खुद का भोजन बनाने वाले पौधे शिकारी कैसे बन गए?

डॉ. किशोर पंवार

लाखों-करोड़ों पौधों की दुनिया में कुछ पौधे ऐसे भी हैं जो अपना भोजन स्वयं नहीं बनाते बल्कि जंतुओं की तरह शिकार करते हैं। इन्हें हम मांसाहारी पौधों (carnivorous plants) के नाम से जानते हैं। चार्ल्स डार्विन ने 1875 में जब अपनी किताब इन्सेक्टीवोरस प्लांट (कीटभक्षी पौधे) (Darwin Insectivorous Plants) प्रकाशित की थी तब तहलका मच गया था कि ऐसे भी पौधे होते हैं। तभी से ये विचित्र शिकारी पौधे आश्चर्य और कौतूहल का विषय रहे हैं। इन पौधों को लेकर तमाम भ्रम फैले या फैलाए गए। खासकर कुछ फिल्मों ने यह दर्शाया कि ऐसे पौधे भी होते हैं जो मनुष्यों को पकड़कर खा जाते हैं जबकि सच्चाई यह है कि ये पौधे छोटे-मोटे कीटों को दबोच (insect eating plants) पाते हैं।

दरअसल, डारविन ने 16 साल तक व्यवस्थित प्रयोगों के बाद दर्शाया था कि कुछ पौधों की पत्तियां इस तरह ढल गई हैं कि वे न सिर्फ छोटे-मोटे जंतुओं को कैद कर लेती हैं, बल्कि उन्हें पचा भी लेती हैं और उनसे मुक्त पोषक पदार्थों का अवशोषण भी कर लेती हैं।

अब आणविक जीव वैज्ञानिकों (molecular biology research) ने इस रहस्य से पर्दा उठाया है कि इन पत्तियों में यह महत्वपूर्ण परिवर्तन कैसे संभव हुआ।

फूलधारी पौधों के विकास के 14 करोड़ से भी ज़्यादा सालों में मांसाहारी गुण बार-बार विकसित हुआ है (evolution of carnivory) और ऐसा कम से कम 12 विभिन्न कुलों में देखा गया है। पर हर बार मांसाहार के विकास की प्रेरक शक्ति एक ही थी – कुछ महत्वपूर्ण पोषक तत्वों के वैकल्पिक स्रोतों की खोज की ज़रूरत। मांसाहारी पौधे अक्सर दलदल और दलदली भूमि में पोषक तत्वों से रहित जलाशयों या हल्की उष्णकटिबंधीय मिट्टी पर ही उगते हैं। यहां पौधों के विकास और वृद्धि के लिए आवश्यक नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे तत्वों की कमी होती है। और ये उपलब्ध होते हैं प्रोटीन से भरपूर कीट-पतंगों और छोटे-छोटे जीवों में। ऐसा नहीं है कि ये मांसाहारी पौधे अपने पूरे पोषण (nutrient absorption from insects) के लिए शिकार पर निर्भर होते हैं। अन्य पौधों की तरह ये भी प्रकाश संश्लेषण करते हैं और कार्बोहायड्रेट वगैरह बना लेते हैं। लेकिन अपने आवास में नाइट्रोजन, फॉस्फोरस जैसे तत्वों के अभाव की पूर्ति ये कीड़ों-मकोड़ों से करते हैं।

प्राय: पेड़-पौधे अपनी जड़ों के ज़रिए नाइट्रोजन व फॉस्फोरस मिट्टी से लवणों के रूप में प्राप्त करते हैं। अब यदि जमीन में ये तत्व न हों तो? कोई चिंता नहीं, हवा में तो प्रोटीन से भरपूर कीट पतंगे उड़ रहे हैं जो नाइट्रोजन का बढ़िया स्रोत है। और यहां उगने वाले कुछ पौधों ने इसी स्रोत का लाभ उठाया और बन गए मांसाहारी। परंतु सवाल तो यह है कि यह परिवर्तन हुआ कैसे कि ये पौधे प्रोटीन को पचाने लगे जबकि सामान्यत: पौधे प्रोटीन बनाते हैं, पचाते नहीं।

वर्तमान में लगभग 800 मांसाहारी पौधे ज्ञात (800 carnivorous plant species) हैं। इनमें पिचर प्लांट (कलश पादप) और ड्रॉसेरा हैं जो शिकार को अपने गतिहीन ट्रैप यानी पाश में फंसाते हैं। दूसरी ओर, कुछ शिकारी पौधों के पाश में गति होती है। जैसे वीनस फ्लाईट्रैप और यूट्रीकुलेरिया जिनके संवेदनशील रोम और खटके से बंद होने वाले पिंजड़े शिकार की उपस्थिति को भांपकर एक साथ प्रतिक्रिया करते हैं और पाश झटके से बंद हो जाते हैं।

पत्तियों से ही बने हैं सभी पाश

आकार, प्रकार और शिकारी को फंसाने के तरीकों में काफी भिन्नता होने के बावजूद, सभी शिकारी फंदे या तो पत्तियों से या पत्तियों (leaf-based traps) के कुछ भाग से बने होते हैं। जैसे ड्रॉसेरा पूरी पत्ती है, वहीं नेपेंथीज़ का कलश पत्ती के शीर्ष  से बना होता है। दरअसल, इन पौधों की पत्तियां थ्री-इन-वन हैं जो हाथ, मुंह और पेट सभी काम करती हैं, बारी-बारी। यहां तक कि वे जड़ों का भी काम करती है – नाइट्रोजन और फॉस्फोरस जैसे लवण उपलब्ध करवाकर जो काम सामान्यत: जड़ें करती हैं।

इन मांसाहारी पौधों की पत्तियां अपने सामान्य कार्य के अलावा अन्य कार्य कैसे करने लगी इस रहस्य का खुलासा आणविक जीव विज्ञान की नवीनतम तकनीकों (जैसे जीनोमिक्स, ट्रांसक्रिप्टोमिक्स और प्रोटीयोमिक्स) (plant genomics research) से हो पाया।

जीनोमिक्स जीव विज्ञान की वह शाखा है जिसके अंतर्गत किसी जीव में मौजूद समस्त जीन्स का मानचित्रण किया जाता है। इससे यह पता चलता है कि उस जीव में कौन-कौन-सी क्षमताएं हैं। लेकिन ज़रूरी नहीं कि सारी क्षमताएं साकार हों। जीन्स के आधार पर प्रतिलेखन (ट्रांसक्रिप्शन) होकर आरएनए बनते हैं जो प्रोटीन बनवाने या कुछ अन्य कार्यों को अंजाम देते हैं। किसी भी कोशिका में उपस्थित समस्त आरएनए के समुच्चय को ट्रांस्क्रिप्टोम कहते हैं। लेकिन सारे आरएनए प्रोटीन बनाने का काम नहीं करते। किसी कोशिका में बनने वाले सारे प्रोटीन्स के समूह को प्रोटीयोम कहते हैं और इसके विश्लेषण को प्रोटियोमिक्स (proteomics protein study)।

तो मांसाहारी पौधों के जीनोम-आरएनए ट्रांसक्रिप्ट की तुलना सामान्य पौधों से करके यह पता लगाया जा सकता है कि कौन-कौन-से जीन पौधे के किस भाग में और कब सक्रिय होते हैं। प्रोटीयोमिक्स विश्लेषण से पता चल जाता है कि भोजन के समय फंदे में कौन से विशेष प्रोटीन बनते हैं।

जीन्स वही, काम नया

पौधों में मांसाहार की दो खास क्रियाओं (पाचन और अवशोषण – digestion & nutrient absorption) के अध्ययन से पता चला है कि कैसे जैव विकास के दौरान मौजूदा जीन्स को ही नए काम पर लगाया गया है। इसके अलावा कुछ जीन्स को नई भूमिकाओं (gene repurposing evolution) के अनुकूल बनाने के लिए उनमें अजीबोगरीब बदलाव किए गए हैं। मांसाहारिता पर काम करने वाले विशेषज्ञ विक्टर अल्बर्ट कहते हैं कि मांसभक्षिता के विकास के केंद्र में दरअसल पौधों की सहस्राब्दियों पुरानी रक्षा प्रणाली ही थी।

1970 के दशक में शोधकर्ताओं ने आजकल की त्वरित और सस्ती जीन अनुक्रमण तकनीक से देखा कि मांसाहारी पौधों के फंदों में पाए जाने वाले एंज़ाइम सिर्फ पत्तियों में ही बनते हैं। आणविक जीव वैज्ञानिकों ने इन पाचक एंज़ाइम्स (digestive enzymes in plants) को कोड करने वाले कई जीन्स की पहचान कर ली है। एक बात तो स्पष्ट हो गई है कि इन पौधों ने मांसाहारिता से सम्बंधित जीन्स जाल में फंसने वाले जंतुओं से हासिल नहीं किए हैं बल्कि ये जीन्स पौधों में पहले से उपस्थित जीन्स को नए कामों में उपयोग करके या उनमें फेरबदल करके पैदा हुए हैं।

1970 के दशक में जीव वैज्ञानिक यह पता कर पाए थे कि इन फंदों में जो एंज़ाइम पाए जाते हैं, वे वैसे ही काम करते जैसे पौधे बैक्टीरिया, फफूंद और कीटों के खिलाफ अपनी रक्षा के लिए करते हैं। काफी शोध के बाद पता चला है कि ऐसे एंज़ाइम पौधे स्वयं बनाते हैं और कुछ नए एंज़ाइम भी बनाते हैं।

पाचक एंज़ाइम्स की सूची में कायटीनेस, प्रोटीएस और पर्पल एसिड फॉस्फेटेस (पीएपी) शामिल हैं। कायटीनेस वे एंज़ाइम होते हैं जो कीटों के कायटीन से बने बाह्य कंकाल को पचाने में काम आते हैं। प्रोटीएस प्रोटीन को पचाने का और पीएपी फॉस्फोरस प्राप्त करने में मदद करते हैं।

ये सभी एंज़ाइम फूलधारी पौधों की प्राचीन सुरक्षा व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे और आज भी निभा रहे हैं। जैसे, संभवत: कायटीनेस फफूंदों से रक्षा करते होंगे क्योंकि फफूंदों की भित्ती कायटीन से ही बनी होती है। आगे चलकर कीटों के कंकाल के कायटीन को पचाने-गलाने में इन्हीं जीन्स का उपयोग किया गया।

जीन्स को नई भूमिका में इस्तेमाल करना जैव विकास में एक महत्वपूर्ण चालक रहा है। इसकी शुरुआत प्राय: संयोगवश किसी जीन के दोहराव से होती है। अधिकांश ऐसे दोहरे जीन्स कोई काम नहीं करते। मगर यदि किसी ऐसे जीन में कोई उपयोगी उत्परिवर्तन हो जाए, तो वह नई भूमिका अख्तियार कर सकता है। अल्बर्ट के मुताबिक मांसाहारिता का विकास शायद इसी प्रक्रिया से हुआ है। 

मौजूदा संसाधनों को नई भूमिकाओं के लिए ढालने की यह प्रवृत्ति कीटों के पाचन से कहीं आगे पोषक तत्वों के अवशोषण तक ले जाती है। जब पाचन प्रक्रिया के फलस्वरुप काइटिन, प्रोटीन और डीएनए छोटे-छोटे अणुओं में टूटते हैं, ये विशेष पत्तियां उन्हें पौधों के अंदर ले लेती हैं। सामान्य पौधों में पोषक तत्वों का अवशोषण जड़ों द्वारा किया जाता है। ट्रांसपोर्टर प्रोटीन उन्हें मिट्टी से पौधे में पहुंचाते रहते हैं।

आश्चर्य की बात है कि वैज्ञानिक सोन्के शेरज़र ने नाइट्रोजन और पोटेशियम के लिए ट्रांसपोर्टर प्रोटीन की खोज वीनस फ्लाईट्रैप की इन शिकारी पत्तियों में की है। ऐसा लगता है कि पत्ती को इन पोषक तत्वों को अवशोषित करने में सक्षम बनाने के लिए जैव विकास ने जड़ों के जीन्स को उठाया और नई जगह पर काम पर लगा दिया है। जड़ों में तो ये ट्रांसपोर्टर जीन्स हमेशा सक्रिय रहते हैं लेकिन शिकारी पत्तियों के ट्रांसपोर्टर जीन्स तभी सक्रिय होते हैं जब शिकार किए गए जंतु का पाचन होकर पोषक तत्व बाहर निकलने लगते हैं।

विक्टर अल्बर्ट और अन्य शोधकर्ताओं द्वारा एक ऑस्ट्रेलियाई मांसाहारी पौधे सीफेलोटस फॉलिकुलेरिस (Cephalotus follicularis) के जेनेटिक विश्लेषण से पता चला कि कैसे परस्पर असम्बंधित पौधों (नेपेंथीस एलाटा, सेरासेनिया पर्प्य़ूरिया, ड्रॉसेरा एडेलेNepenthes alata, Sarracenia purpurea,  Drosera adelae) ने एक-से जीन्स को अपनाकर उनको नए काम में उपयोग करके मांसाहारी कौशल विकसित किया है।

इसी सिलसिले में यह भी पता चला है कि जब कोई एंज़ाइम नई मांसाहारी भूमिका निभाने लगता है तो उसका विकास चलता रहता है ताकि वह बेहतर ढंग से काम कर सके। इसके लिए एंज़ाइम में अमीनो अम्लों को बदला जाता है। आश्चर्य की बात है कि विभिन्न असम्बंधित पौधों में एक-से अमीनो अम्लों की अदला-बदली हुई है।

मांसाहारी ट्रैप के समान जैस्मोनेट्स का उत्पादन सामान्य पौधों में भी होता है। उनमें कोशिकाएं कीटों के हमलों के जवाब में सिग्नल प्रेषित करके आसपास की कोशिकाओं को सचेत करती हैं। इस तरह शाकाहारी आक्रमण से बचने के लिए यह पौधे रक्षात्मक प्रोटीन का उत्पादन शुरू कर देते हैं।

यह प्रतिरक्षा प्रणाली सभी फूलधारी पौधों में मौजूद है। जैस्मोनेट्स की यह बदली हुई भूमिका मांसाहारी पौधों के विकास में एक प्रमुख कारण हो सकती है।

सचमुच पौधों की दुनिया अजब गजब है। यह कुदरत का कमाल ही तो है कि जो पत्तियां सामान्य पौधों में भोजन बनाने का काम करती है, वही इन खनिज लवणों की कमी से जूझते दलदली आवासों में फूलों जैसी रंगीन, रसीली व आकर्षक बन गई हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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जलवायु परिवर्तन धरती की रफ्तार को धीमा कर रहा है

डॉ. सुशील जोशी व डॉ. भास बापट

नेचर पत्रिका (Nature Journal research)  में प्रकाशित एक विश्लेषण का निष्कर्ष है कि आइस कैप्स से पिघलती बर्फ धरती के घूर्णन को धीमा (Earth rotation slowdown) कर रही है। स्क्रिप्स इंस्टीट्यूशन ऑफ ओशिएनोग्राफी के भू-भौतिकविद डन्कन एग्न्यू का मत है कि घूर्णन की रफ्तार में इस गिरावट के कारण शायद लीप सेकंड (leap second timing) जोड़ने की ज़रूरत टल जाएगी।

दरअसल, हम समय का मापन पृथ्वी की गतियों (Earth rotation time) के आधार पर ही करते आए हैं। जैसे एक वर्ष तब पूरा होता है जब पृथ्वी सूर्य की एक परिक्रमा पूरी कर ले। इसी प्रकार एक दिन का मतलब होता है कि पृथ्वी अपने अक्ष पर एक पूरा चक्कर लगा ले। इसी के अनुसार 1 सेकंड को इस दिन की अवधि के एक अंश के रूप में परिभाषित किया गया है। लेकिन पृथ्वी की गतियां बहुत स्थिर (planetary motion changes) नहीं हैं। इन पर कई चीज़ों का असर पड़ता है।

फिर 1967 में परमाणु घड़ियों (atomic clocks timekeeping) का उपयोग शुरू हुआ था। परमाणु घड़ियां किसी परमाणु द्वारा उत्सर्जित प्रकाश की आवृत्ति या फ्रिक्वेंसी के आधार पर चलती हैं। फिलहाल दुनिया भर में लगभग साढ़े चार सौ परमाणु घड़ियां समय का हिसाब रखती हैं। इसे को-ऑर्डिनेटेड युनिवर्सल टाइम (UTC time standard) कहते हैं। आजकल के उपकरणों को चलाने के लिए इनके द्वारा दर्शाया गया समय ही इस्तेमाल किया जाता है। इनके समयमान और पृथ्वी के प्राकृतिक दिन पर आधारित समयमान में थोड़ा अंतर होता है और इनके बीच तालमेल रखना होता है।

समय मापन से जुड़े कई वैज्ञानिकों (मेट्रोलॉजिस्ट) का मत था कि लाखों वर्षों में पृथ्वी का घूर्णन धीमा हो रहा है और कभी-कभी ऐसा हो सकता है कि पृथ्वी-घूर्णन के सेकंड और यूटीसी के सेकंड के बीच तालमेल बनाए रखने के लिए लीप सेकंड जोड़ना पड़े। लीप सेकंड जोड़ने की प्रथा 1972 में शुरू की गई थी और तब से 27 बार लीप सेकंड जोड़ने की ज़रूरत पड़ी है। आखरी लीप सेकंड 2016 में जोड़ा गया था।

दरअसल, पृथ्वी की घूर्णन गति में दीर्घावधि गिरावट मुख्य रूप से चंद्रमा के कारण (lunar tidal effect) होती है। चंद्रमा समंदरों पर आकर्षण बल लगाता है जिसकी वजह से घर्षण पैदा होता है और धरती अपने अक्ष पर थोड़ा धीमे घूमने लगती है। इस मंदन के कई रोचक परिणाम होते हैं। जैसे 2000 साल पहले ग्रहण आज की घूर्णन गति के आधार पर की गई गणना से थोड़ा अलग समय पर दिखते थे। और तो और, प्राचीन तलछटों के विश्लेषण से लगता है कि करीब 1.4 अरब वर्ष पूर्व दिन शायद आजकल के सिर्फ 19 घंटों (shorter day in past) के बराबर हुआ करता था।

पृथ्वी की घूर्णन गति में बदलाव का एक कारण और है। छोटी अवधि में पृथ्वी की घूर्णन गति में उतार-चढ़ाव कई भू-भौतिकीय घटनाओं के कारण होते रहते हैं। इस वक्त पृथ्वी के घूर्णन पर असर पड़ रहा है केंद्रीय भाग में स्थित तरल में चल रही धाराओं (Earth core circulation) का। इन धाराओं की वजह के बाहरी पर्पटी की घूर्णन रफ्तार बढ़ी है।

एग्न्यू का विश्लेषण बताता है कि यदि रफ्तार बढ़ने की यह प्रवृत्ति जारी रही, तो अगला लीप सेकंड शायद 2026 में नहीं बल्कि 2035 में जोड़ना पड़गा। और तो और, शायद आगे चलकर लीप सेकंड घटाने की बात भी उभर सकती है।

लेकिन अब घूर्णन गति को प्रभावित करने वाला एक तीसरा कारण महत्वपूर्ण हो चला है – जलवायु परिवर्तन (climate change impact) और धरती का गर्माना। 1990 के दशक की शुरुआत से ग्रीनलैंड तथा अंटार्कटिका की बर्फ पिघलकर भूमध्य रेखा की ओर बही (polar ice melt redistribution) है। इसकी वजह से पृथ्वी का भूमध्य वाला हिस्सा थोड़ा मोटा हुआ है यानी पृथ्वी पहले की तुलना में थोड़ी पिचक गई है। इसकी वजह से घूर्णन की गति धीमी पड़ी है।

यानी कुछ कारणों से पृथ्वी की घूर्णन गति बढ़ रही है जबकि बर्फ के पिघलकर बहने से घूर्णन गति कम हो रही है। हम देख ही चुके हैं कि घूर्णन गति कम हो तो पृथ्वी का प्राकृतिक दिन लंबा (longer day due to rotation change) हो जाता है। इसलिए यूटीसी में हमें लीप सेकंड जोड़कर तालमेल बनाना पड़ता है। लेकिन यदि नेट गति उतनी तेज़ी से नहीं बढ़ती जितनी अपेक्षा है तो लीप सेकंड की ज़रूरत देर से पड़ेगी।

एग्न्यू के मुताबिक यदि बर्फ पिघलने का असर न हो तो ऋणात्मक लीप सेकंड वर्तमान अपेक्षा से काफी पहले ज़रूरी हो जाएगा (negative leap second event)। मानवीय गतिविधियां जलवायु परिवर्तन को गहराई से प्रभावित करती हैं। लीप सेकंड का टलना ऐसा ही एक प्रभाव है। वैसे समय मापन से सम्बंधित लोगों के लिए तो यह अच्छी खबर होगी क्योंकि हर थोड़े-थोड़े अंतराल के बाद जोड़े गए लीप सेकंड कंप्यूटिंग में काफी दिक्कतें पैदा करते हैं। और यदि लीप सेकंड घटाना पड़ा तो समस्या और विकट होगी क्योंकि वर्तमान कंप्यूटर कोड्स में इसे संभालने के लिए कोई व्यवस्था नहीं है।

फ्रैंकफर्ट (जर्मनी) स्थित इंटरनेशनल अर्थ रोटेशन एंड रेफरेंस सिस्टम्स सर्विस (Earth Rotation Monitoring) के क्रिश्चियन बिज़ुआर्ड का कहना है कि भविष्य में पृथ्वी के घूर्णन के सारे कयास आंतरिक कोर के व्यवहार पर निर्भर हैं और इसे समझना आसान नहीं है। सारी अनिश्चितता के बावजूद, एग्न्यू को लगता है कि जलवायु परिवर्तन (global warming impact on time) की वजह से पिघलते बर्फ का जैसा असर समय मापन पर हो रहा है, वह शायद लोगों को नींद से जगाकर जलवायु परिवर्तन के बारे में कुछ करने को उकसाएगा, और वैसा हुआ तो सबका भला होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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खाद्य सुरक्षा के लिए कृषि अनुसंधान में निवेश ज़रूरी

ज़ुबैर सिद्दिकी

खाने-पीने की चीज़ें लगातार महंगी हो रही हैं। इसकी वजह सिर्फ युद्ध, आपूर्ति शृंखला की समस्याएं या जलवायु परिवर्तन नहीं है, बल्कि एक कम नुमाया वजह भी है – कृषि सम्बंधी वैज्ञानिक शोध और नवाचारों में लगातार घटता निवेश। यदि सरकारें जल्द ही कृषि शोध में निवेश को कम से कम दुगना नहीं करतीं, तो आने वाले वर्षों में भोजन और अधिक महंगा, उपलब्धता में कमी और पर्यावरण को अधिक नुकसान हो सकता है। यह बात नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक आलेख में कही गई है, जिसे फिलिप जी. पारडे, कोनी चैन-कांग, गर्ट-जान स्टैड्स, युआन चाई, जूलियन एम. एलस्टन, जान ग्रेलिंग और हर्नान मुनोज़ ने संयुक्त रूप से तैयार किया है। यहां इसी अध्ययन का सार प्रस्तुत है।

पिछले 40 सालों में दुनिया की आबादी लगभग 80 प्रतिशत बढ़ी है, यानी करीब 3.5 अरब लोग बढ़े हैं। इसके बावजूद खाद्य उत्पादन मांग (global food production)  के साथ बना रहा, क्योंकि खेती में विज्ञान ने बड़ी भूमिका निभाई। बेहतर बीज, उर्वरक, मशीनें, कीट नियंत्रण, सिंचाई और भंडारण तकनीकों (agriculture technology) ने किसानों को उसी ज़मीन से ज़्यादा खाद्यान्न उगाने में मदद की। ये सुधार अपने-आप नहीं हुए, बल्कि सरकारी और निजी क्षेत्रों द्वारा लंबे समय तक किए गए कृषि अनुसंधान और विकास में निवेश का नतीजा थे।

हालांकि, उपरोक्त दल द्वारा 1980 से 2021 तक 150 देशों में किए गए एक वैश्विक अध्ययन (global agriculture study) से एक चिंताजनक बात सामने आई है। आबादी बढ़ने और लोगों की आय बढ़ने के कारण भोजन की मांग लगातार बढ़ रही है, लेकिन कृषि से जुड़े वैज्ञानिक शोध में निवेश (agricultural research investment) की रफ्तार धीमी पड़ती जा रही है – और कई देशों में तो यह घट भी रहा है। यह कमी पहले ही भोजन की बढ़ती कीमतों में योगदान कर रही है, और लंबे समय में इसके असर और भी गंभीर हो सकते हैं।

कृषि शोध की ज़रूरत को समझने के लिए हमें अब तक उसकी उपलब्धियों को देखना होगा। 1980 से 2021 के बीच दुनिया में कृषि से होने वाला उत्पादन लगभग 137 प्रतिशत बढ़ा, जबकि कृषि भूमि में बहुत ज़्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई। इसमें किसानों की मेहनत के साथ लंबे समय का वैज्ञानिक शोध महत्वपूर्ण था। रोग-रोधी गेहूं, जल्दी पकने वाला चावल, ज़्यादा दुधारू पशु और पानी की बचत करने वाली खेती – ये सभी दशकों के शोध से संभव हुए। इतिहास बताता है कि कृषि शोध में लगाया गया हर रुपया समाज को करीब दस रुपए से ज़्यादा का फायदा (research ROI agriculture) देता है, जिससे किसान और उपभोक्ता दोनों लाभान्वित होते हैं।

लेकिन खेती में नई तकनीक लाना आसान नहीं होता। एक नई फसल किस्म विकसित करने में 6 से 10 साल लग जाते हैं (crop development cycle), और फिर उसे किसानों तक पहुंचने में और समय लगता है। इसलिए आज कृषि शोध में किए गए फैसले आने वाले कई दशकों तक खाद्य कीमतों, उपलब्धता (future food security) और पर्यावरणीय टिकाऊपन को प्रभावित करेंगे।

वैश्विक निवेश की रफ्तार धीमी

रिपोर्ट बताती है कि 1980 से 2015 के बीच कृषि से जुड़े शोध पर दुनिया भर में खर्च हर साल औसतन 2.7 प्रतिशत बढ़ रहा था। लेकिन 2015 से 2021 के बीच यह बढ़ोतरी घटकर सिर्फ 1.9 प्रतिशत रह गई (decline in agri R&D funding), यानी करीब एक-तिहाई की गिरावट। अध्ययन में शामिल आधे से ज़्यादा देशों में शोध पर खर्च की रफ्तार धीमी पड़ी, और लगभग एक-तिहाई देशों में तो खर्च घट ही गया।

यह सुस्ती सभी तरह के देशों में दिख रही है। जो अमीर देश कभी कृषि शोध में सबसे आगे थे, वहीं सबसे ज़्यादा गिरावट नज़र आ रही है। 2015 से पहले जहां उनका खर्च सालाना करीब दो प्रतिशत बढ़ता था, अब वह वृद्धि एक प्रतिशत तक सिमट गई है। इनमें से लगभग हर चौथा देश कृषि शोध पर सरकारी खर्च कम कर चुका है।

मध्यम आय वाले देश – जैसे चीन, भारत और ब्राज़ील – अब भी निवेश बढ़ा रहे हैं, लेकिन वहां भी गति पहले जैसी तेज़ नहीं रही।  सबसे खराब हाल गरीब देशों के हैं: 2015 के बाद से इनमें से आधे से ज़्यादा देशों ने कृषि शोध पर वास्तविक खर्च घटा दिया है, जबकि इन्हीं देशों में खाद्य सुरक्षा की समस्या सबसे गंभीर है।

शोध में निवेश की कमी बहुत गलत समय पर हो रही है; जलवायु परिवर्तन खेती को और मुश्किल बना रहा है। ऊपर से मिट्टी और पानी जैसे प्राकृतिक संसाधन भी कमज़ोर हो रहे हैं। ऐसे में कृषि को बचाने के लिए कम नहीं, बल्कि ज़्यादा शोध और नवाचार (innovation ecosystem agriculture) की ज़रूरत है।

फंडिंग का बदलता संतुलन

यह अध्ययन बताता है कि कृषि शोध के लिए पैसा लगाने वाले बदल रहे हैं। वर्ष 1980 में दुनिया भर में खेती से जुड़े शोध पर होने वाले कुल खर्च का लगभग दो-तिहाई हिस्सा सरकारों, विश्वविद्यालयों और सरकारी शोध संस्थानों से आता था। लेकिन 2021 तक निजी कंपनियां लगभग आधा खर्च उठाने लगी हैं।

यह बदलाव व्यापक आर्थिक और सामाजिक परिवर्तनों का नतीजा है। जैसे-जैसे देश विकसित होते हैं, खेती में तकनीक की भूमिका बढ़ती है और श्रम पर निर्भरता कम होती जाती है। इसके अलावा लोगों के खान-पान की आदतें भी बदल रही हैं – प्रोसेस्ड और पैक्ड खाद्य पदार्थ ज़्यादा खाए जा रहे हैं। इससे खाद्य प्रसंस्करण, भंडारण, परिवहन और खुदरा तकनीकों में निजी निवेश बढ़ा है – खासकर अमीर देशों में।

निजी निवेश ज़रूरी और उपयोगी है, लेकिन वह सरकारी शोध की जगह नहीं ले सकता। कंपनियां आम तौर पर ऐसे शोध में पैसा लगाती हैं जिससे सीधा मुनाफा हो – जैसे बीज, रसायन, मशीनें या खाद्य उत्पाद। वहीं सरकार द्वारा वित्तपोषित शोध मिट्टी की सेहत सुधारने, पानी के टिकाऊ इस्तेमाल, पौधों की जेनेटिक्स को समझने व पर्यावरणीय असर को घटाने जैसे विषयों पर काम करता है। इनका सामाजिक लाभ बड़ा होता है लेकिन व्यापारिक मुनाफा कम।

अगर सरकारी और सार्वजनिक शोध पर खर्च घटता है, तो निजी नवाचार भी कमज़ोर पड़ता है, क्योंकि निजी क्षेत्र भी उन्हीं बुनियादी खोजों पर निर्भर करता है जो सरकारी फंडिंग से होती हैं। यानी सरकार द्वारा वित्तपोषित शोध में कटौती पूरी नवाचार प्रणाली की रफ्तार को धीमा कर देती है।

मध्यम-आय देशों का उद्भव और बढ़ती असमानता

1980 में जहां अमीर देश वैश्विक कृषि शोध खर्च पर हावी थे, वहीं 2021 तक मध्यम-आय देशों ने उन्हें पीछे छोड़ दिया। आज दुनिया के कुल कृषि शोध खर्च में लगभग आधा हिस्सा एशिया-प्रशांत क्षेत्र का है।

चीन, भारत और ब्राज़ील अब कृषि शोध में सबसे अधिक निवेश करने वाले देशों में शामिल हैं। यह उनकी बड़ी आबादी और खाद्य सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंताओं को दर्शाता है। कभी इस क्षेत्र का निर्विवाद नेता रहा अमेरिका अब न सिर्फ चीन से पीछे है, बल्कि सरकारी कृषि शोध खर्च में भारत से भी कम निवेश करता है।

लेकिन इसके साथ-साथ एक और चिंता बढ़ रही है – खर्च का अत्यधिक केंद्रीकरण। 2021 में कुल वैश्विक कृषि शोध खर्च में से लगभग 70 प्रतिशत दुनिया के सिर्फ शीर्ष 10 देशों से आता था, जबकि सबसे नीचे के 50 देशों का साझा हिस्सा सिर्फ 0.5 प्रतिशत (global inequality agriculture research) था। यह अंतर खास तौर पर उप-सहारा अफ्रीका जैसे गरीब क्षेत्रों के लिए चिंताजनक है, जहां 2050 तक 80 करोड़ से अधिक लोग जुड़ने की उम्मीद है, लेकिन जो अभी वैश्विक कृषि शोध खर्च का केवल 3 प्रतिशत  योगदान देता है।

पहले, गरीब देशों को अमीर देशों में हुए शोध से अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और तकनीक हस्तांतरण के ज़रिए फायदा मिलता था (CGIAR जैसे कार्यक्रम)। लेकिन अब जब मध्यम-आय देश शोध खर्च पर हावी हो गए हैं, तो वे दुनिया के सबसे गरीब क्षेत्रों के लिए अंतर्राष्ट्रीय नवाचार में पर्याप्त निवेश नहीं कर रहे। उदाहरण के लिए, एशिया की खेती के लिए बनी तकनीकें अक्सर अफ्रीका (Sub-Saharan Africa food crisis) की जलवायु, मिट्टी, कीट-रक्षा, और बाज़ारों में सीधे काम नहीं आतीं।

भोजन की बढ़ती कीमतें

इस विश्लेषण का एक अहम निष्कर्ष यह है कि कृषि उत्पादन बढ़ने की रफ्तार स्वाभाविक रूप से धीमी (crop yield stagnation) पड़ रही है। पहले उत्पादन बढ़ाना अपेक्षाकृत आसान था, लेकिन अब जैविक और भौतिक सीमाएं आड़े आ रही हैं, जिससे फसलों की पैदावार बहुत धीरे-धीरे बढ़ती है। उदाहरण के लिए, 1960 के दशक में गेहूं की वैश्विक पैदावार को 50 प्रतिशत  बढ़ाने में लगभग 12 साल लगे थे, जबकि हाल के दशकों में इतना ही इज़ाफा करने में 30 साल से भी अधिक समय लग रहा है।

ऊपर से जलवायु परिवर्तन (climate change impact on farming) और पर्यावरणीय क्षरण खेती को और मुश्किल बना रहे हैं। मौजूदा उत्पादन स्तर को बनाए रखने के लिए ही अब पहले से अधिक निवेश की ज़रूरत पड़ रही है। यदि यह निवेश नहीं हुआ, तो पैदावार थम सकती है या घट सकती है, जिससे भोजन महंगा होगा और ज़मीन, पानी व प्राकृतिक तंत्रों पर दबाव बढ़ेगा।

चूंकि कृषि शोध की प्रभाविता दिखने में अक्सर दशकों लगते हैं, इसलिए आज निवेश घटने से तत्काल संकट तो नहीं आएगा। लेकिन यह आने वाले वर्षों के लिए ज़मीन तैयार कर देगा। नतीजतन भूख, कुपोषण, गरीबी, पर्यावरण क्षति और सामाजिक अशांति जैसी समस्याएं गंभीर रूप ले सकती हैं।

क्या किया जाए?

शोधकर्ताओं का कहना है कि कृषि शोध (agri-food research funding) में घटते निवेश को तुरंत पलटना ज़रूरी है। अगले पांच साल में कृषि-खाद्य शोध पर वैश्विक खर्च दुगना किया जाना चाहिए और इसके बाद हर साल लगभग 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी होती रहनी चाहिए।

साथ ही, सरकारी और निजी शोध को बेहतर तालमेल (public-private partnership agriculture) के साथ आगे बढ़ना चाहिए। सरकारें ऐसे शोध में निवेश करें जिनमें जोखिम ज़्यादा हो लेकिन समाज को बड़ा लाभ मिले, जबकि कंपनियां वैज्ञानिक खोजों को उपयोगी उत्पादों और सेवाओं में बदलने पर ध्यान दें।

राजनीतिक बदलावों से कम प्रभावित नए वित्तीय मॉडल लंबे समय के शोध को टिकाऊ समर्थन दे सकते हैं। साथ ही, सरकारों को नियामक प्रणालियों को आधुनिक बनाना होगा ताकि जीन-एडिटिंग जैसी नई तकनीकों का सुरक्षित और ज़िम्मेदार इस्तेमाल किया जा सके।

नई तकनीकें (gene editing in agriculture) मदद को मौजूद हैं, लेकिन लगातार निवेश और मज़बूत राजनीतिक इच्छाशक्ति के बिना इन्हें किसानों और उपभोक्ताओं तक पहुंचाना मुश्किल होगा।

यदि सरकारें पिछले सफल अनुभवों पर भरोसा करके कृषि में निवेश कम करती रहीं, तो नतीजा होगा महंगा भोजन, बढ़ती असमानता (global food crisis risk) जिसका सर्वाधिक असर सबसे गरीब लोगों पर पड़ेगा। शोधकर्ताओं का संदेश साफ है: भविष्य में सस्ता और टिकाऊ भोजन इस बात पर निर्भर है कि हम आज निवेश के कैसे फैसले लेते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सर्पदंश: इक्कीसवीं सदी का समाधान

डॉ. डी. बालसुब्रमण्यन, सुशील चंदानी

जैसे-जैसे भारत ने तरक्की की, ‘संपेरों का देश’ वाली छवि धुंधली पड़ती गई है। आज हमारे पास सांपों को बचाने वाले लोग हैं। अलबत्ता, ग्रामीण इलाकों में हर साल सर्पदंश (snake bite cases) के कारण 58,000 लोग जान से हाथ धो बैठते हैं। ये मुख्यत: धान के खेतों में काम करने वाले मज़दूरों और सीमान्त व छोटे किसानों को प्रभावित करते हैं (India snakebite deaths)।

सांप के ज़हर (snake venom effects) आम तौर पर तीन तरह से नुकसान पहुंचाते हैं: रक्त विकार, मांसपेशीय लकवा और ऊतकों की मृत्यु। वाइपर के काटने पर सामान्यत: रक्त सम्बंधी दिक्कतें पैदा होती हैं जबकि कोबरा, करेत जैसे इलेपिड सांपों के ज़हर तंत्रिका सम्बंधी लकवे के कारण बनते हैं (neurotoxic venom)।

भारत के ‘चार बड़े’ सांपों (नाग, सामान्य करेत, रसल्स वाइपर और सॉ-स्केल्ड वाइपर) (Big Four snakes India) के विष के खिलाफ एक मानक एंटीवीनम (प्रति-विष) (anti-venom treatment) डिज़ाइन किया गया है। इस एंटीवीनम को बनाने के लिए इन सांपों के ज़हर की आवश्यकता होती है। भारत में सांपों के विष की आपूर्ति मुख्य रूप से धान के खेतों से और तमिलनाड़ु में झाड़-झंखाड़ वाली भूमि से आदिवासियों द्वारा पकड़े गए सांपों से होती है। ये आदिवासी इरुला स्नेक कैचर्स इंडस्ट्रियल कोऑपरेटिव सोसायटी (Irula snake catchers Tamil Nadu) के साथ जुड़े हैं।

इन चार प्रजातियों के विष के एक मिश्रण की गैर-जानलेवा खुराक घोड़ों में इंजेक्ट की जाती है। इसके बाद कई बार इंजेक्शन देकर इन प्राणियों की प्रतिरक्षा को काफी सक्रिय किया जाता है। घोड़ों को इसलिए चुना गया है कि ये बड़े प्राणी हैं और इन्हें संभालना आसान है। उनका प्रतिरक्षा तंत्र सक्रिय होकर इन विषों के खिलाफ बड़ी मात्रा में एंटीबॉडीज़ (antibody production) बनाता है। जब काफी एंटीबॉडीज़ बन जाती हैं, तब इन घोड़ों से खून लिया जाता है। एंटीबॉडी युक्त प्लाज़्मा को प्रोसेस करके उसमें से टॉक्सिन से जुड़ने वाले एंटीबॉडी खंड पृथक कर लिए जाते हैं, जिनका परीक्षण किया जाता है और फ्रीज़ड्राइ कर वायल्स में भरकर रखा जाता है (horse serum antivenom)।

यह विधि 1950 के दशक से चली आ रही है लेकिन इसकी कई सीमाएं हैं। भारत में 60 से ज़्यादा विषैले सांप (venomous snakes India) पाए जाते हैं। विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों के सांपों में, यहां तक कि एक ही प्रजाति के सांपों में विषैले पदार्थों (टॉक्सिन्स) का संघटन अलग-अलग (regional venom variation) होता है। इस लिहाज़ से ‘चार बड़े’ सांपों के लिए बनाया एंटीवीनम पर्याप्त नहीं है। इसके चलते ऐसे उपचार विकसित करने पर ध्यान दिया गया, जो किसी क्षेत्र के लिए कारगर हों या सार्वभौमिक रूप से कारगर हों।

नेचर में प्रकाशित (Nature journal research) ताज़ा निष्कर्ष हमें सर्पदंश के विरुद्ध एक व्यापक परास वाले उपचार की ओर ले जाते हैं। अंतर्राष्ट्रीय शोधकर्ताओं के साथ मिलकर डेनमार्क की एक प्रयोगशाला ने उप-सहारा अफ्रीका के सांपों (sub-Saharan snakes) पर शोध किया। इस इलाके में सर्पदंश के चलते साल में 10,000 अंग-विच्छेदन करना पड़ते हैं। शोधकर्ताओं ने इस इलाके की 18 प्रमुख सांप प्रजातियों (जिनमें कोबरा और मम्बा शामिल थे) (cobra, mamba venom) से विष एकत्रित किया और मिश्रण का इंजेक्शन अल्पाका और लामा को लगाया। दोनों ही ऊंट कुल के प्राणी हैं। ऊंट कुल का चयन इसलिए किया गया क्योंकि इनमें असाधारण एंटीबॉडी बनती हैं जो छोटी व स्थिर होती हैं। इन्हें नैनोबॉडी (nanobodies technology) कहते हैं। टॉक्सिन का इंजेक्शन देने पर ज़ोरदार प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया उभरती है और कारगर एंटीवीनम मिलता है। इस स्थिति में रक्त से बी-कोशिकाएं एकत्रित कर ली जाती है जो एंटीबॉडी उत्पन्न करती हैं। इसके बाद नैनोबॉडीज़ को कोड करने वाले डीएनए को जेनेटिक इंजीनियरिग की मदद से बैक्टीरिया-भक्षी वायरसों के जीनोम में जोड़ दिया जाता है। ये वायरस अपनी सतह पर नैनोबॉडीज़ प्रदर्शित करने लगते हैं। इनमें से उन नैनोबॉडीज़ के चुना जाता है जो सशक्त रूप से सांप के ज़हर के तत्वों से जुड़ें। इसका मतलब हुआ कि अब घोड़ों की बजाय बैक्टीरिया में एंटीवीनम का उत्पादन (recombinant antivenom) किया जा सकेगा। चूहों पर किए गए प्रयोगों में 18 में से 17 सांपों के विष के विरुद्ध एंटीवीनम क्रिया देखी गई।

भारतीय सांपों पर लौटते हैं। बीकानेर स्थित नेशनल रिसर्च सेंटर ऑन कैमल (National Research Centre on Camel) के शोधकर्ताओं ने दर्शाया है कि ऊंटों में तैयार किया गया एंटीवीनम इस इलाके में पाए जाने वाले सॉ-स्केल्ड वायपर के खिलाफ कारगर है (Saw-scaled viper treatment)। इस अनुसंधान को अन्य सर्प प्रजातियों तक विस्तार देना काफी मददगार होगा। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्राचीन आरएनए हासिल किया जा सका

पिछले कुछ दशकों से वैज्ञानिक प्राचीन डीएनए का विश्लेषण (ancient DNA research) कर अतीत के जीवन के बारे में, उद्विकास (evolution studies) के बारे में समझने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन अकेले डीएनए पर मौजूद जीन्स आधी-अधूरी कहानी बता पाते हैं। डीएनए वह अणु होता है जिसमें किसी जीव के निर्माण व कामकाज की सारी सूचना क्षारों के क्रम के रूप में मौजूद होती है। इस डीएनए के छोटे-छोटे अनुक्रम (जीन्स) के आधार पर कोशिकाओं में एक अन्य अणु बनाया जाता है जिसे आरएनए कहते हैं। आरएनए ही कोशिकाओं में प्रोटीन बनवाने (RNA sequencing) का काम करता है।

किसी जीवित जीव में कोई जीन कब और कहां सक्रिय होता है, उससे उस जीव की समझ बनाने पर बहुत फर्क पड़ सकता है। और यह जानकारी कि कोई जीन कब और कहां सक्रिय हुआ है आरएनए में दर्ज होती है। दिक्कत यह है कि आरएनए तो डीएनए से भी जल्दी अपघटित हो जाता है; कारण है उसकी नाज़ुक बनावट और उसको अपघटित करने वाले एंज़ाइम। पाठ्यपुस्तकों की ज़ुबानी, “मृत्यु के कुछ ही मिनटों या घंटों के भीतर आरएनए बरबाद हो जाता है।” इसलिए प्राचीन नमूनों से आरएनए हासिल (ancient RNA samples) करने के गिने-चुने प्रयास ही हुए हैं।

और ये प्रयास भी पिछले कुछ सालों में ही हुए हैं। सबसे पहले तो वैज्ञानिकों को पुराने मक्के और जौ के बीजों से और पर्माफ्रॉस्ट में जमे भेड़िये के ऊतक से आरएनए के खंड हासिल करने में सफलता मिली। फिर 2023 में, कुछ वैज्ञानिकों ने 132 साल पुराने तस्मानियाई टाइगर (बिल्ली जैसा मार्सुपियल) का आरएनए (Tasmanian tiger RNA) हासिल कर उसका अनुक्रमण किया। और इन्ही नतीजों से प्रेरित होकर हालिया अध्ययन किया गया (RNA preservation)

अध्ययन में, स्टॉकहोम युनिवर्सिटी के जीवाश्म विज्ञानी लव डालेन ने रूस की एकेडमी ऑफ साइंसेज़ के वैज्ञानिकों के साथ मिलकर 10 प्राचीन वुली मैमथ (हाथी जैसा झबरीला जानवर) (woolly mammoth RNA) के ऊतकों से आरएनए हासिल करने का प्रयास किया। ये नमूने पूरे मैमथ के नहीं बल्कि छोटे-छोटे टुकड़े थे। यानी आरएनए ढूंढने का मौका भी बस आर-पार की स्थिति जैसा था।

अच्छी बात कि वे इन नमूनों से ठीक-ठीक हालत में आरएनए हासिल कर पाए। उन्होंने एंज़ाइम की मदद से आरएनए अणु से डीएनए की शृंखलाएं बनाईं, फिर उन डीएनए का अनुक्रमण किया। इसके आधार पर यह अनुमान लगाया कि उन आरएनए में अनुक्रम कैसा रहा होगा। वे 10 मैमथ में से तीन मैमथ के प्राचीन आरएनए पहचान पाए (genome reconstruction); ये 39,000 से 52,000 साल प्राचीन थे।

हालांकि इन मैमथ से अधिकतर आरएनए टूटी-फूटी हालत में मिले थे, लेकिन एक मैमथ जिसका नाम यूका रखा गया है, से काफी जानकारी मिल सकी। एक तो, कुछ ऐसे आरएनए अनुक्रम मिले जो सिर्फ वाय क्रोमोसोम (Y chromosome genes) पर पाए जाने वाले जीन में होते हैं। यह हैरान करने वाली बात थी क्योंकि अब तक उनको लगता था कि यूका मादा है। यूका से मिले दूसरे आरएनए में पेशीय ऊतक बनाने और रख-रखाव रखने के निर्देश थे (mammoth biology)।

सेल पत्रिका में प्रकाशित (Cell journal study) ये नतीजे इस दिशा में शोध के और मौके खुलने की आशा जगाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

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जानवरों में सर्दी से निपटने के अनोखे तरीके

मारे लिए सर्दियों के मौसम का मतलब गर्म कपड़े, हीटर और अधिक समय घरों के अंदर बिताना है। लेकिन जंगली जीवों के पास ऐसी कोई सुविधा नहीं। कीट, सरीसृप, पक्षी और स्तनधारी – सभी ने सर्दी से निपटने के अलग-अलग तरीके (winter survival in animals) विकसित किए हैं। कोई दुबक जाता है, कोई अपनी गतिविधि धीमी कर लेता है, कोई झुंड में सटकर बैठकर गर्मी बनाए रखता है, तो कोई ठंड से बचने के लिए लंबी यात्रा करता है। ऐसे ही कुछ जीवों के खास तरीकों (animal adaptation to cold) पर यहां चर्चा की जा रही है।

मकड़ियों का तरीका (spiders in winter)

मकड़ियां देखने में ज़रा सी दिखती हैं, लेकिन कई मकड़ियां सर्दियों के लिए अच्छी तरह तैयार होती हैं। उत्तरी अमेरिका में ज़मीन पर रहने वाली मकड़ियां, जैसे वुल्फ स्पाइडर, पत्तों की चादर, लकड़ियों के नीचे या मिट्टी में थोड़ी गहराई में जाकर सर्दी बिताती हैं। बर्फ के नीचे का यह इलाका सतह की तुलना में कुछ डिग्री अधिक गर्म होता है।

मकड़ियां अपने शरीर की गर्मी खुद नहीं बना सकतीं, इसलिए ठंड बढ़ने पर उनकी गतिविधियां धीमी हो जाती हैं। इससे उनकी ऊर्जा बचती है। सर्दियों के हल्के गर्म दिनों में कुछ मकड़ियां थोड़ी देर के लिए सक्रिय भी हो जाती हैं। जाल बनाने वाली कई मकड़ियां अपने अंडों (spider eggs winter) को रेशम की मोटी तह वाले थैलों में रखती हैं। कुछ प्रजातियों में बच्चे पूरी सर्दी इसी थैले में साथ-साथ रहते हैं और बसंत आने पर बाहर निकलते हैं।

कुछ मकड़ियां तो और भी खास तरीका अपनाती हैं – वे अपने शरीर में ‘एंटीफ्रीज़’ जैसे रसायन (antifreeze chemicals in insects) बना लेती हैं। ये रसायन शरीर के अंदर बर्फ जमने से रोकते हैं, जिससे मकड़ियां बेहद कम तापमान में भी जीवित रह पाती हैं।

कछुए: बिना फेफड़ों के सांस (turtles brumation)

ठंड बढ़ते ही कछुओं की कई प्रजातियां ब्रूमेशन में चली जाती हैं, जो सरीसृपों में शीतनिद्रा जैसा होता है। इस दौरान उनकी गतिविधियां बहुत धीमी हो जाती हैं। ज़मीन पर रहने वाले कछुए, जैसे बॉक्स टर्टल, मिट्टी में दबकर जमा की हुई चर्बी के सहारे सर्दी काट लेते हैं।

पानी में रहने वाले कछुए, जैसे पेंटेड टर्टल, पूरी सर्दी (painted turtle in winter) तालाब या झील के पेंदे में रहते हैं, तब भी जब ऊपर की सतह पूरी तरह बर्फ बन जाती है। ठंडा पानी उनके शरीर को ठंडा रखता है, जिससे उन्हें कम ऑक्सीजन की ज़रूरत पड़ती है। ये कछुए हवा से सांस लेने के बजाय अपनी त्वचा, मुंह और एक विशेष छिद्र के ज़रिए सीधे पानी से ऑक्सीजन सोख लेते हैं।

जब ऑक्सीजन बहुत कम हो जाती है, तो कुछ कछुए बिना ऑक्सीजन के भी ऊर्जा बनाते हैं। इससे उनके शरीर में हानिकारक अम्ल बनता है लेकिन अपने खोल के कैल्शियम से वे उसे निष्क्रिय कर देते हैं। यानी उनका खोल (turtle shell protection) ही जाड़ों का सुरक्षा कवच है।

मधुमक्खियां: हम साथ-साथ हैं (bees in winter)

अधिकांश कीटों से अलग, मधुमक्खियां सर्दियों में भी सक्रिय रहती हैं। जैसे ही ठंड बढ़ती है, युरोपीय मधुमक्खियां छत्ते के अंदर रानी के चारों ओर जमा हो जाती हैं। कामगार मधुमक्खियां अपने पंख हिलाए बिना उड़ान वाली मांसपेशियों को तेज़ी से सिकोड़ती-फैलाती हैं, जिससे शरीर में गर्मी पैदा (honeybee winter cluster) होती है। मधुमक्खियां लगातार अपनी स्थिति बदलती रहती हैं। इससे रानी और पूरा छत्ता कड़ी ठंड में भी सुरक्षित रहता है।

इस रणनीति के लिए लंबी तैयारी ज़रूरी होती है। गर्मियों में मधुमक्खियां रस इकट्ठा कर लगभग 40 किलो शहद जमा कर लेती हैं, ताकि पूरी सर्दी उसी से ऊर्जा मिलती रहे। वे छत्ते की जगह भी काफी सोच-समझकर चुनती हैं, अक्सर खोखले पेड़ों के अंदर, जहां गर्मी बेहतर बनी रहती है (beehive winter survival)

चिपमंक: छोटी-छोटी नींद (chipmunk torpor)

चिपमंक न तो पूरी तरह शीतनिद्रा में जाते हैं और न ही पूरी तरह सक्रिय रहते हैं। वे ज़मीन के नीचे बने जटिल बिलों में रहते हैं, जहां सुरंगें और भोजन से भरे कक्ष होते हैं।

पूर्वी चिपमंक कुछ दिनों के लिए टॉरपर नाम की हल्की नींद में चले जाते हैं। इस दौरान उनकी दिल की धड़कन बहुत कम हो जाती है और शरीर का तापमान बिल की ठंडक के अनुसार गिर जाता है। हर कुछ दिनों में वे जागते हैं, जमा किया हुआ खाना खाते हैं और फिर दोबारा टॉरपर (torpor in animals) में चले जाते हैं। रुक-रुक कर सोने की यह रणनीति उन्हें ऊर्जा बचाने में मदद करती है और सतर्क भी रखती है।

पक्षी: गर्मी की ओर प्रवास (bird migration winter)

कई पक्षियों के लिए सर्दी से बचने का सबसे अच्छा तरीका है उस इलाके से पलायन कर जाना। अमेरिका और कनाडा में 70 प्रतिशत से ज़्यादा पक्षी सर्दियों में दक्षिण की ओर उड़ जाते हैं, जहां मौसम गर्म होता है और भोजन आसानी से मिलता (migratory birds) है।

कुछ पक्षियों की यात्राएं हैरान कर देने वाली होती हैं। आकार में एक सिक्के जितनी छोटी रूबी-थ्रोटेड हमिंगबर्ड (hummingbird migration) एक ही दिन में 700 किलोमीटर चौड़ी मेक्सिको की खाड़ी पार कर लेती है। वहीं रूफस हमिंगबर्ड जैसे कुछ पक्षी दक्षिण की बजाय पूर्व की ओर उड़ते हैं और फ्लोरिडा या लुइसियाना पहुंच जाते हैं।

पक्षियों का प्रवास उनके स्वभाव, दिन-रात की लंबाई, हवा की दिशा और भोजन की उपलब्धता से तय होता है। यह सफर जोखिम भरा होता है, लेकिन ऐसा करके वे कड़ाके की ठंड से बच पाते हैं।

प्रकृति अद्भुत है, और उसमें रहने वाले जीव और उनके तरीके और भी अद्भुत। उन्हें देखें, समझें, सराहें।  (स्रोत फीचर्स)

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चैथम द्वीप पर प्राचीन नौका के अवशेष मिले

ह अगस्त 2024 की बात है। चैथम द्वीपसमूह (Chatham Islands) के प्रमुख द्वीप के निवासी मछुआरा निकाऊ डिक्स ने चैथम चौपाटी से इमारती लकड़ी के कुछ टुकड़े जुटाए थे। तब उन्हें भान नहीं था कि वे महत्वपूर्ण पुरातात्विक खोज (archaeological discovery) कर रहे हैं। ये टुकड़े भारी बारिश के कारण खाड़ी से बहकर चौपाटी पर आ गए थे। अलबत्ता, वे जल्दी ही समझ गए कि ये कोई साधारण टुकड़े नहीं थे। जोड़ने पर इन्होंने एक नौका (ancient boat) का आकार ले लिया और जब वे वापिस वहां लौटे तो उन्हें लकड़ी का एक और टुकड़ा मिला जिस पर उभरे हुए खांचों की एक लड़ी थी।

उसके बाद से पुरातत्ववेत्ताओं ने उस स्थान से 450 मानव-निर्मित वस्तुएं खोजी हैं। इनमें 5 मीटर का एक पटिया है, जिसमें सुराख हैं और कई सारे छोटे-छोटे तराशे हुए लकड़ी टुकड़े हैं जिन्हें घोंघों के कवच और लावाजनित पत्थरों से सजाया गया था। इसके आसपास ही उन्हें गुंथी हुई रस्सियां भी मिलीं और लौकी की एक चिप्पी। अब वे जान गए हैं कि चौपाटी के रेत में शायद एक समूची नौका (Polynesian vaka boat) दबी हो सकती है, जिसे स्थानीय पोलीनेशियन भाषा में वाका कहते हैं।

वैज्ञानिकों ने रेडियोकार्बन डेटिंग (radiocarbon dating)  की मदद से वाका पर चिपके रेशों की उम्र पता की है। ये रेशे 1440 से 1470 ईस्वीं के बीच के हैं। यह लगभग वही समय था जब चैथम के प्रमुख द्वीप रिकाहू पर मानव बसाहट के प्रथम अवशेष मिले हैं। देशज मोरिओरी लोग (Moriori people) इस द्वीप को इसी नाम से जानते हैं।

हवाई विश्वविद्यालय के पुरातत्ववेत्ता पैट्रिक किर्क का कहना है कि लकड़ी से बनी नौका या उसके टुकड़े मिलना बहुत बिरली बात है और हर बार ऐसी खोज महत्वपूर्ण मानी जाती है। उनका कहना है कि इनका काल 15वीं सदी का है, तो यह उस समय की पोलीनेशियन समुद्री यात्राओं (Polynesian navigation) का अहम प्रमाण है। वैसे काल निर्धारण अभी पक्का नहीं है लेकिन अध्ययन के प्रमुख शोधकर्ता जस्टिन मैक्सवेल को लगता है कि इन मानव-निर्मित चीज़ों का उम्दा कुदरती परिरक्षण हुआ है और उनमें सामग्री की भरपूर विविधता दिखती है। इसके अलावा, मोरिओरी लोग इनके बारे में मौखिक परंपराओं की बातें जोड़ सकते हैं। इन सब कारणों के चलते यह खोज असाधारण है।

इससे पहले मैक्सवेल ने रिकाहू पर पहली बस्तियों का काल निर्धारण 1450 से 1650 ईस्वीं किया था। उसके लिए उन्होंने चारकोल और परागकणों के रिकॉर्ड का सहारा लिया था। रस्सी का एक टुकड़ा तो 1415 ईस्वीं का है जो इन स्थलों से भी पुराना है। और नौका के पास लौकी का टुकड़ा तो शायद 1400 ईस्वीं के आसपास का है। अलबत्ता, मैक्सवेल का मत है कि ये तारीखें सिर्फ इतना बताती (archaeological analysis) हैं कि इस वाका का आखरी उपयोग कब हुआ था; यह पता नहीं चलता कि इसे कब बनाया गया था।

अध्ययन की खास बात यह रही कि आदिवासी मुखियाओं ने वाका की लकड़ी और रेशों का काल निर्धारण करने की अनुमति दे दी थी किंतु वे अभी भी विचार कर रहे हैं कि और नमूने लेने की अनुमति दें या न दें। (स्रोत फीचर्स)

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एक ही व्यक्ति की कोशिकाओं में जेनेटिक विविधता

पाठ्यपुस्तकों में तो हमने यही पढ़ा है कि किसी व्यक्ति की सारी कोशिकाएं जेनेटिक रूप से हू-ब-हू एक जैसी होती है। यह ज़रूर संभव है कि कोशिकाओं में डीएनए की अभिव्यक्ति अलग-अलग हो लेकिन सूचना का भंडार एक ही रहता है। यह भी बताया जाता है कि उम्र के साथ डीएनए के आसपास एपिजेनेटिक परिवर्तन (epigenetic changes) होते रहते हैं, जिनकी वजह से उसके कामकाज पर असर होता है। लेकिन हाल में एक 74 वर्षीय व्यक्ति की 100 अलग-अलग कोशिकाओं के पूरे जीनोम के विश्लेषण (genome analysis) ने हैरतअंगेज़ परिणाम प्रदान किए हैं।

इन 100 कोशिकाओं में से किसी में गुणसूत्र में एक अतिरिक्त भुजा थी, किसी में डीएनए के छोटे-छोटे टुकड़े एक-दूसरे से भिन्न थे, विलोपित हो गए थे या दोहरे हो गए थे। कुछ कोशिकाओं में तो Y गुणसूत्र पूरी तरह नदारद (Y chromosome loss) था। बायोआर्काइव्स-1 में प्रकाशित शोध पत्र के एक लेखक हारवर्ड मेडिकल स्कूल के जो लुक्वेट कहते हैं कि कुछ कोशिकाएं तो एकदम गड्ड-मड्ड थीं।

दरअसल, एक ही व्यक्ति की कोशिकाओं में जेनेटिक विविधता (genetic variation) का अध्ययन एक अहम सरोकार रहा है। कारण यह है कि एक ही व्यक्ति की कोशिकाओं के बीच जेनेटिक भिन्नता (मोसेइसिज़्म या पच्चीकारिता) का असर स्वास्थ्य और कैंसर जैसी कई बीमारियों पर होता है।

जब व्यक्ति के शरीर की सारी कोशिकाएं एक ही मूल कोशिका (जॉ़यगोट) से बनी हैं, तो यह विविधता कहां से आती है। इन विविधताओं के कई स्रोत हो सकते हैं – जैसे डीएनए के प्रतिलिपिकरण या मरम्मत के दौरान होने वाली त्रुटियां, या डीएनए को क्षति पहुंचाने वाले पर्यावरणीय कारकों (पराबैंगनी प्रकाश या धूम्रपान – UV radiation, smoking) का असर।

वैसे तो इन बातों का अंदाज़ा पहले से था, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में डीएनए के अनुक्रमण (DNA sequencing technology) की टेक्नॉलॉजी में बहुत तरक्की हुई है। इससे यह समझने में मदद मिली है कि मोसेइसिज़्म कितना सामान्य है और यह स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करता है। उदाहरण के लिए, कुछ कोशिकाओं में लंबे समय में संग्रहित उत्परिवर्तन कैंसर का कारण बन सकते हैं। रक्त कोशिकाओं में Y गुणसूत्र का अभाव (Y chromosome deletion) कार्डियोवैस्कुलर रोगों और हार्ट अटैक (heart disease risk) से जुड़ा पाया गया है।

अब तक इन अंतरों का मानचित्र तैयार करके यह देख पाना मुश्किल था कि ये जीवन के किस पड़ाव में पैदा होते हैं। कारण यह है कि अधिकांश जीनोम अध्ययनों में कई सारी कोशिकाओं का डीएनए एक साथ निकालकर थोक में अनुक्रमण किया जाता है। तब एक प्रारूपिक जीनोम सामने आता है और एक-एक कोशिका में डीएनए की स्थिति नहीं दिखती। इसके अलावा, एक-एक कोशिका के जीनोम विश्लेषण के तरीके (single-cell genome analysis) परिष्कृत हुए हैं लेकिन आम तौर पर इन आधुनिक तकनीकों का उपयोग डीएनए नहीं बल्कि आरएनए के अध्ययन हेतु किया गया है। बोस्टन चिल्ड्रेन्स हॉस्पिटल की डिआने शाओ के मुताबिक इसका कारण यह है कि किसी भी कोशिका में आरएनए की तो कई प्रतियां एक साथ मौजूद होती हैं लेकिन डीएनए की दो ही प्रतियां पाई जाती हैं। वर्तमान अध्ययन ने इस चुनौती को स्वीकार करके आगे की राह दिखाई है। (स्रोत फीचर्स)

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दो सिर वाली तितलियां

कुछ तितलियों में ऐसा अनुकूलन हुआ है कि लगता है उनके दो सिर (false head adaptation) हैं। माना जाता है कि यह विशेषता उन्हें शिकारियों से बचने (predator defense) में मदद करती है। जीव वैज्ञानिक यह समझने के प्रयास करते रहे हैं कि यह विचित्र अनुकूलन हुआ कैसे। पहले तो यह देखते हैं कि ‘दूसरे सिर’ का मतलब क्या है।

दरअसल, कुछ तितलियों (butterfly species) के पंखों पर कुछ ऐसे पैटर्न और संरचनाएं विकसित हो जाती है कि वहां एक और सिर की उपस्थिति का भ्रम होता है। जैसे वहां छद्म एंटेना (fake antennae) उभर आते हैं, चटख रंग उभर आते हैं, पंख पर धारियों के पैटर्न बन जाते हैं, बड़े-बड़े धब्बे बन जाते हैं और सिर के समान संरचना विकसित हो जाती है। ऐसा माना जाता था कि ये सारे गुणधर्म एक साथ, एकबारगी प्रकट हो गए ताकि शिकारियों को भटकाया जा सके। लेकिन यह समझा नहीं जा सका था कि इन विशेषताओं का जैव-वैकासिक इतिहास क्या है।

अब इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइन्स एजूकेशन एंड रिसर्च (IISER, तिरुअनंतपुरम / IISER Thiruvananthapuram) के तरुणकिश्वर सुमनम और उल्लसा कोडांडरमैया ने प्रोसीडिंग्स ऑफ रॉयल सोसायटी-बी में इस सवाल पर प्रकाश डाला है और चरण-दर-चरण इस गुण के विकास की परतें खोली हैं।

एक बात तो पहले से पता थी – तितलियों के पंखों के पिछले सिरे पर विकसित इन गुणधर्मों का उनकी उड़ान या प्रजनन (flight & reproduction) जैसे कार्यों पर कोई प्रतिकूल असर नहीं होता है। लेकिन छद्म सिर से जुड़े इन परिवर्तनों के उभरने का क्रम क्या था? इसकी समझ बनाने के लिए आइसर के वैज्ञानिकों ने तितलियों की लगभग 1000 प्रजातियों के चित्रों का विश्लेषण किया और यह ध्यान दिया कि प्रत्येक प्रजाति में छद्म सिर के कौन-कौन से लक्षण नज़र आते हैं। इसके बाद शोधकर्ताओं ने एक वंशवृक्ष (phylogenetic tree) तैयार करके यह देखा कि छद्म सिर वाली प्रजातियां एक-दूसरे से कितनी निकटता से सम्बंधित हैं। इस वंशवृक्ष के कंप्यूटर विश्लेषण से स्पष्ट हुआ कि छद्म सिर के पांच में से चार लक्षण – नकली एंटेना, सिर के समान बनावट, चटख रंग (wing coloration) और पंख पर चमकीला धब्बा – परस्पर सम्बंधित रूप से प्रकट हुए हैं। इस विश्लेषण से यह भी पता चला कि इन लक्षणों का उभरना किस क्रम में हुआ है। पता चला कि पंख के चटख रंग सबसे पहले प्रकट हुए और उसके बाद पंखों पर धारियों का पैटर्न उभरा। इसके बाद ही नकली एंटेना और सिर जैसी बनावट विकसित हुई थी।

तो इन सबके एक के बाद एक क्रमिक विकास का कारण क्या रहा होगा?

शोधकर्ताओं का मत है कि ये सब एक साथ आ गए क्योंकि प्राकृतिक चयन (natural selection) का एक ही दबाव काम कर रहा था: शिकारियों के हमले (predator attack pressure)। अलबत्ता, यह सवाल बरकरार है कि छद्म सिर का यह गुण इन तितलियों को कितनी व किस तरह की सुरक्षा प्रदान करता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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फफूंद पर परजीवी पौधे यानी चोर के घर में चोरी

डॉ. किशोर पंवार

ह तो जानी-मानी बात है कि पौधे हवा की कार्बन डाईऑक्साइड (carbon dioxide) और ज़मीन से सोखे गए पानी का उपयोग करके अपना भोजन स्वयं बना लेते हैं। इस क्रिया को अंजाम देने के लिए उनके पास क्लोरोफिल (chlorophyll) होता है और इस प्रक्रिया के लिए ऊर्जा वे सूर्य की रोशनी से प्राप्त करते हैं। इसलिए पेड़-पौधों को स्वपोषी (ऑटोट्रॉफ- autotrophs) कहते हैं। दूसरी ओर सारे जंतु अपना भोजन प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पौधों से प्राप्त करते हैं। इन्हें हम परपोषी (हेटरोट्रॉफ – heterotrophs) कहते हैं। इस मोटी-मोटी परिभाषा के बाद थोड़ा बारीकी पर चलें।

क्या आपने कभी परपोषी पौधों (heterotrophic plants) के बारे में सुना है? चौंकिए मत, बहुत थोड़े से ही सही मगर परजीवी पौधे (parasitic plants) होते हैं। अमरबेल जैसे पौधे परजीवी हैं। ये किसी अन्य पौधे पर लिपटते हैं और अपनी विशेष चूषक जड़ें (होस्टोरियम- haustorium) उसमें घुसा देते हैं और उसके अंदर से भोजन व पानी प्राप्त करते रहते हैं। मेज़बान पौधा स्वपोषी होता है। अलबत्ता किसी अन्य पौधे का सहारा लेने वाले सभी पौधों को परजीवी नहीं कहा जा सकता। हो सकता है कि वे सिर्फ सहारा लेते हों, भोजन-पानी नहीं। कई सारी लताएं, पेड़ों पर उगने वाले ऑर्किड्स (orchids) इस श्रेणी में आते हैं।

अब परपोषी पौधों के एक अनोखे समूह की चर्चा करते हैं। ऊपर हमने देखा कि परजीवी पौधे किसी अन्य स्वपोषी पौधे से भोजन चुराते हैं। लेकिन पौधों का एक समूह है जो फफूंद से भोजन-पानी की चोरी करते हैं। अब दिलचस्प बात यह है कि फफूंद स्वयं अपना भोजन नहीं बनातीं; उनमें क्लोरोफिल का अभाव जो होता है। फफूंद यानी कवक किसी अन्य स्वपोषी पौधे से भोजन की चोरी करती हैं (हालांकि वे बदले में कुछ देती भी हैं)। और अब हम जिन पौधों की बात करने जा रहे हैं वे फफूंद से भोजन चुरा लेते हैं – यानी चोर के घर में चोरी!

इन पौधों को कवक-परपोषी या मायकोहेटरोट्रॉफ (mycoheterotrophs) कहते हैं। दुनिया भर में पाए जाने वाले ये पौधे अपनी जड़ों को मिट्टी में मौजूद कवक के धागों (कवक-तंतु यानी हाइफा) के साथ जोड़ते हैं।

पेड़-पौधों और कवकों का सम्बंध काफी प्राचीन और पेचीदा है। मायकोराइज़ा (mycorrhiza) के रूप में ये कवक पेड़-पौधों से कार्बन प्राप्त करते हैं और बदले में पोषक तत्व भी प्रदान करते हैं। यानी कवकों को परजीवी कहने की बजाय सहजीवी (symbiotic organisms) कहना बेहतर है। मायकोराइज़ा दरअसल एक सम्बंध का नाम है – फफूंद-तंतुओं और पेड़-पौधों की जड़ों के बीच परस्पर लाभदायक सम्बंध (mutualism)। इसमें फफूंद का दूर- Text Box: कुछ कवक-परपोषी पौधे
1. मोनोट्रॉपेस्ट्रम किरीशिमेन्स (Monotropastrum kirishimense): अपनी गुलाबी पंखुड़ियों के कारण, एम. किरीशिमेन्स को लंबे समय से सफेद एम. ह्यूमाइल का एक प्रकार माना जाता था जो पूरे एशिया में आम तौर पर पाया जाता है। लेकिन दो दशक पहले, वनस्पतिशास्त्री केंजी सुएत्सुगु ने पाया कि दोनों पौधों में फूल अलग-अलग समय पर आते हैं। जांच से पता चला कि एम. किरीशिमेन्स एक नई प्रजाति है जो केवल जापान में पाई जाती है। और इसमें हल्के सफेद रंग के फूल आते हैं।
2 स्पिरैन्थेस हचिजोएन्सिस (Spiranthes hachijoensis): आर्किड वंश के पौधों को आम तौर पर ‘लेडीज़ ट्रेसेस' कहा जाता है क्योंकि उनके छोटे फूल तने के चारों ओर सर्पिलाकार रूप में चोटी की तरह गुंथे होते हैं। वैज्ञानिकों का लंबे समय से मानना था कि जापान में केवल एक ही स्पिरैन्थेस प्रजाति मौजूद है, जब तक कि वनस्पतिशास्त्रियों ने यह नहीं देखा था कि कुछ पौधे दूसरों की तुलना में पहले खिलते हैं। दस साल के अध्ययन से यह निष्कर्ष निकला कि जल्दी खिलने वाले पौधे नई प्रजाति, एस. हचिजोएन्सिस, के सदस्य हैं।
3. थिस्मिया कोबेन्सिस (Thismia kobensis): 1999 में विकास कार्यों के कारण इसके अंतिम ज्ञात नमूने का निवास स्थान नष्ट हो जाने के बाद इसे विलुप्त मान लिया गया था। लेकिन 2021 में एक शौकिया वनस्पतिशास्त्री को संयोग से 30 किलोमीटर दूर यह पौधा मिला। इस प्रजाति के पौधों की संख्या दो दर्जन से भी कम है।
4. ओरिऑर्चिस पेटेंस (Oreorchis patens): कुछ आर्किड प्रजातियां प्रकाश संश्लेषण और परजीवी कवक, दोनों का उपयोग करके फलती-फूलती हैं। इसका एक उदाहरण ओ. पेटेंस है। वैसे तो यह पौधा केवल प्रकाश संश्लेषण पर ही जीवित रह सकता है लेकिन अगर इसे सही जगह पर लगाया जाए, तो ओ. पेटेंस की जड़ें लकड़ी को विघटित करने वाले कवकों को खाती हैं। परिणामस्वरूप, एक अधिक मजबूत पौधा विकसित होता है।
5. रेलिक्टिथिस्मिया किमोट्सुकिएन्सिस (Relictithismia kimotsukiensis): 2022 में, एक जापानी यात्री को एक असामान्य पौधा दिखाई दिया। थिस्मियेसी कुल के पौधों को आम तौर पर फेयरी लैंटर्न (परियों का लालटेन) कहा जाता है। (जापान में इन्हें Tanuki-no-shokudai कहते हैं जिसका अर्थ होता है रैकून डॉग कैंडलस्टिक्स)। इस प्रजाति की प्रमुख विशेषता इसके भूमिगत फूल हैं।
दूर तक फैला नेटवर्क पौधों को पानी और खनिज लवण सोखने में मदद करता है, वहीं पौधे उन्हें प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) से बनी शर्करा उपलब्ध कराते हैं। यह सहजीवी सम्बंध लगभग 90 प्रतिशत थलीय पेड़-पौधों में पाया जाता है।

दरअसल, फफूंद तंतुओं (हायफा) (hyphal network)का एक जाल बनाती हैं जो मिट्टी में दूर-दूर तक फैला होता है। इसकी मदद से वे पानी के अलावा नाइट्रोजन (nitrogen) व फॉस्फोरस (phosphorus) जैसे अनिवार्य पोषक खनिज प्राप्त करती हैं। इनमें कुछ पानी तथा खनिज पौधे की जड़ों को मिल जाते हैं। बदले में पौधा शर्करा प्रदान कर देता है। माना जाता है कि पौधों की जड़ों का भूमिगत कवकों से सम्बंध पौधों के ज़मीन पर पहुंचने और बसने में निर्णायक रहा है।

लेकिन हम जिन कवक-परपोषियों की बात कर रहे हैं, वे प्रकाश संश्लेषण के लिए सूर्य के प्रकाश और क्लोरोफिल पर निर्भर रहने की बजाय कवक से कुछ कार्बनिक पदार्थ चुरा लेते हैं। यानी यह सम्बंध सहजीवन का नहीं बल्कि परजीविता (parasitism) का है।

ऐसा अनुमान है कि 33,000 से ज़्यादा पादप प्रजातियां अंकुरण और प्रारंभिक विकास के दौरान कवक-परपोषी होती हैं। इनमें कुछ क्लब मॉस (club moss), फर्न, लिवरवर्ट (liverworts) और सभी ऑर्किड शामिल हैं। वनस्पति शास्त्रियों ने लगभग 600 ऐसी पादप प्रजातियों की भी पहचान की है जो जीवन भर कवक-परपोषी होती हैं। इनमें से लगभग आधी तो ऑर्किड प्रजातियां हैं। 10 वनस्पति कुलों की करीब 400 प्रजातियों में क्लोरोफिल पूरी तरह समाप्त हो चुका है और ये फफूंद के ज़रिए अन्य हरे पेड़-पौधों से कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करती हैं। इसके अलावा लगभग 20,000 प्रजातियां आंशिक रूप से कवक-परपोषी हैं, जो प्रकाश संश्लेषण भी करती हैं और कवक से भी कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करती हैं। ये अधिकांशत: अंकुरण के कुछ समय बाद तक ही फफूंदों पर निर्भर होती हैं।

वैसे ऑर्किड्स में फफूंद मायकोराइज़ा (orchid mycorrhiza) पर निर्भरता विवाद का विषय रही है। हालांकि सारे ऑर्किड्स अपने शुरुआती विकास के दौरान कार्बनिक पदार्थ प्राप्त करने के लिए फफूंदों पर निर्भर रहते हैं लेकिन कई ऑर्किड्स वयस्क अवस्था में इस निर्भरता से मुक्त हो जाते हैं। रेडियोकार्बन ट्रेसिंग (radiocarbon tracing) के आधार पर किए गए प्रयोगों से पता चला है कि एक हरे ऑर्किड गुडयेरा रेपेन्स (Goodyera repens) का अपने फफूंद साथी (Ceratobasidium cornigerum) से सम्बंध परपोषिता का नहीं बल्कि सहजीविता का होता है।

कवक-परपोषी पौधे: इकॉलॉजी

कवक-परपोषिता एक प्रकार का परजीवी पोषण (parasitic nutrition) तरीका है जहां कुछ पौधे अपना भोजन प्रकाश संश्लेषण की क्रिया की बजाय फफूंद से सीधे कार्बनिक पदार्थों (organic nutrients) के रूप में प्राप्त कर लेते हैं। यह सम्बंध कई वनस्पति समूहों में पाया गया है जो या तो केवल बीजों के अंकुरण के समय या जीवन भर के लिए होता है। क्लोरोफिल के अभाव वाले गैर प्रकाश संश्लेषी पौधों (non-photosynthetic plants) में यह पूर्णकालिक होता है और ये पीले या क्रीम रंग के होते हैं।

ये पौधे वहां अक्सर पाए जाते हैं जहां पोषक तत्वों की उपलब्धता कम होती है या घने जंगलों की तलहटी में पाए जाते हैं जहां प्रकाश नहीं पहुंचता।

कवक-परपोषी वस्तुत: जड़ फफूंद जाल (नेटवर्क) (fungal root network) को धोखा देते हैं और उनसे होने वाले कार्बन प्रवाह पर निर्भर रहते हैं जो सामान्यत: अन्य पौधों में परस्पर लेन-देन वाला होता है। कुल मिलाकर ये पौधे चोर हैं जो फफूंदों से सिर्फ लेते ही हैं, बदले में कुछ देते नहीं। किसी स्थान पर इनका पाया जाना प्रकाश की कमी और मिट्टी में पोषक पदार्थ के अभाव से सम्बंधित होता है। लगता है, मिट्टी में फॉस्फोरस की कमी (phosphorus deficiency) भी कवक-परपोषिता को बढ़ावा देती है।

आखिर क्यों?

जीव वैज्ञानिकों (evolutionary biologists) को यह सवाल सताता रहा है कि आखिर स्वपोषी पौधों में यह कवक-परपोषिता क्योंकर विकसित हुई होगी। वैकासिक जीव विज्ञानियों ने इस बात के प्रमाण पाए हैं कि जैव विकास की प्रक्रिया में पूर्ण कवक-परपोषिता कम से कम 50 से ज़्यादा बार स्वतंत्र रूप से विकसित हुई है। हो सकता है यह घने जंगलों, जहां प्रकाश कम होता है, में जीवित रहने के लिए एक अनुकूलन हो। लेकिन वैसे अभी कोई निश्चित कारण सामने नहीं आया है।

कोबे विश्वविद्यालय के वनस्पति शास्त्री केन्जू सुएत्सुगु कहते हैं कि जवाब न मिलने का कारण शायद यह है कि कवक-परपोषी पौधों पर बहुत कम शोध (limited research) किया गया है।

दरअसल, कवक-परपोषी वनस्पतियों पर सुएत्सुगु के अद्भुत वैज्ञानिक कार्य के चलते आज उन्हें इस विषय का प्रमुख विद्वान माना जाता है। पिछले वर्षों में उन्होंने इन पौधों के अध्ययन के अभाव की पूर्ति करने का भरसक प्रयास किया है।

बीजों का बिखराव और परागण

एक सवाल यह भी था कि ऐसे पौधों में परागण कैसे होता है और इनके बीज दूर-दूर तक बिखरते कैसे हैं। ऐसा माना जाता था कि कई कवक-परपोषी अपने धूल के कणों के आकार के बीजों को बिखेरने के लिए हवा पर निर्भर करते हैं। लेकिन इसके विरुद्ध तर्क यह था कि यह थोड़ा जोखिम भरा होगा क्योंकि एक तो इन पौधों का कद छोटा है और घने जंगलों में हवाएं भी कमज़ोर होती हैं।

सुएत्सुगु ने तीन प्रजातियों – योनिया अमाजिएंसिस, फेसेलैंथस ट्यूबिफ्लोरस और मोनोट्रॉपेस्ट्रम ह्यूमाइल (Yoania amagiensis, Phacellanthus tubiflorus, Montropastrum humile) – का गति-संचालित कैमरों (motion-triggered cameras) से 190 घंटे तक अवलोकन किया। पता चला कि गुफा झींगुर और ज़मीनी गुबरैले इन पौधों के बीजों से लदे फल खा गए। प्रयोगशाला में किए गए प्रयोगों में पाया गया कि इन पौधों के सैकड़ों बीज गुफा झींगुरों के पेट से गुज़रने के बाद भी जीवनक्षम बने रहे; जबकि ज़मीनी भृंगों द्वारा निगले जाने पर एक भी बीज जीवित नहीं बचा। पता चला कि एक काष्ठ आवरण बीजों को झींगुर के पाचक रस से तो बचाता है, लेकिन भृंग के चबाने से नहीं।

सुएत्सुगु ने अन्य अप्रत्याशित परागणकर्ताओं और बीज बिखेरने वालों की पहचान की है। कैमरा ट्रैप में एक क्लबियोना मकड़ी को आर्किड नियोटिएन्थे क्यूकुलेटा (Neottianthe cucullata) का रस चूसते और अपने जबड़ों में परागकणों को चिपकाए फूलों के बीच घूमते हुए कैद किया गया। उनके समूह ने पहली बार दिखाया कि गुफा झींगुर (cave crickets) और ऊंट झींगुर तथा चींटियां परागण और बीज बिखेरने दोनों का  काम करते हैं। वुडलाउस (Porcellio scaber) एम. ह्यूमाइल के फल खाकर मल के साथ जीवनक्षम बीज उत्सर्जित कर सकते हैं। देखा जाए, तो ये वुडलाइस जीवजगत में सबसे नन्हे बीज प्रकीर्णक हैं। 

वैसे कवक-परपोषी पौधों में स्व-परागण भी होता है। जैसे एक आर्किड, स्टिग्मैटोडैक्टाइलस सिकोकिएनस (Stigmatodactylus sikokianus) स्व-परागण और पर-परागण दोनों आज़माता है। इसका फूल शुरू में तो खुला होता है, जिससे परागणकर्ताओं को मौका मिलता है। लेकिन कुछ ही दिन बाद, वर्तिकाग्र, यानी मादा अंग, संकुचित हो जाता है, जिससे एक छोटा, उंगली जैसा उपांग फूल के नर अंग (परागकोश) के संपर्क में आ जाता है और परागकण अंडाशय तक पहुंच जाते हैं। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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