चंद्रमा पर फसल उगाने (Moon farming) का विचार, जो पहले सिर्फ विज्ञान-कथाओं का विषय था, अब धीरे-धीरे सच के करीब आ रहा है। एक नए अध्ययन में पाया गया है कि आलू, जो बहुत आसानी से अलग-अलग परिस्थितियों में उग सकता है, चंद्रमा पर भी उग सकता है लेकिन इसके लिए पृथ्वी से कुछ मदद ज़रूरी होगी। इससे यह विश्वास पैदा होता है कि भविष्य में अंतरिक्ष यात्री (space missions food) लंबे मिशनों के दौरान अपना भोजन खुद उगा सकेंगे।
वैज्ञानिकों ने चंद्रमा की मिट्टी जैसी मिट्टी बनाई, जिसे रेगोलिथ (lunar regolith) कहा जाता है। असली चंद्रमा की मिट्टी में पौधों के लिए ज़रूरी पोषक तत्व (soil nutrients) नहीं होते, इसलिए उसमें खेती करना बहुत कठिन है। इस समस्या को हल करने के लिए वैज्ञानिकों ने इसमें थोड़ी मात्रा में वर्मी कम्पोस्ट (केंचुए द्वारा बनाई खाद) मिलाई। उन्होंने पाया कि रेगोलिथ में सिर्फ 5 प्रतिशत खाद मिलाने से चंद्रमा सरीखे चुनौतीपूर्ण वातावरण में भी आलू उगने लगे।
इस प्रयोग में पाया गया कि आलू के पौधे लगभग दो महीने तक जीवित रह सकते हैं और उनमें कंद (खाने वाला हिस्सा) भी विकसित हो सकता है। यह अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के लिए अच्छी खबर है, खासकर तब जब नासा जैसी एजेंसियां चंद्रमा (NASA moon base) पर स्थायी ठिकानों की योजना बना रही हैं। आलू को अंतरिक्ष खेती के लिए उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि यह पोषण से भरपूर है और विभिन्न परिस्थितियों में आसानी से उगता है।
अलबत्ता, अध्ययन (research findings) में कुछ सीमाएं भी सामने आई हैं। चंद्रमा जैसी मिट्टी में उगाए गए आलुओं के डीएनए विश्लेषण से पता चला कि उनमें तनाव सम्बंधी जीन्स सक्रिय हुए थे। साथ ही इनमें तांबा और ज़िंक (heavy metals toxicity) जैसी धातुओं की मात्रा ज़्यादा पाई गई, जो मनुष्यों के लिए नुकसानदायक हो सकती हैं। हालांकि, इन आलुओं का पोषण स्तर (nutritional value) पृथ्वी पर उगाए गए आलुओं के बराबर ही रहा, जो शोधकर्ताओं के लिए हैरानी की बात थी।
साथ ही, वैज्ञानिकों (space environment challenges) का कहना है कि यह प्रयोग चंद्रमा की असल कठिन परिस्थितियों को पूरी तरह नहीं दर्शाता। प्रयोग में तीव्र विकिरण, तापमान में अत्यधिक उतार-चढ़ाव (extreme temperature) और वायुमंडल की लगभग अनुपस्थिति जैसी चीजें शामिल नहीं थीं। असल स्थितियों में खेती और मुश्किल होगी। फिर भी, यह शोध अंतरिक्ष में टिकाऊ जीवन (sustainable space living) की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। आगे के प्रयोगों में अलग-अलग किस्म के आलुओं को परखा जाएगा, ताकि यह पता चल सके कि कौन-सी किस्म चंद्रमा की परिस्थितियों में बेहतर उग सकती है। वैज्ञानिक यह भी उम्मीद कर रहे हैं कि भविष्य में पौधों में ऐसे बदलाव (genetic modification crops) किए जा सकेंगे, जिससे वे अंतरिक्ष में ज़्यादा अच्छी तरह जीवित रह सकें। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zf1h0ym/full/_20260317_on_mars_crops.jpg
यूं तो किसी भी जश्न (celebration culture) की जान होते हैं उससे जुड़े व्यंजन। लेकिन जश्न मनाने का एक चलन ‘पार्टी’ करने का भी है, जिसमें लोग शौकिया शराब पीते हैं। हज़ारों सालों से मद्यपान (drinking habit) की प्रवृत्ति मनुष्य ने दिखाई है और यदा-कदा त्यौहारों या जश्न में शराब पी जाती है। जैसे होली, शिवरात्रि में भांग तो घोटी जाती है लेकिन आजकल शराब की ओर भी काफी रुझान (alcohol trend) है। ऐसा ही एक सामूहिक जश्न अक्टूबरफेस्ट जर्मनी (Oktoberfest Germany) में मनाया जाता है, जिसमें लोग कई दिनों तक छककर शराब पीते हैं। लेकिन पीने की भी एक हद होती है, जिसके बाद पीने वाला कहता है अब बस। लेकिन ऐसा किसी को पता कब और कैसे चलता है कि बस अब बहुत पी ली है, अब और नहीं?
यही सवाल डेनमार्क (Denmark research) के वैज्ञानिकों का शोध विषय बना। उनके शोध नतीजे बताते हैं कि जो हार्मोन गर्भावस्था के दौरान मॉर्निंग सिकनेस (सुबह—सुबह मितली) जैसा एहसास कराता है वही हार्मोन ‘बहुत हो गया’ का संकेत भी देता है।
दरअसल, गर्भावस्था के शुरुआती दौर में मॉर्निंग सिकनेस (morning sickness) का अनुभव होता है; ऐसा देखा गया है कि यह गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में ग्रोथ डिफरेंशिएशन फैक्टर-15 (GDF15) नामक हार्मोन के तेज़ी से बढ़ने के कारण होता है। वैसे तो यह हार्मोन शरीर के सारे ऊतक लगातार थोड़ी मात्रा में बनाते हैं लेकिन गर्भावस्था में अपरा यानी गर्भनाल इसका निर्माण काफी मात्रा में करने लगती है।
एक मत है कि मॉर्निंग सिकनेस सुरक्षा की दृष्टि से होती है: यह इशारा होता है कि गर्भवती मां खराब भोजन न खाए वरना भ्रूण को नुकसान पहुंच सकता है। लेकिन GDF15 उन लोगों में भी मौजूद होता है जो गर्भवती नहीं हैं; लिहाज़ा, इसे भूख दबाने से भी जोड़ा गया है। दवा उद्योग इसे संभावित मोटापे-रोधी दवा के रूप में देख रहा है।
दरअसल युनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन (University of Copenhagen) के हार्मोन रोग विशेषज्ञ मैथ्यू गिलम पूर्व में एक अध्ययन में शामिल थे। उस अध्ययन में रॉकस्लाइड संगीत समारोह (music festival study) में जश्न मनाने वालों युवकों में विभिन्न हार्मोन्स के स्तरों की जांच की गई थी। जश्न में शामिल युवकों ने लगातार एक हफ्ते तक खूब ‘खाया-पीया’ था। अध्ययन में उनमें कई बदलाव दिखे थे; जिनमें से एक था GDF15 के स्तर में वृद्धि। इस अध्ययन ने गिलम को शराब के सेवन (alcohol effects) पर इस हार्मोन के प्रभाव के बारे में सोचने पर प्रेरित किया।
इस बारे में समझने के लिए गिलम और उनके साथियों (scientific study) ने कई अध्ययन किए। इस शृंखला में सबसे पहले उन्होंने एक बहुत छोटा अध्ययन किया। इसमें उन्होंने अक्टूबरफेस्ट में शामिल तीन लोगों के पार्टी से पहले और बाद के नमूने लिए। तीनों ने 3 दिन तक हर दिन लगभग 1 लीटर बीयर पी थी। विश्लेषण में इन लोगों में GDF15 का स्तर बढ़ा हुआ पाया गया। हालांकि, अध्ययन बहुत छोटा था और यह भी स्पष्ट नहीं था कि यह बदलाव शराब पीने की वजह से ही हुआ है या अन्य अस्त-व्यस्त दिनचर्या की वजह से।
इसके बाद उन्होंने 12 मेडिकल विद्यार्थियों पर परीक्षण (clinical trial) किया, जिन्होंने पांच मानक पेग (60X5 मि.ली.) पिए थे। इन लोगों में GDF15 का स्तर बिल्कुल नहीं बढ़ा था। इससे ऐसा लगता है कि शराब के प्रति इस हार्मोन की प्रतिक्रिया शायद लगातार लंबे समय तक शराब पीने (chronic alcohol use) के बाद होती है, न कि थोड़े समय के लिए ज़्यादा शराब पीने से।
इस विचार को जांचने के लिए शोधकर्ताओं (alcohol addiction study) ने उन लोगों में GDF15 के स्तर को मापा जिन्हें शराब की लत थी। जिन वयस्कों को यह लत नहीं थी, उनकी तुलना में ज़्यादा शराब पीने वाले लोगों में GDF15 का स्तर औसतन लगभग पांच गुना ज़्यादा दिखा।
फिर उन्होंने लोगों के जेनेटिक और जीवनशैली से जुड़े डैटा का विश्लेषण किया। यूके बायोबैंक (UK Biobank data) से लिए गए इस डैटा का विश्लेषण करने पर उन्हें एक और दिलचस्प सम्बंध दिखा: जिन लोगों में एक ऐसा जेनेटिक उत्परिवर्तन होता है जो GFRAL (एक प्रोटीन रिसेप्टर जो GDF15 से जुड़ता है) को निष्क्रिय कर देता है, उन्होंने उत्परिवर्तन-रहित लोगों की तुलना में हर हफ्ते 26 मिलीलीटर ज़्यादा नीट शराब पी (250 मिलीलीटर वाइन या 500 मिलीलीटर बीअर के तुल्य)।
गिलम कहते हैं कि कुल मिलाकर ये नतीजे इस विचार (biological mechanism) की पुष्टि करते हैं कि लंबे समय तक शराब पीने की प्रतिक्रिया के रूप में GDF15 का स्तर बढ़ता है, और स्वस्थ लोगों में यह शराब पीने की मात्रा को नियंत्रित करता है। उनका अनुमान है कि जिन लोगों में जेनेटिक उत्परिवर्तन के कारण यह तंत्र काम नहीं करता या जिनमें शराब की लत के कारण GDF15 असंवेदी हो गया है, उनमें यह ‘फीडबैक लूप’ (feedback loop mechanism) काम नहीं करता, जिसकी वजह से शायद वे ज़्यादा शराब पीते हैं।
इसके बाद टीम ने चूहों (mouse experiment) पर भी परीक्षण किया। देखा कि क्या GDF15 शराब पीने की मात्रा कम कर सकता है, या यह सिर्फ भूख शांत करने में भूमिका निभाता है। उन्होंने चूहों को GDF15 का इंजेक्शन लगाया और मापा कि वे सादा पानी ज़्यादा पीते हैं या इथेनॉल (शराब) (ethanol alcohol) मिला हुआ। जैसी कि उम्मीद थी GDF15 ने चूहों की भूख तो कम की ही, साथ ही उनकी शराब पीने की मात्रा में भी कमी (reduced alcohol consumption) आई। यह कमी खाने में आई कमी से कहीं ज़्यादा थी। अन्य शोधकर्ताओं कहना है कि यह प्रयोग शराब पीने में GDF15 की भूमिका जानने की दिशा में एक अच्छा कदम है। लेकिन यह पुख्ता करने के लिए कि यह हार्मोन विशेष तौर पर शराब के प्रति कितना प्रभावी है, अलग-अलग तरह के खाद्य पदार्थों पर परीक्षण करने की ज़रूरत है।
एक संभावना यह भी है कि लगातार कई दिनों तक शराब पीने (liver damage risk) से लीवर को होने वाले नुकसान की वजह से GDF15 बन सकता है, लेकिन दूसरे अंग भी यह हार्मोन बना सकते हैं। इंसान हज़ारों सालों से शराब पीते आ रहे हैं, इसलिए यह मुमकिन है कि किसी चीज़ भी चीज़ की अति रोकने के लिए शरीर में कुछ तरीके (body regulation system) विकसित हुए हों।
शोधकर्ताओं को लगता है कि bioRxiv प्रीप्रिंट (bioRxiv research paper) में प्रकाशित इन नतीजों की मदद से शराब की लत का इलाज में करने में मदद मिल सकती है। लेकिन अभी वे गर्भवती महिलाओं में GDF15 का स्तर, जेनेटिक परिवर्तन और खान-पान में बदलाव (शराब सहित) (diet and alcohol behavior) का अध्ययन करने की योजना बना रहे हैं, ताकि यह देखा जा सके कि GDF15 क्रियामार्ग और शराब से तुष्टि के बीच कोई कार्य-कारण सम्बंध है या नहीं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.zt6ovpi/full/_20260320_on_gdf15_oktoberfest.jpg
सदियों से अश्वगंधा (Withania somnifera) की जड़ आयुर्वेद में तंदुरुस्ती और मनदुरुस्ती के लिए इस्तेमाल होती रही है। आज यह एक लोकप्रिय वेलनेस ट्रेंड (wellness trend) बन चुकी है। सोशल मीडिया और विज्ञापनों में इसे तनाव कम करने, नींद सुधारने, ऊर्जा बढ़ाने और दिमाग तेज़ करने जैसे कई फायदों से जोड़ा जा रहा है, जिससे इसकी लोकप्रियता काफी बढ़ गई है। लेकिन वैज्ञानिक रूप से इसके फायदे और असर भली-भांति साबित (scientific evidence) नहीं हुए हैं।
हाल के कई क्लीनिकल परीक्षणों (clinical trials) की समीक्षा से यह संकेत मिलता है कि अश्वगंधा तनाव, चिंता और अवसाद (stress anxiety depression) कम करने में मदद करता है। लेकिन इन अध्ययनों की अपनी सीमाएं हैं: वे छोटे स्तर पर किए गए हैं और उनके तरीके अलग-अलग हैं; इसलिए पक्के निष्कर्ष निकालना मुश्किल है। यही वजह है कि वैज्ञानिक इसे पूरी तरह प्रमाणित इलाज नहीं, बल्कि एक संभावित सहायक सप्लीमेंट (dietary supplement) मानते हैं, जिस पर अभी और अधिक शोध की ज़रूरत है।
अश्वगंधा की बढ़ती लोकप्रियता के चलते नियामक संस्थाओं (regulatory authorities) के बीच बहस भी पैदा हो गई है। फ्रांस और डेनमार्क जैसे देशों ने खासकर गर्भवती महिलाओं, बच्चों और कुछ बीमारियों से ग्रस्त लोगों के लिए इसकी सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है। डेनमार्क ने तो 2023 में अश्वगंधा युक्त उत्पादों पर प्रतिबंध भी लगा दिया था। वहीं भारत का आयुष मंत्रालय (Ministry of AYUSH) इसे सामान्य रूप से सुरक्षित मानता है, लेकिन यह भी कहता है कि कुछ लोगों में इसके साइड इफेक्ट हो सकते हैं।
गौरतलब है कि अश्वगंधा एक बड़े और तेज़ी से बढ़ते सप्लीमेंट बाज़ार (supplement market) का हिस्सा है। आजकल कोलाजेन, मशरूम एक्सट्रैक्ट, प्रोबायोटिक्स, मैग्नीशियम और ओमेगा-3 जैसे सप्लीमेंट भी काफी लोकप्रिय हो रहे हैं। अमेरिका और युरोप में बड़ी संख्या में लोग नियमित रूप से इनका सेवन करते हैं, और आने वाले समय में यह बाज़ार बहुत तेज़ी से बढ़ने वाला है। इनकी लोकप्रियता का बड़ा कारण यह दावा है कि ये विज्ञान-समर्थित हैं, यानी इनके फायदे वैज्ञानिक शोध (evidence based claims) से साबित हुए हैं।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि कई सप्लीमेंट्स के पीछे का विज्ञान उतना साफ और स्पष्ट नहीं होता, जितना विज्ञापनों (marketing claims) में दिखाया जाता है। शुरुआत में सप्लीमेंट्स का इस्तेमाल विटामिन की कमी को पूरा करने के लिए होता था, जैसे रिकेट्स के लिए विटामिन डी का। लेकिन समय के साथ बाज़ार ऐसे उत्पादों की ओर बढ़ गया जो सामान्य सेहत सुधारने (general wellness) के लिए होते हैं, न कि किसी खास बीमारी के इलाज के लिए। दिक्कत यह है कि इनके ‘ऊर्जा बढ़ाने’ या ‘इम्युनिटी मज़बूत करने’ (immunity booster) जैसे दावों को सही तरह से मापना मुश्किल है।
नियम-कानून इस मामले को और जटिल बना देते हैं। कई देशों में सप्लीमेंट्स को दवाओं (food vs medicine regulation) की बजाय खाद्य पदार्थ माना जाता है, जहां उनकी सुरक्षा को प्रमाणित करना तो ज़रूरी होता है, लेकिन असर को साबित करना ज़रूरी नहीं होता। अमेरिका में स्थिति यह है कि यदि कंपनियां किसी बीमारी के इलाज का दावा न करें, तो अनुमति लिए बिना उसे लेकर सामान्य स्वास्थ्य से जुड़े दावे कर सकती हैं। इससे ये उत्पाद जल्दी बाज़ार में आ जाते हैं और निगरानी भी सीमित हो सकती है। वहीं युरोप में कंपनियों को ऐसे दावों के लिए ज़्यादा मज़बूत वैज्ञानिक प्रमाण (scientific proof) देने पड़ते हैं, लेकिन वहां भी कई बार अधूरी जानकारी के आधार पर ही निर्णय लिए जाते हैं।
एक और बड़ी समस्या यह है कि सप्लीमेंट्स एक जैसे नहीं होते। उनकी मात्रा, बनाने का तरीका और पौधे के किस हिस्से का उपयोग किया गया है (dosage variation), ये सब अलग-अलग हो सकते हैं। इसके चलते अलग-अलग अध्ययनों की आपस में तुलना करना मुश्किल हो जाता है (research variability)। उदाहरण के लिए, अश्वगंधा से जुड़ी कुछ सुरक्षा चिंताएं उन शोधों पर आधारित थीं, जिनमें बहुत अधिक मात्रा या पूरे पौधे का इस्तेमाल किया गया था, जो सामान्य उपयोग से अलग हो सकता है।
ऐसे सबूतों को समझना वैज्ञानिकों के लिए भी आसान नहीं होता। कई बार एक ही विषय पर अलग-अलग अध्ययन अलग नतीजे देते हैं, क्योंकि उनकी गुणवत्ता, सैंपल और तरीके अलग होते हैं। ऐसे में नियम बनाने वाली संस्थाओं को तय करना पड़ता है कि किस अध्ययन पर ज़्यादा भरोसा किया जाए। विशेषज्ञों के अनुसार, ये फैसले पूरी तरह अंतिम सच तय करने के बारे में नहीं होते, बल्कि उपलब्ध जानकारी के आधार पर सबसे सही लगने वाले निष्कर्ष (data interpretation) तक पहुंचने की कोशिश होते हैं।
बहरहाल, विज्ञान-समर्थित सप्लीमेंट्स (science backed supplements) की बढ़ती लोकप्रियता से यह स्पष्ट होता है कि लोग अब अपनी सेहत पर खुद नियंत्रण रखना (self-care trend) चाहते हैं। लेकिन यह भी सामने आता है कि वैज्ञानिक शोध और विज्ञापनों के दावों में फर्क है। कुछ सप्लीमेंट्स सच में फायदेमंद हो सकते हैं, लेकिन कई के लिए सबूत अभी सीमित या पूरी तरह स्पष्ट नहीं हैं। इसलिए किसी नुस्खे के विज्ञान-समर्थित होने के दावे का मतलब यह नहीं है कि वह हमेशा असरदार ही होगा।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/thumb/a/ad/WithaniaFruit.jpg/500px-WithaniaFruit.jpg
एरेबिडॉप्सिस थेलियाना को वनस्पति विज्ञान में वही स्थान हासिल है जो जंतु विज्ञान में ड्रॉसोफिला मेलानोगैस्टर (फल मक्खी) और सेनोरेब्डाइटिस एलेगेंस (गोल कृमि) को दिया गया है। तीनों ही प्रमुख मॉडल जीव हैं; जीव विज्ञान अनुसंधान के सेलिब्रिटी हैं। एरेबिडॉप्सिस थेलियाना एक द्विबीजपत्री पौधा है जिसे थेल क्रेस (thale cress) और माउस ईयर क्रेस (mouse ear cress) भी कहते हैं। सरसों कुल (ब्रेसीकेसी) का यह पौधा यूरेशिया और अफ्रीका का मूल निवासी है। भारत में यह उत्तर भारत में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। आप जब नर्सरी से पौधे खरीद कर लाते हैं तो साथ में यह भी चला आता है। यहां हम इसी पौधे के बहाने जीव विज्ञान के विभिन्न पड़ावों की सैर करेंगे।
रूप–रंग और आकार
एरेबिडॉप्सिस थेलियाना एक छोटा शाकीय वार्षिक पौधा है जो आम तौर पर 15 से 30 सेंटीमीटर लंबा हो सकता है। पौधे के आधार पर पत्तियां एक गुच्छे (रोज़ेट) के रूप में जमी होती हैं, जबकि ऊपरी तने पर थोड़ी संख्या में होती हैं।
जीव विज्ञान अनुसंधान में इस पौधे के महत्व का अंदाज़ा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सन 1964 में ही एरेबिडॉप्सिस सूचना सेवा नामक एक समाचार पत्र शुरू किया जा चुका था। एक और बात – जिन शोध पत्रों के शीर्षक, एब्स्ट्रेक्ट या प्रमुख शब्दों की सूची में एरेबिडॉप्सिस थैलियाना का नाम आता है उनकी संख्या 54,000 से ज़्यादा है। और यह साल 1975 से 2015 का आंकड़ा है। यानी प्रति वर्ष इस पौधे पर लगभग 1000 शोध पत्र प्रकाशित होते रहे हैं। तो अब तक कुल शोध पत्रों की संख्या 65,000 पार कर गई होगी।
कुछ खास बातें
इसका जीनोम छोटे आकार का है और द्विगुणित होने के कारण यह आनुवंशिक मैपिंग और जीनों के अनुक्रमण को जानने समझने के लिए उपयोगी है। द्विगुणित (डिप्लॉइड) का मतलब है कि इसमें प्रत्येक गुणसूत्र जोड़ों में पाया जाता है। (अधिकांश पौधों में गुणसूत्रों की कई प्रतियां होती हैं।) एरेबिडॉप्सिस में केवल पांच गुणसूत्र (डिप्लॉइड संख्या 10) और लगभग 13.5 करोड़ क्षार जोड़ियां पाई जाती हैं। लंबे समय तक इसके जीनोम को सबसे छोटा जीनोम माना गया था परंतु अब एक मांसाहारी पौधे जेनेलिया ट्यूबरोसिया (जीनोम में लगभग 6.1 करोड़ क्षार जोड़ियां) ने इसका स्थान ले लिया है। सन 2000 में यह वह पहला पौधा बन गया जिसके पूरे जीनोम (27,407 जीनों) का अनुक्रमण किया गया था। अंतरिक्ष यात्रा करने वाला भी यह पहला पौधा था – 1982 में सोवियत सेल्यूट-7 अंतरिक्ष स्टेशन पर अंतरिक्ष यात्रियों ने इसे उगाया था और बीज प्राप्त किए थे। इस तरह से यह शून्य गुरुत्व की परिस्थिति में फलने-फूलने वाला पौधा बन गया था। और तो और, पादप विज्ञान का यह मॉडल पौधा 2019 में चांग ई-4 लैंडर के साथ चांद की सैर भी कर चुका है।
एरेबिडॉप्सिस को सबसे पहले 1943 में एक जर्मन वैज्ञानिक फ्रेडरिक लायबैक (Friedrich Laibach) ने आनुवंशिकी अध्ययन के लिए एक मॉडल जीव के रूप में प्रस्तावित किया था। अलबत्ता, मॉडल जीव के रूप में इसके उपयोग को पूर्णत: स्थापित करने का काम मिसौरी विश्वविद्यालय के जॉर्ज रिडे (George Rédei) के शोध की बदौलत हुआ। 1965 में एरेबिडॉप्सिस को लेकर पहला अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन जर्मनी के गॉटिंजेन मे आयोजित हुआ था लेकिन इसे एक मॉडल जीव के रूप में मान्यता 1980 के दशक में मिली। यह पौधा विकास और शारीरिकी की जटिलताओं को सुलझाने में महत्वपूर्ण साबित हुआ है।
छोटा जीवनचक्र
एरेबिडॉप्सिस का जीवनचक्र बहुत ही छोटा है – बीज अंकुरण से लेकर फिर से बीज बनने तक लगभग 6 सप्ताह में इसका जीवनचक्र पूरा हो जाता है। प्रयोगशाला की नियंत्रित परिस्थितियों में इसे उगाना आसान है, इसके लिए बहुत ज़्यादा जगह या संसाधनों की ज़रूरत नहीं पड़ती। प्रत्येक पौधे में हज़ारों बीज बनते हैं। इसके कई उत्परिवर्ती संस्करण (म्यूटैन्ट) ज्ञात हैं और क्रिस्पर कास-9 जैसी उन्नत विधियों की उपलब्धता के चलते जीन्स के कार्य और परस्पर क्रिया का अध्ययन करने के लिए यह एक आदर्श पौधा है। चूंकि यह एक स्व-परागित पौधा है; अतः आनुवंशिक स्थिरता को बनाए रखने और प्रकट लक्षणों को देखने में भी यह मददगार होता है।
एरेबिडॉप्सिस के अध्ययन से पादप विकास में भ्रूण जनन, पत्तियों और फूलों के विकास तथा जड़ संरचना के बारे में कई नई जानकारियां उपलब्ध हुई है। आइए कुछ महत्वपूर्ण मील के पत्थरों को देखें।
परिवर्धन
वैसे तो पादप परिवर्धन का अध्ययन सदियों से होता आया है लेकिन आज हम कोशिकाओं के विभेदन, पैटर्न निर्माण, कोशिका विभाजन के नियंत्रण तथा पर्यावरण व पौधों के परिवर्धन के सम्बंध में जो कुछ जानते हैं, वह एरेबिडॉप्सिस पर किए गए प्रयोगों की बदौलत है। इसकी मदद से पादप विकास के नए-नए मार्ग और कारक पहचाने गए हैं। उदाहरण के लिए, लघु-आरएनए और उनके लक्षित जीन्स के बीच सम्बंधों के आधार पर यह पहचाना गया कि सूक्ष्म-आरएनए (mi-RNA) परिवर्धन के कई स्थान सम्बंधी (spatial) तथा समयगत (temporal) पहलुओं का नियमन करते हैं।
फूलों का विकास
एरेबिडॉप्सिस अनुसंधान का एक महत्वपूर्ण योगदान फूलों के विकास के एबीसी (ABC) मॉडल को समझने में रहा है। एबीसी मॉडल को 1990 के दशक में जॉन बोमैन, डेविड स्माइथ और एलियट मेयरोविट्ज़ (John Bowman, David Smyth, Elliot Meyerowitz) ने प्रस्तावित किया था। इसके अनुसार तीन वर्गों के जीन्स (ए, बी और सी) फूलों के विभिन्न अंगों (अंखुड़ियां, पंखुड़ियां, पुंकेसर और बीजांड कोश) के निर्माण का नियंत्रण करते हैं। इनमें से ‘ए’ वर्ग के जीन्स का कार्य केवल अंखुड़ियों का निर्माण करना है, जबकि ‘ए’ और ‘बी’ वर्ग के जीन्स मिलकर पंखुड़ियां बनाते हैं। ‘बी’ और ‘सी’ वर्ग के जीन मिलकर पुंकेसर को पहचान देते हैं तथा ‘सी’ वर्ग का कार्य स्त्रीकेसर (जिसमें अंडाशय, वर्तिका और वर्तिकाग्र होते हैं) का निर्माण करना है।
शोधकर्ताओं ने एरेबिडॉप्सिस में अलग-अलग जीन वर्गों को निष्क्रिय करके असर देखे। फूलों के विकास का ‘एबीसी’ मॉडल एरेबिडॉप्सिस तथा एंटीराइनम मैजस (Antirrhinum majus) में एबीसी जीन के क्लोनिंग का परिणाम है। इसकी मदद से यह स्पष्ट हुआ कि अंगों में विभेदन का नियंत्रण ट्रांसक्रिप्शन (डीएनए से प्रोटीन संश्लेषण का एक चरण जिसमें डीएनए से आरएनए बनता है) के ज़रिए होता है और ऐसे ही कई कारकों के मिले-जुले प्रभाव से कोशिकीय विभेदन होता है। जैसे 2013 में एरेबिडॉप्सिस पर किए गए प्रयोगों से यह पता चला था कि पंखुड़ियों की शुरुआत ऑक्सिन की वजह से होती है।
प्रकाश–ग्राहियों की खोज
एरेबिडॉप्सिस पर किए गए अनुसंधान से क्रिप्टोक्रोम्स की खोज हुई। क्रिप्टोक्रोम्स, दरअसल, नीले प्रकाश के ग्राही होते हैं और पौधों की वृद्धि तथा विकास को नियंत्रित करते हैं। मार्गरेट अहमद (Margaret Ahmad) और एंथनी कैशमोर (Anthony R. Cashmore)ने एरेबिडॉप्सिस में क्रिप्टोक्रोम-1 (CRY1) को पहचाना था जिससे हमें प्रकाश-निर्भर वृद्धि की प्रक्रिया को समझने में मदद मिली। यह प्रकाशग्राही बीजों के अंकुरण व पुष्पन में अहम भूमिका निभाता है।
हालांकि पौधों में फूल आने के लिए दिन की उपयुक्त लंबाई का संकेत देने वाला प्रकाशग्राही (R/FR संवेदी फायटोक्रोम) अन्य पौधों में खोज लिया गया था लेकिन इसके जीन की संरचना का खुलासा तो एरेबिडॉप्सिस की मदद से हुआ था।
जेनेटिक अनुसंधान
1980 के दशक में आणविक जीव विज्ञान का उदय हुआ और इसके साथ ही एक मॉडल जीव के रूप में एरेबिडॉप्सिस की प्रतिष्ठा और बढ़ी। इसका जीनोम छोटा-सा है (महज़ 13.5 करोड़ क्षार जोड़ियां) और इसमें फालतू जोड़ियां बहुत कम होती हैं। 1996 में एरेबिडॉप्सिस जीनोम इनिशिएटिव की स्थापना के बाद सन 2000 तक इसके पूरे जीनोम का अनुक्रमण कर लिया गया था। इसके बाद तो यह और भी महत्वपूर्ण हो गया। इस पौधे का उपयोग जीन्स के कामकाज, जीनोम के संगठन, पौधों में उनके नियमन और विभिन्न प्रजातियों के बीच वैकासिक सम्बंध खोजने में होने लगा। अनुसंधान ने हमें पादप विकास, कार्यिकी और पर्यावरण के प्रति उनकी प्रतिक्रियाओं को समझने में मदद दी। इस संदर्भ में लघु आरएनए और सूक्ष्म आरएनए की चर्चा ऊपर की जा चुकी है।
एपिजेनेटिक्स
एपिजेनेटिक्स का मतलब होता है कि जेनेटिक कारकों का मात्र जीन्स की रचना से इतर नियंत्रण। एरेबिडॉप्सिस अनुसंधान से विकास की कई प्रक्रियाओं में क्रोमेटिन नियामक प्रोटीन्स की भूमिका सामने आई है। जैसे विकास की अवस्था का परिवर्तन, कोशिका की पहचान में परिवर्तन और तनाव के प्रति प्रतिक्रिया का शुरू होना। इन प्रयोगों से एक समझ यह उभरी है कि क्रोमेटिन नियामकों के परस्पर विपरीत रूप होते हैं – एक जो डीएनए के किसी हिस्से तक पहुंच को बाधित करते हैं और दूसरे वे जो उसी हिस्से तक पहुंच को सुगम बनाते हैं। इनकी क्रिया का परिणाम होता है कि उचित प्रोटीन्स, उचित समय पर, उचित कोशिकाओं में सही परिवेश में बनते हैं। इसका एक उदाहरण फूल बनने की प्रक्रिया में देखा जा सकता है।
एपिजेनेटिक नियंत्रण का एक मार्ग डीएनए मिथाइलेशन का है। डीएनए मिथाइलेशन में डीएनए के एक विशिष्ट भाग में मिथाइल समूह जुड़ जाता है, जिससे जीन की अभिव्यक्ति प्रभावित होती है। यह प्रक्रिया डीएनए के अनुक्रम में बिना किसी बदलाव के जीन के चालू या बंद होने को नियंत्रित कर सकती है। एरेबिडॉप्सिस इसे समझने का एक प्रमुख मॉडल रहा है। डीएनए मिथाइलेशन के चार एंज़ाइम इसी मॉडल में पहचाने गए।
पादप प्रतिरक्षा तंत्र
जब कोई रोगजनक शरीर में घुसे तो उसे पहचानने के लिए ज़रूरी होता है कि उस रोगजनक द्वारा बनाए गए किसी अणु को पहचाना जाए। एरेबिडॉप्सिस पर हुए अनुसंधान से पादप प्रतिरक्षा तंत्र को समझने में बहुत मदद मिली है। इसके अलावा, इसी अनुसंधान ने यह भी स्पष्ट किया है कि पौधे चबाने/कुतरने वाले जंतुओं पर किस तरह की प्रतिक्रिया देते हैं। एरेबिडॉप्सिस पर प्रयोगों से पता चला है कि चबाने-कुतरने वाले जंतुओं से रक्षा के लिए पौधे विविध रणनीतियां अख्तियार करते हैं। इनमें विषैले पदार्थ बनाना, अपनी कोशिका भित्तियों को मज़बूत करना या पत्तियों पर रोम (ट्राइकोम्स) उत्पन्न करना, कुतरने वाले जंतु के कुदरती शत्रुओं को आमंत्रित करना, कुतरने वाले जीव द्वारा पैदा कंपनों को पहचानकर अपनी प्रतिरक्षा प्रणाली को तेज़ करना वगैरह शामिल हैं।
पहले तो पादप-रोगजनक अंतर्क्रिया के अध्ययन के इस तरह के प्रस्तावों को शंका की नज़र से देखा जाता था क्योंकि माना जाता था कि इसका सम्बंध फसली पौधों से होने की संभावना बहुत कम है। लेकिन इस मामले में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि तब सामने आई जब एरेबिडॉप्सिस में से पहला इंट्रासेल्यूलर (यानी कोशिका के अंदर पाया जाने वाला) ग्राही खोजा गया और उसे पृथक कर लिया गया। इससे पता चला कि संक्रमण को थामने की क्रिया में कई परस्पर सम्बंधित प्रोटीन्स की मध्यस्थ भूमिका होती है। अब इन्हें एनएलआर (NLR) यानी न्यूक्लियोटाइड बाइंडिंग डोमैन ल्यूसीन-रिच रिपीट रिसेप्टर प्रोटीन्स कहा जाता है। आगे चलकर यह भी पता चला कि इन प्रोटीन्स के जीन्स डीएनए के उन्हीं बिंदुओं पर होते हैं जो सदियों से रोग-प्रतिरोधी पौध प्रजातियों के विकास के केंद्र में रहे हैं। फिर एरेबिडॉप्सिस में से फ्लेजेलिन ग्राही प्राप्त किया गया और बात आगे बढ़ी। फ्लेजेलिन ग्राही एक प्रोटीन है जो बैक्टीरिया के चाबुकनुमा उपांग फ्लेजेला के एक प्रमुख घटक फ्लेजेलिन से जुड़ जाता है। इससे जंतुओं और पौधों दोनों में प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया सक्रिय होती है। यह भी पता चला कि कुछ रोगजनक ऐसे अणु पौधे में डाल देते हैं जो उनकी प्रतिरक्षा को तहस-नहस करते हैं। आज पादप प्रतिरक्षा तंत्र को परखने की सबसे उम्दा कसौटी एरेबिडॉप्सिस ही है।
कोशिकाओं में संवाद व हारमोन
कोशिकाओं के बीच संवाद भी शोध का एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। आज हम जानते हैं कि ऐसा संवाद मात्र पुराने पादप हारमोन के दम पर नहीं बल्कि नए-नए खोजे गए हारमोन्स की मध्यस्थता से भी होता है। इस संदर्भ में दो हारमोन ब्रासिनोस्टेरॉइड्स (Brassinosteroids) एवं स्ट्रिगोलैक्टोन्स (Strigolactones) के नाम बताए जा सकते हैं। संकेतक अणुओं की विविधता, उनके परिवहन के तरीके और एक-दूसरे पर उनके प्रभाव स्पष्ट करने में एरेबिडॉप्सिस पर हुए प्रयोगों की अहम भूमिका रही है।
उदाहरण के लिए, एरेबिडॉप्सिस की जड़ों में कोशिकाओं की नियति और पैटर्न निर्माण के अध्ययन से हम लघु नियमनकर्ता आरएनए और गतिशील ट्रांसक्रिप्शन कारकों को पहचान पाए हैं जिनकी गति तथा परस्पर क्रियाएं ऊतकों के पैटर्न को निर्धारित करती हैं।
पादप हारमोन की खोज व अध्ययन में एरेबिडॉप्सिस की प्रमुख भूमिका रही है। पादप हारमोन ऐसी विविध संरचना वाले छोटे अणु होते हैं जो जीव में काफी दूर स्थित जगहों पर वृद्धि, परिवर्धन और पर्यावरण के प्रति संवेदना को प्रभावित करते हैं। बीसवीं सदी में न सिर्फ कई पादप हारमोन्स की खोज की गई बल्कि कई हारमोन्स की रासायनिक रचना तथा उनके जैविक संश्लेषण के मार्ग भी पता किए गए। इस सबमें एरेबिडॉप्सिस ने काफी मदद की। इसमें प्रमुख योगदान इस बात का रहा कि एरेबिडॉप्सिस के अनगिनत उत्परिवर्तित संस्करण उपलब्ध हैं।
पादप हारमोन्स के बारे में प्रारंभिक विचारों पर जंतु मॉडल्स हावी थे। जंतुओं में कोशिका की प्लाज़्मा झिल्ली पर कुछ ग्राही होते हैं जो कोशिका द्रव्य के कतिपय प्रोटीन्स के ज़रिए केंद्रक में ट्रांसक्रिप्शन कारकों तक संकेत पहुंचाते हैं। लेकिन पता चला कि यह मॉडल सिर्फ ब्रासिनोस्टेरॉइड नामक हारमोन पर लागू होता है। ब्रासिनोस्टेरॉइड के क्रियामार्ग के प्रमुख घटक एरेबिडॉप्सिस में ही पहचाने गए थे। दरअसल, जंतुओं में स्टीरॉइड्स मूलत: घुलनशील केंद्रकीय हारमोन-ग्राहियों के ज़रिए काम करते हैं, जिसका पौधों में कोई समकक्ष नहीं पाया जाता। लिहाज़ा, एरेबिडॉप्सिस ने पौधों में स्टीरॉइड की क्रिया का एक वैकल्पिक मार्ग सुझाया है।
हारमोन संकेतन का एक अन्य मार्ग शायद क्लोरोप्लास्ट के जीनोम से उभरा है। एथायलीन और सायटोकाइनिन्स दोनों को ही एंडोप्लाज़्मिक रेटिक्युलम पर स्थित ग्राहियों द्वारा भांपा जाता है और ये बैक्टीरिया में पाए जाने वाले ग्राहियों के समकक्ष हैं। इन ग्राहियों तथा क्रियामार्ग के अन्य घटकों का पता लगाने के लिए एरेबिडॉप्सिस शोधकर्ताओं ने दो प्रमुख कार्यिकीय प्रतिक्रियाओं की मदद ली। पहली है इटियोलेटेड (कमज़ोर व पीले पड़ चुके) नवजात पौधों में एंडोप्लाज़्मिक रेटिक्युलम द्वारा नियंत्रित प्रतिक्रिया और दूसरी है कैलस ऊतक (सख्त ऊतक) का सायटोकाइनिन के प्रभाव से हरा हो जाना। जहां सायटोकाइनिन संकेतन की क्रियाविधि बैक्टीरिया जैसी लगती है, वहीं एंडोप्लाज़्मिक रेटिक्युलम नियंत्रित क्रिया एकदम नवीन है। एरेबिडॉप्सिस पर किए अनुसंधान से न सिर्फ एंडोप्लाज़्मिक रेटिक्युलम आधारित क्रियामार्ग के घटक स्पष्ट हुए, बल्कि इसी के दम पर इस क्रियाविधि के चरणों को क्रमबद्ध किया जा सका।
पौधों में हारमोन संकेतन की तीसरी व सबसे प्रमुख क्रियाविधि में घुलनशील सायटोप्लाज़्मिक ग्राही शामिल होते हैं। ये प्रोटीन-प्रोटीन अंतर्क्रियाओं को संभालते हैं। इस क्रियाविधि के बारे में पहले से पता तो था किंतु इसे एक सामान्य संकेतन प्रक्रिया के रूप में एरेबिडॉप्सिस में ही स्थापित किया गया। यह वनस्पतिनुमा क्रियाविधि ऑक्सिन, जैस्मोनेट, गिबरलिक एसिड, स्ट्रिगोलैक्टोन्स, सेलिसिलिक एसिड और एबीए (एब्सिसिक एसिड) की संवेदना में देखी जाती है।
सिगनल ट्रांसडक्शन
सिग्नल ट्रांसडक्शन (Signal Transduction) को सेल सिग्नलिंग भी कहा जाता है। यह किसी बाहरी संकेत को कोशिका के अंदर तक ले जाने की प्रक्रिया है, जिससे कोशिका की प्रतिक्रिया होती है। दूसरे शब्दों में, यह एक प्रक्रिया है जिसके द्वारा कोशिकाएं अपने पर्यावरण में होने वाले परिवर्तनों को भांपती हैं और अन्य कोशिकाओं के साथ संवाद करती हैं। एरेबिडॉप्सिस मॉडल पर शोध की मदद से पौधों के हारमोनल सिग्नलिंग (विशेष रूप से ऑक्सिन, गिबरलिन और एथिलीन) को समझने में महत्वपूर्ण योगदान मिला है। इन क्रियापथों में प्रमुख जीन और रिसेप्टर की पहचान से यह स्पष्ट हुआ है कि पौधे विकास और पर्यावरणीय उद्दीपनों के प्रति प्रतिक्रियाओं को कैसे नियंत्रित करते हैं।
अजैविक पर्यावरण के प्रति प्रतिक्रिया
अपने पर्यावरण के प्रति पौधों के रिस्पॉन्स को समझने में भी एरेबिडॉप्सिस ने काफी योगदान किया है। पौधे एक जगह स्थिर रहते हैं, और उन्हें अपने विकास को पर्यावरण के अनुसार ढालना होता है। पौधे की साइज़, शाखा बनना, वृद्धि की रफ्तार तथा फूलने के समय को अजैविक कारकों के अनुसार ढाला जाता है। अन्य प्रजातियों के अलावा एरेबिडॉप्सिस पर किए गए प्रयोगों से पौधों में पुष्पन के समय की गणना की क्रियाविधि स्पष्ट हो पाई है। इसमें वर्नेलाइज़ेशन जैसी प्रक्रियाएं शामिल हैं। यह भी स्पष्ट हो पाया है कि पौधों में दिन की लंबाई के मापन की क्रियाविधि क्या है, क्योंकि कई पेड़-पौधों में फूल आने की घटना का सम्बंध दिन की लंबाई से होता है।
ठंड पड़ती है तो पौधे रजाई तो ओढ़ नहीं सकते। उनमें ठंड से तालमेल बनाने के लिए आंतरिक परिवर्तन होते हैं। इन परिवर्तनों को समझने में यह जानना महत्वपूर्ण होता है किसी परिस्थिति में कोशिका में कौन-कौन से आरएनए मौजूद हैं। इसे ट्रांसक्रिप्टोम विश्लेषण कहते हैं और एरेबिडॉप्सिस में इसे भली-भांति विकसित किया गया है। एक उदाहरण तो यह है कि शीत-समायोजन की प्रक्रिया में सीबीएफ रेगुलॉन जीन्स की पहचान हो पाई। सीबीएफ रेगुलॉन जीन्स का एक समूह है जो सक्रिय होने पर पौधों में हिमीकरण सहनशीलता को बढ़ाने में योगदान देते हैं। सीबीएफ रेग्युलॉन शीत अनुकूलन प्रक्रिया का एक प्रमुख घटक है, जहां पौधे स्वयं को शून्य से नीचे के तापमान को झेलने के लिए तैयार करते हैं। उम्मीद है कि अन्य पर्यावरणीय तनावों के संदर्भ में भी ऐसे विश्लेषण किए जा सकेंगे। इस संदर्भ में बारबरा मैक्लिंक्टॉक ने सुझाव दिया था कि एपिजीनोम का नियमन तनाव के अधीन होता है। इस परिकल्पना की जांच एरेबिडॉप्सिस पर ही की गई है।
कुछ अन्य अजैविक तनावों पर बात करते हैं। पानी के अभाव में पौधों में एब्सेसिक एसिड और सूखा-प्रतिक्रिया प्रारंभ हो जाती है। लेकिन एरेबिडॉप्सिस पर किए गए प्रयोगों से यह भी पता चला है कि कोशिका झिल्ली के प्रोटीन कुछ अकार्बनिक पदार्थों को पहचानकर उनका परिवहन भी करते हैं। दूसरी ओर, अभी भी हम सोडियम आयन या भारी धातुओं के विषैले आयन के ग्राहियों का पता नहीं लगा पाए हैं।
जड़ों का विकास
जड़ें कब लंबाई में वृद्धि करती हैं, कब उनकी कोशिकाएं विभेदित होने लगती हैं, कब मुख्य जड़ से पार्श्व जड़ें निकलने लगती है, कब मूल रोम विकसित होने लगते हैं – इस बारे में तीन व्याख्याएं प्रस्तुत हुई हैं। पहली है, साइज़र (आकार-आधारित) परिकल्पना जिसके अनुसार जड़ों के अग्र भाग (एपिकल मेरिस्टेम) की कोशिकाएं एक न्यूनतम साइज़ हासिल करने के बाद विभाजित/विभेदित होती हैं। दूसरी है, टाइमर (समय-आधारित) परिकल्पना, जिसके अनुसार कोशिकाएं विभाजन से पूर्व एक समय बिताती हैं और वह समय पूरा होने के बाद विभाजन करती हैं। तीसरी है, रूलर परिकल्पना जो कहती है कि कोशिकाएं अग्र भाग की लंबाई की तुलना में एक निश्चित लंबाई प्राप्त करने के बाद विभाजित होती हैं। एरेबिडॉप्सिस के मूल रोमों के अध्ययन ने इस मामले में काफी समझ बनाई है।
एरेबिडॉप्सिस पर किए गए आणविक जेनेटिक प्रयोगों से जड़ों के विकास के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी हासिल हुई हैं। जड़ के विकास में शामिल कई नियामक जीन्स की पहचान हुई है।
पौधों में द्वितीयक वृद्धि
पौधों में दो तरह की वृद्धियां देखी जाती है। पहला प्रकार प्राथमिक वृद्धि कहलाती है जो धनिया, पालक, मेथी, सरसों आदि शाकीय पौधों में होती है जिसमें मुख्य रूप से उनकी लंबाई बढ़ती है। वृद्धि का दूसरा प्रकार द्वितीयक वृद्धि कहलाता है जो झाड़ियों और पेड़ों में लंबाई के साथ-साथ तनों और जड़ों की मोटाई में होने वाली वृद्धि है। इसे द्वितीयक वृद्धि कहते हैं। गौरतलब है कि एरेबिडॉप्सिस एक शाकीय पौधा है जिसमें सामान्यत: द्वितीयक वृद्धि नहीं होती लेकिन आश्चर्यजनक रूप से द्वितीयक वृद्धि के बारे में कुछ खास बातें इसी मॉडल जीव के अध्ययन से प्राप्त हुई हैं। जे-ह्यूंग को (Jae-Heung Ko), क्यूंग-ह्वान हान (Kyung-Hwan Han), सुलचुंग पार्क (Sunchung Park) तथा जेमो यांग (Jaemo Yang) ने एक प्रयोग में देखा कि इस पौधे के तने के शीर्ष पर कुछ भार आरोपित करके इस शाकीय पौधे में भी द्वितीयक वृद्धि प्रेरित की जा सकती है। इस प्रकार के प्रयोग से पता चला कि तने द्वारा वहन किया जाने वाला भार तने में एक ऐसे विकास कार्यक्रम को सक्रिय करता है जिससे द्वितीयक वृद्धि होती है और उसमें काष्ठ का निर्माण होता है। अर्थात तने की कुल लंबाई (यानी वज़न) द्वितीयक वृद्धि का नियंत्रण करती है।
वैसे शोधकर्ताओं ने पहले किए गए प्रयोगों में यह भी देखा था कि यदि एरेबिडॉप्सिस में फूल न लगने दिए जाएं, तो उसकी लंबाई बढ़ती रहती है और उसमें द्वितीयक वृद्धि होने लगती है। इससे पता चलता है कि प्राथमिक और द्वितीयक वृद्धि की प्रक्रियाएं काफी निकटता से एक दूसरे से सम्बंधित है जबकि पूर्व में ऐसा सोचा गया था कि ये दोनों अलग-अलग हैं। काष्ठीय पौधों में द्वितीयक वृद्धि के लिए ज़िम्मेदार जीन्स की पहचान में भी इस मॉडल जीव ने काफी मदद की है।
गुरुत्व–चालित गति
एरेबिडॉप्सिस के छोटे-छोटे बीज अंकुरण के बाद नन्ही पौध पैदा करते हैं जिन्हें काफी नियंत्रित परिस्थितियों में पनपने दिया जा सकता है। यानी एक-एक पौध को अलग-अलग पर्यावरणीय परिस्थितियां प्रदान की जा सकती हैं।
इसी खूबी के चलते यह संभव हुआ कि विभिन्न उत्परिवर्तित पौधों में गुरुत्व-चालित गति का अध्ययन किया जा सके। जैसे एक मामले में अगर (agar) के खड़े माध्यम में एरेबिडॉप्सिस के अंकुरों को कुछ दिन तक पनपाया गया। फिर इन नन्हे अंकुरों को गुरुत्व उद्दीपन दिया गया। इसके लिए उन्हें एक तश्तरी में रखकर 90 अंश के कोण पर घुमाकर रख दिया गया। इस परिस्थिति में वन्य पौधों ने तो 12 घंटे के अंदर अपने अंगों की वृद्धि को समायोजित कर लिया यानी उनकी जड़ें सीधे नीचे की ओर तथा तने सीधे ऊपर की ओर बढ़ने लगे। लेकिन गुरुत्व के लिहाज़ से उत्परिवर्तित पौधे ऐसा समायोजन नहीं कर पाए।
यही हालत तब भी रही जब प्रयोग को पुष्पक्रम के साथ दोहराया गया था। रोचक बात यह रही कि शुरुआत में ही उन जेनेटिक उत्परिवर्तनों को पहचान लिया गया था जो तीनों अंगों (जड़, तना व पुष्पक्रम) की गुरुत्व संवेदना को प्रभावित करते हैं और कुछ जीन ऐसे भी थे जो इनमें से किसी एक या दो अंगों पर असर डालते थे।
बीजों की वृद्धि
एरेबिडॉप्सिस पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि यह पौधा बड़ी चतुराई से अपने सिर्फ उन्हीं बीजांडों तक पोषण पहुंचने देता है जो निषेचित हो चुके होते हैं गैर-निषेचित बीजांड तक पोषण पहुंचने से रोकता है, जिससे पोषण का सदुपयोग होता है और बीज बड़ा बनता है। प्रयोगों के द्वारा इस प्रक्रिया की जेनेटिक व आणविक क्रियाविधि भी स्पष्ट हुई है और लगता है कि इसे अन्य फसली पौधों पर आज़माया जा सकता है।
कोशिका भित्ती, स्टार्च और लिपिड्स
मनुष्य पौधों से जो कुछ प्राप्त करते हैं वह अधिकांशत: कोशिका भित्तियां, स्टार्च, शर्करा तथा लिपिड्स होते हैं। और एरेबिडॉप्सिस इन चीज़ों के संश्लेषण व रूप-परिवर्तन में शामिल एंज़ाइम्स की पहचान करने का एक प्रमुख मॉडल बनकर सामने आया है।
एरेबिडॉप्सिस अनुसंधान से यह भी स्पष्ट हुआ है कि सीमित संसाधन वाले पौधों में स्टार्च विघटन की दर रात की लंबाई के अनुरूप होती है, जिसके चलते वे रात के अंत में कार्बन के अभाव से बच जाते हैं। यह पता चला है कि पौधों में स्टार्च का विघटन जैविक घड़ी के नियंत्रण में होता है जो एक अधिकतम दर निर्धारित करती है और यह सुनिश्चित करती है कि सुबह होने तक सारा स्टार्च खत्म न हो जाए। इस समझ के आधार पर पादप वृद्धि के नवीन मॉडल बन सकेंगे। हालांकि इस समझ को सीधे-सीधे फसली पौधों पर लागू नहीं किया जा सकेगा लेकिन यह भावी शोध को दिशा ज़रूर देगी।
कुल मिलाकर यह कहा जा सकता है कि यह छोटा-सा पौधा एक बड़ा महत्वपूर्ण मॉडल साबित हुआ है। इसे जीव विज्ञान अनुसंधान की सेलिब्रिटी कहना गलत न होगा। भविष्य में भी इसकी महत्ता बनी रहेगी और यह मॉडल जीव हमें जीव विज्ञान के नए-नए रास्ते सुझाता रहेगा।
भावी अनुसंधान
एरेबिडॉप्सिस विटामिन चयापचय का खुलासा करने में महत्वपूर्ण होता जा रहा है। जैसे पैंटोथेनेट (विटामिन बी-5) का संश्लेषण एरेबिडॉप्सिस में होता है और तीन जीन्स पहचाने गए हैं। इन पर आगे अध्ययन जारी है।
इसी प्रकार से एरेबिडॉप्सिस पादप जीनोम व उसकी अभिव्यक्ति के व्यवस्थित अध्ययन के लिए एक मॉडल तंत्र बनकर उभरा है। पिछले कुछ वर्षों में इस पादप मॉडल में अभिव्यक्त प्रोटीन्स के अलावा, पूरे अंग या ऊतकों में प्रोटीन समुच्चय (प्रोटियोम) के अध्ययन शुरू हुए हैं। क्लोरोप्लास्ट, माइटोकॉण्ड्रिया, परॉक्सिसोम, और केंद्रक जैसे कोशिका के अंदर पाए जाने वाले उपांगों के प्रोटियोम का अध्ययन भी एक महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया है। इन अध्ययनों ने यह समझने में मदद की है कि किसी अजैविक तनाव, रोगजनक के आक्रमण या उत्परिवर्तन के तनाव के संदर्भ में पौधों के प्रोटीन प्रोफाइल पर कैसे असर होते हैं।
जिस अकेले पौधे पर 60-70 हज़ार शोध पत्र छप चुके हों, उसका सांगोपांग वर्णन तो एक-दो किताबों में भी मुश्किल होगा। संक्षेप में कहें, तो इस पौधे पर अनुसंधान के द्वारा हमें जीव विज्ञान की कई गुत्थियां सुलझाने में मदद मिली है। इनमें जीन्स की अभिव्यक्ति का नियंत्रण, कोशिकाओं के प्रकारों के विकास में विभिन्न कारकों की भूमिका, संश्लेषण जीव विज्ञान वगैरह जैसे विविध क्षेत्र शामिल हैं।
यहां यह बता देना मुनासिब है कि एरेबिडॉप्सिस सम्बंधी अनुसंधान में इस बात से बहुत मदद मिली है कि इसके बारे में उपलब्ध सूचनाएं विभिन्न डैटाबेस में संग्रहित व उपलब्ध हैं। इसलिए इस पर अनुसंधान करने के लिए हर बार ‘क-ख-ग’ से शुरू नहीं करना पड़ता।
ऐसे अनुसंधान को लेकर एक मल्टीनेशनल एरेबिडॉप्सिस स्टेरिंग कमिटी (MASC) गठित हुई है जो निरंतर हो रही प्रगति का प्रकाशन करती है। इस कमिटी ने शोधकर्ताओं से सुझाव लिए हैं कि आने वाले दशक में एरेबिडॉप्सिस की मदद से किस तरह की खोजें होने की उम्मीद है।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://upload.wikimedia.org/wikipedia/commons/6/6f/Arabidopsis_thaliana.jpg
कल्पना कीजिए, रात का खाना खत्म हुआ और सामने एक गिलास दूध हाज़िर हो गया। कुछ लोगों के लिए यह एक सुखद आदत है। लेकिन कुछ लोगों के पेट में दूध पहुंचते ही एक अजीब हलचल शुरू हो जाती है – गैस बनना, मरोड़ उठना, पेट फूलना और कभी-कभी दस्त भी लग जाते हैं। क्या इसके पीछे दूध दोषी है? या हमारे भीतर कुछ ऐसा है जो बदल चुका है, चुपके से, बिना बताए!
यह कहानी है लैक्टोज़ असहिष्णुता (lactose intolerance) की| एक ऐसी अवस्था जिसे अक्सर ‘दूध से एलर्जी’ (milk allergy) समझ लिया जाता है। लेकिन यह वास्तव में पाचन के जैव रसायन की एक बेहद रोचक और जैव विकास सम्बंधी गाथा है।
लैक्टोज़ क्या है?
दूध को संपूर्ण आहार (complete nutrition food) कहा जाता है, और इसका एक बड़ा कारण है उसमें मौजूद शर्करा, जिसे हम लैक्टोज़ कहते हैं। रासायनिक दृष्टि से यह एक डाईसेकराइड (disaccharide molecule) है, यानी दो सरल शर्करा अणुओं से मिलकर बना अणु। देखा जाए तो, साधारण शकर (सुक्रोज़) भी एक डाईसेकराइड होती है और ग्लूकोज़ तथा फ्रक्टोज़ के अणुओं के जुड़ने से बनती है:
शकर = ग्लूकोज़ + फ्रक्टोज़
इसी प्रकार से दूध में उपस्थित शर्करा (लैक्टोज़) भी दो शर्करा अणुओं से जुड़कर बनी होती है:
लैक्टोज़ = ग्लूकोज़ + गैलेक्टोज़
जब हम दूध पीते हैं तो आंतों (human digestive system) में लैक्टोज़ टूटकर ग्लूकोज़ और गैलेक्टोज़ बन जाते हैं। असहिष्णुता की कहानी यहीं से शुरू होती है।
लैक्टोज़ पाचन की दिक्कत
हमारी छोटी आंत (small intestine) की भीतरी सतह पर असंख्य सूक्ष्म ऊंगली-नुमा संरचनाएं होती हैं जिन्हें विलाई कहते हैं। इन्हीं विलाई पर एक विशेष एंज़ाइम काम करता है लैक्टेज़ (lactase enzyme)। लैक्टेज़ ही वह सूक्ष्म रसायन है जिस पर दूध, खासकर लैक्टोज़, पचाने की पूरी ज़िम्मेदारी टिकी है।
लैक्टेज़ दरअसल लैक्टोज़ के दोनों अणुओं के बीच की रासायनिक कड़ी को तोड़ता है, जिससे ग्लूकोज़ और गैलेक्टोज़ अलग-अलग हो जाते हैं। ये दोनों सरल शर्कराएं आसानी से रक्तप्रवाह में अवशोषित होकर शरीर को ऊर्जा देती हैं।
यदि लैक्टेज़ पर्याप्त मात्रा में है तो लेक्टोज़ टूटता है, दूध पचता है, ऊर्जा मिलती है, सब सुचारू चलता है। यदि लैक्टेज़ पर्याप्त मात्रा में नहीं है तो कहानी बदल जाती है।
अपचित लैक्टोज़ जब छोटी आंत से आगे बड़ी आंत (large intestine) में पहुंचता है, तो वहां रहने वाले अरबों जीवाणु, जिन्हें सामूहिक रूप से आंतों का माइक्रोबायोटा (gut microbiota) कहते हैं, इसे अपने भोजन के रूप में ‘किण्वित’ (bacterial fermentation) करने लगते हैं।
यह किण्वन क्रिया कई उत्पाद बनाती है – हाइड्रोजन गैस, कार्बन डाईऑक्साइड, और कभी-कभी मीथेन भी। साथ ही, लैक्टोज़ आंत में पानी को अपनी ओर खींचता है, जिससे दस्त की स्थिति diarrhea symptoms) बन सकती है। महत्वपूर्ण बात यह है कि समस्या दूध में नहीं, बल्कि उसे पचाने की हमारी घटी हुई क्षमता में है।
ऐसा क्यों होता है?
मनुष्य, गाय, बकरी, हाथी वगैरह सभी स्तनधारी जीव (mammals) जन्म के बाद मां के दूध पर निर्भर रहते हैं। इसलिए प्रकृति ने शिशु को लैक्टेज़ का भरपूर उत्पादन करने की क्षमता दी है।
लेकिन जैसे-जैसे बच्चा ठोस आहार ग्रहण करने लगता है और दूध (animal milk nutrition) उसके जीवन का एकमात्र ऊर्जा-स्रोत नहीं रहता, शरीर लैक्टेज़ बनाने के लिए ज़िम्मेदार जीन (LCT) की सक्रियता को धीरे-धीरे कम करने लगता है। यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि एक स्वाभाविक, सुनियोजित जैविक प्रक्रिया है।
एक अनोखा मोड़
लगभग दस हज़ार वर्ष पहले, जब युरोप, अरब और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में पशुपालन और डेयरी संस्कृति का उदय हुआ, तो एक जेनेटिक उत्परिवर्तन हुआ जिसने प्रकृति की ‘लॉटरी’ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
जिन व्यक्तियों में यह उत्परिवर्तन था, उनके शरीर में वयस्क होने पर भी लैक्टेज़ बनता रहा। वे बड़े होने पर दूध पीते रह सकते थे और उन्हें पशुओं के दूध से अतिरिक्त कैलोरी, प्रोटीन और कैल्शियम मिलता था। यह अकाल और कठिन परिस्थितियों में उनके जीवित रहने में सहायक था। इस अतिरिक्त पोषण स्रोत ने इन व्यक्तियों को अधिक संतानें पैदा करने की संभावना दी, और यह जीन पीढ़ी-दर-पीढ़ी फैलता गया। इस परिघटना को लैक्टेज़ पर्सिस्टेंस (lactase persistence) या लैक्टोज़ सहिष्णुता कहते हैं।
लैक्टोज़ असहिष्णुता के प्रकार
प्राथमिक लैक्टोज़ असहिष्णुता (primary lactose intolerance): सबसे सामान्य प्रकार। उम्र के साथ LCT जीन की सक्रियता स्वाभाविक रूप से घटती है। यह जेनेटिक रूप से निर्धारित होती है और स्थायी होती है।
द्वितीयक लैक्टोज़ असहिष्णुता (secondary lactose intolerance): किसी संक्रमण, सीलिएक रोग, क्रोह्न रोग, या आंत की सूजन के कारण लैक्टेज़ उत्पादन अस्थायी रूप से कम हो जाता है। मूल रोग के उपचार के बाद यह प्राय: ठीक हो सकता है।
जन्मजात लैक्टोज़ असहिष्णुता (congenital lactose intolerance): यह अत्यंत दुर्लभ है। शिशु जन्म से ही लैक्टेज़ एंज़ाइम नहीं बना पाता। मां का दूध भी पच नहीं पाता, इसलिए इसमें तत्काल चिकित्सकीय हस्तक्षेप (medical treatment) आवश्यक होता है।
लैक्टोज़ असहिष्णुता का अर्थ जीवनभर दूध का पूर्ण परित्याग (dairy avoidance) नहीं है। कई व्यावहारिक रास्ते खुले हैं, जैसे:
– लैक्टोज़-मुक्त दूध (lactose free milk) और दुग्ध उत्पादों का उपयोग करें।
– दही और पनीर (fermented dairy products) अक्सर पच जाते हैं।
– डेयरी-उत्पाद खाने से पहले लैक्टेज़ एंज़ाइम सप्लीमेंट (lactase supplements) लें। थोड़ी मात्रा से शुरू करें और धीरे-धीरे असर जांचें।
– किसी भी परिवर्तन से पहले चिकित्सक से परामर्श (medical consultation) अवश्य लें।
यहां एक महत्वपूर्ण चेतावनी भी है: दूध और डेयरी उत्पाद कैल्शियम और विटामिन डी के प्रमुख स्रोत हैं। इन्हें बिना उचित विकल्पों के छोड़ना हड्डियों को प्रभावित कर सकता है, विशेषकर बच्चों और महिलाओं में।
लैक्टोज़ असहिष्णुता के आंकड़ों global lactose intolerance statistics) से यह आश्चर्यजनक तथ्य सामने आता है कि दुनिया की लगभग 60–70 प्रतिशत वयस्क आबादी इसी अवस्था में है। तो फिर प्रश्न यह है कि क्या दूध न पचना असामान्य है, या वयस्क होने पर भी दूध पचना एक विशेष जेनेटिक अपवाद (genetic exception) है?
विज्ञान का उत्तर स्पष्ट है: दूध न पचना जैविक रूप से सामान्य है। जैव विकास (evolutionary biology) की दृष्टि से देखें तो लैक्टेज़ पर्सिस्टेंस यानी वयस्कावस्था में भी लैक्टोज़ पचाने की क्षमता वास्तव में एक अपवाद है।
यह हमें यह भी याद दिलाता है कि ‘सामान्य’ की परिभाषा अक्सर हमारी सांस्कृतिक (cultural diet habits) और भौगोलिक पृष्ठभूमि (geographical food patterns) से आकार लेती है, विज्ञान से नहीं।
अंत में
दूध से दूरी बनाने की ज़रूरत शरीर की जैविक विविधता (human biological diversity) का एक ईमानदार संकेत है। हमारा शरीर समय के साथ बदलता है; जो शिशु अवस्था में सहज था, वह वयस्क होने पर बदल सकता है। एक व्यक्ति के लिए स्वाभाविक, दूसरे के लिए असहज हो सकता है। शरीर कोई एक स्थिर मशीन नहीं, बल्कि एक बदलती हुई जैविक कहानी (human biology) है — और हर कहानी का अपना स्वाद है। (स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://charlestongi.com/wp-content/uploads/2024/03/CGI_IgnoreLactoseIntolerance.jpg
आम तौर पर कोशिकाओं (cells) के बारे में बताया जाता है कि उनमें एक कोशिका झिल्ली होती है, पादप कोशिकाओं में कोशिका भित्ती होती है, एक केंद्रक होता है, माइटोकॉण्ड्रिया होते हैं, रिक्तिकाएं (vacuoles) होती हैं। लेकिन कोशिकाओं में हज़ारों की संख्या में एक ऐसा उपांग होता है जिसके बारे में ज़्यादा मालूमात नहीं हैं।
इन उपांगों को वॉल्ट (तिज़ोरी-vault) कहते हैं और इनकी खोज कैलिफोर्निया विश्वविद्यालय, लॉस एंजेल्स (UCLA research) के जीव वैज्ञानिक लियोनार्ड रोम और नैन्सी केडेर्शा ने 1986 में की थी। तभी से वे इनकी गुत्थी सुलझाने की जद्दोजहद कर रहे हैं। बहरहाल, रहस्य बरकरार है लेकिन इनका एक उपयोग खोज लिया गया है।
वॉल्ट्स मनुष्यों सहित अधिकांश यूकेरियोटिक (केंद्रक-युक्त) कोशिकाओं (eukaryotic cells) के कोशिका द्रव्य में पाए जाने वाले खोखले, बैरल के आकार के राइबोन्यूक्लिक प्रोटीन कण होते हैं। ये कोशिकाओं में पाए जाने वाले सबसे बड़े कणों में से हैं (70 नैनोमीटर)। इनका आवरण मेजर वॉल्ट प्रोटीन (MVP) से बना होता है और अंदर छोटे वॉल्ट आरएनए (vault RNA) सहित तीन प्रोटीन होते हैं। एक औसत मानव कोशिका में लगभग 10,000 से 1,00,000 वॉल्ट्स होते हैं, विशेष रूप से मैक्रोफेज (macrophage immune cells) जैसी प्रतिरक्षा कोशिकाओं में। ये मुख्य रूप से कोशिका द्रव्य में और कोशिका कंकाल से जुड़े पाए जाते हैं और साथ ही नाभिकीय छिद्र (nuclear pore complex) पर भी पाए जा सकते हैं।
कोशिकाओं में क्या चल रहा है यह पता लगाने के लिए वैज्ञानिक आम तौर पर या तो किसी कोशिका में किसी क्षण पाए गए प्रोटीन्स (प्रोटियोम) का अध्ययन करते हैं या किसी कोशिका में पाए गए आरएनए अणुओं (ट्रांसक्रिप्टोम – transcriptome) का अध्ययन करते हैं। प्रोटीन्स कोशिका की क्रिया के प्रमुख उत्पाद होते हैं और इन्हें देखकर बताया जा सकता है कि उस समय किसी कोशिका में क्या-क्या क्रियाएं हुई हैं। दूसरी ओर, आरएनए (RNA molecules) वह अणु होता है जिसके आधार पर प्रोटीन्स बनते हैं। केंद्रक में मौजूद डीएनए (DNA genetic information) के रूप में इस बात की समस्त सूचना होती है कि किसी कोशिका में कौन-कौन से प्रोटीन बन सकते हैं। इस डीएनए के खंड जीन्स कहलाते हैं। ज़रूरत के अनुसार इन जीन्स के अनुलेख बनाए जाते हैं। ये अनुलेख आरएनए के रूप में होते हैं और यही कोशिका द्रव्य में जाकर सम्बंधित प्रोटीन का निर्माण करवाते हैं। तो किसी कोशिका के समस्त आरएनए का विश्लेषण करके यह बताया जा सकता है कि उसमें किन प्रोटीन्स का निर्माण हो रहा है या हाल ही में हुआ है। इस विश्लेषण को ट्रांसक्रिप्टोम विश्लेषण (transcriptome profiling) कहते हैं।
इस मामले में दिक्कत यह है कि आरएनए अत्यंत अस्थिर अणु (unstable RNA molecules) होता है और सम्बंधित प्रोटीन बनवाने का काम पूरा होने के बाद जल्द ही (मिनटों में) नष्ट हो जाता है। तो ट्रांसक्रिप्टोम विश्लेषण से आपको कुछ समय पहले की गतिविधियों की जानकारी नहीं मिल सकती। यहीं पर वॉल्ट्स (vault nanoparticles) का पदार्पण हुआ।
ब्रॉड इंस्टीट्यूट के जैव-चिकित्सा इंजीनियर फाइ चेन यह जानना चाहते थे कि किसी कोशिका में पिछले कुछ दिनों में कौन-कौन से जीन्स प्रोटीन निर्माण में सक्रिय रहे हैं। विचार यह था कि संदेशवाहक आरएनए (m-RNA, जो प्रोटीन बनवाते हैं) (messenger RNA – mRNA) को कैद कर लिया जाए, ताकि बाद में पता लगाया जा सके कि पिछले कुछ दिनों में कौन-कौन से जीन्स से m-RNA बने थे।
पहला विचार यह आया कि इसके लिए पोली (A) बाइंडिंग प्रोटीन (PABP) की मदद ली जाए। यह वह प्रोटीन है जिसे स्वाभाविक रूप से m-RNA के एक सिरे पर जोड़ा जाता है और यह m-RNA की हिफाज़त करता है। कोशिश यह थी कि इस प्रोटीन (PABP) को किसी अन्य टिकाऊ अणु से जोड़ दिया जाए। जब यह संकुल m-RNA से जुड़ेगा तो m-RNA संरक्षित रहेगा जिसे बाद में देखा जा सकेगा।
इसके लिए सर्वप्रथम उन्होंने PABP को एक बैक्टीरिया प्रोटीन से जोड़ा। मगर इससे काम नहीं बना। तब सुझाव मिला कि इस काम के लिए रहस्यमयी वॉल्ट्स (vault nanostructures) की मदद ली जाए। अंदर से तो वॉल्ट्स खोखले होते हैं। m-RNA को वॉल्ट के अंदर पहुंचाने के लिए टीम ने यह रणनीति अपनाई कि PABP के जीन को MVP से जुड़ने वाले अंदरुनी प्रोटीन के जीन से संलग्न कर दिया।
जैसा कि हमने देखा ये वॉल्ट प्रोटीन की तीन परतों से घिरे होते हैं। सबसे ऊपर होता है मेजर वॉल्ट प्रोटीन (major vault protein – MVP)और अंदर दो छोटे वॉल्ट प्रोटीन के अस्तर होते हैं। अलबत्ता, बाहरी आवरण गतिशील होता है और इसमें समय-समय पर छिद्र खुलते हैं। इन्हीं छिद्रों से होकर छोटे अणु (small biomolecules) अंदर जा सकते हैं।
वॉल्ट के आवरण में अंदर घुसने के लिए बाहर से आने वाले प्रोटीन या अन्य अणुओं को आवरण के वॉल्ट पोली (एडीपी राइबोस) पोलीमरेज़ प्रोटीन (VPARP) से जुड़ना होता है। यह एक संकेत के रूप में काम करता है। जब कोई प्रोटीन या अन्य अणु इससे जुड़ जाता है तो उसे वॉल्ट के अंदर प्रवेश मिल जाता है।
शोधकर्ता इसी मार्ग का उपयोग करके मनचाहे अणु को वॉल्ट के अंदर पहुंचाते हैं। इसके लिए MVP प्रोटीन पर ऐसे स्थल तैयार किए जाते हैं जो मनचाहे अणु से जुड़ सकें।
इस परिवर्तित PABP जीन को कोशिका में जोड़ दिया गया और साथ में MVP जीन की अतिरिक्त प्रतियां भी डाल दी गईं। हुआ यह कि इस परिवर्तित PABP ने m-RNA को पकड़ा (जो वह सामान्य तौर पर भी करता है) (gene expression signal) और उसे वॉल्ट के अंदर पहुंचा दिया। इसके बाद टीम ने यह किया कि वॉल्ट्स को रासायनिक विधि से खोला और वहां मौजूद m-RNA का क्षार अनुक्रम (RNA sequencing) पता किया। इससे यह पता चल सका कि वहां उपस्थित m-RNA अणुओं की उत्पत्ति किन जीन्स (gene origin analysis) से हुई है।
यानी इस विधि में m-RNA अणुओं को वॉल्ट में कैद कर लिया जाता है जहां ये काफी समय तक (लगभग 7 दिन तक) सुरक्षित रहते हैं। कोशिकाओं को गर्मी या कम ऑक्सीजन (hypoxia conditions) जैसी परिस्थितियां में उनकी जेनेटिक प्रतिक्रिया देखकर इस विधि की जांच की गई। टीम ने इन वॉल्ट्स का उपयोग करके उन जीन्स का पता भी लगाया जो फेफड़े के कुछ कैंसर (lung cancer research) को स्वीकृत औषधियों का प्रतिरोध करने में मदद करते हैं। m-RNA रिकॉर्ड करने वाले वॉल्ट्स को उन्होंने कैंसर कोशिकाओं में डाला और फिर उन कोशिकाओं को औषधि के संपर्क में रखा। टीम यह चिंहित कर पाई कि कौन से सुरक्षात्मक जीन्स थे जो उपचार से पहले ही सक्रिय थे। पहले के अध्ययनों में सिर्फ उन्हीं जीन्स की पहचान की गई थी जो उपचार की प्रतिक्रिया स्वरूप सक्रिय होते हैं। जब टीम ने इस नए चिंहित जीन को लक्ष्य करने वाली दवा भी जोड़ दी तो प्रथम उपचार की प्रतिरोधी अधिकांश कोशिकाएं मारी गई।
इसे टीम ने टाइम-वॉल्ट या टाइम कैप्सूल (time vault technology) भी कहा है। कुछ लोग इसे आणविक सेल्फी भी कह रहे हैं। इसके चिकित्सा में कई उपयोग सोचे जा रहे हैं। वैसे चेन यह देखने की कोशिश कर रहे हैं कि क्या यह विधि एक-एक कोशिका के स्तर काम करेगी जिसकी मदद से यह पता लगाया जा सकेगा कि किसी कोशिका में पिछले कुछ दिनों में कौन-कौन से जीन सक्रिय (gene activity tracking) रहे हैं।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.science.org/do/10.1126/science.ztb5avv/full/_20260115_on_vaults.jpg
स्कॉच टेप (Scotch Tape) क्या है? एक पतली प्लास्टिक का लंबा फीता जिसकी एक सतह पर चिपकू गोंद (adhesive glue) होती है, जिसे एक गोले पर सलीके से लपेटा होता है। (कुछ किस्म के टेप में कागज़ या कपड़े के फीते होते हैं।) जब गोले से टेप निकालते हैं, तो अक्सर यह होता है कि शुरुआत में तो टेप ठीक से निकलता है, लेकिन फिर हल्का-सा अटककर निकलता है, और इसी के साथ आती है चर्रर्ररर-चर्रर्ररर की आवाज़। खासकर एक साथ लंबा टेप निकालते समय आपने ज़रूर यह आवाज़ सुनी होगी। लेकिन क्या आपने कभी यह सोचा कि यह आवाज़ आती क्यों है? चलिए आपने सोचा हो या नहीं, लेकिन वैज्ञानिकों ने ज़रूर इस बारे में सोचा और इसका कारण पता करने में जुट गए।
2010 में किंग अब्दुल्ला युनिवर्सिटी ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी (KAUST University) के भौतिकशास्त्री सिगुरदुर थोरोडसन ने उच्च क्षमता वाले कैमरों (high-speed cameras) की मदद टेप निकालने की बारीक से बारीक हरकत को रिकॉर्ड किया था। तब उन्होंने पाया था कि जब टेप आसानी से निकलता हुआ दिखता है, तब भी बहुत सूक्ष्म स्तर पर अटक-अटक कर निकलता है जो पता नहीं चलता। इसे उन्होंने स्लिप-स्टिक मोशन (फिसलना-चिपकना – slip-stick motion) कहा था।
इसके अलावा, उन्होंने पाया था कि टेप निकालने में जब सूक्ष्म स्तर पर (अगोचर) अटकाव होता है तब स्लिप फेज़ (फिसलने- slip phase) के दौरान टेप की चिपकू सतह (adhesive surface) पर महीन दरारें बन जाती हैं। ये दरारें टेप खींचने की दिशा के लंबवत बनती हैं। ये टेप निकालते समय टेप पर लकीरें बनी दिखती हैं।
अनुमान था कि चर्रर्ररर की आवाज़ इन दरारों के आगे वाली किनोर से आती है। इसे जांचने के लिए उन्होंने टेप की चिपकू सतह पर बनी दरारों (micro cracks) और टेप निकालते समय आसपास की हवा में उत्पन्न तरंगों (sound waves) को रिकॉर्ड करने का सेटअप जमाया।
उन्होंने दो सेंटीमीटर मोटी कांच की पट्टी (glass plate experiment) पर टेप चिपकाया। इस पट्टी के नीचे की ओर से एक हाई-स्पीड कैमरा (high-speed imaging) निकाले जा रहे टेप की हरकत रिकॉर्ड कर रहा था। और, टेप की चौड़ाई के दो किनारों पर लगे माइक्रोफोन (sensitive microphones) टेप निकालने से उत्पन्न आवाज़ें रिकॉर्ड कर रहे थे। दोनों तरह की रिकॉर्डिंग के विश्लेषण से पता चला कि दरारें टेप के एक किनारे से शुरू होकर टेप की चौड़ाई में फैलती हैं, और अक्सर कई दरारें तेज़ी से एक के बाद एक, एक ही दिशा में फैलती चली जाती हैं। शोधकर्ताओं को अगले किनारे पर इस हरकत से उत्पन्न कोई तरंगें नहीं दिखी। यानी, उनका पूर्वानुमान गलत निकला। लेकिन, जब दरारें फैलकर टेप के दूसरे छोर पर पहुंचीं, तो माइक्रोफोन ने हवा में तीव्र तरंग रिकॉर्ड कीं।
फिज़िकल रिव्यू ई (Physical Review E journal)में शोधकर्ताओं ने बताया कि दरारें सुपरसोनिक गति से चलती हैं – यानी, ध्वनि की गति से भी तेज़। इतनी तेज़ गति चर्रर्ररर की आवाज़ पैदा करने में अहम भूमिका निभाती है।
होता यह है कि जैसे ही टेप की चिपकू सतह (adhesive layer) पर दरार बनने की शुरुआत होती है वहां निर्वात (vacuum formation) बनता जाता है। हवा दरार से बने निर्वात को भरने के लिए घुसती है। लेकिन, चूंकि दरार के फैलने की गति ध्वनि से भी तेज़ होती है, हवा पूरे निर्वात को तुरंत नहीं भर पाती। इसलिए दरार के टेप के दूसरे छोर तक पहुंचने तक कम दबाव (low pressure zone) बना रहता है, और अंतत: दूसरे छोर पर पहुंचने के बाद खत्म होता है। यानी हम जो चर्रर्ररर की आवाज़ सुनते हैं ये कम दबाव की रेखाओं के दूसरे छोर पर पहुंचकर हवा से भर जाने के कारण आती है।
उम्मीद है टेप निकालने की यांत्रिकी (peeling mechanics) और ध्वनिकी (acoustics research) को बेहतर ढंग से समझकर टेप निकालने की आवाज़ को कम किया जा सकेगा। हो सकता है टेप निकालने की यह आवाज़ हम-आपको इतना परेशान न करती हो, क्योंकि हमारा टेप चिपकाने-निकालने से इतना वास्ता नहीं पड़ता। लेकिन जो लोग पैकेजिंग का काम करते हैं उन्हें शायद लगातार टेप की चर्रर्ररर की आवाज़ आती रहती हो जो उन्हें परेशान करती हो। बहरहाल, इस शोध का विषय इगनोबल (Ig Nobel Prize) के लिए भी उम्मीदवार लगता है।(स्रोत फीचर्स)
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जाड़े का मौसम तो चला गया है लेकिन जाते-जाते एक सवाल का जवाब मिल गया है: कुछ लोगों को ठंड कम क्यों लगती है? इसका कारण है हमारे शरीर की बनावट, अनुकूलन की क्षमता (cold adaptation) और हमें मिले वंशानुगत गुण (genetic factors)।
युनिवर्सिटी ऑफ ओटावा के जीवविज्ञानी फ्रांस्वा हेमन के अनुसार, इंसान का शरीर नैसर्गिक रूप से बहुत ज़्यादा ठंड सहने में माहिर नहीं है। हम आसानी से शरीर की गर्मी गंवा देते हैं। फिर भी हर व्यक्ति को ठंड अलग-अलग तरह से महसूस होती है। और, इसमें हमारी जीवनशैली व जैविक बनावट (human physiology), दोनों की अहम भूमिका होती है।
ठंड सहने में एक भूमिका अनुकूलन की भी होती है। जो लोग गर्म इलाकों से ठंडे स्थानों पर जाते हैं, उन्हें शुरुआत में ज़्यादा दिक्कत होती है। लेकिन लगातार उस स्थान पर रहने से धीरे-धीरे शरीर ठंड के मुताबिक खुद को ढाल लेता है। इस प्रक्रिया को अनुकूलन (climate acclimatization) कहते हैं।
शरीर का आकार भी मायने रखता है। छरहरे शरीर या छोटे कद वाले लोग जल्दी गर्मी गंवाते हैं, जबकि बड़े डील-डौल वाले लोग गर्मी देर तक सहेज पाते हैं। खासकर मांसपेशियां (muscle mass) बहुत महत्वपूर्ण होती हैं, क्योंकि वे काम करते समय गर्मी पैदा करती हैं। इसलिए जिन लोगों की मांसपेशियां ज़्यादा होती हैं, वे अंदर से अधिक गर्मी (heat generation in body)बनाते हैं। ठंड से बचाव के मामले में मांसपेशियां शरीर की सबसे मज़बूत ढालों में से एक हैं।
लेकिन, सिर्फ शरीर का आकार ही पूरी कहानी नहीं है। आर्कटिक जैसे बेहद ठंडे इलाकों में रहने वाले कुछ समुदाय (जैसे ग्रीनलैंड के इनुइट लोग) अपेक्षाकृत छोटे कद के बावजूद कड़ाके की ठंड आसानी से सह लेते हैं। शोध में पाया गया है कि कुछ लोगों के जीन ऐसे होते हैं जो ‘भूरी वसा’ (brown fat tissue) नाम की खास वसा के विकास से जुड़े हैं। यह वसा शरीर में गर्मी पैदा करने में मदद करती है। इसके अलावा, जीन यह भी तय करते हैं कि शरीर में चर्बी कैसे वितरित होगी और मांसपेशियां कैसे काम करेंगी। इन कारणों से कुछ लोग अपने शरीर का अंदरूनी तापमान दूसरों की तुलना में बेहतर तरीके से बनाए (genetic adaptation) रख पाते हैं।
जीन इस बात को भी प्रभावित कर सकते हैं कि ठंड में हमारी रक्त वाहिकाएं (blood vessels response) कैसे प्रतिक्रिया देती हैं। जब मौसम बहुत ठंडा होता है, तो त्वचा और हाथ-पैरों की ओर बहने वाला खून कम हो जाता है, ताकि हृदय और दूसरे ज़रूरी अंगों के आसपास गर्मी बनी रहे। इसी कारण उंगलियां और पैर ज़्यादा ठंडे महसूस होते हैं, लेकिन इससे शरीर का केंद्रीय तापमान सुरक्षित रहता है। कुछ लोगों में जीन इस प्रक्रिया को और बेहतर तरीके से नियंत्रित (blood circulation in cold) करने में मदद करते हैं।
कुल मिलाकर, ठंड लगना कई कारणों से तय होता है। इसमें डील-डौल, अनुकूलन क्षमता और जेनेटिक्स (human genetics) तीनों मिलकर असर डालते हैं।(स्रोतफीचर्स)
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अमेरिकी लेखक और एक्टिविस्ट हेलन केलर (Helen Keller) इंसानी क्षमता और संभावना की एक अंतर्राष्ट्रीय मिसाल हैं। बहरेपन और अंधेपन से ग्रसित हेलन केलर ने लिखा था, “आशावाद (inspirational mindset) वह विश्वास है जो कामयाबी की ओर ले जाता है। उम्मीद और भरोसे के बिना कुछ भी नहीं किया जा सकता।”
आशावाद को भविष्य में अच्छा और हितकर होने की सकारात्मक उम्मीद रखने के रूप में समझा जा सकता है। यह एक इंसानी खूबी है जिसे बेहतर सेहत और बेहतर ज़िंदगी से भी जोड़ कर देखा जाता है। आशावाद तय करता है कि हम भविष्य को कैसे देखते-सोचते हैं। यह एक मॉड्युलेटर की तरह काम करता है जो सकारात्मक संभावनाओं को थोड़ा बढ़ा-चढ़ा देता है और नकारात्मक विचारों और ख्यालों को दूर रखता है। इस्राइली-ब्रिटिश तंत्रिका विज्ञानी ताली शारोट (Tali Sharot neuroscientist) का अनुमान है कि लगभग 80 प्रतिशत मनुष्य आशावादी हैं, लेकिन अधिकतर लोग ‘थोड़े ही’ आशावादी होते हैं।
यह कहा जा सकता है कि आशावाद वास्तविकता से अलग, एकतरफा सोच दिखाता है। जैव-विकास (evolutionary biology) ऐसी खूबी को क्यों तरजीह देगा जो आपको पूरी तरह निष्पक्ष रखने की बजाय एकतरफा ढंग से पूर्वाग्रह से लैस करे? वैज्ञानिकों के बीच आम राय यह है कि आशावाद की बदौलत अनुकूलन (adaptive advantage) काफी ज़्यादा होता है, अर्थात आशावाद किसी जीव की उत्तरजीविता (survival benefit) को बढ़ाता है।
कल्पना कीजिए कई हज़ार साल पहले कोई महिला जिस तरह रहती थी। मान लीजिए वह एक गुफा के अंदर रहती है और उस समय उस क्षेत्र में सूखा पड़ रहा है। अगर वह बाहर भोजन (कोई खरगोश या फल से लदी झाड़ी) मिलने की संभाविता निकालकर निर्णय करे, तो शायद ही भोजन की तलाश में बाहर जाए। ऐसे में निष्क्रिय रहना उसके लिए सही चुनाव रहता, क्योंकि इससे यहां-वहां भटकने में खर्च होने वाली ऊर्जा बचती। दूसरी ओर, (कुछ-न-कुछ मिल जाने की) उम्मीद उसे भोजन की तलाश के लिए बाहर निकलने की हिम्मत दे सकती है। बाहर कुछ-न-कुछ भोजन मिल जाने की संभावना ज़्यादा मानकर, उसके पास कोशिश करने की ज़्यादा संभावना होगी। किसी एक तरफ यह थोड़ा अधिक झुकाव उसे कोशिश करने के लिए बढ़ावा (risk taking behavior) देता है, जिससे उसके जीने की संभावना बढ़ जाती है।
हालांकि, इसकी भी एक सीमा है कि आप कितने आशावादी होकर इससे फायदा उठा सकते हैं। फायदे के लिए जो तरीका सबसे अच्छा काम करता है वह है एक सामान्य सकारात्मक सोच रखना, जिसे आशावादी स्वभाव कहा जाता है। असल ज़िंदगी में कुछ बुरा होने पर किसी निराशावादी व्यक्ति की प्रतिक्रिया होगी “मैं जानता था, ऐसा ही होगा”। जबकि आशावादी लोग कहेंगे “कल बेहतर होगा”।
वर्ष 2007 में नेचर पत्रिका में प्रकाशित अध्ययन (Nature journal research)के अनुसार यह लचीलापन ‘आशावादी पूर्वाग्रह (ऑप्टिमिज़्म बायस)’ से बना रहता है, जो मस्तिष्क में सूचनाओं की प्रोसेसिंग में गैर-बराबरी का परिणाम है: मस्तिष्क द्वारा अच्छी बातों को ज़्यादा अहमियत दी जाती है और बुरी बातों को कम।
मस्तिष्क के अग्र और मध्य भाग का एक क्षेत्र है रोस्ट्रल एंटीरियर सिंगुलेट कॉर्टेक्स (rACC)। जब आशावादी लोग अच्छे और सुखद भविष्य की कल्पना करते हैं तब यह क्षेत्र बहुत सक्रिय होता है। इस हिस्से में अधिक सक्रिय न्यूरॉन अच्छी संभावनाओं की एन्कोडिंग को आसान बनाते हैं। इसके विपरीत, नकारात्मक जानकारियों पर rACC कम प्रतिक्रिया देता है, परिणामस्वरूप असफलताओं का व्यक्ति की भविष्य की उम्मीदों पर कम असर पड़ता है।
रिवाइज़्ड लाइफ ओरिएंटेशन टेस्ट (Life Orientation Test) एक छोटा-सा परीक्षण है जिसका इस्तेमाल यह मापने के लिए किया जाता है कि किसी व्यक्ति में आशावादिता है या नहीं। इसमें स्थिति आधारित 10 वक्तव्य होते हैं जिन्हें आपको 0 से 4 के बीच अंक देने होते हैं (‘पूरी तरह असहमत’ के लिए 0 से ‘पूरी तरह सहमत’ के लिए 4 तक)। मसलन, ऐसे वक्तव्य होते हैं: “कठिन परिस्थितियों में, अमूमन मैं अच्छे की उम्मीद रखता हूं” और “यदि कुछ बुरा होना है, तो होकर रहेगा।” (psychological assessment)।
जिन लोगों में आशावादिता अधिक होती है, उनका हृदय अधिक स्वस्थ (heart health benefits)पाया गया है। बुज़ुर्गों में, आशावादी स्वभाव को न्यूरॉन्स का सुरक्षा कवच माना जाता है, जो मस्तिष्क को बुढ़ापे की मार से बचाता है। वर्ष 2024 में एजिंगएंडडिसीज़ जर्नल (Aging and Disease journal study) में प्रकाशित नतीजों के अनुसार ब्रेन-डेराइव्ड न्यूरोट्रॉफिक फैक्टर (BDNF) का उच्च स्तर बुढ़ापे में लचीलापन बढ़ाता है। बुढ़ाने के कारण भले ही कुछ न्यूरॉन्स खत्म होते जाते हैं, लेकिन BDNF बचे हुए न्यूरॉन्स को ज़्यादा असरदार तरीके से एक-दूसरे से जोड़ने में मदद करता है, जिससे व्यक्ति की इंद्रियां चाक-चौबंद रहती हैं और दिमाग समझदार बना रहता है। (स्रोतफीचर्स)
देखें कि यहां दिए गए वक्तव्यों से आप कितना सहमत हैं? सहमति की गंभीरता के अनुसार आपको इन वक्तव्यों को अंक देना है।
वक्तव्य
कठिन परिस्थितियों में, अमूमन मैं अच्छे की उम्मीद रखता/ती हूं।
मुश्किलों या चिंता को भूलना/हावी न होने देना मेरे लिए आसान है।
यदि मेरे साथ कुछ बुरा होना है तो वह होकर रहेगा।
मैं अपने भविष्य को लेकर हमेशा सकारात्मक रहता/ती हूं।
मुझे अपने दोस्तों के साथ बहुत मज़ा आता है।
मेरे लिए व्यस्त रहना ज़रूरी है।
मुझे शायद ही कभी लगता है कि चीज़ें मेरे हिसाब से/अच्छे के लिए होंगी।
मैं बहुत जल्दी परेशान नहीं होता/ती।
मेरे साथ शायद ही कभी अच्छा हुआ है।
कुल मिलाकर, मुझे लगता है कि मेरे साथ बुरी चीज़ों की तुलना में अच्छी चीज़ें अधिक होंगी।
नोट: अंक ईमानदारी से दें। कोशिश करें कि किसी एक सवाल का जवाब, दूसरे सवाल के जवाब को ध्यान में रखकर न दिया जाए। जवाब वे चुनें जो आप पर लागू होते हों, न कि आदर्श जवाब हों या दूसरों को ध्यान में रखकर चुनें हों। ध्यान रहे यहां कोई भी जवाब सही या गलत नहीं हैं।
अंककैसेदें?
ध्यान दें: स्कोर के लिए केवल कथन क्रमांक 1, 3, 4, 7, 9, 10 नंबर के सवालों अंकों को जोड़ा जाता है। वक्तव्य क्रमांक 2, 5, 6, 8 के अंकों को नहीं जोड़ा जाता।
वक्तव्यक्रमांक 1, 2, 4, 5, 6, 8 और 10 केलिएइसतरहअंकदें।
पूरी तरह असहमत – 0 असहमत – 1 उदासीन (न असहमत, न सहमत) – 2 सहमत – 3 पूरी तरह सहमत – 4
वक्तव्यक्रमांक 3, 7 और 9 केलिएइसतरहअंकदें।
पूरी तरह सहमत – 0 सहमत – 1 उदासीन (न असहमत, न सहमत) – 2 असहमत – 3 पूरी तरह असहमत – 4
19-24 घोर आशावादी; 14-18 मध्यम आशावादी; 9-13 उदासीन; 4-8 मध्यम निराशावादी; और 0-3 घोर निराशावादी।
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://th-i.thgim.com/public/sci-tech/science/2d6p7g/article70654691.ece/alternates/LANDSCAPE_1200/pablo-guerrero-I6QTv5pjq0E-unsplash.jpg
इन दिनों अमेरिका की अदालत में एक ऐसा वैज्ञानिक सवाल सामने आया है, जिसका जवाब अभी तक स्पष्ट नहीं है। सवाल यह है कि क्या सोशल मीडिया (social media addiction debate) बच्चों और किशोरों के लिए ‘लत’ बन सकता है, और अगर उससे उन्हें मानसिक नुकसान होता है तो उसकी ज़िम्मेदारी किसकी होगी। कैलिफोर्निया में शुरू हुए इस ऐतिहासिक मुकदमे में एक युवती का कहना है कि बचपन में सोशल मीडिया का बहुत ज़्यादा इस्तेमाल करने की वजह से उसे लंबे समय तक चिंता, अवसाद और अपने शरीर को लेकर हीन भावना जैसी समस्याएं झेलनी पड़ रही हैं।
इंटरनेट कानून के विशेषज्ञ एरिक गोल्डमैन के अनुसार, जूरी को दो बेहद मुश्किल सवालों पर फैसला करना होगा। पहला, क्या सोशल मीडिया की ‘लत’ एक वास्तविकता है? और दूसरा, क्या टेक-कंपनियों को अपने प्लेटफॉर्म से होने वाले मानसिक नुकसान (tech company liability case) के लिए कानूनी रूप से ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है? उनके मुताबिक, इन सवालों के जवाब आसान नहीं होंगे, क्योंकि इन्हें लेकर वैज्ञानिकों के बीच ज़ोरदार बहस होने वाली है।
यह बात अभी वैज्ञानिक रूप से पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। नशे या जुए की ‘लत’ की तरह सोशल मीडिया की ‘लत’ को मानसिक रोगों की मानक पुस्तकों (mental disorder classification) में आधिकारिक रूप से बीमारी नहीं माना गया है। इसी वजह से शोधकर्ता इस विषय पर बहुत सावधानी से बात करते हैं। कुछ वैज्ञानिक सोशल मीडिया के लिए ‘लत’ शब्द इस्तेमाल करने में सहज हैं, लेकिन कई दूसरे वैज्ञानिक इससे असहमत हैं और कहते हैं कि इसके पक्ष में ठोस सबूत अभी पर्याप्त नहीं हैं (scientific debate)।
आम तौर पर लत का मतलब होता है किसी चीज़ को निरंतर करते रहना, उसे छोड़ने पर बेचैनी महसूस होना और साफ नुकसान दिखने के बावजूद उसका इस्तेमाल जारी रखना। कई किशोरों में सोशल मीडिया का इस्तेमाल इसी तरह आदत बन चुका है, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह तय करना अभी मुश्किल है कि इसे एक मानसिक रोग कहा जाए या सिर्फ एक संगीन खराब आदत। इसी कारण ज़्यादातर वैज्ञानिक इसे ‘समस्यामूलक सोशल मीडिया उपयोग’ (problematic social media use) कहना ज़्यादा उचित मानते हैं।
एक और बड़ी मुश्किल यह समझना है कि सोशल मीडिया और मानसिक समस्याओं के बीच सम्बंध कार्य-कारण का है या सिर्फ साथ-साथ होने वाली (correlation vs causation)बात का। जिस समय सोशल मीडिया का इस्तेमाल बढ़ा है, उसी दौरान युवाओं में चिंता और अवसाद के मामले भी बढ़े हैं। लेकिन ज़्यादातर शोध यह पक्के तौर पर साबित नहीं कर पाए हैं कि इन मानसिक समस्याओं की सीधी वजह सोशल मीडिया ही है (psychological research findings)। संभव है कि कुछ किशोर पहले से ही मानसिक रूप से संवेदनशील हों और इसी कारण वे सोशल मीडिया का ज़्यादा सहारा लेने लगते हों।
सोशल मीडिया के असर को मापने का तरीका भी बहुत अहम है। कई अध्ययनों में केवल स्क्रीन टाइम देखा जाता है, लेकिन इससे पूरी सच्चाई सामने नहीं आती। बिना सोचे-समझे लगातार स्क्रॉल करना, शारीरिक चीज़ों पर ज़ोर देने वाली सामग्री देखना या ऑनलाइन परेशान किया जाना नुकसानदेह हो सकता है, जबकि दोस्तों से जुड़ना और रचनात्मक काम करना कभी-कभी फायदेमंद भी साबित हो सकता है।
2024 में विज्ञान और चिकित्सा से जुड़ी यूएस की एक राष्ट्रीय समिति (National Academies of Sciences, Engineering, and Medicine) के अनुसार अब तक हुए शोध यह साबित नहीं करते कि सोशल मीडिया से सभी किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य को बड़े स्तर पर नुकसान हो रहा है। फिर भी कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि कुछ बच्चों और किशोरों पर इसका असर साफ तौर पर दिखाई देता है, खासकर तब जब सोशल मीडिया का इस्तेमाल बहुत ज़्यादा किया जाता है (digital wellbeing concern) ।
अब जब अदालतें इस अधूरी और अनिश्चित वैज्ञानिक जानकारी के आधार पर ज़िम्मेदारी तय करने की कोशिश कर रही हैं, तो इस मामले का फैसला यह तय कर सकता है कि समाज आगे चलकर किशोरों की डिजिटल ज़िंदगी को कैसे समझे (social media regulation policy) और उस पर कैसे नियम बनाए। फिर भी इस मुद्दे पर विभिन्न वैज्ञानिकों के विचार और वाद-विवाद काफी महत्वपूर्ण होंगे।(स्रोत फीचर्स)
नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है। Photo Credit : https://www.motleyrice.com/sites/default/files/styles/social_share/public/managed/cases/2025-02/social%20media1%20900×315%20copy.png.webp?itok=VBWulSj_