अजगर की बैक्टीरिया-रोधी चमड़ी

वैसे तो ये अजगर (Python regius) एक सुरक्षा रणनीति के लिए जाने ही जाते हैं – खतरा भांपकर ये एक गेंद के रूप में गुड़ी-मुड़ी हो जाते हैं। इसी वजह से इनका नाम पड़ा है बॉल पायथन। इसे रॉयल पायथन (Royal Python) भी कहते हैं और यह पश्चिमी तथा मध्य अफ्रीका (Central Africa) में पाया जाता है। लेकिन अब एसीएस ओमेगा में प्रकाशित एक अध्ययन में इनकी एक और सुरक्षा रणनीति का विवरण प्रस्तुत हुआ है जो शायद हमारे काम की साबित हो।

हालांकि सांपों की त्वचा (Snake skin) की सूक्ष्म रचना का काफी अध्ययन किया गया है लेकिन इसमें ज़्यादा ध्यान रंग और चलने-फिरने पर इसके असर पर दिया गया है। बैक्टीरिया से बचाव में इसकी भूमिका उपेक्षित ही रही है।

इस संदर्भ में प्राग स्थित युनिवर्सिटी ऑफ केमेस्ट्री एंड टेक्नॉलॉजी के वैक्लाव पेरूट्का के नेतृत्व में शोधकर्ताओं ने बॉल पायथन (Ball Python) की त्वचा पर उपस्थित शल्कों (Scales) पर गौर किया। इन शल्कों की एक विशेषता यह है कि इन पर सूक्ष्म कंटक (Microneedles) पाए जाते हैं। हरेक कंटक करीब 9 माइक्रोमीटर लंबा होता है – यह लगभग एक कोशिका के बराबर है। शोधकर्ताओं की मान्यता थी कि ये कंटक शायद बैक्टीरिया द्वारा बायोफिल्म बनाने की प्रक्रिया को रोकते होंगे। बायोफिल्म (Biofilm) तब बनती हैं जब सूक्ष्मजीव की आबादी एक लसलसा पदार्थ छोड़ती है। ये पदार्थ  उन्हें किसी भी सतह पर चिपकने में मदद करता है।

बायोफिल्म पोषक तत्वों को बैक्टीरिया के अंदर रखने और बैक्टीरिया-नाशी पदार्थों को बाहर रखने में भी मदद करती है। इसी बायोफिल्म के माध्यम से बैक्टीरिया आपस में जीन्स का लेन-देन भी करते हैं। इनमें एंटीबॉयोटिक (Antibiotic) प्रतिरोध के जीन्स भी होते हैं। ऐसा देखा गया है कि बायोफिल्म से युक्त बैक्टीरिया मुक्तजीवी बैक्टीरिया से 1000 गुना ज़्यादा प्रतिरोधी होते हैं।

पेरूट्का की टीम ने अपने अध्ययन के लिए प्लज़ेन चिड़ियाघर से जंतुओं द्वारा विमोचित त्वचा के नमूने एकत्रित किए। इनमें से एक-एक शल्क को सुइयों पर जड़ दिया और उन्हें पोषक पदार्थों से भरपूर माध्यम में इनक्यूबेट किया। माध्यमों में दो में से एक किस्म के बैक्टीरिया भी रखे गए थे – कुछ में एशरीशिया कोली (ई.कोली) और कुछ में स्टेफिलोकॉकस ऑरियस (एस. ऑरियस)। लगभग 48 घंटे बाद देखा गया कि कंट्रोल नमूने (जिसमें शल्क पोलीस्टायरिन प्लास्टिक से बने थे) पर एक मोटी परिपक्व बायोफिल्म का आवरण बन चुका था। लेकिन सांप के वास्तविक शल्क दोनों बैक्टीरिया के विरुद्ध कहीं ज़्यादा प्रतिरोधी थे – ई. कोली 88 प्रतिशत कम चिपक पाए थे और एस. ऑरियस 78 प्रतिशत कम। सूक्ष्मदर्शी से देखने पर पता चला कि शल्क की सतहों पर बैक्टीरिया बहुत कम आबाद हुए थे और कंटकों के बीच की जगहों पर थे।तो सवाल उठा कि कंटकों ने यह करामात कैसे की। शोधकर्ताओं ने इसकी क्रियाविधि को लेकर कई अटकलें लगाई हैं।

एक संभावना तो यह हो सकती है कि कंटकनुमा (Spike-like) उभार बैक्टीरिया (Bacteria) को संपर्क बनाने के लिए उपलब्ध जगह को सीमित कर सकते हैं या शायद संपर्क के बाद उन्हें अस्थिर बनावट में धकेल सकते हैं।

शोधकर्ताओं के मुताबिक एक संभावना यह भी है कि कंटकों के नुकीले सिरे बैक्टीरिया की झिल्ली को भेदकर नुकसान भी पहुंचा सकते हैं या किसी प्रकार से बायोफिल्म स्रवण की उनकी क्रिया में बाधा पहुंचा सकते हैं। बहरहाल, प्रतिरोध की सटीक क्रियाविधि को समझना महत्वपूर्ण होगा। ऐसा होने पर कुछ उपयोगी बैक्टीरिया-रोधी चीज़ें बनाने का रास्ता खुलेगा। इस नए रास्ते की विशेषता यह होगी कि हमें रसायनों का उपयोग कम से कम करना होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सिर्फ मादा चूहों की याददाश्त सुधारता एक यौगिक

वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के गैबर एगरवैरी और उनके साथियों ने चूहों (Rodents) पर कुछ मज़ेदार प्रयोग करके बताया है कि एक यौगिक (Metabolic Byproduct) है एसिटेट जो उनकी याददाश्त को सुदृढ़ करता है और यह असर सिर्फ मादा चूहों पर होता है। जिस यौगिक की बात हो रही है वह आम तौर पर शरीर में अल्कोहल, ग्लूकोज़ और अधिक रेशेदार खाद्य पदार्थों के विघटन से बनता है।

याददाश्त सम्बंधी दो प्रयोग किए गए थे। पहले प्रयोग में चूहों को दो समान वस्तुओं के साथ 10 मिनट तक खेलने दिया गया। फिर चौबीस घंटे बाद चूहों को उन्हीं वस्तुओं के संपर्क में लाया गया। लेकिन इस बार एक वस्तु की जगह बदल दी गई थी। विचार यह था कि यदि चूहे की याददाश्त अक्षुण्ण रही तो वह समझ जाएगा कि एक वस्तु की जगह बदली गई है। दूसरी ओर, यदि याददाश्त अस्त-व्यस्त हुई होगी तो वे दोनों वस्तुओं के साथ बराबर समय बिताएंगे। चूहों ने नई जगह पर रखी वस्तु से साथ ज़्यादा समय बिताया। यानी पहली बात (अक्षुण्ण याददाश्त) सही है।

दूसरे प्रयोग में चूहों को एक बार फिर दो एक-सी वस्तुओं के साथ 10 मिनट के लिए छोड़ा गया।  24 घंटे बाद वस्तुएं फिर से रखी गईं लेकिन इस बार एक वस्तु बदल दी गई थी। देखा यह गया था कि क्या चूहे नई वस्तु पर ज़्यादा ध्यान देते हैं, यानी उस पर ज़्यादा समय बिताते हैं।

देखा गया कि जिन मादा चूहों को एसिटेट (Acetate) का इंजेक्शन दिया गया था उन्होंने अन्य के मुकाबले (जिन्हें प्लेसिबो इंजेक्शन दिया गया था) इन दोनों कार्यों में बेहतर प्रदर्शन किया। अलबत्ता, रोचक बात यह रही कि नर चूहों (Male Rodents) में कोई फर्क नज़र नहीं आया।

शोधकर्ताओं को पता चला है कि एसिटेट मस्तिष्क में जीन्स की अभिव्यक्ति (Gene Expression) को प्रभावित करता है। वह हिस्टोन प्रोटीन्स (Histone Proteins) में परिवर्तन कर देता है। हिस्टोन्स वे प्रोटीन होते हैं जिनके इर्द-गिर्द डीएनए (DNA) कसकर लिपटा होता है। जब हिस्टोन पर एसिटेट समूह जुड़ जाते हैं तो यह लिपटना थोड़ा ढीला पड़ जाता है। इसकी वजह से कई जीन्स और कोशिका की आणविक मशीनरी के बीच संपर्क आसान हो जाते हैं। ऐसे में ये जीन्स सक्रिय रहते हैं।

शोधकर्ताओं ने कुछ ऐसे हिस्टोन परिवर्तन देखे जिनका सम्बंध दीर्घावधि याददाश्त (Long term memory) से जाना-माना है। इसके अलावा एसिटेट ने मादा चूहों के मस्तिष्क के सीखने से सम्बंधित हिस्सों में भी जीन्स की अभिव्यक्ति पर असर डाला था।

एक तो यह महत्वपूर्ण बात रही कि फर्क सिर्फ मादा चूहों (Female Rodents) की स्मृति (Memory) पर दिखा। दूसरी बात और भी महत्वपूर्ण है। साइन्स सिग्नलिंग पत्रिका में प्रकाशित शोध पत्र में बताया गया है कि एसिटेट तभी कारगर होता है जब मस्तिष्क में तंत्रिका गतिविधि को सीखने की किसी प्रक्रिया के दौरान सक्रिय कियी जाए; यह आम याददाश्त सुदृढ़ीकरण का तरीका नहीं है। (स्रोत फीचर्स)

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इंसान बेहोशी में भी सीख सकते हैं!

शीर्षक पढ़ते ही मन में यह सवाल उठता है: क्या ऐसा सचमुच मुमकिन है? हाल ही में हुए एक शोध में वैज्ञानिकों ने ऐसी ही चौंका देने वाली जानकारी को साझा करते हुए पुरानी समझ को चुनौती दी है। नेचर पत्रिका में प्रकाशित इस अध्ययन में वैज्ञानिकों ने पाया कि साधारण बेहोशी वाली दवा देने के बावजूद भी इंसानी दिमाग (Human Brain) सामान्य अवस्था जैसा सक्रिय (Concious) रहता है। यहां तक कि दिमाग बेहोशी की हालत में भी संकेतों को समझता और आगे का अनुमान लगाता है। पिछले कुछ अध्ययनों में यह पता लगाया जा चुका है कि दिमाग के संवेदना-ग्राही हिस्से बेहोशी की हालत में इंद्रियों के संकेतों से सरल ध्वनियों को दर्ज कर सकते हैं। लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि क्या दिमाग बेहोशी की हालत में समझ और सीख भी सकता है।

इसी का पता लगाने के लिए बेलर कॉलेज ऑफ मेडिसिन के तंत्रिका वैज्ञानिक समीर शेठ और उनके साथियों ने सात ऐसे मरीज़ों पर अध्ययन किया, जिनका मिर्गी के इलाज के लिए मस्तिष्क का ऑपरेशन किया जा रहा था। सातों को प्रोपोफोल (Propofol) नामक दवा (जनरल एनेस्थीसिया) से बेहोश करके उनके दिमाग की गतिविधि को रिकॉर्ड किया गया।

इस अध्ययन को दो समूहों में बांटकर किया गया था। पहले समूह में, बेहोशी की हालत वाले तीन प्रतिभागियों को अलग-अलग आवृत्ति की बार-बार दोहराई जाने बीप सुनाई गई और बीच-बीच में कुछ अन्य ध्वनियां। दस मिनट तक मस्तिष्क की तंत्रिका गतिविधियां रिकॉर्ड करने से पता चला कि समय के साथ ‘बेहोश’ दिमाग के हिप्पोकैम्पस (Hippocampus) हिस्से में बीप को अन्य ध्वनियों से अलग पहचानने और उनकी अलग-अलग आवृत्तियों के बीच अंतर करने की क्षमता बढ़ती गई। अर्थात लगता है कि दिमाग अचेतन सीखने की क्षमता रखता है।

शेष चार प्रतिभागियों को कुछ वार्तालाप के हिस्से सुनाए गए। दिमागी रिकॉर्डिंग में देखा गया कि कुछ तंत्रिकाएं (Neurons) शब्दों के विशेष हिस्सों पर प्रतिक्रिया दे रहीं थीं (जैसे संज्ञाओं को बाकी शब्दों से अलग पहचानना)। एक शोधकर्ता के अनुसार, ‘बेहोशी (Unconcious) में भी प्रतिभागी यह अनुमान लगाने में समर्थ थे कि अगला शब्द क्या हो सकता है’। आखिर में, बेहोश प्रतिभागियों और सामान्य (बाहोश) प्रतिभागियों के आंकड़ों की तुलना की गई। देखा गया कि सामान्य और बेहोश, दोनों ही तरह के प्रतिभागियों के दिमागों का बर्ताव लगभग एक जैसा रहा।

यह दर्शाता है कि दिमाग का एक हिस्सा – हिप्पोकैम्पस (जो नई यादें बनाने और सीखने की क्षमता के लिए जिम्मेदार है), बेहोश हालत में भी जानकारी का आकलन और अनुमान लगाने में सक्षम है। वैज्ञानिक अभी अन्य तरह से काम करने वाले निश्चेतकों पर भी प्रयोग करना चाहेंगे ताकि और अधिक दृढ़ प्रमाण मिलें जो इस प्रयोग के परिणामों की पुष्टि कर सकें।

इस जानकारी का इस्तेमाल चिकित्सा क्षेत्र में किया जा सकता है। इन आंकड़ों की मदद से ऐसे मरीज़ों का उपचार संभव हो सकेगा जो कोमा या निष्क्रिय हालत से पीड़ित हैं। इससे दिमाग के क्षतिग्रस्त हिस्सों को छोड़कर, बाकी बचे हुए सही हिस्सों को कृत्रिम रूप से सक्रिय करने में मदद मिल सकेगी। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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एड्स वायरस से निपटने का नया प्रयास

वैसे तो एड्स वायरस (ह्युमैन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस यानी एच.आई.वी.) (HIV) पर किए गए अनुसंधान ने हमें ऐसी कई दवाइयां मुहैया कराई हैं जो वायरस को काबू में रखती हैं और उसे हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को तहस-नहस करने से रोके रखती हैं। दुनिया भर में करीब 4 करोड़ लोग एच.आई.वी. के साथ जी रहे हैं और कोई इलाज नहीं खोजा जा सका है। आज तक इलाज करके मात्र 11 लोगों को वायरस से मुक्त किया जा सका है। यह स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण (Stem cell transplant) के ज़रिए संभव हुआ है। दिक्कत यह है कि स्टेम कोशिका उपचार का उपयोग आसान नहीं है।

अब एच.आई.वी./एड्स (AIDS) सम्मेलन में प्रस्तुत कुछ निष्कर्ष एक नई राह सुझा रहे हैं। कुछ अध्ययन प्रयोगशालाओं में किए गए हैं और कुछ अध्ययन मरीज़ों पर भी किए गए हैं। इनमें एक नए विचार का इस्तेमाल किया गया है।

आम तौर पर एड्स वायरस कोशिका में प्रवेश करने के बाद संक्रमित कोशिका में ऐसे परिवर्तन करता है कि वे उसकी उपस्थिति को भांपने और भांपकर स्वयं को नष्ट करने में असफल रहती हैं। यदि कोशिकाएं स्वयं को नष्ट करें तो उनके अंदर बैठे वायरस भी खत्म हो जाएंगे। यदि वायरस की इस करामात से पार पा लें तो काम आसान हो जाएगा।

यह सही है कि वर्तमान में उपलब्ध दवाइयां एच.आई.वी. का दमन इतनी हद तक कर देती है कि रक्त परीक्षण (Blood Test) में वह नज़र नहीं आता। लेकिन वह संक्रमित टी-कोशिकाओं (Infected T-cells) और मैक्रोफेजों में बना रहता है और अपना जेनेटिक कोड व्यक्ति के गुणसूत्रों में पिरो देता है। जैसे ही व्यक्ति उपचार बंद करता है ये सुप्त वायरस अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगते हैं और जल्दी ही लाखों वायरस रक्त में पहुंच जाते हैं। कई संक्रमित कोशिकाएं इन वायरसों को बाहर निकालने की प्रक्रिया में या प्रतिरक्षा तंत्र के हमले में मारी जाती हैं, लेकिन कुछ जीवित रह जाती है।

नई रणनीति टी-कोशिकाओं व मैक्रोफेज में पाए जाने वाले ऐसे सेंसर्स पर टिकी है जो सूक्ष्मजीवों को ताड़ते हैं। इन्हें कार्ड-8 (CARD8) कहते हैं। ये मुख्य रूप से प्रोटीएज़ (Protease) नामक एंज़ाइम को पहचानते हैं जो नव-निर्मित प्रोटीन्स को तोड़ता है ताकि नए वायरस बनाए जा सकें। जैसे ही कार्ड-8 किसी वायरस प्रोटीन की उपस्थिति भांपता है, वह एक किस्म की कोशिकीय खुदकुशी की प्रक्रिया शुरू करवा देता है जिसके चलते नए वायरसों का निर्माण अस्त-व्यस्त हो जाता है। इस प्रक्रिया को पायरोप्टोसिस (Pyroptosis) कहते हैं। 

एच.आई.वी. अपना प्रोटिएज़ दो एक-सी इकाइयों को जोड़कर बनाता है। 2021 में साइन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र में वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के लियांग शान और उनके साथियों ने बताया गया था कि कार्ड-8 (Card-8) सिर्फ दो इकाइयों के जुड़ने पर बने डाइमर को ही पहचानता है। वायरस इसका फायदा उठाते हैं – वे दो इकाइयों को जोड़ने की प्रक्रिया को तब तक मुल्तवी रखते हैं जब तक कि वायरस कण मेज़बान कोशिका से बाहर न झांकने लगे। शान की टीम ने यह भी बताया था कि दो वर्तमान एच.आई.वी. रोधी दवाइयां (एफेवाइरिनेज़़ और रिल्पिवायरिन) किसी तरह से डाइमर (Dimer) निर्माण की इस प्रकिया को जल्दी करवा देती हैं। उस समय तो किसी ने इस खोज की उपचारात्मक संभावना पर ध्यान नहीं दिया था लेकिन अब इस पर चर्चा हो रही है।

कई औषधि निर्माताओं ने ऐसी अधिक शक्तिशाली दवाइयों पर काम भी शुरू कर दिया है। जैसे टारगेटेड एक्टिवेटर ऑफ सेल किल (TACK) पर ध्यान दिया जा रहा है। 2023 में मर्क कंपनी ने साइन्स ट्रांसलेशन मेडिसिन में बताया था कि उसने ऐसा अणु खोज लिया है जो प्रोटिएज़ को डाइमराइज़ करवाने में एफेवाइरिनेज़ (Efavirenz) से कई गुना शक्तिशाली है। कंपनी इसका परीक्षण ऐसे लोगों पर कर रही है जिन्हें पहले कोई उपचार नहीं मिला है। 

दूसरी ओर, कोलंबिया विश्वविद्यालय के डेविड हो एक दोतरफा रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसमें TACK को एक अन्य तरीके के साथ जोड़ गया है। यह दूसरा तरीका है सुप्तावस्था पलट एजेंट (Latency reversal agents LRA) पर आधारित। ये ऐसे एजेंट होते हैं जो वायरस की सुप्तावस्था (latency) को समाप्त करके उन्हें अपनी प्रतिलिपियां बनाने को उकसाते हैं। इसके पीछे विचार यह है कि जिन कोशिकाओं में वायरस तेज़ी से प्रतिलिपियां बनाएंगे, उन्हें प्रतिरक्षा तंत्र नष्ट कर देगा या वे स्वयं ही फट जाएगी। लेकिन अब तक इस तरह से वायरस का जखीरा कम करने में सफलता सीमित रही है।

हो की प्रयोगशाला में बेहतर LRA बनाने पर काम चल रहा है। वहां सुप्त संक्रमित कोशिकाओं के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जो ऐसे कोशिकीय संकेतों को शुरू करवा दें जो वायरस को अपनी प्रतिलिपि बनाने को उकसाएं। लेकिन प्रयोगशाला में एच.आई.वी. संक्रमित लोगों से ली गई कोशिकाओं में अकेली एंटीबॉडी कारगर नहीं रही। ये कोशिकाएं ऐसे व्यक्तियों की थीं जो उपचार ले रहे थे और वायरस को पूरी तरह नियंत्रित कर रहे थे। लेकिन हो ने बताया है कि जब उन्होंने साथ में TACK औषधि मिला दी तो वायरल आरएनए (Viral RNA) की मात्रा तेज़ी से कम हुई।

हो का कहना है कि एच.आई.वी. संक्रमण की स्थिति पर असर डालने के लिए LRA और टैक का उपयोग शायद ज़रूरी न हो।

रिट्रोवायरस (Retrovirus) और अन्य मौकापरस्त संक्रमणों पर एक सम्मेलन में वॉशिंग्टन विश्वविद्यालय मेडिसिन की प्रिया लाल ने बताया कि उनकी टीम ने सात ऐसे एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्तियों को शामिल किया जो विभिन्न वायरस रोधी दवाइयों और एफेवाइरिनेज़ की मदद से वायरस पर काबू किए हुए थे। सुप्त रूप से संक्रमित कोशिकाओं के प्रति संवेदी तकनीकों की मदद से पता चला कि 4 महीने के उपरांत 6 व्यक्तियों में सुप्त संक्रमित कोशिकाएं 20 से 50 प्रतिशत तक कम हो गई थीं। शोधकर्ताओं ने स्वीकार किया है कि इतनी गिरावट किसी व्यक्ति को रोगमुक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है लेकिन यह इस विचार का प्रमाण है कि प्रोटिएज़ को सक्रिय करने वाले शक्तिशाली कारकों का विकास करना उपयोगी होगा। कई औषधि निर्माताओं ने इस दिशा में काम करना शुरू भी कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)

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सौर तूफानों पर नज़र रखेगा SMILE मिशन

यूरोप और चीन एक संयुक्त मिशन शुरू कर रहे हैं, जिसका उद्देश्य पृथ्वी की चुंबकीय ढाल (Magnetic field) को बेहतर तरीके से समझना है। स्माइल (SMILE) नामक अंतरिक्ष यान (spacecraft) यह अध्ययन करेगा कि सूर्य से आने वाले खतरनाक विकिरण (solar radiation) से पृथ्वी की ,सुरक्षा कैसे होती है। उम्मीद है कि इससे उपग्रहों, संचार व्यवस्था, जीपीएस और बिजली नेटवर्क का बेहतर संचालन संभव हो सकेगा।

पृथ्वी के चारों ओर एक चुंबकीय क्षेत्र (मैग्नेटोस्फीयर) है। यह सूर्य से आने वाले अधिकांश आवेशित कणों को रोक देता है। लेकिन जब सूर्य पर बड़े विस्फोट – जैसे सौर तूफान – होते हैं, तो यह सुरक्षा ढाल प्रभावित हो सकती है और उपग्रहों, जीपीएस (GPS), रेडियो संचार (Radio communication) और बिजली व्यवस्था (Electricity) में गड़बड़ी पैदा हो सकती है।

वैज्ञानिक कई दशकों से अंतरिक्ष यानों की मदद से मैग्नेटोस्फीयर (Magnetosphere) का अध्ययन कर रहे हैं, लेकिन अब तक वे सिर्फ छोटे-छोटे हिस्सों को ही देख पाते थे। SMILE मिशन सूर्य और पृथ्वी के बीच होने वाली पूरी प्रक्रिया की बड़ी तस्वीर दिखाएगा।

यह अंतरिक्ष यान एक दीर्घवृत्ताकार कक्षा में घूमेगा और पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव से लगभग 1,21,000 किलोमीटर दूर तक जाएगा। वहां से इसका एक्स-रे कैमरा मैग्नेटोस्फीयर के उस हिस्से को देखेगा, जो सूर्य की तरफ होता है। सूर्य से आने वाले कण पृथ्वी के ऊपरी वायुमंडल से टकराकर एक्स-रे (X-Ray) उत्सर्जित करते हैं। इस उत्सर्जन के अवलोकन की मदद से समझा जा सकेगा कि पृथ्वी की चुंबकीय ढाल का आकार कैसे बदल रहा है।

उम्मीद है कि इस मिशन से सौर तूफानों की बेहतर समझ और अंतरिक्ष मौसम (space weather) की ज़्यादा सटीक भविष्यवाणी करने में मदद मिलेगी। यह जानकारी उपग्रह (satellite), संचार नेटवर्क और बिजली व्यवस्था जैसी तकनीकी प्रणालियों को सौर तूफानों से होने वाले नुकसान से बचाने में मददगार होगी।

यह मिशन ध्रुवीय ज्योति (ऑरोरा) (aurora) का भी अध्ययन करेगा। ये तब बनती हैं जब सूर्य से आने वाले आवेशित कण मैग्नेटोस्फीयर के ज़रिए ऊपरी वायुमंडल तक पहुंचकर गैस अणुओं (Gseous Atoms) से टकराकर रोशनी पैदा करते हैं। अधिकांश रोशनी अल्ट्रावायलेट (Ultraviolet) होती है, जिसे इंसानी आंखें नहीं देख सकतीं। SMILE का खास कैमरा इन अदृश्य गतिविधियों को देखकर यह समझने में मदद करेगा कि सौर कण पृथ्वी के वायुमंडल (atmosphere) में कैसे प्रवेश करते हैं।

वैज्ञानिकों का कहना है कि इन दोनों तरह की जानकारी को साथ मिलाकर यह बेहतर समझा जा सकेगा कि सूर्य की ऊर्जा पृथ्वी के चुंबकीय वातावरण में कैसे यात्रा करती है। इससे अंतरिक्ष मौसम से जुड़े कई सवालों के जवाब मिलने के अलावा, पृथ्वी की चुंबकीय सुरक्षा प्रणाली को बेहतर समझने में और तकनीक पर निर्भर दुनिया को सौर तूफानों (solar storms) के खतरों से बचाव को बेहतर बनाने में  भी मदद मिलेगी।

एक और खास बात है कि यह मिशन युरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी और चायनीज़ एकेडमी ऑफ साइन्सेज़ का पहला संयुक्त मिशन है। वैज्ञानिकों का मानना है कि इससे भविष्य में अंतरिक्ष अनुसंधान में देशों के बीच सहयोग और मज़बूत हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

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क्या खून के थक्के कृत्रिम तरीके से जम सकते हैं?

म तौर पर जब त्वचा कटने पर खून बहना शुरू हो जाता है तो सामान्यत: कुछ देर बाद बहाव बंद हो जाता है और चोट की जगह पर खून का थक्का जम जाता है। इसमें चोट के स्थान पर तो खून का बहाव रुक जाता है, जबकि दूसरे अंगों में रक्त संचार अपनी गति से होता रहता है। चिकित्सा विज्ञान में इसे हीमोस्टेसिस कहते हैं। रक्तस्राव रोकने की यह प्रक्रिया तीन चरणों में होती है। सबसे पहले रक्त वाहिनियां सिकुड़ती हैं – यानी चोट के स्थान की रक्तवाहिनी सिकुड़ती है ताकि बहाव कम किया जा सके। इसके बाद प्लेटलेट्स चिपककर गुच्छा बना लेती हैं। प्लेटलेट्स रक्त की कोशिकाएं हैं जिनका मुख्य कार्य क्षतिग्रस्त रक्त नलिकाओं की मरम्मत करना है। इनके चिपककर गुच्छा बनाने से दीवार जैसी अस्थाई संरचना बन जाती है। अंत में, ‘फाइब्रिन जाल’ बनता है। प्लेटलेट्स के गुच्छे पर रेशेदार प्रोटीन फाइब्रिन एक जाली बना देता है। ये जालियां ही खून के थक्के को मज़बूत बनाकर रक्तस्राव बंद कर देती हैं।

हाल ही में नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार वैज्ञानिकों ने हीमोस्टेसिस को ज़्यादा प्रभावी बनाने का प्रयास किया है। उन्होंने ‘क्लिक केमिस्ट्री’ तकनीक का इस्तेमाल करके चूहों पर प्रयोग किए। दावा है कि रक्तस्राव रोकने की यह तकनीक जिसे ‘क्लिक क्लॉटिंग’ नाम दिया गया है, लाल रक्त कोशिकाओं को आपस में जोड़कर रक्त के थक्के कम समय में बना देती है। परीक्षण के दौरान, चूहों का रक्तस्राव प्राकृतिक प्रक्रिया के मुकाबले ज़्यादा तेजी से रुक गया। हालांकि प्राकृतिक रूप से यह कार्य प्लेटलेट्स कोशिकाओं का है, लेकिन उसमें थक्का बनने की क्रिया धीमी, कमज़ोर और अस्थायी होती है, और आपातकालीन स्थिति या गहरी चोट के दौरान व्यर्थ खून बहना जानलेवा साबित होता है।

पूर्व में, वैज्ञानिकों का ध्यान प्लेटलेट आधारित तकनीक पर था। लेकिन इस परीक्षण से वैज्ञानिकों को लगता है कि लाल रक्त कोशिकाओं को संशोधित कर सुरक्षित और बेहतर हीमोस्टेसिस किया जा सकता है। इसका मुख्य कारण यह है कि लाल रक्त कोशिकाएं अधिक लचीली और टिकाऊ होती हैं। इसलिए वैज्ञानिकों ने प्रभावी हीमोस्टेसिस के लिए लाल रक्त कोशिकाओं को बेहतर विकल्प माना।

क्या हैक्लिक केमिस्ट्री’?

दरअसल, ‘क्लिक केमिस्ट्री’ रासायनिक अभिक्रियाओं का समूह है जिसमें दो या अधिक अणु आपस में तुरंत और सटीक तरीके से जुड़ जाते हैं। यह बहुत तेज़, सरल और सुरक्षित है। इसमें कोशिकाओं में कुछ खास कार्यात्मक समूहों को डाले जाते हैं, जिससे वे समूह कार्य के अनुरूप, लक्ष्य अनुसार भूमिका निभाते हैं व दूसरे अणुओं या क्रियाओं से हस्तक्षेप नहीं करते। यह शरीर की सामान्य क्रियाओं में कोई बाधा नहीं डालती।

भविष्य में इस शोध के सफल होने से चिकित्सा में बदलाव देखने को मिल सकते हैं। खून का बहाव चुटकियों में रोक सकेंगे। दुर्घटनाओं, युद्ध क्षेत्र, और लंबी सर्जरी के दौरान होने वाले गंभीर रक्तस्राव, जो जीवन और मृत्यु का फैसला करता है, का नियंत्रण हो पाएगा। (स्रोत फीचर्स)

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पानी की जांच से जैव विविधता के सुराग

न्यूयॉर्क के बीच बहने वाली ईस्ट रिवर के बाल्टी भर पानी ने रॉकफेलर विश्वविद्यालय के मार्क स्टोकेल को न्यूयॉर्क शहर के जीवन के बारे में हैरान करने वाली जानकारी दी है। नदी के पानी में मौजूद डीएनए के छोटे-छोटे खंडों का अध्ययन करके उन्होंने उसमें पाई जाने मछलियों, शहर के जीवों, लोगों की सेहत और उनके खानपान की आदतों तक के बारे में संकेत पाए। अध्ययन दिखाता है कि पर्यावरणीय डीएनए (eDNA) पर्यावरण को समझने का एक तेज़ और सस्ता तरीका बनता जा रहा है।

यह शोध प्लॉस वन में प्रकाशित हुआ है। स्टोकेल और साथियों ने एक साल तक हर हफ्ते ईस्ट रिवर से पानी के नमूने लिए। फिर उन्होंने उस पानी में मौजूद डीएनए के छोटे-छोटे खंडों की जांच की, जो जीवों की त्वचा, बाल, गंदगी या दूसरे जैविक पदार्थों के ज़रिए पानी में पहुंचे थे।

अध्ययन में पता चला कि शहर के बीच बहने वाली यह नदी जीवों से भरपूर और लगातार बदलने वाला पारिस्थितिकी तंत्र है। वैज्ञानिकों ने इसमें 71 मछली प्रजातियां पहचानीं, जिनमें कुछ ऐसी भी थीं जो पहले इस इलाके में बहुत कम दिखाई देती थीं, और अब अच्छी संख्या में दिखाई दे रही हैं। अध्ययन यह दिखाता है कि ईस्ट रिवर अब पहले की तुलना में काफी साफ हो चुकी है।

गौरतलब है कि पर्यावरणीय डीएनए तकनीक पानी, मिट्टी या हवा में मौजूद जीवों के छोड़े गए छोटे-छोटे डीएनए खंडों के विश्लेषण पर आधारित है। सभी जीव लगातार अपनी कोशिकाएं और गंदगी छोड़ते रहते हैं, इसलिए उनका डीएनए कुछ दिनों तक वातावरण में बना रह सकता है।

पारंपरिक तरीकों में नाव, जाल, ट्रैप या गोताखोरों की ज़रूरत पड़ती है, लेकिन eDNA तकनीक बहुत कम उपकरण और खर्च में बड़ी मात्रा में जानकारी दे सकती है। यह ऐसी मुश्किल जगहों में उपयोगी है, जहां तेज़ धाराएं और चट्टानी इलाका सामान्य जांच को कठिन बना देते हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, पूरे एक साल के इस अध्ययन का खर्च किसी रिसर्च बोट को सिर्फ एक दिन चलाने जितना था।

वैज्ञानिकों को नदी के पानी में सिर्फ मछलियों के ही नहीं, बल्कि ज़मीन पर रहने वाले जीवों के डीएनए भी मिले। वैज्ञानिकों को गिलहरी, रैकून, बीवर, गाय, सूअर, मुर्गियों और चूहों के डीएनए के संकेत मिले, जो शायद गंदे पानी और बारिश के बहाव के ज़रिए नदी तक पहुंचे थे। खासकर चूहों का डीएनए महत्वपूर्ण माना जा रहा है, क्योंकि इससे भविष्य में शहरों में चूहों की बढ़ती संख्या का जल्दी पता लगाया जा सकता है। दिलचस्प बात यह रही कि पानी में मिले जीवों के डीएनए का अनुपात लोगों के मांस खाने के आंकड़ों से काफी मेल खाता था। इससे संकेत मिलता है कि eDNA तकनीक भविष्य में लोगों की खानपान की आदतों और स्वास्थ्य के रुझानों को समझने में मदद कर सकती है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि पहली बार गंदे पानी से मिले eDNA का इस्तेमाल लोगों की खानपान की आदतों को इतने विस्तार से समझने के लिए किया गया है।

विशेषज्ञ eDNA को पर्यावरण और वन्यजीवों की निगरानी के लिए एक बहुत उपयोगी नई तकनीक मानते हैं। यह जीवों की सही-सही संख्या तो नहीं बता सकती, लेकिन यह ज़रूर दिखा सकती है कि कोई प्रजाति समय के साथ बढ़ रही है या घट रही है। इससे पर्यावरण में हो रहे बदलावों और बाहरी प्रजातियों के फैलाव का जल्दी पता लगाया जा सकता है।

यह तकनीक अब दुनिया के कई हिस्सों में इस्तेमाल हो रही है। कनाडा में दुर्लभ वनबिलावों (लिंक्स) का पता लगाने से लेकर माउंट एवरेस्ट के आसपास पिघले बर्फ के पोखरों में तितलियों की प्रजातियों की पहचान तक, eDNA कई जगहों पर मदद कर रहा है।

हालांकि वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि eDNA पारंपरिक पर्यावरणीय जांच तरीकों की पूरी जगह नहीं ले सकती। लेकिन यह एक पूरक के तौर पर उन्हें और मज़बूत बना सकती है। हवा-पानी के नमूनों से पर्यावरण की विस्तृत जानकारी निकालकर यह तकनीक शहरों और प्रकृति की अदृश्य दुनिया को समझने का नया रास्ता खोल रही है, और यह जानने में मदद कर रही है कि प्राकृतिक दुनिया कैसे बदल रही है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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धान वगैरह को हर साल रोपने से मुक्ति का रास्ता

ह कल्पना करना थोड़ा मुश्किल है कि हमारे पास अनाज (Grains) की ऐसी फसलें होंगी जिन्हें हर साल नए सिरे से बोने की ज़रूरत नहीं होगी; एक बार बो दिया और साल-दर-साल दाने लेते रहिए। फिलहाल तो धान, गेहूं, तुअर जैसी फसलों को हर साल बोना ही पड़ता है। क्या ऊपर की कल्पना साकार हो सकती है?

इस सिलसिले में चीन के वैज्ञानिकों ने 2018 में धान की एक ऐसी किस्म (PR23) प्रस्तुत की थी जिससे कई सालों तक उपज ली जा सकती थी। अलबत्ता, इसे बनाने में कई दशकों तक पारंपरिक ब्रीडिंग का सहारा लेना पड़ा था। इसके लिए शोधकर्ताओं ने धान की एक फसली किस्म का संकरण एक वन्य किस्म से किया था।

अब शोधकर्ताओं ने दर्शाया है कि यही काम द्रुत गति से किया जा सकता है यदि किसी उपयुक्त वन्य किस्म से जीन्स (Genes) चोरी कर लिए जाएं। फिर तो अलग-अलग इलाकों के लिए बहुवर्षी धान (Parennial Paddy) तैयार किए जा सकेंगे।

इस संदर्भ में हाल ही में साइन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र में वैज्ञानिकों की एक टीम ने बताया है कि जंगली धान (Wild Rice) (ओराइज़ा रुफिपोगोनOryza rufipogon) साल-दर-साल फूलता-फलता है और उन्होंने इसके लिए ज़िम्मेदार जीन्स भी खोज निकाले हैं। उन्होंने आम तौर पर फसल के रूप में उगाए जाने धान (ओराइज़ा सटाइवा- Oryza sativa) में ये जीन्स जोड़ने में भी सफलता प्राप्त कर ली है। इन जीन्स ने ओराइज़ा सटाइवा को बहुवर्षी गुण प्रदान कर दिए; यानी यह एक बार पुष्पन (Flowering) के बाद मरता नहीं बल्कि पुष्पन को रोककर फिर से सामान्य वृद्धि (वर्धी विकास) शुरू कर देता है। यह प्रगति तो ज़बर्दस्त है लेकिन एक दिक्कत बाकी है। जो नई वृद्धि शुरू होती है उसमें लगने वाले फूलों में दाने पैदा नहीं होते।

दरअसल, अनाजों को बहुवर्षी पौधों में तबदील करना सहस्राब्दियों में चुन-चुनकर किए गए प्रजनन को वापिस पलटने जैसा होगा। एकवर्षी पौधे (Annual Plants) ज़मीन के ऊपर तेज़ी से वृद्धि (Growth) करते हैं और वहुवर्षी पौधों की तुलना में कहीं अधिक दाने पैदा करते हैं क्योंकि वहुवर्षी पौधे अपने काफी सारे संसाधन जड़ों के विकास में निवेश करते हैं। जब इन पौधों के पालतू बनाया गया था, तब पुराने ज़माने के लोगों ने एकवर्षी पौधों को शायद उनकी अधिक दाना उत्पादन क्षमता के कारण ही चुना था।

नए अध्ययन में चाइनीज़ एकेडमी ऑफ साइन्स के सेंटर फॉर एक्सेलेंस इन मॉलीक्यूलर प्लांट साइन्सेस के बिन हान और जिया-वाई वांग ने उन जीन्स की तलाश की जो धान में वहुवर्षिता का नियमन करते हैं। इस तलाश में सबसे पहले तो वे ओ. रुफिपोगोन पर गए। उन्होंने अनुसंधान के दौरान विकसित एक किस्म का प्रजनन एक आम तौर पर अध्ययन की जाने वाली किस्म से करवाया ताकि ऐसी ढेर सारी संतानें पैदा कर सकें जिनमें से प्रत्येक में वन्य किस्म के डीएनए (DNA) का अलग-अलग छोटा-छोटा खंड हो। बड़े होने के बाद उन्होंने एक पौधा चुना जिसमें यह गुण था कि वह पुष्पन को रोककर वर्धी विकास जारी रख सके। इसे उन्होंने नाम दिया G43।

सारे धान के पौधों, चाहे वे कृष्य वार्षिक किस्म के हों, में एक मुख्तसर द्वितीय जीवन होता है। वार्षिक धान के पौधे से जब दानों की उपज प्राप्त कर ली जाती है, उसके बाद वे एक दूसरा शाखित तना पनपाते हैं, जिन्हें टिलर (Tiller)कहते हैं। इनसे भी एक कमतर उपज पैदा होती है जिसे रैटून राइस (Ratoon Rice) कहते हैं। इसे प्रक्रिया को रैटूनिंग (Ratooning) कहते हैं।

बहुवर्षी धान

बहरहाल, हान और वांग ने जो G43 धान विकसित किया था वह ऐसे टिलर्स पैदा करने में काफी उदार था – जहां एकवर्षी धान में 10-12 टिलर बनते हैं, वहीं G43 में 70 ऐसे द्वितीयक टिलर्स (Secondary Tillers) बने।

अब शोधकर्ताओं ने इसके लिए ज़िम्मेदार जीन्स का स्थान निश्चित किया – ये गुणसूत्र-1 पर पाए गए और शोधकर्ताओं ने इन्हें नाम दिया ‘एंडलेस ब्रांचेज़ एंड टिलर्स’ (EBT1)। इसके बाद उन्होंने दो विशिष्ट जीन्स की पहचान की – MIR156B और MIR156C। ये दोनों ही माइक्रो-आरएनए (Micro-RNA) का निर्माण करते हैं और ये माइक्रो-आरएनए विशिष्ट संदेशवाहक आरएनए (mRNA) से जुड़ जाते हैं। जुड़ने के बाद ये कुछ अन्य जीन्स की गतिविधि को ठप्प कर देते हैं जो युवा पौधे को परिपक्वता की ओर ले जाएंगे।

इसी प्रकार के MIR156 जीन्स घास की अन्य प्रजातियों में भी पाए जाते हैं। गौरतलब है कि गेहूं, धान आदि भी घास कुल में ही आते हैं। आम तौर पर इनकी अभिव्यक्ति फूल आने के बाद थम जाती है जिसके चलते वृद्धि रुक जाती है। लेकिन G43 में इनका व्यवहार अलग रहा। इनकी भी अभिव्यक्ति फूल आने के बाद कम हुई लेकिन फिर से बढ़ गई और टिलर्स का वर्धी विकास फिर चल निकला। शोधकर्ताओं का ख्याल है कि यदि अन्य बहुवर्षी अनाजों में ऐसी ही क्रियाविधि हुई तो अचरज नहीं होना चाहिए। उदाहरण के लिए 1920 के दशक में मक्का की एक उत्परिवर्तित किस्म (Mutated Species) खोजी गई थी जो लगातार एक झाड़ीनुमा ढंग से बढ़ती है। Corngrass1 नामक इस उत्परिवर्ती में MIR156 जीन पाया जाता है और शायद इसका व्यवहार बहुवर्षी धान के समान ही होगा।

G43 किसी भी वार्षिक पौधे की तरह ही बढ़ता है – एक दम सीधा खड़ा। यह ज़मीन पर फैलकर नहीं बढ़ता, जिस गुण की वजह से . रुफिपोगोन के द्वितीयक टिलर्स जड़ें उगाकर नए पौधे बन जाते हैं। पौधे की बनावट को बदलने के लिए हान और वांग की टीम ने . रुफिपोगोन के दो जीन्स (PROG1 और TIG1) G43 में जोड़ दिए थे। इस तरह जो पौधा विकसित हुआ वह ज़मीन पर आड़ा विकसित हुआ। यह एक आशाजनक संकेत है।

लेकिन अभी एक बड़ी बाधा सामने है। हालांकि ये द्वितीयक टिलर्स काफी अच्छे से बढ़े लेकिन उनसे बने पौधों पर वंध्या फूल आए और दाने नहीं बने। यह समस्या तब भी आई जब . रुफिपोगोन का समूचा EBT1 खंड एक वार्षिक किस्म में रोपा गया।

ज़ाहिर है, इस काम को अंजाम देने के लिए अन्य जीन्स की ज़रूरत है। हान और वांग इन जीन्स की तलाश में हैं ताकि द्वितीयक टिलर्स भी उपजाऊ फूल पैदा कर सकें। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://eng.ruralvoice.in/national/paddy-planting-leads-overall-2023-kharif-crops-sowing-in-india.html

https://www.science.org/content/article/rice-needs-be-replanted-every-year-genetic-tinkering-could-make-it-more-apples

कॉफी का दिमाग और मूड पर सकारात्मक प्रभाव

हाल ही प्रकाशित एक अध्ययन के मुताबिक, कॉफी (Coffee) पीने से बात सिर्फ ऊर्जा बढ़ाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह मूड को बेहतर करने, चिंता कम करने और मस्तिष्क के काम करने के तरीके पर भी असर डाल सकती है। एपीसी माइक्रोबायोम आयरलैंड के शोधकर्ताओं के अनुसार कैफीन-युक्त और कैफीन-मुक्त, दोनों तरह की कॉफी पेट के सूक्ष्मजीव-संसार को बदलकर मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बना सकती हैं।

नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित इस शोध में पेट-और मस्तिक (गट–ब्रेन) सम्बंध पर ध्यान दिया गया है। हालांकि कॉफी के फायदे पहले भी बताए जाते रहे हैं, लेकिन यह अध्ययन खास तौर पर दिखाता है कि कॉफी इस सम्बंध को कैसे सीधे प्रभावित करती है।

इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों ने 62 लोगों पर अध्ययन किया। इनमें से आधे लोग रोज़ 3–5 कप कॉफी पीते थे और बाकी कॉफी नहीं पीते थे। जब कॉफी पीने वालों ने दो हफ्ते तक कॉफी बंद की, तो उनके पेट के बैक्टीरिया में बदलाव दिखा। लेकिन जब दोनों समूहों ने कॉफी पीना शुरू किया, तो दोनों समूहों ने बेहतर मूड, कम तनाव (less stress) और कम अवसाद महसूस किया।

यह भी पता चला कि कॉफी पीने से पेट में पाचन और सेहत के लिए फायदेमंद बैक्टीरिया बढ़ते हैं। यही बदलाव मानसिक स्थिति (Mental Condition) को बेहतर बनाने में मदद करते हैं। दिलचस्प बात यह है कि कॉफी का प्रकार भी मायने रखता है – कैफीन-मुक्त कॉफी से याददाश्त और सीखने की क्षमता बेहतर हुई, जिससे पता चलता है कि सिर्फ कैफीन ही नहीं, बल्कि कॉफी में मौजूद अन्य तत्व भी दिमाग के लिए फायदेमंद हैं।

कैफीन-युक्त कॉफी के कुछ अलग फायदे भी देखे गए। इसे पीने वाले लोगों में चिंता कम हुई, सतर्कता बढ़ी (more Attentive) और ध्यान बेहतर हुआ। साथ ही, यह शरीर में सूजन के खतरे को भी कम कर सकती है, जो जीर्ण बीमारियों से जुड़ी होती है।

यह नतीजे पहले के शोधों की भी पुष्टि करते हैं, जिनमें बताया गया था कि संतुलित मात्रा में कॉफी पीने से टाइप 2 डायबिटीज़, दिल की बीमारी और दिमाग से जुड़ी कुछ समस्याओं का खतरा कम हो सकता है। लेकिन यह नया अध्ययन खास तौर पर यह दिखाता है कि कॉफी तुरंत असर डालते हुए मूड और मानसिक स्पष्टता को भी बेहतर बना सकती है, और इसका सम्बंध पेट की सेहत से है।

वैज्ञानिकों का कहना है कि कॉफी को सिर्फ जागने या ऊर्जा बढ़ाने वाला पेय नहीं समझना चाहिए, बल्कि यह शरीर के कई हिस्सों पर असर डालने वाला एक जटिल खाद्य तत्व है। यह पेट के अच्छे बैक्टीरिया (Good Bacteria) और उनके काम करने के तरीके को बदलकर शारीरिक और मानसिक सेहत दोनों को बेहतर बनाने में मदद कर सकती है।

यह सही है कि इसके लंबे समय के असर को समझने के लिए अभी और शोध की ज़रूरत है, लेकिन अब तक के नतीजे बताते हैं कि सीमित मात्रा में कॉफी पीना – चाहे उसमें कैफीन (Caffeine) हो या न हो – मूड सुधारने और रोज़मर्रा के तनाव को कम करने में मददगार हो सकता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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हू-ब-हू एक जैसे जुड़वां के बीच पहचान का संकट

पिछले दिनों फ्रांस की एक अदालत में एक अजीबो-गरीब मामला उठा। पढ़ने में अत्यंत फिल्मी लगने वाला यह मामला जब यथार्थ में सामने आया तो खलबली मचना स्वाभाविक था।

हुआ यह कि हत्या के एक मामले में दो में से एक जुड़वा लिप्त था। बंदूक पर से डीएनए प्राप्त हुआ था। डीएनए वह आनुवंशिक पदार्थ होता है जिसकी मदद से सम्बंधित व्यक्ति की पहचान की जा सकती है। किया यह जाता है कि उस डीएनए के कुछ खंडों में क्षार का अनुक्रम पता किया जाता है। इस विधि में डीएनए के 30 विशिष्ट खंडों का क्षार अनुक्रम निकाला जाता है। ऐसा देखा गया है कि इन्हीं 30 खंडों में सबसे अधिक विविधताएं पाई जाती हैं – यानी इन हिस्सों में व्यक्ति-व्यक्ति में सबसे अधिक अंतर देखे जाते हैं और इनके आधार पर तुलना करके व्यक्ति की पहचान की जा सकती है।

लेकिन जब मामला हू-ब-हू एक जैसे या आइडेंटिकल जुड़वां का हो तो बात बदल जाती है। आइडेंटिकल जुड़वा एक ही अंडाणु के, एक ही शुक्राणु से निषेचन से बने भ्रूण के दो भागों में बंटकर अलग-अलग विकसित होने से बनते हैं। यानी इन दोनों में डीएनए एक समान होता है। तो डीएनए के 30 छोटे-छोटे खंडों की तुलना से व्यक्ति विशेष की पहचान करना मुश्किल हो जाता है। तो क्या किया जाए?

इस संदर्भ में डीएनए के चंद खंडों की बजाय पूरे-के-पूरे डीएनए (यानी समूचे जीनोम) का विश्लेषण मददगार हो सकता है। इस तरीके में वैज्ञानिक यह पता कर सकते हैं कि निषेचित अंडे के विभाजन के बाद डीएनए में किस तरह के उत्परिवर्तन हुए हैं। 2014 में किए गए एक अध्ययन में दो वयस्क जुड़वा के डीएनए में मात्र 5 जेनेटिक अंतर देखे जा सके थे। समूचे जीनोम के विश्लेषण से कुछ मामलों में अदालतों को जुड़वा के बीच भेद करने में मदद ज़रूर मिली है लेकिन इस तरह के विश्लेषण के लिए ज़रूरी होता है कि पर्याप्त मात्रा में डीएनए मिल जाए, जो मिलना काफी मुश्किल होता है।

इस सिलसिले में कुछ शोधकर्ताओं ने माइटोकॉण्ड्रिया में पाए जाने वाले डीएनए की मदद ली है। गौरतलब है कि माइटोकॉण्ड्रिया कोशिकाओं में पाया जाने वाला एक ऐसा उपांग है जिसके पास अपना डीएनए होता है और यह केंद्रक में पाए जाने वाले डीएनए से स्वतंत्र होता है। माइटोकॉण्ड्रिया के डीएनए (mtDNA) में अपेक्षाकृत तेज़ी से परिवर्तन होते हैं। अर्थात जुड़वा संतानें mtDNA के मामले में ज़्यादा अंतर दर्शाती हैं। यूएस की अदालतें आजकल mtDNA के प्रमाणों को स्वीकारने लगी हैं।

इस संदर्भ में डीएनए विश्लेषण की एक और तकनीक पर शोध जारी है। यह देखा गया है कि उम्र के साथ कोशिकाओं के केंद्रक में डीएनए पर अलग-अलग स्थानों पर मिथाइल समूह चस्पा होने लगते हैं। यानी स्वयं डीएनए में तो कोई परिवर्तन नहीं होता लेकिन मिथाइल समूह चस्पा होने के कारण जीन्स की अभिव्यक्ति बदलने लगती है। इन परिवर्तनों को एपिजेनेटिक परिवर्तन कहते हैं और ये व्यक्ति के खानपान, धूम्रपान या शराब सेवन जैसे व्यवहारों के कारण अलग-अलग हो सकते हैं; जुड़वा के बीच भी अंतर आ जाते हैं। इनके आधार पर उन्हें अलग-अलग पहचाना जा सकता है। जैसे दक्षिण कोरिया में वैज्ञानिकों ने 54 नवजात आइडेंटिकल जुड़वा के जीनोम्स का विश्लेषण किया था। एपिजेनेटिक अंतरों के आधार पर वे 54 जुड़वाओं में से 50 के बीच भेद कर पाए थे। यही प्रयोग जब वयस्क जुड़वाओं पर किया गया तो 47 में से 41 जोड़ियों तथा 118 में से 105 जोड़ियों के जुड़वाओं की अलग-अलग पहचाने हो पाई थी।

फ्रांस की अदालत में तो मुकदमा जारी है लेकिन वैज्ञानिक अपने तईं कोशिशों में इस गुत्थी को सुलझाने का प्रयास कर रहे हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
Photo Credit : https://raisingchildren.net.au/pregnancy/health-wellbeing/twin-pregnancy/twins