खाद्य पदार्थों का स्टार रेटिंग – सोमेश केलकर

सुप्रीम कोर्ट में एक जनहित याचिका में मांग की गई है कि सुप्रीम कोर्ट केंद्र को ऐसे दिशानिर्देश बनाने के निर्देश दे जो यह सुनिश्चित करें कि खाद्य उत्पाद के पैकेट पर सामने की ओर ‘स्वास्थ्य रेटिंग’ के साथ-साथ ‘स्वास्थ्य चेतावनी’ अंकित हो। याचिका में यह अनुरोध भी किया गया है कि डिब्बाबंद खाद्य पदार्थों और पेय पदार्थों का उत्पादन करने वाले सभी उद्योगों के लिए ‘स्वास्थ्य प्रभाव आकलन’ और ‘पर्यावरण प्रभाव आकलन’ अनिवार्य किया जाए।

याचिका में यह भी अनुरोध है कि सुप्रीम कोर्ट भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) को निर्देश दे कि वह विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा वसा, नमक और शर्करा की स्वीकार्य मात्रा सम्बंधी सिफारिशों का अध्ययन करे। इसके अलावा, FSSAI अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड के ‘स्वास्थ्य प्रभाव आकलन’ और ‘हेल्थ स्टार रेटिंग सिस्टम’ का अध्ययन करके तीन माह में प्रतिवेदन प्रस्तुत करे।

याचिका का तर्क है कि अनुच्छेद 21 स्वास्थ्य का अधिकार देता है। जबकि केंद्र और FSSAI बाज़ार में बिकने वाले खाद्य पदार्थों का ‘स्वास्थ्य प्रभाव आकलन’ नहीं करते हैं। उनके द्वारा ‘हेल्थ स्टार रेटिंग सिस्टम’ भी लागू नहीं किया गया है और इससे नागरिकों के स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचता है। याचिका उपरोक्त दो निकायों की निष्क्रियता को संविधान के अनुच्छेद 21 के खुलेआम उल्लंघन समान बताती है। याचिका इस तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहती है कि किसी भी तरह के कुपोषण से बचने के लिए और अस्वास्थ्यकर या असंतुलित आहार के कारण होने वाले गैर-संचारी रोगों को थामने के लिए स्वास्थ्यप्रद आहार आवश्यक है। स्वास्थ्यप्रद आहार कोविड-19 जैसे संक्रामक रोगों के जोखिम को भी कम करता है। और FSSAI और केंद्र की निष्क्रियता ने इस बीमारी को बढ़ाया है। हेल्थ स्टार रेटिंग सिस्टम या स्वास्थ्य प्रभाव आकलन की अनिवर्यता न होने के कारण उपभोक्ता को ऐसा खाद्य मिलता है जिसमें कैलोरी, वसा, शर्करा व नमक की अधिकता होती है और फाइबर जैसे पोषक तत्वों की कमी होती है।

ऐसे में सवाल उठता है कि हेल्थ स्टार रेटिंग सिस्टम के साथ आगे बढ़ा जाए या नहीं? क्या वाकई इसकी आवश्यकता है? और है तो क्यों? जिन देशों में यह लागू है, क्या वे देश अपने उपभोक्ताओं को पौष्टिक विकल्पों के बारे में अधिक जागरूक कर पाए हैं? या क्या नागरिकों के स्वास्थ्य की देखभाल और चिंताओं की आड़ में कुछ और ही खेल रचा जा रहा है?

पोषण लेबलिंग

चौथे राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक दस वर्षों में (2016 तक) देश में मोटापे से ग्रसित लोगों की संख्या दुगनी हो गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि 2030 तक भारत में होने वाली कुल मौतों में से 67 प्रतिशत मौतें गैर-संचारी रोगों के कारण होंगी।

पिछले दो दशकों में आहार विविधता बदली है, जिससे असंतुलित आहार के कारण गैर-संचारी रोग बढ़े हैं। हमारे वर्तमान भोजन में कैलोरी, शर्करा, ट्रांस फैटी एसिड, संतृप्त वसा, नमक आदि की अधिकता होती है। जबकि कुछ दशक पहले हमारा भोजन प्रोटीन, फाइबर, असंतृप्त वसा और कुछ अन्य आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्वों से समृद्ध होता था। भोजन में परिवर्तन के कारण देश में मोटापे की समस्या बढ़ी है। इसलिए भारत सरकार ने लगभग सभी खाद्य पदार्थों पर पोषण सम्बंधी जानकारी देना अनिवार्य किया है।

अब तक, यह जानकारी पैकेट के नीचे या पीछे की ओर एक पोषण तालिका में लिखी जाती है, जिसमें किसी खाद्य या पेय के सेवन से मिलने वाले पोषक तत्वों की लगभग मात्रा लिखी होती है। पैकेट पर एक और अनिवार्य हिस्सा है खाद्य या पेय में प्रयुक्त सामग्री की जानकारी, ताकि उपभोक्ता को पहले से यह पता हो कि जिस उत्पाद का वह सेवन कर रहा है उसमें कोई ऐसे पदार्थ तो नहीं है जिससे उसे एलर्जी है, या आस्थागत कारणों से वह उनका सेवन न करता हो – जैसे कुछ लोग प्याज़-लहसुन युक्त उत्पाद नहीं खाते।

पोषण सम्बंधी जानकारी दो तरह से दी जा सकती है;

1. लिखित तरीके से,

2. चित्र के रूप में।

वर्तमान में पोषण जानकारी लिखित तरीके से दी जाती है, जिसमें पैकेट पर एक तालिका में पोषण और प्रयुक्त सामग्री की जानकारी होती है। याचिका का सारा तर्क इसके इर्द-गिर्द है कि पोषण सम्बंधी जानकारी देने का कौन-सा तरीका बेहतर हो सकता है? यह सवाल महत्वपूर्ण है, क्योंकि उपभोक्ता अनुसंधान में पाया गया है कि लिखित जानकारी पढ़ना भ्रमित कर सकता है और उपभोक्ता अक्सर सामान खरीदते समय इन जानकारियों की अनदेखी करते हैं। और यह अनदेखी लापरवाही, निरक्षरता, पोषण सम्बंधी आवश्यकताओं के प्रति उदासीनता, भाषा से अनभिज्ञता, या जागरूकता में कमी के कारण हो सकती है।

ऐसे में, यह तर्क दिया जा सकता है कि चित्रात्मक लेबल पढ़ने में आसान होते हैं जैसे कि स्टार-रेटिंग सिस्टम। स्टार रेटिंग सिस्टम एयर कंडीशनर, माइक्रोवेव ओवन और रेफ्रिजरेटर जैसे बिजली से चलने वाले उपकरणों के लिए पहले से ही उपयोग की जा रही है। यह काफी हद तक भाषा और निरक्षरता की बाधा को दूर करती है। और उपभोक्ताओं को यह जानने का एक आसान और ‘विश्वसनीय’ तरीका देती है कि वे किस गुणवत्ता की वस्तु उपयोग कर रहे हैं।

स्टार रेटिंग सिस्टम के समर्थकों का कहना है कि यह निम्नलिखित पांच मानदंडों को पूरा करेगी;

1. दृश्यता – दृश्य लेबल इस तरह बनाया जाएगा कि उस पर लोगों की नज़र जाए, और इसके लिए स्टार रेटिंग लेबल को पैकेट के सामने छापा जाएगा।

2. बोधगम्यता – लेबल ऐसा हो कि इसे समझने में उपभोक्ताओं को भाषा या साक्षरता की बाधा न आए। ऐसा करने के लिए ट्रैफिक लाइट जैसी रंग आधारित कोडिंग प्रणाली का उपयोग की जा सकता है।

3. सूचनात्मकता – लेबल को पर्याप्त और आवश्यक जानकारी देना चाहिए। लाल, पीले, हरे रंग की प्रणाली अपनाई जा सकती है – लाल स्वास्थ्य के लिए हानिकारक, पीला सहनीय और हरा स्वास्थप्रद।

4. पठनीयता – लेबल आसानी से पढ़ने या दिखने में आना चाहिए। वर्तमान में पैकेट के पीछे जानकारी छोटे अक्षरों में या तारांकित करके दी जाती है जो उपभोक्ताओं की नज़र से बच जाती है। इस तरह जानबूझ कर छोटे टाइप या तारांकन का उपयोग निषिद्ध होना चाहिए और उल्लंघन पर दंडित किया जाना चाहिए। स्टार का आकार इतना बड़ा होना चाहिए कि ये आसानी से दिखें।

5. वैज्ञानिक परीक्षण – लेबल का परीक्षण यह जानने के लिए किया जाना चाहिए कि क्या वह उपभोक्ता को उत्पाद के बारे में निर्णय करने में मदद करता है। लेबल के लगाए जाने से पहले और लेबल व्यवस्था शुरू होने के बाद उपभोक्ता के व्यवहार का अध्ययन किया जाना चाहिए और अध्ययन के परिणामों के आधार पर उपभोक्ताओं के लिए अधिक प्रासंगिक और आकर्षक लेबल बनाने के प्रयास होने चाहिए।

खाद्य उत्पाद पर किस तरीके से पोषण जानकारी देना कारगर होगा और किस तरह से नहीं, यह तब तक नहीं कहा जा सकता जब तक कि उपभोक्ता के क्रय व्यवहार का बहुत विस्तार से अध्ययन नहीं किया जाता। इसलिए, स्टार-रेटिंग सिस्टम के समर्थकों का प्रस्ताव है कि इसकी कारगरता जांचने के लिए फॉलोअप अध्ययन भी करना चाहिए। उनका सुझाव है कि FSSAI, WHO और गैर-सरकारी संगठन मिलकर भारत के विभिन्न हिस्सों में समय-समय पर रैंडम सर्वेक्षण कर सकते हैं ताकि यह पता लगाया जा सके कि स्वास्थ्य स्टार रेटिंग प्रणाली प्रभावी है या नहीं। अगर नहीं है तो उपभोक्ताओं के लिए जागरूकता कार्यक्रम तैयार किए जा सकते हैं।

क्या हम असफल प्रणाली ला रहे हैं?

चित्रित या दृश्य पोषण लेबलिंग प्रणाली के लाभ अन्य देशों में इसके लागू होने के आधार पर गिनाए जा रहे हैं। स्टार रेटिंग प्रणाली के प्रस्तावकों का कहना है कि यह प्रणाली 10 से अधिक देशों में सफल है।

लेकिन वास्तविकता निराशाजनक है। दरअसल, उपरोक्त 10 देशों में से केवल दो ही देश इस प्रणाली का पालन कर रहे हैं। ये दो देश हैं ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड। बाकी देश मानक पोषण तालिका और सामग्री की लिखित जानकारी के साथ या तो ‘ट्रैफिक-लाइट’ प्रणाली या ‘हाई अलर्ट’ प्रणाली का उपयोग करते हैं। ट्रैफिक लाइट प्रणाली में पैकेट पर लाल, पीला या हरा बिंदु या तारा होता है जो यह दर्शाता है कि कोई चीज कितनी स्वास्थ्यप्रद है या अस्वास्थ्यकर है। हाई अलर्ट प्रणाली में किसी उत्पाद में चीनी, नमक या वसा की मात्रा अधिक होने पर यह बात पैकेट पर मोटे अक्षरों में उसकी मात्रा के साथ लिखी जाती है।

और तो और, जिन दो देशों में इस प्रणाली का पालन किया जा रहा है वहां भी यह प्रणाली कारगर साबित नहीं हुई है। वैज्ञानिक अध्ययनों से पता चला है कि इस तरह के लेबल किसी विशेष वस्तु के सेवन के खतरों के बारे में लोगों को सजग नहीं करते हैं।

उदाहरण के लिए कहीं दूर जाने की ज़रूरत नहीं हैं। सिगरेट या तंबाकू उत्पादों को ही लें। सिगरेट और अन्य तंबाकू उत्पादों के बॉक्स या पैकेट पर एक बड़ा वैधानिक चेतावनी चित्र होता है, फिर भी युवा सिगरेट पीने की इच्छा करते हैं और धूम्रपान करने वाले ये चेतावनी देखने के बावजूद भी सिगरेट खरीदना और पीना जारी रखते हैं। भारत सरकार का यह विचार कि पैकेट पर चेतावनी छापने से लोग सतर्क होंगे और इन उत्पादों को नहीं खरीदेंगे, यह पहले ही विफल साबित हो चुका है।

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि स्टार रेटिंग प्रणाली के लाभ तो अस्पष्ट हैं, लेकिन यह स्पष्ट है कि FSSAI इस प्रणाली का उपयोग कंपनियों को लाभ पहुंचाने के लिए कर सकता है।

स्टार रेटिंग प्रणाली किसी खाद्य या पेय में उपस्थित वसा या शर्करा की सटीक मात्रा नहीं बताती। इस तरह, कोई कंपनी अपने अन्यथा हानिकारक उत्पाद में प्रोटीन, फाइबर या सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा बढ़ाकर (अधिक वसा, नमक और शर्करा के बावजूद) उसके लिए अच्छी रेटिंग हासिल कर लेगी।

उत्तरी कैरोलिना विश्वविद्यालय का अध्ययन बताता है कि ‘हाई अलर्ट’ प्रणाली ने उच्च कैलोरी, शर्करा, नमक, वसा आदि युक्त उत्पादों की खपत को कम किया है। इसलिए, स्वास्थ्य स्टार रेटिंग प्रणाली के बजाय हाई अलर्ट प्रणाली का उपयोग किया जाना चाहिए। क्योंकि हाई अलर्ट प्रणाली वास्तव में अस्वास्थकर पदार्थों की उपस्थिति के बारे में आगाह करती है और उनकी मात्रा बताती है। स्टार-रेटिंग प्रणाली में यह एक बड़ी खामी है।

ऑस्ट्रेलिया की स्टार रेटिंग प्रणाली के दुष्परिणामों पर अध्ययन किए गए हैं। इनमें पाया गया है कि ऑस्ट्रेलिया में 41 प्रतिशत खाद्य पदार्थों पर स्टार-रेटिंग होती है, और इसके बावजूद भी उपभोक्ता अपने द्वारा उपयोग किए जा रहे खाद्य में वसा, शर्करा, कैलोरी, नमक आदि की मात्रा से अनभिज्ञ हैं। हम दूसरों की गलतियों से सीख सकते हैं।

स्टार रेटिंग प्रणाली लागू करने से परिवर्तन की संभावना नहीं दिखती। यह प्रणाली लोगों को विश्वास दिलाएगी कि पोषण के बारे में चिंता की जा रही है, इसकी आड़ में निम्न गुणवत्ता वाले उत्पाद बेचे जाएंगे। कंपनियों पर तो भरोसा नहीं किया जा सकता कि वे अपने खरीदारों को स्वास्थ्यप्रद उत्पाद पेश करेंगी, क्योंकि उनकी रुचि तो ऐसा उत्पाद देने में है जिसकी लागत बहुत कम हो और उसे ऊंचे दामों पर बेचा जा सके।

स्टार-रेटिंग सिस्टम के अन्य नुकसान भी हैं। किस उत्पाद को कौन सी रेटिंग मिलेगी, इसका निर्धारण करने वाले बेंचमार्क में ढील या संशोधन के लिए कंपनियां सरकार को घूस भी दे सकती हैं। और यह हमारे लिए कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि हम न्यूनतम मज़दूरी को लागू करने में विफल रहे हैं, हम न्यूनतम समर्थन मूल्य को लागू करने में विफल रहे हैं और हम अनौपचारिक क्षेत्र में काम कर रहे दिहाड़ी मज़दूरों के लिए बेहतर माहौल देने में असफल रहे हैं। मानकों में हेराफेरी नहीं होगी, यह सुनिश्चित करना एक चुनौती होगी।

स्टार रेटिंग प्रणाली के कारण एक और समस्या उत्पन्न होगी। यह कंपनियों द्वारा की जा रही बेइमानी को पकड़ना मुश्किल बना देगी। उदाहरण के लिए मैगी को ही लें। एमएसजी और सीसा (लेड) की अत्यधिक मात्रा के कारण मैगी की आलोचना की गई थी। पूरे भारत से लिए गए 12 में से 10 नमूनों में सीसा की मात्रा अस्वीकार्य स्तर पर निकली थी। मैगी में सीसा और एमएसजी की अत्यधिक मात्रा की शिकायत की जा सकी क्योंकि इसकी सामग्री और पोषण की मात्रा के बारे में पारदर्शिता थी। अन्यथा इस तरह के अनाचार होते रह सकते हैं और इन पर ध्यान तब जाएगा जब लोग वास्तव में बीमार होने और मरने लगेंगे।

निष्कर्ष

भोजन एक बुनियादी ज़रूरत है। और लाभ कमाना भी कोई अपराध नहीं है। लेकिन कंपनियों को इस बारे में बहुत संवेदनशील होने की ज़रूरत है कि मुनाफा कमाने के लिए क्या स्वीकार्य है, और उपभोक्ता के स्वास्थ्य को नज़रअंदाज़ कर अपना लाभ बनाना अस्वीकार्य और अनैतिक है।

इसका समाधान कोई बीच का रास्ता हो सकता है, जिसमें दो या दो से अधिक प्रणालियों को लागू किया जाए। उत्पाद की एक नज़र में परख के लिए और कुछ हद तक भाषागत बाधा को पार करने के लिए अलग-अलग रंग वाले स्टार अंकित किए जाएं, और अगर किसी खाद्य पदार्थ में अत्यधिक मात्रा में वसा, शर्करा, नमक, कैलोरी है तो उसे बड़े और मोटे शब्दों में छापा जाए। इसके साथ ही पैकेट के पीछे पोषक तत्व और सामग्री तालिका भी दी जाए। यह प्रणाली लचीली होगी क्योंकि यह सभी तरह के उपभोक्ताओं को जानकारी देगी – स्वास्थ्य के प्रति जागरूक उपभोक्ता पोषण चार्ट और अवयव देखकर उत्पाद चुन सकता है, निरक्षर या उस भाषा से अनजान व्यक्ति स्टार देखकर।

अलबत्ता, यह एक बड़ी समस्या का शॉर्ट-कट समाधान है। शिक्षा में कमी, स्वस्थ रहने के लिए हमारी संस्कृति में प्रोत्साहन की कमी, उपभोक्ता जागरूकता की कमी, उपभोक्ता अधिकारों के बारे में जागरूकता की कमी और इस तरह की नीतियों पर सरकार के फैसलों पर सवाल उठाने की इच्छा की कमी। ये समस्याएं लंबे समय से हमारे साथ हैं। और सरकार को अच्छी शिक्षा के माध्यम से तर्क करने वाले नागरिक बनाने में कोई रुचि नहीं है क्योंकि जो नागरिक सवाल नहीं करते हैं उन पर शासन करना आसान होता है। इन मुद्दों को संबोधित करने और सुधारने में एक लंबा समय लगेगा। जागरूक नागरिक बनाने में बहुत अधिक धन भी लगता है। लेकिन वर्तमान में हम अंतर्निहित समस्या को खत्म करने के बजाय शॉर्ट-कट सुधार तलाश रहे हैं। क्योंकि समस्या को खत्म करना न केवल कठिन और महंगा है बल्कि पहले तो हमें यह स्वीकार करने की ज़रूरत है कि हम गलत हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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चीन विदेशों में कोयला बिजली घर निर्माण नहीं करेगा

हाल ही में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में यह वचन दिया है कि उनका देश विदेशों में कोयला आधारित नई बिजली परियोजनाओं का निर्माण नहीं करेगा। यह निर्णय वैश्विक जलवायु के हिसाब से काफी स्वागत योग्य है। चीन दुनिया में नए कोयला संयंत्रों का सबसे बड़ा वित्तपोषक रहा है। लिहाज़ा, यह निर्णय काफी महत्वपूर्ण हो सकता है।

वैसे, शंघाई स्थित फुडान युनिवर्सिटी के विकास अर्थशास्त्री क्रिस्टोफ नेडोपिल के मुताबिक यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है क्योंकि चीन के सरकारी संस्थान कई वर्षों से संभावित कोयला मुक्ति का मूल्यांकन करने के लिए चीनी और अंतर्राष्ट्रीय भागीदारों के साथ काम करते रहे हैं। नेडोपिल द्वारा जून में जारी रिपोर्ट के अनुसार विकाशसील देशों में बुनियादी ढांचे के निर्माण की व्यापक योजना, चाइना बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई), से सम्बंधित 52 कोयला आधारित उर्जा संयंत्रों में से 33 या तो हटा दिया गए हैं या फिर रद्द कर दिए गए हैं, सात निर्माणाधीन हैं, 11 नियोजन में हैं और केवल एक संयंत्र अभी क्रियाशील है।

इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2020 में पहली बार सौर, पवन और पनबिजली ऊर्जा में बीआरआई का निवेश जीवाश्म र्इंधन पर खर्च से काफी अधिक रहा है। इससे यह कहा जा सकता है कि नवीकरणीय उर्जा की लगातार घटती लागत चीन के कोयले में निवेश को कम कर रही है।

इस विषय में बोस्टन युनिवर्सिटी के वैश्विक विकास विशेषज्ञ केविन गैलागर के अनुसार चीन विदेशी कोयला परियोजनाओं के लिए सरकारी वित्तीय सहायता को समाप्त करने वाला अंतिम प्रमुख देश है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि विकासशील देशों में कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों का निर्माण रुक जाएगा। आम तौर पर माना जाता है कि अधिकांश कोयला संयंत्रों का वित्तपोषण चीन के सरकारी बैंकों द्वारा किया जाता है लेकिन ग्लोबल डेवलपमेंट पॉलिसी सेंटर के अनुसार तथ्य यह है कि विदेशी कोयला संयंत्रों में वैश्विक निवेश में 87 प्रतिशत तो जापान और पश्चिमी देशों के वित्तीय संस्थानों से आता है। ऐसे निजी संस्थानों द्वारा कोयला संयंत्रों के लिए वित्तीय सहायता जारी रही तो वैश्विक जलवायु के लक्ष्यों को प्राप्त नहीं किया जा सकेगा।

शी के वक्तव्य के बाद चीन की घरेलू कोयला परियोजनाओं पर भी ध्यान देना होगा। इंटरनेशनल एनर्जी एजेंसी के अनुसार 2020 में चीन एकमात्र ऐसी बड़ी अर्थव्यवस्था थी जिसका वार्षिक कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन बढ़ा है। ग्लोबल एनर्जी मॉनिटर के अनुसार चीन ने पिछले वर्ष 38.4 गीगावाट क्षमता के नए कोयला संयंत्र शुरू किए हैं। संस्था का दावा है कि चीन के कई प्रांतों ने कोविड-19 महामारी के मद्देनज़र अपनी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने के लिए कई कोयला परियोजनाओं का उपयोग किया है। चीन ने यह भी वादा किया है कि उसका कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जन 2030 में अधिकतम को छूकर कम होने लगेगा। इस लक्ष्य के मद्देनज़र चीन को चाहिए कि अन्य विकासशील देशों में कोयले के संयंत्रों के निर्माण पर रोक लगाने के साथ-साथ कोयले पर घरेलू निर्भरता को कम करने का भी प्रयास करे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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वैम्पायर चमगादड़ सहभोज करते हैं

क नए अध्ययन में पता चला है कि मादा वैम्पायर चमगादड़ रात का भोजन अपने साथियों के साथ करना पसंद करती हैं। इसके लिए वे रात को शिकार के दौरान एक विशेष ध्वनि निकालती हैं। लगता है कि इससे उनको रक्तभोज हासिल करने के दौरान समय और उर्जा बचाने में मदद मिलती है। यह वैम्पायर चमगादड़ों में आपसी सामाजिक सहयोग को समझने में मदद कर सकता है।

गौरतलब है कि वैम्पायर चमगादड़ बड़े-बड़े समूह में गुफाओं या खोखले पेड़ों में रहते हैं। समूह में मां-बेटी के जोड़े, युवा नर और अस्थायी नर होते हैं जो संभोग के लिए इन समूहों में शामिल होते हैं। ओहायो स्टेट युनिवर्सिटी के इकॉलॉजिस्ट गेराल्ड कार्टर बताते हैं कि चमगादड़ जीवों के व्यवहार का अध्ययन करने के लिए एक बेहतरीन मॉडल है। खास तौर से इसलिए कि ये छोटी और बंद जगहों में रहते हैं और अपने सम्बंधियों और असम्बंधित दोस्तों के साथ घनिष्ठ सम्बंध बनाते हैं।

कार्टर द्वारा पूर्व में किए गए अध्ययनों से पता चला है कि मादा वैम्पायर चमगादड़ जमघट जमाने के दौरान अपने सबसे अच्छे साथियों के साथ समय बिताती हैं। यहां तक कि दोनों अपने मुंह का भोजन एक-दूसरे को देते हैं। इन सम्बंधों का अध्ययन करने के लिए कार्टर ने स्मिथसोनियन ट्रॉपिकल रिसर्च इंस्टिट्यूट के शोधकर्ता साइमन रिपरगर द्वारा तैयार किए गए सेंसर की सहायता से चमगादड़ों की निगरानी की ताकि यह पता लगाया जा सके कि चमगादड़ एक-दूसरे से कितना करीब हैं।     

कार्टर की टीम ने टॉले, पनामा के एक खोखले पेड़ में रहने वाले 200 चमगादड़ों के समूह में से 50 मादा चमगादड़ों को पकड़ा। इनमें से 23 चमगादड़ों को पहले शोधकर्ता पकड़कर उनका अवलोकन कर चुके थे जबकि 27 पूरी तरह जंगली थे। चमगादड़ों पर बहुत ही सावधानी से सेंसर लगाए गए जो हर दो सेकंड में उनकी स्थिति का डैटा प्रसारित करते थे। इससे यह जानने में मदद मिली कि ये चमगादड़ कितना समय एक-दूसरे के साथ समय बिताते हैं। टीम ने भोजन तलाश के 586 मामले दर्ज किए।

प्लॉस बायोलॉजी में प्रकाशित डैटा के अनुसार चमगादड़ आम तौर पर भोजन की तलाश में अपना बसेरा अलग-अलग समय पर छोड़ते हैं, भोजन के लिए वे एक साथ मिलते हैं और फिर अलग-अलग रास्ते पर निकल जाते हैं। पूर्व में शोधकर्ताओं का मानना था कि यदि वे मिलकर भोजन की तलाश कर रहे हैं तो वापस भी एक साथ ही आएंगे। लेकिन देखा गया कि भोजन की तलाश में निकलने और अपने पसंदीदा साथियों की तलाश करने की प्रक्रिया काफी जटिल है जिसके लिए उच्च स्तर के सामाजिक सहयोग की आवश्यकता होती है।

इसके बाद टीम ने चमगादड़ों के रक्त के पसंदीदा स्रोत ‘पशुओं के झुंड’ पर रात के समय अध्ययन किया। इन्फ्रारेड कैमरा और माइक्रोफोन की मदद से रिपरगर द्वारा बनाए गए विडियोज़ में चमगादड़ों के आपसी संपर्क के 14 मामले देखने को मिले। इन अवलोकनों को सेंसर द्वारा प्राप्त डैटा के साथ देखने पर महत्वपूर्ण परिणाम सामने आए। इससे यह जानने में मदद मिली कि जब चमगादड़ एक साथ होते हैं तो क्या करते हैं।

रिपरगर ने जाने-माने सामाजिक कॉल और भोजन के लिए विशिष्ट आवाज़ भी रिकॉर्ड की जो पहले नहीं सुनी गई थी। ऐसा लगता है कि ये ध्वनियां चमगादड़ों को अपनी कॉलोनियों को छोड़ने के बाद एक-दूसरे की पहचान करने में मदद करती हैं और यहां तक कि भोजन के लिए संकेत देने में मदद करती हैं। सामाजिक सहयोग में इन ध्वनियों की भूमिका और गहन अध्ययन से ही स्पष्ट हो पाएगी। (स्रोत फीचर्स)

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वायु गुणवत्ता के नए दिशानिर्देश

र साल लगभग 70 लाख लोग वायु प्रदूषण के कारण मारे जाते हैं। इनमें से अधिकांश वे लोग हैं जो निम्न और मध्यम आय वाले देशों में रहते हैं। वायु प्रदूषण के कारण क्रॉनिक ऑब्सट्रक्टिव पल्मोनरी डिसीज़ (सीओपीडी), हृदय रोग, फेफड़े के कैंसर, निमोनिया और स्ट्रोक का जोखिम रहता है। गत 22 सितंबर को विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने वायु गुणवत्ता के लिए नए वैश्विक दिशानिर्देश जारी किए। इनमें प्रमुख प्रदूषकों की सांद्रता के नए स्तर के साथ-साथ अंतरिम तौर पर कुछ नए प्रदूषकों के स्तर भी सुझाए हैं। इसके अलावा, कुछ तरह के कणीय पदार्थ (जैसे ब्लैक कार्बन) के नियंत्रण के लिए भी अच्छे कामकाज की अनुशंसाएं जारी की हैं क्योंकि इनके मानक तय करने के लिए फिलहाल पर्याप्त प्रमाण नहीं हैं।

डब्ल्यूएचओ ने पिछले वायु गुणवत्ता दिशानिर्देश 2005 में जारी किए थे। तब से, वायु प्रदूषण के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभावों के प्रमाणों में काफी वृद्धि हुई है। दिशानिर्देश विकसित करने वाले समूह के एक सदस्य माइकल ब्रावर के मुताबिक पूर्व में दिशानिर्देश उत्तरी अमेरिका और पश्चिमी युरोप में हुए अध्ययनों से प्राप्त डैटा पर बहुत अधिक निर्भर थे और इन्हें पूरी दुनिया के लिए लागू किया गया था लेकिन अब हमारे पास निम्न और मध्यम आय वाले क्षेत्रों का भी काफी डैटा है। इसके अलावा, आज वायु प्रदूषकों के स्तर और रुझानों को मापने और उनके जोखिम का आकलन करने के बेहतर तरीके हैं, और वैश्विक स्तर पर कुछ वायु प्रदूषकों के आबादी से संपर्क के बारे में बेहतर जानकारी है। अध्ययनों में पता चला है कि वायु प्रदूषण का बहुत कम स्तर भी स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।

2021 के दिशानिर्देशों में लगभग हर प्रदूषक के लिए 2005 में जारी किए गए स्वीकार्य स्तर से बहुत कम स्तर की सिफारिश की गई है। वर्तमान सिफारिश में, 2.5 माइक्रोमीटर व्यास (पीएम2.5) के या उससे छोटे कणीय पदार्थ के लिए औसत वार्षिक सीमा पिछली सीमा से आधी कर दी गई है। पीएम2.5 के कण र्इंधन जलने के कारण उत्पन्न होते हैं जो स्वास्थ्य के लिए बहुत ही खतरनाक होते हैं। ये कण न सिर्फ फेफड़ों में भीतर तक जाते हैं बल्कि रक्तप्रवाह में भी प्रवेश कर सकते हैं।

नए दिशानिर्देशों में ज़हरीली गैस नाइट्रोजन डाईऑक्साइड का स्तर भी पिछले स्तर से 75 प्रतिशत तक कम कर दिया गया है। ओज़ोन के लिए ग्रीष्मकालीन माध्य सांद्रता का स्तर भी जारी किया गया है। कार्बन मोनोऑक्साइड, पीएम10 और सल्फर डाईऑक्साइड के लिए संशोधित दिशानिर्देश भी जारी किए गए हैं।

डब्ल्यूएचओ का कहना है कि यदि नए दिशानिर्देशों को विश्व स्तर पर हासिल कर लिया जाता है तो पीएम2.5 के संपर्क में आने के कारण होने वाली मौतों की संख्या लगभग 80 प्रतिशत कम हो जाएगी। लेकिन दिल्ली अभी दूर है। वर्तमान में, विश्व की 90 प्रतिशत से अधिक आबादी वर्ष 2005 में पीएम2.5 के लिए जारी किए गए स्तर से भी अधिक स्तर के संपर्क में है।

वायु गुणवत्ता दिशानिर्देश वास्तव में सार्वजनिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए एक साधन (टूल) है। डब्ल्यूएचओ का देशों से आग्रह है कि इस साधन का उपयोग कर देश वायु प्रदूषण को कम करने वाली नीतियां तैयार करें/लागू करें। इसके अलावा, डब्ल्यूएचओ का आग्रह है कि सदस्य देश वायु गुणवत्ता निगरानी प्रणाली स्थापित करें, वायु गुणवत्ता सम्बंधी डैटा तक लोगों की पहुंच सुनिश्चित करें और डब्ल्यूएचओ के दिशानिर्देशों को कानूनी मानकों का रूप दें।

बर्मिंघम विश्वविद्यालय में पर्यावरण स्वास्थ्य के प्रोफेसर रॉय हैरिसन का कहना है कि दिशानिर्देश बहुत महत्वपूर्ण हैं लेकिन इन्हें हासिल करना बेहद चुनौतीपूर्ण है, और इसकी संभावना बहुत कम है कि कई देश कई दशकों तक इन्हें हासिल कर पाएंगे। हालांकि कोविड-19 के दौरान के अनुभव से हम जानते हैं कि मोटर वाहनों की गतिविधि कम करने से वायु गुणवत्ता पर नाटकीय प्रभाव पड़ सकता है। वैश्विक स्तर पर यातायात में बहुत अधिक कमी होने की उम्मीद करना अवास्तविक है लेकिन वायु गुणवत्ता को कम करने के प्रयास में सड़क वाहनों का विद्युतीकरण किया जा सकता है।

हालांकि कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि सुझाए गए नए स्तर से भी कम स्तर पर प्रदूषकों की उपस्थिति स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है। महत्वपूर्ण यह है हर साल जितना हो सके इस प्रदूषण से संपर्क को कम करने की दिशा में प्रयास किए जाएं, ताकि आबादी को स्वास्थ्य सम्बंधी उल्लेखनीय लाभ मिल सकें। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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फिलकॉक्सिया माइनेन्सिस: शिकारी भूमिगत पत्तियां – डॉ. किशोर पवार

चार्ल्स डार्विन ने 1875 में मांसाहारी पौधों पर एक किताब लिखी थी। तब से अब तक तकरीबन 10 कुलों में लगभग 20 मांसाहारी वंश (जीनस) पहचाने जा चुके हैं।

तो, कुछ पौधे मांसाहारी क्यों होते हैं? इस संदर्भ में लाभ और लागत की गणना के आधार पर एक मॉडल विकसित किया गया है। इसके अनुसार मांसाहारिता भली-भांति प्रकाशित, पोषक तत्वों की कमी और साल के कम से कुछ समय नम आवासों में ही पाई जाएगी। यहां नाइट्रोजन, फॉस्फोरस, पोटेशियम और अन्य पोषक तत्व अकशेरुकी जंतुओं के शिकार और पाचन से प्राप्त किए जाएंगे।

इस मॉडल में तेज़ प्रकाश की उपस्थिति और नमी की परिस्थितियों को इसलिए शामिल किया गया है क्योंकि मांसाहार अपनाने पर प्रकाश संश्लेषण गंवाने की जो लागत होगी उसकी भरपाई सूखे और छायादार स्थानों में होने की संभावना कम है। हाल ही में इस मॉडल को प्रकाश, नमी और सड़ते-गलते कार्बनिक पदार्थ (लिटर) के द्वारा पोषक तत्वों की उपलब्धता के बीच संतुलन के रूप में भी आगे बढ़ाया गया है। यह मॉडल  प्रकाश और नमी के काफी अलग-अलग आवासों में मांसाहारिता पाए जाने की व्याख्या करता है। अब आते हैं नए खोजे गए मांसाहारी पौधे फिलकॉक्सिया प्रजातियों पर।

फिलकॉक्सिया वंश में 3 प्रजातियां हैं और तीनों मात्र केंद्रीय ब्रााज़ील के सराडो बायोम के कैंपोस रूपेस्टरिस में ही मिलती हैं। यह परिसर जैव विविधता से सम्पन्न है और भली-भांति प्रकाशित  है और यहां चट्टानी मुंडेरें हैं। यहां पर हल्की सफेद रेत भी पाई जाती है और वर्षा मौसमी होती है।

लागत लाभ मॉडल के अनुसार ये परिस्थितियां मांसाहारिता के विकास के लिए अनुकूल हैं। एक अन्य मांसाहारी वंश जेनलीसिया भी यहां आम तौर पर पाया जाता है, जहां रेत पर पानी रिसता रहता है। हमारे देश में पचमढ़ी में भी ड्रॉसेरा और स्थलीय यूट्रीकुलेरिया जैसी  कीट भक्षी प्रजातियां ऐसे ही आवासों में सफेद रेत और रिसते पानी में उगते देखी जाती हैं।

फिलकॉक्सिया का मांसाहार

फिलकॉक्सिया में कई असामान्य लक्षण हैं। मसलन एक मायकोराइज़ा विहीन अल्पविकसित जड़ तंत्र, चम्मच के आकार की पत्तियां जो वृद्धि काल में मध्य शिरा पर अंदर की ओर मुड़ी होती हैं। गौरतलब है कि मायकोराइज़ा पेड़-पौधों की जड़ों और फफूंद का मेलजोल है और यह पौधों की वृद्धि में काफी सहायक होता है। फिलकॉक्सिया की पत्तियों की ऊपरी सतह पर चिपचिपा पदार्थ छोड़ने वाली ग्रंथियां होती हैं और पत्ती रहित पुष्पक्रम (स्केपोस) पाया जाता है। इसमें एक अनोखा लक्षण और पाया जाता है – वह है इसकी कई छोटी-छोटी पत्तियां जो 0.5 से 1.5 मिलीमीटर चौड़ी होती हैं और सफेद रेत के नीचे घुसी हुई पाई जाती हैं। इन पत्तियों पर उपस्थित ग्रंथियां एक चिपचिपा पदार्थ छोड़ती हैं जो रेत के कणों को इन पत्तियों की ऊपरी सतह पर कसकर बांधे रखता है।

क्या वाकई मांसाहारी है?

इस पौधे की खोज के बाद यह सवाल उठा कि क्या इसे मांसाहारी पौधा माना जाए।  किसी भी पौधे को मांसाहारी मानने के लिए यह ज़रूरी है कि वह अपनी सतह पर लगे मृत जंतुओं से पोषक पदार्थ अवशोषित करने में समर्थ हो। उसमें कुछ अन्य प्राथमिक लक्षण  भी होना चाहिए – जैसे शिकार को आकर्षित करने का सक्रिय तरीका, शिकार को पकड़ने की युक्ति और उसका पाचन करने की क्षमता। इस संदर्भ में  फिलकॉक्सिया जहां उगता है उस जगह का पोषण-अभाव से ग्रस्त होने के अलावा हरबेरियम और वास्तविक परिस्थितियों से प्राप्त पौधों की पत्तियों पर निमेटोड कृमि पाए जाने ने इस परिकल्पना को जन्म दिया कि यह एक मांसाहारी पौधा है। कहा गया कि यह पौधा निमेटोड और अन्य कृमियों को अपनी पत्तियों पर उपस्थित ग्रंथियों से पकड़ता है और शिकार किए गए कृमियों का पाचन करके पोषक पदार्थों को अवशोषित करता है।

इस परिकल्पना का परीक्षण करने हेतु साओ पॉलो के कैगो जी. परेरा और उनके साथियों ने फिलकॉक्सिया की एक प्रजाति फिलकॉक्सिया निमेन्सिस को चुना और कीट को पचाने और उससे प्राप्त पोषक पदार्थों का अवशोषण करने की क्षमता का परीक्षण किया।

यह पता करने के लिए उन्होंने पत्तियों को ऐसे कृमि दिए जिनमें नाइट्रोजन के एक समस्थानिक (ग़्15) का समावेश किया गया था। परीक्षण से पता चला कि मात्र 24 घंटों के अंदर पत्तियों में 5 प्रतिशत नाइट्रोजन कृमि से आई थी। 48 घंटे बाद तो 15 प्रतिशत नाइट्रोजन कृमि से प्राप्त थी। इससे स्पष्ट होता है कि कृमियों के प्राकृतिक विघटन से मुक्त नाइट्रोजन का अवशोषण नहीं किया गया था बल्कि पत्तियों द्वारा कृमियों को पचाकर उनके पोषक पदार्थों का अवशोषण किया गया था। और वह भी अन्य मांसाहारी पौधों की तुलना में अधिक तेज़ी से।

ऐतिहासिक रूप से प्रामाणिक अधिकांश मांसाहारी पौधों की पत्तियों पर उपस्थित रुाावी ग्रंथियों पर फॉस्फेटेज़ एंज़ाइम की सक्रियता अधिक पाई जाती है। शोध दल ने पाया कि फिलकॉक्सिया की पत्तियों पर फॉस्फेटेज़ सक्रियता अधिक थी जिससे पता चलता है कि कृमियों का पाचन किया गया है ना कि सूक्ष्म जीवों द्वारा उनका विघटन होने से पोषक पदार्थ पत्तियों में पहुंचे हैं। साथ ही पत्तियों पर पाए गए सभी कृमि मृत थे जो इस बात का प्रमाण है कि वे न तो यहां से भोजन पा रहे थे, और ना ही प्रजनन कर रहे थे।

आम तौर पर माना जाता है कि पौधों द्वारा शिकार कर पोषक पदार्थ हासिल करना सबसे किफायती तरीका नहीं है। यह इस बात से भी साबित होता है कि फूलधारी पौधों में मात्र 0.2 प्रतिशत मांसाहारी हैं। अलबत्ता, ऐसा लगता है कि यह वास्तविक संख्या से बहुत कम आंका गया है क्योंकि कुछ संभावित प्रजातियों (जैसे जीरेनियम,  डिप्सेकस, पेटुनिया और पोटेंटिला) पर  कुछ प्रारंभिक परीक्षण ही हुए हैं। कुछ अन्य मामलों में मांसाहारिता छुपी हुई हो सकती है क्योंकि वे शायद सूक्ष्म जीवों का शिकार करते हों, उन तक पहुंचना मुश्किल होता है, या कोई ऐसी विधि हो सकती है जो हमें नज़र नहीं आती। फिलकॉक्सिया में मांसाहार की खोज इतनी देरी से होने के ऐसे ही कारण हो सकते हैं। लिहाज़ा हो सकता है कि हमारे आसपास और भी कई हत्यारे पौधे हों। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जलवायु परिवर्तन और जीवाश्म ईंधन

हाल ही में नेचर में प्रकाशित एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि यदि हम धरती के बढ़ते तापमान को थामना चाहते हैं तो हमें अपने जीवाश्म ईंधन के 90 प्रतिशत आर्थिक रूप से व्यावहारिक भंडार को अछूता छोड़ देना पड़ेगा। जलवायु सम्बंधी पैरिस संधि में कहा गया है कि धरती का तापमान औद्योगिक-पूर्व ज़माने से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक नहीं बढ़ने देना है। और इस लक्ष्य को पाने के लिए वर्ष 2100 से पूर्व दुनिया में कार्बन डाईऑक्साइड का उत्सर्जन 580 गिगाटन से ज़्यादा नहीं हो सकता। यदि इसे मानें तो, युनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के पर्यावरण व ऊर्जा अर्थ शास्त्री डैन वेलस्बी ने गणना की है कि हमें 89 प्रतिशत कोयला, 58 प्रतिशत तेल और 59 प्रतिशत गैस भंडारों को हाथ लगाने की सोचना भी नहीं चाहिए। और तो और, उनके मुताबिक ये सीमाएं और कठोर बनानी पड़ सकती हैं। 

दरअसल, यह नया अध्ययन 2015 में विकसित एक मॉडल को विस्तार देता है। वह मॉडल धरती के औसत तापमान को उद्योग-पूर्व काल से 2 डिग्री सेल्सियस अधिक होने से रोकने के लक्ष्य को ध्यान में रखकर बनाया गया था। लेकिन वेलस्बी का मत है कि 2 डिग्री की वृद्धि बहुत अधिक साबित होगी।

वेलस्बी के मॉडल में सारे प्राथमिक ऊर्जा स्रोतों को ध्यान में रखा गया है – जीवाश्म ईंधन, जैव-पदार्थ, परमाणु तथा नवीकरणीय ऊर्जा। मॉडल में मांग, आर्थिक कारकों, संसाधनों के भौगोलिक वितरण और उत्सर्जन जैसी सभी बातों को शामिल किया गया है और देखा गया है कि समय के साथ इनमें क्या परिवर्तन आएंगे। मॉडल में ऋणात्मक उत्सर्जन टेक्नॉलॉजी (यानी वातावरण में से कार्बन डाईऑक्साइड को हटाने) पर भी ध्यान दिया गया है।

वेलस्बी के मॉडल के मुताबिक वर्ष 2050 तक तेल व गैस उत्पादन प्रति वर्ष 3 प्रतिशत कम होते जाना चाहिए। वैसे इस संदर्भ में क्षेत्रीय अंतर भी देखे जा सकते हैं। इसका मतलब होगा कि अधिकतम जीवाश्म ईंधन उत्पादन इसी दशक में आ जाएगा।

मॉडल में वातावरण में से कार्बन डाईऑक्साइड को हटाने की रणनीतियों पर भी विचार किया गया है। ऐसी टेक्नॉलॉजी से आशय है कि पहले आप वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ें और फिर उसे हटाने के उपाय करें। लेकिन कई वैज्ञानिकों के अनुसार यह जोखिमभरा हो सकता है। उनके मुताबिक इसका मतलब सिर्फ इतना ही है कि हम समस्या को थोड़ा आगे सरका रहे हैं। क्योंकि उत्सर्जन तो बदस्तूर जारी रहेगा। (स्रोत फीचर्स) 

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गिद्धों पर नया खतरा

कुछ वर्षों पहले गिद्धों पर एक संकट आया था और गिद्धों की आबादी तेज़ी से घटी थी। 1990 के दशक में यह एक सामान्य अवलोकन था कि भारत में करोड़ों गिद्ध थे। इनके चलते जानवरों के शव तत्काल ठिकाने लग जाते थे। फिर अचानक गिद्धों की आबादी घटने लगी और काफी शोध के बाद पता चला था कि इसका कारण डिक्लोफेनेक नामक एक दवा थी। यह दवा पशुओं को दर्द निवारक के तौर पर दी जाती थी और इसके अवशेष इन पशुओं में जमा हो जाते थे। पशुओं के शव खाने पर डिक्लोफेनेक गिद्धों के शरीर में पहुंच जाती थी और उनके गुर्दों को नष्ट कर देती थी।

इस समस्या के मद्देनज़र भारत में 2006 में डिक्लोफेनेक के पशुओं में उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। कई देशों ने भारत का अनुसरण किया था। इससे परिस्थिति में थोड़ा ठहराव तो आया लेकिन नुकसान तो हो ही चुका था – देश के लगभग 90 प्रतिशत गिद्ध मारे जा चुके थे। अब दो ताज़ा अध्ययनों ने एक नए खतरे की ओर इशारा किया है। इन अध्ययनों का निष्कर्ष है कि गिद्धों की मौत निमेसुलाइड खाने से भी हो सकती है। निमेसुलाइड भी एक लोकप्रिय दर्द निवारक दवा है।

पर्यावरण समूह अब कोशिश कर रहे हैं कि सराकर निमेसुलाइड के पशुओं में उपयोग पर प्रतिबंध लगा दे। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी के उप निदेशक विभु प्रकाश के अनुसार निमेसुलाइड का घातक प्रभाव चिंताजनक है। चिंता की बात यह भी है कि कई सारी दर्द निवारक दवाइयां गिद्धों के लिए जानलेवा पाई गई हैं। जैसे एसिक्लोफेनेक और कीटोप्रोफेन जैसी दवाइयां घातक साबित हो चुकी हैं और कई देशों में प्रतिबंधित हैं। लेकिन ज़्यादा चिंताजनक बात यह है कि ये प्रतिबंध सिर्फ पशुओं में इनके उपयोग पर लगाए गए हैं और बाज़ार में दवाइयां मिलती रहती हैं।

निमेसुलाइड के विरुद्ध कार्रवाई की मांग सबसे पहले 2016 में उठी थी जब कई गिद्धों के शवों में यह दवा पाई गई थी। यह चिंता तब गहरा गई जब सलीम अली सेंटर फॉर ऑर्निथोलॉजी एंड नेचुरल हिस्ट्री के सुब्रामण्यन मुरलीधरन की रिपोर्ट एन्वायरमेंटल साइन्स एंड पॉल्यूशन रिपोट्स में प्रकाशित हुई।

अब पर्यावरणविद अन्य दर्द निवारक दवाइयों की पैरवी कर रहे हैं। एक है टॉलफेनेमिक एसिड जो पशुओं में उपयोग की जाती है और एक रिपोर्ट के अनुसार यह गिद्धों के लिए सुरक्षित है। इसी प्रकार से, मेलोक्सीकैन भी सुरक्षित पाई गई है। (स्रोत फीचर्स)

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बढ़ रही है जुड़वा बच्चों की संख्या

क नए अध्ययन का निष्कर्ष है कि पूरी दुनिया में जुड़वा बच्चों की संख्या बढ़ रही है। 1980 के दशक से शुरू करें तो जुड़वा बच्चों की संख्या 30 प्रतिशत बढ़ी है। जहां 1980 से 1985 के बीच 1000 प्रसवों में जुड़वा प्रसव 9 होते थे वहीं 2010 से 2015 के बीच की अवधि में हर 1000 प्रसवों में 12 जुड़वा प्रसव थे।

अध्ययन में यह भी बताया गया है कि सिर्फ प्रतिशत ही नहीं, जुड़वा प्रसवों की कुल संख्या भी बढ़ी है। 1980 के दशक के प्रारंभ में 11 लाख जुड़वा प्रसव हुए थे और 2010 के दशक की शुरुआत में ये बढ़कर 16 लाख हो गए – यानी जुड़वा प्रसवों में 42 प्रतिशत का इजाफा हुआ।

इसके कारणों पर विचार करते हुए अध्ययन में इसका प्रमुख कारण चिकित्सकीय सहायता प्राप्त प्रजनन को बताया गया है। इसके अंतर्गत इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (जिसे बोलचाल में टेस्ट ट्यूब बेबी कहते हैं) भी शामिल है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब निषेचन शरीर से बाहर करवाया जाता है और भ्रूण को गर्भाशय में पहुंचाया जाता है तो एक से अधिक भ्रूण पहुंचने की संभावना अधिक होती है। हालांकि अब शायद इसमें कमी आने लगेगी क्योंकि चिकित्सक अब एकाधिक भ्रूण प्रत्यारोपित करने से बचने लगे हैं।

जुड़वा प्रसव की संख्या में वृद्धि का एक कारण शायद यह भी है कि अब महिलाएं अधिक उम्र में बच्चे पैदा करने लगी हैं और बढ़ती उम्र के साथ जुड़वा गर्भ की संभावना बढ़ती है। इस अध्ययन के एक शोधकर्ता ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के समाज विज्ञानी क्रिस्टियान मोंडेन का कहना है कि इस समय दुनिया में जुड़वा बच्चों की संख्या शायद पिछले पचास सालों में सर्वाधिक है। उनके मुताबिक यह तथ्य इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि जुड़वा प्रसव के दौरान शिशु की मृत्यु की संभावना ज़्यादा होती है और मां के लिए प्रसव में पेचीदगियां पैदा होने की संभावना भी एकल प्रसव की अपेक्षा अधिक होती है। (स्रोत फीचर्स)

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दूध पीकर घुड़सवार चरवाहे युरोप पहुंचे

पांच हज़ार से अधिक वर्ष पहले आज यमनाया के रूप में पहचाने जाने वाले खानाबदोश वर्तमान रूस और यूक्रेन के घास के मैदानों से भारी बैल गाड़ियों में बाहर निकल पड़े थे। कुछ ही शताब्दियों में वे पूरे युरेशिया में फैल गए, और मंगोलिया से लेकर हंगरी तक की आबादी में अपने आनुवंशिक हस्ताक्षर छोड़ दिए। अब, 50 से अधिक कांस्य युगीन कंकालों के दांतों पर अश्मीभूत प्लाक बताता है कि संभवत: उनका विस्तार दूध के दम पर संभव हुआ था।

शोधकर्ताओं का काफी समय से यह अंदाज़ा था कि बग्घियों, डेयरी और घुड़सवारी के मेल ने यमनाया लोगों के लिए अधिक घुमक्कड़ जीवन संभव बनाया था। लेकिन शोधकर्ताओं के इस विचार का समर्थन करने वाले कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं थे, सिवाय कुछ दफन बग्घियों और मिट्टी के बर्तनों के।

यमनाया के फैलाव की सफलता का कारण जानने के लिए यूएसए, युरोप और रूस के शोधकर्ताओं ने दांतों के प्लाक में फंसकर सुरक्षित रह गए दूध प्रोटीन की जांच की। प्लाक के ये नमूने वर्तमान रूस के घास के मैदानों में 4600 ईसा पूर्व से 1700 ईसा पूर्व तक रहे लोगों के थे। शोधकर्ताओं ने कैस्पियन सागर के उत्तरी क्षेत्र के दो दर्जन से अधिक खुदाई स्थलों से प्राप्त 56 कंकालों की जांच की। संरक्षित प्रोटीन को प्लाक से अलग किया और फिर मास स्पेक्ट्रोमेट्री नामक तकनीक से हरेक प्रोटीन की पहचान की।

3300 ईसा पूर्व से पहले, वोल्गा और डॉन नदियों के किनारे रहने वाले लोगों के दांतों के प्लाक में दूध के कोई प्रोटीन नहीं थे। पूर्व अध्ययनों में देखा गया है कि इसकी बजाय ये यमनाया-पूर्व समूह मीठे पानी की मछली, जंगली शिकार, और कभी-कभार पालतू गाय, भेड़, या बकरी का मांस खाते थे।

फिर, लगभग 3300 ईसा पूर्व के बाद के प्लाक नमूनों में गाय, भेड़ और बकरी के दूध के प्रोटीन प्रचुर मात्रा में मिले। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि इस समय के ये लोग डेयरी उत्पादों का सेवन करते थे। कुछेक नमूनों में घोड़े के दूध की भी बहुत थोड़ी मात्रा मिली। ज्यूरिख इंस्टीट्यूट ऑफ इवॉल्यूशनरी मेडिसिन के जैव-आणविक पुरातत्वविद शेवन विल्किन कहते हैं कि कभी-कभी इन जानवरों को खाने की बजाय इन जानवरों को सदैव दोहना, यह एक सांस्कृतिक बदलाव है।

नेचर पत्रिका में प्रकाशित निष्कर्षों के अनुसार ये प्रोटीन संकेत देते हैं कि शिकारी-संग्रहकर्ताओं के तेज़ी से खानाबदोश चरवाहों में बदलने और महज़ 300 सालों में पूरे युरेशिया में फैल जाने में मुख्य भूमिका डेयरी और पशुपालन अपनाने की है। देखा जाए तो घोड़ों, मवेशियों और बकरियों ने घास को रोटी, कपड़ा और मकान में बदल दिया।

लेकिन यह सिर्फ डेयरी के कारण संभव नहीं हुआ; लगभग इसी समय बग्घियों की शुरुआत ने पानी लाना और जानवरों को दूर के चारागहों में चराने के लिए ले जाना संभव बनाया। पालतू घोड़ों ने नए यमनाया खानाबदोशों को जानवरों के बड़े-बड़े झुंडों का प्रबंधन करने में सक्षम बनाया होगा।

बहरहाल, एक रहस्य अब भी बना हुआ है। प्राचीन डीएनए के विश्लेषण बताते हैं कि यमनाया लोग लैक्टोज़ पचा नहीं पाते थे। यह संभव है कि आधुनिक मंगोलियाई लोगों की तरह यमनाया लोग भी किण्वित डेयरी उत्पाद जैसे दही या चीज़ का सेवन करते हों, जिनमें कोई लैक्टोज़ नहीं होता है। चाहे वे किसी भी रूप में वे डेयरी उत्पादों के सेवन करते हों लेकिन इतना साफ है कि इसके बगैर वे इतनी तेज़ी से, इतनी दूर तक नहीं फैल सकते थे। (स्रोत फीचर्स)

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सार्स जैसे वायरस बार-बार आते हैं

पिछले दो दशकों में वैश्विक स्तर पर मात्र दो नए कोरोनावायरस उभरे हैं: सार्स-कोव (2003 में सार्स) और दूसरा सार्स-कोव-2 (कोविड-19)। लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार शायद ये चमगादड़ों से छलकने वाले ऐसे ही वायरसों की एक तुच्छ बानगी भर हैं। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि हर वर्ष लगभग 4 लाख लोग सार्स सम्बंधी कोरोनावायरस से प्रभावित होते हैं जो किसी बड़ी बीमारी का रूप नहीं लेते हैं। इस परिणाम को लेकर काफी अगर-मगर हैं लेकिन इसे एक चेतावनी के रूप में लेना चाहिए क्योंकि इससे पता चलता है कि जंतु-जनित संक्रमण काफी आम हो सकते हैं।        

अध्ययन में इकोहेल्थ अलायन्स के पीटर डज़ाक और एनयूएस मेडिकल कॉलेज, सिंगापुर के शोधकर्ता लिन्फा वांग और अन्य ने सार्स सम्बंधी कोरोनावायरस की वाहक 23 चमगादड़ प्रजातियों के आवासों का एक विस्तृत नक्शा तैयार किया। फिर उन्होंने इस मानचित्र पर उन स्थानों को चिंहित किया जहां मनुष्य भी बसे हैं। शोधकर्ता बताते हैं कि लगभग 50 करोड़ लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां भविष्य में कोरोनावायरस चमगादड़ों से छलककर मनुष्यों में आ सकते हैं। 

इस नक्शे की मदद से सार्स या कोविड वायरस के उभरने की संभावना देखकर भावी प्रकोप को रोकने के उपाय किए जा सकते हैं। और तो और, इसकी मदद से वायरस की उत्पत्ति के स्रोत का भी पता लगाने में मदद मिल सकती है।

शोधकर्ता एक कदम और आगे गए। कोविड-19 उभरने से पहले किए गए कुछ सर्वेक्षणों में यह बात सामने आई थी कि दक्षिण एशिया के कुछ लोगों में सार्स-सम्बंधित कोरोनावायरस की एंटीबॉडीज़ मौजूद थीं। लोगों के चमगादड़ों के संपर्क में आने की संभावना और रक्त में एंटीबॉडी कितने समय तक बनी रहती हैं, इनके मिले-जुले विश्लेषण के आधार पर शोधकर्ताओं का अनुमान है कि हर वर्ष लगभग 4 लाख लोग सार्सनुमा वायरस से संक्रमित होते हैं।

डज़ाक के अनुसार चमगादड़ों से हमारा संपर्क कल्पना से कहीं अधिक है। गुफाओं के आसपास रहने का मतलब है कि आप वायरस के निरंतर संपर्क में हैं। लोग गुआनो खाद निकालते हैं, चमगादड़ों का शिकार करते हैं और उनको खाते हैं। वैसे इस अध्ययन में  वन्यजीव व्यापार और अन्य जीवों के ज़रिए चमगादड़ से मनुष्यों में वायरस के प्रवेश करने की संभावना पर तो चर्चा ही नहीं की गई है।

वैसे इन नतीजों पर शंकाएं भी व्यक्त की गई हैं। एक आपत्ति तो यह है कि इस अध्ययन के परिणामों की वि·ासनीयता की रेंज बहुत अधिक है: 1 से लेकर 3.5 करोड़ अदृश्य संक्रमण प्रति वर्ष। इसके अलावा, एंटीबॉडी से प्राप्त डैटा चंद हज़ार लोगों का था और इसमें फाल्स पॉज़िटिव भी हो सकते हैं। 

कई संक्रमण इसलिए पता नहीं चलते क्योंकि वे अल्प-कालिक होते हैं और आगे नहीं फैलते। शायद ये वायरस व्यक्ति से व्यक्ति में संचरण के लिए पर्याप्त कोशिकाओं को संक्रमित नहीं कर पाते हों या ये मनुष्यों की प्रतिरक्षा को मात देने में सक्षम न हों। ये थोड़े-से लोगों को ही संक्रमित कर पाते हैं।  

एक कारण यह भी हो सकता है कि इन वायरसों से होने वाली बीमारियां पहचानी न गई हों। वैसे भी हल्के-मध्यम लक्षणों के चलते लोग शायद ही  अस्पताल जाएं। फिर भी यह अध्ययन भविष्य में वायरस के फैलने के जोखिमों को चिंहित करने की दिशा में छोटा मगर अच्छा प्रयास है। इस अध्ययन से एक बात तो साफ है कि जीवों से मनुष्यों में वायरस के छलकने-फैलने की घटनाएं जितनी मानी जाती थीं उससे कहीं अधिक होती हैं। (स्रोत फीचर्स)

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