बढ़ रही है जुड़वा बच्चों की संख्या

क नए अध्ययन का निष्कर्ष है कि पूरी दुनिया में जुड़वा बच्चों की संख्या बढ़ रही है। 1980 के दशक से शुरू करें तो जुड़वा बच्चों की संख्या 30 प्रतिशत बढ़ी है। जहां 1980 से 1985 के बीच 1000 प्रसवों में जुड़वा प्रसव 9 होते थे वहीं 2010 से 2015 के बीच की अवधि में हर 1000 प्रसवों में 12 जुड़वा प्रसव थे।

अध्ययन में यह भी बताया गया है कि सिर्फ प्रतिशत ही नहीं, जुड़वा प्रसवों की कुल संख्या भी बढ़ी है। 1980 के दशक के प्रारंभ में 11 लाख जुड़वा प्रसव हुए थे और 2010 के दशक की शुरुआत में ये बढ़कर 16 लाख हो गए – यानी जुड़वा प्रसवों में 42 प्रतिशत का इजाफा हुआ।

इसके कारणों पर विचार करते हुए अध्ययन में इसका प्रमुख कारण चिकित्सकीय सहायता प्राप्त प्रजनन को बताया गया है। इसके अंतर्गत इन विट्रो फर्टिलाइज़ेशन (जिसे बोलचाल में टेस्ट ट्यूब बेबी कहते हैं) भी शामिल है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि जब निषेचन शरीर से बाहर करवाया जाता है और भ्रूण को गर्भाशय में पहुंचाया जाता है तो एक से अधिक भ्रूण पहुंचने की संभावना अधिक होती है। हालांकि अब शायद इसमें कमी आने लगेगी क्योंकि चिकित्सक अब एकाधिक भ्रूण प्रत्यारोपित करने से बचने लगे हैं।

जुड़वा प्रसव की संख्या में वृद्धि का एक कारण शायद यह भी है कि अब महिलाएं अधिक उम्र में बच्चे पैदा करने लगी हैं और बढ़ती उम्र के साथ जुड़वा गर्भ की संभावना बढ़ती है। इस अध्ययन के एक शोधकर्ता ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के समाज विज्ञानी क्रिस्टियान मोंडेन का कहना है कि इस समय दुनिया में जुड़वा बच्चों की संख्या शायद पिछले पचास सालों में सर्वाधिक है। उनके मुताबिक यह तथ्य इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि जुड़वा प्रसव के दौरान शिशु की मृत्यु की संभावना ज़्यादा होती है और मां के लिए प्रसव में पेचीदगियां पैदा होने की संभावना भी एकल प्रसव की अपेक्षा अधिक होती है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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दूध पीकर घुड़सवार चरवाहे युरोप पहुंचे

पांच हज़ार से अधिक वर्ष पहले आज यमनाया के रूप में पहचाने जाने वाले खानाबदोश वर्तमान रूस और यूक्रेन के घास के मैदानों से भारी बैल गाड़ियों में बाहर निकल पड़े थे। कुछ ही शताब्दियों में वे पूरे युरेशिया में फैल गए, और मंगोलिया से लेकर हंगरी तक की आबादी में अपने आनुवंशिक हस्ताक्षर छोड़ दिए। अब, 50 से अधिक कांस्य युगीन कंकालों के दांतों पर अश्मीभूत प्लाक बताता है कि संभवत: उनका विस्तार दूध के दम पर संभव हुआ था।

शोधकर्ताओं का काफी समय से यह अंदाज़ा था कि बग्घियों, डेयरी और घुड़सवारी के मेल ने यमनाया लोगों के लिए अधिक घुमक्कड़ जीवन संभव बनाया था। लेकिन शोधकर्ताओं के इस विचार का समर्थन करने वाले कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं थे, सिवाय कुछ दफन बग्घियों और मिट्टी के बर्तनों के।

यमनाया के फैलाव की सफलता का कारण जानने के लिए यूएसए, युरोप और रूस के शोधकर्ताओं ने दांतों के प्लाक में फंसकर सुरक्षित रह गए दूध प्रोटीन की जांच की। प्लाक के ये नमूने वर्तमान रूस के घास के मैदानों में 4600 ईसा पूर्व से 1700 ईसा पूर्व तक रहे लोगों के थे। शोधकर्ताओं ने कैस्पियन सागर के उत्तरी क्षेत्र के दो दर्जन से अधिक खुदाई स्थलों से प्राप्त 56 कंकालों की जांच की। संरक्षित प्रोटीन को प्लाक से अलग किया और फिर मास स्पेक्ट्रोमेट्री नामक तकनीक से हरेक प्रोटीन की पहचान की।

3300 ईसा पूर्व से पहले, वोल्गा और डॉन नदियों के किनारे रहने वाले लोगों के दांतों के प्लाक में दूध के कोई प्रोटीन नहीं थे। पूर्व अध्ययनों में देखा गया है कि इसकी बजाय ये यमनाया-पूर्व समूह मीठे पानी की मछली, जंगली शिकार, और कभी-कभार पालतू गाय, भेड़, या बकरी का मांस खाते थे।

फिर, लगभग 3300 ईसा पूर्व के बाद के प्लाक नमूनों में गाय, भेड़ और बकरी के दूध के प्रोटीन प्रचुर मात्रा में मिले। यह इस बात का प्रत्यक्ष प्रमाण है कि इस समय के ये लोग डेयरी उत्पादों का सेवन करते थे। कुछेक नमूनों में घोड़े के दूध की भी बहुत थोड़ी मात्रा मिली। ज्यूरिख इंस्टीट्यूट ऑफ इवॉल्यूशनरी मेडिसिन के जैव-आणविक पुरातत्वविद शेवन विल्किन कहते हैं कि कभी-कभी इन जानवरों को खाने की बजाय इन जानवरों को सदैव दोहना, यह एक सांस्कृतिक बदलाव है।

नेचर पत्रिका में प्रकाशित निष्कर्षों के अनुसार ये प्रोटीन संकेत देते हैं कि शिकारी-संग्रहकर्ताओं के तेज़ी से खानाबदोश चरवाहों में बदलने और महज़ 300 सालों में पूरे युरेशिया में फैल जाने में मुख्य भूमिका डेयरी और पशुपालन अपनाने की है। देखा जाए तो घोड़ों, मवेशियों और बकरियों ने घास को रोटी, कपड़ा और मकान में बदल दिया।

लेकिन यह सिर्फ डेयरी के कारण संभव नहीं हुआ; लगभग इसी समय बग्घियों की शुरुआत ने पानी लाना और जानवरों को दूर के चारागहों में चराने के लिए ले जाना संभव बनाया। पालतू घोड़ों ने नए यमनाया खानाबदोशों को जानवरों के बड़े-बड़े झुंडों का प्रबंधन करने में सक्षम बनाया होगा।

बहरहाल, एक रहस्य अब भी बना हुआ है। प्राचीन डीएनए के विश्लेषण बताते हैं कि यमनाया लोग लैक्टोज़ पचा नहीं पाते थे। यह संभव है कि आधुनिक मंगोलियाई लोगों की तरह यमनाया लोग भी किण्वित डेयरी उत्पाद जैसे दही या चीज़ का सेवन करते हों, जिनमें कोई लैक्टोज़ नहीं होता है। चाहे वे किसी भी रूप में वे डेयरी उत्पादों के सेवन करते हों लेकिन इतना साफ है कि इसके बगैर वे इतनी तेज़ी से, इतनी दूर तक नहीं फैल सकते थे। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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प्राचीन मानव और आधुनिक मानव साथ-साथ रहे थे

एक दशक पहले साइबेरिया की डेनिसोवा गुफा में मानव विज्ञानियों को एक मानव (अब विलुप्त, उस समय अज्ञात प्रजाति) का जीवाश्म मिला था। यह उसकी सबसे छोटी उंगली की हड्डी का था। जहां यह जीवाश्म मिला था उस जगह के नाम पर इन्हें ‘डेनिसोवन’ नाम दिया गया। अब, इस गुफा की मिट्टी से प्राप्त डीएनए के विश्लेषण से पता चलता है कि इस गुफा ने आधुनिक मनुष्यों की भी मेज़बानी की थी, और संभवत: इस गुफा में कुछ समय के लिए आधुनिक मनुष्य, डेनिसोवन्स और निएंडरथल साथ-साथ रहे थे।

यह तो पहले से पता था कि डेनिसोवा गुफा में निएंडरथल और डेनिसोवन्स सहित मनुष्य कम से कम तीन लाख साल तक रहे थे। खुदाई में मिले आठ जीवाश्मों में एक छोटी उंगली की हड्डी का जीवाश्म, तीन निएंडरथल मनुष्यों की हड्डियों के जीवाश्म, और एक ऐसे बच्चे का जीवाश्म था जिसकी माता निएंडरथल व पिता डेनिसोवन था। गुफा के अपेक्षाकृत बाद के प्रस्तरों में पत्थर के परिष्कृत औज़ार और थोड़े आधुनिक समय के आभूषण भी थे। लेकिन यहां आधुनिक मनुष्य का कोई जीवाश्म नहीं मिला था। खुदाई में मिली वस्तुओं और हड्डियों से प्राप्त डीएनए का विस्तृत अध्ययन, और पूर्व में मिट्टी से प्राप्त डीएनए के अध्ययन ने मानव विकास को समझने में इस गुफा का महत्व और भी पुख्ता किया है।

लेकिन इसे समझने के लिए सिर्फ आठ जीवाश्म का अध्ययन काफी नहीं था। इसलिए मैक्स प्लांक इंस्टीट्यूट फॉर इवॉल्यूशनरी एंथ्रोपोलॉजी की इलेना ज़वाला और उनके साथियों ने तीन कक्ष वाली इस गुफा की मिट्टी में डीएनए की पड़ताल की। वैसे तो 40 से अधिक वर्षों से मिट्टी से डीएनए हासिल कर अध्ययन किया जा रहा है लेकिन विगत चार साल में ही प्राचीन समय की मिट्टी से विलुप्त मनुष्यों के डीएनए हासिल किए जा सके हैं।

गुफा से प्राप्त विभिन्न काल की मिट्टी के 728 नमूनों का अनुक्रमण करने पर 175 में मानव डीएनए मिले। नेचर पत्रिका में प्रकाशित विश्लेषण के अनुसार विभिन्न समयों पर गुफा में विभिन्न मानव समूह आए और गए। गुफा में सबसे पहले (लगभग तीन लाख साल पहले) डेनिसोवन मनुष्य आए थे, जो आज से लगभग 1,30,000 साल पहले गुफा से चले गए थे। इसके लगभग 30,000 साल बाद डेनिसोवन्स का एक भिन्न समूह गुफा में आया जिन्होंने पत्थर के औज़ार बनाए। निएंडरथल मानव लगभग 1,70,000 साल पहले इस गुफा में आए, और इसके बाद विभिन्न कालखंड में इनके विभिन्न समूह इस गुफा रहे। निएंडरथल किसी समय पर डेनिसोवन्स के साथ रहे होंगे।

सबसे अंत में, लगभग 45,000 साल पहले, आधुनिक मनुष्य इस गुफा में आए। कुछ प्रस्तर ऐसे भी हैं जिनकी मिट्टी में तीनों समूहों के डीएनए के नमूने मिले हैं। लेकिन यह प्रस्तर इतने बड़े कालखंड का है कि पक्के तौर पर यह नहीं कहा जा सकता कि तीनों मानव समूह किसी समय में साथ रहे थे या नहीं। बाद के समय की मिट्टी में मिले आभूषण और परिष्कृत वस्तुएं देख कर शोधकर्ताओं का विचार तो था कि वहां आधुनिक मनुष्य रहा करते थे। लेकिन यह अंदाज़ा नहीं था वे 45,000 साल पहले ही वहां पहुंच गए थे।

बहरहाल, यह अध्ययन जीवाश्म और मिट्टी के नमूनों, दोनों के जीनोमिक डैटा का समन्वय है जो वास्तव में नई दिशा देता है। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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तालाबंदी की सामाजिक कीमत – सोमेश केलकर

म तौर पर कीमत को हम मुद्रा से जोड़कर देखते हैं। लेकिन यहां हम सामाजिक कीमत की बात करेंगे। सामाजिक कीमत वह है जिसे किसी उद्देश्य पूर्ति के लिए समाज सामूहिक रूप से वहन करता है। भारत के संदर्भ में यह पिछले साल मार्च और फिर इस साल अप्रैल-मई में की गई तालाबंदी के कारण समाज द्वारा झेली गई पीड़ा और क्षति है। इस लेख में हम देखेंगे कि कैसे आनन-फानन तालाबंदी ने लोगों का जीवन प्रभावित किया और किस तरह तालाबंदी की सामाजिक कीमत कम की जा सकती थी।

तालाबंदी के कारण मौतें

भारत में मई 2021 तक मरने वालों की अधिकारिक संख्या 2,95,525 थी जिसका कारण सिर्फ महामारी नहीं थी। समाचार वेबसाइट theprint.in के अनुसार सिर्फ केरल में अप्रैल 2020 तक तालाबंदी के दौरान भूख, पुलिस की बर्बरता, चिकित्सा सहायता में देरी, आय के स्रोत चले जाने, भोजन व आश्रय न मिलने, सड़क दुर्घटनाओं, शराब की तलब, अकेलेपन या बाहर निकलने पर पाबंदी और तालाबंदी से जुड़े अपराध (गैर-सांप्रदायिक) के कारण 186 लोगों की जान चली गई थी।

अनौपचारिक क्षेत्र

देशव्यापी तालाबंदी के दौरान भारत के अधिकांश हिस्सों में कोविड-19 से लड़ने के लिए आवश्यक वस्तुओं की निर्बाध आपूर्ति की कोशिश हो रही थी। लेकिन मुख्य सवाल यह है कि इतने बड़े पैमाने पर उत्पादन और कम लागत पर वितरण की मांग को पूरा करने के लिए श्रमिकों को क्या कीमत चुकानी पड़ी? ये ऐसे सवाल हैं जिनमें संक्रमण काल से परे दीर्घकालिक मानवीय चिंता झलकती है।

असंगठित और प्रवासी श्रमिकों का एक बड़ा वर्ग (39 करोड़) है, जो सबसे कमज़ोर है और सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के दायरे से या तो बाहर है या उसकी परिधि पर है। तालाबंदी की सामाजिक कीमत सबसे अधिक इसी मज़दूर वर्ग ने चुकाई है। और इसी वजह से यह तबका शोषण और मानव तस्करी जैसे संगठित अपराधों का आसानी से शिकार बन जाता है।

प्रवासी मज़दूरों के लिए अपने गांव वापस जाना भी आसान नहीं था। कई राज्यों में श्रमिकों को अपने गांव पहुंचने से पहले और बाद में अभाव और भूख का सामना करना पड़ा। उन्हें अपने दैनिक निर्वाह के लिए महंगा कर्ज़ लेने को मजबूर होना पड़ा। इसने बच्चों को अपने माता-पिता द्वारा लिया कर्ज चुकाने के लिए बंधुआ मज़दूरी और भुगतान-रहित मज़दूरी करने की ओर धकेल दिया।

2020 के उत्तरार्ध में तालाबंदी के बाद जब चीज़ें सामान्य होने लगीं और कारखाने पूरी क्षमता के साथ शुरू हो गए तो कारखाना मालिकों ने अपने नुकसान की भरपाई के लिए श्रमिकों को कम पैसों पर रखना शुरू किया। ज़रूरतमंद, कमज़ोर और असंगठित श्रमिक पर्याप्त मज़दूरी या अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने की स्थिति में न होने के कारण कम मज़दूरी पर काम करने लगे। कई राज्य सरकारों ने अर्थ व्यवस्था दुरुस्त करने की आड़ में श्रमिक कानूनों में ढील देकर श्रमिकों की मुसीबत और बढ़ा दी।

काम पर रखे गए नए मज़दूरों में बड़ी संख्या में बच्चे थे, परिवार की मदद करने के कारण उनका स्कूल छूट गया। कारखानों में मज़दूरी के लिए हज़ारों बच्चों की तस्करी भी हुई, जहां उन्हें अत्यंत कम मज़दूरी पर काम करना पड़ा और संभवत: शारीरिक, मानसिक और यौन उत्पीड़न भी झेलना पड़ा।

केंद्र और राज्य सरकारों को इन चुनौतियों से निपटने के लिए वृहद योजना बनाने की ज़रूरत है। खासकर असुरक्षित/हाशिएकृत बच्चों की सुरक्षा के लिए। यहां कुछ ऐसे तरीकों का उल्लेख किया जा रहा है जिन्हें अपनाकर दोनों तालाबंदी का बेहतर प्रबंधन किया जा सकता था –

1. कानूनी ढांचे का आकलन और समीक्षा: केंद्र सरकार को मानव तस्करी के मौजूदा आपराधिक कानून, इसकी अपराध रोकने की क्षमता और पीड़ितों की ज़रूरतों को पूरा करने की क्षमता का आकलन करके लंबित मानव तस्करी विरोधी विधेयक को संशोधित करके संसद में पारित करवाना चाहिए।

2. कारखानों और विनिर्माण इकाइयों का निरीक्षण: छोटे और मध्यम व्यवसायी कारखानों को गैर-कानूनी ढंग से न चला पाएं, इसके लिए उनका निरीक्षण करना और उन्हें जवाबदेह बनाना चाहिए। बाल श्रम कानूनों के अनुपालन पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। साथ ही बाल श्रम रोकने के लिए कम से कम अगले दो वर्षों तक पंजीकृत कारखानों और अन्य निर्माण इकाइयों का गहन निरीक्षण किया जाना चाहिए।

3. कानून के अमल और पीड़ितों के पुनर्वास हेतु बजट आवंटन में वृद्धि: विमुक्त बंधुआ मज़दूरों के पुनर्वास के लिए 2016 में केंद्र सरकार ने अपनी योजना के तहत पीड़ितों को तीन लाख रुपए तक के मुआवज़े का प्रावधान रखा था। लेकिन बजट में योजना के लिए कुल आवंटन महज़ 100 करोड़ रुपए है जबकि योजना को बनाए रखने का न्यूनतम खर्च ही 100.2 करोड़ रुपए है। इसमें तत्काल वृद्धि आवश्यक है।

4. ऋण प्रणाली का विनियमन: ग्रामीण भारत में स्थानीय साहूकारों द्वारा तालाबंदी से प्रभावित लोगों का शोषण रोकने के लिए विनियमन की आवश्यकता है। इसमें उधार देने के लिए लायसेंस और ब्याज दर की उच्चतम सीमा निर्धारित करने के अलावा, सरकारी बैंकों द्वारा उचित शर्तों पर दीर्घावधि कर्ज़ देना व उदार वसूली प्रक्रियाएं शामिल हों। बंधुआ मज़दूरी को समाप्त करने में राज्य सरकारों की सक्रिय भूमिका हो।

महिलाएं

तालाबंदी की सामाजिक कीमत महिलाओं और बच्चों को भी चुकानी पड़ी है। आर्थिक के अलावा मनोवैज्ञानिक असर भी देखे जा रहे हैं। लोग पहले ही गंदगी और बदतर स्थितियों में रहने को मजबूर थे और अनियोजित तालाबंदी के कारण लिंग-आधारित हिंसा, बाल-दुर्व्यवहार, सुरक्षा में कमी, धन और स्वास्थ्य जैसी सामाजिक असमानताएं बढ़ी हैं। महिलाएं वैसे ही अपने स्वास्थ्य की उपेक्षा करती हैं। ऊपर से लॉकडाउन के दौरान महिलाओं के स्वास्थ्य – मासिक स्राव सम्बंधी स्वास्थ्य, मानसिक स्वास्थ्य और पोषण – की और उपेक्षा हुई है और सीमित हुए संसाधनों ने स्थिति को और भी बदतर बनाया है।

तालाबंदी के दौरान बाल विवाह की संख्या में भी वृद्धि देखी गई है। केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार वर्ष 2020 की तालाबंदी के दौरान, बाल विवाह से सम्बंधित लगभग 5584 फोन आए थे।

स्कूल बंद होने के कारण परिवारों और युवा लड़कियों तक पहुंच पाना और बाल-विवाह के मुद्दे पर बात करना मुश्किल हो गया है। बाल अधिकार कार्यकर्ताओं के अनुसार बाल विवाह के चलते लड़कियों का स्कूल छूट जाता है। और यदि हालात बिगड़ते हैं तो उन्हें गुलामी और घरेलू हिंसा भी झेलनी पड़ती है।

तालाबंदी में नौकरी गंवाने और आय न होने के चलते प्रवासी कामगार और मज़दूर भुखमरी और कर्ज़ की ओर धकेले गए। इस स्थिति में उन्हें बेटियों का शीघ्र विवाह करना ही उनकी सुरक्षा और जीवन के लिए उचित लगा।

शिक्षा

शिक्षा पर तालाबंदी का प्रभाव विनाशकारी रहा। मार्च 2020 में सख्त तालाबंदी लगते ही स्कूल भी बंद कर दिए गए। और बंद पड़े स्कूल अब तक सबसे उपेक्षित मुद्दा रहा है। विश्व बैंक ने अपनी 2020 की रिपोर्ट बीटन ऑर ब्रोकन: इनफॉर्मेलिटी एंड कोविड-19 इन साउथ एशिया में पर्याप्त डैटा के साथ इस पर एक व्यापक विश्लेषण प्रकाशित किया है कि कैसे महामारी ने दक्षिण एशियाई क्षेत्र को प्रभावित किया।

इस रिपोर्ट का एक दिलचस्प बिंदु है अर्थव्यवस्था पर स्कूल बंदी का प्रभाव। तालाबंदी की घोषणा के बाद से ही दक्षिण एशिया में स्कूल बंद हैं। भारत में भी मार्च 2020 से स्कूल बंद कर दिए गए थे। अधिकतर शहरी निजी स्कूलों ने ऑनलाइन शैली में कक्षाएं शुरू कर दी थीं। लेकिन सरकारी स्कूल अब भी कक्षाएं संचालित करने के लिए संघर्ष कर रहे हैं क्योंकि सुदूर और ग्रामीण इलाकों में रहने वाले बच्चों की इंटरनेट तक पहुंच नहीं है या उसका खर्च वहन करने की सामथ्र्य नहीं है। यह एक गंभीर मुद्दा है।

विश्व बैंक ने शायद पहली बार अपनी रिपोर्ट में स्कूल बंदी के प्रभावों के मौद्रिक आकलन की कोशिश की है। रिपोर्ट के नतीजे चौंकाने वाले हैं। रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशियाई क्षेत्र में 39.1 करोड़ बच्चे स्कूलों से वंचित हुए जिसके कारण सीखने का गंभीर संकट पैदा हो गया है। महामारी के कारण 55 लाख बच्चे पढ़ाई छोड़ भी सकते हैं। इसके अलावा, स्कूल बंदी से स्कूली शिक्षा के 6 महीनों के समय का नुकसान हुआ है।

रिपोर्ट कहती है कि स्कूल बंद होने से न केवल सीखने पर अस्थायी रोक लगती है, बल्कि छात्रों द्वारा पूर्व में सीखी गई चीज़ों को भूलने का भी खतरा होता है। इसका आर्थिक असर भी चौंकाने वाला है। स्कूल बंदी के परिणामस्वरूप दक्षिण एशियाई क्षेत्र को 622 अरब डॉलर से 880 अरब डॉलर तक का नुकसान होने का अंदेशा है।

रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशिया में एक औसत बच्चे के वयस्क होने के बाद उसकी जीवन भर की कमाई में कुल 4400 डॉलर की कमी आएगी जो उसकी संभावित आमदनी का 5 प्रतिशत है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि वर्तमान तालाबंदी से होने वाला कुल आर्थिक नुकसान, वर्तमान में शिक्षा पर किए जाने वाले खर्च से काफी अधिक है।

सामाजिक पतन

भारत और अन्य देशों में कई तरह के नस्लवाद ने लोगों को बांट दिया है। धर्म-आधारित घृणा, जाति आधारित भेदभाव और उत्तर-पूर्वी लोगों को कलंकित करना किसी भी अन्य भेदभाव के समान ही घातक है। अनभिज्ञ और पक्षपाती मीडिया और लोगों ने देश के सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुंचाया है और कोविड-19 के खिलाफ लड़ाई को सामाजिक रूप से बहुत प्रभावित किया है। सार्स-कोव-2 वायरस को उसकी उत्पत्ति के चलते चीनी वायरस कहकर चीन के लोगों के साथ भेदभाव का माहौल बना। यह संवेदनशीलता के गिरते स्तर का द्योतक है। समाज ने तालाबंदी की यह एक और कीमत चुकाई है।

यदि उचित उपाय नहीं किए गए तो जातिवाद के विचार स्वाभाविक रूप से लोगों की मानसिकता में बने रहेंगे जो समाज की शांति और स्थिरता के लिए खतरा होगा। नस्लवाद के इस अदृश्य घातक वायरस से लड़ने के लिए व्यक्तिगत, सामुदायिक और सरकारी स्तर पर, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के स्तर पर दीर्घकालिक नियोजन और सामूहिक प्रयास किए जाने चाहिए। भारत में नेताओं को भाषा और मुद्दों के प्रति अधिक संवेदनशील होने की आवश्यकता है। उन्हें समस्या के समाधान निकालने के प्रयास करने चाहिए न कि समाधान में अड़ंगा लगाना चाहिए।

निष्कर्ष

यहां हमने तालाबंदी की समाज द्वारा चुकाई गई कुछ कीमतों पर ध्यान दिया। लेकिन हमारे आसपास कई और भी मुद्दे हैं जो दिखते तो हैं लेकिन उपेक्षित रह जाते हैं। जैसे किराए की दुकान में अपना व्यवसाय करने वाले छोटे व्यवसाय, तालाबंदी में दुकान बंद रखने के कारण उनकी आय तो रुक गई लेकिन दुकान का किराया तो देना ही पड़ा होगा।

भले ही आकलन करना कठिन हो, लेकिन स्पष्ट है कि 2020 और 2021 दोनों में भारत के लॉकडाउन की सामाजिक कीमत काफी अधिक रही है। तालाबंदी जैसे कठोर उपायों को लागू करने से पहले व्यवस्थित योजना तालाबंदी की सामाजिक कीमत कम करने और लोगों का नुकसान कम करने व कम से कम असुविधा सुनिश्चित कर सकती है। यह सभी के लिए हितकर होगा कि हम अपनी गलतियों से सीखें, स्वास्थ्य व स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे को दुरुस्त करने पर अधिक ध्यान दें, चिकित्सा अध्ययन को प्रोत्साहित करने के तरीके खोजें, और यह सुनिश्चित करें कि हमारे डॉक्टर देश छोड़कर न जाएं।

तालाबंदी अपर्याप्त स्वास्थ्य सेवा की भरपाई का अंतिम उपाय है, महामारी का समाधान नहीं। ज़रूरत है कि समाज के कमज़ोर वर्गों को होने वाले नुकसान को कम से कम करने के लिए उचित योजना बनाई जाए, और स्वास्थ्य सेवा में भारी निवेश किया जाए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि भविष्य में ऐसी स्थिति फिर से उत्पन्न होने पर हमें स्वास्थ्य के कमज़ोर ढांचे की वजह से तालाबंदी न करनी पड़े। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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सूक्ष्मजीवों की मेहरबानी है चॉकलेटी स्वाद

च्चे ही नहीं हर उम्र के लोग चॉकलेट के शौकीन होते हैं। लेकिन शायद ही इसके शौकीनों को यह मालूम होता है कि चॉकलेट में यह स्वाद किण्वन के कारण आता है, जिसे सूक्ष्मजीव अंजाम देते हैं।

पेरू से लेकर बेल्जियम तक दुनिया भर की तमाम चॉकलेट प्रयोगशालाओं के स्व-घोषित चॉकलेट विज्ञानी यह समझने की कोशिश में हैं कि किण्वन चॉकलेट के स्वाद को कैसे बदलता है। इसके लिए कभी वे प्रयोगशाला में कृत्रिम किण्वन करते हैं, तो कभी प्रकृति में किण्वित ककाओ बीन के नमूनों का अध्ययन करते हैं। और प्रयोगशाला में चॉकलेट के कई नमूने तैयार कर वालंटियर्स से उनका स्वाद पूछते हैं।

इस तरह कई दशकों के अध्ययन के बाद शोधकर्ताओं ने ककाओ के किण्वन के बारे में बारीकी से जानकारी हासिल की है, और इस किण्वन में शामिल और चॉकलेट का स्वाद और गुणवत्ता बढ़ाने वाले सूक्ष्मजीवों के बारे में पता लगाया है।

चॉकलेट जिन बीजों से बनकर तैयार होती है उसके रग्बी फुटबॉल नुमा फल थियोब्राोमा ककाओ (Theobroma cacao) नामक पेड़ के तने पर लगते हैं। पेड़ों से तोड़कर इन चमकीले रंग के फलों को खोलकर अंदर से उनका गूदा और बीज निकाल कर अलग कर लिए जाते हैं। बीजों को बीन्स कहते हैं। इसके बाद उपचार के चरण में बीन्स को तीन से 10 दिन तक किण्वन के लिए छोड़ा जाता है। किण्वन होने के बाद इन्हें धूप में सुखाया जाता है और सूखे हुए बीन्स को भुना जाता है। इन्हें चीनी और कभी-कभी सूखे दूध के साथ इतना महीन होने तक पीसा जाता है कि मुंह में रखने पर दोनों के कण अलग-अलग महसूस न हों। इस रूप में आने के बाद यह मिश्रण चॉकलेट बार, चॉकलेट चिप्स या अन्य किसी भी रूप में चॉकलेट के उत्पाद बनाने के लिए तैयार होता है।

उपचार के चरण में बीन्स में कुदरती रूप से किण्वन होता है। वास्तव में चॉकलेट के स्वाद के लिए सैकड़ों तरह के यौगिक ज़िम्मेदार होते हैं, इनमें से कई यौगिक किण्वन की प्रक्रिया के दौरान ही बनते हैं और बेस्वाद बीन्स को चॉकलेटी स्वाद देते हैं।

ककाओ का किण्वन कई चरणों में होता है। किण्वन के लिए खमीर का उपयोग किया जाता है, इसमें कई बार बीयर और वाइन के किण्वन के लिए उपयोग किए जाने वाले खमीर का भी उपयोग किया जाता है। ककाओ के किण्वन के दौरान खमीर बीन्स से चिपके शर्करा पल्प को पचाकर एल्कोहल का निर्माण करते हैं। नतीजतन स्वाद प्रदान करने वाले एस्टर और फूल की खुशबू वाले एल्कोहल बनते हैं, जो ककाओ बीन्स द्वारा सोख लिए जाते हैं और अंत तक चॉकलेट में मौजूद रहते हैं।

जब बीन्स से चिपका गूदा विघटित होने लगता है तो उसमें ऑक्सीजन प्रवेश करती है। ऑक्सीजन के प्रवेश करने पर वहां ऑक्सीजन-प्रेमी बैक्टीरिया की संख्या बढ़ने लगती है और खमीर की आबादी में कमी आने लगती है। इन ऑक्सीजन-प्रेमी बैक्टीरिया को एसिटिक एसिड बैक्टीरिया के नाम से भी जाना जाता है क्योंकि ये खमीर द्वारा बनाए गए एल्कोहल को एसिटिक एसिड में परिवर्तित करते हैं।

बैक्टीरिया द्वारा बनाया गया यह एसिड भी बीन्स द्वारा सोख लिया जाता है, जो बीजों में जैव-रासायनिक परिवर्तन लाता है। इसकी वजह से वसा एकत्रित होने लगती है। कुछ एंज़ाइम प्रोटीन को छोटे-छोटे पेप्टाइड्स में तोड़ देते हैं, जो भुनने के दौरान ‘चॉकलेटी’ महक देते हैं। कुछ अन्य एंज़ाइम ऑक्सीकरण-रोधी पोलीफेनॉल, जिसके लिए चॉकलेट प्रसिद्ध है, को तोड़ देते हैं। नतीजतन, इसकी खासियत के विपरीत, अधिकांश चॉकलेट में बहुत कम पोलीफेनॉल्स होते हैं, किसी-किसी चॉकलेट में तो पोलीफेनॉल्स होते ही नहीं।

एसिटिक एसिड बैक्टीरिया द्वारा रोक दी गई प्रक्रियाओं के कारण चॉकलेट के स्वाद पर बड़ा असर पड़ता है। इन एसिड के कारण ही अत्यंत कड़वे, गहरे बैंगनी रंग के पोलीफेनॉल अणु मद्धम स्वाद वाले, भूरे रंग के ओ-क्विनोन रसायन में बदलते हैं। और इसी जगह आकर ककाओ बीन्स कड़वे स्वाद से एक समृद्ध और चॉकलेटी स्वाद में आ जाते हैं। स्वाद के साथ-साथ रंग में भी परिवर्तन आता है और लाल-बैंगनी रंग के बीन्स भूरे रंग के हो जाते हैं, यानी चॉकलेट यहां अपना रंग पाती है। अंत में, एसिड धीरे-धीरे वाष्पित हो जाते हैं और शर्करा उपयोग हो जाती है। फिर अन्य सूक्ष्मजीव जैसे कवक और बेसिलस बैक्टीरिया अपना काम शुरू करते हैं।

चॉकलेट बनने में सूक्ष्मजीव जितने अहम होते हैं, कभी-कभी वे चॉकलेट का उतना ही नाश भी कर डालते हैं। बेसिलस बैक्टीरिया की संख्या में अत्यधिक वृद्धि चॉकलेट को बासा और बेकार स्वाद देती है।

ककाओ के किण्वन के लिए किसान प्राकृतिक सूक्ष्मजीवों पर निर्भर होते हैं ताकि चॉकलेट को अपना अनूठा और स्थानीय स्वाद मिले। इसे ‘टेरोइर’ कहा जाता है: यानी किसी स्थान के कारण आने वाली विशेषता या स्वाद। ठीक अंगूर के किण्वन की तरह, ककाओ के मामले में भी स्थानीय सूक्ष्मजीव किसान के अपने अनूठे तरीके के साथ मिलकर चॉकलेट को स्थानीय विशेषता और भिन्न स्वाद प्रदान करते हैं।

यदि आप चॉकलेट के इतने अलग-अलग स्वादों से महरूम हैं तो कभी इनका भी आंनद लीजिए और सूक्ष्मजीवों की इस मेहनत को भी दाद दीजिए। (स्रोत फीचर्स)

नोट: स्रोत में छपे लेखों के विचार लेखकों के हैं। एकलव्य का इनसे सहमत होना आवश्यक नहीं है।
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टीके से जुड़े झूठे प्रचार को रोकने की पहल

हाल ही में ट्विटर ने अपने सोशल मीडिया प्लेटफार्म से ऐसे अकाउंट्स को निलंबित या बंद कर दिया है जो नियमित रूप से कोविड-19 टीकों से जुड़ी भ्रामक जानकारी फैला रहे थे। इसी तरह की एक पहल के तहत अमेरिकी वैज्ञानिकों ने कोविड-19 टीके के बारे में भ्रामक जानकारियों के विरुद्ध मोर्चा खोल दिया है।

कुछ सर्वेक्षणों से पता चला है भ्रामक खबरों के परिणामस्वरूप अमेरिका की 20 प्रतिशत से अधिक जनसंख्या टीकाकरण के विरोध में है। शोधकर्ता सोशल मीडिया पर टीके से सम्बंधित गलत सूचनाओं को ट्रैक करने और भ्रामक सूचनाओं, राजनैतिक बयानबाज़ी और जन नीतियों से टीकाकरण पर पड़ने वाले प्रभावों का डैटा एकत्र कर रहे हैं। इन भ्रामक सूचनाओं में षड्यंत्र सिद्धांत काफी प्रचलित है जिसके अनुसार महामारी को समाज पर नियंत्रण या अस्पतालों का मुनाफा बढ़ाने के लिए बनाया-फैलाया गया है। यहां तक कहा जा रहा है कि टीका लगवाना जोखिम से भरा और अनावश्यक है।

इस संदर्भ में वायरेलिटी प्रोजेक्ट नामक समूह ट्विटर और फेसबुक जैसे प्लेटफार्म द्वारा टीकों से जुड़ी गलत जानकारियों से निपटने के प्रयासों में तथा जन स्वास्थ्य एजेंसियों और सोशल-मीडिया कंपनियों के साथ मिलकर नियमों का उल्लंघन करने वालों की पहचान करने में मदद कर रहा है।

स्टैनफोर्ड इंटरनेट ऑब्ज़र्वेटरी की अनुसंधान प्रबंधक रिनी डीरेस्टा के अनुसार शोधकर्ताओं ने टीकाकरण के संदर्भ में भ्रामक प्रचार के चलते सार्वजनिक नुकसान की आशंका के कारण इस पर ध्यान केंद्रित किया गया है। हालांकि, सोशल मीडिया कंपनियां सभी मामलों में तो सच-झूठ की पहरेदार नहीं बन सकती लेकिन नुकसान की संभावना को देखते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ संतुलन अनिवार्य है।

फरवरी में ट्विटर, फेसबुक (इंस्टाग्राम समेत) ने झूठे दावों को हटाने के प्रयासों को विस्तार दिया है। दोनों ही कंपनियों ने घोषणा की है कि झूठी खबरें फैलाने वाली पोस्ट और ट्वीट को हटाया जाएगा और बार-बार नीतियों का उल्लंघन करने वालों के अकाउंट्स बंद भी कर दिए जाएंगे।

यह देखा गया है कि वेब पर गलत जानकारी अपेक्षाकृत थोड़े-से लोगों (सुपरस्प्रेडर्स) द्वारा फैलाई जाती है। इनमें अक्सर पक्षपाती मीडिया, सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर और राजनीतिक हस्तियां शामिल होती हैं।  

गौरतलब है कि कोविड-19 के बारे में लोगों की सोच का अनुमान लगाने के लिए बोस्टन स्थित नार्थवेस्टर्न युनिवर्सिटी, मेसाचुसेट्स के राजनीति वैज्ञानिक डेविड लेज़र के नेतृत्व में अमेरिका के सभी 50 राज्यों में प्रति माह 25,000 से अधिक लोगों का सर्वेक्षण किया जा रहा है और साथ ही ट्विटर का उपयोग करने वाले 16 लाख लोगों की जानकारी भी एकत्रित की जा रही है। 

फरवरी में लगभग 21 प्रतिशत लोगों ने टीकाकरण करवाने से इनकार किया। स्वास्थ्य कर्मियों में यह आंकड़ा लगभग 24 प्रतिशत था। देखा गया कि इस फैसले के पीछे शिक्षा का स्तर एक मुख्य कारक रहा। टीम यह समझने का प्रयास कर रही है कि स्वास्थ्य सम्बंधी गलत जानकारी का सामना करने में कौन-सी चीज़ें प्रभावी हो सकती हैं। लगता है कि डॉक्टर और वैज्ञानिकों को सबसे भरोसेमंद माना जाता है जबकि पक्षपातपूर्ण राजनीतिक नेताओं के संदेशों पर विश्वास की संभावना कम होती है। ऐसे में डॉक्टर की सकारात्मक सलाह लोगों की पसंद को प्रभावित कर सकती है। (स्रोत फीचर्स)

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मध्यकालीन प्रसव-पट्टे के उपयोग के प्रमाण

ध्ययुग में प्रसव के दौरान जच्चा-बच्चा की मृत्यु होना काफी आम बात थी। इस समय के ग्रंथों में सुरक्षित गर्भावस्था और प्रसव के लिए अभिमंत्रित कमरबंद का उल्लेख काफी मिलता है। लेकिन वास्तव में ऐसी बातों पर अमल किया जाता था या नहीं यह जानकारी नहीं थी। हाल ही में शोधकर्ताओं ने इंग्लैंड में मिले 15वीं शताब्दी के एक कमरबंद का विश्लेषण करके इस बात की पुष्टि की है कि मध्य काल में महिलाएं गर्भावस्था में अपनी और अपने बच्चे की सुरक्षा के लिए इस तरह के कमरबंद सचमुच पहना करती थीं। और तो और, वे प्रसव के दौरान भी इसे बांधे रखती थीं।

प्राप्त कमरबंद (जिसे नाम दिया गया है पांडुलिपि-632) भेड़ की खाल से बना लगभग 332 सेंटीमीटर लंबा और 10 सेंटीमीटर चौड़ा चर्मपत्र था। इस पर धार्मिक प्रतीक और मंत्र अंकित थे। इसकी लंबाई-चौड़ाई देखकर लगता है कि इसे शरीर पर लपेटा जाता होगा। प्रसव से सम्बंधित संतों और पैगंबरों के नामों के अलावा इस कमरबंद पर अंकित था: ‘यदि कोई महिला प्रसव या गर्भवास्था के दौरान कमरबंद पहनेगी तो यह उसके गर्भ की रक्षा करेगा और बिना किसी परेशानी के सुरक्षित प्रसव कराएगा।’

यह जानने के लिए कि क्या चिकित्सा ग्रंथों में उल्लेखित प्रसव प्रथाएं वाकई में अमल में लाई जाती थीं, युनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज की सारा फिडीमेंट ने कमरबंद पर पड़े धब्बों का विश्लेषण किया। उन्होंने इरेज़र की मदद से नाज़ुक कमरबंद पर संरक्षित धब्बों को इस तरह हल्के-हल्के रगड़ कर छुड़ाया कि कमरबंद को कोई क्षति न पहुंचे। फिर इन नमूनों में विभिन्न तरह के प्रोटीन की पहचान की। प्राप्त परिणामों की तुलना उन्होंने एक नए चर्मपत्र और 18वीं शताब्दी के चर्मपत्र के नमूनों के साथ की। रॉयल सोसायटी ओपन साइंस में शोधकर्ता बताते हैं कमरबंद पर शहद, दूध, अंडे, अनाज, फलियां और विभिन्न मानव प्रोटीन के निशान मिले। और इनमें से कई मानव प्रोटीन ग्रीवा-योनि द्रव के प्रोटीन थे, जिससे लगता है कि महिलाएं प्रसव के दौरान इसे पहने रखती थीं।

इसके अलावा ग्रंथों में गर्भवती महिला के लिए जिस तरह के खान-पान का उल्लेख मिलता है, कमरबंद पर उसी तरह के खाद्यों के प्रोटीन की पहचान हुई है। ये इस बात का संकेत देते हैं कि ग्रंथों में उल्लेखित प्रथाओं को गंभीरता से अमल में लाया जाता था।

इस संदर्भ में अन्य शोधकर्ता बताते हैं कि महिलाओं के प्रसव के प्रति सजगता यूं ही नहीं बढ़ी होगी। दरअसल 1300 के दशक में युरोप में प्लेग फैलने के बाद वहां की आबादी में कमी आई थी, इसलिए सुरक्षित प्रसव के तरीके पहचानना और उन्हें अमल में लाना महत्पूर्ण रहा होगा।

वैसे यह अध्ययन मध्यकालीन प्रसव प्रथाओं के बारे में कोई नई जानकारी नहीं देता लेकिन यह बताता है कि प्राचीन पांडुलिपियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करके उनके उपयोग के बारे में पुष्टि की जा सकती है। इंग्लैंड और फ्रांस से इस तरह के लगभग एक दर्जन चर्मपत्र मिले हैं, जिसमें से कुछ प्रसव के दौरान उपयोग किए जाते होंगे जबकि कुछ का उपयोग सर्वार्थ सिद्धि तावीज़ या रक्षा कवच की तरह किया जाता होगा। जैसे युद्ध में जाने वाले पुरुषों की रक्षा के लिए। इन चर्मपत्रों पर मौजूद प्रोटीन या चिकित्सा पांडुलिपियों पर पड़े धब्बों के प्रोटीन की पहचान करके यह भी पता किया जा सकता है कि क्या ऑपरेशन टेबल पर शल्य क्रिया के दौरान उन्हें खोलकर रखा जाता था। (स्रोत फीचर्स)

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पुरातात्विक अध्ययनों में नए जेंडर नज़रिए की ज़रूरत

पुरातात्विक स्थलों से प्राप्त वस्तुओं-कंकालों के आधार पर वैज्ञानिक उस समय के समाज-संस्कृति का अनुमान लगाते हैं। कांस्य युगीन युरोप से प्राप्त टूटे-फूटे कंकालों के देखकर यह अंदाज़ा मिलता है कि यह समय इस समाज के लिए मुश्किल रहा होगा। अधिकांश इतिहासकार और पुरातत्वविद यह मानते हैं कि इन योद्धा समाजों का नेतृत्व पुरुष द्वारा ही किया जाता होगा।

अलबत्ता, हाल ही में हुए एक अध्ययन में, कांस्य युगीन महल में दफन महिला कंकाल का विश्लेषण यह संभावना जताता है कि महिलाएं भी नेतृत्व की भूमिका में रही होंगी। हालांकि स्पष्ट रूप से यह पता करने का कोई तरीका नहीं है कि महिलाएं कितनी शक्तिशाली रही होंगी, लेकिन इस अध्ययन के आधार पर शोधकर्ताओं का कहना है कि प्राचीन समय में महिलाओं की स्थिति या भूमिका के बारे में हमारी मान्यताओं पर पुनर्विचार करने की ज़रूरत है।

वर्ष 2014 में स्पेनिश शोधकर्ताओं को ला अल्मोलोया खुदाई स्थल पर एक खंडहर महल के नीचे बने मकबरे में एक कब्र मिली थी। यह खंडहर महल विस्तृत मैदान के बीच एक चट्टानी पहाड़ी पर स्थित था। जिस स्थल पर यह खंडहर था वह किसी ज़माने में एल एलगर समाज का हिस्सा था, जो लगभग 2200 से 1550 ईसा पूर्व तक दक्षिण-पूर्वी आइबेरियाई प्रायद्वीप के आसपास फला-फूला। पुरातत्वविदों को स्थल पर बुनाई के उपकरण और सामग्रियां मिली थीं, जिसके आधार पर उनका कहना था कि यह एक प्रमुख कपड़ा उत्पादक क्षेत्र था और संभवत: साम्राज्य का शक्तिशाली धन-सम्पन्न केंद्र भी था।

महल के मकबरे के नीचे एक बड़ा कमरा था। इस कमरे में आम तौर पर पाई जाने वाली वस्तुएं, जैसे औज़ार या पानी के बर्तन, या समारोह में इस्तेमाल होने वाली चीज़ें नहीं थी बल्कि कमरे की दीवारों से सटी हुई पत्थर की बेंच लगी थीं। इन्हें देखकर लगता था कि यह कमरा ध्यान लगाने, विचार-विमर्श करने या दरबार की जगह रही होगी।

कमरे के फर्श के नीचे मिट्टी का एक बड़ा पात्र दफन था जिसमें एक पुरुष और एक महिला का कंकाल था। रेडियोकार्बन डेटिंग ने पता चलता है कि उनकी मृत्यु 1650 ईसा पूर्व के आसपास हुई होगी। मृत्यु के समय पुरुष की उम्र लगभग 35-40 वर्ष होगी और महिला की उम्र लगभग 25-30 वर्ष होगी। शोधकर्ताओं को उनकी मृत्यु का कारण स्पष्ट नहीं हो पाया, क्योंकि उनके कंकाल में किसी तरह की घातक चोट के निशान नहीं थे। कंकालों के आनुवंशिक विश्लेषण से यह पता चला है दोनों कंकाल आपस में सम्बंधी (एक ही वंश के) नहीं थे। लेकिन उन दोनों की एक बेटी थी जिसकी मृत्यु बचपन में ही हो गई थी, और उसका शव वहीं पास में दफन था।

महिला-पुरुष के कंकालों का यह जोड़ा बहुमूल्य चीज़ों के साथ दफन था। पुरुष ने तांबे का कंगन पहना था और उसके कानों में सोने के बुंदे थे। लेकिन महिला आभूषणों से पूरी तरह लदी हुई थी। महिला ने चांदी के कई कंगन और अंगूठियां पहनी थीं, उसके गले में मोतियों का हार था और उसके सर पर आकर्षक ताज सुशोभित था। इस पुरातत्व स्थल से 90 किलोमीटर दूर स्थित एक अन्य पुरातत्व स्थल पर मिले एल एलगर समाज की चार महिलाओं के कंकाल के सर पर भी इसी तरह के ताज सुशोभित थे।

मूल्यवान चीज़ों के साथ दफन महिला-पुरुष के कंकालों के आधार पर शोधकर्ताओं का कहना है कि ये जोड़ा कुलीन वर्ग का होगा। महिला के आभूषणों को देखकर लगता है कि पुरुष और महिला में से महिला अधिक शक्तिशाली रही होगी, और संभवत: वह पास के एल एलगर समाज की क्षेत्रीय शासक होगी। युरोप के अन्य कांस्य युगीन स्थलों पर भी आभूषणों से सुसज्जित महिलाओं की कई कब्रों मिली हैं। पुरातत्वविद अब तक इन्हें भी शक्तिशाली योद्धाओं की पत्नियों के रूप में ही देखते आए हैं। लेकिन ला अल्मोलोया सहित अन्य सम्पन्न कब्रों को देखकर हम यह कल्पना क्यों नहीं करते कि संभवत: ये महिलाएं आर्थिक और राजनीतिक नेता रही हों।

प्राचीन समाज की वास्तविकता क्या है? वास्तव में उन समाजों में लोग एक दूसरे को किस तरह की भूमिका में देखते थे, यह स्पष्ट रूप से जानना तो लगभग असंभव है। लेकिन बेहतर होगा यदि हम आभूषणों से सुसज्जित प्राचीन महिला को पुरुष पराक्रम की छाया के रूप में न देखें। यदि हम यह मानते हैं कि कब्रों में साथ में दफनाई गई चीज़ें व्यक्ति की अपनी होती हैं तो हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि शायद कांस्य युग में महिलाएं भी शासकों की भूमिका में रही थीं। (स्रोत फीचर्स)

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सज़ायाफ्ता की रिहाई के लिए वैज्ञानिकों की गुहार

विश्व के लगभग नब्बे वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने मिलकर नए साक्ष्यों के आधार पर बाल हत्याओं की दोषी सज़ायाफ्ता कैथलीन फोलबिग को क्षमा करने के लिए अर्जी दी है। नए वैज्ञानिक साक्ष्य बताते हैं कि उनके बच्चों की मृत्यु प्राकृतिक कारणों से हुई थी।

दरअसल मामला 53 वर्षीय कैथलीन फोलबिग का है जिनके चार बच्चों की मृत्यु वर्ष 1989 से 1999 के दौरान हुई थी। वर्ष 2003 में उन्हें इन मौतों का दोषी ठहराया गया था और 30 साल के कारावास की सज़ा सुनाई गई थी। फोलबिग अब तक 18 वर्ष की सज़ा काट चुकी हैं।

लेकिन फोलबिग को मोटे तौर पर परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (उनकी डायरी) के आधार पर दोषी ठहराया गया था। जब लॉरा उनके गर्भ में थी तब 1 जनवरी, 1997 को फोलबिग ने अपनी डायरी में लिखा था: ‘यह साल बीत गया, और नया साल आने वाला है। मुझे बच्चा होने वाला है। इसका मतलब हम दोनों को ज़िंदगी में कई बड़े समझौते करने पड़ेंगे, लेकिन मुझे यकीन है कि सब ठीक ही होगा। इस बार मैंने किसी से मदद मांगी है, इस बार सब कुछ मैं अकेले करने की कोशिश नहीं करूंगी। मुझे पता है कि मेरे सारे तनावों का मुख्य कारण यही है और तनाव के कारण मैं कई बार भयानक कर गुज़रती हूं…।’ डायरी का एक अन्य अंश: ‘मुझे लगता है कि मैं इस धरती पर सबसे बुरी मां हूं। मुझे डर लगता है कि वह भी मुझे सारा की तरह छोड़कर चली जाएगी। मैं जानती हूं कि मुझे गुस्सा बहुत जल्दी आता है। कभी-कभी मैंने उसके साथ बुरा और क्रूर बर्ताव किया, आखिर वह हमको छोड़कर चली गई। थोड़ी मदद के ज़रिए।’

फोलबिग द्वारा बच्चों की मृत्यु के दौरान लिखी यह डायरी पढ़ने के बाद फोलबिग के पति ने उन पर हत्या का आरोप लगाया था। और इन्हीं अंशों के आधार पर उन्हें सज़ा सुनाई गई थी। लेकिन फोलबिग का कहना था कि डायरी में उल्लेखित ‘मदद’ से उनका आशय भगवान या किसी दैवीय शक्ति से था।

इसके बाद इस मामले में महत्वपूर्ण नए चिकित्सा साक्ष्य पता चले जो बताते हैं कि फोलबिग के कम से कम दो बच्चों, सारा और लॉरा, की मृत्यु प्राकृतिक कारण (हृदय गति रुकने) से हुई थी। और अन्य दो बच्चों की मृत्यु में भी आनुवंशिक कारण होने की संभावना दिखाई दे रही है।

सारा और लॉरा के डीएनए का आनुवंशिक अनुक्रमण करने पर पाया गया कि दोनों शिशुओं को अपनी मां से विरासत में एक आनुवंशिक उत्परिवर्तन CALM2 मिला था। यह ज्ञात है कि CALM2 जीन के उत्परिवर्तन के कारण अचानक हृदय गति रुक सकती है और मृत्यु हो सकती है। CALM2 जीन में उत्परिवर्तन शिशुओं और वयस्कों में जागते या सोते समय अचानक मृत्यु के लिए ज़िम्मेदार प्रमुख कारणों में से एक है। यदि इस उत्परिवर्तन के साथ कोई अन्य संक्रमण पनप रहा हो या स्यूडोएफेड्रिन जैसी दवाएं दी जा रही हों तो यह उत्परिवर्तन कार्डिएक एरिद्मिया (असामान्य हृदय गति) की स्थिति पैदा कर सकता है।

इसके अलावा अन्य अध्ययन भी यह संभावना जताते हैं कि फोलबिग के दो बेटों की मृत्यु भी भिन्न आनुवंशिक उत्परिवर्तन के कारण से हुई होगी। इस तरह वैज्ञानिक साक्ष्य फोलबिग के चारों बच्चों की मृत्यु के पीछे प्राकृतिक कारण दर्शाते हैं।

पूर्व में फोलबिग के लिए लड़ने वाली बैरिस्टर रैनी रेगो कहती हैं कि हमारा कानूनी तंत्र न्याय करने में गलतियां भी करता है। जब बच्चों की हत्या जैसे अपराध के लिए गंभीर सज़ा की बात आती है तो चिकित्सकीय साक्ष्यों को परिस्थितिजन्य साक्ष्यों से ऊपर रखना चाहिए। और इसलिए इन्हीं नए वैज्ञानिक साक्ष्यों को प्रकाश में लाने के लिए नोबेल पुरस्कार विजेता पीटर डोहर्टी, नोबेल पुरस्कार विजेता एलिज़ाबेथ ब्लैकबर्न और पूर्व ऑस्ट्रेलियन ऑफ दी ईयर फियोना स्टेनली समेत विश्व के कई जाने-माने वैज्ञानिकों और चिकित्सकों ने याचिका दायर की है। यदि इस याचिका पर गौर नहीं किया जाता है तो यह फोलबिग के मूलभूत मानवाधिकारों का हनन होगा और यह मामला परिस्थितिजन्य साक्ष्यों की व्यक्तिपरक व्याख्याओं को वरीयता देने और चिकित्सकीय-वैज्ञानिक सबूतों की अनदेखी की मिसाल बन जाएगा।

फोलबिग को क्षमा करने का निर्णय अब वहां के राज्यपाल का है। यदि फोलबिग को माफी मिल भी जाती है, तो भी वह अपने आप अपने बच्चों की हत्या के आरोप से दोषमुक्त नहीं होंगी। इसके लिए उन्हें अदालत में गुहार लगानी ही पड़ेगी। (स्रोत फीचर्स)

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महामारी में वैज्ञानिक मांओं ने अधिक चुनौतियां झेलीं

मार्च 2020 में मिशिगन विश्वविद्यालय की कैंसर विज्ञानी रेशमा जग्सी ने कोविड-19 महामारी के महिला वैज्ञानिकों के काम पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव के बारे में पूर्वानुमान लगाते हुए एक राय लिखी थी। डैटा न होने के कारण संपादकों ने इस राय को प्रकाशित करने से मना कर दिया था। लेकिन इसके बाद से कई टिप्पणीकार यही बात दोहराते आए हैं। अब अध्ययन से प्राप्त प्रमाणों से स्पष्ट हो गया है कि कोविड-19 महामारी में पहले से व्याप्त असमानताएं और बढ़ गर्इं हैं, इस दौर ने महिला वैज्ञानिकों के लिए नई चुनौतियां खड़ी की हैं। खासकर जिन महिला वैज्ञानिकों के बच्चे हैं उन्होंने अपना अनुसंधान कार्य करते रहने के लिए अतिरिक्त संघर्ष किया है।

कुछ विषयों में किए गए अध्ययन के डैटा से पता चलता है कि कोरोना महामारी के शुरुआती महीनों में भेजे गए प्रीप्रिंट्स, पांडुलिपियों, और प्रकाशित शोधपत्रों में महिला लेखकों की संख्या में कमी आई है। 20,000 शोधकर्ताओं पर वैश्विक स्तर पर किए गए सर्वेक्षण में पाया गया है कि इस दौरान पिता-वैज्ञानिकों की तुलना में माता-वैज्ञानिकों के अनुसंधान कार्यों के घंटों में 33 प्रतिशत अधिक की कमी आई है। मई 2020 से जुलाई 2020 तक हुए सर्वेक्षण में यह भी पाया गया कि माता-वैज्ञानिकों ने पिता-वैज्ञानिकों की तुलना में अधिक घरेलू दायित्व निभाए और बच्चों की देखभाल करने में अधिक समय बिताया।

लेकिन इस दौरान थोड़ी सकारात्मक बातें भी दिखीं। एक फंडिंग एजेंसी ने महामारी के दौरान बढ़ी लैंगिक असमानता को पहचाना और उसमें सुधार के प्रयास किए। दरअसल, फरवरी 2020 में केनेडियन स्वास्थ्य अनुसंधान संस्थान ने कोविड-19 सम्बंधी शोध कार्यों के लिए अनुदान की पेशकश की थी, जिसमें एजेंसी ने शोधकर्ताओं को प्रस्ताव भेजने के लिए महज़ 8 दिन की मोहलत दी थी। यह कनाडा में तालाबंदी के पहले की बात है। लेकिन उन्होंने देखा कि प्राप्त प्रस्तावों में से केवल 29 प्रतिशत प्रस्ताव ही महिला शोधकर्ताओं द्वारा भेजे गए थे, यह संख्या पूर्व में भेजे जाने वाले प्रस्तावों की संख्या से लगभग सात प्रतिशत कम थी।

संख्या में इतना अंतर देखने के बाद संस्थान के इंस्टीट्यूट ऑफ जेंडर एंड हेल्थ की निदेशक कारा तेनेनबॉम को लगा कि हमने कहीं कुछ गलती कर दी है। इसीलिए जब संस्थान ने दो महीने बाद कोविड-19 शोध कार्यों के लिए दोबारा प्रस्ताव मंगाए तो उन्होंने प्रस्ताव भेजने की समय सीमा को 8 दिन से बढ़ाकर 19 दिन कर दी और दस्तावेज़ी कार्रवाइयां भी कम कर दीं। प्रोसीडिंग्स ऑफ दी नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज़ में के अनुसार दूसरे दौर में महिलाओं द्वारा भेजे गए प्रस्तावों की संख्या बढ़कर 39 प्रतिशत हो गई थी।

संस्थान द्वारा मांगे गए प्रस्तावों के संदर्भ में लावल युनिवर्सिटी की स्वास्थ्य शोधकर्ता होली विटमैन अपना अनुभव बताती हैं, “जब पहली बार मैंने प्रस्ताव भेजने की समय सीमा महज़ 8 दिन देखी तो मैंने सोचा कि दो बच्चों और अपनी स्वास्थ्य स्थिति के साथ इतने कम समय में अनुदान के लिए देर रात तक बैठकर प्रस्ताव लिखना और भेजना संभव नहीं है। लेकिन जब अनुदान के लिए दोबारा प्रस्ताव मांगे गए तो प्रस्ताव लिखने के लिए पर्याप्त समय था, जिसमें अंतत: मुझे अनुदान मिला भी।”

महामारी के दौर में अधिकांश शोधकर्ताओं के शोध कार्य के घंटों में कमी आई। ताज़ा अध्ययन बताते हैं कि पालक-शोधकर्ताओं, खासकर माता-शोधकर्ताओं के काम के घंटों में बहुत कमी आई है। पिता की तुलना में माताओं ने बच्चे की देखभाल और गृहकार्य करने में अधिक समय बिताया। इस संदर्भ में सान्ता क्लारा युनिवर्सिटी की रॉबिन नेल्सन बताती हैं कि पिछले साल की तुलना में कोरोनाकाल में उनके काम के घंटे घटकर आधे हो गए हैं क्योंकि उनके दो बच्चे अब घर पर होते हैं। कुछ शोधकर्ता अन्य की तुलना में अधिक बाधाओं में काम कर रहे हैं। इसलिए हमें अब अनुदान की प्रक्रिया, समय सीमा, नीतियों आदि पर सवाल उठाने चाहिए।

बोस्टन विश्वविद्यालय के इकॉलॉजिस्ट रॉबिन्सन फुलवाइलर का कहना है कि विश्वविद्यालयों और फंडिंग एजेंसियों को वैज्ञानिकों को यह बताने का भी विकल्प देना चाहिए कि कोविड-19 ने उनके काम में किस तरह की बाधा डाली या प्रभावित किया। इसके अलावा नियोक्ताओं को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि सभी शोधकर्ताओं को ठीक-ठाक झूलाघर जैसी सुविधाएं मिलें। फुलवाइलर और अन्य माता-वैज्ञानिकों ने प्लॉस बायोलॉजी में इस तरह की व कई अन्य सिफारिशें की हैं। कोरोनाकाल में और स्पष्ट होती असमानता को अब दूर करने के प्रयास करने का वक्त है। (स्रोत फीचर्स)

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