्यूस की पत्तियों का रंग बदलते ही पौधे में दूसरे फायदेमंद यौगिक पहले से कहीं ज़्यादा मात्रा में जमा होने लगे। लाल पत्तों वाली लेट्यूस का रंग एंथोसायनिन नाम के पॉलीफेनॉलिक रंजक की वजह से होता है। एंथोसायनिन एक ऐसा प्राकृतिक रंजक है, जो कई फलों, फूलों और सब्ज़ियों में पाया जाता है और अपने एंटीऑक्सीडेंट गुणों के लिए जाना जाता है। पौधों में यह यौगिक फिनाइलएलानीन नामक अमीनो एसिड से शुरू होने वाली एक लंबी जैव-रासायनिक शृंखला के ज़रिए बनता है। इस शृंखला के दौरान रास्ते में कई फ्लेवोनॉइड्स भी बनते हैं। फ्लेवोनॉइड्स पौधों में पाए जाने वाले यौगिकों का एक बड़ा समूह है, जो कई जैविक भूमिकाएं निभाते हैं। सामान्य स्थिति में ये फ्लेवोनॉइड्स आगे चलकर एंथोसायनिन में बदल जाते हैं। यानी एंथोसायनिन (anthocyanin) असल में इस शृंखला का अंतिम उत्पाद है।
शोधकर्ताओं ने क्रिस्पर कास-9 (CRISPR-CAS9) नामक आधुनिक जीनोम संपादन तकनीक की मदद से डीएफआर नाम के एंज़ाइम को बनाने वाले जीन को निशाना बनाया। यह एंज़ाइम एंथोसायनिन बनने से ठीक पहले वाले चरण के लिए ज़िम्मेदार होता है, यानी फ्लेवोनॉइड्स के एंथोसायनिन में तब्दील होने के चरण पर। जब वैज्ञानिकों ने इस जीन को निष्क्रिय किया, तो एंथोसायनिन बनने की प्रक्रिया रुक गई। नतीजतन, पौधे की पत्तियों से लाल रंग पूरी तरह उड़ गया और वे हरी दिखने लगीं।
यहां एक दिलचस्प बात सामने आई। जब एंथोसायनिन बनने का रास्ता बंद हुआ तो पौधे में इस रासायनिक शृंखला के मध्यवर्ती पदार्थ (यानी फ्लेवोनॉइड्स) ही जमा होने लगे। पाया गया कि संशोधित पौधों में क्वेरसेटिन जैसे फ्लेवोनॉइड्स की मात्रा काफी बढ़ गई। क्वेरसेटिन को भी अपने एंटीऑक्सीडेंट और सूजनरोधी गुणों (anti-inflammatory quality) के लिए जाना जाता है, और यह कई स्वास्थ्यवर्धक खाद्य पदार्थों में पाया जाता है।
इस पूरे प्रयोग की एक और खास बात यह रही कि जीन में इतना बड़ा बदलाव करने के बावजूद पौधे की वृद्धि पर कोई नकारात्मक असर नहीं देखा गया। संशोधित लेट्यूस (modified lettuce) सामान्य लेट्यूस की तरह ही बढ़ी और उसकी पैदावार में कोई फर्क नहीं पड़ा। यह बात विशेष महत्व रखती है, क्योंकि अक्सर किसी जीन में बदलाव करने से पौधे की उत्पादकता प्रभावित होने का खतरा बना रहता है। यहां ऐसा नहीं हुआ, जिससे यह तकनीक व्यावहारिक इस्तेमाल के लिहाज़ से काफी आकर्षक बन जाती है।
यह अध्ययन सिर्फ लेट्यूस के रंग बदलने की कहानी भर नहीं है, यह दिखाता है कि किसी सब्ज़ी के भीतर पोषक तत्वों के संतुलन को सोच-समझकर नियंत्रित किया जा सकता है। अभी तक ऐसा माना जाता रहा है कि लाल लेट्यूस में हरी लेट्यूस के मुकाबले ज़्यादा पॉलीफेनॉल बनाने की क्षमता होती है। इस अध्ययन ने दिखाया कि इसी क्षमता का इस्तेमाल करके अंतिम उत्पाद (एंथोसायनिन) की बजाय, बीच के फायदेमंद यौगिकों (फ्लेवोनॉइड्स) को बढ़ाया जा सकता है, भले ही पत्तियां हरी ही क्यों न दिखें। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तरीका भविष्य में ऐसी सब्ज़ियां विकसित करने में मदद कर सकता है, जिनका पोषण-प्रोफाइल (nutrition-profile) ज़रूरत के हिसाब से कस्टमाइज़ किया जा सके। चूंकि फ्लेवोनॉइड का उत्पादन रोशनी की तीव्रता और तापमान जैसी परिस्थितियों से गहराई से प्रभावित होता है, इसलिए इन परिस्थितियों को सटीक रूप से नियंत्रित करके मनचाहे पोषक गुणों वाली सब्ज़ियां उगाना आसान हो जाएगा।
यह अध्ययन उत्साहजनक तो है, लेकिन यह देखना होगा कि यह जीन-संशोधित हरी लेट्यूस सामान्य हरी किस्मों के मुकाबले पोषण के लिहाज़ से कितनी बेहतर साबित होती है।
इसके अलावा, किसी भी जीनोम संपादित फसल के व्यावसायिक इस्तेमाल से पहले उसे खाद्य सुरक्षा और नियामक मानकों (food safety & standards) की कसौटी पर परखा जाता है। विभिन्न देशों में जीन-संपादित फसलों को लेकर नियम अलग-अलग हैं, और इससे तय होगा कि यह तकनीक कितनी जल्दी किसानों और उपभोक्ताओं तक पहुंच पाती है। (स्रोत फीचर्स)
हमारे शरीर की हर कोशिका में मौजूद DNA में लगभग 20 हज़ार से ज़्यादा जीन्स होते हैं, लेकिन हर जीन हर समय सक्रिय नहीं रहता। शरीर का सही ढंग से विकास और कामकाज तभी संभव हो पाता है जब सही जीन, सही समय पर और सही जगह पर ‘ऑन’ हों। तो, यह कौन तय करता है कि कौन सा जीन कब ऑन होगा? इसका जवाब DNA के उन खास हिस्सों में छिपा है जो जीन्स को सक्रिय करने का संकेत देते हैं। अमेरिका के कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अब कृत्रिम बुद्धि (AI) की मदद से इसी छिपे हुए ‘जेनेटिक स्विच’ (genetic switch) को डिकोड करने में बड़ी सफलता हासिल की है।
रहस्यमयी इनिशिएटर
वैज्ञानिकों ने डीएनए के जिस भाग पर शोध किया, उसे इनिशिएटर (initiator) कहते हैं। यह वह जगह है जहां से किसी जीन में मौजूद जानकारी को प्रतिलेखन-अनुलेखन के माध्यम से प्रोटी न या किसी अन्य ज़रूरी अणु में बदलने की प्रक्रिया शुरू होती है। दूसरे शब्दों में कहें, तो इनिशिएटर वह स्टार्ट बटन है, जो तय करता है कि जीन की गतिविधि कहां से शुरू होगी। यह जीन अभिव्यक्ति (gene expression) की पूरी प्रक्रिया की नींव माना जाता है, क्योंकि शरीर में एंज़ाइम, हॉर्मोन और तमाम ज़रूरी प्रोटीन इसी प्रक्रिया के ज़रिए बनते हैं।
अब तक वैज्ञानिकों के लिए यह एक बड़ी पहेली रही है कि आखिर डीएनए की अरबों क्षार-जोड़ियों (base pairs) में इस इनिशिएटर को ठीक-ठीक कैसे पहचाना जाए। इसकी बनावट इतनी जटिल और विविधतापूर्ण थी कि पारंपरिक तरीकों से इसका पूरा पैटर्न समझना मुश्किल हो रहा था।
खोज प्रक्रिया
इस शोध का नेतृत्व कैलिफोर्निया के मॉलीक्यूलर बायोलॉजी विभाग के प्रोफेसर जेम्स टी. कैडोनागा (James T. Kadonaga) और ग्रेजुएट रिसर्चर टॉरी राइन-कैरिग (Torrey Rhyne-Carrigg) ने किया। टीम ने सबसे पहले हाई-थ्रूपुट अनुक्रमण (High-throughput DNA sequencing) तकनीक का इस्तेमाल करते हुए डीएनए के लगभग 5,00,000 अलग-अलग वैरिएंट अनुक्रम तैयार किए और उनकी गतिविधि को मापा। इस तकनीक की मदद से एक साथ बहुत बड़ी संख्या में डीएनए अनुक्रम को तेजी से पढ़ा जा सकता है।
इसके बाद इन आंकड़ों का इस्तेमाल एक मशीन लर्निंग मॉडल को प्रशिक्षित करने के लिए किया गया। इस मॉडल ने लाखों अनुक्रमों का विश्लेषण करके यह सीखा कि इनिशिएटर की पहचान करने वाला क्षार-जोड़ी पैटर्न (base pair pattern) आखिर होता क्या है। यह मॉडल पहली बार मानव जीन्स में इनिशिएटर की उपस्थति या अनुपस्थिति का सटीक अनुमान लगाने में सफल रहा, और लगभग 60 प्रतिशत मानव जीन्स में इस इनिशिएटर को सफलतापूर्वक पहचान लिया गया।
प्रोफेसर कैडोनागा के मुताबिक, यह पहली बार है जब किसी एआई मॉडल ने डीएनए में मौजूद इनिशिएटर की मौजूदगी का इतना मज़बूत और भरोसेमंद अनुमान दिया है। इसके आधार पर डीएनए के इस क्षार अनुक्रम पैटर्न को असल मायनों में डिकोड (decode) किया जा सका।
खोज का महत्व
यह शोध सिर्फ अकादमिक जिज्ञासा तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके कई व्यावहारिक और चिकित्सकीय पहलू भी हैं:
1. बीमारियों को समझने में मदद: जब इनिशिएटर जैसे नियामक क्षेत्रों में उत्परिवर्तन होता है, तो जीन की गतिविधि गड़बड़ा सकती है, जिससे कोशिकाओं में खराबी आ सकती है। यह गड़बड़ी कैंसर सहित कई गंभीर बीमारियों से जुड़ी मानी जाती है। अब वैज्ञानिक इस नए मॉडल की मदद से यह अनुमान लगा सकेंगे कि कोई खास उत्परिवर्तन इनिशिएटर को कैसे प्रभावित करेगा और उससे जीन गतिविधि (gene activtiy) में क्या बदलाव आ सकता है।
2. सिंथेटिक प्रमोटर डिज़ाइन करना: इस शोध से मिले आंकड़े भविष्य में सिंथेटिक प्रमोटर डिज़ाइन करने में मदद कर सकते हैं। ये ऐसे कृत्रिम डीएनए अनुक्रम (artificila DNA sequences) होते हैं जिन्हें खास मकसद के हिसाब से जीन्स को चालू या बंद करने के लिए तैयार किया जाता है। इनका इस्तेमाल जीन थेरपी, बायोटेक्नोलॉजी और सिंथेटिक बायोलॉजी जैसे क्षेत्रों में हो सकता है।
3. जीनोम की समझ: मानव जीनोम में सिर्फ जीन्स ही नहीं, बल्कि उन्हें नियंत्रित करने वाले असंख्य नियामक घटक भी मौजूद हैं। इन घटकों को डिकोड करना पूरे जीनोम की भाषा (genome understanding) को समझने की दिशा में एक अहम कदम है।
वास्तविक प्रयोग और कृत्रिम बुद्धि का मेल
डीएनए का यह चालू-बंद स्विच (DNA switch) दशकों से एक पहेली बना हुआ था। इस अध्ययन की सबसे खास बात यह रही कि इसमें पारंपरिक प्रयोगों और कृत्रिम बुद्धि (एआई) की आधुनिक तकनीक, दोनों को साथ लाया गया। पहले वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में बड़े पैमाने पर आंकड़े जुटाए और फिर उस एक एआई मॉडल को इन आंकड़ों के आधार पर प्रशिक्षित किया ताकि वह पैटर्न पहचान सके। यह तरीका भविष्य में जीनोम की अन्य उलझनों को समझने के लिए भी एक मॉडल के तौर पर काम आ सकता है।
आगे की राह
हालांकि इस शोध ने लगभग 60 प्रतिशत मानव जीन्स में इनिशिएटर को पहचान लिया है, फिर भी बाकी बचे जीन्स में इनकी पहचान करना अभी बाकी है। वैज्ञानिकों का अगला लक्ष्य होगा कि वे मॉडल (model) को और बेहतर बनाएं, ताकि बाकी जीन्स में भी इनिशिएटर या उससे मिलते-जुलते नियामक घटकों को खोजा जा सके। इसके अलावा, यह समझना भी ज़रूरी होगा कि अलग-अलग प्रकार की कोशिकाओं और ऊतकों में यह स्विच किस तरह अलग-अलग व्यवहार करता है। (स्रोत फीचर्स)
नोबेल पुरस्कार (nobel prize) से तो सभी वाकिफ हैं। यह विज्ञान के क्षेत्र में संजीदगी से किए गए अहम शोधकार्य के लिए दिया जाता है, जिसमें सम्मान और प्रतिष्ठा के साथ-साथ वैज्ञानिकों को गोल्ड मेडल और लगभग 10 लाख डॉलर की राशि भी मिलती है। यह भी सर्वमान्य है कि डीएनए की संरचना का खुलासा करना शोध का एक महत्वपूर्ण विषय है। लेकिन क्या आपको लगता है कि नाक छिनकना भी शोध का विषय हो सकता है?
नोबेल पुरस्कार के विपरीत, इगनोबेल पुरस्कार उतनी ही संजीदगी से किए गए ऐसे शोधकार्यों के लिए दिए जाते हैं जो पहले पल में तो लोगों को गुदगुदाते हैं लेकिन दूसरे ही पल लोगों को विचार करने पर मजबूर करते हैं। वास्तव में, इगनोबेल (Ig Nobel) पुरस्कार ‘ignoble’ शब्द पर तंज है जिसका मतलब होता है अप्रतिष्ठित। लेकिन, इगनोबेल पुरस्कार पाने वाले को भी काफी प्रतिष्ठा मिलती है, भले ही नकद राशि न मिलती हो। ये पुरस्कार इस बात को रेखांकित करते हैं कि महज भारी-भरकम और संजीदा लगने वाले विषय ही अहम नहीं होते और सिर्फ उन्हीं पर संजीदगी से शोधकार्य नहीं किए जाते, बल्कि हमारे मन में उठने वाले छोटे-छोटे सवाल भी उतने ही अहम होते हैं और उनके जवाब उतनी ही संजीदगी (scholarly diligence) से खोजना होते हैं।
इस वर्ष भी एनल्स ऑफ इंप्रॉबेबल जर्नल ने 10 क्षेत्रों में इन शोधकार्यों को इगनोबेल के सम्मान से नवाज़ा है। खुद देखिए कि बात कहां से निकलकर कहां तक पहुंच सकती है।
1. बायोमैकेनिक्स: चुंबन की वैज्ञानिक परिभाषा
इस वर्ष बायोमैकेनिक्स का इगनोबेल पुरस्कार मैटिल्डा ब्रिंडल, कैथरीन टैलबोट और स्टुअर्ट वेस्ट को चुंबन की एक सटीक वैज्ञानिक परिभाषा (kissing definition) देने के लिए मिला है। इस परिभाषा के अनुसार “चुंबन एक ऐसी गैर-आक्रामक क्रिया है जिसमें एक ही प्रजाति के जीवों के बीच मुंह-से-मुंह (या होंठ-से-होंठ) का सीधा संपर्क हो, होंठो/मुंह में कुछ हलचल हो और यह संपर्क या हलचल भोजन के खाने-खिलाने के लिए न हो।” न सिर्फ मनुष्यों बल्कि कई प्रजातियों में इस तरह का व्यवहार देखा गया है जिसमें दो जीवों के बीच मुंह से मुंह का संपर्क होता है; चुंबन को सटीक रूप से परिभाषित करने से इसे विभिन्न प्रजातियों के बीच बेहतर समझा जा सकेगा और इसके उद्भव और कारणों के बारे में सोचा जा सकेगा। शोधकर्ताओं की उक्त परिभाषा के अनुसार अब तक ज्ञात जीवों में ध्रुवीय भालू, कुछ पक्षी, चींटियां और कुछ अन्य प्राइमेट भी चुंबन करते हैं। शोधकर्ताओं ने यह भी पता लगाने की कोशिश की कि यह व्यवहार कब विकसित हुआ। उन्होंने पाया है कि यह व्यवहार लगभग 2.5 करोड़ साल पहले वानरों (एप्स) के पूर्वजों से आया है। अब समझना बाकी है कि इस व्यवहार की भूमिका क्या है।
2. अर्थशास्त्र: अमीरी और अनैतिक व्यवहार
अर्थशास्त्र का इगनोबेल पुरस्कार पॉल पिफ और उनके साथियों को उस शोध के लिए मिला है जिसमें उन्होंने सामाजिक-आर्थिक स्थिति और अनैतिक व्यवहार के बीच सम्बंध की पड़ताल की है। उन्होंने पाया कि गरीबों की तुलना में अमीर लोग (wealthy people) अधिक अनैतिक व्यवहार करते हैं। ये निष्कर्ष उनके द्वारा किए गए सात अध्ययनों के आधार पर दिए गए हैं। पहले दो अध्ययनों में उन्होंने इन दोनों वर्गों के लोगों का व्यवहार चौराहे पर वाहन चलाते समय देखा; उन्होंने पाया कि अमीर लोग चौराहे पर अपनी बारी आने के पहले ही दूसरे वाहनों से आगे निकलने की कोशिश करते हैं। तीसरे अध्ययन में प्रतिभागियों को कुछ परिस्थितियां देकर उन पर उनकी प्रतिक्रिया पूछी गई – अमीर लोगों ने अधिक अनैतिक निर्णय लिए। चौथे अध्ययन में सिर्फ और सिर्फ बच्चों के लिए रखी कैंडी को अमीरों की भूमिका निभा रहे प्रतिभागियों ने अधिक लिया। पांचवे अध्ययन में बातचीत के दौरान अपनी बात मनवाने के लिए झूठ बोलने की प्रवृत्ति अमीरों में अधिक दिखी। छठवे अध्ययन में खेल जीतने के लिए चीटिंग करने का व्यवहार अमीरों में अधिक दिखा। और सातवें अध्ययन में कार्यस्थल पर अमीर अधिक अनैतिक व्यवहार (unethical behaviour) करते पाए गए।
3. रसायन विज्ञान: प्रोटीन से भरपूर कॉकरोच का दूध
रसायन विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध के लिए मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने बताया कि Diploptera punctata नामक कॉकरोच का दूध (cockroch milk) गाय के दूध से भी तीन गुना अधिक पौष्टिक है। यह कॉकरोच आम घरों में मिलने वाले कॉकरोच से अलग है और अंडे देने की बजाय बच्चों को जन्म देता है। दरअसल, मादा कॉकरोच अपने शरीर में विकसित हो रहे भ्रूणों को एक विशेष पोषक तरल से भोजन देती है। भ्रूण जब इस तरल को ग्रहण करते हैं तो उनकी आंत में यह प्रोटीन, वसा और शर्करा से भरपूर छोटे-छोटे क्रिस्टलों के रूप में जमा हो जाता है। ये क्रिस्टल धीरे-धीरे घुलकर बढ़ते भ्रूण को पोषण देते हैं।
2016 में भारतीय और फ्रांसीसी वैज्ञानिकों ने एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी की मदद से इन क्रिस्टलों की संरचना का अध्ययन किया। उन्होंने पाया कि यह तरल अत्यधिक पौष्टिक है: यह गाय के दूध की तुलना में तीन गुना से अधिक पोषण और ऊर्जा दे सकता है। घबराइए नहीं, वैज्ञानिक सीधे इस दूध उपयोग मनुष्य के इस्तेमाल के लिए नहीं सोच रहे हैं, बल्कि इसके घटकों के आधार पर पोषक पेय (nutritious drink) तैयार करने का विचार है।
4. चिकित्सा: नाक कैसे छिनकें
चिकित्सा का इगनोबल पुरस्कार जापानी चिकित्सक टोकुजी उन्नो के 1977 के उस अध्ययन के लिए मिला है जिसमें उन्होंने बताया था कि नाक कैसे साफ करें। रोज़ाना नाक की सफाई श्वासनली और फेफड़ों के संक्रमण के जोखिम को कम करती है, और जब सर्दी-ज़ुकाम होता है तो नाक तो छिनकनी पड़ती है। उन्नो यही जानना चाह रहे थे कि किस तरह नाक की सफाई (nostril hygiene) स्वस्थ रहने में मदद कर सकती है। इसके लिए उन्होंने देखा कि कितनी तेज़ी और ताकत से हवा बाहर करने पर, एक बार में एक नथुने से छिनकने पर, या दोनों नथुनों से छिनकने पर नाक की सफाई में क्या अंतर पड़ता है। उन्होंने यह सब 14 से 48 वर्ष की आयु के 15 लोगों पर करके देखा। नाक से निकलने वाली हवा की गति मापने के लिए दो न्यूमोटैकोमीटर (pnuemotachometer) लगाए गए और नाक से निकली हवा की मात्रा तथा समय भी दर्ज किया गया। साथ ही कान की बाहरी नलिका में दबाव परिवर्तन को एक कैथेटर और संवेदनशील प्रेशर ट्रांसड्यूसर से मापा गया। उन्होंने पाया कि दोनों नथुने खुले रखते हुए नाक साफ करने की बजाय एक बार में एक नथुने को खुला रखकर नाफ साफ करने से ज़्यादा अच्छे से सफाई होती है।
5. जीव विज्ञान: सांप कब काट सकता है
यह तो कहा ही जाता है कि सांप तभी काटता है जब आपका पैर उस पर पड़ जाए। जीव विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन के लिए दिया गया जिसमें शोधकर्ताओं ने यह समझने की कोशिश की कि विषैले सांप पर पांव कहां पड़ने पर उसके द्वारा काटने की संभावना अधिक होती है। उन्होंने ब्राज़ील के विषैले सांप पिट वाइपर (pit viper snake) के व्यवहार का अध्ययन किया और उसकी लंबाई, लिंग, उम्र, तापमान, दिन का समय तथा मनुष्य द्वारा दी गई उत्तेजनाओं जैसे कारकों को देखा। प्रयोगों में सांपों के साथ नियंत्रित मानव-संपर्क की परिस्थितियां बनाई गईं और यह देखा गया कि कहां पांव पड़ने पर सांप रक्षा के लिए काटता (defensive snakebite) है। पाया गया कि सिर पर पांव पड़ने पर काटने की संभावना लगभग 44 प्रतिशत थी, शरीर के बीच के हिस्से पर 20 प्रतिशत और पूंछ पर 11 प्रतिशत थी। छोटे सांपों, विशेषकर नवजातों में काटने की प्रवृत्ति भी अधिक पाई गई। हालांकि पशु-नैतिकता सरोकारों के चलते इस अध्ययन को साइंटिफिक रिपोर्ट्स ने फरवरी 2025 में वापस ले लिया।
6. भौतिकी: छींटे-मुक्त युरिनल
भौतिकी का इगनोबेल पुरस्कार ऐसे युरिनल डिज़ाइन (splash-free urinal design) करने के लिए दिया है जिससे आसपास फैलने वाले छींटे और गंदगी न के बराबर फैलें। शोधकर्ताओं ने ऐसा अनुभव किया था कि कितनी भी सावधानी से युरिनल में पेशाब की जाए, आसपास के फर्श पर छींटे फैल ही जाते हैं और सार्वजनिक शौचालयों की सफाई का मुद्दा बना रहता है। यदि सफाईकर्मी हर व्यक्ति के जाने के बाद सफाई करते रहें तो यह उनके लिए भी थकाऊ होता है, और सफाई बरकरार रखने में संसाधन, पैसा और ऊर्जा भी लगती ही है। इसी के समाधान में उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि छींटे छिटककर बाहर आते ही क्यों हैं और इस आधार पर नए युरिनल डिज़ाइन पेश किए; इन डिज़ाइन का नाम उन्होंने नॉटी-लू (Nauti-Loo), कॉर्नुकोपिया (Cornucopeea) और यूरिन-नो (Urine-no) नाम दिए हैं। इसके लिए उन्होंने किसी तरल के सतह से टकराने के कोण और छींटों के उचकने के बीच के सम्बंध का गणितीय मॉडल बनाया और पाया कि किसी सतह पर किसी तरल की जितनी सीधी धार (90 डिग्री के कोण से) पड़ेगी छींटे उतने ज़्यादा छिटकते हैं, सतह पर धार यदि कम कोण (30 डिग्री से कम) से टकराए तो छींटे कम उछलते हैं। इसके आधार पर उन्होंने तिरछी सतहों वाले तीन युरिनल डिज़ाइन तैयार किए और उनका परीक्षण किया। नई डिज़ाइनों से प्रचलित युरिनल की तुलना महज़ 1.4 प्रतिशत छींटे बाहर आए।
7. तकनीक: मच्छर की सूंडी से 3-डी प्रिंटिंग
तकनीक का इगनोबेल पुरस्कार वैज्ञानिकों की उस कोशिश को मिला जिसमें मरी हुई मादा मच्छर की सूंड को 3-डी प्रिंटर की बेहद सूक्ष्म नोज़ल के रूप में इस्तेमाल किया गया। मच्छर की सूंड बहुत पतली होने के साथ काफी मज़बूत भी होती है। कई कीटों के सूंड (मुखांगों) की संरचना और यांत्रिक गुणों की तुलना करने पर मादा मच्छर की सूंड सबसे उपयुक्त लगी। उन्होंने प्रयोगशाला में पाले गए मृत मच्छरों से सूंड अलग करके डिस्पेंसिंग नोज़ल से जोड़ा और डायरेक्ट-इंक-राइटिंग 3-डी प्रिंटर (direct-ink-writing 3-D printer) में लगाया और अलग-अलग गति संयोजन से प्रिंट करके देखा। उन्होंने पाया कि इस नोज़ल व्यवस्था से लगभग 20 माइक्रोमीटर पतली लकीरें प्रिंट की जा सकती हैं, जो आम व्यावसायिक नोज़लों की तुलना में काफी पतली लकीरें हैं।
8. घ्राण विज्ञान: संतान की गंध
घ्राण विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार उस अध्ययन को मिला है जिसमें शोधकर्ताओं ने यह जांचा कि माता-पिता अपनी संतानों के शरीर की गंध को अलग-अलग उम्र में किस तरह महसूस करते हैं। पोलैंड में किए गए अध्ययन में 235 माता-पिता ने कुल 367 संतानों के शरीर की गंध की सुखदता (pleasing body odor) का आकलन किया। संतानों की उम्र एक महीने से 35 वर्ष तक थी। प्रतिभागियों ने अपनी संतानों की गंध को 0 से 20 के पैमाने पर बेहद बुरी से बहुत अच्छी तक अंक दिए। शोधकर्ताओं ने संतानों की उम्र, माता-पिता और संतान का लिंग, साथ बिताया समय तथा माता-पिता और-संतान के बीच सम्बंध जैसे कारकों को भी विश्लेषण में शामिल किया। पाया गया कि संतान की उम्र बढ़ने के साथ उसके शरीर की गंध को सुखद मानने की प्रवृत्ति घटती गई। शिशुओं की गंध को 93.7 प्रतिशत माता-पिता ने सुखद या बहुत सुखद बताया, जबकि किशोरावस्था से बड़ी संतानों के लिए यह आंकड़ा 75.2 प्रतिशत था। शोधकर्ताओं का कहना है कि माता-पिता और बच्चों के बीच सम्बंधों में गंध की भूमिका हो सकती है।
9. शांति: दुश्मन का दुश्मन दोस्त क्यों
शांति का इगनोबेल पुरस्कार उस शोध को मिला जिसमें वैज्ञानिकों ने दोस्ती और दुश्मनी के बीच एक दिलचस्प सामाजिक मनोविज्ञान का अध्ययन किया है। शोधकर्ताओं ने छह अध्ययनों में कुल 1183 प्रतिभागियों से पूछा कि वे अपने आदर्श दोस्त (ideal friend) में क्या गुण चाहते हैं। प्रतिभागी अमेरिका और भारत के छात्र तथा सामान्य समुदाय के थे। उनसे यह भी पूछा गया कि उनका दोस्त उनके साथ, किसी अजनबी के साथ या उनके दुश्मन के साथ कैसा व्यवहार करे तो उन्हें ठीक लगेगा। सामान्य स्थिति में लोगों ने दयालु और भरोसेमंद दोस्त को अधिक पसंद किया। लेकिन जब सवाल किसी दुश्मन के प्रति व्यवहार का था, तो तस्वीर बदल गई। कुछ प्रतिभागियों ने ऐसे दोस्त को पसंद किया जो उनके दुश्मन के प्रति थोड़ा रूखा और सख्त रवैया रखते हों। शोधकर्ताओं ने इसे “embedded dyad” यानी दोस्ती को व्यापक सामाजिक नेटवर्क के भीतर देखने के दृष्टिकोण से समझाया। कोई दोस्त केवल हमारे साथ ही ताल्लुक नहीं रखता बल्कि वह हमारे प्रतिद्वंद्वियों से भी मिलता-जुलता है, जिसका अप्रत्यक्ष असर हम पर पड़ सकता है।
10. मृदा विज्ञान: जांघियों से मिट्टी की सेहत
मृदा विज्ञान का इगनोबेल पुरस्कार मिट्टी में दबाए गए सूती जांघियों और टी-बैग्स के ज़रिए मिट्टी की जैविक सक्रियता और गुणवत्ता (soil biological activity & quality) का अध्ययन करने के लिए मिला है। विचार सरल था: मिट्टी में मौजूद सूक्ष्मजीव जितने सक्रिय होंगे, सूती कपड़े जैसे जैविक पदार्थ की अपघटन गति उतनी ही तेज़ होगी। शोधकर्ताओं ने शौकिया वैज्ञानिकों से आग्रह किया कि वे मानकीकृत सूती जांघिए और टी-बैग्स वगैरह अपने आसपास की विभिन्न तरह की मिट्टियों (जैसे बाग-बगीचे, मैदान, खेत आदि) में गाड़ दें और लगभग दो महीने बाद उन्हें निकालें, ताकि यह देखा जा सके कि कपड़ा कितना सड़-गल गया और कितना बाकी है। दुनिया भर के लगभग 1000 शौकिया वैज्ञानिकों ने 2000 से अधिक जांघिए और हज़ारों टी-बैग्स दफनाए। पाया गया कि निजी बगीचों, जहां पेड़-पौधों की प्रजातियों में विविधता थी, में कपड़ा सबसे अधिक तेज़ी से अपघटित हुआ, जबकि लॉन (जिस पर सिर्फ एक तरह के पौघे – हरी घास या दूब – उगी थी) में अपघटन (decomposition) धीमी गति से हुआ। मिट्टी की गुणवत्ता के लिहाज़ से यह अहम है।
चलते–चलते
विगत 3 सितंबर को स्विट्जरलैंड के ज़्यूरिख में इस वर्ष के इगनोबेल पुरस्कार दिए गए। अपने 36 वर्ष के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ जब एनल्स ऑफ इंप्रोबेबल ने यह समारोह बोस्टन के बाहर आयोजित किया गया। इसका कारण पिछले दो वर्ष का अनुभव रहा: विगत दो सालों में अमेरिका में सख्त किए गए वीज़ा नियमों और विभिन्न देशों के बीच चल रहे युद्ध एवं संघर्ष के चलते कई विजेता चाहकर भी समारोह में शामिल नहीं हो पा रहे थे। और, इगनोबेल पुरस्कार के संस्थापक मार्क अब्राहम्स (mark abrahams) के लिए यह चिंता का विषय था कि यह समारोह जो हल्के-फुल्के और मज़ेदार अंदाज़ में सम्पन्न होता है उस पर संघर्ष और नीतियां हावी हो रही हैं, विजेता शामिल नहीं हो पा रहे हैं और मेहमानों के लिए देश का दौरा करना असुरक्षित हो गया है।
इस वर्ष विजेता तो शामिल हो ही पाए, साथ ही समारोह में नोबेल पुरस्कार विजेता एशर डफलो, अभिजीत बनर्जी, मिशेल मेयर एवं टिम हंट भी शामिल रहे जिन्होंने इगनोबेल पुरस्कार विजेताओं को मशरूम-आकार की ट्रॉफी दी। आमंत्रित अतिथियों ने 24/7 की तर्ज पर व्याख्यान भी दिए: तयशुदा विषय पर पहले तो 24 सेकंड में और फिर 7 शब्दों में विषय समझाया गया। समारोह की शुरुआत ‘लैबोरेटरी ऑफ स्मॉल डिसास्टर’ की थीम पर डांस परफॉर्मेंस हुई, फंजाई थीम पर ओपेरा संगीत (fungi themed opera)सम्पन्न हुआ, और समारोह का समापन दर्शकों ने कागज़ के हवाई-जहाज़ उड़ाकर किया। हर इवेंट की शुरुआत फोर-पीस ऑर्केस्ट्रा द्वारा की गई, और विजेताओं की वेशभूषा उनके शोध विषय से सम्बंधित थी।
अगले वर्ष ये पुरस्कार बेल्जियम के एंटवर्प (antwerp) में 5 सितंबर को दिए जाएंगे। आप यदि दर्शकों में शामिल होना चाहें तो मई में टिकट बुकिंग उनकी वेबसाइट पर प्रारंभ होगी। और, आप चाहें तो किसी मज़ेदार लेकिन संजीदा शोध को अगले वर्ष के लिए नामित (nominate) भी कर सकते हैं, क्या पता आपका नामित शोध पुरस्कार पा जाए। (स्रोत फीचर्स)
हालिया हुए एक शोध में विज्ञान और चिकित्सा जगत को एक ऐतिहासिक उपलब्धि प्राप्त हुई है। नेचर में प्रकाशित शोध के अनुसार प्रयोगशाला में मानव मस्तिष्क के हू-ब-हू छोटे मॉडल विकसित कर लिए गए हैं। इन्हें ‘ब्रेन ऑर्गेनॉइड’ (brain organoid) या ‘मिनी ब्रेन’ कहा जाता है।
पिछले कुछ अन्य अध्ययनों में भी ऐसे मिनी ब्रेन विकसित किए गए थे लेकिन वे थोड़े समय में – केवल कुछ हफ्तों-महीनों के भीतर – नष्ट हो जाते थे। उनकी मदद से मस्तिषक के केवल शुरुआती विकास का अध्ययन ही मुमकिन था। लेकिन इस ताज़ा अध्ययन में शोधकर्ताओं ने इस ‘मिनी ब्रेन’ (mini brain) को पांच साल से अधिक समय तक सफलतापूर्वक जीवित और विकासमान रखा।
हारवर्ड युनिवर्सिटी की प्रोफेसर पाओला अर्लोटा और उनकी टीम ने 34 मिनी ब्रेन विकसित करके उनका अध्ययन किया। इस दौरान उन्होंने पाया कि प्रयोगशाला में विभाजन कर रहे कोशिकाओं के समूह समय के साथ बिल्कुल उसी गति और क्रम से वृद्धि कर रहे थे जैसे मां के गर्भ में बच्चे (human embryo) का मस्तिष्क विकसित होता है। विकास के चरण कुछ इस प्रकार थे – 15 दिन से 2 महीने में पहली तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 3 से 6 महीने में दूसरी तिमाही के जैसा भ्रूण मस्तिष्क; 12 महीने में नवजात शिशु के मस्तिष्क जैसी स्थिति और पांच साल तक कोशिकाओं के चारों तरफ प्रोटीन की सुरक्षा परत बनना (myelination) और परिपक्व होना।
शोधकर्ताओं ने एक प्रयोग भी किया। उन्होंने नई (15 दिन पुरानी) और परिपक्व (9 से 12 महीने पुरानी) कोशिकाओं का एक साथ 15 दिनों तक विभाजन करवाया। नतीजा यह था कि नई कोशिकाओं ने शुरुआती तंत्रिका कोशिकाएं बनाई, जबकि परिपक्व कोशिकाओं ने उनकी परिपक्वता के अनुसार परिपक्व तंत्रिका कोशिकाओं का ही विकास किया। इस प्रयोग से यह साबित हुआ कि मस्तिष्क की कोशिकाओं में जैविक स्मृति (biological memory) होती है, और वे नए माहौल में भी अपनी जैविक उम्र के अनुसार ही काम करती हैं।
पिछले अध्ययनों में मस्तिष्क की मुख्य कोशिकाएं पोषण की कमी से जल्दी नष्ट हो जाती थीं। इससे निपटने के लिए शोधकर्ताओं ने एक खास संशोधित तरल (ब्रेनफिज़) (brainphys) का इस्तेमाल किया। ब्रेनफिज़ की मदद से तंत्रिका कोशिकाएं न केवल लंबे समय तक क्रियाशील रहीं, बल्कि उनके बीच जटिल विद्युतीय संकेतों (complex electric signals) का प्रेषण भी होने लगा।
शोधकर्ताओं को लगता है कि यह अनुसंधान शिज़ोफ्रेनिया और ऑटिज़्म जैसी मानसिक और न्यूरोलॉजिकल बीमारियों के कारणों और लक्षणों को बेहतर तरीके से समझने में सहायक होगा, क्योंकि ये बीमारियां एक खास उम्र के बाद ही सामने आती हैं। इसके अलावा, मरीज़ों की स्टेम कोशिकाओं (stem cells) से मिनी ब्रेन विकसित करके नई दवाइयों का सुरक्षित परीक्षण भी संभव हो सकेगा।
भविष्य में शोधकर्ता संवेदनाओं से युक्त ऐसे मिनी ब्रेन बनाने की कोशिश करने जा रहे हैं जो सुनने, देखने, और छूने जैसे संकेतों को महसूस करने में भी सक्षम हों। (स्रोत फीचर्स)
विज्ञान प्रकृति के रहस्यों को परत-दर-परत सुलझाने का उद्यम है। महान जीवविज्ञानी चार्ल्स डार्विन ने विकासवाद का सिद्धांत देकर दुनिया को चौंका दिया था। वनस्पति जगत को लेकर भी उनकी अंतर्दृष्टि और सूक्ष्म अवलोकन क्षमता बेजोड़ थी। वर्ष 1875 में, डार्विन ने एक पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम (Saxifraga candelabrum) को देखकर यह अनुमान लगाया था कि वह मांसाहारी (carnivorous) हो सकता है। पूरे डेढ़ सौ साल तक यह महज़ एक परिकल्पना बनी रही, क्योंकि इसे साबित करने के लिए कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण मौजूद नहीं था। अंतत: अगस्त, 2026 में प्रकाशित एक अभूतपूर्व शोध ने वे प्रमाण उपलब्ध करा दिए हैं। चीन के हेंगडुआन पर्वत और किंगहाई-तिब्बत पठार की बर्फीली ऊंचाइयों पर पाए जाने वाले पौधे सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को अब आधिकारिक तौर पर एक मांसाहारी पौधे की मान्यता मिल गई है।
सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम कोई सामान्य पौधा नहीं है। इसका आवास स्थान समुद्र तल से हज़ारों मीटर ऊपर, अत्यधिक ठंडे और दुर्गम अल्पाइन क्षेत्रों में है। इन बर्फीले और पथरीले इलाकों की मिट्टी में आवश्यक पोषक तत्वों, विशेषकर नाइट्रोजन और फास्फोरस की भारी कमी होती है। अत्यधिक ठंड के कारण मृत जीवों और वनस्पतियों का अपघटन बहुत धीमी गति से होता है, जिससे मिट्टी उपजाऊ नहीं बन पाती। ऐसे कठोर वातावरण में जीवित रहने के लिए पौधों को कुछ असाधारण रणनीतियां अपनानी पड़ती हैं। अपनी नाइट्रोजन की आवश्यकता को पूरा करने के लिए प्रकृति ने इस पौधे को एक गुप्त हथियार दिया है – कीटों का शिकार करने की क्षमता (insect eating capacity)। यह पारिस्थितिक अनुकूलन (ecological adaptation) का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहां विपरीत परिस्थितियां किसी जीव को एक पूरी तरह से नई जीवनशैली अपनाने के लिए विवश कर देती हैं।
चार्ल्स डार्विन (charles darwin) ने अपने अध्ययन के दौरान सैक्सीफ्रेगा वंश के पौधों की पत्तियों और तनों पर मौजूद छोटे-छोटे ग्रंथिल रोमों को बेहद करीब से देखा था। उन्होंने पाया कि इन रोमों से चिपचिपा तरल पदार्थ स्रावित होता है, जिसमें छोटे-छोटे कीड़े अक्सर फंस जाते हैं। डार्विन को पूरा विश्वास था कि यह पौधा इन कीटों को केवल फंसाता ही नहीं है, बल्कि उन्हें पचाकर अपना भोजन भी बनाता है। हालांकि, उस समय विज्ञान इतना उन्नत नहीं था कि आणविक या रासायनिक स्तर पर इस प्रक्रिया को प्रमाणित किया जा सके। इसके अलावा, इस पौधे का निवास स्थान इतना दुर्गम है कि वहां जाकर लंबे समय तक इसका प्राकृतिक अवस्था में अध्ययन करना किसी भी वैज्ञानिक के लिए एक बड़ी चुनौती थी। यही कारण है कि डार्विन का यह विचार दशकों तक केवल परिकल्पना ही रहा और इसे मुख्यधारा के कीटभक्षी पौधों (insect eating plants) में शामिल नहीं किया गया।
हाल ही में प्रतिष्ठित शोध पत्रिका नेचर कम्युनिकेशंस में चीनी शोधकर्ताओं के एक दल ने अपना विस्तृत अध्ययन प्रकाशित किया है। उन्होंने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को मांसाहारी साबित करने के लिए आधुनिक विज्ञान की सबसे उन्नत तकनीकों का सहारा लिया। वनस्पति विज्ञान के कड़े नियमों के अनुसार, किसी पौधे को केवल कीट फंसाने के आधार पर मांसाहारी नहीं कहा जा सकता। इसके लिए यह साबित करना अनिवार्य होता है कि पौधा शिकार को आकर्षित करता है, उसे फंसाता है, उसे पचाने के लिए विशेष एंज़ाइम (special enzyme) निकालता है और अंतत: उस शिकार से प्राप्त पोषक तत्वों को अपने भीतर अवशोषित करता है। शोध दल ने सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम को इन सभी मापदंडों की वैज्ञानिक कसौटी पर परखा।
शोध की शुरुआत व्यापक मैदानी अध्ययन से हुई। दल ने प्राकृतिक आवास में मौजूद सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के पौधों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण किया। उन्होंने पाया कि पौधे के चिपचिपे ग्रंथिल रोम (sticky pore glands) शिकार को पकड़ने में बेहद कुशल हैं। औसतन एक परिपक्व पौधे पर इकहत्तर छोटे कीट फंसे हुए मिले। यह इस बात का पहला संकेत था कि पौधा सक्रिय रूप से शिकार कर रहा है और ये कीट केवल संयोगवश नहीं फंसे थे।
दूसरा और सबसे महत्वपूर्ण कदम यह पता लगाना था कि क्या पौधा इन फंसे हुए कीटों को वास्तव में पचा रहा है। इसके लिए शोधकर्ताओं ने फ्लोरेसेंस टैगिंग (flouroscence tagging) नामक एक विशेष प्रकाश-आधारित तकनीक का उपयोग किया। इस आधुनिक तकनीक के माध्यम से उन्होंने पौधे के ग्रंथिल रोमों में फॉस्फेटेस एंज़ाइम की गतिविधि का पता लगाया। फॉस्फेटेस वह प्रमुख पादप एंज़ाइम है जो शिकार के शरीर को गलाकर उसमें से आवश्यक पोषक तत्वों को अलग करने का काम करता है। यह एक बहुत बड़ी सफलता थी, क्योंकि इससे साबित हो गया कि पौधा कीटों को केवल पकड़ने के लिए चिपचिपा पदार्थ नहीं छोड़ता, बल्कि एक रासायनिक प्रक्रिया के तहत उन्हें पचाता (digest) भी है।
अंतिम और सबसे निर्णायक प्रमाण यह साबित करना था कि पौधे ने कीटों के शरीर से निकले पोषक तत्वों को वास्तव में सोख लिया है। इसके लिए वैज्ञानिकों ने समस्थानिक ट्रेसिंग तकनीक (isotope tracing technique) का प्रयोग किया। उन्होंने प्रयोगशाला में फल मक्खियों को नाइट्रोजन के एक समस्थानिक (परमाणु भार 15 वाले आइसोटॉप) युक्त यौगिक से पोषित किया। नाइट्रोजन के दो स्थिर समस्थानिक होते हैं – एक का परमाणु भार 14 (उपस्थिति 99.26 प्रतिशत) और दूसरे का परमाणु भार 15 (उपस्थिति 0.38 प्रतिशत) होते हैं। इसके बाद इन मक्खियों को पौधे के ग्रंथिल रोमों पर रख दिया गया। कुछ दिनों बाद जब पौधे के ऊतकों का रासायनिक विश्लेषण किया गया तो वही नाइट्रोजन-15 समस्थानिक पौधे की पत्तियों और तनों के भीतर मौजूद पाया गया। यह इस बात का अकाट्य प्रमाण था कि पौधे ने शिकार को पचाने के बाद उसके पोषक तत्वों को सफलतापूर्वक अवशोषित (Absorb) कर लिया है।
इन शारीरिक प्रमाणों के अलावा, शोधकर्ताओं ने पौधे का संपूर्ण जीनोम विश्लेषण भी किया। उन्होंने पाया कि सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम के डीएनए में शिकार को आकर्षित करने, उसे पचाने और पोषक तत्वों को सोखने वाले वे सभी जीन सक्रिय (active genes) हैं, जो दुनिया के अन्य जाने-माने मांसाहारी पौधों में पाए जाते हैं।
विकासवाद के नज़रिए से यह बहुत महत्वपूर्ण खोज है। यह अभिसारी विकास का एक शानदार उदाहरण है, जहां बिल्कुल अलग-अलग वंश के पौधे समान पर्यावरणीय चुनौतियों (environmental stress) का सामना करने के लिए स्वतंत्र रूप से एक जैसी विशेषताएं विकसित कर लेते हैं।
यह शोध न सिर्फ वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में एक मील का पत्थर है, बल्कि महान वैज्ञानिक चार्ल्स डार्विन की दूरदृष्टि (vision) को भी एक भव्य श्रद्धांजलि है। जो बात डार्विन ने अपनी सूक्ष्म अवलोकन क्षमता के आधार पर कही थी, उसे आधुनिक प्रयोगशालाओं और उन्नत तकनीकों ने सही साबित कर दिया है। सैक्सीफ्रेगा कैंडेलब्रम की यह कहानी हमें बताती है कि प्रकृति जीवन को बचाए रखने के लिए किस हद तक जा सकती है, और वैज्ञानिक जिज्ञासा अंतत: हर गहरे रहस्य को उजागर कर देती है। (स्रोत फीचर्स)